Saturday, October 11, 2014

काँटों का भी हक़ है कुछ आखि़र


जिगर मुरादाबादी का कलाम. बेग़म अख्तर की अमर आवाज़ –

 

कोई ये कह दे गुलशन गुलशन
लाख बलाएँ एक नशेमन

फूल खिले हैं गुलशन गुलशन
लेकिन अपना अपना दामन

आज न जाने राज़ ये क्या है
हिज्र की रात और इतनी रोशन

काँटों का भी हक़ है कुछ आखि़र
कौन छुड़ाए अपना दामन 

3 comments:

Rs Diwraya said...

आपने बहुत खुब लिख हैँ। आज मैँ भी अपने मन की आवाज शब्दो मेँ बाँधने का प्रयास किया प्लिज यहाँ आकर अपनी राय देकर मेरा होसला बढाये

सुशील कुमार जोशी said...

बस वाह । आभार ।

सुशील कुमार जोशी said...

बस वाह । आभार ।