(पिछली किस्त से जारी)
गणेश हलोई: पेन्ट करने की इच्छा सिद्धान्ततः दो कारकों पर निर्भर करती है: संवेदना और बुद्धि. जब संवेदना बुद्धि से आगे निकल जाती है, हम आखिरकार भटक जाते हैं. बुद्धि है जो मन पर काबू किये रहती है. लेकिन दोनों कारकों के बीच एक सन्तुलन ज़रूरी होता है. अगर इनमें से किसी एक की अधिकता हो जाती है तो दूसरा अरुचिकर हो जाता है. हम अपनी बुद्धि से सोचते हैं और हम काम करते हैं जिसे हमारी संवेदना पोषित करती हैं. क्या होगा यदि संवेदनाएं न हों? जीवन बिल्कुल बेहिस हो जाएगा.
पेन्टिंग तभी पूरी होती है जब बुद्धि और संवेदना के बीच एक सन्तुलन स्थापित होता है. संवेदना पेन्टिंग में अनुभूति की सघनता को काबू में रखती है जबकि बुद्धि उसे एक संरचना प्रदान करती है.
... हां परिकल्पना ... कॉन्सेप्चुअलाइज़ेशन ... लेकिन सर, क्या आपको नहीं लगता कि जब हम आज की भारतीय चित्रकला ... समकालीन भारतीय चित्रकला के बारे में बात करते हैं ... तो किसी भी और चीज़ के बनिस्बत आज कॉन्सेप्चुअलाइज़ेशन को तरजीह दी जाती है?
गणेश हलोई: हां ... और यह भी इस कारण है कि उन सब की उत्पत्ति बुद्धि से होती है. जब मैं एक डिज़ाइन बनाता हूं, हां उसके पीछे कोई तर्क नहीं होता पर जब तक उसके भीतर जीवन का स्पर्श नहीं होगा, वह असल मायनों में पेन्टिंग नहीं बन सकता. जीवन का वह स्पर्श ... संवेदना का स्पर्श ही पेन्टिंग को सार्वभौमिक बनाता है ... देखो ... एक पेन्टिंग ने क्या करना चाहिए? उसे हर किसी के पास पहुंचना चाहिए. और वह हर किसी तक कैसे पहुंच सकती है जबकि हर कोई एक दूसरे से भिन्न किस्म का व्यक्तित्व होता है ... वह सार्वभौमिक कैसे बनेगी? हमें यह जानने की ज़रूरत है कि अन्तर बुद्धि का होता है. बौद्धिक रूप से हर व्यक्ति अलग होता है लेकिन ... यह सम्भव ही है कि हमें यह नज़र आए कि अन्यथा अलग किस्म के कई लोगों की एक जैसी संवेदनात्मक प्रतिक्रिया हो. क्योंकि वह किसी के भीतर पहुंचना है. अगर ऐसा नहीं होता तो केवल कुछ ही पेन्टिंग्स देखे जाने लायक नहीं होतीं ... हम सिर्फ़ उन्हीं पेन्टिंग्स की तरफ़ आकर्षित होते हैं जिनके भीतर सत्य होता है ... ईमानदारी होती है.
(समाप्त)
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Saturday, July 9, 2011
Friday, July 8, 2011
गणेश हलोई से साक्षात्कार - 3
(पिछली किस्त से जारी)
क्षितिज ...
गणेश हलोई: आधार.देखो, जब एक आदमी खड़ा होता है वह एक लम्बवत होता है, जब वह मर जाता है वह एक ऊर्ध्वाधर है ... इस बारे मैं मैंने बहुत विचार किया. कि यह प्रक्रिया असल में क्या है पर मुझे अहसास हुआ कि हम इस से आगे नहीं जा सकते. अब इस पिरामिड के आकार को देखो - यह किसी पहाड़ जैसा है. प्रकृति में ऊंचाई वाली हरेक चीज़ ऐसी ही नज़र आती है. यहां तक कि जब आप दाल या चावल जैसी चीज़ों को उड़ेलते हो - या किसी भी चीज़ को - वह गुरुत्व के कारण ऐसा ही पिरामिड का आकार ग्रहण कर लेगी. उसके बाद गोले की बारी आती है. एक बुलबुला गोल होता है, पानी की एक बूंद वृत्त के आकार में गिरती है ... प्रकृति में एक और मूलभूत फ़ॉर्म होती है और वह है एक लयबद्ध रेखा. पानी की सतह के ऊपर की लहर एक लयबद्ध रेखा जैसी होती है. जब पेड़ों से होकर हवा गुज़रती है तो एक लयबद्ध रेखा बनती है. जब रेगिस्तान में रेत के ढूहों में हरकत होती है तो एक लयबद्ध रेखा का निर्माण होता है. जब आप इस तरह की रेखा बच्चों को दिखाते हैं वे तुरन्त कह उठते हैं - 'पानी'. ड्रॉइंग करते समय बच्चे बहुत सारी मूलभूत संरचनाओं का इस्तेमाल करते हैं. जब वे चेहरा बनाते हैं तो वह सामने से दिखाई देने वाला होता है. प्रोफ़ाइल में चेहरा वे बहुत कम बनाते हैं. आप दो बिन्दु बनाइए और एक और बिन्दु उनके नीचे ठीक बीचोबीच बना दीजिए - एक चेहरा बन जाता है. चेहरे के गोले से बाहर निकलने वाली दो ऊर्ध्वाधर रेखाएं हाथ बन जाते हैं. नीचे की तर्फ़ खींची गई एक लम्बवत रेखा से शरीर बन जाता है. अपेक्षाकृत छोटे बच्चे बस इतना ही ड्रॉ करते हैं. फिर उन्हें भान होता है कि मानव देह में कमर भी होती है और टांगें भी सो वे इस रेखा को बांटना शुरू करते हैं. धीरे धीरे पूरा चित्र विकसित होने लगता है. बच्चे मूलभूत संरचनाओं को हिस्सों की तरह देखते हैं. वे इन टुकड़ों को इकठ्ठा कर के अपनी पसन्दीदा रचना बनाना चाहते हैं. तब वे बड़े होने लगते हैं और आठ-नौ की आयु तक पहुच जाते हैं. यह एक बहुत ख़राब उम्र होती है. इस आयु में आकर उन्हें यह मालूम पड़ता है और वे इस से निराश हो जाते हैं कि उनकी बनाई गाय गाय जैसी नहीं होती, न ही आदमी आदमी जैसा. बड़े होने के साथ साथ वे वास्तविकता के करीब आने लगते हैं. तो वे चाहते हैं कि चीज़ों को वैसे ही पेन्ट कर पाएं जैसी वे हैं. वे चाहते हैं कि उनका बनाया सब कुछ प्राकृतिक दिखने लगे. वे मूलभूत संरचनाओं की अपनी समझ खोने लगते हैं. मैं इन्हीं मूलभूत संरचनाओं की बात कर रहा हूं. ऊर्ध्वाधर, लम्बवत, विकर्ण, वृत्त ... वे सब हमारे चारों तरफ़ हैं, हैं न? वे मानव आकृति के भीतर होती हैं ... जो हमें आसपास नहीं दिखाई देता वह है वर्ग का आकार. या आयत का आकार. हां हमें ये आकार कभी कभी पत्थरों की संरचना में दिखाई दे सकते हैं पर वह बहुत दुर्लभ होता है. यहां हमें एक और आयाम पर बात करनी होगी. हमारी गरदन की गति - यह एक खास तरह से गति कर सकती है, एक खास धुरी के गिर्द. चूंकि धरती ऊर्ध्वाधर है. सो चूंकि हमें अपने आसपास एक खास तरह से देखने की आदत पड़ चुकी होती है, किसी स्काइस्क्रेपर को देखने में असल में बहुत दिक्कत होती है. हमें आयत और वर्ग प्रकृति में नहीं दिखाई देते पर हम उन्हें देखते हैं - एक किताब में जिसे आदमी ने बनाया है.
गुफाओं में रह रहे आदिम मनुष्य ने रेखाएं खींचना शुरू किया. जाहिर है उसने शिकार के दृश्य बनाए. लेकिन उन्होंने उनके चारों तर्फ़ कोई फ़्रेम नहीं लगाया. फ़्रेम बनाने का विचार उन्हें घर बनाते समय आया. क्या आपने कभी किसी आदिम पेन्टिंग को देखा है जिसमें फ़्रेम हो? एक बार आदिम कला के विषय पर एक सेमिनार था. उसमें यहां तक कि इतिहासकारों ने भी इस बात की तरफ़ इशारा किया कि फ़्रेम का विचार तो आदमी के सभ्य होने के बाद अस्तित्व में आया था. उसने मेज़ें बनाईं, किताबें बनाईं ...
सिन्धु घाटी सभ्यता की मोहरें वर्गाकार हैं.
गणेश हलोई: हां, तब तक मकान बनाए जा चुके थे. नियोजन का सिद्धान्त उस समय तक समाज में आ चुका था. तब तक आदमी ने वर्ग का इस्तेमाल इस हिसाब से करना शुरू कर दिया था जैसे वह कोई मूलभूत संरचना हो. लेकिन वह मूलभूत संरचना नहीं है. हम उसका प्रयोग कुछ बनाने के लिए कर रहे हैं और जबरन अपने आप को ऐसी चीज़ का इस्तेमाल करने को विवश कर रहे है जो प्रकृति में मूलभूत नहीं है. वह थोपा हुआ है, नैसर्गिक नहीं.
थोपे हुए और नैसर्गिक के बीच क्या अन्तर है?
थोपे हुए का मतलब उस स्थिति से है जब लोग अपने आप से कहते हैं कि उन्हें किसी काम को सिर्फ़ किए जाने के वास्ते करना है. वे कहते हैं कि बस ऐसा करना ही है. अगर उसने आंख को एक खास तरह से बनाया है तो मैं भी उसे वैसे ही बनाऊंगा - उस से फ़र्क, उस से बेहतर. वह रेडिकल किस्म के बदलावों के बारे में नहीं सोचता. सो वह अलग तरीके से एक आंख बनाता है जो आंख की जगह पर हॊ होती है. सो एक तरफ़ तो वह अलग होने की कोशिश करता है वहीं दूसरी तरफ़ वास्तविकता का अनुसरण करता है. आप उन आकृतियों को दिखिए जिन्हें आजकल जोगेन चौधरी बनाते हैं. वे उन्हें एक खास उद्देश्य से बनाते हैं. लेकिन ऐसे भी चित्रकार हैं जो एक खास परम्परा का अनुसरण करने की नीयत से उनकी नकल करते हैं. वे सोचते हैं कि ऐसा करना रचनात्मक होता है.
उदाहरण के लिए आप गुलाब की एक झाड़ी और चमेली के पौधे को लीजिए. दोनों एक ही मिट्टी से उगते हैं. लेकिन वे एक दूसरे से इतने फ़र्क होते हैं - क्योंकि वे अलग अलग प्रक्रियाओं से गुज़रते हैं. ये अलग अलग प्रक्रियाएं हैं जिनके कारण उनकी अलग-अलग संरचनाएं बनी हैं. यह प्रकृति है. सब कुछ ऐसे ही होना होता है - नैसर्गिक. उसे अपने आप से होना होता है. संरचनाओं ने अपना आकार ग्रहण करना होता है और संरचना के भीतर एक आधारभूत विकास विद्यमान होता है.
ठीक है, अब ज़रा इस वर्ग को देखो. अब मैं इसके भीतर यह लम्बवत रेखा खींचता हूं और ऊपर दो विकर्ण और नीचे यह ऊर्ध्वाधर रेखा. फिर मैं ऊपर के दाएं कोने पर यह वृत्त बनाता हूं और नीचे एक लहरदार लयबद्ध रेखा. और यहां यह पिरामिड ... यह बस स्पेस का विभाजन भर है. अगर मैं किसी से पूछूं कि यह क्या है तो जवाब मिलेगा कि यह स्पष्टतः एक लैन्डस्केप है. यह पेड़, यह पानी, यह पहाड़ और यह सूरज ... कोई भी सामान्य व्यक्ति ऐसी ही प्रतिक्रिया देगा. और यह सही भी है. क्योंकि यह सब आया कहां से है? स्वयं प्रकृति से. यह सब प्रकृति के भीतर था और वहीं से आया है. और हमारे मस्तिष्क में कुछ विशेष सिद्धान्त होते हैं जो हमें मूलभूत संरचनाओं को एक विशेष तरीके से दिखाते हैं. हम कभी भी इस लम्बवत रेखा को इस तरह हवा में तैरता हुआ नहीं बनाएंगे; हम इसे जमीन को छूता हुआ बनाएंगे. क्योंकि हमें हर समय गुरुत्व का भान रहता है. हम इसे किसी सतह पर धंसा हुआ दिखाएंगे. वह एक आधार का निर्माण करेगा. अगर हम इसे तैरता हुआ दिखाएंगे तो सामान्य व्यक्ति को वह किसी तिलिस्म जैसा दिखाई देगा. मानॊ किसी ने इसे ऊपर से नीचे गिरने दिया और वह गिरी ही नहीं - बस टंगी रही. लोग हैरत में पड़ जाते हैं. लेकिन अगर मैं इसे इस तरह बनाऊं - सतह को छूते हुए तो यह अच्छा दिखने लगेगा, अच्छा महसूस होगा. आपके विचार से ऐसा क्यों होता होगा?
क्योंकि हम इसे धरती पर अपने चारों तरफ़ देखते हैं. क्योंकि यह प्रकृति में पाया जाता है. चूंकि यह उस वास्तविकता से मेल खाता है जिसे हम जानते हैं, हम इसे स्वीकार कर लेते हैं. और यह वास्तविकता होती है जिसे हम छोड़ना नहीं चाहते. ठीक है, अब इसे देखो. यह रहा आदाह. अब बजाए ऐसे ही ऊपर को जा रही किसी रेखा को बनाने के बजाय मैं इसे तोड़ देता हूं. मान लिया मैं इसे यहां से तोड़ दूं और फिर यह आगे चलती रहे, तो कुछ फ़र्क पड़ेगा? पड़ेगा, है न? अब आप मुझे बताइए ये पहली, दूसरी, तीसरी में से कौन सी ड्रॉइंग आपको अच्छी लगी? किसी ऐसे व्यक्ति से पूछिए जो साधारण काम करता हो. वे इस वाली को छांटेंगे क्योंकि यह वास्तविकता के सबसे करीब है. यह प्रकृति के साथ एक सामंजस्य बनाए है. ये वाली जिसके बीच में एक आकृति है हमें इस लिए अपील नहीं करती क्योंकि हमें प्रकृति में किसी भी चीज़ को केन्द्र में देखने की आदत नहीं है. तो हम केन्द्र में किस चीज़ को रखेंगे? देवी-देवताओं को. अब अगर मैं इस रेखा को यहां बना दूं तो यह बेहतर दिखती है न? अगर मैं इस हिस्से को खाली छोड़ दूं तो यह अच्छा नहीं लगेगा. अगर मैं इसे खींच कर और नीचे ले आऊं तो यह और भी बेहतर लगने लगेगी. क्यों? क्योंकि धरती के साथ एक सम्पर्क बनाया जा रहा है. यह धंसा हुआ लगता है सो हम इसे स्वीकार कर लेते हैं. क्या इन्टीरियर डिज़ाइनिंग करते वक्त आप इस बात का खयाल नहीं रखते?हमारे सारे चित्रों में स्पेस का यह मूलभूत विद्यमान रहता है. कुछ मामलों में यह अपने आप आया है, विशुद्ध अन्तर्बोध के कारण. अगर हामरे द्वारा इस्तेमाल की गई आकृतियों के बीच कोई लय नहीं होगी तो देखने वाला अटपटा महसूस करेगा. इसलिए वर्गों का प्रयोग करने में जोख़िम होता है. उनसे काम नहीं चलता. वे गतिहीन दिखने लगते हैं. वृत्त तब भी ठीकठाक होते हैं. और हां जैसे ही आप वृत्त के नीचे एक वर्ग को रखते हैं, वह भी स्वीकार्य हो जाता है. क्योंकि हम उसे किसी वाहन के पहिये और गतिमानता से जोड़कर देखते हैं. अन्ततः सब कुछ प्रकृति से आता है. प्रकृति में क्या नहीं होता? छोटा, बड़ा, सूक्ष्म, विशाल, पतला, मोटा, बाहर निकला हुआ, भीतर धंसा हुआ; और मुलायम और खुरदरा .... पेन्टिंग के भीतर यह टैक्सचर बहुत महवपूर्ण भूमिका निभाता है. दबाव भी बेहद ज़रूरू कारक होता है. जहां भी संवेदना होगी वहां दबाव होगा. मैं आपको एक साधारण सी मिसाल देता हूं. हमारे द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली हर वस्तु के साथ दबाव जुड़ा होता है. अब इस पेन्सिल को देखिए. जब तक मैं दबाव नहीं डालूंगा, सीसे की कोई भी छाप नहीं पड़ेगी. जब तक मैं दबाव डालकर इसे कागज़ पर घिसूंगा नहीं, कागज़ पर कोई छवि नहीं बनेगी. अब जो दाग बनेगा उसके भीतर ही वह टैक्सचर होता है जिसकी हम अभी बात कर रहे थे. आजकल कृत्रिम माध्यमों की मदद से टैक्सचर बनाए जा रहे हैं - बाह्य माध्यमों की मदद से चीज़ें चिपका कर. अगर हम अपने कार्य के सामंजस्य की मदद से ध्यानपूर्वक देखें तो पाएंगे कि टैक्सचर वहां पहले से मौजूद रहता है. वह अपने आप आ जाता है. आपको अपने काम में टैक्सचर पैदा करने के लिए कोई गुप्त तकनीक का इस्तेमाल करने की आवश्यकता नहीं है. आप मुझे बताइए, जब आप तैलरंगों के साथ काम करते हैं तो क्या उनमें टैक्सचर नहीं होता?
उम्मीद एक महत्वपूर्ण तत्व है. उम्मीद और इच्छा. जब तक तीव्र इच्छा नहीं होगी, कुछ पा सकने का संघर्ष अस्तित्व में आ ही नहीं सकता. तब एक शक्ति होगी, आपकी ज़िन्दगी के भीतर एक गतिशीलता. लेकिन उसके लिए एक विशेष तरह की इच्छा चाहिए- सकारात्मक इच्छा.
(जारी, अगली किस्त में समाप्य.)
क्षितिज ...
गणेश हलोई: आधार.देखो, जब एक आदमी खड़ा होता है वह एक लम्बवत होता है, जब वह मर जाता है वह एक ऊर्ध्वाधर है ... इस बारे मैं मैंने बहुत विचार किया. कि यह प्रक्रिया असल में क्या है पर मुझे अहसास हुआ कि हम इस से आगे नहीं जा सकते. अब इस पिरामिड के आकार को देखो - यह किसी पहाड़ जैसा है. प्रकृति में ऊंचाई वाली हरेक चीज़ ऐसी ही नज़र आती है. यहां तक कि जब आप दाल या चावल जैसी चीज़ों को उड़ेलते हो - या किसी भी चीज़ को - वह गुरुत्व के कारण ऐसा ही पिरामिड का आकार ग्रहण कर लेगी. उसके बाद गोले की बारी आती है. एक बुलबुला गोल होता है, पानी की एक बूंद वृत्त के आकार में गिरती है ... प्रकृति में एक और मूलभूत फ़ॉर्म होती है और वह है एक लयबद्ध रेखा. पानी की सतह के ऊपर की लहर एक लयबद्ध रेखा जैसी होती है. जब पेड़ों से होकर हवा गुज़रती है तो एक लयबद्ध रेखा बनती है. जब रेगिस्तान में रेत के ढूहों में हरकत होती है तो एक लयबद्ध रेखा का निर्माण होता है. जब आप इस तरह की रेखा बच्चों को दिखाते हैं वे तुरन्त कह उठते हैं - 'पानी'. ड्रॉइंग करते समय बच्चे बहुत सारी मूलभूत संरचनाओं का इस्तेमाल करते हैं. जब वे चेहरा बनाते हैं तो वह सामने से दिखाई देने वाला होता है. प्रोफ़ाइल में चेहरा वे बहुत कम बनाते हैं. आप दो बिन्दु बनाइए और एक और बिन्दु उनके नीचे ठीक बीचोबीच बना दीजिए - एक चेहरा बन जाता है. चेहरे के गोले से बाहर निकलने वाली दो ऊर्ध्वाधर रेखाएं हाथ बन जाते हैं. नीचे की तर्फ़ खींची गई एक लम्बवत रेखा से शरीर बन जाता है. अपेक्षाकृत छोटे बच्चे बस इतना ही ड्रॉ करते हैं. फिर उन्हें भान होता है कि मानव देह में कमर भी होती है और टांगें भी सो वे इस रेखा को बांटना शुरू करते हैं. धीरे धीरे पूरा चित्र विकसित होने लगता है. बच्चे मूलभूत संरचनाओं को हिस्सों की तरह देखते हैं. वे इन टुकड़ों को इकठ्ठा कर के अपनी पसन्दीदा रचना बनाना चाहते हैं. तब वे बड़े होने लगते हैं और आठ-नौ की आयु तक पहुच जाते हैं. यह एक बहुत ख़राब उम्र होती है. इस आयु में आकर उन्हें यह मालूम पड़ता है और वे इस से निराश हो जाते हैं कि उनकी बनाई गाय गाय जैसी नहीं होती, न ही आदमी आदमी जैसा. बड़े होने के साथ साथ वे वास्तविकता के करीब आने लगते हैं. तो वे चाहते हैं कि चीज़ों को वैसे ही पेन्ट कर पाएं जैसी वे हैं. वे चाहते हैं कि उनका बनाया सब कुछ प्राकृतिक दिखने लगे. वे मूलभूत संरचनाओं की अपनी समझ खोने लगते हैं. मैं इन्हीं मूलभूत संरचनाओं की बात कर रहा हूं. ऊर्ध्वाधर, लम्बवत, विकर्ण, वृत्त ... वे सब हमारे चारों तरफ़ हैं, हैं न? वे मानव आकृति के भीतर होती हैं ... जो हमें आसपास नहीं दिखाई देता वह है वर्ग का आकार. या आयत का आकार. हां हमें ये आकार कभी कभी पत्थरों की संरचना में दिखाई दे सकते हैं पर वह बहुत दुर्लभ होता है. यहां हमें एक और आयाम पर बात करनी होगी. हमारी गरदन की गति - यह एक खास तरह से गति कर सकती है, एक खास धुरी के गिर्द. चूंकि धरती ऊर्ध्वाधर है. सो चूंकि हमें अपने आसपास एक खास तरह से देखने की आदत पड़ चुकी होती है, किसी स्काइस्क्रेपर को देखने में असल में बहुत दिक्कत होती है. हमें आयत और वर्ग प्रकृति में नहीं दिखाई देते पर हम उन्हें देखते हैं - एक किताब में जिसे आदमी ने बनाया है.
गुफाओं में रह रहे आदिम मनुष्य ने रेखाएं खींचना शुरू किया. जाहिर है उसने शिकार के दृश्य बनाए. लेकिन उन्होंने उनके चारों तर्फ़ कोई फ़्रेम नहीं लगाया. फ़्रेम बनाने का विचार उन्हें घर बनाते समय आया. क्या आपने कभी किसी आदिम पेन्टिंग को देखा है जिसमें फ़्रेम हो? एक बार आदिम कला के विषय पर एक सेमिनार था. उसमें यहां तक कि इतिहासकारों ने भी इस बात की तरफ़ इशारा किया कि फ़्रेम का विचार तो आदमी के सभ्य होने के बाद अस्तित्व में आया था. उसने मेज़ें बनाईं, किताबें बनाईं ...
सिन्धु घाटी सभ्यता की मोहरें वर्गाकार हैं.
गणेश हलोई: हां, तब तक मकान बनाए जा चुके थे. नियोजन का सिद्धान्त उस समय तक समाज में आ चुका था. तब तक आदमी ने वर्ग का इस्तेमाल इस हिसाब से करना शुरू कर दिया था जैसे वह कोई मूलभूत संरचना हो. लेकिन वह मूलभूत संरचना नहीं है. हम उसका प्रयोग कुछ बनाने के लिए कर रहे हैं और जबरन अपने आप को ऐसी चीज़ का इस्तेमाल करने को विवश कर रहे है जो प्रकृति में मूलभूत नहीं है. वह थोपा हुआ है, नैसर्गिक नहीं.
थोपे हुए और नैसर्गिक के बीच क्या अन्तर है?
थोपे हुए का मतलब उस स्थिति से है जब लोग अपने आप से कहते हैं कि उन्हें किसी काम को सिर्फ़ किए जाने के वास्ते करना है. वे कहते हैं कि बस ऐसा करना ही है. अगर उसने आंख को एक खास तरह से बनाया है तो मैं भी उसे वैसे ही बनाऊंगा - उस से फ़र्क, उस से बेहतर. वह रेडिकल किस्म के बदलावों के बारे में नहीं सोचता. सो वह अलग तरीके से एक आंख बनाता है जो आंख की जगह पर हॊ होती है. सो एक तरफ़ तो वह अलग होने की कोशिश करता है वहीं दूसरी तरफ़ वास्तविकता का अनुसरण करता है. आप उन आकृतियों को दिखिए जिन्हें आजकल जोगेन चौधरी बनाते हैं. वे उन्हें एक खास उद्देश्य से बनाते हैं. लेकिन ऐसे भी चित्रकार हैं जो एक खास परम्परा का अनुसरण करने की नीयत से उनकी नकल करते हैं. वे सोचते हैं कि ऐसा करना रचनात्मक होता है.
उदाहरण के लिए आप गुलाब की एक झाड़ी और चमेली के पौधे को लीजिए. दोनों एक ही मिट्टी से उगते हैं. लेकिन वे एक दूसरे से इतने फ़र्क होते हैं - क्योंकि वे अलग अलग प्रक्रियाओं से गुज़रते हैं. ये अलग अलग प्रक्रियाएं हैं जिनके कारण उनकी अलग-अलग संरचनाएं बनी हैं. यह प्रकृति है. सब कुछ ऐसे ही होना होता है - नैसर्गिक. उसे अपने आप से होना होता है. संरचनाओं ने अपना आकार ग्रहण करना होता है और संरचना के भीतर एक आधारभूत विकास विद्यमान होता है.
ठीक है, अब ज़रा इस वर्ग को देखो. अब मैं इसके भीतर यह लम्बवत रेखा खींचता हूं और ऊपर दो विकर्ण और नीचे यह ऊर्ध्वाधर रेखा. फिर मैं ऊपर के दाएं कोने पर यह वृत्त बनाता हूं और नीचे एक लहरदार लयबद्ध रेखा. और यहां यह पिरामिड ... यह बस स्पेस का विभाजन भर है. अगर मैं किसी से पूछूं कि यह क्या है तो जवाब मिलेगा कि यह स्पष्टतः एक लैन्डस्केप है. यह पेड़, यह पानी, यह पहाड़ और यह सूरज ... कोई भी सामान्य व्यक्ति ऐसी ही प्रतिक्रिया देगा. और यह सही भी है. क्योंकि यह सब आया कहां से है? स्वयं प्रकृति से. यह सब प्रकृति के भीतर था और वहीं से आया है. और हमारे मस्तिष्क में कुछ विशेष सिद्धान्त होते हैं जो हमें मूलभूत संरचनाओं को एक विशेष तरीके से दिखाते हैं. हम कभी भी इस लम्बवत रेखा को इस तरह हवा में तैरता हुआ नहीं बनाएंगे; हम इसे जमीन को छूता हुआ बनाएंगे. क्योंकि हमें हर समय गुरुत्व का भान रहता है. हम इसे किसी सतह पर धंसा हुआ दिखाएंगे. वह एक आधार का निर्माण करेगा. अगर हम इसे तैरता हुआ दिखाएंगे तो सामान्य व्यक्ति को वह किसी तिलिस्म जैसा दिखाई देगा. मानॊ किसी ने इसे ऊपर से नीचे गिरने दिया और वह गिरी ही नहीं - बस टंगी रही. लोग हैरत में पड़ जाते हैं. लेकिन अगर मैं इसे इस तरह बनाऊं - सतह को छूते हुए तो यह अच्छा दिखने लगेगा, अच्छा महसूस होगा. आपके विचार से ऐसा क्यों होता होगा?
क्योंकि हम इसे धरती पर अपने चारों तरफ़ देखते हैं. क्योंकि यह प्रकृति में पाया जाता है. चूंकि यह उस वास्तविकता से मेल खाता है जिसे हम जानते हैं, हम इसे स्वीकार कर लेते हैं. और यह वास्तविकता होती है जिसे हम छोड़ना नहीं चाहते. ठीक है, अब इसे देखो. यह रहा आदाह. अब बजाए ऐसे ही ऊपर को जा रही किसी रेखा को बनाने के बजाय मैं इसे तोड़ देता हूं. मान लिया मैं इसे यहां से तोड़ दूं और फिर यह आगे चलती रहे, तो कुछ फ़र्क पड़ेगा? पड़ेगा, है न? अब आप मुझे बताइए ये पहली, दूसरी, तीसरी में से कौन सी ड्रॉइंग आपको अच्छी लगी? किसी ऐसे व्यक्ति से पूछिए जो साधारण काम करता हो. वे इस वाली को छांटेंगे क्योंकि यह वास्तविकता के सबसे करीब है. यह प्रकृति के साथ एक सामंजस्य बनाए है. ये वाली जिसके बीच में एक आकृति है हमें इस लिए अपील नहीं करती क्योंकि हमें प्रकृति में किसी भी चीज़ को केन्द्र में देखने की आदत नहीं है. तो हम केन्द्र में किस चीज़ को रखेंगे? देवी-देवताओं को. अब अगर मैं इस रेखा को यहां बना दूं तो यह बेहतर दिखती है न? अगर मैं इस हिस्से को खाली छोड़ दूं तो यह अच्छा नहीं लगेगा. अगर मैं इसे खींच कर और नीचे ले आऊं तो यह और भी बेहतर लगने लगेगी. क्यों? क्योंकि धरती के साथ एक सम्पर्क बनाया जा रहा है. यह धंसा हुआ लगता है सो हम इसे स्वीकार कर लेते हैं. क्या इन्टीरियर डिज़ाइनिंग करते वक्त आप इस बात का खयाल नहीं रखते?हमारे सारे चित्रों में स्पेस का यह मूलभूत विद्यमान रहता है. कुछ मामलों में यह अपने आप आया है, विशुद्ध अन्तर्बोध के कारण. अगर हामरे द्वारा इस्तेमाल की गई आकृतियों के बीच कोई लय नहीं होगी तो देखने वाला अटपटा महसूस करेगा. इसलिए वर्गों का प्रयोग करने में जोख़िम होता है. उनसे काम नहीं चलता. वे गतिहीन दिखने लगते हैं. वृत्त तब भी ठीकठाक होते हैं. और हां जैसे ही आप वृत्त के नीचे एक वर्ग को रखते हैं, वह भी स्वीकार्य हो जाता है. क्योंकि हम उसे किसी वाहन के पहिये और गतिमानता से जोड़कर देखते हैं. अन्ततः सब कुछ प्रकृति से आता है. प्रकृति में क्या नहीं होता? छोटा, बड़ा, सूक्ष्म, विशाल, पतला, मोटा, बाहर निकला हुआ, भीतर धंसा हुआ; और मुलायम और खुरदरा .... पेन्टिंग के भीतर यह टैक्सचर बहुत महवपूर्ण भूमिका निभाता है. दबाव भी बेहद ज़रूरू कारक होता है. जहां भी संवेदना होगी वहां दबाव होगा. मैं आपको एक साधारण सी मिसाल देता हूं. हमारे द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली हर वस्तु के साथ दबाव जुड़ा होता है. अब इस पेन्सिल को देखिए. जब तक मैं दबाव नहीं डालूंगा, सीसे की कोई भी छाप नहीं पड़ेगी. जब तक मैं दबाव डालकर इसे कागज़ पर घिसूंगा नहीं, कागज़ पर कोई छवि नहीं बनेगी. अब जो दाग बनेगा उसके भीतर ही वह टैक्सचर होता है जिसकी हम अभी बात कर रहे थे. आजकल कृत्रिम माध्यमों की मदद से टैक्सचर बनाए जा रहे हैं - बाह्य माध्यमों की मदद से चीज़ें चिपका कर. अगर हम अपने कार्य के सामंजस्य की मदद से ध्यानपूर्वक देखें तो पाएंगे कि टैक्सचर वहां पहले से मौजूद रहता है. वह अपने आप आ जाता है. आपको अपने काम में टैक्सचर पैदा करने के लिए कोई गुप्त तकनीक का इस्तेमाल करने की आवश्यकता नहीं है. आप मुझे बताइए, जब आप तैलरंगों के साथ काम करते हैं तो क्या उनमें टैक्सचर नहीं होता?
उम्मीद एक महत्वपूर्ण तत्व है. उम्मीद और इच्छा. जब तक तीव्र इच्छा नहीं होगी, कुछ पा सकने का संघर्ष अस्तित्व में आ ही नहीं सकता. तब एक शक्ति होगी, आपकी ज़िन्दगी के भीतर एक गतिशीलता. लेकिन उसके लिए एक विशेष तरह की इच्छा चाहिए- सकारात्मक इच्छा.
(जारी, अगली किस्त में समाप्य.)
Thursday, July 7, 2011
गणेश हलोई से साक्षात्कार - 2
(पिछली किस्त से जारी)
गणेश हलोई: निश्चितता के कारण आप एक ही जगह पर अटक जाते हैं क्योंकि हर चीज़ बहुत तय और नियत हो जाती है. और अगर अनिश्चितता दुबारा न आए तो हम गतिहीन बन जाते हैं. निश्चितता से अनिश्चितता की यात्रा ही जीवन को आनन्ददायक बनाती है. तब पुनः निश्चितता अनिश्चितता की जगह ले लेती है क्योंकि आपने कुछ उत्तर खोज लिए होते हैं. और फिर वही प्रक्रिया शुरू हो जाती है. किसी चक्र की तरह. अगर ऐसा अनवरत न चलता रहे तो जीवन में गति कहां से आएगी?
यह प्रक्रिया आपकी पेन्टिंग्स में भी देखी जा सकती है.
गणेश हलोई: मेरे पुराने काम के कुछ तत्व मेरे बाद के काम में पाए जाते हैं पर वह किसी दोहराव की तरह नहीं.
पुनर्सन्धान ... उसी चीज़ का फिर से सन्धान करना.
गणेश हलोई: एक ही चीज़ को दस अलग अलग कोणों से देखा जा सकता है. अगर आप दिन के समय ऊपर की मंज़िल पर की मेरी खिड़की से बाहर देखेंगे तो आप पेड़ और परिन्दे देख सकते हैं. आप एक लैन्डस्केप देख सकते हैं. उस खिड़की से मैंने इतनी सारी पेन्टिंग्स बनाई हैं मगर कोई भी दो एक जैसी नहीं हैं. किसी ने आपके वास्ते नियम नहीं बनाए हुए हैं. आपको किसी ने कोई निश्चित चीज़ पेन्ट करने को नहीं कहा हुआ है. प्रकृति मौलिक होती है. उसकी नकल मत करो. तमाम महान कलाकारों ने प्रकृति के चित्र बनाए हैं पर उसकी नकल नहीं की है. दा विन्ची, माइकेलएन्जेलो को देखो. माइकेलएन्जेलो ने प्रकृति की नकल नहीं की. उसने उसकी अपनी व्याख्या को पेन्ट किया; उसने उसे वह अनुभूति दी जो उसके विषय ने उसके भीतर पैदा की थी. उसकी शैली यथार्थावादी हो सकती है पर आपने उसके काम की आत्मा को देखना चाहिए. उसकी पेन्टिंग्स फ़ोटोग्राफ़ों जैसी नहीं हैं. जब आप रेम्ब्रां का काम देखते हैं, आपको आश्चर्य नहीं होता? ऐसा नहीं है कि उनमें से कोई कलाकार अच्छा है या खराब है. उनका सारा काम प्रेरणास्पद होता है.
मैंने तय किया कि मैं पश्चिमी पेन्टिंग्स और भारतीय पेन्टिंग्स को अलहदा करके नहीं देखूंगा. पेन्टिंग पेन्टिंग होती है. बहुत सारे लोग कला में इस तरक का वर्गीकरण करते हैं. वे हर तरह के किए गए काम के लिए वर्ग बना देते हैं. लेकिन आप किसी चीज़ को पश्चिमी कला और किसी को भारतीय कला नहीं कह सकते. वह किसी एक खास व्यक्ति या खास समूह का प्रयास नहीं होता. यह समाज का एक सामूहिक प्रयास होता है. सारी चीज़ें एक सम्पूर्ण की तरह घटित हुई हैं. हम इस बात से इन्कार नहीं कर सकते. हमें इस सब को अभिव्यक्ति के तौर पर स्वीकार करना होगा. तो इस तरह मैंने पेन्टिंग्स में कोई फ़र्क़ नहीं किया.
आपने पेन्टिंग के आवश्यक तत्वों के विषय में बातें कीं. पेन्टिंग की अपनी भाषा होती है. हम अब तक इस दर्शन पर बात करते रहे हैं कि कला क्या है. अब आप के काम की तरफ़ दृष्टि डाली जाए. आपकी पेन्टिंग के बारे में बात की जाए. पेन्टिंग्स के आम तत्वों में रंग, फ़ॉर्म, पंक्ति, स्पेस वगैरह होते हैं. मैं जानना चाहता हूं कि अपने काम में आप इनके साथ कैसा बर्ताव करते हैं? मैं आपसे एक पेन्टर की तरह बात कर रहा हूं. एक पेन्टर अपनी पेन्टिंग में संधान के उद्देश्य से एक या दो तत्वों को छांट लेता है. मिसाल के तौर पर राम कुमार कहते हैं कि वे अपनी पेन्टिंग में रंग का सन्धान करते हैं. उन्हें रंगों का रहस्य बहुत पहेलीभरा लगता है. उनके कैनवस के कम्पोज़ीशन में यह सन्धान स्पष्ट नज़र आता है. इसी तरह से, आप किस तत्व की गहराइयों में उतरा करते हैं?
गणेश हलोई: हां, निश्चित ही रंग मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण है. लेकिन मैं स्पेस के बारे में सोचने से शुरू करता हूं. वह वर्ग या आयत जिसे मैं भरने वाला हूं. मैं पहले स्पेस को देखता हूं. कई बार उसे देखते हुए मुझे भान होता है कि वह स्पेस ही मुझे रास्ता दिखाता है. मैं जो भी बनाता हूं वह स्पेस के हिसाब से होता है. स्पेस के भीतर ही वह जीवन शक्ति होती है. मिसाल के तौर पर कह लीजिए कि ज़मीन का एक टुकड़ा है जिस पर आप खेती करना चाहते हैं. आप उस पर खेती कैसे करेंगे? आपको तय करना होगा कि खेती का तरीका क्या होगा और किस पैटर्न पर होगा. है न. आप को बताना पड़ेगा कि मैं इस जगह पर एक पेड़ लगाऊंगा. यहां एक घर बनाऊंगा. बगीचा यहां होगा. साधारण शब्दों में कहें तो आपको स्पेस का बंटवारा करना होगा. तो मेरे लिए स्पेस का बंटवारा सबसे पहले आता है. उसके बाद मैं सोचता हूं कि मैं क्या बनाना चाहता हूं. मेरी पेन्टिंग्स आमतौर पर प्रकृति से सम्बन्धित होती हैं. लेकिन मेरी पेन्टिंग देखकर कोई भी यह नहीं कह सकता कि वह एक आत्मपरक फ़िगरेटिव कम्पोज़ीशन है. वह कहेगा कि पेन्टिंग लैन्ड्स्केप जैसी दिखाई पड़ती है. लेकिन यह साम्य 'जैसा है' नहीं होता. कोई चीज़ एक सी ज़रूर है लेकिन यह फ़क़त बाहरी आकृति भर ही नहीं है. मेरा प्रयास रहता है कि मैं किसी उस चीज़ को पेन्ट करूं जिसे मैंने प्रकृति से पाया लेकिन जो प्रकृति जैसी नहीं है. मैं एक ऐसी ज़मीन पेन्ट करता हूं जो मेरी होती है.
यह मेरी ज़मीन है. मेरे नियम-कानूनों के साथ. मैंने इस ज़मीन की सर्जना की है. इसका प्रकृति के साथ कोई साम्य नहीं है. यह इस ज़मीन की रचना करने का संघर्ष होता है जो पेन्टिंग की प्रक्रिया को दिलचस्प बनाता है. विषय के साथ स्पेस के तनाव को बरकरार रखना होता है. पेन्टिंग का एक और महत्वपूर्ण आयाम होता है - लय. कोल्टे सर की पेन्टिंग्स को देखिए. उनमें लय है. लय के बिना कोई पेन्टिंग नहीं हो सकती. लय के बिना जीवन भी नहीं होता. जैसा कि मैंने कल कहा था कि जीवन का आनन्द तभी लिया जा सकता है जब उसमें लय हो. अगर लय नहीं है तो उसका कोई मतलब नहीं. संगीत में, चलने में, बोलने में लय होती है - इसी तरह पेन्टिंग में भी लय होनी चाहिए. तो मैं कैसे पहुंचा लय तक?
एक आदिम मानव के बारे में सोचो. जीवन एक संघर्ष था. मनुष्य वनों से डरते थे. इसी वजह से वे मकान नहीं बना पाते थे. वे गुफा जैसी किसी जगह पर शारण ले लिया करते थे. वे हमेशा किसी खौफ़ से भरे रहते थे. उन्हें प्रकृति के साथ एक सतत युद्ध लड़ना होता था. लेकिन भोजन के लिए उन्हें तब भी शिकार पर जाना होता था. वह एक उत्तेजनापूर्ण घटना होती थी. सो उन्होंने उसके चित्र बनाए. इन के कुछ हिस्से बहुत अच्छे हैं कुछ नहीं हैं. लेकिन हमें पूछना चाहिए कि इस से उन्हें क्या मिलता था. वह उन तक बड़े नैसर्गिक रूप से पहुंची. ढोने के लिए उनके पास और कोई बोझा नहीं था. ... उनके लिए वह अभिव्यक्ति का एक माध्यम था, अपने अनुभवों, भयॊं, चिन्ताओं और खुशियों को औरों तक पहुंचा पाने का तरीका. लेकिन उन्होंने ड्रॉइंग और चित्र बनाना कैसे सीखा?
प्रकृति से, इस ब्रह्मांड से. इस ब्रह्मांड के भीतर एक निश्शब्द गति हुआ करती है - एक निश्शब्द गति जिस पर हम अपने अचेतन के माध्यम से प्रतिक्रिया देते हैं. यह इसी वजह से था कि दिन का मिजाज़ देख कर आदमी यह बता पाने में सक्षम था कि उस दिन बारिश होगी या नहीं. आकाश, पेड़, सब कुछ अन्तर्बोध के माध्यम से जाने जाते थे. इन्स्टिंक्ट ही वह चीज़ है जो अब तकरीबन विलुप्त हो चुकी है. इस अन्तर्बोध के आधार पर ही हम अगले दिन की घटनाओं के बारे में भविष्यवाणी कर सकते थे. प्रकृति से हमने इसी अन्तर्बोध को पाया था. हमें प्रकृति ने क्या सिखलाया? इस ने हमें वह खामोश आवाज़ दी जिसके भीतर से लय जन्म लेती है. हम उसे सुन नहीं सकते क्योंकि वह खामोश है, लेकिन है. लय से ही चीज़ें अपना काम कर पाती हैं. लय से ही चीज़ों का एक पैटर्न बनता है. जब हमने इस लय के प्रति अपनी देह के माध्यम से प्रतिक्रिया की, तब हम ने नृत्य करना सीखा. आदिम मानव कैसे नृत्य करता था?
... जब हमने उस ध्वनि के प्रति अपनी आवाज़ के माध्यम से रेस्पॉन्ड किया, संगीत की सर्जना हुई. और जब हमने अचरज का अनुभव किया और उसे अभिव्यक्ति देनी चाही, वक चित्रकला के रूप में सामने आया. चित्र बनाना हमने अपने आप को सिखाया है. गायन, नृत्य, पेन्टिंग - सब कुछ हम तक पहुंचा है. हमारा अभिप्राय इसी बात से होता है जब हम कहते हैं कि संस्कृति ने एक रास्ता तय किया है और हमें यहां तक पहुंचाया है. तो सारा कुछ इस तरह शुरू हुआ. आज भी जब हम कोई लयहीन चीज़ पेन्ट करते हैं तो सन्तुष्टि नहीं मिलती. लय के बिना हमें इत्मीनान नहीं मिलता. हम बेचैन महसूस करते हैं. हम एक पेन्टिंग को पूरा करते हैं और उसे अलग रख देते हैं. उसकी तरफ़ देख तक पाना भी दर्दभरा होता है यदि हम उस लय के भीतर प्रवेश न करें. कोशिश करता हूं कि मैं अधिक स्पष्टता के साथ बतला सकूं कि लय से मेरा क्या अभिप्राय है. देखिए - यह वस्तु यहां रखी हुई है. नानक वहां बैठे हैं. मैं यहां हूं और आप वहां. हमारे दरम्यान एक मेज़ है. मेज़ के ऊपर एक गिलास है, एक फूलदान है जिसमें एक फूल लगा हुआ है. अगर मैं इस सारे को एक सफ़ेद स्पेस में रखना चाहूं तो नानक को कहां रखूंगा? आपको कहां रखूंगा? इस किताब को कहां रखूंगा? यह सब कुछ स्पेस का विभाजन है. स्पेस के भीतर एक तनाव होता है, वस्तु और स्पेस के बीच, वस्तुओं के बीच, और तभी एक पहचान बनती है. यह कोई मृत चीज़ नहीं है.जब मैं किसी गतिविधि में संलग्न होता हूं, जब मैं यहां रखी किसी चीज़ का इस्तेमाल करता हूं तो एक सम्बन्ध बनता है. मैं उस के साथ हूं. तो जब मैं पेन्ट कर रहा होता हूं, उस सम्बन्ध के साथ मैं क्या करता हूं? समस्या यहीं आती है. समस्या का समाधान तभी हो सकेगा जब एक सन्तुलन स्थापित कर लिया जाएगा, जब एक लयबद्ध सामंजस्य वहां होगा. हम इसी लयबद्ध सामंजस्य के बारे में बात करना चाहते हैं, उसे अभिव्यक्त करना चाहते हैं. वरना किसी भी तरह की अभिव्यक्ति नहीं होगी. चीज़ें बनाई जा सकती हैं पर उनमें कोई अभिव्यक्ति नहीं होगी. अगर मैं तीन सीधी रेखाओं को इस तरह बनाऊं तो अंग्रेज़ी का 'एच' अक्षर बन जता है. सो मेरे विचार से एक ही समय में एक डिज़ाइन भी बन गया और एक कम्पोज़ीशन का निर्माण भी हुआ. प्रकृति नाम का यह चमत्कार असीम है. मैं इस पर यकीन करता हूं.
मैंने अपने आप से पूछा कि मैं दुनिया की हर चीज़ को कैसे देखता हूं? मैंने बचपन से आज तक क्या सीखा? जब मैं छोटा था मुझे चीज़ें कौन सिखाया करता था. मैंने अपने आप चलना सीखा ... बच्चा चलना कैसे सीखता है? जब वह एक ऊंची जगह पर बैठा होता है पहले वह हौले हौले अपने पैरों को लटकने देता है, उसके बाद पैरों से फ़र्श को छूने की कोशिश करता है और तब जाकर अन्ततः अपने पैरों पर खड़ा हो पाता है. उसे किसी ने सिखाना नहीं होता, वह बहुत सी चीज़ें अपने आप सीख लेता है. दरअसल ऐसी बहुत सारी चीज़ें हैं जिन्हें हम अपने आप सीख सकते हैं. कुछ वाह्य चीज़ें होती हैं जिन्हें हम पढ़कर सीखते हैं और कुछ ऐसी होती हैं जिन्हें प्रकृति से सीखा जा सकता है. अगर हम बाद में यह फ़ैसला लें कि अब तक सीखी गई सारी चीज़ों को भुला दें और बिल्कुल बुनियादी बातों पर पहुंच जाएं तो क्या होगा? हमारे पास प्रकृति की बुनियादी संरचनाओं के अलावा कुछ नहीं बचेगा. हम उनसे आगे नहीं जा सकते. तो ये मूलभूत संरचनाएं हैं क्या? मिसाल के लिए कोई चीज़ खड़ी है. प्रकृति में वह लम्बवत है. अगर वह चीज़ ऊर्ध्वाधर होने के लिए झुकना भी शुरू करे तो भी उसकी दिशा ऊपर की तरफ़ ही रहेगी. है न? तो यहां यह लम्बवत रेखा एक बुनियादी फ़ॉर्म बन जाती है. अगर ये झुका हुआ विकर्ण इस से जुड़ जाए तो यह किसी पेड़ की टहनी जैसा दिखने लगती है. हमने इसे देखा है; यह हमें किसी ने सिखाया नहीं है. हम इसे अपने चारों तरफ़ देखते हैं. यह प्रकृति में अस्तित्वमान है. और अब अगर यह विकर्ण इस दूसरे वाले को काटे तो यह साफ़ साफ़ किसी पेड़ जैसा दिखने लगता है. टहनियां एक दूसरे को ऐसे ही काटा करती हैं. सो प्रकृति में विकर्ण का अस्तित्व है. एक सीधी रेखा है, एक ऊर्ध्वाधर रेखा है ...
(जारी)
गणेश हलोई: निश्चितता के कारण आप एक ही जगह पर अटक जाते हैं क्योंकि हर चीज़ बहुत तय और नियत हो जाती है. और अगर अनिश्चितता दुबारा न आए तो हम गतिहीन बन जाते हैं. निश्चितता से अनिश्चितता की यात्रा ही जीवन को आनन्ददायक बनाती है. तब पुनः निश्चितता अनिश्चितता की जगह ले लेती है क्योंकि आपने कुछ उत्तर खोज लिए होते हैं. और फिर वही प्रक्रिया शुरू हो जाती है. किसी चक्र की तरह. अगर ऐसा अनवरत न चलता रहे तो जीवन में गति कहां से आएगी?
यह प्रक्रिया आपकी पेन्टिंग्स में भी देखी जा सकती है.
गणेश हलोई: मेरे पुराने काम के कुछ तत्व मेरे बाद के काम में पाए जाते हैं पर वह किसी दोहराव की तरह नहीं.
पुनर्सन्धान ... उसी चीज़ का फिर से सन्धान करना.
गणेश हलोई: एक ही चीज़ को दस अलग अलग कोणों से देखा जा सकता है. अगर आप दिन के समय ऊपर की मंज़िल पर की मेरी खिड़की से बाहर देखेंगे तो आप पेड़ और परिन्दे देख सकते हैं. आप एक लैन्डस्केप देख सकते हैं. उस खिड़की से मैंने इतनी सारी पेन्टिंग्स बनाई हैं मगर कोई भी दो एक जैसी नहीं हैं. किसी ने आपके वास्ते नियम नहीं बनाए हुए हैं. आपको किसी ने कोई निश्चित चीज़ पेन्ट करने को नहीं कहा हुआ है. प्रकृति मौलिक होती है. उसकी नकल मत करो. तमाम महान कलाकारों ने प्रकृति के चित्र बनाए हैं पर उसकी नकल नहीं की है. दा विन्ची, माइकेलएन्जेलो को देखो. माइकेलएन्जेलो ने प्रकृति की नकल नहीं की. उसने उसकी अपनी व्याख्या को पेन्ट किया; उसने उसे वह अनुभूति दी जो उसके विषय ने उसके भीतर पैदा की थी. उसकी शैली यथार्थावादी हो सकती है पर आपने उसके काम की आत्मा को देखना चाहिए. उसकी पेन्टिंग्स फ़ोटोग्राफ़ों जैसी नहीं हैं. जब आप रेम्ब्रां का काम देखते हैं, आपको आश्चर्य नहीं होता? ऐसा नहीं है कि उनमें से कोई कलाकार अच्छा है या खराब है. उनका सारा काम प्रेरणास्पद होता है.
मैंने तय किया कि मैं पश्चिमी पेन्टिंग्स और भारतीय पेन्टिंग्स को अलहदा करके नहीं देखूंगा. पेन्टिंग पेन्टिंग होती है. बहुत सारे लोग कला में इस तरक का वर्गीकरण करते हैं. वे हर तरह के किए गए काम के लिए वर्ग बना देते हैं. लेकिन आप किसी चीज़ को पश्चिमी कला और किसी को भारतीय कला नहीं कह सकते. वह किसी एक खास व्यक्ति या खास समूह का प्रयास नहीं होता. यह समाज का एक सामूहिक प्रयास होता है. सारी चीज़ें एक सम्पूर्ण की तरह घटित हुई हैं. हम इस बात से इन्कार नहीं कर सकते. हमें इस सब को अभिव्यक्ति के तौर पर स्वीकार करना होगा. तो इस तरह मैंने पेन्टिंग्स में कोई फ़र्क़ नहीं किया.
आपने पेन्टिंग के आवश्यक तत्वों के विषय में बातें कीं. पेन्टिंग की अपनी भाषा होती है. हम अब तक इस दर्शन पर बात करते रहे हैं कि कला क्या है. अब आप के काम की तरफ़ दृष्टि डाली जाए. आपकी पेन्टिंग के बारे में बात की जाए. पेन्टिंग्स के आम तत्वों में रंग, फ़ॉर्म, पंक्ति, स्पेस वगैरह होते हैं. मैं जानना चाहता हूं कि अपने काम में आप इनके साथ कैसा बर्ताव करते हैं? मैं आपसे एक पेन्टर की तरह बात कर रहा हूं. एक पेन्टर अपनी पेन्टिंग में संधान के उद्देश्य से एक या दो तत्वों को छांट लेता है. मिसाल के तौर पर राम कुमार कहते हैं कि वे अपनी पेन्टिंग में रंग का सन्धान करते हैं. उन्हें रंगों का रहस्य बहुत पहेलीभरा लगता है. उनके कैनवस के कम्पोज़ीशन में यह सन्धान स्पष्ट नज़र आता है. इसी तरह से, आप किस तत्व की गहराइयों में उतरा करते हैं?
गणेश हलोई: हां, निश्चित ही रंग मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण है. लेकिन मैं स्पेस के बारे में सोचने से शुरू करता हूं. वह वर्ग या आयत जिसे मैं भरने वाला हूं. मैं पहले स्पेस को देखता हूं. कई बार उसे देखते हुए मुझे भान होता है कि वह स्पेस ही मुझे रास्ता दिखाता है. मैं जो भी बनाता हूं वह स्पेस के हिसाब से होता है. स्पेस के भीतर ही वह जीवन शक्ति होती है. मिसाल के तौर पर कह लीजिए कि ज़मीन का एक टुकड़ा है जिस पर आप खेती करना चाहते हैं. आप उस पर खेती कैसे करेंगे? आपको तय करना होगा कि खेती का तरीका क्या होगा और किस पैटर्न पर होगा. है न. आप को बताना पड़ेगा कि मैं इस जगह पर एक पेड़ लगाऊंगा. यहां एक घर बनाऊंगा. बगीचा यहां होगा. साधारण शब्दों में कहें तो आपको स्पेस का बंटवारा करना होगा. तो मेरे लिए स्पेस का बंटवारा सबसे पहले आता है. उसके बाद मैं सोचता हूं कि मैं क्या बनाना चाहता हूं. मेरी पेन्टिंग्स आमतौर पर प्रकृति से सम्बन्धित होती हैं. लेकिन मेरी पेन्टिंग देखकर कोई भी यह नहीं कह सकता कि वह एक आत्मपरक फ़िगरेटिव कम्पोज़ीशन है. वह कहेगा कि पेन्टिंग लैन्ड्स्केप जैसी दिखाई पड़ती है. लेकिन यह साम्य 'जैसा है' नहीं होता. कोई चीज़ एक सी ज़रूर है लेकिन यह फ़क़त बाहरी आकृति भर ही नहीं है. मेरा प्रयास रहता है कि मैं किसी उस चीज़ को पेन्ट करूं जिसे मैंने प्रकृति से पाया लेकिन जो प्रकृति जैसी नहीं है. मैं एक ऐसी ज़मीन पेन्ट करता हूं जो मेरी होती है.
यह मेरी ज़मीन है. मेरे नियम-कानूनों के साथ. मैंने इस ज़मीन की सर्जना की है. इसका प्रकृति के साथ कोई साम्य नहीं है. यह इस ज़मीन की रचना करने का संघर्ष होता है जो पेन्टिंग की प्रक्रिया को दिलचस्प बनाता है. विषय के साथ स्पेस के तनाव को बरकरार रखना होता है. पेन्टिंग का एक और महत्वपूर्ण आयाम होता है - लय. कोल्टे सर की पेन्टिंग्स को देखिए. उनमें लय है. लय के बिना कोई पेन्टिंग नहीं हो सकती. लय के बिना जीवन भी नहीं होता. जैसा कि मैंने कल कहा था कि जीवन का आनन्द तभी लिया जा सकता है जब उसमें लय हो. अगर लय नहीं है तो उसका कोई मतलब नहीं. संगीत में, चलने में, बोलने में लय होती है - इसी तरह पेन्टिंग में भी लय होनी चाहिए. तो मैं कैसे पहुंचा लय तक?
एक आदिम मानव के बारे में सोचो. जीवन एक संघर्ष था. मनुष्य वनों से डरते थे. इसी वजह से वे मकान नहीं बना पाते थे. वे गुफा जैसी किसी जगह पर शारण ले लिया करते थे. वे हमेशा किसी खौफ़ से भरे रहते थे. उन्हें प्रकृति के साथ एक सतत युद्ध लड़ना होता था. लेकिन भोजन के लिए उन्हें तब भी शिकार पर जाना होता था. वह एक उत्तेजनापूर्ण घटना होती थी. सो उन्होंने उसके चित्र बनाए. इन के कुछ हिस्से बहुत अच्छे हैं कुछ नहीं हैं. लेकिन हमें पूछना चाहिए कि इस से उन्हें क्या मिलता था. वह उन तक बड़े नैसर्गिक रूप से पहुंची. ढोने के लिए उनके पास और कोई बोझा नहीं था. ... उनके लिए वह अभिव्यक्ति का एक माध्यम था, अपने अनुभवों, भयॊं, चिन्ताओं और खुशियों को औरों तक पहुंचा पाने का तरीका. लेकिन उन्होंने ड्रॉइंग और चित्र बनाना कैसे सीखा?
प्रकृति से, इस ब्रह्मांड से. इस ब्रह्मांड के भीतर एक निश्शब्द गति हुआ करती है - एक निश्शब्द गति जिस पर हम अपने अचेतन के माध्यम से प्रतिक्रिया देते हैं. यह इसी वजह से था कि दिन का मिजाज़ देख कर आदमी यह बता पाने में सक्षम था कि उस दिन बारिश होगी या नहीं. आकाश, पेड़, सब कुछ अन्तर्बोध के माध्यम से जाने जाते थे. इन्स्टिंक्ट ही वह चीज़ है जो अब तकरीबन विलुप्त हो चुकी है. इस अन्तर्बोध के आधार पर ही हम अगले दिन की घटनाओं के बारे में भविष्यवाणी कर सकते थे. प्रकृति से हमने इसी अन्तर्बोध को पाया था. हमें प्रकृति ने क्या सिखलाया? इस ने हमें वह खामोश आवाज़ दी जिसके भीतर से लय जन्म लेती है. हम उसे सुन नहीं सकते क्योंकि वह खामोश है, लेकिन है. लय से ही चीज़ें अपना काम कर पाती हैं. लय से ही चीज़ों का एक पैटर्न बनता है. जब हमने इस लय के प्रति अपनी देह के माध्यम से प्रतिक्रिया की, तब हम ने नृत्य करना सीखा. आदिम मानव कैसे नृत्य करता था?
... जब हमने उस ध्वनि के प्रति अपनी आवाज़ के माध्यम से रेस्पॉन्ड किया, संगीत की सर्जना हुई. और जब हमने अचरज का अनुभव किया और उसे अभिव्यक्ति देनी चाही, वक चित्रकला के रूप में सामने आया. चित्र बनाना हमने अपने आप को सिखाया है. गायन, नृत्य, पेन्टिंग - सब कुछ हम तक पहुंचा है. हमारा अभिप्राय इसी बात से होता है जब हम कहते हैं कि संस्कृति ने एक रास्ता तय किया है और हमें यहां तक पहुंचाया है. तो सारा कुछ इस तरह शुरू हुआ. आज भी जब हम कोई लयहीन चीज़ पेन्ट करते हैं तो सन्तुष्टि नहीं मिलती. लय के बिना हमें इत्मीनान नहीं मिलता. हम बेचैन महसूस करते हैं. हम एक पेन्टिंग को पूरा करते हैं और उसे अलग रख देते हैं. उसकी तरफ़ देख तक पाना भी दर्दभरा होता है यदि हम उस लय के भीतर प्रवेश न करें. कोशिश करता हूं कि मैं अधिक स्पष्टता के साथ बतला सकूं कि लय से मेरा क्या अभिप्राय है. देखिए - यह वस्तु यहां रखी हुई है. नानक वहां बैठे हैं. मैं यहां हूं और आप वहां. हमारे दरम्यान एक मेज़ है. मेज़ के ऊपर एक गिलास है, एक फूलदान है जिसमें एक फूल लगा हुआ है. अगर मैं इस सारे को एक सफ़ेद स्पेस में रखना चाहूं तो नानक को कहां रखूंगा? आपको कहां रखूंगा? इस किताब को कहां रखूंगा? यह सब कुछ स्पेस का विभाजन है. स्पेस के भीतर एक तनाव होता है, वस्तु और स्पेस के बीच, वस्तुओं के बीच, और तभी एक पहचान बनती है. यह कोई मृत चीज़ नहीं है.जब मैं किसी गतिविधि में संलग्न होता हूं, जब मैं यहां रखी किसी चीज़ का इस्तेमाल करता हूं तो एक सम्बन्ध बनता है. मैं उस के साथ हूं. तो जब मैं पेन्ट कर रहा होता हूं, उस सम्बन्ध के साथ मैं क्या करता हूं? समस्या यहीं आती है. समस्या का समाधान तभी हो सकेगा जब एक सन्तुलन स्थापित कर लिया जाएगा, जब एक लयबद्ध सामंजस्य वहां होगा. हम इसी लयबद्ध सामंजस्य के बारे में बात करना चाहते हैं, उसे अभिव्यक्त करना चाहते हैं. वरना किसी भी तरह की अभिव्यक्ति नहीं होगी. चीज़ें बनाई जा सकती हैं पर उनमें कोई अभिव्यक्ति नहीं होगी. अगर मैं तीन सीधी रेखाओं को इस तरह बनाऊं तो अंग्रेज़ी का 'एच' अक्षर बन जता है. सो मेरे विचार से एक ही समय में एक डिज़ाइन भी बन गया और एक कम्पोज़ीशन का निर्माण भी हुआ. प्रकृति नाम का यह चमत्कार असीम है. मैं इस पर यकीन करता हूं.
मैंने अपने आप से पूछा कि मैं दुनिया की हर चीज़ को कैसे देखता हूं? मैंने बचपन से आज तक क्या सीखा? जब मैं छोटा था मुझे चीज़ें कौन सिखाया करता था. मैंने अपने आप चलना सीखा ... बच्चा चलना कैसे सीखता है? जब वह एक ऊंची जगह पर बैठा होता है पहले वह हौले हौले अपने पैरों को लटकने देता है, उसके बाद पैरों से फ़र्श को छूने की कोशिश करता है और तब जाकर अन्ततः अपने पैरों पर खड़ा हो पाता है. उसे किसी ने सिखाना नहीं होता, वह बहुत सी चीज़ें अपने आप सीख लेता है. दरअसल ऐसी बहुत सारी चीज़ें हैं जिन्हें हम अपने आप सीख सकते हैं. कुछ वाह्य चीज़ें होती हैं जिन्हें हम पढ़कर सीखते हैं और कुछ ऐसी होती हैं जिन्हें प्रकृति से सीखा जा सकता है. अगर हम बाद में यह फ़ैसला लें कि अब तक सीखी गई सारी चीज़ों को भुला दें और बिल्कुल बुनियादी बातों पर पहुंच जाएं तो क्या होगा? हमारे पास प्रकृति की बुनियादी संरचनाओं के अलावा कुछ नहीं बचेगा. हम उनसे आगे नहीं जा सकते. तो ये मूलभूत संरचनाएं हैं क्या? मिसाल के लिए कोई चीज़ खड़ी है. प्रकृति में वह लम्बवत है. अगर वह चीज़ ऊर्ध्वाधर होने के लिए झुकना भी शुरू करे तो भी उसकी दिशा ऊपर की तरफ़ ही रहेगी. है न? तो यहां यह लम्बवत रेखा एक बुनियादी फ़ॉर्म बन जाती है. अगर ये झुका हुआ विकर्ण इस से जुड़ जाए तो यह किसी पेड़ की टहनी जैसा दिखने लगती है. हमने इसे देखा है; यह हमें किसी ने सिखाया नहीं है. हम इसे अपने चारों तरफ़ देखते हैं. यह प्रकृति में अस्तित्वमान है. और अब अगर यह विकर्ण इस दूसरे वाले को काटे तो यह साफ़ साफ़ किसी पेड़ जैसा दिखने लगता है. टहनियां एक दूसरे को ऐसे ही काटा करती हैं. सो प्रकृति में विकर्ण का अस्तित्व है. एक सीधी रेखा है, एक ऊर्ध्वाधर रेखा है ...
(जारी)
Wednesday, July 6, 2011
गणेश हलोई से साक्षात्कार - १
बांग्लादेश में १९३६ में जन्मे गणेश हलोई बंटवारे के बाद १९५० में कलकत्ता आ बसे. अपनी जड़ों से कट जाने का ज़ख़्म उनके कार्य में नज़र आता है. वे हमारे समय के बड़े चित्रकारों में गिने जाते हैं. तमाम माध्यमों में असाधारण कार्य कर चुके हलोई का एक साक्षात्कार ललित कला अकादेमी के पिछले वर्ष छपे प्रकाशन "कला भारती" में आया था. वहीं से साभार -
गणेश हलोई: कथा है कि एक बार एक शिष्य ने अपने गुरु से एक दर्शनसम्बन्धी प्रश्न करते हुए पूछा, " ईश्वर कहां है? हम उसे देख नहीं सकते. हम उसे महसूस नहीं कर सकते. हम कैसे मान लें कि वह है?" गुरु ने उत्तर दिया, "ज़रा प्रकृति को देखो. यह विकृति से बनी हुई है - परिवर्तन से. हर चीज़ एक दूसरे में बदल सकती है. पेड़, पत्ते, मिट्टी ... सारा कुछ. सो अगर आप एक पत्ती का चित्र भी बनाते हैं तो उसके अन्दर ईश्वर होता है." क्या हम विश्वास नहीं करते कि हर चीज़ में ब्रह्म होता है?
मैं अपने आप को खुशकिस्मत मानता हूं कि मैं कला की सौगात लेकर इस धरती पर पहुंचा. रोज़ी रोटी के लिए मुझे किसी जगह नौकरी नहीं करनी पड़ती. मेरे ऊपर समय की कोई पाबन्दियां नहीं हैं. मेरे कार्य की प्रगति पूरी तरह मेरे आन्तरिक बोध की प्रक्रिया पर निर्भर करती है. मुझे केवल उस रास्ते पर चलना है जिस पर मैं यकीन करता हूं और वही मुझे उस अन्तिम लक्ष्य तक ले कर जाएगा जहां ईश्वर है और जहां मुझे आशा है मैं अपने को उसके आगे समर्पित कर दूंगा.
बात करना अच्छी बात है पर सिर्फ़ बात करने से कुछ नहीं हो सकता !! यह कुछ कुछ यथार्थवाद जैसा है. ज़रा यथार्थवाद पर नज़र डालिए ... यथार्थवाद किसी भी किस्म के विकास को पोषित नहीं करता. धरती इतनी सुन्दर कैसे बन गई? क्या हम इस तरह की बातों को लेकर यथार्थवादी हो सकते हैं? धरती यथार्थवाद की वजह से सुन्दर नहीं बनी ... ऐसा कल्पना के कारण सम्भव हुआ है! वह ज़्यादा उत्तेजित करने वाली है. मुझे बताइये, जीवन का अन्तिम लक्ष्य क्या होता है? आप खुश होना चाहते हैं, है न? अपनी कल्पना का प्रयोग करना आपको प्रसन्न बनाता है. जब आप एक पेन्टिंग बना रहे होते हैं और वह बिल्कुल वैसी ही बन कर सामने आती है जैसा आपने सोचा होता है, आपको उतना सन्तोष नहीं मिलता. लेकिन जब पेन्टिंग आपकी उम्मीदों से कहीं अलग बन जाती है तो आप चरम आनन्द के अतिरेक से भर उठते हैं. क्योंकि उसकी उम्मीद नहीं की गई थी ... वह नई होती है. क्योंकि आपकी समझ में आने लगता है कि जिन तत्वों का इस्तेमाल आप अपनी पेन्टिंग में कर रहे होते हो, वे एक सामंजस्य के साथ आपके साथ रेस्पॉन्ड करने लगे हैं. मुझे ऐसा सामंजस्यपूर्ण रेस्पॉन्स इतनी दफ़ा मिला है. फ़ॉर्म, रेखाएं, रंग ... तनाव ... अगर सामंजस्य होगा तो पेन्टिंग ठीक होगी.
आपको पेन्ट करने की प्रेरणा किस से मिलती है? और ऐसा क्यों होता है?
गणेश हलोई: क्योंकि अगर मैं पेन्ट नहीं करूंगा तो सब कुछ ठहर जाएगा. आप यह वार्तालाप क्यों कर रहे हैं? वह क्या चीज़ है जिसके कारण आप इस वार्तालाप को जारी रखे हुए हैं? ठीक ऐसा ही इस मामले में भी है. लेकिन हम दोनों को संचालित करने वाली शक्तियां अलग अलग हैं. ठीक जिस तरह आपके और मेरे विचार अलग अलग हैं. प्रेरणा के स्रोत और उसके सन्धान करने की प्रक्रिया भिन्न लोगों में भिन्न होती है. मुझे बताइए, कुल कितने देवता होंगे? एक, है न? मगर ज़रा उसकी प्रार्थना करने के तरीकों की संख्या पर निगाह डालिए. इतनी इतनी तरह की तो प्रार्थनाएं हैं! रवीन्द्रनाथ टैगोर की 'गीतांजलि' क्या है? समर्पण. तो भी हमें एक ज़रूरी बात का ध्यान रखे रहना चाहिए - आपकी उपस्थिति दिखाई नहीं पड़नी चाहिए. आपकी पहचान का कोई मतलब नहीं होता. यह आवश्यक नहीं कि पेन्टिंग्स को किसी ट्रेडमार्क की तरह देखा जाए. अपनी शैली स्थापित करने के फेर में कलाकार ने भटक नहीं जाना चाहिए. यह बात कलाकारों, लेखकों और किसी भी किस्म का रचनात्मक कार्य करने वाले व्यक्ति पर लागू होती है. आपके इसका अहसास तक नहीं हो पाता और आप अपनी शैली बनाए रखने की वजह से मिकानीकी बन चुके होते हैं.
सब कुछ मुझ पर निर्भर करता है. मैं स्वयं अपना स्वामी हूं. कोई आदेश नहीं देता कि मुझे क्या करना है. किसी ने मेरी पीठ पर बन्दूक सटाकर किसी ख़ास रास्ते पर चलने का आदेश नहीं दे रखा है मुझे. प्रत्येक रचनाशील व्यक्ति को बेहद स्वतन्त्र होना चाहिए. किसी व्यक्ति या किसी वस्तु का गुलाम नहीं.
जीवन बहते पानी की तरह होना चाहिए; रास्ते भर की सारी अनिश्चितताओं में ही तो आनन्द है. आगे बढ़ते हुए आपके सामने नई बाधाएं आती रहती हैं. इसी तरह पेन्टिंग बोध की एक प्रक्रिया है.
शुरू से अन्त तक गाया गया कोई गीत स्पेस में समय घेरता है. शुरू से अन्त तक सुनाई गई एक कहानी स्पेस में समय घेरती है.
-अब ज़रा बिन्दु और रेखा के कार्य को देखें. बिन्दु आपको स्थिर थामे रहता है जबकि रेखा दिशा देती है. एक पेन्टिंग क्या करती है? जब आप उसे देख रहे होते हैं वह आपको समय के बीच स्थिर थामे रहती है और जब आप उसे देखते जाते हैं वह आपको आगे - पीछे ले जाने लगती है - भीतर से. आपको ऐसा जादू और कहां देखने को मिलेगा? पेन्टिंग आपको आपके भावजगत में ले जाती है - जो आपकी अनुभूतियों का संसार है. कहानी या गीत को आपने पूरा सुन कर समाप्त करना होता है लेकिन किसी पेन्टिंग के साथ आपकी प्रतिक्रिया देखने की प्रक्रिया के साथ शुरू हो जाती है.
कहानी और गीत के मामले में, उन्हें समझने के लिए सुनने-पढ़ने वाला उतना ही समय लेता है जितना रचनाकार ने लिया होता है ...
गणेश हलोई: बिल्कुल. जहां एक पेन्टर को यह तय करने में दस साल लग सकते हैं कि पेन्टिंग पूरी हो गई है, दर्शक को फ़कत एक पल लगता है उसके प्रभाव से रूबरू होने में और उसी एक पल में उसे रेस्पॉन्ड भी करना होता है ... क्योंकि आखिरकार दिमाग से अधिक तेज़ कुछ नहीं चल सकता!
दरअसल मेरा मानना है कि संगीत भी आपके साथ बहुत व्यक्तिगत स्तर पर जुड़ता है. कई सारे गीत हैं जिन्हें मैं बरसों पहले सुना करता था. मैं उन्हें बार-बार सुना करता था. आज भी जब वे धुनें कहीं से मेरे कान में पड़ती हैं तो मेरे सारे पुराने जुड़ाव जीवन्त हो उठते हैं. कुछेक गन्धों को लेकर भी मैं यही बात कह सकता हूं. उनसे भी कुछ विशिष्ट किस्म के जुड़ाव उभर आया करते हैं. वे सम्पूर्ण संसारों का पुनर्सृजन कर देते हैं. लेकिन इन दोनों उदाहरणों में रेस्पॉन्स बहुत व्यक्तिगत होते हैं. लेकिन जब पेन्टिंग की बात आती है तो यह बेहद व्यक्तिगत होने के साथ ही पूरी तरह सार्वभौमिक भी होती है.
आजकल यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण बात हुई है कि लोगों ने 'एब्स्ट्रैक्ट' की गलत व्याख्या करना शुरू कर दिया है. यह सिर्फ़ आकारहीनता नहीं है. यथार्थवाद में भी एक तरह का एब्सट्रैक्शन होता है, है न?
किसी गुस्साए बच्चे की कल्पना कीजिए. वह नहीं जानता कि अपना गुस्सा कैसे बाहर निकाले. अपने अनुभव की सीमितता के कारण वह उसकी अभिव्यक्ति अपने खुले हाथ को भींच कर मुठ्ठी बना कर करता है. अब अगर मैं इस बच्चे की भावनाओं को अभिव्यक्त करना चाहूं तो उसकी कलाई का प्लास्टर का सांचा बना देना ही पर्याप्त होगा क्या? नहीं. लेकिन यदि मैं उसे इस तरह से विद्रूप बना दूं कि वह उस क्रिया को उससे जुड़ी हुई अनुभूति तक पहुंचा सके तो मैं वांछित प्रभाव प्राप्त कर पाने में सफल हो सकता हूं. आन्तरिक अनुभूति को विद्रूपता के माध्यम से पाया जा सकता है. इस तरह हम विद्रूपता के बगैर काम नहीं चला सकते. सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति के लिए विद्रूपता आवश्यक है. ऐसा कविता के साथ भी होता है. क्या कविता साधारण गद्य का विद्रूपन नहीं है? अख़बारी लेखन और कविता में फ़र्क़ होता है, है न? यह 'अनुभूति' का फ़र्क होता है.
एब्सट्रैक्शन रंगों के अर्थहीन टुकड़े भर नहीं होता. एब्सट्रैक्शन विचार, सघन अनुभूति और मज़बूत कल्पना शक्ति से आता है. कल्पना ही अन्तिम सत्य है. यह अकल्पनीय रूप से आश्चर्यजनक काम कर सकती है.
जेराम पटेल के काम से बहुत सुदृढ़ विश्वास परिलक्षित होता है. उनके ब्लैक एन्ड व्हाइट्स बहुत ताकतवर हैं.
(जारी)
गणेश हलोई: कथा है कि एक बार एक शिष्य ने अपने गुरु से एक दर्शनसम्बन्धी प्रश्न करते हुए पूछा, " ईश्वर कहां है? हम उसे देख नहीं सकते. हम उसे महसूस नहीं कर सकते. हम कैसे मान लें कि वह है?" गुरु ने उत्तर दिया, "ज़रा प्रकृति को देखो. यह विकृति से बनी हुई है - परिवर्तन से. हर चीज़ एक दूसरे में बदल सकती है. पेड़, पत्ते, मिट्टी ... सारा कुछ. सो अगर आप एक पत्ती का चित्र भी बनाते हैं तो उसके अन्दर ईश्वर होता है." क्या हम विश्वास नहीं करते कि हर चीज़ में ब्रह्म होता है?
मैं अपने आप को खुशकिस्मत मानता हूं कि मैं कला की सौगात लेकर इस धरती पर पहुंचा. रोज़ी रोटी के लिए मुझे किसी जगह नौकरी नहीं करनी पड़ती. मेरे ऊपर समय की कोई पाबन्दियां नहीं हैं. मेरे कार्य की प्रगति पूरी तरह मेरे आन्तरिक बोध की प्रक्रिया पर निर्भर करती है. मुझे केवल उस रास्ते पर चलना है जिस पर मैं यकीन करता हूं और वही मुझे उस अन्तिम लक्ष्य तक ले कर जाएगा जहां ईश्वर है और जहां मुझे आशा है मैं अपने को उसके आगे समर्पित कर दूंगा.
बात करना अच्छी बात है पर सिर्फ़ बात करने से कुछ नहीं हो सकता !! यह कुछ कुछ यथार्थवाद जैसा है. ज़रा यथार्थवाद पर नज़र डालिए ... यथार्थवाद किसी भी किस्म के विकास को पोषित नहीं करता. धरती इतनी सुन्दर कैसे बन गई? क्या हम इस तरह की बातों को लेकर यथार्थवादी हो सकते हैं? धरती यथार्थवाद की वजह से सुन्दर नहीं बनी ... ऐसा कल्पना के कारण सम्भव हुआ है! वह ज़्यादा उत्तेजित करने वाली है. मुझे बताइये, जीवन का अन्तिम लक्ष्य क्या होता है? आप खुश होना चाहते हैं, है न? अपनी कल्पना का प्रयोग करना आपको प्रसन्न बनाता है. जब आप एक पेन्टिंग बना रहे होते हैं और वह बिल्कुल वैसी ही बन कर सामने आती है जैसा आपने सोचा होता है, आपको उतना सन्तोष नहीं मिलता. लेकिन जब पेन्टिंग आपकी उम्मीदों से कहीं अलग बन जाती है तो आप चरम आनन्द के अतिरेक से भर उठते हैं. क्योंकि उसकी उम्मीद नहीं की गई थी ... वह नई होती है. क्योंकि आपकी समझ में आने लगता है कि जिन तत्वों का इस्तेमाल आप अपनी पेन्टिंग में कर रहे होते हो, वे एक सामंजस्य के साथ आपके साथ रेस्पॉन्ड करने लगे हैं. मुझे ऐसा सामंजस्यपूर्ण रेस्पॉन्स इतनी दफ़ा मिला है. फ़ॉर्म, रेखाएं, रंग ... तनाव ... अगर सामंजस्य होगा तो पेन्टिंग ठीक होगी.
आपको पेन्ट करने की प्रेरणा किस से मिलती है? और ऐसा क्यों होता है?
गणेश हलोई: क्योंकि अगर मैं पेन्ट नहीं करूंगा तो सब कुछ ठहर जाएगा. आप यह वार्तालाप क्यों कर रहे हैं? वह क्या चीज़ है जिसके कारण आप इस वार्तालाप को जारी रखे हुए हैं? ठीक ऐसा ही इस मामले में भी है. लेकिन हम दोनों को संचालित करने वाली शक्तियां अलग अलग हैं. ठीक जिस तरह आपके और मेरे विचार अलग अलग हैं. प्रेरणा के स्रोत और उसके सन्धान करने की प्रक्रिया भिन्न लोगों में भिन्न होती है. मुझे बताइए, कुल कितने देवता होंगे? एक, है न? मगर ज़रा उसकी प्रार्थना करने के तरीकों की संख्या पर निगाह डालिए. इतनी इतनी तरह की तो प्रार्थनाएं हैं! रवीन्द्रनाथ टैगोर की 'गीतांजलि' क्या है? समर्पण. तो भी हमें एक ज़रूरी बात का ध्यान रखे रहना चाहिए - आपकी उपस्थिति दिखाई नहीं पड़नी चाहिए. आपकी पहचान का कोई मतलब नहीं होता. यह आवश्यक नहीं कि पेन्टिंग्स को किसी ट्रेडमार्क की तरह देखा जाए. अपनी शैली स्थापित करने के फेर में कलाकार ने भटक नहीं जाना चाहिए. यह बात कलाकारों, लेखकों और किसी भी किस्म का रचनात्मक कार्य करने वाले व्यक्ति पर लागू होती है. आपके इसका अहसास तक नहीं हो पाता और आप अपनी शैली बनाए रखने की वजह से मिकानीकी बन चुके होते हैं.
सब कुछ मुझ पर निर्भर करता है. मैं स्वयं अपना स्वामी हूं. कोई आदेश नहीं देता कि मुझे क्या करना है. किसी ने मेरी पीठ पर बन्दूक सटाकर किसी ख़ास रास्ते पर चलने का आदेश नहीं दे रखा है मुझे. प्रत्येक रचनाशील व्यक्ति को बेहद स्वतन्त्र होना चाहिए. किसी व्यक्ति या किसी वस्तु का गुलाम नहीं.
जीवन बहते पानी की तरह होना चाहिए; रास्ते भर की सारी अनिश्चितताओं में ही तो आनन्द है. आगे बढ़ते हुए आपके सामने नई बाधाएं आती रहती हैं. इसी तरह पेन्टिंग बोध की एक प्रक्रिया है.
शुरू से अन्त तक गाया गया कोई गीत स्पेस में समय घेरता है. शुरू से अन्त तक सुनाई गई एक कहानी स्पेस में समय घेरती है.
-अब ज़रा बिन्दु और रेखा के कार्य को देखें. बिन्दु आपको स्थिर थामे रहता है जबकि रेखा दिशा देती है. एक पेन्टिंग क्या करती है? जब आप उसे देख रहे होते हैं वह आपको समय के बीच स्थिर थामे रहती है और जब आप उसे देखते जाते हैं वह आपको आगे - पीछे ले जाने लगती है - भीतर से. आपको ऐसा जादू और कहां देखने को मिलेगा? पेन्टिंग आपको आपके भावजगत में ले जाती है - जो आपकी अनुभूतियों का संसार है. कहानी या गीत को आपने पूरा सुन कर समाप्त करना होता है लेकिन किसी पेन्टिंग के साथ आपकी प्रतिक्रिया देखने की प्रक्रिया के साथ शुरू हो जाती है.
कहानी और गीत के मामले में, उन्हें समझने के लिए सुनने-पढ़ने वाला उतना ही समय लेता है जितना रचनाकार ने लिया होता है ...
गणेश हलोई: बिल्कुल. जहां एक पेन्टर को यह तय करने में दस साल लग सकते हैं कि पेन्टिंग पूरी हो गई है, दर्शक को फ़कत एक पल लगता है उसके प्रभाव से रूबरू होने में और उसी एक पल में उसे रेस्पॉन्ड भी करना होता है ... क्योंकि आखिरकार दिमाग से अधिक तेज़ कुछ नहीं चल सकता!
दरअसल मेरा मानना है कि संगीत भी आपके साथ बहुत व्यक्तिगत स्तर पर जुड़ता है. कई सारे गीत हैं जिन्हें मैं बरसों पहले सुना करता था. मैं उन्हें बार-बार सुना करता था. आज भी जब वे धुनें कहीं से मेरे कान में पड़ती हैं तो मेरे सारे पुराने जुड़ाव जीवन्त हो उठते हैं. कुछेक गन्धों को लेकर भी मैं यही बात कह सकता हूं. उनसे भी कुछ विशिष्ट किस्म के जुड़ाव उभर आया करते हैं. वे सम्पूर्ण संसारों का पुनर्सृजन कर देते हैं. लेकिन इन दोनों उदाहरणों में रेस्पॉन्स बहुत व्यक्तिगत होते हैं. लेकिन जब पेन्टिंग की बात आती है तो यह बेहद व्यक्तिगत होने के साथ ही पूरी तरह सार्वभौमिक भी होती है.
आजकल यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण बात हुई है कि लोगों ने 'एब्स्ट्रैक्ट' की गलत व्याख्या करना शुरू कर दिया है. यह सिर्फ़ आकारहीनता नहीं है. यथार्थवाद में भी एक तरह का एब्सट्रैक्शन होता है, है न?
किसी गुस्साए बच्चे की कल्पना कीजिए. वह नहीं जानता कि अपना गुस्सा कैसे बाहर निकाले. अपने अनुभव की सीमितता के कारण वह उसकी अभिव्यक्ति अपने खुले हाथ को भींच कर मुठ्ठी बना कर करता है. अब अगर मैं इस बच्चे की भावनाओं को अभिव्यक्त करना चाहूं तो उसकी कलाई का प्लास्टर का सांचा बना देना ही पर्याप्त होगा क्या? नहीं. लेकिन यदि मैं उसे इस तरह से विद्रूप बना दूं कि वह उस क्रिया को उससे जुड़ी हुई अनुभूति तक पहुंचा सके तो मैं वांछित प्रभाव प्राप्त कर पाने में सफल हो सकता हूं. आन्तरिक अनुभूति को विद्रूपता के माध्यम से पाया जा सकता है. इस तरह हम विद्रूपता के बगैर काम नहीं चला सकते. सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति के लिए विद्रूपता आवश्यक है. ऐसा कविता के साथ भी होता है. क्या कविता साधारण गद्य का विद्रूपन नहीं है? अख़बारी लेखन और कविता में फ़र्क़ होता है, है न? यह 'अनुभूति' का फ़र्क होता है.
एब्सट्रैक्शन रंगों के अर्थहीन टुकड़े भर नहीं होता. एब्सट्रैक्शन विचार, सघन अनुभूति और मज़बूत कल्पना शक्ति से आता है. कल्पना ही अन्तिम सत्य है. यह अकल्पनीय रूप से आश्चर्यजनक काम कर सकती है.
जेराम पटेल के काम से बहुत सुदृढ़ विश्वास परिलक्षित होता है. उनके ब्लैक एन्ड व्हाइट्स बहुत ताकतवर हैं.
(जारी)
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