Saturday, March 12, 2016

और आता ही नहीं कोई फ़साना हमको

पेश है कलीम आजिज़ की एक ग़ज़ल - 

डॉ. कलीम आजिज़
जिस जगह बैठना, दुख दर्द ही गाना हमको
और आता ही नहीं कोई फ़साना हमको

कल हर इक ज़ुल्फ़ समझती रही शाना हमको
आज आईना दिखाता है ज़माना हमको

अक़ल फिरती है लिए ख़ाना--ख़ाना हमको
इश्क़ अब तू ही बता कोई ठिकाना हमको

ये असीरी है संवरने का बहाना हमको
तवके आईना है ज़ंजीर है शाना हमको

जादा ग़म के मुसाफ़िर का ना पूछो अहवाल
दूर से आए हैं और दूर है जाना हमको

इक कांटा सा कोई दिल में चुभो देता है
याद जब आता है फूलों का ज़माना हमको

दिल तो सौ चाक है दामन भी कहीं चाक ना हो
ए जुनूं  देख ! तमाशा ना बनाना हमको

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