Friday, August 3, 2018

पल भर के लिए कोई हमें प्यार कर ले

फ़िल्मी गानों की समीक्षा – 1
पल भर के लिए कोई हमें प्यार कर ले

काव्य समीक्षा: कविता की पहली पंक्ति में नायक जीवन की क्षणभंगुरता की तरफ इशारा करते हुए नायिका द्वारा फकत एक पल के लिए झूठा प्यार कर लिए जाने की अभिलाषा व्यक्त करता है कि “पल भर के लिए कोई हमें प्यार कर ले!” सामान्य दृष्टि से देखा जाय तो प्रेम को यहीं से कविता की मूल आत्मा के रूप में प्रतिष्ठित करने का उद्यम प्रारम्भ किया जाता प्रतीत होता है. 
लेकिन नायक के झूठ और उसकी बदनीयत का पर्दाफ़ाश अगली ही पंक्ति में हो जाता है – “दो दिन के लिए कोई इकरार कर ले.” 
मल्लब एक पल से सीधा दो दिन. अगर एक पल को एक बार के लिए एक सेकेण्ड के बराबर मान लिया जाय तो वैज्ञानिक तौर पर सिद्ध किया जा सकता है कि नायक जिस चीज के लिए बेकरार है उसके लिए उसकी उत्कंठा उसे शब्दों में अभिव्यक्त कर देने के अगले ही क्षण 86400x2 गुना बढ़ जाती है (ज्ञात हो कि एक दिन में 86400 सेकेण्ड होते हैं). इतनी तेज़ी से बढ़ने वाली कोई भी चीज़ केवल ईश्वर ही हो सकती है. इसकी तार्किक परिणति के रूप में नायक बहुत जल्दी ही वहां तक पहुँच भी जाता है और नायिका से शिकायत करता है कि उसके सभी उदात्त प्रयत्नों के बावजूद “राम में क्यों तूने रावण को देखा.” 
कविता के अगले छंद में नायक साम-दाम-दंड-भेद टाइप की सभी तिकड़में भिड़ाकर नायिका का करीब-करीब इमोशनल ब्लैकमेल करता हुआ पहले कहता है - “सुन सुन कर तेरी नहीं नहीं जाँ अपनी निकल जाए न कहीं” और बाद में अपने आत्मसम्मान के रक्षार्थ उसे उलाहना देता हुआ सूचित करता है कि “माना तू सारे हसीनों से हसीं है, अपनी भी सूरत बुरी तो नहीं है” 
इसके तुरंत बाद नायक को अचानक अपनी औकात का भान होता है और वह घिघियाता हुआ याचक बन जाता है “कभी तू भी हमारा दीदार कर ले झूठा ही सही” (*काफ़्का की एक कहानी में भी नायक का ऐसा ही कायांतरण होता है. नायक ग्रेगोर साम्सा एक अच्छे भले इन्सान से गुबरैले में तब्दील हो जाता है.) 
दीदार झूठा कैसे हो सकता है यह बहस का मुद्दा हो सकता है. हाँ भगवान का दीदार झूठा हो सकता है हालांकि उसमें भी शक है क्योंकि तुलसीदास जी हर सुबह भगवानजी का दीदार करने के बाद ही अगली चौपाई लिखना शुरू करते थे. 
फिल्मकाव्य के मनीषी जानते हैं कि एक पल से प्रारम्भ होने वाले प्रत्येक प्रकरण को जीवन की शाश्वतता तक पहुंचना अनिवार्य माना गया है. यही शास्त्रोक्त है. यह कविता भी इस पैमाने पर खरी उतरती है क्योंकि अंतिम अनुच्छेद के प्रारम्भ में ही नायक नायिका से कह चुकता है – “पल भर के प्यार पे निसार सारा जीवन.” 
रेखांकित किया जाना चाहिए कि इस पंक्ति में नायक की उत्कंठा 86400x2 गुना से सीधे 86400x365xA गुना बढ़ जाती है (फार्मूले में A=नायक का शेष बचा जीवन वर्षों में.) 
पैनी दृष्टि वाले पाठक/दर्शक समझ जाएंगे कि नायक का रूप धारे कवि मूलतः गणितज्ञ है तथा नायिका के गणित ज्ञान की परीक्षा लेने के बहाने उससे ठिठोली कर रहा है. कविता को अपने गणित के सिलेबस में लगाकर कोई भी शैक्षिक बोर्ड धन्य हो रहेगा. 
वीडियो रिव्यू: ऐसी कविता के फिल्मांकन के लिए ऐसे कक्ष का होना अनिवार्य है जिसमें दो दर्ज़न दरवाजे, तीन दर्ज़न खिड़कियाँ और एक सौ गवाक्ष हों. इन सब पर परदे लगें हों ऐसा ही प्रावधान है. परदे न हों तो वेनेशियन ब्लाइंड्स से काम चलाया जा सकता है. 

नायक-नायिका जितने हॉकलेट हों उतना बेहतर. 

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