Monday, January 12, 2015

अन्ना कामीएन्सका की नोटबुक से कुछ बेतरतीब बातें

वह पूरी सम्पूर्णता में ग़रीब थी. वह फ़क़त अपनी तस्बीह के साथ गयी. वह अपने पीछे काली लाख और जर्जर मिसल वाले बेंत के छप्पर की एक जायदाद छोड़ गयी जिसमें पुराने तरीके से पापों का हिसाब किताब करने के तरीके थे मिसाल के तौर पर नौकरों और गुलामों से कैसा सुलूक किया जाए. इतना तो है हमें इस बाबत चिंता करने की ज़रुरत ज़रा कम है.
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लड़खड़ाती चलती हूँ कविताओं के सहारे.
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कवितायेँ समय के पदार्थ से क्रिस्टलों में बदलती हैं. क्षणों का एक गुच्छा, टंगा हुआ झूलता मधुमक्खी के  छत्ते के मुंह से.
तली तक बैठने में लम्बा वक़्त लेता है कविता का नमक.
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हम सब के पास अपना अध्यात्म होता है, चाहे हमें इसका भान हो ही नहीं या हम ज़रा भी शंका न करें उसकी बाबत.
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मेरे सपनों में एक बार फिर से पानी.साफ़, शफ्फाफ़, बालू पर बहता, इतना पारदर्शी कि आप तल पर तैर रही सर्पिल मछलियों तक को देख सकते हैं.
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कविताओं की कतरनों और इस्तेमाल न किये गए विचारों से भरा एक घर. विचारों का एक घोंसला, शब्द के मेहनतकश बढ़ई की छीलनें. झाग की तरह उनकी प्रचुरता, मेरे अस्तित्व के चारों तरफ, ज़रुरत से ज़्यादा खौलता पानी. मुझे नहीं मालूम क्यों इस या उस कविता को मैंने सज़ा दे दी खामोश हो रहने, कुछ न होने की; मैंने इसे क्यों लिखा, उस विचार को क्यों नहीं. सब झाग है.
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जब सब शांत हो जाता है
अनंत भी आराम करता है
और चीज़ें हमारे लिए और नहीं रोतीं
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मैंने चांदी के मुखौटे पहने देखा अपने मृतकों को.
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हम “इस संसार” और “अगले संसार” की बातें करते हैं. “आस्तिक” वे होते हैं जो कथित रूप से“अगले संसार” पर, उसकी वास्तविकता पर भरोसा करते हैं.      

मैं “अगले संसार” पर यकीन नहीं करती. संसार एक है. एक सच्चाई. मृत्यु अगले संसार में जाने का रास्ता नहीं है कोई, हो सकता है वह हो अंधी आँखों का खुल जाना.

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