Sunday, October 19, 2014

हम कीड़ों से मदद मांगते हैं जिनकी हमने ज़रा भी भी परवाह नहीं की - माज़ेन मारूफ़ की कवितायें – ३


 मौत की बाबत

- माज़ेन मारूफ़

जब हम मरते हैं
अब तक न बोले गए हमारे शब्द 
बुलबुलों में बदल जाते हैं 
फुलाना शुरू करते हैं शरीर को वे
और तस्करी कर उसे बाहर निकाल लाते हैं कब्र से
जबकि सोया होता है कब्रगाह का चौकीदार
लेकिन
देहों पर धरी पत्थर की शिला
हमसे टकराती है
और हटने से इनकार कर देती है.
सो
हम कीड़ों से मदद मांगते हैं जिनकी हमने ज़रा भी भी परवाह नहीं की
एक कीड़ा यहाँ
एक वहाँ
हर कीड़ा कुतरता जाता है
उनमे से एक-एक शब्द को
कुछ भी नहीं छोड़ता
अपने पीछे सिवा
खुरचन के
जो इकठ्ठा होती हुई बगल में धीरे-धीरे
रचती हुई एक कंकाल
जो लौटता है स्कूल से
हर रोज़

एक टुकड़ा कम.  

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