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Tuesday, December 27, 2016

या रब ज़माना मुझ को मिटाता है किस लिये


मरहूम मेहदी हसन खान की गई मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़ल -

 

दायम पड़ा हुआ तेरे दर पर नहीं हूँ मैं
ख़ाक ऐसी ज़िन्दगी पे कि पत्थर नहीं हूँ मैं

क्यों गर्दिश-ए-मुदाम से घबरा न जाये दिल?
इन्सान हूँ, प्याला-ओ-साग़र नहीं हूँ मैं

या रब ज़माना मुझ को मिटाता है किस लिये
लौह-ए-जहां पे हर्फ़-ए-मुक़र्रर नहीं हूँ मैं

हद चाहिये सज़ा में उक़ूबत के वास्ते
आख़िर गुनाहगार हूँ, काफ़िर नहीं हूँ मैं

(दायम - हमेशा, गर्दिश-ए-मुदाम - हमेशा की गर्दिश, लौह-ए-जहां - संसार का कागज़, हर्फ़-ए-मुक़र्रर - बार बार लिखी गयी इबारत, उक़ूबत - तकलीफ) 

Monday, June 25, 2012

लौह-ए-जहां पे हर्फ़-ए-मुक़र्रर नहीं हूँ मैं


मरहूम मेहदी हसन खान की गई मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़ल -

 

दायम पड़ा हुआ तेरे दर पर नहीं हूँ मैं
ख़ाक ऐसी ज़िन्दगी पे कि पत्थर नहीं हूँ मैं

क्यों गर्दिश-ए-मुदाम से घबरा न जाये दिल?
इन्सान हूँ, प्याला-ओ-साग़र नहीं हूँ मैं

या रब! ज़माना मुझ को मिटाता है किस लिये
लौह-ए-जहां पे हर्फ़-ए-मुक़र्रर नहीं हूँ मैं

हद चाहिये सज़ा में उक़ूबत के वास्ते
आख़िर गुनाहगार हूँ, काफ़िर नहीं हूँ मैं

(दायम - हमेशा, गर्दिश-ए-मुदाम - हमेशा की गर्दिश, लौह-ए-जहां - संसार का कागज़, हर्फ़-ए-मुक़र्रर - बार बार लिखी गयी इबारत, उक़ूबत - तकलीफ) 

Saturday, June 23, 2012

वो मेरी भूख को भी अब कुपोषण ही बताता है

ख्यात जनकवि बल्ली सिंह चीमा की एक नई गज़ल पेश है. इत्तेफाक है कि बल्ली भाई अभी हल्द्वानी में मेरे घर पर विराजमान हैं और  ये गज़ल उन्होंने बाकायदा डिक्टेट कर के लिखाई है. 


पराई कोठियों में रोज संगमरमर लगाता है
किसी फुटपाथ पर सोता है लेकिन घर बनाता है

लुटेरी इस व्यवस्था का मुझे पुरजा बताता है
वो संसाधन गिनाता है तो मुझको भी गिनाता है

बदलना चाहता है इस तरह शब्दों व अर्थों को
वो मेरी भूख को भी अब कुपोषण ही बताता है

यहाँ पर सब बराबर हैं ये दावा करने वाला ही
उसे ऊपर उठाता है मुझे नीचे गिराता है

मेरे आज़ाद भारत में जिसे स्कूल जाना था
वो बच्चा रेल के डिब्बों में अब झाड़ू लगाता है

तेरे नायक तो नायक बन नहीं सकते कभी 'बल्ली'
कोई रिक्शा चलाता है तो कोई हल चलाता है



पुनश्च - इस गज़ल का अंग्रेज़ी अनुवाद  हाल के दिनों में अखिल भारत शिक्षा अधिकार मंच के एक अंक के लिए किया गया है. उसे भी यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ. अनुवाद निशा थपलियाल, विकास गुप्ता और यमल गुप्ता का है.

Lays marble in strangers houses
Makes houses but sleeps on the footpath
He counts me as a tool of this predatory system;
He counts me only when he counts the resource.
He who claims that everyone is equal;
Pulls me down and elevates others.
He plays with words and meanings;
My hunger is only malnutrition to him now.
In my free India who was supposed to go to school;
That child now sweeps the floor in trains.
Your heroes will never be called heroes, Balli!
Some pull rickshaws and some heave ploughs.

Tuesday, May 8, 2012

इतने अच्छे क्यों लगते हो


बरसों पुरानी किसी एक याद को ताज़ा करते हुए गुलाम अली की गाई इस गज़ल को सुना गया आज.

 


ये भी याद आया कि गुलाम अली की बनाई इसी धुन पर दिलराज कौर ने भी मोहसिन नकवी की इस गज़ल को गाया है.

 

आप के साथ बाँट रहा हूँ.

इतनी मुद्दत बाद मिले हो
किन सोचों में गुम रहते हो


तेज हवा ने मुझ से पूछा
रेत पे क्या लिखते रहते हो


हमसे न पूछो हिज्र के किस्से
अपनी कहो अब तुम कैसे हो


कौन सी बात है तुम है ऐसी
इतने अच्छे क्यों लगते हो