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Wednesday, March 29, 2017

शिम्बोर्स्का बता रही हैं कविता कैसे लिखें और कैसे न लिखें

कविता कैसे लिखें और कैसे न लिखें

प्रस्तुति - शिवप्रसाद जोशी

पोलैंड के अख़बार लिटरेरी लाइफ़ में नोबेल पुरस्कार विजेता विख्यात कवि, विस्वावा शिम्बोर्स्का जुलाई 1923 - फ़रवरी 2012) का एक कॉलम छपता था जिसमें वो नवोदित लेखकों, कवियों, अनुवादकों और सामान्य पाठकों के जवाब देती थीं. वे कविता लिखने के बारे में पूछते और अपनी कविता भेजकर राय भी जानना चाहते. अपने अंदाज़ में शिम्बोर्स्का  उनको जवाब देती थीं. शिम्बोर्स्का  के जवाबों का एक संकलन पोएट्री फ़ाउंडेशन डॉट ऑर्ग ने तैयार किया था. पोलिश से अंग्रेज़ी में इनका अनुवाद क्लेयर कावानाघ ने किया है. वहीं से इसे साभार, हिंदी में अनूदित किया गया है. विभिन्न मशहूर अनुवादों में शिम्बोर्स्का  हिंदी पाठकों और लेखकों के बीच पहले से लोकप्रिय है, हिंदी में पहली बार ये उनका एक अलग पहलू पेश है.  

अंग्रेज़ी अनुवाद में शिम्बोर्स्का  से सवाल पूछने वालों के नाम हैं, कुछ के इनीशियल्स हैं, सभी पौलेंड के लोग हैं. सुविधा के लिए सिर्फ शिम्बोर्स्का  के जवाबों को सवाल दर सवाल रखा गया है. शिम्बोर्स्का  के सुझाव, ऑस्ट्रियाई मूल के जर्मन कवि राईनर मारिया रिल्के की उन चिट्ठियों की याद दिलाते हैं जो उन्होंने अपने प्रशंसक एक युवा कवि को बतौर जवाब भेजी थीं और जो लेटर्स टू द यंग पोएटनाम से किताब के रूप में विश्वविख्यात है. हिंदी में कबाड़ख़ाना में ये पत्र उपलब्ध हैं और किताब के रूप में भी आए हैं.



तुमने लिखा, ‘मैं जानता हूं कि मेरी कविताओं में कई कमियां हैं, लेकिन उससे क्या, मैं रुकने वाला नहीं और न ही उन्हें ठीक करूंगा.ऐसा क्यों कह रहे हो, प्यारेशायद इसलिए कि तुम कविता को बहुत पवित्र मानते हो या तुम उसे बहुत हल्के में लेते होदोनों ही तरीक़े ग़लत हैं. और ज़्यादा ख़राब बात ये है कि वे नौसिखिए कवि को अपनी रचनाओं पर काम करने की ज़रूरत से वंचित कर देते हैं.

अनुवादक को सिर्फ़ टेक्स्ट के प्रति ही वफ़ादार नहीं रहना होगा. उसे कविता की समूची ख़ूबसूरती को उद्घाटित भी करना होगा, उसकी फ़ॉर्म को बरकरार रखते हुए और उसकी आत्मा और शैली को यथासंभव पूरा का पूरा बचाए रखते हुए.

पंख निकाल दो, धरातल पर आकर लिखने की कोशिश करो, क्या ऐसा कर सकती हो?”

तुम्हें नई कलम की ज़रूरत है. जो कलम तुम इस्तेमाल कर रहे हो वो बहुत गल्तियां करती हैं. ज़रूर विदेशी होगी.

तुम तुकबंदी में पूछती हो कि क्या ज़िंदगी सिक्के बनाती है. मेरी डिक्शनरी का जवाब ना में है.

तुम मुक्त छंद को ऐसे बरतते हो जैसे वो सबके लिए स्वच्छंद हो, सबके लिए मुफ़्त. लेकिन कविता (जो भी हम कहें) हमेशा एक खेल है, थी और रहेगी. और जैसा कि हर बच्चा जानता है, हर खेल के नियम होते हैं. फिर बड़े लोग ये बात क्यों भूल जाते हैं.

हर बोरियत का एक ख़ुश तबीयत के साथ वर्णन करो. कितनी सारी चीज़ें हो रही होती हैं जब कुछ भी नहीं हो रहा होता है.

तुम्हारी अस्तित्वपरक पीड़ाएं जल्द ही कमतर और निरर्थक हो जाती हैं. हमारे पासे पर्याप्त मायूसी और उदास गहराइयां हैं. हमारे प्यारे टॉमस मान (विख्यात जर्मन उपन्यासकार) ने कहा था, गहरे विचार ऐसे होते हैं जो हममें मुस्कान भर दें. तुम्हारी कविता महासागरपढ़ते हुए, हमें लगता है कि हम किसी उथले तालाब में हाथ पांव मार रहे हैं. तुम्हें अपने जीवन के बारे में ऐसे सोचना चाहिए कि वो एक बेमिसाल कमाल अनुभव तुम्हें हासिल हुआ है. फिलहाल तो हमारा यही सुझाव है.

हमारा एक सिद्धांत है कि बसंत के बारे में तमाम कविताएं  यहां स्वतः ही खारिज कर दी जाती हैं. कविता में ये विषय अब अस्तित्व में नहीं है. वैसे जीवन में ये अब भी मौजूद हैं. लेकिन ये दोनों अलग अलग मुआमले हैं.

स्पष्ट कहने का डर, हर चीज़ को मेटाफ़र बना देने की निरंतर, तक़लीफ़ भरी कोशिशें, और हर पंक्ति में ख़ुद को कवि साबित करने की एक अंतहीन कामनाः ये वे उद्विग्नताएं हैं जो हर उभरते कवि को घेरती हैं. लेकिन वे लाइलाज नहीं हैं, अगर वक़्त रहते पकड़ ली जाएं.

तुमने तो तीन छोटी कविताओं में ही बहुत आला दर्जे के वैसे शब्द ठूंस दिए जितने कि अधिकांश कवि अपनी पूरी ज़िंदगी में इस्तेमाल कर पाते हैं. मातृभूमि, सत्य, आज़ादी, न्याय. ये शब्द सस्ते में नहीं आते हैं. इनमें असली ख़ून बहता है जिसे स्याही से फ़र्ज़ी नहीं किया जा सकता.

रिल्के ने युवा कवियों को सावधान किया था कि वे अतिरंजत विषयों से बचें क्योंकि वे सबसे कठिन होते हैं और महान कलात्मक परिपक्वता की मांग करते हैं. रिल्के ने सुझाया था कि नये कवि वो सब लिखें जो वे अपने आसपास देखते हैं, वे रोज़ाना कैसे रहते हैं, क्या खो गया है, क्या मिल गया है. वो उन्हें प्रेरित करता था कि हमारे इर्दगिर्द उपस्थित चीज़ों को अपनी कविता में लाएं, अपने सपनों से छवियां लाएं, याद में पड़ी चीज़ों को उभारें. रिल्के ने कहा था, अगर रोज़मर्रा का जीवन तुम्हें कमतर लगता है, तो जीवन को मत कोसो. तुम ख़ुद कुसूरवार हो. तुम उसकी संपदा को ग्रहण करने लायक पर्याप्त कवि तो बने ही नहीं हो. ये सलाह तुम्हें नीरस, साधारण और थोड़ा कड़वा भी लग सकती है. इसीलिए तो हमने अपने बचाव में विश्व साहित्य के सबसे गूढ़ कवियों में से एक को याद किया है- और देखो उसने किस तरह उन चीज़ों की प्रशंसा की है जो कथित रूप से साधारण हैं.

एक वाक्य में कविता की परिभाषा ! अच्छा, ठीक है. हम कम से कम पांच सौ परिभाषाएं जानते हैं लेकिन उनमें से कोई भी हमें सटीक या पर्याप्त नहीं लगती. हर परिभाषा अपने समय के स्वाद को अभिव्यक्त करती है. जो ये अपने अंदर धंसा हुआ शंकावाद होता है न, ये हमें हमारी अपनी परिभाषा गढ़ने की कोशिश से दूर रखता है. लेकिन हमें कार्ल सैंडबुर्ग की प्यारी उक्ति याद हैः कविता, समंदर के एक जीव की डायरी है जो ज़मीन पर रहता है और उड़ान भरने की चाहत रखता है. हो सकता है इन्हीं दिनों वो ऐसा कर गुज़रे.” 

हम ऐसे कवि से कुछ ज़्यादा की अपेक्षा करते हैं जिसने अपनी तुलना इकेरस से की है लेकिन अपनी भेजी लंबी कविता से उसकी ये तुलना मेल नहीं खाती. श्रीमान आप इस तथ्य पर ग़ौर करना भूल गए कि आज का इकेरस, किसी प्राचीन समय से नहीं, एक अलग किस्म के लैंडस्केप से उभरता है. वो राजमार्गों को कारों और ट्रकों से भरा हुआ देखता है, वहां हवाईअड्डे, रनवे, विशाल शहर, फैलते जाते आधुनिक बंदरगाह और अन्य वास्तविक दुश्वारियां हैं. क्या कभी किसी समय उसके कान की बगल से कोई जेट धड़धड़ाता हुआ न गुज़रा होगा.

अगर तुम एक मंझे हुए मोची बनना चाहते हो, तो इंसानी पांव के बारे में ही सोचकर ख़ुश होना काफ़ी नहीं. तुम्हें अपने चमड़े, अपने औजार के बारे में भी जानना होगा. तुम्हे एक सही पैटर्न चुनना होगा.......कलात्मक रचना का भी यही सच है.

गद्य में तुम्हारी कविताएं एक महान कवि की छवि में सनी हुई हैं जो अपनी उल्लेखनीय रचनाएं शराब के एक उन्माद में रचता है. हम एक मोटा सा अनुमान लगा सकते है कि तुम्हारे ज़ेहन में कौन रहा होगा, लेकिन हमारे लिए ये नाम की बात नहीं. बल्कि ये एक भ्रामक और गलत धारणा है कि शराब लेखन की कार्रवाई में मददगार होती है, या कल्पनाशीलता को विकसित करती है, तर्क को धारदार बनाती है और मदमस्त कवि चेतना के प्रस्फुटन में अन्य दूसरे उपयोगी कार्य कर लेता है. मेरे प्यारे मिस्टर के, न तो ये कवि, न ही हमसे व्यक्तिगत रूप से परिचित कोई कवि, न ही वास्तव में कोई और कवि- शराब के अछूते प्रभाव में कुछ महान लिख सका है. सभी अच्छी रचनाएं एक दर्द के साथ, एक दर्द भरे संयम के साथ, और ज़ेहन में किसी ख़ुशगवार ठकठकाहट के बिना ही लिखी गयी हैं. विसपियान्सकी ने कहा था, ‘मेरे पास हमेशा विचार रहते हैं लेकिन वोद्का लेने के बाद मेरा सर दुखने लगता है.अगर कवि पीता है तो वो एक कविता और अगली कविता के बीच में ऐसा करता है. ये एक ठोस सच्चाई है. अगर शराब अच्छी कविता को प्रमोट करती, तो हमारे देश का हर तीसरा नागरिक कम से कम होरेस तो बन ही जाता....बहरहाल....हमें उम्मीद है कि आप बरबादियों से पूरी तरह बचकर निकल आएंगें.

तुम शायद गद्य में प्रेम करना सीख सकती हो.

जवानी किसी की ज़िंदगी में वाकई एक लुभावना समय होता है. अगर जवानी की कठिनाइयों में लिखने की चाहतों को भी शुमार कर लिया जाए, तो इससे निबाह करने का एक अभूतपूर्व मजबूत गठन भी करना होगा. इस गठन का हिस्सा होंगे:  एक ज़िद, एक धुन, व्यापक पढ़ाई, जिज्ञासा, पर्यवेक्षण, अपने से दूरी, दूसरों के प्रति संवेदनशीलता, एक आलोचक मन, ह्यूमर की तमीज़, और दुनिया के बने रहने का (नंबर एक) एक पक्का यकीन और (नंबर दो) कि उसकी क़िस्मत पहले से अच्छी है. जिन कोशिशों का संकेत तुमने दिया हैं उनसे मालूम पड़ता है कि तुम्हारी सिर्फ़ लिखने की कामना है और वे सारी बातें जो ऊपर कही गई हैं वे उसमें शामिल नहीं हैं. तुम्हारा काम तय है, पहले उसे करो.

जो कविताएं तुमने भेजी हैं उससे लगता है कि तुम कविता और गद्य के बीच बुनियादी फ़र्क को समझने में नाकाम रहे हो. मिसाल के लिए, ‘यहांशीर्षक वाली कविता एक कमरे और उसके फ़र्नीचर का महज़ एक शालीन सा वृतांत है. गद्य में ऐसे विवरण एक ख़ास कार्य करते हैं- वे आने वाले ऐक्शन के लिए स्टेज तैयार करते हैं. जिस पल दरवाजा खुलेगा कोई अंदर दाख़िल होगा और कुछ होगा. कविता में विवरण को ही घटित होना होता है. हर चीज़ अहम हो जाती है, अर्थपूर्णः छवियों का चुनाव, उनकी जगह, शब्दों मे वे क्या आकार लेगें- सब तय करना होता है. एक साधारण घर का विवरण हमारी आंखों के सामने उस कमरे की खोज बन जाना चाहिए. और उस विवरण में निहित भावना को पाठकों से साझा करना चाहिए. वरना, गद्य गद्य ही रहेगा, तुम अपने वाक्यों को कविता की लाइनों में तब्दील करने की चाहे जितनी मशक्कत कर लो. और इसमें और भी ख़राब बात ये होती है कि हासिल कुछ नहीं निकलता यानी ऐसा करने के बाद भी कुछ नहीं होता.

इस ग्रह की भाषा में  क्योंसबसे महत्त्वपूर्ण शब्द है और शायद तमाम अन्य गैलेक्सियों में ही शायद यही होगा.


Wednesday, March 2, 2016

क्योंकि ऐसा बस नफ़रत ही कर सकती है

पोलैंड की नोबेल-विजेता कवयित्री विस्वावा शिम्बोर्स्का की यह कविता एकाधिक बार कबाडखाने पर पोस्ट हुई है. मौजूदा परिदृश्य में इसे एक बार और लगाने की आवश्यकता महसूस हुई -


नफ़रत

-विस्वावा शिम्बोर्स्का

देखो कितनी सक्षम है यह अब भी
बनाए हुए अपने आप को चाक-चौबन्द -
हमारी शताब्दी की नफ़रत.

किस आसानी से कूद जाती है यह
सबसे ऊंची बाधाओं के परे.
किस तेज़ी से दबोच कर गिरा देती है हमें.
बाकी भावनाओं जैसी नहीं होती यह.
यह युवा भी है और बुज़ुर्ग भी.
यह उन कारणों को जन्म देती है
जो जीवन देते हैं इसे.
जब यह सोती है, स्थाई कभी नहीं होती इसकी नींद
और अनिद्रा इसे अशक्त नहीं बनाती;
अनिद्रा तो इस का भोजन है.
एक या कोई दूसरा धर्म
इसे तैयार करता है - तैनात.
एक पितृभूमि या दूसरी कोई
इसकी मदद कर सकती है - दौड़ने में!
शुरू में न्याय भी करता है अपना काम
जब तक नफ़रत रफ़्तार नहीं पकड़ लेती.

नफ़रत, नफ़रत
एन्द्रिक आनन्द में खिंचा हुआ इसका चेहरा
और बाकी भावनाएं -कितनी कमज़ोर, किस कदर अक्षम.

क्या भाईचारे के लिए जुटी कभी कोई भीड़?
क्या सहानुभूति जीती कभी किसी दौड़ में?
क्या सन्देह से उपज सकता है भीड़ में असन्तोष?
केवल नफ़रत के पास हैं सारे वांछित गुण -
प्रतिभा, कड़ी मेहनत और धैर्य.
क्या ज़िक्र किया जाए इस के रचे गीतों का?
हमारे इतिहास की किताबों में कितने पन्ने जोड़े हैं इस ने?
तमाम शहरों और फ़ुटबाल मैदानों पर
आदमियों से बने कितने गलीचे बिछाए हैं इस ने?

चलें: सामना किया जाए इस का:
यह जानती है सौन्दर्य को कैसे रचा जाए.
आधी रात के आसमान पर आग की शानदार लपट.
गुलाबी सुबहों को बमों के अद्भुत विस्फ़ोट.
आप नकार नहीं सकते खंडहरों को देखकर
उपजने वाली संवेदना को -
न उस अटपटे हास्य को
जो उनके बीच महफ़ूज़ बचे
किसी मजबूत खंभे को देख कर महसूस होता है.

नफ़रत उस्ताद है विरोधाभासों की -
विस्फ़ोट और मरी हुई चुप्पी
लाल खून और सफ़ेद बर्फ़.
और सब से बड़ी बात - यह थकती नहीं
अपने नित्यकर्म से - धूल से सने शिकार के ऊपर
मंडराती किसी ख़लीफ़ा जल्लाद की तरह
हमेशा तैयार रहती है नई चुनौतियों के लिए.
अगर इसे कुछ देर इंतज़ार करना पड़े तो गुरेज़ नहीं करती

लोग कहते हैं नफ़रत अंधी होती है.
अंधी?
छिपे हुए निशानेबाज़ों जैसी
तेज़ इसकी निगाह - और बगैर पलक झपकाए
यह ताकती रहती है भविष्य को
-क्योंकि ऐसा बस यही कर सकती है.

Tuesday, February 28, 2012

मेरा यकीन है ठोस, अन्धा और निराधार


फरवरी के पूरे महीने आप पोलैंड की इस महान कवयित्री की रचनाओं का आस्वाद लेते रहे. मुझे उम्मीद है आप को ये कविताएँ भाई होंगी. आज शिम्बोर्स्का - सीरीज़ की यह अंतिम कविता.

खोज

विस्वावा शिम्बोर्स्का

मुझे महान खोज पर यकीन है
मुझे उस आदमी पर यकीन है जो महान खोज करेगा
मुझे उस आदमी के भय पर यकीन है जो महान खोज करेगा
मुझे यकीन है सफ़ेद पड़ते उसके चेहरे पर
उसकी बेचैनी पर, ठण्डे पसीने से भीगे उसके ऊपरी होंठ पर
मुझे उसके नोट्स के जलने पर यकीन है
उनके राख में बदलने और
उनके आखिरी टुकड़े के जल चुकने पर यकीन है
मुझे संख्याओं के बिखराए जाने पर यकीन है
उन्हें बग़ैर किसी पश्चाताप के बिखराए जाने पर
मुझे आदमी की हड़बड़ी पर यकीन है
उसकी गति की सुघड़ता पर
और उसकी मुक्त इच्छाशक्ति पर यकीन है
मुझे दवा की गोलियों के टूटने पर यकीन है
द्रवों के उड़ेले जाने पर
और किरणों के बुझ जाने पर यकीन है
मैं पक्का विश्वास करती हूं कि इस सब का अन्त भला होगा
कि ऐसा होने में बहुत देर नहीं हो जाएगी
और यह कि बिना किसी प्रत्यक्षदर्शी के सब कुछ घटेगा
मुझे पक्का मालूम है कि कोई नहीं जान पाएगा असल में क्या हुआ था
न कोई पत्नी, न कोई दीवार,
वह चिड़िया भी नहीं जो ऊंची आवाज़ में गाती है
मुझे चीज़ों में हिस्सा न लेने पर यकीन है
मुझे तबाह ज़िन्दगानियों पर यकीन है
मुझे वर्षों की बर्बाद मेहनत पर यकीन है
मुझे उस रह्स्य पर यकीन है जिसे कोई शख्स अपनी कब्र तक ले जाता है
मेरे लिए इन शब्दों की ऊंची उड़ान तमाम कानूनों के परे है
जिसके वास्ते मुझे वास्तविक उदाहरणों की ज़रूरत नहीं पड़ती
मेरा यकीन है ठोस, अन्धा और निराधार.

Monday, February 27, 2012

हमारे पूर्वजों का संक्षिप्त जीवन


हमारे पूर्वजों का संक्षिप्त जीवन

विस्वावा शिम्बोर्स्का

उनमें से बहुत थोड़े जी सके तीस की उम्र तक
वृद्धावस्था तब चट्टानों और पेड़ों का विशेषाधिकार थी
बचपन उतना ही होता था जितनी देर में भेड़िये के बच्चे बड़े हो जाते थे
जीवन के साथ चलने के लिये, आपको जल्दी करनी होती थी
-सूरज डूब जाने से पहले
-पहली बर्फ़ के आने से पहले

तेरह साल की लड़कियां बच्चे जनती थीं
चार साल के बच्चे जंगलों में चिड़ियों के घोंसले तलाशते थे
और बीस की उम्र में शिकारियों की टोली का नेतृत्व करते
-अब वे नहीं हैं, वे जा चुके हैं
अनन्तता के सिरों को जल्दी-जल्दी तोड़ दिया गया.
अपनी युवावस्था के सुरक्षित दांतों से
जादूगरनियां चबाया करती थीं टोने-टोटके.
अपने पिता की आंखों के सामने पुरुष बना एक बेटा
दादा की आंखों के खाली कोटरों के साये में जन्मा एक पोता.

जो भी हो, वे लोग वर्षों की गिनती नहीं करते थे.
वे जाले, बीज, बाड़े और कुल्हाड़े गिना करते थे.
समय जो इतनी उदारता से देखता है आसमान में किसी सुन्दर सितारे को
उसने उनकी तरफ़ एक तकरीबन ख़ाली हाथ बढ़ाया
और उसे वापस खींच लिया, मानो यह सब बहुत श्रमसाध्य रहा हो
एक कदम और, दो कदम और,
उस चमकीली नदी के साथ-साथ
जो अन्धकार से निकलकर अन्धकार में विलीन हो जाती थी.

खोने के लिये एक भी पल नहीं था,
न कोई स्थगित प्रश्न, न देर से होने वाले रहस्योद्घाटन
बस वही हा जिसे समय के भीतर भोगा गया.

सफ़ेद बालों की प्रतीक्षा नहीं करे सकती थी बुद्धिमत्ता
उसने रोशनी देखने से पहले सब कुछ देख लेना था
और सुनाई देने से पहले सुन लेना था हर आवाज़ को.
अच्छाई और बुराई-
इनके बारे में बहुत कम जानते थे वे, लेकिन जानते सब कुछ थे,
जब बुराई जीत रही हो, अच्छाई को छिपना होता है
और जब अच्छाई सामने हो, तो बुराई को,
दोनों में से किसी को भी जीता नहीं जा सकता
न ही ऐसी किसी जगह फेंका जा सकता है, जहां से वे वापस न लौटें

इसलिए अगर आनन्द होता, तो थोड़े भ्रम के साथ
और उदासी होती, तो ऐसे नहीं कि मद्धिम सी भी उम्मीद न हो.

जीवन चाहे कितना भी लम्बा हो, रहेगा सदैव संक्षिप्त ही.
कुछ भी और जोड़े जाने के वास्ते बहुत छोटा.

Sunday, February 26, 2012

चीज़ें आख़िर ख़ुद को उठा तो नहीं सकतीं


अन्त और आरम्भ

विस्वावा शिम्बोर्स्का

हर युद्ध के बाद
किसी न किसी ने चीज़ों को तरतीबवार लगाना होता है.
चीज़ें आख़िर
ख़ुद को उठा तो नहीं सकतीं.

किसी न किसी ने
मलबे को किनारे लगाना होता है
ताकि लाशों से भरी गाड़ियों के लिए
रास्ता बन सके.

किसी न किसी ने गुज़रना ही होगा
गंदगी और राख़,
सोफ़ों के स्प्रिंग,
कांच के टुकड़ों
और ख़ून सने चीथड़ों से हो कर.

किसी न किसी ने लादना होंगे खंभे
दीवार खड़ी करने के वास्ते
किसी ने साफ़ करना होगा खिड़की को
और चौखट में जमाना होगा दरवाज़ों को.

न कोई ध्वनियां, न फ़ोटो खिंचाने के मौके
और यह करने में सालों लग जाने होते हैं
सारे कैमरे जा चुके
दूसरे युद्धों की तरफ़.

पुलों को दोबारा बनाया जाना है
रेलवे स्टेशनों को भी.
आस्तीनें मोड़ी जाएंगी
तार-तार हो जाने तलक.

हाथ में झाड़ू थामे एक कोई
अब भी याद करने लगता है कि यह कैसा था.
एक कोई सुनता है, हिलाता हुआ
अपनी खोपड़ी, जो फूटने से बच गई.
लेकिन आसपास कोलाहल मचा रहे लोगों को
यह सब
तनिक उबाऊ लगेगा.

समय समय पर किसी एक ने
खोद निकालना होगा एक ज़ंग-लगा तर्क
किसी झाड़ी के नीचे से
और उछाल फेंकना होगा उसे मलबे की तरफ़.

उन्होंने
जो इस को तफ़सील से जानते हैं,
रास्ता बनाना होगा उनके लिए
जिन्हें बहुत कम मालूम है.
या उससे भी कम.
और अन्ततः कुछ नहीं से भी कुछ कम.

किसी न किसी को लेटना होगा यहां
घास पर
जो ढंके हुए है
कारणों और परिणामों को
मक्के के पत्ते से छांटा गया तिनका दांतों में दबाए
किसी मूर्ख की तरह बादलों को ताकते हुए.

Saturday, February 25, 2012

डायनासोर का कंकाल

डायनासोर का कंकाल

विस्वावा शिम्बोर्स्का

प्यारे भाइयो!
हमारे सामने है अनुचित अनुपात का एक उदाहरण
ऊपर देखिये, यह रहा डायनासोर का कंकाल

प्रिय मित्रो!
बांईं तरफ़ हम देख सकते हैं अनन्त तक घिसटती एक पूंछ
और दाईं तरफ़ दूसरे अनन्त तक घिसटती गरदन

सम्मानित साथियो!
पहाड़ जैसे धड़ के नीचे
मजबूती से खड़ी हैं चार टांगें कीचड़ में

उदार नागरिको!
प्रकृति ग़लती नहीं करती
पर उसे पसन्द है अपना नन्हा लतीफ़ा:
कृपया ग़ौर करें हास्यास्पद रूप से छोटे सिर पर

देवियो और सज्जनो!
इस आकार के सिर में दूरदृष्टि के लिये जगह नहीं होती
इसलिये इसका स्वामी अब उजड़ चुका है -

माननीय अतिथियो!
बहुत सूक्ष्म मस्तिष्क और बेहद स्थूल भूख
अधिक तर्कहीन नींद बजाय अक्लमन्द भय के -

सम्मानित जन!
इस मामले में हम लोग कहीं बेहतर हैं
जीवन सुन्दर है और दुनिया है हमारी -

शिष्ट प्रतिनिधिगण!
सोचनेवाली शिरा के ऊपर तारों भरा आसमान
और नैतिक नियम उसके भीतर

परम उदार मान्यवर!
शायद इस इकलौते सूरज के नीचे
दो बार नहीं होते ऐसे करिश्मे -

अनन्य सज्जनो!
कितने सधे हुए हाथ
कैसे उस्ताद होंठ
कैसा सिर इन कन्धों के ऊपर

हे सर्वोच्च दरबार!
अदृश्य हो चुकी पूंछ के बदले
कितनी बड़ी ज़िम्मेदारी -

Friday, February 24, 2012

मेरी बहन कविता नहीं लिखती


अपनी बहन की प्रशंसा में

विस्वावा शिम्बोर्स्का

मेरी बहन कविता नहीं लिखती
ऐसी कोई उम्मीद भी नहीं कि
वह अचानक कविता लिखना शुरू कर देगी।
वह मां पर गई है, जो कविता नहीं लिखती थी
और पिता पर भी जो कविता नहीं लिखते थे।
अपनी बहन की छत के नीचे मुझे सुरक्षित महसूस होता है।
उसका पति कविता लिखने के बदले मर जाना पसन्द करेगा
और बावजूद इसके कि यह बात पीटर पाइपर की तरह
बार-बार दोहराई जैसी लगने लगी है,
सच्चाई यह है कि मेरा कोई भी रिश्तेदार कविता नहीं लिखता
मेरी बहन की डेस्क की दराज़ों में पुरानी कविताएं नहीं होतीं
न उसके हैण्डबैग में नई कविताएं।
जब मेरी बहन मुझे खाने पर बुलाती है
मुझे पता होता है कि उसे मुझसे कविताएं नहीं सुननी होतीं।
उसके बनाए सूप स्वादिष्ट होते हैं और उनका कोई गुप्त उद्देश्य नहीं होता।
उसकी कॉफ़ी नहीं बिखरती पाण्डुलिपियों पर।
ऐसे बहुत से परिवार होते हैं जिनमें कोई कविता नहीं लिखता
लेकिन अगर ऐसा शुरू हो जाय तो फिर उसे रोकना बहुत कठिन होता है।
कभी-कभार कविता पीढ़ियों में बहती आती है
- वह रच सकती है ऐसे भंवर जिनमें परिवार का प्रेम
तहस-नहस हो सकता है
मेरी बहन ने मौखिक गद्य के इलाक़े में
थोड़ी कामयाबी हासिल की है
और उसका लिखित गद्य
छुट्टियों में भेजे गए पोस्टकार्डों में सीमित है
जिनमें हर साल
एक जैसे वायदे लिखे होते हैं:
जब वह लौटती है
उसके पास होता है
इतना
इतना सारा
बताने को इतना सारा।

Thursday, February 23, 2012

परिणामस्वरूप, यद्यपि, हालांकि


हो सकता था

विस्वावा शिम्बोर्स्का

ऐसा हो सकता था
होना ही था
पहले हो गया. बाद में हुआ.
नज़दीक. दूर.
हुआ. पर तुम्हारे साथ नहीं.

तुम बच गए क्योंकि तुम
पहले थे
तुम बच गए क्योंकि तुम
आख़िरी थे.
अकेले थे. या
औरों के साथ.
दाईं तरफ. बाएँ. या
क्योंकि बारिश हो रही थी. छांह के कारण.
क्योंकि धूपभरा था दिन.

किस्मत वाले थे तुम - वहाँ एक जंगल था
किस्मत वाले थे तुम - वहाँ कोई पेड़ न थे
किस्मत वाले थे तुम - एक हुक, एक बल्ली, एक ब्रेक
एक घुमाव, एक चौथाई इंच, एक क्षण
किस्मत वाले थे तुम - ठीक उसी वक़्त तैरता आया एक तिनका

परिणामस्वरूप, यद्यपि, हालांकि,
क्या हो गया होता अगर एक हाथ, एक पैर,
एक इंच भर और, बाल बराबर दूरी

-कोई दुर्भाग्यपूर्ण संयोग.
सो तुम यहाँ हो?
एक बार और बाल-बाल बच जाने के बाद अभी नीम-बेहोश,
मैं और ज्यादा आश्चर्यचकित और बे-आवाज़ नहीं बनी रह सकती
सुनो
किस तरह धड़क रहा है मेरे भीतर तुम्हारा दिल.

Wednesday, February 22, 2012

इतिहास मोटी मोटी संख्याओं में गिनता है नरकंकालों को


यास्लो का यातना शिविर

विस्वावा शिम्बोर्स्का

लिखो इसे. लिखो. साधारण स्याही से
साधारण कागज़ पर - उन्हें भोजन नहीं दिया गया
भूख से मरे वे सारे. "सारे! कितने?
यह तो बहुत बड़ा चारागाह है. कितनी घास चाहिए
हरेक के वास्ते?" लिखो -
मैं
नहीं जानती.
इतिहास मोटी मोटी संख्याओं में गिनता है नरकंकालों को.
एक हजार एक रह जाते हैं एक हज़ार
जैसे एक का कोई अस्तित्व ही नहीँ था -
एक काल्पनिक भ्रूण, एक खाली पालना, एक वर्णमाला
जिसे कभी पढ़ा नहीं गया
हँसती, रोटी, बड़ी होती हवा
ख़ालीपन, जो सीढ़ियों से दौड़ता बगीचे में पहुँच जाता है.
कोई नहीं खड़ा कतार में.

हम उस चारागाह में खड़े हैं जहां वह शरीर में तब्दील हुआ था
और झूठे गवाह की तरह चुप खड़ा है चारागाह -
धूपदार, हरा. नजदीक में एक जंगल
जहां चबाने को लकड़ी है और छाल के नीचे पानी -
हर रोज देखे जाने के लिए एक दृश्य
जब तक कि तुम अंधे न हो जाओ. ऊपर एक चिड़िया -
उसके जीवनदाई पंखों की छाया ने छुआ था उनके होंठों को. उनके जबड़े खुले हुए थे
दांत से टकराते थे दांत
रात, हंसिये जैसा चाँद चमकता था आसमान में
और उनकी रोटी केलिए गेहूं काटता था.
काले पड़ चुके देवताओं की दिशा से हाथ आया करते थे -
उनकी उँगलियों में खाली प्याले.
कांटेदार बाड़ के नज़दीक
पलटता है एक आदमी

उनके मुंह मिट्टी से भरे हुए थे और वे गा रहे थे
"एक प्यारा गीत कि कैसे सीधे दिल पर
वार करता है युद्ध." लिखो - कितनी खामोशी से.
"हाँ."

Tuesday, February 21, 2012

अश्लीलता के प्रश्न पर एक विचार


अश्लीलता के प्रश्न पर एक विचार

विस्वावा शिम्बोर्स्का

सोचने से ज़्यादा अनैतिक कुछ नहीं होता
इस तरह की आवारागर्दी हर जगह पसर जाती है
जिस तरह हवा की उड़ाईं झाडियाँ
डेज़ी के फूलों के लिए तय की गयी ज़मीन पर फैलती है.

सोचने वालों के लिए कुछ भी पवित्र नहीं होता.
चीज़ों को उद्दंडता के साथ नाम ले कर पुकारना,
काम और वासना से प्रभावित व्याख्याएं-समीक्षाएँ,
नंगी हकीकत की तरफ पागलों की तरह चपलता के साथ भागना,
संवेदनशील विषयों को गंदी मंशा के साथ छेड़ना,
गर्मी में बहस करना - उनके कानों के लिए यह संगीत होता है.

दिन के उजाले में या रात के खोल के नीचे
वे वृत्त, त्रिकोण और जोड़े बनाया करते हैं .
जोड़ीदार की उम्र या लिंग मायने नहीं रखते.
उनकी आँखें दमकती हैं, उनके गालों पर लाली है.
दोस्त ले जाते हैं दोस्तों को गलत राहों पर.
भ्रष्ट पुत्रियां भ्रष्ट करती हैं अपने पिताओं को.
एक भाई अपनी छोटी बहन की दलाली करता है.

चिकनी पत्रिकाओं में पाए जाने वाले गुलाबी नितंबों के बदले
वे प्राथमिकता देते हैं
ज्ञान के प्रतिबंधित पेड़ के फलों को -
वह सारा सीधा-सादा कूड़ा कचरा.
उन्हें बिना चित्रों वाली किताबों में स्वाद मिलता है.
उनमें जो भी भिन्नता होती है वह कुछ खास वाक्यांशों में पाई जाती है
जिन्हें रेखांकित किया गया होता है
किसी क्रेयौन से.

चौंका देने वाली होती हैं वे मुद्राएं
वह बिना जांची-परखी सादगी जिस के साथ
एक दिमाग दूसरे के भीतर बीज रोपने की योजना बनाता है!
खुद 'कामसूत्र' को ऐसी मुद्राओं के बारे में कुछ नहीं मालूम.

इनके इन प्रयासों के दौरान उबलती हुई एकमात्र चीज़ चाय होती है
लोग कुर्सियों पर बैठे होते हैं और अपने होंठ हिलाते हैं
हर कोई अपनी टांग पर टांग रखता है
ताकि एक पैर फर्श पर टिका रहे
और दूसरा लटका हो हवा में.
बस कभी कभार कोई खड़ा होता है
और खिडकी से लगकर
पर्दों के बीच की दरार से
बाहर गली में डालता है छिपी हुई निगाह.

Monday, February 20, 2012

हे परमेश्वर, उसे बस यही एक तोहफा मत देना!


एक कथा शुरू हुई

विस्वावा शिम्बोर्स्का

एक शिशु के जन्म के लिए
कभी भी तैयार नहीं रहता संसार.

अभी हमारे जहाज़ विन्लैंड से वापस नहीं लौटे हैं.
अभी हमें सेंट गोटहार्ड दर्रे को पार करना बाक़ी है.
हमें योर के रेगिस्तान में चौकीदार को उल्लू बनाना है,
सीवरों से अपना रास्ता बनाते हुए पहुंचना है वारसा के केन्द्र तलक
सम्राट हैरल्ड बटरपेट तक पहुंचना है
और फौशे को मंत्री पद से बर्खास्त किए जाने का इंतजार करना है
केवल एकलपुल्को जा कर ही
हम नए सिरे से सफ़र शुरू कर सकते हैं.

हमारी पट्टियां,
माचिसें, हाइड्रोलिक प्रैस, तर्क और पानी खत्म हो चुके हैं
हमारे पास ट्रक भी नहीं हैं, न हमें उच्चाधिकारी का सहयोग मिला.
शेरिफ को रिश्वत में देने लायक तक नहीं यह मरियल घोड़ा.
तार्तारों के बंदी बनाए हुओं की कोई खबर नहीं.
जाड़ों के लिए हमें एक अधिक गर्म गुफा चाहिए होगी
और किसी ऐसे की जो हमारी भाषा बोल सके.

हमें नहीं मालूम निनेवे में हम किस पर यकीन करें
और क्या-क्या प्रतिबन्ध लगायेगा राजकुमार हम पर
दफ्तरों की फाइलों में पता नहीं किस-किस का नाम है.
लोग कह रहे हैं चार्ल्स,द हैमर कल सुबह हमला बोलने वाला है
ऐसे में हमें खुद को उनके हाथों सौंप देना चाहिए,
धर्म-परिवर्तन कर लेना चाहिए
दिखावा करना चाहिए कि हम उनके खलीफा को जानते हैं
और क्वाबे कबीले से हमारा कोई लेना-देना नहीं.

रोशनी करने का वक्त हो गया
जाबीएर्सो में दादी माँ को तार भेजा जाय
झोंपड़ी की चमड़े की रस्सियों की गांठें ढीली की जाएँ

ईश्वर करे आसान हो प्रसव
ईश्वर करे हमारा शिशु अच्छे से बड़ा हो
समय-समय उसे खुश होने देना
और भरने देना पाताल में कुलांचें.
उसका दिल हो मज़बूत
और जागृत उसका दिमाग
कि पहुंचे दूर-दूर.

लेकिन उतनी दूर नहीं
कि वह देखने लगे भविष्य में
हे परमेश्वर,
उसे बस यही एक
तोहफा मत देना!

Sunday, February 19, 2012

जहां हिरोशिमा था वहाँ फिर से हिरोशिमा है


वास्तविकता मांग करती है

विस्वावा शिम्बोर्स्का

वास्तविकता मांग करती है
कि हम इस बात का भी ज़िक्र करें -
जीवन अनवरत चलता रहता है.
वह चल रहा है कैने में बोरोडीनो में
कोसोवो पोल्ये में और गुएर्निका में.

जेरिको के छोटे चौराहे पर
एक पेट्रोल पम्प है
और विला होरा के पार्क की बेंचों पर
गीला पेंट
पर्ल हार्बर और हेस्टिंग्ज़ के बीच
चिठ्ठियों का आना जाना लगा रहता है,
शेरोनी के सिंह की आँखों के तले
गुजरती है एक वैन,
और वेर्डून के नज़दीक खिले हुए बगीचे
अनदेखी नहीं कर सकते
आसपास घट रही चीज़ों की.

हर चीज इतनी सारी है
कि बहुत बढ़िया से छिप जाता है "कुछ नहीं"
एक्टियम पर लंगर डाले खड़ी नावों से
उडेला जाता है संगीत
और उन के धूपदार डेकों पर नृत्यरत जोड़े होते हैं.

इतना सारा चल रहा है
कि यह एक बार दुबारा हो रहा होना चाहिए.
जहां अब एक भी पत्थर नहीं खड़ा है
वहाँ आप देखते हैं आइसक्रीम बेचने वाले को
जिस पर बच्चों ने धावा बोला हुआ है.
जहां हिरोशिमा था,
वहाँ फिर से हिरोशिमा है
और वहां रोज़मर्रा इस्तेमाल की चीज़ों का
उत्पादन किया जाता है.

भयावहता से भरा यह संसार अब भी आकर्षक है -
सुबहें, जिन्हें होता देखने को
जागना अब भी इस लायक है.

मासेजोविस के खेतों में
घास हरी है
और भरी हुई है ओस से
घास के साथ अक्सर ऐसा होता है

संभवतः सभी मैदान युद्ध के मैदान होते हैं
जिन्हें हम याद रखते हैं वो
और जिन्हें भुला दिया जाता है वो भी -
भोजपत्र के जंगल और देवदार के जंगल,
बर्फ और बालू, दिपदिपाते दलदल
और पराजय के संकरे दर्रे,
जहाँ अभी फिलहाल, ज़रूरत पड़ने पर आप को
भयाक्रांत हो कर छिपना होगा,
आप किसी झाड़ी के पीछे जाकर फारिग हो सकते हैं.

क्या सीख मिलती है इस से हमें?
शायद कुछ नहीं.
केवल खून बहता है
और जल्दी सूख जाता है
और
हमेशा की तरह
-कुछ नदियां,
कुछ बादल.

त्रासद पहाड़ी दर्रों पर
हवा उड़ा देती है
किसी बेपरवाह सर पर से टोपी
और हम कुछ नहीं कर सकते
इस बात पर ठहाका लगाने के सिवा.

Saturday, February 18, 2012

हकीक़त के संसार को विस्मृति से भयभीत नहीं होना होता


हकीक़त का संसार

विस्वावा शिम्बोर्स्का

इस तरह उड़ान नहीं भरता हकीक़त का संसार
जैसे सपने भरते हैं
कोई दबी हुई आवाज़ या घंटी
उसे रस्ते से हटा नहीं सकते.
कोई भी चीख या टक्कर
उसे छोटा नहीं बना सकते.

सपनों में छवियाँ
धुंधली और अस्पष्ट होती हैं
और आमतौर पर कई भिन्न तरीकों से
उनकी व्याख्या की जा सकती है.
हकीक़त का मतलब हकीक़त होता है
जिसकी असलियत जानना अधिक टेढी खीर होता है.

सपनों की चाभियां होती हैं
हकीक़त का संसार अपने आप खुलता है
और उसे बंद नहीं किया जा सकता,
उस में से बाहर आते हैं
परीक्षाफल और सितारे
उस में से बौछारें होती हैं
तितलियों और बगैर सर की टोपियों
और बादलों की किरचों की
कुल मिला कर वे एक पहेली तैयार करते हैं
जिसे हल नहीं किया जा सकता.

हमारी अनुपस्थिति में सपनों का अस्तित्व नहीं हो सकता था.
वह सपना जिस पर टिका है हकीक़त का संसार
अब भी अज्ञात है,
और उसकी अनिद्रा के उत्पाद
हर जागने वाले के लिए उपलब्ध हैं.

सनकी नहीं होते सपने -
असल में हकीक़त का संसार पागल है
चाहे अपने अड़ियलपन में ही क्यों न हो
जिस से वह चिपका रहता है
घटनाक्रम की धाराओं के बीच.

सपनों में अब भी जीवित रहते हैं
हमारे ताज़ा मृतक
और पूरी तरह स्वस्थ.
वापस पा चुकने के बाद अपना यौवन.
हकीक़त का संसार हमारे सामने रख देता है
मृत देह को.
पलक तक नहीं झपकाता
हकीक़त का संसार.

सपने होते हैं पंखों की तरह भारहीन
और स्मृति
बहुत आसानी से उन से पल्ला झाड सकती है.
हकीक़त के संसार को
विस्मृति से भयभीत नहीं होना होता.
बेहद जिद्दी होता है वह.
बैठा हुआ हमारे कन्धों पर,
उसका भार हमारे दिलों पर
और हमारे पैरों पर लुढकता रहता है.

उस से कोई बचाव नहीं.
जब हम भाग रहे होते हैं
वह लद जाता है हम पर
और बच निकलने के हमारे रास्ते में ठहरने की कोइ जगह नहीं -
हकीक़त नहीं कर रही हमारा इंतज़ार वहाँ.

Friday, February 17, 2012

एक सम्पूर्ण सेकेण्ड से कम कुछ भी नहीं


मई १६, १९७३

विस्वावा शिम्बोर्स्का

उन बहुत सी तारीखों में एक
जो कुछ याद नहीं दिलातीं.

मैं उस दिन कहाँ जा रही थी
क्या कर रही थी - मुझे याद नहीं,

मैं किस से मिली, हम ने किस बारे में बातें की
मैं नहीं जानती.

अगर आसपास कहीं कोई अपराध हुआ हो
तो मैं गवाही नहीं दे सकती.

सूरज चमका और
मेरे क्षितिजों से परे मर गया.
धरती घूमी
लेकिन इस बाबत कुछ भी नहीं लिखा गया मेरी नोटबुक में.

बेहतर होगा मैं यह सोचूँ
कि मेरी अस्थाई मृत्यु हो गयी थी
बजाय इस के कि मैं जिए जा रही थी
और मुझे कुछ भी याद नहीं है.

आखिरकार मैं कोई प्रेत तो नहीं थी -
मैं सांस ले रही थी, खाना खा रही थी
टहल रही थी.
मेरे क़दमों की चाप को सुना जा सकता था
मेरी उँगलियों के शर्तिया छोड़े होंगे
दरवाजों के कुंडों पर निशान
आईनों में क़ैद हुआ होगा मेरा प्रतिविम्ब
मैंने किसी भी रंग का कुछ पहना ही होगा
किसी ने देखा ही होगा मुझे.

शायद उस दिन मुझे कुछ मिला हो
जिसे खो दिया हो मैंने
शायद मैंने कोई चीज़ खो दी हो जो प्रकट हुई हो बाद में

मैं भरी हुई थी भावनाओं और सनसनी से
अब वह सब
कोष्ठकों के बीच बिंदुओं की पांत जैसा है

मैं कहाँ छिपी हुई थी?
कहाँ दफना लिया था मैंने खुद को?
अपनी आँखों के सामने ही अदृश्य हो जाने
की बुरी तरकीब नहीं यह.

मैं झकझोरती हूँ अपनी स्मृति को
संभवतः उसकी टहनियों में
सालों से निद्रामग्न कोई चीज़
फडफडाती हुई, हरकत में आ जाए.

नहीं.

स्पष्टतः मैं बहुत अधिक मांग रही हूँ
एक सम्पूर्ण सेकेण्ड से कम कुछ भी नहीं.

Thursday, February 16, 2012

संभवतः हम एक प्रयोगधर्मी पीढ़ी हैं?


शायद यह सब

विस्वावा शिम्बोर्स्का

शायद यह सब
किसी प्रयोगशाला में घटित हो रहा है?
दिन के वक़्त एक
और रात के वक़्त अरबों दीयों की रोशनी में?

संभवतः हम एक प्रयोगधर्मी पीढ़ी हैं?
एक बरतन से दूसरे में उड़ेले जाते
परखनलियों में हिलाए जाते
सिर्फ आँख से ही न परखे जाते
हम में से हर किसी को
आखिरकार चिमटी से पकड़ा जाता है

या शायद यह इस बात के ज़्यादा करीब है -
कोई बाधा नहीं?
योजनाबद्ध तरीके से
अपने आप होते हैं परिवर्तन?
ग्राफ की सुई
धीमे-धीमे उकेरती है पूर्वनिर्धारित ऊंची-नीची लकीरें?

शायद इस सीमा तक हम बहुत दिलचस्पी लेने लायक नहीं होते?
आमतौर पर कंट्रोल-मॉनीटरों को स्विच से नहीं जोड़ा जाता?
केवल युद्धों के लिए, बेहतर होता है महायुद्धों के लिए
धरती के ढेले के ऊपर एक बेढब उड़ान के लिए
या बिंदु 'अ' से 'ब' तक की महत्वपूर्ण यात्रा के लिए?

शायद उसका ठीक उल्टा -
हो सकता है ऊपर वालों को रोजमर्रा की चीज़ों में रस आता हो?
देखो! उस बड़ी स्क्रीन पर एक छोटी लड़की
अपनी आस्तीन पर बटन टाँक रही है.
राडार चीखता है
और दौड़े चले आते हैं कर्मचारी.
कितना प्यारा नन्हा सा प्राणी
उसका नन्हा दिल धड़कता हुआ उस के भीतर!

सुई के टाँके
कितने प्यारे, कितने गंभीर!
कभी कोई चिल्लाता है -
बॉस को खबर करो,
उसे बताओ
उसने अपनी आँखों से देखना चाहिए ये सब!

Wednesday, February 15, 2012

हमें देह से ऊपर उठना होगा


हम बेहद भाग्यशाली हैं

विस्वावा शिम्बोर्स्का

हम बेहद भाग्यशाली हैं
कि हम ठीकठाक नहीं जानते
हम किस तरह के संसार में रह रहे हैं

यह जानने के लिए आपको
बहुत, बहुत लंबे समय तक जीना है
निस्संदेह इस संसार के
जीवन से भी ज्यादा लंबे समय तक
चाहे तुलना करने के लिए ही सही
हमें दूसरे संसारों को जानना होगा

हमें देह से ऊपर उठना होगा
जो बस
बाधा उत्पन्न करना
और तकलीफें खड़ा करना जानती है

शोध के वास्ते
पूरी तस्वीर के वास्ते
और सुनिश्चित निष्कर्षों के वास्ते
हमें समय से परे जाना होगा
जिसके भीतर हर चीज़ हडबडी में भागती है और चक्कर काटती है

उस आयाम से
शायद हमें त्याग देना होगा
घटनाओं और विवरणों को

सप्ताह के दिनों की गिनती
तब अपरिहार्य रूप से
अर्थहीन लगने लगेगी

पोस्ट बॉक्स में चिट्ठी डालना लगेगा
मूर्खतापूर्ण जवानी की सनक

“घास पर न चलें” लिखा बोर्ड लगेगा
पागलपन का लक्षण.

Tuesday, February 14, 2012

इस के खिलाफ होने वाले विरोध को हम आत्मा कहते हैं


कुछ भी नहीं है तोहफ़े के बतौर

विस्वावा शिम्बोर्स्का

कुछ भी नहीं मिला है तोहफ़े के बतौर, सब उधार लिया हुआ है
मैं अपने कानों तक ऋण में डूब रही हूँ
मुझे खुद का भुगतान करना है
खुद को चूका कर
अपना जीवन देना है अपने जीवन के बदले

ज़रा देखिये क्या है यहाँ की व्यवस्था –
दिल पर पाया जा सकता है दुबारा से हक़
और जिगर पर भी
और हरेक उंगली और अंगूठे पर

इन शर्तों को फाड़ डालने के लिए अब देर हो चुकी है
मेरे ऋण चुकाए जायेंगे
और मुझे लूटा जाएगा
या, ज्यादा साफ़ कहूँ – मेरी खाल उतार ली जायेगी.

मैं घूमती रहती हूँ इस नक्षत्र पर
कर्जदारों की भीड़ के बीच
कुछ पर अपने पंखों को चुकाने के
बोझ की जीन कसी हुई है
बाकियों को हरेक पत्ती का हिसाब देना होगा
हर हाल में

हमारा हरेक ऊतक
उधार के हिसाब में चढा हुआ है
एक भी स्पर्शिका या तंतु
हम नहीं रख सकते
अपने इस्तेमाल के लिए

अनंत विवरणों से भरी सूची
का मतलब यह हुआ कि हम
सिर्फ खाली हाथ ही नहीं
बगैर हाथों के रह जायेंगे आखिर में.

मुझे याद नहीं पड़ता
कहाँ, कब और क्यों
मैंने किसी को
अपने नाम का यह खाता खोलने दिया था.

इस के खिलाफ होने वाले विरोध को
हम आत्मा कहते हैं
और सिर्फ यही एक चीज़ है
जो इस सूची में शुमार नहीं.

Monday, February 13, 2012

हम सब आखिरकार अकेले होते हैं उन सारे सूर्यों के नीचे जो कभी चमके थे

इस महीने की पहली तारीख को पोलैंड की महान नोबेल-विजेता कवयित्री विस्वावा शिम्बोर्स्का का निधन हो गया था. उनकी स्मृति में मैंने आप को इस ठिकाने पर उनकी एकाधिक कवितायेँ पढवाई थीं. कोई चार साल पहले मैंने उनकी तकरीबन दो सौ कविताओं का अनुवाद समाप्त किया था. यह अलग बात है कि उन अनुवादों ने अभी पुस्तक के रूप में छपना बाकी है.

शिम्बोर्स्का की मृत्यु के बाद मैं बार-बार उस पांडुलिपि के पास गया हूँ और मेरे भीतर लगातार इस बात का अहसास गहराता गया है कि हमें अभी तक नहीं पता शिम्बोर्स्का के जाने के साथ ही हमने क्या खो दिया है – एक युग, एक चेतना और एक अद्वितीय दृष्टि. और सबसे ऊपर एक बेहद ईमानदार और प्रतिबद्ध रचनाकार (जो आज के समय में एक दुर्लभ प्रजाति बन चुकी है).

आज से मैं इसी महान कवयित्री की कुछेक और कविताओं से आपका परिचय कराऊंगा.



एक अनलिखी कविता का मूल्यांकन

कविता के शुरुआती शब्दों में
लेखिका जोर देकर कहती है कि जहाँ एक तरफ धरती बहुत छोटी है
बेहद विशाल है आसमान और उसके भीतर,
मैं उद्धृत करती हूँ “हमारी अपनी भलाई के लिए ज़रूरत से ज्यादा सितारे हैं.”

जब वह आसमान का चित्र खींचती है, आपको उसके भीतर की असहायता नज़र आ जाती है,
एक भयावह विस्तार में खो गई है लेखिका
वह इस गृह की जीवन-हीनता के कारण अचंभित है,
और उसके दिमाग में (जिसे हम अस्पष्ट ही कह सकते हैं)
जल्द ही एक सवाल उठता है –
क्या अंततः हम अकेले होते हैं
सूरज के नीचे, उन सारे सूर्यों के नीचे जो कभी चमके थे.

प्रायिकता के तमाम सिद्धांतों के बावजूद!
और वर्तमान के हर जगह स्वीकार कर लिए गए पूर्वानुमानों के बावजूद!
उस अवश्यम्भावी प्रमाण के बावजूद जो कभी भी आ सकता है
आदमी के हाथ! यह आपके वास्ते कविता है.

इस दौरान, कवयित्री देवी वापस लौट आती है ज़मीन पर.
उस गृह पर जिसके बारे में उसका दावा है कि वह “बिना प्रत्यक्षदर्शियों के
चक्कर काटती जाती है” जो इकलौती “विज्ञान कथा है जिसे हमारा
ब्रह्माण्ड अफोर्ड कर सकता है.”
इस तरह पास्कल (१६२३-१६६२) का दुःख,
लेखिका का मानना है, अद्वितीय था
किसी भी एंड्रोमेडा या कैसियोपीया के भीतर.
हमारा इकलौता अस्तित्व हमारे कर्तव्यबोध को
भ्रष्ट करता है और
उस अवश्यम्भावी प्रश्न को ला खड़ा करता है
हमें किस तरह जीवित रहना चाहिए इत्यादि इत्यादि?
चूंकि “हम उस खोखल की अनदेखी नहीं कर सकते”
हे भगवान, आदमी पुकारता है खुद को
मुझ पर दया करो, मैं भीख मांगता हूँ, मुझे राह सुझाओ ...
लेखिका को बेहद अफ़सोस है कि जीवन इतने मज़े में बर्बाद किया जाता है
मानो हमें अनंत आपूर्ति मिल रही हो.
इसी तरह वह युद्धों को लेकर भी चिंतित है, जो,
उसके विकृत विचारों के हिसाब से,
दोनों पक्षों द्वारा हारे जाते हैं - हमेशा.
और ऐसा कुछ लोगों द्वारा दूसरों पर अपने अधिकार थोपने की वजह से होता है.
उसके नैतिक उद्देश्य पूरी कविता भर दिपदिपाते रहते हैं.
किसी अधिक निश्छल लेखनी के नीचे वे शायद ज्यादा चमकते.

इस वाली के नीचे नहीं, हाय! मूलतः उसका अभिप्रायहीन सिद्धांत
(कि हम सब आखिरकार अकेले होते हैं
सूर्य के नीचे, उन सारे सूर्यों के नीचे जो कभी चमके थे)
और उसकी आत्माहीन शैली (अतिशयोक्तिपूर्ण शब्दों
और साधारण भाषा का मेल) इस सवाल को सामने ले कर आते हैं –
इस कविता पर कौन विश्वास करेगा?
उत्तर बस एक ही हो सकता है – कोई नहीं.
इति सिद्धम.

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(पास्कल - फ्रांसीसी गणितज्ञ व दार्शनिक जिन्होंने प्रायिकता के सिद्धांत की नींव रखी.
एंड्रोमेडा – एक तारामंडल जो उत्तरी गोलार्ध के ऊपर कैसीयोपिया और पेगासस तारामंडलों के मध्य अवस्थित है.
कैसीयोपिया – सन्दर्भ ऊपर दिया गया है)

Friday, February 3, 2012

परीकथाएँ अब भी सुखान्त होती हैं


आज का दिन शिम्बोर्स्का को याद करने का था. कहना न होगा शिम्बोर्स्का की कविताएँ बीसवीं शताब्दी का वह बयान हैं जिसके बगैर उस सदी के इतिहास ने अधूरा रह जाना था. इस महान कवयित्री की आज के लिए आख़िरी कविता-

नाव की तरफ

-विस्वावा शिम्बोर्स्का

एक अनंत बारिश शुरू हुआ चाहती है
नाव की तरफ, और कहाँ जा सकते हैं आप,
इकलौती आवाज़ के लिए तुम्हारी कविताएँ,
व्यक्तिगत अतिशयोक्तियाँ,
अनावश्यक प्रतिभाएं,
ज़रूरत से ज्यादा जिज्ञासा
सीमित दुःख और भय,
चीज़ों को सभी छः तरफ से देखने की उत्सुकता.

फूल रही हैं नदियाँ और उन के किनारे फटने को तैयार
नाव की तरफ, तुम सारे चित्रों और अर्ध-रंगों,
तुम - तफसीलो, गहनो, सनको,
मूर्ख अपवादों,
विस्मृत संकेतों,
सलेटी रंग की असंख्य आभाओ
खेल के वास्ते खेल
और खुशी के आंसू

जहाँ तक निगाह पहुँचती है, सिर्फ पानी और धुंधले क्षितिज
नाव की तरफ, सुदूर भविष्य के लिए योजनाएं,
विभिन्नता में उल्लास,
बेहतर इंसान के लिए सराहना
एक या दो तक सीमित न कर दिए गए विकल्प,
घिस चुके नैतिक मानदंड,
इस बारे में दोबारा सोचे जाने का समय,
और यह यकीन
कि यह सारा किसी दिन कार आमद साबित होगा.

यह बच्चों की वजह से है
कि हम अब तक बने हुए हैं
परीकथाएँ अब भी सुखान्त होती हैं
वही एक आख़िरी अंत है जिस से फिलहाल भी काम चल जाएगा.
बारिश रुक जाएगी,
शांत हो जायेंगी लहरें,
छितर जायेंगे बादल
साफ़ आसमान में
और वे फिर से वही हो जायेंगे
जो बादलों ने होना होता है -
ऊंचा और हल्का,
धुप में सूख रही चीज़ों
के समान -
आनंद के टापू,
भेडें,
बन्द्गोभियाँ,
बच्चों की लँगोटियाँ.

मृतकों के साथ एक षड्यंत्र - शिम्बोर्स्का


मृतकों के साथ एक षड्यंत्र

- विस्वावा शिम्बोर्स्का

किन परिस्थितियों में देखते हैं आप मृतकों के स्वप्न?
क्या सोने से पहले आप अक्सर उन के बारे में सोचते हैं?
सब से पहले क्या दीखता है?
क्या एक सा ही नज़र आता है हमेशा?
नाम? जाति? कब्रिस्तान? मृत्यु की तारीख?

वे किस बारे में बातें करते हैं?
पुरानी मित्रता? रिश्तेदारी? अपना मुल्क?
क्या वे बताते हैं कि वे कहाँ से आ रहे हैं?
और कौन होता है उन के पीछे?
और तुम्हारी बगल में कौन खड़ा होकर उन्हें सपने में देख रहा होता है?

उनके चेहरे, क्या वे उनके फोटोग्राफों जैसे होते हैं?
क्या वे समय के साथ ज़रा भी बुढाए हैं?
क्या वे तंदुरुस्त होते हैं? क्या उदास?
वे जिनकी हत्या हुई, क्या भर चुके उन के घाव?
क्या तुम्हें अब भी याद है उन की हत्या किस ने की थी?

वे क्या थामे होते हैं अपने हाथों में?
ज़रा खुल कर बताओ उन चीज़ों की बाबत.
क्या वे जले हुए हैं? फफूंद लगे? जंग लगे? सड़ते हुए?
और उनकी आँखों में क्या? कोई निवेदन? कोई चेतावनी?
साफ़-साफ़ बताओ
क्या तुम बस मौसमों के बारे में बातें करते रहते हो?
या फूलों के? पक्षियों के? तितलियों के?

वे कोई अटपटे सवाल तो नहीं पूछते?
अगर हाँ तो क्या होते हैं तुम्हारे जवाब?
चुपचाप सुरक्षित रहने के वास्ते?
या क्या तुम चतुराई से बदल देते हो सपने का विषय?
जागने पर या बिलकुल सही मौके पर?