Sunday, January 25, 2015

शादी क्यों नहीं की बदरी काका ने

बदरी काका के परम शिष्य गोपाल उर्फ़ गोपालौ का अंतिम उपलब्ध फ़ोटू 

बदरी काका से अपनी पुरानी पहचान है. अरे वही इटली में रहनेवाले गोल टोपी वाले बुढ्ढे के बालसखा. उनके अविवाहित रह जाने की कथा कभी सुनाई थी. आज फिर सुनाने का मन हो रहा है-  


जैसा पहले मैंने बताया था बदरी काका की आयु के बारे में कोई निश्चित अनुमान नहीं लगाया जा सकता है. लेकिन विद्वानों का मानना है कि उनके विवाह से सम्बंधित इकलौता प्रामाणिक विवरण १९३० के दशक के उत्तरार्ध में पाया जाता है.

तब पर्यटन हेतु कुमाऊं के पहाड़ों में या तो बंगाली आया करते थे या गुजराती सेठ. बंगालियों के आने का मुख्य उद्देश्य ज्ञान की प्राप्ति या आध्यात्मिक विकास हुआ करता था. गुजराती लोगों के आने का तब कोई निश्चित प्रयोजन किसी को ज्ञात नहीं था.

खैर. उस दिन लोधिया की चुंगी के पास बदरी काका को अपने एक पुराने मित्र के आने का इंतज़ार करते हुए कई लोगों ने देखा था. यह अलग बात है कि काका का दोस्त सुबह दस बजे ही आ गया था और उनके रानीधारा वाले डेरे में उनके आने की राह देख रहा था. काका जान बूझकर छिपे हुए एक खोखे में बैठे उस गुजराती सेठ पर निगाहें लगाए थे जो तीन दिन से अपनी कार स्टार्ट नही कर पा रहा था.

अल्मोड़ा में आने वाली वह पहली मोटरकार थी. शुरू में तो लोगों ने बहुत अविश्वास और हैरत के साथ मोटर को देखा पर तीन दिनों तक उसे लोधिया के पास लगातार खडा देखते देखते उनकी हैरत ख़त्म हो गई थी. लोग तो यहाँ तक कहने लगे थे कि इस से तो अच्छा खच्चर हुआ जिसे कम से कम बीमार हो जाने पर बदला तो जा सकता है और काम के हर्जे से बचा जा सकता है. फिलहाल लगातार तीसरे दिन गाडी स्टार्ट करने की जुगत में लगे गुजराती सेठ को जब पहली बार बदरी काका ने आपनी सहायता देने का प्रस्ताव दिया तो सेठ ने एक बार उन्हें इस बुरी तरह झिड़का कि काका जैसा आदमी भी अपना धैर्य खोने ही वाला था. लेकिन कूर्मांचल प्रदेश के गौरव अल्मोड़ा नगर से कोई आदमी बेसहारा निकल जाये यह काका की बर्दाश्त से बाहर था.

काका खोखे में बैठे रहे और सेठ लगातार मोटर पर लगा रहा.

आख़िर शाम ढलने को हुई. निराशा सेठ के चेहरे पर छपी हुई थी. काका एक बार फिर उस के पास गए और बोले:

"
सर आप चाहें तो एक बार में देखूं बोनट के भीतर?"

एक गंवार दिख रहे आदमी के मुँह से बोनट शब्द सुन कर सेठ जी को थोडा अचरज हुआ. 'चलो देखते हैं' वाला भाव चेहरे पर ला कर उसने काका को इस की इजाज़त दे दी.

बोनट उठा कर काका ने किसी विशेषज्ञ की तरह भीतर देखा और सेठ से पेंचकस माँगा.

बदरी काका ने इंजन के बाँई तरफ एक पेंच को जरा सा घुमाया और सेठ जी से कहा: "अब ज़रा स्टार्ट कर के देखिए."

और लीजिये गाडी स्टार्ट हो गई.

गाँव की किम्वदंतियों में यह बात स्थापित है कि उस के बाद गुजराती सेठ करीब दस मिनट तक काका के पैरों से नही हटा.

वह काका से कहता रहा : "मुझे माफ़ कर दीजिए. मुझे माफ़ कर दीजिए."

आख़िर मजबूर हो कर काका ने उसे माफ़ कर दिया. उन्हें घर जाने की देर हो रही थी और उनका दोस्त सुबह से भूखा था.

लेकिन बात ऐसे खतम होने वाली नहीं थी. सेठ चाहता था कि काका उस के साथ गुजरात चलें.

"बदरी जी एक बार बस एक बार मेरे साथ चलिए. आपको पता नहीं आप जैसे महापुरुष की तलाश में मैं कितने सालों से भटक रहा हूँ."

बदरी काका को झूठ बोलना पड़ा कि उन्हें घर जा कर माँ की देख रेख करनी है. सेठ को तात्कालिक टामा पिलाने की नीयत से काका ने एक दो झूठ और बोले और कहा अगर सेठ जी को उनकी इतनी ही ज़रूरत है तो वह ठीक एक साल बाद अल्मोड़ा आ जाएँ. तब वे चल देंगे.

यह बात काका ही नही सारा शहर जानता था कि इस तरह के अमीर लोगों के वायदे कभी सच नही होते.

लेकिन ठीक ३६५ दिन बाद गुजराती सेठ अल्मोड़ा में था.

वादा किया था तो निभाना भी था ही. सेठ काका को अपनी गाडी में बिठा कर ले चला. कहते हैं कि गोपाल का बाप उन्हें छोड़ने गरमपानी तक गया था.

अब रास्ते में काका को याद आया कि यात्रा का उद्देश्य तो उन्होने पूछा ही नहीं.
काका के ऐसा पूछने पर गुजराती सेठ की आंखों में आंसू भर आये और उसने कहा : "ऐसा है बदरी जी भगवान् ने सब कुछ दिया. करोड़ों की दौलत दी. शोहरत दी. बस एक बेटा नहीं दिया ..."

सेठ जी के अपनी बात पूरी करने से पहली ही बौखलाते हुए बदरी काका ने सेठ से गाडी रोकने को कहा. "अगर आप मुझे अपना बेटा बनाना चाहते हैं तो इस बात को भूल जाइए. मेरे पास वैसे ही हजारों काम करने को होते हैं. आप जाएँ सेठ जी. मैं खुद ही अल्मोड़ा पहुंच जाऊंगा. ..."

"
ऐसा नहीं है बदरी जी. मेरी एक बेटी है बस. सोच रहा हूँ कि उसके हाथ जल्दी से पीले कर दूँ और हम मियाँ बीवी हरिद्वार किसी आश्रम में अपना बुढापा काटें. लेकिन इतनी बड़ी जायदाद सम्हालने को कोई योग्य वर भी तो चाहिए होता है. उसी की तलाश में इतने साल भटकने के बाद आखिरकार मुझे भगवान् ने आप के दर्शन करा दिए. मैं तो बस यह चाहता हूँ कि आप मेरे दामाद बन जाएँ और मुझ बदनसीब के जीवन की नैया पार लगा दें. मैं अपनी सारी ज़ायदाद आपके नाम करना चाहता हूँ. ..."

"
यानी आप मुझे घरजवाईं बनाने ले जा रहे हैं. वह भी पैसों का लालच देकर! ना सेठ जी, मुझे माफ़ करें ..."

"
आप मेरी बात तो सुनिये. देखिए हम दो जन तो हरिद्वार जा के रहेंगे. मैं तो आपको देखते ही समझ गया था कि आप कोई पहुंचे हुए महात्मा हैं. मेरा एक प्रस्ताव है. मेरी सारी सम्पत्ति बेच कर आप अल्मोड़ा में बेसहारा लोगों के लिए कोई आश्रम खोल लें या और किसी परोपकार कार्य में उस पैसे को लगा दें. लेकिन मुझे पता है मेरी बेटी को आप से बेहतर वर इस जनम में तो नहीं मिल सकता. एक बार हाँ कह दीजिए बदरी जी. मैं आप के चरण छूता हूँ."

सेठ की इस बात से काका के मन में दो बातें आईं: एक तो यह कि ज़रूर इस सेठ की लड़की में बीसियों खोट होंगे जो यह इतनी दूर अल्मोड़ा से उस के लिए वर खोज कर ले जा रहा है. दूसरा यह कि अगर पहले वाली बात सच नही है तब सेठ का प्रस्ताव विचार करने योग्य है.

"
देखिए साब. बिना लड़की देखे मैं हाँ या ना नहीं कह सकता." बदरी काका कह गए.

"
इसी लिए तो आपको ले जाने आया हूँ बदरी जी. आप कनुप्रिया को एक बार देख कर पसंद कर लें. तभी हाँ कहें. मेरी बेटी आपको पसंद न आए तो मैं खुद आपको वापस अल्मोड़ा छोड़ कर आऊंगा."

कई दिनों कि यात्रा के बाद आखिरकार दोनों अहमदाबाद पहुंचे. सेठ जी के महल जैसे घर में सैकड़ों नौकर चाकर थे. बैठक में सोने और चांदी से बनी मेज कुर्सियां थीं. उनकी पत्नी ने बदरी काका का तिलक लगा कर स्वागत किया.

आखिरकार वह क्षण आ ही गया जब सेठ जी की बेटी हीरे जड़े कपों में चाय ले कर आई. एक हाथ से उस ने ट्रे सम्हाली हुई थी जबकि दूसरे हाथ की सबसे छोटी उंगली उसने बांये गाल पर हलके से छुआ भर रखी थी.

बदरी काका ने इतनी सुन्दर लड़की की कभी सपने तक में कल्पना नहीं की थी. उन्हें अपनी तकदीर पर भरोसा नहीं हो रहा था. जब सेठ और सेठानी दोनों को अकेला छोड़ कर बाहर गए तो बदरी काका और कनुप्रिया के बीच एक घंटे का बेहद बुद्धिमत्तापूर्ण वार्तालाप हुआ. कनुप्रिया ऑक्सफोर्ड में पढ़ कर आयी थी लेकिन एक भारतीय नारी के उस में सारे गुण मौजूद थे. उसे शास्त्रीय संगीत का अपार ज्ञान था और वह खुद गाती भी थी. बातचीत के दौरान उसने 'ना जाओ सैंया' को चार अलग अलग रागों में गा कर भी सुनाया. भारतेंदु हरिश्चंद्र और जयशंकर प्रसाद जी उन के घर हर साल महीना महीना भर रहने आया करते थे.

लेकिन इस पूरे समय कनुप्रिया ने दूसरे हाथ की सबसे छोटी उंगली को अपने बांये गाल से एक पल को भी नहीं हटाया. बदरी काका संकोचवश इसका कारण नही पूछ सके. लेकिन उनके मन में आता रहा कि कहीं इस उंगली के नीचे कोढ़ तो नहीं. या क्या मालूम उंगली जन्म से ही उसके गाल से चिपकी हुई हो ... या ...

बाद में कनुप्रिया के चले जाने के बाद सेठ जी ने बदरी काका से उनके फैसले के बारे में पूछा. कुछ देर सोचने के बाद काका ने एक बार फिर से कनुप्रिया को देखने की इच्छा व्यक्त की.

कनुप्रिया आई तो सेठ जी जाने लगे. "आप यहीं बैठें सेठ जी." कनुप्रिया की उंगली अब भी उसी तरह गाल पर थी.

"
सेठ जी अपनी बेटी से कहें कि गाल से उंगली हटाए."

सेठ जी ने कनुप्रिया को इशारा किया तो कनुप्रिया ने उंगली हटा दी. गाल पर सुई की नोक बराबर एक ताज़ा फुंसी थी. बदरी काका ने एक पल फुंसी को देखा फिर कनुप्रिया को. सोने से बनी कुर्सी से उठते हुए बदरी काका ने सेठ जी से कहा :

"बाक़ी तो सब ठीक है सेठ जी. फुंसी नहीं चलेगी."



1 comment:

Vivek VK Jain said...

ye pic kaha se jugadi apne? Google Baba se?