Tuesday, January 23, 2018

सिलिंडर का मोमेंट ऑफ इनर्शिया उर्फ़ उच्च शिक्षा के रहस्य


उच्च शिक्षा
-ललित मोहन रयाल

हमारे एक सहपाठी थे. वे अभिभावकों को अपने परीक्षा-परिणाम का ठीक विपरीत फल बताया करते थे. कभी-कभी वे उत्तीर्ण भी हो जाया करते थे. उन वर्षों में वे परिणाम बताने के प्रथम चरण में रोनी सूरत बनाते थे. अगले चरण में भाग्य का रोना रोते थे. इस तरह नाना प्रकार की लीलायें धरकर वे घर पर अनुत्तीर्ण-फल रिकार्ड कराया करते थे. मित्रों द्वारा असत्य कथन बावत् पूछे जाने पर कहते थे - "मात्र इस कथन से मैं वर्ष भर आंतरिक सुख से परिपूर्ण रहता हूँ. चैन रहता है. इस साल की कौन-सी गारंटी है यार! एडवांस एडजस्टमेंट का भी तो सोचना पड़ता है. जीवन जीने की गुंजाइशें खोजनी पड़ती है पार्टनर! जीने के अपने-अपने तरीके हैं दोस्त!"

फल के हिसाब से गार्जियन्स की हठधर्मिता व दमन नीति तो साल-भर चलती ही थी. उसमें किसी शिथिलता अथवा विराम की गुंजाइश नहीं रहती थी. ताने सुनकर कोपभाजन बनकर भी वे अप्रभावित-से रहते थे. घर की उपेक्षा उन पर वाह्य-प्रभाव ही डाल पाती थी. आंतरिक प्रभाव पड़ना नामुमकिन-सा था. चूँकि वे वास्तविक फल-रहस्य जानते थे. अनुत्तीर्ण होने वाले वर्षों में अभिभावक उन्हें उत्तीर्ण जानते थे. अतः कलुषित नहीं करते थे. उन वर्षों में वे अंतर्मन से दुरूखी व वाह्य रुप से प्रसन्न रहते थे.  एक तरह से यह एक नवीन प्रकार का जीवन-दर्शन था. जो उन्हें फिफ्टी परसेंट दुःख  से निजात दिलाता था. इस फिलॉसफी की वे शर्तिया गारंटी भी देते थे. परिणाम आने के दो माह तक अपने मित्रों को सत्य बोलने से थामे रखते थे. "अभी नहीं आया" बोलने की सामूहिक शपथ दिलाये रखते थे. इस व्यूह- संरचना से भी उन्हें अस्थायी-सी राहत मिलती थी.

उनके मोहल्ले से गुजरने पर दोस्त डरे-सहमे-से रहते थे. "उनके पिताजी ने देख लिया तो क्या होगा." इस भय से साँसत में रहते थे. अतः उस रेंज से चौकस-सतर्क होकर गुजरते थे. तेज-तेज कदमों से मोहल्ला पार करना पड़ता था. कभी-कभी धोखे से पकड़ में आ भी जाते थे. एक दिन उनकी नजर पड़ ही गयी थी. उँगली से संकेत देकर बुलाया. जाना पड़ा. अभिवादन किया. उन्होंने भी उचित आसन पर बिठाया. वार्तारंभ किया. घर की कुशल-क्षेम जैसे औपचारिक प्रश्नों पर नहीं गए. सीधे मूल प्रश्न पर आए "रिजल्ट आया" उस समय तक रिजल्ट सचमुच नहीं आया था. "चाचाजी! अभी नहीं आया." कहकर जबाब दिया. चिंता सवार थी कि किस तरह रिहाई हो. देर तक रुकना उचित नहीं जान पड़ रहा था. वे हठात् रोक रहे थेए "तुमने अभी तक बताया नहीं."

 "जी! अभी तक तो नहीं आया थाए आया होता तो मैं जरुर आपसे कुछ बताता."

"तो अब बता दो."

उस दिन माताजी नें बीच में पड़कर जान छुड़ाई थी. दोस्त इतना बड़ा उलट-फेर किए रहते थे. राजा-रंक, रंक-राजा का उनका यह खेल बरसों तक चलता रहा. संपूर्ण उच्च शिक्षा काल में उनका यह एडजस्टमेंट चलता रहा.

खेती-बाड़ी सँभालनी होती थी. अतिरिक्त समय में शिक्षा भी ग्रहण कर लेते थे. जीवनचर्या अनियमित-सी हो चली थी. कृषि-पशुपालन के साथ विज्ञान की कक्षाओं का सामंजस्य नहीं बैठ पाता था. भौतिकी पढ़ने के लिए कक्षा में भौतिक रूप से उपस्थित रहने में अड़चन पड़ती थी. इसलिए क्लास अटेंड करना बच्चों का खेल मान लिया गया था. परीक्षाएँ और फसल-कटाई परस्पर क्लैश किया करते थे. तो भी दोनों ईवेंट्स में अच्छी परफॉरमेंस दिखाने का दबाब बना रहता था.

इन मिले-जुले कारणों से लेबोरेटरी जाना भी नहीं हो पाता था. प्रायोगिक परीक्षा पास करनी ही होती थी. प्रैक्टिकल्स में उपकरणों को तक नहीं पहचानते थे. पहचान तो तब होती, जब वहाँ कभी गए होते. साहचर्य से ही परिचय बढ़ता है. अतः उपकरणों को उपेक्षा की दृष्टि से देखते थे. भौतिकी में तीन प्रयोग मिलते थे. उनमें से दो को चुनने की आजादी रहती थी. इलेक्ट्रिसिटी सर्किट्स के दूर से ही दर्शन कर वे आशंकित हो जाते थे. चूँकि वे विद्युत-स्पर्शाघात से भयभीत रहते थे. उन्होने एक थंब रूल ईज़ाद किया हुआ था. जिस प्रयोग में सर्किट, वोल्टेज, करंट, एमीटर, ब्रिज, रजिस्टेंस आदि शब्द सुनाई दें, उसे न करना लाभकारी रहता है. क्योंकि एहतियात बरतने से जीवन अक्षुण्ण रहने की गारंटी रहती है. इन मिले-जुले कारणों से एकास्टिक्स व ऑप्टिक्स उनके प्रिय प्रायोगिक विषय बन चुके थे. इनका वे प्रसन्नता से चयन करते थे.

ऐसा न था कि इन विषयों में वे अगाध पांडित्य रखते हों. इसके मूल में डार्क रूम की प्रेरणा रहती थी. क्योंकि वहाँ नकल करने की अगाध स्वतंत्रता मिलती थी  डियम लाइट के क्षीण-से प्रकाश में वे गैर-डार्क रूम प्रैक्टिकल्स के निष्कर्ष भी लिपिबद्ध कर लेते थे. बाहर आकर डंके की चोट पर कहते थेए "मैं अज्ञात वस्तुओं के परिणामए बिना प्रयोग किए ही चुटकियों में निकालने में समर्थ हूँ. रिफ्रैक्टिव इंडेक्स, वेवलैंथ, स्पेक्ट्रम, बैंडविड्थ, डिफ्रैक्शन, डिस्पर्सन, इंटरफेरेंस, फ्रिंजेज में से जिसका जो चाहे निकलवा सकते हो." सैक्स्टैंट का प्रयोग उनका पसंदीदा प्रयोग होता था. एक तो यह खुल्लम-खुल्ला होता था. दूसरा प्रयोगशाला से बाहर का नीरव वातावरण अनुकूल पड़ता था. तीसरा इंटर्नल व एग्जामिनर की बेधक दृष्टि से बचत रहती थी.

वे खुलकर स्वीकारते थे कि जहाँ-जहाँ इंटर्नल व एग्जामिनर की दृष्टि पड़ती होए वहाँ-वहाँ उन्हें अपनी प्रतिभा के लाइम लाईट में आने का भय सताता है. वे समर्थ शत्रुओं का मुकाबला करने में असमर्थ थे. चूँकि वे मात्र गुरिल्ला युद्ध-कला में ही पारंगत थे, आमने-सामने के युद्ध में  नहीं.

पहले वर्ष भाग्य ने उनका साथ न दिया था. सिलिंडर का मोमेंट ऑफ इनर्शिया निकालना इनके हिस्से आ गया था. यह सब काकतालीय-न्याय से घटित हुआ था. पूछताछ करते-करते येए बमुश्किल अपनी टेबल तक पहुँच सके थे. फ्लाईव्हील व सिलिंडर से यह इनका प्रथम साक्षात्कार था. अंतरीक्षक व परीक्षक ने इनको बेधक दृष्टि से देखना आरंभ ही किया था. कि इन्होंने अपनी संपूर्ण शक्ति को संचित किया. तत्पश्चात् फ्लाईव्हील को इतनी जोर से घुमाया, जैसे इंजन को स्टार्ट कर रहे हों. सिलिंडर जोर की ध्वनि करते हुए भूमि पर गिरा था. तत्पश्चात् इन्होंने पहली रीडिंग ली. इनके आगाज और अंदाज को देखकर परीक्षक इनकी टेबल तक आने का साहस न जुटा सके. ध्वनि संबंधी प्रयोगों में भी ये परीक्षक से मुक्ति का उपाय जानते थे. परीक्षक के समीप आते ही ये कानों में हेड-फोन लगा लेते थे. कुछ अबूझ-सी ध्वनियों को सुनने का उपक्रम-सा करने लगते थे. परीक्षक को घोर उपेक्षा की दृष्टि से देखते थे. जो उन्हें दूर-दूर रखने की शर्तिया गारंटी सिद्ध होता था.

रसायन शास्त्र के प्रयोगों में मेधावी छात्र लंबे संश्लेषण-विश्लेषण करके ही परिणाम तक पहुँच पाते थे. वे रसायन मिक्सचर के रंग-गंध-स्वादए तापांतर, रासायनिक क्रियाओं इत्यादि के परिणामों से गुण-धर्म का मिलान करते हुएए परिश्रम से ही निष्कर्ष जान पाते थे. इनका यहाँ भी शार्ट-कट चलता था. प्रयोगशाला सहायक इनके अभिन्न मित्र रहते थे. वे इन्हें जबलपुर से आयातित बीड़ी का उचित और युक्तियुक्त प्रतिफल प्रदान करते थे. फलतः पुड़िया हाथ में ग्रहण करने से पूर्व ही मिक्सचर एक्स का नाम, गुण-धर्म मय पूर्ण विवरण पूर्व से ही जान लेते थे.

कार्बनिक रसायन के परीक्षा परिणाम में इन्हें इक्यावन अंक मिले थे. कैंपस में लगभग भूचाल-सा आ गया था. चूँकि पूर्णांक पचास अंक का ही था. काफी देर तक इन्हें समझ नहीं आया कि इन्हे प्रसन्न होना चाहिए अथवा दुखी. उसी दिन से ये प्रतिदिन परीक्षा-नियंत्रक के सिर पर सवार होने लगे. सवार होकर उसी शैली में सवाल करते थे, जैसे वैताल ने विक्रमार्क से पूछा थाए "हे राजन! मैं पास हुआ अथवा फेल." इस प्रश्न के जवाब के लिए सुदीर्घ पत्राचार चला था. लंबे समय के पश्चात् विश्वविद्यालय ने खेद जताया था. इन्हें सूचित किया गया था कि किसी टाइपराइटर की सुखद त्रुटि से आपको यह सुखद अनुभूतियुक्त अंक प्राप्त हुए हैं. अब त्रुटि-सुधारकर उस त्रुटि का परिमार्जन कर लिया गया है. उसी टाइपराइटर से आपको शुद्ध पंद्रह अंक सूचित किए जा रहे हैं. सूचना जानें.

प्रयोगशालाओं का माया-मोह इनका प्रगति-रथ न रोक सका था. उस वर्ष प्रवेश के लिए एंट्रेंस परीक्षा हुई थी. एक नंबर के सवाल हल करने के ये मास्टर थे ही. उच्चतर कक्षा में रसायन शास्त्र में इन्हें सहजता से प्रवेश मिल चुका था. यह विषय वह माँगता था, जो ये दे नहीं सकते थे-उपस्थिति. इसके बावजूद ये अपनी पूर्ववत् दिनचर्या के अधीन रहे. विभाग ने इन्हें सुधारने की भरसक चेष्टा की. सम्यक् अवसर दिए. सुधार न होने की दशा में निष्कासन का भय भी दिखलाया. इतना हो गुजरने के बाद भी ये अप्रभावित ही रहे.

एक सुहानी सुबह ये सोकर उठे. विषय परिवर्तन का निश्चय मन में ठान चुके थे. तैयार होकर शहर गए. गणित विषय में दाखिला लेकर प्रयोगों के खटराग को हमेशा के लिए तिलांजलि दे आए थे. अध्यवसायी तो थे ही. कृषि-पशुपालन के साथ-साथ मन लगाकर स्वाध्याय भी करते रहे. यह विषय इनकी दिनचर्या से मेल खाता था. गाँव के किसानों की उपज मंडी में पहुंचती थी. ग्रामीणों के हितों की रक्षा के लिए ये हिसाब-किताब देखने हर पल मंडी में उपलब्ध मिलते थे. समय-चक्र चलता रहा. अंतिम परीक्षा परिणाम निकल चुका था. अंकतालिका लेकर ये घर पहुँचे थे. अंकतालिका आँगन में रखकर हाथ-मुँह धोया. तत्पश्चात् ये गाँव की एक वृद्ध महिला को दवा पहुँचाने चले गए. वापसी में आकर इन्होंने देखा कि गाय इनकी अंकतालिका को चबा रही है. लपककर बचा-खुचा हिस्सा इन्होंने गाय के मुँह से छुड़ाया. गाय ने ना-नुकुर भी की थी. शेष हिस्सा हाथ में आया था. यह वह हिस्सा था जिसमें सहायक कुलसचिव के हस्ताक्षर थे. गाय अंको की जुगाली बड़ी तन्मयता से कर रही थी. गाय को संभवतः अपने मालिक के अंको ने चबाने को प्रेरित किया था. इस वर्ष इन्हें विश्वविद्यालय में पोजीशन जो मिली थी.

इनके एक मेधावी मित्र थे. वे दो वर्ष देश के किसी  प्रमुख महानगर में रहकर प्रतिष्ठित परीक्षा में बैठना चाहते थे. उनके पिता ने अपनी सामर्थ्य के हिसाब से बढ़-चढ़कर इमदाद भी दी थी. किसी जटिल माने जाने वाले विषय में उनको उस परीक्षा में शून्य अंक मिला था. यह शून्य अंक उनके पिता को आजीवन सालता रहा. आरंभ में तो पिता ने यही निष्कर्ष दिया था किए "भला शून्य क्यों मिलेगा. इसने परीक्षा में कुछ लिखा ही नहीं होगा. इसने जानबूझकर पन्ने कोरे छोड़ दिए होंगे. इसका मूल स्वभाव ही ऐसा है. इसने जानबूझकर कुछ लिखा ही नहीं होगा, क्योंकि यह मेरी छाती पर मूंग दलने को जो पैदा हुआ है."

पुत्र को देखते ही वे लाठी उठा लेते थे. किसी प्रकार पूरी शक्ति से दौड़कर वह सुरक्षित दूरी तक पहुँच पाता था. तब जाकर पिता के कोप से अपनी प्राणरक्षा कर पाता था. पिता के परिवर्तित व्यवहार से वह भयभीत तो कम थाए खिन्न अधिक रहता था. उसने अपने मित्रों से सहायता की याचना की. उन्हें दूत बनाकर पिता के पास भेजना चाहा था. इन्होंने कहा- "यार! उनसे कहूँगा क्या? उत्तर क्या दूँगा?"  फिर भी ये मित्र के घर गए. उसके पिता की अनुनय-विनय की. कुपित पिता की अभ्यर्थना की. मानविकी व अमानविकी विषयों के स्कोरिंग पैटर्न का रहस्य भी बताया गया. गावस्कर व कपिल देव के बल्लेबाजी पैटर्न का दृष्टांत भी दिया गया. अंत में यह कहकर भी मनाया किए "अमानविकी विषयों के अंक यदाकदा अमानवीय स्थिति उत्पन्न कर ही देते हैं." इस शास्त्रीय बहस के आयोजन से कुछ उम्मीद बँधी थी. हालाँकि बाद में ज्ञात हुआ कि पिता-पुत्र के आंतरिक संबंधों में कोई सुधार नहीं आया है. बाद के वर्षों में वह उच्च पद पर भी आसीन हो चुका था. तब भी उसके पिता शून्य अंक के परिणाम के प्रति आजीवन संदेहशील बने रहे.

ललित मोहन रयाल

4 comments:

सुशील कुमार जोशी said...

बहुत खूब :) रसायन विज्ञान से ज्यादातर लोग भाग जाते हैं 51 के 15 कोई नयी बात नहीं है । यहाँ सब सम्भव है।

Unknown said...

बहुत सुन्दर सर.......

naveen kumar naithani said...

अन्तरीक्षक तो खूब भाया, पर यह काकतलीय न्याय क्या ठहरा बन्धु?

sushil singh rana said...

Very good 51 in place of 15 outstanding in chemistry