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Sunday, December 22, 2013

द स्काई इज़ द लिमिट


होनहार युवा क्रिकेटर उन्मुक्त चन्द के अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन क्रिकेट के मैदान पर बहुत जल्दी दिखाना शुरू कर दिया था. उसकी इन उपलब्धियों के बारे में कबाड़खाने पर बहुत सारी सामग्री लगाई जा चुकी है. क्रिकेट की अंतर्राष्ट्रीय अंडर – १९ विश्वकप प्रतियोगिता की चैम्पियन भारतीय टीम के इस कप्तान ने एक नई पारी का आगाज़ किया है.

बीस साल के उन्मुक्त ने विश्वकप प्रतियोगिता की चैम्पियनशिप जीतने तक के अपने सफ़र को बाकायदा किताब की शक्ल में आपके सामने रख दिया है. और यह किताब उसने खुद लिखी है – मैं ऐसा पूरी आत्मविश्वास से कह रहा हूँ क्योंकि किताब के शुरुआती अध्यायों के सम्पादन में छोटा-मोटा योगदान मेरा भी रहा था. खेल, पढाई और प्रैक्टिस और तमाम व्यवस्तताओं के बावजूद इस किताब का लिखा जाना युवाओं के लिए बेहद प्रेरणास्पद होगा, मैं उम्मीद करता हूँ.

व्यक्तिगत रूप से मेरे लिए विवियन रिचर्ड्स यानी किंग रिचर्ड्स क्रिकेट के सर्वकालीन महानतम बल्लेबाज़ और खिलाड़ी रहे हैं. उन्होंने ही किताब की भूमिका लिखी है और एक दूसरी भूमिका वी. वी. एस. लक्ष्मण ने.
किताब पेंग्विन इण्डिया से छाप कर आई है और बीती ३० नवम्बर को उसका बाकायदा विमोचन राहुल द्रविड़ और संजय मांजरेकर के हाथों हुआ है.

अपने प्रेरणास्रोतों के रूप में उन्मुक्त अपने प्रशिक्षकों के अलावा अपनी माता, अपने पिता और चाचा को बड़े लाड़ और सम्मान से याद करता है. पूरी किताब अब जब चाहें पढ़ें लेकिन मैं चाहूंगा कि यदि आपके घर में दस से पंद्रह साल का कोई बच्चा है तो उसे यह किताब अवश्य पढने को दें.

आज जब बच्चे इस कदर सेलेक्टिव और आत्मकेंद्रित होते जा रहे हैं, उस माहौल में मुझे इस किताब से उन्मुक्त के स्कूली जीवन से एक पैराग्राफ यहाँ आपके साथ बांटने में गर्व का अनुभव हो रहा है –

The most important decision of my life that turned out to be really fruitful was shifting my school from DPS, Noida to Modern School, Barakhamba Road in class IX. It was a tough decision as I had studied in DPS from the beginning and by then had developed good friendship with many classmates. But the passion for cricket made me bold enough to change the school. Getting admission in Modern school was very tough. They conducted a written test and interviewed me and my parents. It was not my cricket, but on the  basis of my good academic record and swimming feat (I had participated in national level school contest) that I was admitted to  Modern school. It was at this school where I got an idea of what competitive cricket was all about. I started playing with senior players about whom I had heard plenty but had never played with. Many of them were representing Delhi state in different age groups. At Modern school I practiced under Navin Chopra and Uday Gupta sir. My coach at Modern school, Navin sir holds a special place in my heart. He was the one who always tried to help in all possible ways. The four years of Modern School were very productive and fun filled for me. The school gave me the confidence and belief  that I lacked before. It also gave me the right attitude, the so called Modernite attitude. I feel that personality development is equally important for cricketers. They meet so many people from  different backgrounds. They must learn how to conduct themselves amongst these people. Modern school taught me that.

The other important thing at Modern school was my studies. Somehow I always paid utmost importance to studies. It could be because my parents never let me compromise on it. Most of the cricketers used to bunk  classes, even if they were not playing matches, but I never did that. I was very fond of psychology (one of the subjects I studied in school). I attended all psychology classes and even preferred sitting in other sections in their psychology period. There is a saying that when the  going gets tough, the tough get going. It has always happened with me. I have performed better under tough conditions. I love challenges. The bigger the challenge, the better I am. I took Mathematics as one of the subjects in class XI and XII, knowing that I would have to burn the midnight lamp to get decent marks. But still I did. I thought cricket would go well with mathematics. Maths would help me tactically, statistically and working with the angles and stuff like that. I never blamed one thing for the other. I think there are always different perspectives to a situation. You might see no relation, but I did. And I always surprised my teachers and classmates with my marks. Even today I take out time for studies. That is the reason why I could score good marks in my first semester of the first year of BA Programme at St. Stephen’s college. I can never give up studies. I would love to continue with this even while playing for India.


Sunday, April 15, 2012

उन्मुक्त ने फिर किया सीना चौड़ा

ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ उन्मुक्त की नाबाद सेंचुरी ने ऑस्ट्रेलिया में चल रही अंडर १९ क्रिकेट टूर्नामेंट में भारत को चैम्पियन बना दिया है. ऑस्ट्रेलिया की टीम में दिग्गज गेंदबाज़ पैट कमिंस भी था जिसकी गेंदों ने भारत के धुरंधर बल्लेबाजों की ऐसी-तैसी कर दी थी. उसी कमिंस के उन्मुक्त ने दो दफा छक्के ठोके. १९८ के लक्ष्य का पीछा करते हुए तीसरे नंबर पर खेलने आए उन्मुक्त ने १४६ गेंदों पर नौ चौके और छः छक्के लगाकर नाबाद ११२ बनाए. ध्यान रहे कि सेमीफाइनल में पहली वरीयता प्राप्त इंग्लैण्ड के खिलाफ भी उन्मुक्त ने ९४ रनों की कप्तानी पारी खेली थी. बधाई पुत्तर! क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया की आधिकारिक वेबसाईट से एक खबर लगा रहा हूँ.



India take out quad series

India have taken out the 2012 International Under-19 Quadrangular Series, cruising to a seven-wicket win over Australia in Townsville on Sunday.

After being sent into bat by the Indians, the Aussies were restricted to just 9-194 from their 50 overs, with seamers Sandeep Sharma and Harmeet Singh taking 4-51 and 2-33 respectively. In reply, a brilliant unbeaten 112 from number three Unmukt Chand saw India mow down the target with few problems and they reached 3-198 in the 43rd over.

The Australian innings was on the back foot almost immediately, with medium pacer Kamal Passi drawing an edge from opener James Peirson (5), who was caught behind by India wicketkeeper Smit Patel. From there the wickets kept on tumbling for the Australians, with Kurtis Patterson (0), Travis Head (12) and Will Bosisto (5) making little impression on the scorers. When left-arm orthodox spinner Vikas Mashra had opener Meyrick Buchanan (59) caught behind the Australians were in deep trouble at 5-114. Nick Stevens showed some fight with a patient 24, and a gritty unbeaten 41 from Sam Hain gave the bowlers some runs to play with it, but it never looked like being enough.

The Australians had their tails up early, however, when speedster Pat Cummins removed openers Akhil Herwadkar (2) and Manan Vohra (23), but Chand's appearance immediately had the run rate moving in an upward direction. The right-hander guided the tourists home with a superb 112 from 146 balls, while paceman Gurinder Sandhu was the only other Aussie to take a wicket.

The win completed a remarkable turnaround for the Indians, who went winless in the group section of the competition before thumping first-placed England in their semi-final and then easing past the host nation in the final.

Tuesday, September 27, 2011

पहले अन्तर्राष्ट्रीय मैच में उन्मुक्त की टीम ने ऑस्ट्रेलिया को धोया


चार देशों की अन्तर्राष्ट्रीय अन्डर - १९ क्रिकेट प्रतियोगिता के पहले मैच में उन्मुक्त की टीम ने अन्डर - १९ क्रिकेट के इतिहास में सौ से अधिक रनों का स्कोर सबसे तेज़ गति से बनाकर एक ज़बरदस्त रेकॉर्ड कायम किया. पहले खेलते हुए ऑस्ट्रेलिया ने इकतालीस ओवरों में १६३ रन बनाए. जवाब में जो हुआ उसकी कल्पना मुझे तो नहीं थी. कुल बारह ओवरों में भारत की टीम ने बिना कोई विकेट गंवाए १६७ रनों का अम्बार लगा डाला. ओपनिंग करने आए कप्तान उन्मुक्त ने तीन छक्कों के साथ ७२ रन बनाए जबकि उनके साथी मनन वोहरा ने दो छक्कों के साथ ७९ रन बनाए.

ये तो उन्मुक्त की शुरुआत है. आगे आगे देखिए होता है क्या!

(फ़ोटो - जीत का जश्न . क्रिकइन्फ़ो से साभार)

Wednesday, September 21, 2011

उन्मुक्त को बधाई दीजिये


अभी थोड़ी देर पहले बी सी सी आई ने उन्मुक्त यानी अपने लवी को भारत की अन्डर-१९ टीम का कप्तान घोषित किया है. विशाखापत्तनम में होने वाले चार देशों के टूर्नामेंट में उन्मुक्त देश की युवा टीम का नेतृत्व करेगा. उसके कप्तान बनने में एकाध तकनीकी दिक्कतें आईं मगर अब यह तय है.

बधाई बेटे! बधाई भरत दा! बधाई सुन्दर!

इसे भी देखें - लव यू लवी, ऑल द बेस्ट

Sunday, November 14, 2010

लव यू लवी, ऑल द बेस्ट

आज मेरा सीना चौड़ा होकर दूना हो गया है. लवी यानी उन्मुक्त चन्द, मेरा पुत्र-भ्राता-मित्रसुलभ याड़ी बच्चा आज एक इतनी बड़ी ख़बर ले कर आया है. रहस्य ज़रा बना रहे. बस यह कि नीचे लिखा नोट सुन्दर ठाकुर कबाड़ी का लिखा है.

मैं लवी को धन्यवाद देता हूं. उसके माता-पिता को धन्यवाद देता हूं और सबसे ऊपर अपने सबसे प्यारे यार सुन्दर को कहता हूं "बौफ़्फ़ाइन बेटे! बौफ़्फ़ाइन!!"

लव यू लवी, योर चाचू सेज़ ऑल द बेस्ट टु यू! इतनी ख़ुशी देने का शुक्रिया!


कि रंग लाती है हिना पत्थर पे घिस जाने के बाद

*सुंदर चंद ठाकुर

यह एक बेहद निजी मामला है, मगर मैं अशोक भाई के कहने पर इसे सार्वजनिक कर रहा हूं। वैसे मौका खुशी का है भी, ऐसी खुशी जिसे समेट पाना मेरे लिए मुमकिन नहीं हो पा रहा। दो घंटे पहले ही खबर मिली है कि उन्मुक्त दिल्ली की रणजी टीम में शामिल कर लिया गया है। वीनू मांकड अंडर-19 टूर्नामेंट में दिल्ली की कप्तानी करते हुए उसने क्वार्टर फाइनल और सेमीफाइनल दोनों ही मैचों में लगातार शतक ठोक कर अपनी दावेदारी रखी थी। सेलेक्टरों ने संभवतः उसके पिछले साल का भी रेकार्ड देखा हो। उसने शिखर धवन के साथ ओपनिंग करते हुए रणजी वनडे में पंजाब के खिलाफ 75 रनों की पारी खेली थी।

अब मैं उन्मुक्त के बारे में कुछ और बातें आपसे साझा करना चाहता हूं। उन्मुक्त मेरा भतीजा है यानी बड़े भाई का बेटा. दिल्ली में पला-बढ़ा बच्चा है और चार साल की उम्र से क्रिकेट खेल रहा है। मेरे कुछ साहित्यकार मित्र जानते हैं कि उन्मुक्त के क्रिकेट को लेकर मैं और उसके पापा बचपन से ही पागलपन की हद समर्पित रहे हैं। एक बार जब वह सात साल का था, उसकी सहनशक्ति को बढ़ाने के इरादे से मैं और भाई मई की भरी दोपहर उसे पब्लिक पार्क में ले गए थे और हमने चार घंटे प्रैक्टिस करवाई थी। उस दिन भाई, जो कि अन्यथा बहुत सीधा-सरल और अपेक्षाकृत भीरू है, अपनी बॉलिंग की स्पीड दिखाने पर तुला था। एक बॉल, वह बाकायदा क्रिकेट बॉल थी, मगर साइज में जरा-सी छोटी थी, उन्मुक्त के हेलमेट की ग्रिल से निकलकर सीधे उसकी नाक पर लगी और खून की धार बह चली। मगर उस चोट के बावजूद हम उसे प्रैक्टिस पूरे चार घंटे प्रैक्टिस करवाकर ही लौटे। उन्मुक्त की यही खासियत रही है। उसने प्रैक्टिस से कभी जी नहीं चुराया और दो-दो घंटे बसों में धक्के खाकर भी प्रैक्टिस करने मयूर विहार से भारत नगर जाता रहा।

दिल्ली में स्कूलों और मध्यवर्गीय घरों में बच्चों के करियर को लेकर माता-पिता बहुत चिंतित रहते हैं। उन्मुक्त के साथ भी ऐसा था। मैं आजमाना चाहता था कि अगर एक लक्ष्य चुनकर पूरी ताकत और समर्पण के साथ उसे हासिल करने की कोशिश की जाए, तो वह हासिल होता है या नहीं। लेकिन उन्मुक्त के दसवीं तक आते-आते मुझे भी डर लगने लगा। अगर क्रिकेटर नहीं बन पाया तो! तब यह फेसला किया गया कि क्रिकेट के साथ उसकी पढ़ाई को भी बराबर महत्व दिया जाए। इस मामले में मैं उन्मुक्त को सलाम करूंगा। उन्मुक्त चौदह साल की उम्र में दिल्ली की अंडर-15 टीम में आ तो गया था, मगर उसे एक ही मैच खेलने को मिला, जिसमें वह कुछ खास नहीं कर पाया। तब हमें दिल्ली क्रिकेट की राजनीति समझ में आई क्योंकि उन्मुक्त ने दो साल लगातार टायल मैचों में सबसे ज्यादा रन बनाए थे। मगर उसके दिल्ली अंडर-15 टीम में आने से मुझे बहुत राहत मिली। जिस साल उन्मुक्त को दसवीं का बोर्ड देना था, उस साल नियम बदले और बीसीसीआई ने अंडर-15 के बदले अंडर-16 शुरू कर दिया। इस साल भी टायल मैचों में उन्मुक्त ने सबसे ज्यादा रन बनाए, मगर उसका फिर भी टीम में सेलेक्शन नहीं हुआ। मैं गुस्से में फनफनाया तब उन्मुक्त की अब तक अखबारों में छपी खबरों की पूरी फाइल लेकर सीधे डीडीसीए के प्रेजिडेंट अरूण जेटली जी से मिला। उनके हस्तक्षेप से उन्मुक्त को तीसरे मैच में खेलने का मौका मिला। इसके बाद तो उन्मुक्त ने दिल्ली की ओर से रन बनाने का ऐसा सिलसिला शुरू किया कि इस साल उसे अंडर-19 की कप्तानी ही दे दी गई। मगर वह पढ़ाई को बराबर तवज्जो देता रहा और दसवीं के बोर्ड में महज डेढ़ महीने की तैयारी के बावजूद 83 फीसदी अंक लेकर आया।

उन्मुक्त की एक ओर खासियत उसका नेचर है। उसे मैंने जब जो कहा उसने किया। ऐसे बच्चे किसी को कम ही मिलते हैं। पिछले साल एक दिन वह दस किलोमीटर भागा, क्योंकि मुझे लग रहा था कि उसका वजन बढ़ने से उसके मूवमेंट धीमे हो रहे हैं। मैं अपने साहित्यकार मित्रों से भी उसे मिलाता रहा हूं। विष्णु खरे की कविता कवर डाइव मैंने उसे पढ़कर सुनाई। वे जब भी मेरे घर आए मैंने उन्मुक्त को उनसे जरूर मिलाया। मेरे साहित्यिक लगाव ने उसे ज्ञानरंजन की कहानी अमरूद का पेड़ पढ़ने को मजबूर किया। अशोक के साथ उसका और भी गजब का रिश्ता है। अशोक हर बार उसे चुनौती देकर जाता- इतने रन बनाएगा तो ये दूंगा, वो दूंगा। उसे इसका नुकसान भी उठाना पड़ा है। पिछले साल उसे उन्मुक्त को 18000 का मोबाइल देना पड़ा और इस साल लगता है कि वह लैपटॉप हारने वाला है। पिछले महीने दिल्ली में उसने लैपटॉप के लिए उन्मुक्त के सामने अंडर-19 में तीन सेंचुरी मारने की शर्त रखी थी। उन्मुक्त अब तब दो सेंचुरी मार चुका है। हालांकि एक में वह 96 पर आउट हो गया। 15 को उन्मुक्त फाइनल खेल रहा है। अगर इसमें सेंचुरी लग गई तो अशोक को 30000 की चपत लगनी तय है। वैसे वह उदार है। हर बार दो पैग पीने के बाद उन्मुक्त की पिछली कामयाबियों से खुश होकर उसे हजार-दो हजार रूपये तो थमा ही देता है।

खत्म करने से पहले उन्मुक्त के बारे में कुछ और बातें - कि वह किताबें पढ़ता है। अशोक ने उसे दसियों किताबें दी हैं। बड़े भाई ने उसके लिए पूरी लाइब्रेरी ही बना दी है। वह पिछले कई सालों से डायरी भी लिखता है। मुझे हमेशा लगा है कि लिखने की आदत डालने के लिए डायरी लेखन सबसे बेहतरीन तरीका है। खुद मैंने 14 साल बिना एक दिन छोड़े डायरी लिखी। बहरहाल, क्रिकेट और उन्मुक्त की बात की जाए। उन्मुक्त के समर्पण का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 7 साल की उम्र से अब तक एग्जाम्स के दिनों के अलावा शायद ही कोई दिन होगा जब उसने बैट नहीं पकड़ा हो। उसे इस समर्पण के लिए मैं सौ में से सौ नंबर देता हूं और उम्मीद करता हूं कि वह सिर्फ अच्छा क्रिकेटर नहीं, एक पढ़ा-लिखा, समाज के प्रति दायित्वों को समझने वाले इंसान बने। मित्रों से भी उसके लिए ऐसी शुभकामना की अपेक्षा करता हूं।

फिलहाल इतना ही।


तस्वीरें क्रमशः

१. पांच साल का लवी
२. डीपीएस नोएडा में चेतन चौहान से बैस्ट बैट्समैन का खिताब लेते हुए
३. दिल्ली डेयरडेविल्स के साथ प्रक्टिस मैच २००९
४. चचा सुन्दर के साथ
५, १३ साल का था जब उसे बिशन बेदी ऑस्ट्रेलिया ले गए
६. आज की ताज़ा तस्वीर - मॉडर्न स्कूल का बेस्ट स्पोर्ट्समैन
७. कोटला मैदान विराट कोहली के साथ
८. २००९ में इंग्लैण्ड - दिल्ली अंडर-१९ का दौरा
९. एन सी ए बैंगलोर में वीवीएस के साथ सितम्बर २०१०