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Monday, June 10, 2013

अफ्रीकी लोक-कथाएँ: १० (पहला हिस्सा)


अफ्रीकी लोक-कथाएँ: १०


दो त्वचाओं वाली औरत - भाग एक 

कालाबार का राजा एयाम्बा बहुत ताकतवर था. उसने अपने पड़ोस के सभी देशों को हराकर उन पर कब्ज़ा कर लिया था. उसने वहां के सभी बूढ़े औरत-आदमियों को मरवा दिया और सारे हट्टे कट्टे आदमी-औरतों को कैद कर अपना गुलाम बना लिया जो जीवन भर उसके खेतों पर कड़ी मेहनत करने को मजबूर थे.

इस राजा की दो सौ पत्नियाँ थीं, लेकिन किसी से भी उसे बेटे का सुख नसीब नहीं हुआ था. उसके चक्रों ने जब देखा कि राजा बूढ़ा होता जा रहा है, उस से अनुरोध किया कि वह मकड़ी की बेटी से शादी कर ले क्योंकि मकड़ी हमेशा बहुत सारे बच्चों को जन्म देती थी. लेकिन जब राजा ने मकड़ी की बेटी को देखा वह उसे पसंद नहीं आई. वह बदसूरत थी. लोगों का ख़याल था कि उसकी बदसूरती की वजह यह थी कि उसकी माँ ने एक साथ इतने सारे बच्चे जने थे. खैर जो भी हो, अपनी प्रजा को खुश करने के लिए उसने उस बदसूरत लड़की से शादी कर ली और उसे अपनी बाकी रानियों के साथ रहने को कह दिया. लेकिन बाकी रानियों ने राजा से शिकायत की कि वह बहुत बदसूरत है और उनके साथ रहने के काबिल नहीं. सो राजा ने उसके लिए एक अलग घर बनवा दिया जहां और रानियों की तरह उसे भी खाना वगैरह दिया जाता था. हर कोई उसकी बदसूरती को लेकर उसका मजाक उडाया करता; लेकिन वास्तव में वह बदसूरत नहीं बल्कि खूबसूरत थी, क्योंकि वह दो त्वचाओं के साथ पैदा हुई थी और उसके पैदा होते समय उसकी माँ से यह वायदा करवाया गया था कि सिवा रात के वक्त उसकी बेटी एक निश्चित समय आने से पहले अपनी बाहरी त्वचा को नहीं उतारेगी. और यह भी कि भोर होते ही उसे अपनी बदसूरत त्वचा को फिर से पहन लेना होगा.

राजा की पटरानी को किसी तरह यह बात पता थी और उसे हरदम डर लगा रहता कि कहीं राजा इस बात को जान न ले, कि कहीं वह मकड़ी की बेटी से प्यार न कर बैठे. सो वह एक जूजू के पास गयी और उसे सोने की दो सौ छड़ों का लालच देकर ऐसा जादुई मिश्रण बनाने का नुरोध किया जिसे पीकर राजा इस बात को बिलकुल ही भूल जाए कि मकड़ी की बेटी उसकी पत्नी है. काफी मोलभाव के बाद जूजू तीन सौ पचास छड़ों के एवज में ऐसा करने को तैयार हो गया. उसके बनाए मिश्रण को पटरानी ने राजा के खाने में मिला दिया. कुछ महीनों तक ऐसा असर रहा कि राजा मकड़ी की बेटी को भूल ही गया और उसके बिलकुल नज़दीक से गुजरने पर भी उसे कुछ याद न आता. जब चार महीने बीतने को आए और राजा ने एक बार भी आदिया (यही नाम था मकड़ी की बेटी का) को याद नहीं किया तो वह थक गयी और वापस अपने माँ-बाप के घर चली गयी. उसके पिता उसे एक दूसरे जूजू के पास ले लिए जिसने कई तरह के जादू-टोनों से यह पता लगा लिया कि पटरानी ने एक दूसरे जूजू की मदद से राजा की याददाश्त पर अंकुश लगा रखा था. उसने एक “दवा” तैयार की जिसे खिलाने पर राजा को फिर से आदिया की याद आ जानी थी. इस दवा के बदले जूजू ने मोटी रकम वसूली. आदिया ने उसी दिन एक व्यंजन बनाया और उसमें दवा मिलकर राजा को प्रस्तुत किया. उसे खाते ही राजा अपनी पत्नी को पहचान गया और उसे उसी शाम मुलाक़ात करने को कहा. सो वह बहुत खुश हुई. नदी में नहाने के बाद उसने अपनी सबसे सुंदर पोशाक पहनी और राजा के महल पहुंच गयी.

जल्द ही अंधरा हो गया. जब सारी बत्तियाँ बुझ गईं आदिया ने अपनी बदसूरत त्वचा उतार दी. टब राजा ने देखा वह कितनी सुन्दर है. राजा बहुत खुश हुआ. लेकिन जब सुबह मुर्गे ने बांग दी, आदिया ने फिर से अपनी बदसूरत पोशाक पहनी और वापस अपने घर चली गयी.

ऐसा उसने चार रातों तक किया –अन्धेरा होते ही बदसूरत त्वचा को उतार देना और भोर होने पर उसे फिर पहन लेना. समय बीतता गया और लोगों को घोर आश्चर्य हुआ जब इतनी सारी पत्नियों में से मकड़ी की बेटी आदिया ने एक बेटे को जन्म दिया. इस से भी ज़्यादा आश्चर्य उन्हें इस बात पर हुआ कि सिर्फ एक ही बेटा पैदा हुआ, जबकि उसकी माँ एक बार में कम से कम पचास बच्चे जनती थी.

आदिया के बेटे के जन्म के बाद पटरानी और भी जलन से भर उठी; वह फिर से जूजू के पास गयी और उसे बहुत सारा सोना-चाँदी देकर उस से ऐसी दवा बनाने को कहा जिसे खाकर राजा बीमार पड़ जाए और अपने बेटे को भूल जाए. और यह कि उस दवा को खाकर राजा को खुद जूजू के पास आना पड़े. तब जूजू ने उसे बताना था कि उसे उसके बेटे ने बीमार बनाया था क्योंकि वह खुद राजा बनना चाहता था. जूजू ने तब राजा को सलाह देनी थी कि अच्छा होने के लिए उसने अपने बेटे को नदी में फिंकवा देना चाहिए.

तो जब राजा को दवा खिला दी गयी, वह जूजू के पास गया जिसने उसे वही सब करने को कहा जैसा पटरानी ने उसे बता रखा था. शुरू में राजा अपने बेटे को मारने से हिचका. लेकिन जब उसके चाकरों के उस से बेटे को मार देने की सलाह देते हुए हौसला दिलाया कि साल भर में उसे एक बेटा और मिल सकता है तो राजा मान गया. आदिया मिन्नतें करती रही, जार-जार रोती रही पर उसके बेटे को नदी में फेंक दिया गया.

(अगली किस्त में यह कथा समाप्त. सीरीज़ जारी रहेगी.) 

Sunday, June 9, 2013

अफ्रीकी लोक-कथाएँ : ९


अफ्रीकी लोक-कथाएँ : ९


सियार और सूरज

बहुत पुरानी बात है जब आदमी जानवर थे और जानवर आदमी, एक सियार अपने बूढ़े पिता के साथ रहता था. एक दिन बूढ़े ने अपने बेटे से कहा: “सुनो बेटा, तुमने अपने लिए जल्द ही एक दुल्हन ढूंढ लेनी चाहिए जो हमारे लिए खाना पका सके, खास तौर पर जब तुम यहाँ नहीं होते हो. तुन देख ही रहे हो मैं कितना बूढ़ा हो चुका हूँ.”
   
बाहर जाकर सियार अपनी बकरियों को बाड़े से निकाल कर चराने चल दिया. दूर झाडियों में उसने कोई चमकती हुई चीज़ देखी. उसने मन ही मन सोचा चट्टान पर इतनी ख़ूबसूरती से चमक रही यह क्या चीज़ हो सकती है?

उसे अपनी पिता की बताई हुई एक बात याद आई और वह चट्टान पर चमकती उस सुन्दर चीज़ को देखे के लिए उसके और भी नज़दीक गया. उसने पूछा: “तुम मनुष्य हो या कोई और चीज़?”

“नहीं, यह मैं हूँ” चमक ने जवाब दिया “मैं सूरज हूँ.”

सियार ने कहा: “माफ करना, मुझे नहीं पता था यह तुम हो. तुम अकेले क्यों हो?”

सूरज ने जवाब दिया: “मेरे माँ-बाप ने मुझे गोद से उतार दिया इसलिए मैं इतना अकेला हूँ. दरअसल मैं गर्म हूँ.”

सियार बोला: “नहीं तुम सुन्दर हो. मैं तुम्हें उठा कर ले चलूँगा. कोई परेशानी नहीं है. मैं तुम्हें अपने घर ले जाऊँगा ताकि मेरे पिताजी तुम्हें देख सकें.”

सूरज ने उत्तर दिया: “ठीक है पर बाद में शिकायत मत करना.”

सियार ने सूरज को अपनी पीठ पर लादा और घर के रास्ते लग लिया.

सियार की पीठ पर सूरज जलने लगा था. “क्या तुम थोड़ी देर को मेरी पीठ से उतरोगे ताकि मैं थोड़ा आराम कर सकूं?”

“मैंने तुम से पहले ही कहा था,” सूरज बोला “शिकायत मत करना. अब चलते चलो.”
बहुत ज़्यादा दूर तक यूं सूरज को लादे ले चलना सियार के लिए मुमकिन न था. अचानक सियार ने थोड़ा आगे रास्ते पर लकड़ी का एक कुंदा गिरा देखा. उसने कुंदे के नीचे से रेंगना शुरू किया ताकि उस से टकरा कर सूरज नीचे गिर जाए. तो सूरज के साथ साथ उसकी पीठ की खाल भी कुंदे से टकराने के कारण पीछे छूट गए.  

जब सियार घर पहुंचा तो पीठ की खाल निकल जाने से तड़प रहा था. उसके पिता ने तेल चुपड़कर उसकी पीठ का इलाज किया. कुछ समय बाद इलाज ने अपना काम किया और सियार की पीठ की फर फिर से उग आई. यह अलग बात है कि उसका रंग पुराने जैसा नहीं था.

सियार की पीठ पर काली धारी दिखाई देने के पीछे यही कारण है.

अफ्रीकी लोक-कथाएँ : ८


अफ्रीकी लोक-कथाएँ : 


राजकुमारी, राजा और एक आदमी की कथा

कुछ समय पहले जंगल में एक अकेला शिकारी रहता था. उसका कोई परिवार नहीं था और वह बाकी लोगों से दूर रहा करता था.

एक दिन उस इलाके के राजा ने अपनी प्रजा को अपराधियों से बचाने के लिए कैदखाना बनाने का फैसला लिया.

राजा के शेर को कैद कर लिया क्योंकि वह लोगों को खा जाता था. सांप को इसलिए कैद किया गया क्योंकि वह लोगों को ज़हर दिया करता था. चोरी करने वाले एक आदमी को भी पकड़ लिया गया.

कुछ समय बाद यूं ही टहलने निकले शिकारी को कैदखाना नज़र आया. उसे सुनाई दिया: “बचाओ! बचाओ! हमें यहाँ से बाहर निकालो! एक दिन बदले में हम तुम्हारी मदद करेंगे!”

शिकारी ने उनकी मदद करने का निर्णय लिया. उसने कैदखाने के दरवाज़े खोलकर उन्हें आज़ाद कर दिया.

बहुत ज़्यादा दिन नहीं हुए थे जब शिकारी से मिलने शेर जंगल में उसके ठिकाने पर पहुंचा. जब उसने देखा कि शिकारी अकेला रहता है , उसका कोई परिवार नहीं और न ही उसके पास कोई जानवर हैं तो उसने शिकारी की मदद करने को एक तरकीब सोची. वह शहर जाकर राजा की बेटी को पकड़ लाया और उसे शिकारी के पास ले जा कर बोला: “तुम राजा की इस बेटी को अपनी पत्नी बना लो.”

इसके बाद शेर दौड़ कर गया और कुछ देर में बकरियों का एक झुण्ड अपने साथ लेकर लौटा. इसके बाद से शिकारी और राजकुमारी खुशी खुशी अपना जीवन बिताने लगे और संपन्न होते गए.

कुछ समय बाद शिकारी द्वारा आज़ाद कराए गए आदमी को उसकी याद आई. “वह शिकारी क्या कर रहा होगा?” आदमी ने सोचा “मुझे जाकर देखना चाहिए वह जिंदा है या मर गया.”

जब आदमी शिकारी के घर पहुंचा, उसने वहां पहुँचते ही राजा की बेटी को पहचान लिया. उसे याद आया कि शेर कुछ दिन पहले उसे उठा ले गया था. लेकिन उसने शिकारी और राजकुमारी दोनों से कुछ कहा नहीं.जब उसने बकरियों का झुण्ड देखा तो उसे याद आया कि कुछ ही दिन पहले गाँव के एक अमीर आदमी की बकरियां लापता हो गयी थीं.

तब भी वह कुछ नहीं बोला. उसने राजकुमारी और उसके पति का अभिवादन किया और उन्हें शुभकामनाएं दीं.

इसके बाद वह आदमी सीधा राजा के पास गया और पूरी दास्तान सुनाई. राजा बहुत खुश हुआ कि उसकी बेटी अभी जिंदा है, पर उसे गुस्सा भी आया कि वह शिकारी की पत्नी बन गयी है. उसने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि शिकारी और राजकुमारी को पकड़ लाएं.

“कल सुबह तुम्हें मौत की सज़ा दी जाएगी!” राजा ने आदेश दिते हुए कहा “इस शिकारी को तहखाने में डाल दिया जाए!”

इस बीच राजा निबटने के उद्देश्य से जंगल की तरफ़ निकल गया. वह झुक कर नीचे बैठने को ही था कि शिकारी द्वारा मुक्त कराए गए सांप ने उसे काट लिया. राजा की तबीयत उसके बाद बहुत बिगड गयी.

गाँव के सारे वैद्य बुलाए गए पर सांप के ज़हर से निबटने का इलाज किसी के पास न था.

तब राजकुमारी अपने पिता के सलाहकार के पास जाकर बोली “मेरे पति को मुक्त कर दीजिए. मुझे पक्का यकीन है वे पिताजी को ठीक कर देंगे.”

सलाहकार ने पूछा “तुम्हें ऐसा पक्का यकीन क्यों है?”

“मैं जानती हूँ वे ऐसा कर पाएंगे. वे एक चिकित्सक भी हैं.” राजा की बेटी बोली. उधर वही सांप तहखाने में शिकारी के पास जा पहुंचा. जब सांप को पता लगा कि बाहर क्या चल रहा है तो उसने एक छोटी सी शीशी में अपना थोड़ा सा ज़हर थूक कर बाहर निकाला और उसे शिकारी को देते हुए कहा “ये लो, जब वे तुम्हें आज़ाद करने आएं तो अपने साथ इस शीशी को ले जाना. इसे हर हाल में राजा को पिला देना. वे ठीक हो जाएंगे.”

सूरज के उगने से पहले ही राजा के चाकर शिकारी को अपने साथ ले जाने आए. शिकारी ने सांप के ज़हर को राजा को मुंह से लगा दिया. जब राजा के पेट में सांप का ज़हर गया तो उसे उल्टियां आना शुरू हो गईं. सारा ज़हर बाहर आने से राजा स्वस्थ हो गया.

तब राजा बोला: “इस आदमी ने मेरी जान बचाई है. अवश्य ही यह एक अच्छा दामाद साबित होगा. उस दूसरे आदमी को लाओ जो इसे यहाँ लेकर आया था. अब उसे भुगतनी होगी सज़ा.”

Saturday, June 8, 2013

अफ्रीकी लोक-कथाएँ : ७


अफ्रीकी लोक-कथाएँ : ७


चालबाज़ आदमी और दोस्ती की परख

दो लड़के पक्के दोस्त थे. उन्होंने हमेशा एक दूसरे के साथ बने रहने का वादा किया हुआ था. जब वे बड़े हुए उन्होंने आमने-सामने अपने घर बनाए. दोनों के खेतों के दरम्यान एक पतली सी पगडंडी भर थी.

एक दफा गाँव में एक चालबाज़ आदमी आया. उसने दोनों दोस्तों के साथ एक शरारत करने की ठानी. उसने एक ऐसा कोट पहना जो आगे से नीले और पीछे से लाल रंग का था. चालबाज़ आदमी दोनों दोस्तों के घरों के बीच के पतले से रास्ते से गुजरा. दोनों दोस्त आमने सामने अपने खेतों में काम कर रहे थे. वहां से गुजरते हुए चालबाज़ आदमी ने कुछ अटपटी आवाजें निकालीं. वह निश्चित कर लेना चाहता था कि दोनों दोस्त अपनी निगाहें उठाकर उसे एक बार ज़रूर देख लें.

शाम के समय दोनों दोस्त सुस्ताते हुए बातचीत कर रहे थे.

“तुमने दिन में उस आदमी को देखा? क्या बढ़िया लाल कोट पहने था वह!”

“तुम्हारा मतलब है वह जिसने नीला कोट पहना हुआ था.” दूसरे ने जवाब दिया.

“नहीं भाई. उसका कोट लाल रंग का था. मैंने अपनी आँखों से उसे देखा था जब वह सामने रास्ते से गुज़र रहा था.”

“गलत कह रहे हो तुम!” दूसरा दोस्त बोला “मैंने भी अपनी ही आँखों से देखा था और उसने नीला कोट पहना हुआ था.”

“मुझे मालूम है मैंने क्या देखा था.” गुस्से में आते हुए पहला दोस्त बोला. “लाल था कोट.”

“तुम्हें कुछ नहीं मालूम!” दूसरे ने पलट कर जवाब दिया “नीला था.”

पहले दोनों दोस्त बहस करते रहे और बाद में एक दूसरे का अपमान करने पर उतारू हो गए. थोड़ी ही देर बाद दोनों में मारपीट शुरू हो गयी!

तभी चालबाज़ आदमी लौट आया. उसने लड़ते हुए दोनों को देखा जो चिल्ला चिल्ला कर कह रहे थे: “अब हमारी दोस्ती खत्म!”

चालबाज़ आदमी बड़ी जोर से हंसा. और उसने उन्हें अपना दोरंगी कोट दिखलाया. दोनों फिर से गुस्सा होकर उस पर बरस पड़े.

“हम पूरी जिंदगी भाइयों की तरह साथ साथ रहे हैं! और आज तुमने हमारे बीच लड़ाई करवा दी!”

चालबाज़ आदमी ने ठंडे स्वर में जवाब दिया – “लड़ाई का इलज़ाम मेरे मत्थे मत लगाओ. तुम दोनों ही गलत हो. और दोनों ही सही भी. तुम दोनों ने जो देखा वह सच था. तुम आपस में इसलिए लड़ रहे हो क्योंकि तुम दोनों ने अपनी अपनी तरफ से मेरे कोट को देखा था. तुमने एक बार भी नहीं सोचा कि इस बात को दूसरे तरीके से देखे जाने का रास्ता भी खुला हुआ था."

कहानियाँ कहाँ से आती हैं


अफ्रीकी लोक-कथाएँ : ६ 



कहानियाँ कहाँ से आती हैं

(एक पारम्परिक ज़ुलू लोककथा)

बहुत, बहुत साल पहले की बात है. यह इतनी पुरानी बात है जब शायद पहले आदमी और पहली औरत को धरती पर आए बहुत समय नहीं हुआ था. इसी धरती पर कहीं मान्जादाबा नाम की एक औरत अपने पति जेंजेले के साथ रहा करती थी.

वे एक पारम्परिक गाँव के एक पारम्परिक घर में रहा करते थे.उनके बहुत से बच्चे थे और ज़्यादातर समय वे बहुत खुश रहा करते थे. दिन भर वे काम करने, टोकरियाँ बुनने, खालों को रंगने, शिकार और अपने घर के नज़दीक की ज़मीन जोतने में व्यस्त रहते. कभी कभी वे नीचे समुद्र किनारे जाया करते और धूप तले रेत पर खेलते, तेज़ी से तट पर भागते अटपटे केकड़ों पर हंसते, चिड़ियों को समुद्र में डुबकी लेता देख प्रसन्न होते और समुद्री पवन में गोते लगाते. जेंजेले के भीतर एक कलाकार का दिल था और उसे अपनी कुल्हाड़ी की मदद से लकड़ी के कुंदों और पत्थरों पर खूबसूरत चिड़ियाँ, बाघ और हिरणों की आकृतियाँ उकेरना अच्छा लगता था. मूर्तिकार जेंजेले की कलाकृतियों से उनका घर भरा रहता.

लेकिन शामों को जब सोने से पहले सारा परिवार आग के चारों तरफ बैठा करता, सभी लोग उतने प्रसन्न नहीं होते थे. बुनाई या मूर्तिकारी के लिए अँधेरा हो चुका होता था जबकि नींद के हिसाब से उतनी डेरी भी नहीं होती थी. “माँ” बच्चे चिरौरी किया करते “हमें कहानियाँ चाहिए! हमें कहानियाँ सुनाओ माँ!” मान्जादाबा सोचती जाती और सोचती ही जाती कि बच्चों को सुनाने के लिए उसके दिमाग में कोई कहानी आ सके. मान्जादाबा और जेंजेले को कोई कहानी आती ही नहीं थी. उन्होंने हवा को सूना. क्या हवा उन्हें कोई कहानी सुनाने की कोशिश कर रही थी? नहीं. उन्हें कुछ सुनाई नहीं दिया. न कोई कहानियाँ थीं, न सपने, न ही कोई तिलिस्मी किस्से.

एक दिन जेंजेले ने अपनी पत्नी से कहा कि उसे कहानियों की तलाश में निकल पडना चाहिए. उसने वादा किया कि अगर वह परिवार और पड़ोसियों के लिए कहानियाँ लेकर आएगी तो वह घर पर बच्चों की देखभाल के साथ ही बाकी सारे काम भी करेगा. मान्जादाबा मान गयी. उसने अपने पति और बच्चों को चूमकर उनसे विदा ली और कहानियों की तलाश में निकल पड़ी.

मान्जादाबा ने तय लिया कि वह रास्ते में मिलने वाले हर जीव-जंतु से कहानियों के लिए निवेदन करेगी. सबसे पहले उसकी मुलाक़ात नोग्वाजा नाम के खरगोश से हुई. वह इस कदर शरारती था! लेकिन मान्जादाबा ने सोचा कि एक बार उस से पूछ लेने में हर्ज ही क्या है. “नोग्वाजा, क्या तुम कोई कहानी जानते हो? मेरे लोग कहानियों के लिए भूखे हैं!”

“कहानियाँ?” नोग्वाजा चिल्लाया “क्या बात करती हो! मुझे सैकड़ों, हजारों बल्कि लाखों कहानियाँ आती हैं!”

“कृपा करो नोग्वाजा” मान्जादाबा गिडगिडाते हुए बोली “कुछ कहानियाँ मुझे भी दो न ताकि हम भी खुश हो सकें.”

“हम्म्म्म...” नोग्वाजा बोला “फिलहाल मेरे पास कहानियों के लिए समय नहीं है. तुम देखती नहीं मैं किस कदर व्यस्त हूँ? दिन के समय कहानियाँ ... वाह जी वाह!” नोग्वाजा ऊछ्लता कूदता तेज़ी से नज़रों से ओझल हो गया. मूर्ख नोग्वाजा झूठ बोल रहा था. उसे कोई कहानी नहीं आती थी.

लम्बी सांस भरकर मान्जादाबा आगे चल दी. अब उसे अपने बच्चों के साथ बैठी एक माता लंगूर नज़र आई. “ओह फे-ने! मैं देख सकती हूँ कि तुम भी एक माँ हो! मेरे बच्चे कहानियों के लिए मरे जा रहे हैं. क्या तुम्हारे पास कोई कहानी है जिसे लेकर मैं उनके पास जा सकूं.”

“कहानियाँ!” माता लंगूर हंसी “क्या मुझे देखकर तुम्हें लगता है कि मेरे पास कहानियों के लिए वक़्त होगा? हावू! अपने बच्चों को गर्म और सुरक्षित रखने के लिए मुझे इतना ज़्यादा काम करना पडता है. तुम समझती हो मेरे पास कहानियों के लिए कुछ बचता होगा? मैं खुशकिस्मत हूँ कि मेरे बच्चे आदमी के बच्चों जैसे नहीं जो ऐसी बेवकूफीभरी चीज़ों के लिए रोते हैं.”

मान्जादाबा अपनी राह चलती रही. आगे उसने एक जंगली अंजीर के पेड़ पर बैठे एक उल्लू को देखा. “ओह खो-वा!” उसने उल्लू को आवाज़ दी “क्या तुम मेरी मदद करोगे? मैं कहानियों की तलाश में निकली हूँ. क्या तुम मुझे मेरे घर ले जाने के वास्ते कुछ कहानियां दे सकते हो?”

दिन के वक्त नींद से जगाए जाने पर उल्लू बहुत खीझ गया. “कौन हल्ला मचा रहा है?” उसने गुस्सा करते हुए पूछा “मुझे परेशान क्यों कर रही हो? क्या चाहिए तुम्हें? कहानियां? कहानियों के लिए तुमने मुझे मेरी नींद से उठाने की हिम्मत कैसे की? कैसी बदतमीजी है!” ऐसा कहकर उल्लू एक दूसरे पेड़ की काफी ऊपर की दाल पर जा कर बैठ गया. उसे उम्मीद थी वहां उसे कोई तंग नहीं करेगा. और जल्द ही उसे फिर से नींद आ गयी.  उदास हो कर मान्जादाबा आगे चल दी.

अब उसकी मुलाक़ात एक हाथी से हुई. “ओ दयालु न्दलोवू!” उसने कहा “क्या तुम्हें पता है मुझे कहानियां कहाँ मिल सकती हैं? मेरा परिवार कहानियों के लिए प्यासा है. हमारे पास कोई कहानी है ही नहीं.”

हाथी सचमुच दयालु था. उसने मान्जादाबा की आँखों में देखा और देखते ही उसे उस पर दया आगी. “प्रिय स्त्री!” उसने कहा “मुझे तो कोई कहानी नहीं मालूम. लेकिन मैं बाज़ को जानता हूँ. वह पक्षियों का राजा है और बाकियों से कहीं ऊंचा उड़ सकता है. क्या तुम्हें नहीं लगता कि वह तुम्हारी मदद करने में कामयाब होगा?”
“ओह दयालु न्दलोवू!” वह बोली “तुम्हारा बहुत बहुत धन्यवाद.”

सो मान्जादाबा न्कीवाज़ी नाम के महान बाज़ की खोज में निकल पड़ी. वह उसे तुगेला नदी के मुहाने पर मिला. उत्तेजित होकर वह उसकी तरफ़ भागी. जब उसने बाज़ को पुकारा वह अपने देने फैलाए आसमान से नीचे गोता लगाता हुआ नदी में से एक मछली पकड़ने के जातां में लगा हुआ था. “न्कीवाज़ी! न्कीवाज़ी!” उसकी आवाज़ सुनकर बाज़ इस कदर ठिठका कि उसकी चोंच में दबी हुई मछली वापस पानी में गिर गयी. आसमान का एक चक्कर लगाकर वह मान्जादाबा के नज़दीक ज़मीन पर उतरा.

“हावू!” उसने मान्जादाबा को डांटते हुए कहा “ऐसी क्या जल्दी थी कि तुम मुझे ढंग से खाना भी नहीं खाने दे रही हो?”

“ओ महान और बुद्धिमान न्कीवाज़ी!” मान्जादाबा ने बोलना शुरू किया (यहाँ आपको पता होना चाहिए कि बाज़ को दूसरों से अपनी तारीफें सुनना अच्छा लगता है. सो खुद को महान और बुद्धिमान कहे जाने पर घमंड के मारे उसने अपने पंख फुला लिए और मान्जादाबा को सुनने लगा) “न्कीवाज़ी, मेरा परिवार कहानियों के लिए भूखा है. कई दिनों से मैं कहानियों की तलाश में भटक रही हूँ. क्या तुम जानते हो मुझे कहानियां कहाँ मिलेंगी?” मान्जादाबा हताश भाव से उसकी तरफ देख रही थी.

“अच्छा!” वह बोला “ हालांकि मैं खासा बुद्धिमान हूँ पर मुझे सब कुछ नहीं आता. मैं तो सिर्फ उन चीज़ों के बारे में जानता हूँ जो यहाँ धरती पर मौजूद हैं. लेकिन एक जानवर और है जो समुद्र की अंधेरी गहराइयों के रहस्यों को जानता है. शायद वह तुम्हारी मदद कर सके.  मैं कोशिश करके उसे यहाँ तुम्हारे लिए बुला सकता हूँ. तुम यहीं ठहर कर मेरी पतीक्षा करो!” सो मान्जादाबा ने कुछ और दिन तक वहीं अपने दोस्त बाज़ की प्रतीक्षा की. अंततः वह वापस आया “मान्जादाबा!” वह चिल्लाया “मैं लौट आया हूँ और र्मैने अपने प्यारे दोस्त उफुन्दू इवासोल्दान्देल, जो एक समुद्री कछुआ है, को मना लिया है कि वह तुम्हें उस जगह तक ले कर जाएगा जहां कहानियां मिला करती हैं.” इसी के साथ एक विशाल समुद्री कछुए के अपना सिर पानी से बाहर निकाला.
“नमस्ते मान्जादाबा!” अपनी गहरी आवाज़ में कछुवे ने बोलना शुरू किया “ मेरी पीठ पर बैठ जाओ और मेरे कवच को थामे रखना. मैं तुम्हें आत्माओं के देश ले कर जाऊँगा.” सो मान्जादाबा ने वैसा ही किया और वे समुद्र की गहराइयों को नापने निकल पड़े. मान्जादाबा आश्चर्यचकित थी. उसने अपने जीवन में ऐसी सुन्दर चीज़ें कभी नहीं देखी थीं. आखिरकार वे आत्माओं के देश पहुँच ही गए. कछुआ उसे लेकर सीधा राजा और रानी के सिंहासन तक ले कर पहुंचा. वे इस कदर राजसी थे! पहले मान्जादाबा को उनकी तरफ़ देखने में डर लगा पर बाद में वह उनके सम्मान में झुक गयी.

“सूखी धरती से आई ओ स्त्री! तुम्हें हम से क्या चाहिए?” उन्होंने पूछा.

सो मान्जादाबा ने उन्हें अपने दिल की इच्छा बतला दी.

“क्या आपके पास कुछ कहानियां हैं जिन्हें लेकर मैं अपने परिवार के पास जा सकूं?” उसने तनिक शर्मिन्दा होते हुए पूछा.

 “हां!” वे बोले “हमारे पास बहुत सी कहानियाँ हैं. लेकिन हमें उनके बदले तुम क्या दोगी मान्जादाबा?”

“आपको क्या चाहिए? मान्जादाबा ने पूछा.

 “दर असल हमें तुम्हारे घर और तुम्हारे परिवार की एक तस्वीर चाहिए.” वे बोले “ हम सूखे इलाके में कभी नहीं जा सकते इसलिए उसे देखना दिलचस्प होगा. क्या तुम हमारे लिए ऐसी एक तस्वीर ला सकती हो मान्जादाबा?”

“क्यों नहीं! मान्जादाबा ने जवाब दिया. “मैं ऐसा कर सकती हूँ. बिलकुल कर सकती हूँ. धन्यवाद!”

सो मान्जादाबा कछुए की पीठ पर सवार होकर वापस किनारे पहुँची. उसने कछुए को शुक्रिया कहा और अगली पूर्णिमा को तस्वीर लेकर उस से उसी जगह मिलने का वादा भी किया.

मान्जादाबा ने अपने परिवार को अपनी यात्रा और उस दौरान हुए अनुभवों के बारे में बतलाया. जब वह अपने अनुभवों के अंत पर पहुँची तो उसका पति खुशी से उछल पड़ा. “मैं कर सकता हूँ ऐसा. उनकी कहानियों के बदले उन्हें जो तर्स्वीर चाहिए उसे मैं उकेर सकता हूँ!” ऐसा कहने के साथ ही वह तस्वीर बनाने में जुट गया.
मान्जादाबा को अपने पति और उसकी कुशल उँगलियों पर गर्व था. वह देखती रही कैसे उसके पति की उँगलियों की मदद से तस्वीर जीवंत हो उठी थी. तस्वीर में उनके परिवार के सदस्य, उनका घर आर उनका गांव थे. जल्दी ही लोगों को मान्जादाबा की यात्रा और आत्माओं द्वारा कहानियां दिए जाने के वादे के बारे में पता चल गया. वे सब भी जेंजेले की तस्वीर को बनता हुआ देखने आने लगे. जब पूर्णिमा आई तो जेंजेले का काम पूरा हो गया था.  उसने बहुत सावधानी से तस्वीर को मान्जादाबा की पीठ पर बाँध दिया. वह कछुए की पीठ पर सवार हुई और वे चल दिए आत्माओं के देश. तस्वीर देखकर राजा और रानी बहुत खुश हुए. उन्होंने जेंजेले की कला की बहुत तारीफ की और उसके लिए उपहार के बतौर सुन्दरतम सीपियों से बना एक हार मान्जादाबा को दिया. उसके बाद वे मान्जादाबा से मुखातिब हुए. “तुम्हें और तुम्हारे परिवार को हम कहानियों का तोहफा दे रहे हैं.” उन्होंने मान्जादाबा को इतना बड़ा शंख दिया जैसा उसने कभी देखा तक नहीं था. “जब भी तुम्हें एक कहानी की ज़रूरत हो” वे बोले “इस शंख को अपने कानों से लगाना और तुम्हें कहानी मिल जाएगी.” इस दयालुता के लिए राजा और रानी को धन्यवाद कहकर मान्जादाबा वापस अपने संसार लौट आई.

जब वह किनारे पर पहुँची, उसका परिवार और गाँव के सारे लोग वहां मौजूद थे. उन्होंने एक बड़ी सी आग जलाई और चिल्लाकर बोले “हमें एक कहानी सुनाओ मान्जादाबा! कहानी सुनाओ!”

सो वह नीचे बैठी, उसने शंख को अपने कान पर लगाया और बोलना शुरू किया: “एक बार की बात है ...”          

Friday, June 7, 2013

अफ्रीकी लोक-कथाएँ : ५


अफ्रीकी लोक-कथाएँ : ५


आसमानी बिजली और तूफ़ान की कहानी

बहुत पहले आसमानी बिजली और तूफ़ान बाकी सारे लोगों के साथ यहीं धरती पर रहा करते थे, लेकिन राजा ने उन्हें सारे लोगों के घरों से बहुत दूर अपना बसेरा बनाने का आदेश दिया हुआ था.

तूफ़ान असल में एक बूढ़ी भेड़ थी जबकि उसका बेटा आसमानी बिजली एक गुस्सैल मेढा. जब भी मेढा गुस्से में होता वह बाहर जाकर घोरों में आगज़नी किया करता और पेड़ों को गिरा देता. वह खेतों को भी नुकसान पहुंचाता और कभी तो लोगों को मार भी डालता. वह जब नभी ऐसा करता उसकी माँ ऊंची आवाज़ में डांटती हुई उसे और नुक्सान न पहुंचाने और घर वापस आने को कहती, लेकिन आसमानी बिजली अपनी माँ की बातों पर ज़रा भी ध्यान दिए बिना तमाम नुकसान करने पर आमादा रहता. अंत में जब यह सब लोगों की बर्दाश्त से बाहर हो गया, उन्होंने राजा से शिकायत की.

सो राजा ने एक विशेष आदेश दिया और भेड़ और उसके मेढे को शहर छोड़कर दूर झाडियों में जा कर रहने पर मजबूर होना पड़ा. इस से भी कोई लाभ नहीं हुआ क्योंकि गुस्सैल मेढा अब भी कभी कभार जंगलों में आग लगा दिया करता और आग की लपटें जब-तब खेतों तक पहुंचकर उन्हें तबाह कर दिया करतीं.

लोगों ने राजा के आगे फिर से शिकायत की और इस बार राजा ने दोनों माँ-बेटे हो धरती छोड़कर आसमान में जाकर अपना घर बना लेने को कहा, जहां वे बहुत ज़्यादा नुकसान नहीं पहुंचा सकते थे. तब से जब भी आसमानी बिजली को गुस्सा आता है, वह हमेशा की तरह तबाही मचाता है लेकिन हम उसकी माँ को उसे दांत पिलाता हुआ सुन सकते हैं. हाँ कभी कभी जब माँ अपने शरारती बेटे से कुछ दूर कहीं गयी होती है, हम देख सकते हैं कि वह अब भी गुस्सा है और नुक्सान पहुंचा रहा है अलबत्ता उसकी माँ की आवाज़ हमें नहीं सुनाई देती.

अफ्रीकी लोक-कथाएँ : ४


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शेर और आग जलाने की लकड़ी

यह उस ज़माने की बात है जब जानवर और मनुष्य इकठ्ठे रहा करते थे. उन दिनों लोगों के पास आग इस्तेमाल करने का अधिकार नहीं था. वे अपना भोजन कच्चा ही खाया करते थे. आग का इस्तेमाल सिर्फ शेर कर सकता था. वह आग पर स्वादिष्ट व्यंजन बनाया करता और किसी दूसरे को अपनी आग के नज़दीक नहीं आने देता.

आदमी और बाकी जानवरों के मिलकर एक योजना बनाई. “शेर के घर से आग लाने के लिए हमें क्या करना चाहिए ताकि हम भी स्वादिष्ट खाना पका सकें?” सब के मन में यही सवाल था. उन्होंने शाम होने का इंतज़ार किया. शाम होते ही सभी ने एक दूसरे को पुकारते हुए तालियाँ बजाना और नाचना-गाना शुरू कर दिया.

आओ हमारे साथ नाचो  
आओ हमारे साथ नाचो
आओ हमारे साथ नाचो ...

इस नाच-गाने में शामिल होने को बहुत से जानवर झाडियों से बाहर निकल आए. शेर को भी लालच आ गाया और वह अपनी आग जलाने वाली लकडियाँ लेकर नाच-गाने में शामिल होने पहुँच गया. उसने इन लकडियों को घिसना शुरू किया. थोड़ी देर घिस चुकने के बाद लकडियों से धुआँ निकलना शुरू हो गया. शेर ने आग में एक फूंक मारी और थोड़ी सी सूखी हुई घास लकडियों के ऊपर रख दी. थोड़ी देर में एक नन्हीं लपट जलना शुरू हुई और हर कोई लकड़ी का एक-एक टुकड़ा ले आया. जल्दी ही सारे आग के चरों तरफ़ नाचने-गाने लगे.
खरगोश एक चालाक और तेजतर्रार जानवर था. सो लोगों ने उस से कहा: “जब तक हम यहाँ गा रहे हैं और शेर हमारे साथ नाच रहा है और उसका ध्यान बंटा हुआ है, तुम इसकी आग जलाने वाली लकडियाँ ले कर रफूचक्कर हो जाओ. जब वह तुम्हारा पीछा करेगा, हम उसकी आग बुझा देंगे.”

खरगोश ने शेर की आग जलाने वाली लकडियाँ थामीं और दौड़ लगा दी. लेकिन वह बच नहीं सका क्योंकि शेर ने जल्दी ही उसे पकड लिया और आग जलाने वाली लकडियाँ अपने कब्ज़े में कर लीं. अब शेर ने बाल वाले और बिना बाल वाले जानवरों को खाने के बारे में डींग हांकने वाला एक गीत गाना चालू किया.

मुझे नहीं है कोई दिक्कत
चाहे हों बाल तुम्हारी खाल में  
चाहे तुम हो बिना एक भी बाल
मैं खा सकता सब को
तुम सब मेरा भोजन हो
मुझे नहीं है कोई दिक्कत

हिरन बहुत तेज भाग सकता था और छलांगें भी ऊंची लगा सकता था. तब सब ने उस से कहा “जब तक हम यहाँ गा रहे हैं और शेर हमारे साथ नाच रहा है और उसका ध्यान बंटा हुआ है, तुम इसकी आग जलाने वाली लकडियाँ ले कर रफूचक्कर हो जाओ”

जब नाच-गाना चल रहा था तो हिरन ने वैसा ही किया. लेकिन तब शेर बोला: “मेरे गीत की लय पर हिरन के खुरों की टाप क्यों नहीं आ रही?”

शेर ने पलट कर देखा तो पाया कि हिरन उसकी लकड़ियों को थामे जंगल की तरफ़ भाग रहा है. सो उसने हिरन का पीछा किया और उसी तरह अपनी लकडियाँ वापस ले आया.

शेर ने डींग मारने वाला गान दुबारा से शुरू किया.

“ओह!” लोगों ने ठंडी सांसें भरते हुए कहा “अब कौन सा जानवर हमारी मदद कर सकता है? ऑस्ट्रिच के पास सबसे लंबी टांगें हैं. हमें उससे मदद मांगनी चाहिए.” उन्होंने ऑस्ट्रिच को अपनी तरकीब के बारे में बताया तो ऑस्ट्रिच ने शेर की आग जलने वाली लकडियाँ उठाकर भागना शुरू कर दिया.

“मेरे पीछे ऑस्ट्रिच की ऊंची आवाज़ क्यों बंद हो गयी?” शेर ने पलट कर देखा तो पाया कि इस बार ऑस्ट्रिच उसकी लकड़ियों को थामे जंगल की तरफ़ भाग रहा है. उसने ऑस्ट्रिच का पीछा करना शुरू किया.

कुछ देर बाद थका हुआ चेहरा लेकर शेर वापस लौटा. ऑस्ट्रिच की रफ़्तार उस से कहीं ज़्यादा थी. “आज के बाद से” गुस्साए शेर ने कहा “मैं तुम में से किसी एक भी नहीं छोडूंगा. मैं तुम्हारा पीछा करूँगा, तुम्हारा शिकार करूँगा और तुम्हें खा जाऊंगा!”

इस तरह शेर हर किसी का दुश्मन बन गया और लोगों को आग के इस्तेमाल का अधिकार हासिल हुआ.