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Thursday, October 29, 2009

खून की नदी में बिना पतवार की नाव

रेस्टोरेन्टों के नाम वही पुराने जहाजों वाले ही थे- फेरी क्वीन, जलपरी, डाल्फिन...बिना किसी भूमिका के जहां छोड़ा था, वहीं से जारी।
उस रात धुंध और कुहरा था और पूरा शहर खुदा पड़ा था. कई फ्लाइओवर और सड़कें बन रहे थे. कुहरे में भीड़ सड़क पर उबलती लगती थी और सोडियम लाइटों के नीचे, गिट्टियों पर रिक्शे वाले हैंडिल के आगे ढिबरी जलाए फुदक रहे थे. वे अंग्रेजों के जमाने के म्युनिस्पैलिटी कानून का जस का तस पालन किए जा रहे थे. फुटपाथों को देखकर लगता था, कहीं चुनाव ठिठका खड़ा है. असम में हर चुनाव से पहले अचानक विकास और नरसंहार दोनों एक साथ होने लगते हैं. शहरी मिडिल क्लास के लिए विकास और गंवई असमिया के ध्रुवीकरण के लिए नरसंहार आजमूदा नुस्खा है जो उन्हें पोलिंग बूथ तक ले ही आता है.
शहर के व्यापारिक केंद्र फैन्सी बाजार और पान बाजार में एक छोटा-सा समृद्ध राजस्थान बसता है जिसके आईकॉन संगरमरमर के छोटे-छोटे मंदिरों में चुनरी ढके विट्ठल जी और राणी सती हैं. बिना प्याज और लहुसन का मारवाड़ीबासा, कचौड़ी-जलेबी-फुचके (गोलगप्पे) और गलियों में ठुंसी नई मॉडल की कारें, बाकी का ठाठ सजा देते हैं. सीपीआई के बूढ़े विधायक हेमंत दास ने बाद में अपने ही ढंग से एक दिन समझाया था कि असम में सौ प्रतिशत से भी ज्यादा थोक व्यापार मारवाड़ियों के हाथ में है और असमिया सिर्फ उपभोक्ता है. बाजार के पिछवाड़े गोदामों में सैकडो ट्रकों से माल लादा- उतारा जा रहा था. लगभग सारे पल्लेदार पुरबिया, बिहारी और छिटपुट मैमनसिंघिया मुसलमान थे. डर के कारण मैं उधर नहीं गया क्योंकि हर बड़े शहर में, हमेशा ऐसी गलियों में पल्लेदारी करते मुझे अपने गाँव, जिले या आसपास के जिलों के परिचित लोग मिल जाया करते हैं जो कभी खाते-पीते किसान हुआ करते थे. मैं उनका और वे मेरा सामना नहीं कर पाते. हर जगह पलायन और पीड़ा की उदास कर देने वाली एक जैसी कहानियां सुनने को मिलती हैं.
गौहाटी एक युग से उत्तर-पूर्व में व्यापार का सबसे बड़ा केंद्र रहा है. अब भी कई बेहद पुरानी दुकानों में सिर्फ नमक, टार्च और लालटेन बिकते हैं जिन्हें खरीदने के लिए सुदूर जंगलों से आदिवासियों के काफ़िले आते हैं. इन दुकानों का यूएसपी यह है कि पुराने ग्राहकों की ठहरने की जगह भी दुकान के पिछवाड़े होती है. यहाँ का सुअर बाजार तो अद्भुत है जहाँ व्यापार की भाषा भोजपुरी और पंजाबी हो जाती है क्योंकि इन्हें बोलने वाले प्रांतों से ही सबसे अधिक माल आता है.
सुबह अखबार देखे तब समझ में आया कि, जैसा ट्रेन में लगा था, हालात उससे कहीं अधिक बदतर हैं. उत्तर-पूर्व दिल्ली की मीडिया की चिंता के दायरे से बाहर है, दरअसल उसे ब्लैकआउट कर दिया गया है वरना यहाँ कश्मीर से जटिल और भयावह स्थिति है. 22 अक्तूबर को दुलियाजान और काकोजान में सोलह, 27 को नलबाड़ी में दस, 8 नवंबर को बरपेटा मे दस, 16 नवंबर को बेटावर में आठ, 25 नवंबर को नलबाड़ी में चार और 30 नवंबर को बोंगाईगाँव में दस हिन्दीभाषी मारे गए थे. इनके अलावा दूरदराज़ की जगहों में कम से कम सात हत्याएं हुई थीं जिन्हें रिपोर्ट नहीं किया गया था. सेना, गृहमंत्रालय और असम पुलिस को मिलाकर बनाई गई संयुक्त कमान के कोर ग्रुप की बैठक हो रही थी जिसमें गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी के दूत के रूप में पूर्वोत्तर मामलों के संयुक्त सचिव एनके पिल्लै दिल्ली से आ रहे थे.
हर ओर चीमड़ लोकल माछ और फीके भात के अतिरेक से त्रस्त होकर रोटी के इकलौते विकल्प के रूप में हमने नेपाली मंदिर के पास एक रेस्टोरेन्ट खोजा जहाँ मैदे का पराठा और मटर का छोला मिलता था. तदुपरांत स्वीट डिश के तौर पर मलाई समसम. बाद मे यही “मलाईसमसम” हम लोगों का गुडलक साइन बन गया. असमिया जबान में “च” गायब है. चाय “सा” होती है और एक जाति सूतिया जिसे अंग्रेजी में वाकई चूतिया लिखा जाता है. हम लोग खाना खा रहे थे और सामने टेलीविजन पर खबरें आ रही थीं. एक बिहारी की हत्या के बाद उसका सिर पत्थर से कुचल दिया गया था, जिसका भेजा हमारी थालियों से ढाई फीट की दूर, रंगीन स्क्रीन पर छितरा पड़ा था. मुझे पेट में उफनता झाग महसूस हुआ. शाश्वत अपनी टिपिकल मादरी अवधी में मुझे गरिया रहा था, “ल्यौ ससुर अब भेजा देखो. पत्रकारिता करै आय हैं हियां. जहाँ देखो हुंआ लहास पड़ी है और एक मनई साला ढंग से बात करै वाला नहीं है. यू नहीं भवा कि चुपाई मार के अपने घरे रहो. बाप की दूई बात सुनि लेत्यो, भोजन तो चैन से बैठ के करत्यो.”
“तुम तो लौन्डे की जिद मान के पछताय रहे किसी गरीब बाप की तरह पिनपिना रहे हो.” मैने और उकसाया ताकि ध्यान बंटे और उल्टी करने से बच सकूं.
उसका गुस्सा जायज़ था. लखनऊ के समाजवादी गिरीश पान्डेय ने जिन मददगार समाजवादी नेता का पता दिया था, उनकी मौत चार साल पहले हो चुकी थी. पत्रकार रामबहादुर राय ने जिन पत्रकारों के पते दिए थे, उनमें से दो मर चुके थे और एक रिटायर होकर भजन कर रहे थे. लखनऊ पॉयनियर के संपादक उदय सिन्हा ने जिस अखबार मालिक का पता दिया था, वे मिलते ही हत्थे से उखड़ गए कि सिन्हा को पान चबाने के अलावा आता क्या है. वही तो हमारे अखबार को यहाँ बरबाद करके गया है. प्रभाष जोशी ने आंचलिक ग्रामदान संघ के बिनोबापंथी रवीन्द्र भाई का पता दिया था, जिनका कहीं अता-पता नहीं था. संजीव क्षितिज ने फिल्म निर्देशक जानु बरूआ का नम्बर दिया था, वे कलकत्ता में थे.
एक और बात थी. मैने शाश्वत का कैमरा गले मे लटकाने से पहले ही दिन साफ इनकार कर दिया था. यह बच्चों को जन्मदिन पर उपहार में दिया जाने वाला फुसलाऊ कैमरा था और मुझे झालरदार टूरिस्ट दिखने से पुरानी चिढ़ थी. यह कैमरा उसने सुल्तानपुर में अपने बिकाऊ पुश्तैनी घर की आखिरी तस्वीर उतारने के लिए खरीदा था.
तो अब हमें अपनी पत्रकारिता की शुरुआत करनी थी. सवा साल तक अवसाद और बेरोजगारी में सोने के बाद मैं अचानक पूर्वोत्तर का उग्रवाद कवर करने जा रहा था. मेरे पास लखनऊ से अनियमित निकलने वाले एक चौपतिया धंधेबाज साप्ताहिक अखबार का उड़ाया गया फर्जी पहचान पत्र था, जिसमें मुझे दिल्ली ब्यूरो प्रमुख बताया गया था. यह आई-कार्ड मुझे वहाँ खानसामा का काम करने वाले एक लड़के ने अखबार मालिक की जानकारी के बिना मुहर समेत बनाकर दिया था. आई-कार्ड में मेरी उम्र के आगे ठीक शताब्दी पहले की बिल्कुल सही तारीख लिखी हुई थी. पहचान के कॉलम में गलत स्पेलिंग में लिखा था कि मेरी बांई आँख के भीतर कहीं एक कटे का निशान है. मैने पहले इन सब चीजों पर कभी गौर ही नहीं किया था. खैर शाश्वत के पास तो यह कार्ड भी नहीं था. हम लोगों ने सबसे पहले लोकल अखबारों की प्रिन्ट लाइन में छपे नम्बरों पर फोन कर गुवाहाटी के पत्रकारों से मिलना तय किया ताकि जान सकें कि खून की नदी में हम अपनी पत्रकारिता की डोंगी लेकर किस दिशा में जाएं.

Monday, July 20, 2009

एक आतंकवादी से हैंडशेक

दस क़दम की दूरी पर वो लहीम-शहीम इंसान खड़ा था, कोट-पैंट-टाइ और चमकते जूते पहने हुए. तनिक आगे को झुका सा दिखता था -- शायद अपनी लंबाई के कारण.

मैंने अब तक सिर्फ़ उसकी तस्वीर अख़बारों में देखी थी या फिर टेलीविज़न पर. जनसत्ता अख़बार के दफ़्तर में उन दिनों आनंद स्वरूप वर्मा ने उसके युवा दिनों की तस्वीर वाला एक पोस्टर लगा दिया था: नेल्सन मंडेला को रिहा करो.

वही नेल्सल मंडेला मुझसे कोई दस क़दम की दूरी पर खड़े थे. मैंने देखा रंगभेदी शासकों की जेल में सत्ताईस साल काटने के बाद जनसत्ता के पोस्टर वाली छवि पर उम्र की रेखाएँ उभर आई थीं. काले बालों में सफ़ेदी चुकी थी लेकिन सफ़ेद चमकते दाँत वैसे ही थे. सधी हुई चाल बरक़रार थी.

अमरीका और ब्रिटेन सहित कई पश्चिमी सरकारें और राजनेता इस आदमी को ख़तरनाक मानते आए थे. मार्गरेट थैचर की कंज़र्वेटिव सरकार के लिए मंडेला और अफ़्रीकन नेशनल काँग्रेस आतंकवादी थे. बाद में इन देशों ने नए आतंकवादी गढ़ लिए.

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने ख़ालिस्तान के एक नेता को प्रिज़नर आफ़ कांशेंस घोषित किया था लेकिन मंडेला को नहीं क्योंकि उन्होंने पश्चिमी प्रभुओं की सरपरस्ती में चलने वाले श्वेत-दमनचक्र के ख़िलाफ़ बंदूक़ उठाई थी. अमरीका की सरकारी लिस्ट में मंडेला अभी तक आतंकवादी ही रहे, अन्याय के ख़िलाफ़ लड़ने वालों कई और लोगों की तरह.

मैंने कस कर मुट्ठी बाँधी और दूर से ही चिल्लाया: कामरेड मंडेला !! वहाँ मौजूद तमाम लोगों की निगाह मेरी ओर उठ गई. नेल्सन मंडेला ने भी मेरी ओर देखा और लंबे लंबे डग भर कर मेरी ओर बढ़े. उन्होंने अपना मज़बूत और बड़ा सा हाथ मेरी ओर बढ़ा दिया.

मैं बीसवीं शताब्दी के एक जननायक से हाथ मिला रहा था. तीसरी दुनिया का जननायक मगर अमरीका-ब्रिटेन के लिए आतंकवादी.

उन्नीस सौ तिरानवे की उस शांत सुबह मंडेला के लिए सुरक्षा का इंतज़ाम तो था लेकिन इतना नहीं कि गला ही घुट जाए. हम तीस जनवरी मार्ग पर बिड़ला भवन में खड़े थे. यहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े रहे नाथूराम गोडसे ने गाँधी को गोली मारी थी. रंगभेदियों की क़ैद से छूटने के बाद मंडेला एक निजी यात्रा में हिंदुस्तान आए थे और गाँधी से जुड़ी जगहों पर जाना उनके लिए तीर्थयात्रा सा रहा होगा. तब वो दक्षिण अफ़्रीक़ा के राष्ट्रपति नहीं बने थे. अगर वो बुश के वार आन टेरर का ज़माना होता तो टेलीविज़न और अख़बार पता नहीं कैसे कैसे विश्लेषण, कैसे कैसे एक्सक्लूसिव आइटम पेश करते.

मैं नेल्सन मंडेला के साथ साथ उसी प्रार्थना स्थल की ओर चलने लगा जहाँ गाँधी को गोली मारी गई थी. अपने कमरे से निकल कर गाँधी जिस रास्ते प्रार्थना स्थल की ओर 30 जनवरी 1948 को अंतिम बार गए थे, वहाँ उनके क़दमों की पथरीली आकृतियाँ बना दी गई हैं. दिल्ली में उस गुनगुनी सुबह उन्हीं आकृतियों को देखते नेल्सन मंडेला भी प्रार्थना स्थल की ओर गए. मैं उनके साथ साथ चलता रहा था. साथ में कुछ और लोग भी थे -- कुछ गाँधी के लोग, कुछ सरकारी अधिकारी और एक मेरे जैसा रिपोर्टेर और.

प्रार्थना स्थल के बाहर की मुंडेर पर बैठकर मंडेला ने अपने जूते खोले. एक भद्र घरेलू महिला मुस्कुराते हुए आगे बढ़ीं. उन्हें देखकर ही लगता था कि वो विनी मंडेला के बारे में ही पूछने वाली हैं. मैं भीतर ही भीतर तनावग्रस्त होता रहा और वही हुआ. महिला ने पूरी उत्तर भारतीय पारिवारिक शैली में मंडेला से पूछ ही डाला -- "विनी नहीं आईं?"

"विनी के कुछ और कार्यक्रम थे, इसलिए नहीं सकीं", मंडेला ने बेहद संक्षिप्त जवाब दिया. विनी मंडेला और उनके बीच तनाव की ख़बरें छप चुकी थीं और कुछ ही बरस बाद दोनों का तलाक़ भी हो गया. लेकिन शायद मंडेला को भारत यात्रा से पहले बता दिया गया होगा कि परिवार के बारे में सवाल किए जाएँगे, बुरा मत मानना.

गाँधी के प्राण पखेरु जहाँ उड़े, वहाँ मंडेला कुछ देर ख़ामोश खड़े देखते रहे. फिर हम लोग मुख्य भवन की ओर लौटे, उन्हीं पत्थर के गाँधी-चरणों से होते हुए जिन्हें गाँधी के मरने के बाद गाँधी वालों ने वहाँ स्थापित करवाया और फिर हर साल 30 जनवरी को उन्हीं पर चलकर धन्य धन्य हुए. गाँधी की राह पर पहले औद्योगीकरण की घासपात उगी, फिर वो एक छोटी पगडंडी में बदल गई और आगे चलकर विचारशून्यता के बियावान में कहीं बिला गई.

इमारत के पिछले दरवाज़े पर सरकारी इंतज़ाम करने वालों ने शायद किसी टेंट हाउस से डोर मैट किराए पर लेकर रख दिया था. डोर मैट पर अँग्रेज़ी में लिखा था कुमार. मंडेला ने उसे पढ़ते हुए मुझसे पूछा कि कुमार का अर्थ क्या हुआ. मैंने बताया कि ये किसी का नाम भी हो सकता है लेकिन इसका शाब्दिक अर्थ कुँआरा है. मंडेला हलके से मुस्कुराए. तब वो पचहत्तर साल के थे.

वो सुबह मुझे इस शनिवार को फिर से याद आई जब मंडेला ने इक्यानवे वर्ष पूरे किए. शहर लंदन में संसद और वेस्टमिन्स्टर एबी के पास कुछ समय पहले नेल्सन मंडेला की मूर्ति लगा दी गई है. विन्स्टन चर्चिल का बुत भी वहीं है लेकिन उसे नेल्सन मंडेला की मूरत से कई गुना विशाल बनाया गया है.

और अभी मार्गरेट थैचर भी जीवित हैं.

Friday, March 27, 2009

आतंकवादी देखता है

किसी तेज़ फ़िल्म की तरह चलती है यह डरा देने वाली कविता. शिम्बोर्स्का की यह कविता दुनिया भर में अपने कथ्य की वजह से बहुत बहुत मशहूर हुई.

आतंकवादी देखता है

तेरह बीस पर बम फटेगा शराबख़ाने के भीतर
अभी बजा है बस तेरह सोलह.
अभी समय है कुछ लोग भीतर जा सकते हैं
कुछ आ सकते हैं बाहर.
आतंकवादी सड़क पार कर चुका है.
वह ख़तरे से पर्याप्त दूरी पर है और
क्या नज़ारा है! - बिल्कुल फ़िल्मों जैसा
पीली जैकेट वाली एक औरत - वह भीतर जा रही है
काला चश्मा लगाए वह आदमी - वह बाहर आ रहा है
जीन्स पहने लड़के बतिया रहे हैं
तेरह सत्रह और चार सेकेंड
तकदीर वाला है वह ठिगना - स्कूटर पर बैठ कर जा रहा है
और वह लम्बा वाला - वह भीतर जा रहा है.
तेरह सत्रह और चालीस सेकेंड.
वह लड़की - वह चहलकदमी कर रही है, उसके बालों में हरा रिबन
लेकिन तभी एक बस रुकती है उसके सामने.
तेरह अठारह.
अब नहीं है वह लड़की वहां.
क्या वह इतनी बेवकूफ़ थी!
पता नहीं वह भीतर गई या नहीं.
हम देख लेंगे जब उन्हें बाहर लाया जाएगा.
तेरह उन्नीस.
फ़िलहाल कोई नहीं जा रहा भीतर.
एक और मोटा-गंजा बाहर आ रहा है अलबत्ता.
एक सेकेंड, लगता है वह कुछ ढूंढ़ रहा है जेबों में
और तेरह बीस से दस सेकेंड पहले
वह भीतर जा रहा है
अपने घटिया दस्तानों के लिए.
ठीक तेरह बीस.
उफ़ यह इन्तज़ार! कितना लम्बा!
अब.
किसी भी पल.
नहीं.
अभी नहीं.
हां, अब.
बम फटता है.