Tuesday, October 7, 2014

ग़ज़ल की मलिका बेगम अख़्तर की जन्म शती और इन्दौर से उनका राब्ता


बस एक झिझक है यही हाल ए दिल सुनाने में;तेरा ज़िक्र भी आएगा इस फ़साने में
ईरान से हिन्दुस्तान आई और दिल्ली में आबाद होकर फली फूली ग़ज़ल को परवाज़ देने में बेगम अख़्तर की ख़िदमत को कभी भुलाया नहीं जा सकता. आज ७ अक्टूबर को अख़्तरीबाई पूरे सौ बरस की होतीं. इन्दौर से रसिकराज कहे जाने वाले रामूभैया दाते और बेगम अख़्तर के रेकॉर्ड संकलनकर्ता आर.के आमेरिया के साथ बेगम साहिबा का एक रूहानी राब्ता था. जन्मशती नज़दीक आते ही मुझे इन्दौर के संगीतप्रेमी और बेगम अख़्तर की ग़ज़लों के शैदाई महावीरकुमार जैन ने बताया कि इन्दौर को तक़रीबन पाँच बार बेगम साहब को सुनने का मौक़ा मिला. क्लासिकल मौसीक़ी की ख़िदमत करने वाले मध्यप्रदेश के प्रतिष्ठित अनुष्ठान अभिनव कला समाज और होलकर राजवंश के ज़माने में स्थापित हुए यशवंत क्लब में बेगम अख़्तर लगातार आती रहीं. आख़िरी बार वे केन्द्रीय सरकार के कर्मचारियों के संगठन में १७ मार्च १९७४ को आईं थी. इसी बरस ३० अक्टूबर को अहमदाबाद में उनका निधन हो गया.
महावीरजी को किशोरवय में बेगम अख़्तर का चस्का लगा. बाद में बेगम अख़्तर एक तिलिस्म की मानिंद इस संगीत रसिक के मानस पर छा गईं.उनकी मुराद तब पूरी हुई जब बेगम अख़्तर के मुरीद और इंटीरियर डेकोरेटर स्व.आर.के. आमेरिया से मुलाक़ात हुई और बेगम साहिबा की रचनाओं के एलपी महावीर जैन के ख़ज़ाने में आ शरीक हुए. बाद में सुमन चौरसिया से भी उन्हें कुछ दुर्लभ रेकॉर्ड्स की रेकॉर्डिंग हासिल हो गई. इन्दौर के आर.एन.टी.मार्ग पर युनिवर्सिटी के सामने एक होटल हुआ करती थी जहाज़ महल.एक दिन वहाँ से गुज़रते हुए महावीरजी को बेगम अख़्तर की आवाज़ सुनाई दी. अंदर गए और चार रूपये में ख़य्याम द्वारा कम्पोज़ किया एलबम सुना.बाद में दो-तीन बार और जब वहाँ जाकर कोक पीने लगे तो मैनेजर शिवदत्त सूद ने मशवरा दिया कि एलपी क्यों नहीं ख़रीद लेते.महावीरजी ने २५/- में एल पी ख़रीदा.पर बजाएँ कहाँ ? तो पुराने शहर के इलाक़े टोरी कॉर्नर पर बाबूलाल गिरी के होटल पर महावीरजी जाते,साथ में एल पी ले जाते और एक अठन्नी वाली चाय के साथ बेगम अख़्तर की मख़मली आवाज़ का रसपान करते.
महावीरजी ने बताया कि इन्दौर के आख़िरी शो के मेज़बान आयकर आयुक्त और शायर जे.एस.आनन्द थे और शहर के एकमात्र सभागार रवीन्द्र नाट्य गृह में तिल भर जगह नहीं थी,सुनकार ज़मीन पर बैठे हुए थे. इस प्रोग्राम की तफ़सील का इश्तेहार नईदुनिया में आया था और एक,दो और पाँच रूपये के टिकिट बेचे गये थे. महावीरजी ने ये सोचकर कि कुछ मित्रों को इस सर्वकालिक महान गुलूकारा के कंसर्ट निमंत्रण लेने में तकलीफ़ न हो;एक साथ दस कार्ड ख़रीद लिये. कार्ड बेचने वाला महावीरजी को भौंचक होकर देखता रह गया और कहने लगा कि क्या वाक़ई इतनी बड़ी आर्टिस्ट हैं ये ? अंतिम कार्यक्रम के दूसरे दिन शहर के नामचीन उद्योगपति आई.एस.गजरा के निवास पर बेगम अख़्तर की प्रायवेट महफिल जमी. कोई सौ सुनने वाले थे. तबले पर इन्दौर के उस्ताद सुलेमान ख़ाँ संगत कर रहे थे.महावीरजी ने बताया बेगम साहिबा को बार बार सिगरेट की तलब लगती थी लेकिन वे बेहद अदब पसंद थीं सो बीच बीच में बाहर बरामदे में जाकर सिगरेट पीतीं थी. आग्रह करने पर बेगम अख़्तर ने महावीरजी के साथ सहर्ष तस्वीर खिंचवाई.और तो और उन्होंने वह जगह भी ख़ुद चुनी कि कहाँ पर तस्वीर बेहतर आएगी. सिल्क की साड़ी में बेगम अख़्तर बहुत ज़हीन लग रहीं थी. बस यही ग़ज़ल की मलिका की अन्तिम यात्रा थी. (ये तस्वीरें इन्दौर के जाने-माने प्रेस फ़ोटोग्राफ़र स्व.महेन्द्र महाजन ने खीचीं दूसरी तस्वीर में महावीरकुमार जैन बेगम अख़्तर के साथ नज़र आ रहे हैं) बहज़ाद लख़नवी की ग़ज़ल दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे/वरना कहीं तक़दीर तमाशा न बना दे पूरे देश में बेगम अख्तर की लोकप्रियता का सरताज बनी.नोट करने वाली बात ये है कि इस रेकॉर्ड में उनके साथ सारंगी पर संगत की है पटियाला घराने के सिरमौर गायक उस्ताद बड़े गु़लाम अली ख़ा साहब ने. मेरी इस पोस्ट को सुरीला बनाने के लिये जारी कर रहा हूँ बेगम अख़तर की गाई एक गुजराती ग़ज़ल.

2 comments:

javed khan said...

इंदौर और
इंदौर के गुणी और
जौहरी की तरह हीरों की क़द्र करने वाले
और उन यादों को ऐसे समेटने वाले के वो जीवन का अटूट हिस्सा बन जाएँ
और फिर उन्हें बांटते भी फिरें ज़िक्र हुवा
उस्ताद सुलेमान साहब का भी उनके साहबज़ादे
हमारे अपने स्कूल में पढ़ा करते थे जो अम्मी चलाया करती थीं पापा की देखरेख में सुलेमान साहब सामने कमल कामले दादा को भी तबला सिखाने आया करते थे
फिर कभी छुट्टी होती तो पापा के पास बैठक में महफ़िल जम जाती चाय की प्यालियों के ढेर लग जाते हम उनके जाने का वक़्त समझ जाते जब वो सिर्फ हाँ हूँ करते या अपनी जेब से नफ़ासत से पुड़िया खोल कर मुंह में पान की गिलौरी दबा लेते कभी कभी तो गावड़े (विजय)अंकल भी आ जाते बस फिर क्या ...
@संजय भाई बेहद शुक्रिया एक दौर को यूँ यादों से उतार कर बुहारने का

javed khan said...

इंदौर और
इंदौर के गुणी और
जौहरी की तरह हीरों की क़द्र करने वाले
और उन यादों को ऐसे समेटने वाले के वो जीवन का अटूट हिस्सा बन जाएँ
और फिर उन्हें बांटते भी फिरें ज़िक्र हुवा
उस्ताद सुलेमान साहब का भी उनके साहबज़ादे
हमारे अपने स्कूल में पढ़ा करते थे जो अम्मी चलाया करती थीं पापा की देखरेख में सुलेमान साहब सामने कमल कामले दादा को भी तबला सिखाने आया करते थे
फिर कभी छुट्टी होती तो पापा के पास बैठक में महफ़िल जम जाती चाय की प्यालियों के ढेर लग जाते हम उनके जाने का वक़्त समझ जाते जब वो सिर्फ हाँ हूँ करते या अपनी जेब से नफ़ासत से पुड़िया खोल कर मुंह में पान की गिलौरी दबा लेते कभी कभी तो गावड़े (विजय)अंकल भी आ जाते बस फिर क्या ...
@संजय भाई बेहद शुक्रिया एक दौर को यूँ यादों से उतार कर बुहारने का