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Saturday, October 25, 2014

बड़े ग़ुलाम अली ख़ान साहब का साक्षात्कार - उम्दा कबाड़


उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ान साहब का एक दुर्लभ साक्षात्कार-

Tuesday, August 12, 2014

तकदीर तेरे क़दमों में होगी और तू मुकद्दर का बादशाह होगा - कादर ख़ान का एक लंबा साक्षात्कार – अंतिम क़िस्त


कॉनी हाम – आजकल क्या कर रहे हैं?

कादर ख़ान –मैं किताबें लिख रहा हूँ. मैं अपने सामने अनपढ़, अयोग्य लोगों को रखता हूँ. अगर कोई उनसे वैसी भाषा में बात करेगा तो क्या वे समझ सकेंगे? सो मैं सवाल-जवाब की शैली में किताबें लिख रहा हूँ. वह मुझसे सवाल कैसे पूछेगा? और मैं किस ज़बान में उसे उत्तर दूंगा ताकि वह समझ जाए?

कॉनी हाम – किस बारे में लिख रहे हैं?

कादर ख़ान – मैं ग़ालिब पर काम कर रहा हूँ. मैं उन ग़ज़लों को सुनाता हूँ, शब्द – दर –शब्द समझाता हूँ: इस शब्द का क्या मतलब है, इस का क्या. और इस शेर का सही मतलैब क्या है. और इसका गहरा अर्थ क्या है. इस शेड के पीछे का आइडिया क्या है. मैं करीब 100 ग़ज़लों पर काम कर चुका हूँ. मेरी किताबें छः महीने में पूरी हो जाएँगी. फोर मैं अपनी खुद की सीडी बनाऊंगा ताकि लोगों को बता सकूं ग़ज़ल कैसे पढ़ी जाती है. और कबीर और इकबाल पर भी काम चल रहा है. यही काम मैं गीतों पर भी करना चाहता हूँ. और अरबी और कुरान और हदीस पर भी.

कॉनी हाम – यह तो दो या तीन जिंदगियों के बराबर का काम है?

कादर ख़ान –  हम लोग ढाई सौ किताबें तैयार कर चुके हैं. एक लाख बीस हज़ार पन्ने टाइप हो चुके हैं. धीरे धीरे हम किताबें बांटना शुरू करेंगे. मैं इन किताबों पर लेक्चर दूंगा और इन किताबों को बांटूंगा ...मैं एड्स पर भी एक सीडी तैयार कर रहा हूँ. एक एनीमेशन फिल्म. आप एड्स की बात करते हैं तो लोग बोर होने लगते हैं. मुझे अपने ऑडीएंस को बोर करने या खुद बोर हो जाने से बहुत डर लगता है.

मुस्लिम समुदाय को शिक्षित करना:

दुनिया भर में मुस्लिम समुदाय के खिलाफ असंतोष है. मैं भी मुस्लिम हूँ. अगर आप इन लोगों के घर जाकर इनके साथ बैठेंगे तो – हालाँकि लोग कहते हैं कि इन्होने संसार की शांति को तबाह कर दिया है – दरअसल इनके अपने घरों में शांति नहीं है. गरीबी. अशिक्षा. एक दूसरे का सम्मान नहीं. घर में बाप बेटे की इज्ज़त नहीं करता. बेटा माँ की बात नहीं सुनता. माँ अपने पति की नहीं सुनती. कोई किसी की इज्ज़त नहीं करता. एक तनाव जैसा हर समय बना रहता है क्योंकि पैसा नहीं है. जब वे बाहर आते हैं तो उन्हें दुनिया की आँखों में अपने लिए नफरत नज़र आती है. सो प्रतिशोध की भावना से ... – मान लीजिये आप किसी को मारने के लिए हत्यारे को किराए पर लेना चाहते हैं, तो ऐसा करने आप खुद तो जाएंगे नहीं.  आपको एक हत्यारे की ज़रूरत है. आप उसे ८००० रूपये देने को तैयार हैं. और अगर वह राजी है तो आप चाहेंगे आपका काम ५००० में हो जाए. ठीक है! 3-4% लोग हैं जो ऐसे काम करते हैं. और उन्हें रोकने वाला कोई नहीं है. ये ज़रूरतमंद संकी लोग हैं, हिंसा से भरे हुए. आप उन्हें कैसे रोक लेंगे? कुछ ऐसा हो पाता कि सारी मुस्लिम कौम एक डोर से बंध पाती. अब क्या है कि मुस्लिमों में कोई एक हाईकमान तो है नहीं. बहुत सारी हईकमानें हैं. इन सब ने मिलकर साथ आना चाहिय्र और तय करना चाहिए कि : मैं यह मारकाट,  हत्या और आतंकवाद करने वाला नहीं हूँ, मैं नहीं चाहूँगा मेरा भाई या मेरा बेटा ये काम करे. कुछ लोग यह काम कर रहे हैं. मगर इसे रोका कैसे जाए? अगर हर इलाके का अपना हाईकमान है और अगर वहां कुछ होता है तो यह उसकी ज़िम्मेदारी मानी जानी चाहिए. मैं इसी तरह का कुछ काम करने की तरफ बढ़ रहा हूँ. अगर मैं फ़िल्मी कलाकार बनकर जाऊंगा तो वे मेरी बात न्हींसुनेंगे, सो मैं अध्यापक बनकर जाता हूँ. मैं उन्हें शिक्षित करने का प्रयास करूंगा. उनके दुखों को सुनूंगा उनकी तकलीफों का समाधान निकालने की कोशिश करूंगा. धीर धीरे उनके घरों से होता हुआ उनके दिलों में उतरने की कोशिश करूंगा. इसमें वक्त लगेगा पर मेरा मानना है मुझे सफलता मिलेगी.

इस्लामी कानून इस धरती पर अरबी में लिखी हुई पवित्र पुस्तक की मार्फ़त आया. लेकिन बहुत सारे मुस्लिम अरबी नहीं जानते. उन्हें साहित्य पढने की तमीज़ नहीं. वे कैसे समझेंगे इस्लामी क़ानून को? वे उसका अनुवाद पढेंगे. अनुवादक आपको कुछ भी बता सकता है और आप उसे मानने लगेंगे क्योंकि आप सोचते हैं वही अल्लाह के शब्द हैं. लेकिन जब आप भाषा को समझते हैं और कल कोई मुल्ला-मौलवी कहता है कि फलां काम करो या यह कि सारे मुसलमान एक हो जाएं और कोई गलत काम करने लगें तो मैं उन्हें शिक्षित कर इस लायक बनाना चाहता हूँ कि वे उनसे पूछ सकें “बताओ कहाँ लिखा है ऐसा?” तब उस मुल्ला-मौलवी ने अपनी बात साबित करना पड़ेगी. अगर वह ऐसा नहीं कर पाता तो उसकी बात कोई सुनेगा ही नहीं. ये है मेरा प्लान.

मनुष्य होने की बाबत:

एक इंसान बस एक इंसान होता है. इसे आप किसी नाम से कैसे बुला सकते हैं? क्या होता है हिन्दू? मुसलमान? ईसाई? हर इंसान के दो हिस्से होते हैं. एक अपने भगवान से उसका रिश्ता होता है. यह उन दोनों के बीच की बात है. मुझे आपसे यह पूछने का कोई हक़ नहीं कि आप क्या करते हैं और न आपको मुझसे ये बात पूछने का. कि आप पूजा करते हैं या नहीं. दूसरा हिस्सा मेरा-आपका सम्बन्ध है. मैं आपसे कैसा बर्ताव करता हूँ. जैसे मान लीजिये किसी का विवाह किसी औरत से हुआ है या वह उस औरत से मोहब्बत करता है. यह प्रेम उसकी व्यक्तिगत समस्या है. वह उसे समाज के सामने लेकर नहीं आता. वह उसकी चर्चा समाज में नहीं करेगा. अगर वह ऐसा करता है तो यह उसकी कमजोरी है. इकबाल ने एक उम्दा लाइन लिखी है:

दर्द-ए-दिल के वास्ते पैदा किया इंसान को,
वर्ना ताअत के लिए कुछ म न थे    

अगर खुदा चाहता कि उसे पूजा जाए तो फरिश्तों की क्या कमी थी? उसे आदमी बनाने की क्या ज़रुरत थी? अगर आदमी बनाया तो इसलिए कि उसे एक दिल दिया गया. और एक अच्छे दिल को दर्द सहना आना चाहिए. और वह दर्द बांटा जाना चाहिए. तो आपस में दुःख बाँट लें, तो इंसान को दुःख बांटने के लिए पैदा किया गया दुनिया में. पूजापाठ ही करना था तो फिर फ़रिश्ते बहुत थे. तो उसने कायको पैदा किया हमको?

कॉनी हाम – और सुख बांटने को नहीं? सुख नहीं, सिर्फ दुःख?

कादर ख़ान – दुःख बहुत अच्छी चीज़ है.

(दुःख और यातना को आगे समझाने के लिए कादर खान ने, जब उनसे मैंने पूछा कि उनका फेवरेट डायलाग क्या है, फिल्म ‘मुकद्दर का सिकन्दर’ का एक सीन चुना. उन्होंने अपनी वशीभूत कर लेने वाली शैली में आवाज़ के उतार-चढावों के साथ एक अध्यापक की तरह मुझे समझाते हुए यह डायलाग सुनाया. - कॉनी हाम)

कादर ख़ान – इस फिल्म में मैंने एक भिखारी का रोल किया था. मैं एक कब्रिस्तान में जाता हूँ और एक बच्चे को देखता हूँ. बच्चा बड़ा होकर अमिताभ बच्चन बनता है. वह कब्र पर बैठा रो रहा है.

“किसकी कब्र पर बैठे हो बच्चो?

“हमारी माँ मर गयी है.”

“उठो. आओ मेरे साथ. चारों तरफ देखो. यहाँ भी कोई किसी की बहन है, कोई किसी का भाई है. कोई किसी की माँ है. इस शहर-ए-खामोशियों में, इस खामोश शहर में, इस मिट्टी के ढेर के नीचे सब दबे पड़े हैं. मौत से किसको रास्तागरी है? इस मौत से कौन छूट सकता है? आज उनकी, तो कल हमारी बारी है. मेरी ये बात याद रखना इस फकीर की बात याद रखना. ये ज़िन्दगी में बहुत काम आएगी. कि अगर सुख में मुस्कराते हो तो दुःख में कहकहे लगाओ. क्योंकि ज़िन्दा हैं वो लोग जो मौत से टकराते हैं, पर मुर्दों से बदतर हैं वो लोग जो मौत से घबराते हैं. सुख तो बेवफा है. चन्द दिनों के लिए है. तवायफ की तरह आता है. दुनिया को बहलाता है दिल को बहलाता है और चला जाता है, मगर दुःख तो हमेशा का साथी है.एक बार आता है तो कभी लौटकर नहीं जाता, इसलिए सुख को ठोकर मार, दुःख को गले लगा. तकदीर तेरे क़दमों में होगी और तू मुकद्दर का बादशाह होगा.

(समाप्त)     


Wednesday, November 6, 2013

मेरी ज़्यादातर प्रेरणाएँ और मशग़ले साहित्यिक जीवन से बाहर के हैं

कुछ दिनों पहले ‘प्रभात खबर’ अख़बार में छपा वरिष्ठ कवि असद ज़ैदी का यह साक्षात्कार पढ़कर कलकत्ता में रहने वाले मेरे फिल्मकार दोस्त राजीव का फ़ोन आया था. वह इस साक्षात्कार से खासा प्रभावित था और असद जी को व्यक्तिगत रूप से बधाई देना चाहता था. जीवन के तमाम मसलों पर ख़ासा आलस्य बरतने के कोई एक हज़ार विश्व कीर्तिमान बना चुके राजीव की असद ज़ैदी का नम्बर प्राप्त करने की यह बेचैनी बता रही थी कि इंटरव्यू बढ़िया होगा. अपने परिचितों में अगर मुझे कुछ गिनती के लोगों के पढ़े से रश्क होता है तो राजीव उनमें काफ़ी आगे नज़र आता है. इस इंटरव्यू को पढने की सबसे बड़ी वजह तो मुझे सब से पहले यही लगी.   

भाई धीरेश सैनी ने इसे अपने ब्लॉग एक ज़िद्दी धुन पर पहले ही लगा रखा है. फ़ॉर द रेकॉर्ड इसे यहाँ लगाने में मुझे अच्छा लग रहा है. धन्यवाद धीरेश!


कविताआपके लिए क्या है?

कविता समाज में एक आदमी के बात करने का तरीक़ा है. पहले अपने आप से, फिर दोस्तों से, तब उनसे जिनके चेहरे आप नहीं जानते, जो अब या कुछ बरस बाद हो सकता है आपकी रचना पढ़ते हों. कविता समाज को मुख़ातिब करती बाहरी आवाज़ नहीं, समाज ही में पैदा होने वाली एक आवाज़ है. चाहे वह अंतरंग बातचीत हो, उत्सव का शोर हो या प्रतिरोध की चीख़. यह एक गंभीर नागरिक कर्म भी है. एक बात यह भी है कि कविता आदमी पर अपनी छाप छोड़ती है - जैसी कोई कविता लिखता है वैसा ही कवि वह बनता जाता है और किसी हद तक वैसा ही इन्सान.


लेखन की शुरुआत स्वत: स्फूर्त थी या कोई प्रेरणा थी?

खुद अपने जीवन को उलट पुलटकर देखते, और जो पढ़ने, सुनने और देखने को मिला है उसे संभालने से ही मैं लिखने की तरफ़ माइल हुआ. घर में तालीम की क़द्र तो थी पर नाविल पढ़ने, सिनेमा देखने, बीड़ी सिगरेट पीने, शेरो-शाइरी करने, गाना गाने या सुनने को बुरा समझा जाता था. यह लड़के के बिगड़ने या बुरी संगत में पड़ने की अलामतें थीं. लिहाज़ा अपना लिखा अपने तक ही रहने देता था. पर मिज़ाज में बग़ावत है, यह सब पर ज़ाहिर था.


आपने शुरुआत कहानी से की थी फिर कविता की ओर आये. कविता विधा ही क्यों?

शायद सुस्ती और कम लागत की वजह से. मुझे लगता रहता था असल लिखना तो कविता लिखना ही है. यह इस मानी में कि कविता लिखना भाषा सीखना है. कविता भाषा की क्षमता से रू-ब-रू कराती है, और उसे किफ़ायत से बरतना भी सिखाती है. कविता एक तरह का ज्ञान देती है, जो कथा-साहित्य या ललित गद्य से बाहर की चीज़ है. वह सहज ही दूसरी कलाओं को समझना और उनसे मिलना सिखा देती है. हर कवि के अंदर कई तरह के लोग - संगीतकार, गणितज्ञ, चित्रकार, फ़िल्मकार, कथाकार, मिनिएचरिस्ट, अभिलेखक, दार्शनिक, नुक्ताचीन श्रोता और एक ख़ामोश आदमी - हरदम मौजूद होते हैं.


अपनी रचना-प्रक्रिया के बारे में बताएं.

मैं अक्सर एक मामूली से सवाल का जवाब देना चाहता हूँ. जैसे : कहो क्या हाल है? या, देखते हो? या, उधर की क्या ख़बर है? या, तुमने सुना वो क्या कहते हैं? या, तुम्हें फ़लाँ बात याद है? या, यह कैसा शोर है? जहाँ तक मैं समझ पाया हूँ, मेरे प्रस्थान बिंदु ऐसे ही होते हैं. कई दफ़े अवचेतन में बनती कोई तस्वीर या दृश्यावली अचानक दिखने लगती है जैसे कोई फ़िल्म निगेटिव अचानक धुलकर छापे जाना माँगता हो. मिर्ज़ा ने बड़ी अच्छी बात कही है - 'हैं ख़्वाब में हनोज़ जो जागे हैं ख़्वाब में.'

दरअसल रचना प्रक्रिया पर ज़्यादा ध्यान देने से वह रचना प्रक्रिया नहीं रह जाती, कोई और चीज़ हो जाती है. यह तो बाद में जानने या फ़िक्र में लाने की चीज़ है. यह काम भी रचनाकार नहीं, कोई दूसरा आदमी करता है - चाहे वह उसी के भीतर ही बैठा हो - जो रचना में कोई मदद नहीं करता.

मुक्तिबोध से बेहतर चिंतन इस मामले में किसी ने नहीं किया, वह इन मामलात की गहराई में गए थे. 'कला का तीसरा क्षण' निबंध और 'बाह्य के आभ्यंत्रीकरण' और 'अभ्यन्तर के बाह्यकरण' का चक्रीय सिद्धान्त जानने और समझने की चीज़ें हैं. लेकिन मुझे यक़ीन है कवि के रूप में मुक्तिबोध 'तीसरे क्षण' के इन्तिज़ार में नहीं बैठे रहते थे.


अपनी रचनाशीलता का अपने परिवेश, समाज और परिवार से किस तरह का संबंध पाते हैं?

संबंध इस तरह का है कि 'दस्ते तहे संग आमदः पैमाने वफ़ा है' (ग़ालिब). मैं इन्ही चीज़ों के नीचे दबा हुआ हूँ, इनसे स्वतंत्र नहीं हूँ. लेकिन मेरे लेखन से ये स्वतंत्र हैं, यह बड़ी राहत की बात है.


क्या साहित्य लेखन के लिए किसी विचारधारा का होना जरूरी है?

पानी में गीलापन होना उचित माना जाए या नहीं, वह उसमें होता है. समाज-रचना में कला वैचारिक उपकरण ही है - आदिम गुफाचित्रों के समय से ही. विचारधारा ही ज़बान और बयान को तय करती है, चाहे आप इसको लेकर जागरूक हों या नहीं. बाज़ार से लाकर रचना पर कोई चीज़ थोपना तो ठीक नहीं है, पर नैसर्गिक या रचनात्मक आत्मसंघर्ष से अर्जित वैचारिक मूल्यों को छिपाना या तथाकथित कलावादियों की तरह उलीचकर या बीनकर निकालना बुरी बात है. यह उसकी मनुष्यता का हरण है. और एक झूटी गवाही देने की तरह है.


आप अपनी कविताओं में बहुत सहजता से देश और दुनिया की राजनीतिक विसंगतियों को आम आदमी की जिंदगी से जोड़ कर एक संवाद पेश करते हैं. क्या आपको लगता है कि मौजूदा समय-समाज में कवि की आवाज सुनी जा रही है?

मौजूदा वक़्त ख़राब है, और शायद इससे भी ख़राब वक़्त आने वाला है. यह कविता के लिए अच्छी बात है. कविकर्म की चुनौती और ज़िम्मेदारी, और कविता का अंतःकरण इसी से बनता है. अच्छे वक़्तों में अच्छी कविता शायद ही लिखी गई हो. जो लिखी भी गई है वह बुरे वक़्त की स्मृति या आशंका से कभी दूर न रही. जहाँ तक कवि की आवाज़ के सुने जाने या प्रभावी होने की बात है, मुझे पहली चिन्ता यह लगी रहती है कि दुनिया के हंगामे और कारोबार के बीच क्या हमारा कवि ख़ुद अपनी आवाज़ सुन पा रहा है? या उसी में एबज़ॉर्ब हो गया है, सोख लिया गया है? अगर वह अपने स्वर, अपनी सच्ची अस्मिता, अपनी नागरिक जागरूकता को बचाए रख सके तो बाक़ी लोगों के लिए भी प्रासंगिक होगा.


आपके एक समकालीन कवि ने लिखा है (अपनी उनकी बात: उदय प्रकाश) आपके साथ हिंदी की आलोचना ने न्याय नहीं किया.क्या आपको भी ऐसा लगता है? इसके पीछे क्या वजहें हो सकती हैं?

मैं अपना ही आकलन कैसे करूँ! या क्या कहूँ? ऐसी कोई ख़ास उपेक्षा भी मुझे महसूस नहीं हुई. मेरी पिछली किताब मेरे ख़याल में ग़ौर से पढ़ी गई और चर्चा में भी रही. कुछ इधर का लेखन भी. इस बहाने कुछ अपना और कुछ जगत का हाल भी पता चला.


लेखन से जुड़े पुरस्कारों को कितना अहम मानते हैं एक लेखक के लिए?

मुझे अपने मित्र पंकज चतुर्वेदी की कविता 'कृतज्ञ और नतमस्तक' की याद आ रही है. यह कालजयी रचना बहुत थोड़े शब्दों में वह सब कह देती है जो इस मसले पर कहा जा सकता है.


कृतज्ञ और नतमस्तक

-      पंकज चतुर्वेदी

सत्ता का यह स्वभाव नहीं है
कि वह योग्यता को ही
पुरस्कृत करे
बल्कि यह है
कि जिन्हें वह पुरस्कृत करती है
उन्हें योग्य कहती है

अब जो पुरस्कृत होना चाहें
वे चाहे ख़ुद को
और पूर्व पुरस्कृतों को
उसके योग्य न मानें
मगर यह मानें
कि योग्यता का निश्चय
सत्ता ही कर सकती है

अंत में योग्य
सिर्फ सत्ता रह जाती है
और जो उससे पुरस्कृत हैं
वे अपनी-अपनी योग्यता पर
संदेह करते हुए
सत्ता के प्रति
कृतज्ञ और नतमस्तक होते हैं
कि उसने उन्हें योग्य माना


आप अपनी सबसे प्रिय रचना के तौर पर किसका जिक्र करना चाहेंगे?

इस बारे में राय बदलता रहता हूँ, किसी समय कोई कविता ठीक लगती है किसी और समय दूसरी. मेरे दोस्तों से पूछिए तो कहेंगे मेरी ज़्यादातर रचनाएँ अप्रिय रचनाएँ हैं. यह भी ठीक बात है. उन लोगों को जो पसन्द हैं - या सख़्त नापसंद हैं - वे कविताएँ हैं : बहनें, संस्कार, आयशा के लिए कुछ कविताएँ, पुश्तैनी तोप, दिल्ली दर्शन, कविता का जीवन, अप्रकाशित कविता, सामान की तलाश, आदि.


इन दिनों क्या नया लिख रहे हैं? और लेखन से इतर क्या, क्या करना पसंद है?

कुछ ख़ास नहीं. वही जो हमेशा से करता रहा हूँ. मेरी ज़्यादातर प्रेरणाएँ और मशग़ले साहित्यिक जीवन से बाहर के हैं, लेकिन मेरा दिल साहित्य में भी लगा रहता है. समाजविज्ञानों से सम्बद्ध विषयों पर "थ्री एसेज़" प्रकाशनगृह से किताबें छापने का काम करता हूँ. और अपना लिखना पढ़ना भी करता ही रहता हूँ. हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत, ख़ासकर ख़याल गायकी, सुनते हुए और विश्व सिनेमा देखते हुए एक उम्र गुज़ार दी है.


ऐसी साहित्यिक कृतियां जो पढ़ने के बाद ज़ेहन में दर्ज हो गयी हों? क्या खास था उनमें?

चलते चलते ऐसे सवाल नहीं पूछे जाते. मैं पुराना पाठक हूँ. जवाब देने बैठूँ तो बक़ौल शाइर - 'वो बदख़ू और मेरी दास्ताने-इश्क़ तूलानी / इबारत मुख़्तसर, क़ासिद भी घबरा जाए है मुझसे.' कुछ आयतें जो बचपन में रटी थीं और अन्तोन चेख़व की कहानी 'वान्का' जो मैंने किशोर उम्र में ही पढ़ ली थीं ज़ेहन में नक़्श हो गईं हैं. इसके बाद की फ़ेहरिस्त बहुत लम्बी है.


Friday, July 26, 2013

मनोहारी सिंह का साक्षात्कार – ६

(पिछली क़िस्त से आगे)


क्या आपने कभी हेमंत कुमार के साथ भी काम किया?

हां, मुझे उनके कुछ गानों में बांसुरी और मैन्डोलिन बजा चुके होने की याद है. दरअसल उनके एक बांग्ला गीत में मैंने क्लैरिनेट बजाया था.

आपने शंकर-जयकिशन के साथ कई बार काम किया. उनका अल्बम ‘जैज़ रागा’ किस बारे में था?

मेरा ख़याल है एच.एम.वी. ने जयकिशन से एक जैज़ अल्बम कम्पोज़ करने को कहा था. उन्होंने रईस खान, सुमंत राज, दिलीप नायक और मुझे इस अल्न्बम के लिए साथ काम करने को बुलावा भेजा.

उषा खन्ना, चित्रगुप्त, कल्याणजी-आनंदजी और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जैसे कम्पोज़र्स के साथ अपने समय को आप कैसे याद रखना चाहेंगे?

हां, मैंने इन सभी के साथ काम किया. इन प्रतिभावान लोगों के साथ काम करना शानदार था. मैंने रविन्द्र जैन के साथ भी काम किया और उनकी फ़िल्म ‘चोर मचाये शोर’ के लिए म्यूजिक अरेंजर का काम किया. हालांकि मैं उनके साथ काफ़ी काम नहीं कर पाया ... मैं और चीज़ों में व्यस्त हो गया था और रविन्द्र जैन का संगीत समय के साथ बदल गया था ...

आपने अपने एक पुराने इंटरव्यू में कहा था कि लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के कम्पोज़ किये ‘अमीर गरीब’ के गाने “मैं आया हूँ” का सैक्सोफोन पीस बजाना आपके लिए सबसे बड़ी चुनौती था...

हां, मैं इस बात को कहना चाहूँगा कि उस शानदार कम्पोजीशन में उस सैक्सोफोन पीस को बजा पाना बेहद संतुष्ट करनेवाला था. वह मेरे दिल के बेहद करीब हमेशा एक अमर कृति रहेगी.

बाद के कम्पोज़रों जैसे बप्पी लाहिरी, राजेश रोशन, हेमंत भोसले और राम-लक्ष्मण के बारे में कुछ बताइये.

मुझे इन सब के साथ काम करने में मज़ा आया है. सच बात तो यह है कि बप्पी लाहिरी के संगीत के लिए हम शुरुआती अरेंजर थे.

‘सदमा’ के लिए दक्षिण भारतीय उस्ताद इलियाराजा ने आर.डी. बर्मन के संगीतकारों को लिया था ...

मैंने उनके साथ भी काम किया – न सिर्फ़ ‘सदमा’ में बल्कि कुछेक तमिल फिल्मों में भी. मेरे लिए वे एक सम्पूर्ण संगीत निर्देशक रहे हैं जिन्हें हर साज़ की रेंज मालूम रहती है और उन साजों के लिए नोटेशंस लिखना भी उन्हें आता है. सचमुच वे एक महान संगीतकार हैं.

अपने समय के किन साथी संगीतकारों के लिए आपके मन में आदर का भाव है?

हमारे समय में एक से एक संगीतकार थे. उन सब के लिए मेरे भीतर बहुत आदर है – ट्रम्पेट पर जॉर्ज, गिटार पर भूपिंदर, और अकॉर्डियन पर केसरी लार्ड का नाम सबसे पहले जेहन में आ रहा है.

क्या आपके बच्चों में से किसी ने संगीत को चुना?

मेरा सबसे बड़ा बेटा वायोलिन बजाया करता था. छोटा वाला कीबोर्ड बजाता है. लेकिन वे हिन्दी फ़िल्म संगीत में कहीं नहीं पहुँच पाए.


Thursday, July 25, 2013

मनोहारी सिंह का साक्षात्कार – ५

(पिछली क़िस्त से आगे)


आप एस.डी. बर्मन के भी बहुत नज़दीकी थे. बर्मनदा की कम्पोजिंग की शैली कैसी थी? पंचम की शैली पर उनका कितना प्रभाव था?

दोनों की शैलियाँ बहुत अलग थीं. बर्मनदा पर लोकसंगीत और प्रकृति का गहरा असर था; हालांकि उन्होंने प्रकृति से प्रेरित अपने संगीत को नए रंग देने की कोशिश की. एक दफ़ा प्राकृतिक सूत बनाने में निकलने वाली आवाज़ से वे इतने प्रभावित हुए कि वे उन्हीं आवाज़ों को अपनी गीतों में इस्तेमाल करना चाहते थे.

पंचम की साउंड रेकॉर्डिंग की शानदार क्वालिटी का राज़ क्या था?

पंचम की साउंड रेकॉर्डिंग का गहरा ज्ञान था. वे सारे सेशंस में बैठा करते थे और बैलेंसिंग का काम भी किया करते थे. वांछित साउंड क्वालिटी पाने के लिए वे बहुत ज़्यादा मशक्कत करते थे.

सलिलदा और उनकी कम्पोज़ीशन्स के बारे में आप क्या कहना चाहेंगे?

सलिलदा भी एक महान आदमी थे. उन्हें संगीत का इतना ज्ञान था और इतनी ज़्यादा सूचनाएं. वे बहुत पढ़े-लिखे थे – दरअसल वे डबल ग्रेजुएट थे. वे बहुत उम्दा कहानीकार भी थी और मैं समझता हूँ उन्हें अपनी प्रतिभा के लिए कहीं ज़्यादा पहचान  मिलनी चाहिए थी ...

ओ.पी. नैयर के साथ भी आप लम्बे समय तक रहे. इस की शुरुआत कब और कैसे हुई?

अरेंजर सेबेस्टियन ने मुझे शंकर-जयकिशन की ‘जंगली’ के टाइटिल म्यूजिक और ‘प्रोफ़ेसर’ के लोकप्रिय गीत “आवाज़ देके हमें तुम बुलाओ” के लिए बजाने का प्रस्ताव दिया. हमारी गहरी छनती थी और मेरी वादन शैली के वे बड़े फैन थे. १९६० के दशक के शुरू में उन्होंने ही मुझे नैयर साहब से मिलवाया था.

एक कम्पोज़र के तौर पर आप नैयर साहब को कैसे देखते हैं?

नैयर साहब का संगीत सबसे ऊंचे रूमानी मेयार का था. हालांकि उनके संगीत में पंजाबी रंग खासा था पर मूलतः वह भारतीय संगीत था. उनका संगीत युवाओं के लिए तैयार किया गया था और वह हमेशा जवान बना रहेगा.
नैयर साहब अपने संगीतकारों से कितना प्यार करते थे, इस बारे में कई किस्से प्रचलित हैं. क्या सचमुच ऐसा था?

हाँ. वे सबके सामने अपने संगीतकारों की तारीफ़ करते हुए कहते थे “ये मेरे गहने हैं”. यही कोई तीन साल पहले उन्होंने मंच पर मुझे और केसरी लार्ड को याद करते हुए कहा “ये वो लोग हैं जिन्होंने मेरे संगीत को सजाया.” उनके मन में संगीतकारों के लिए गहरी संवेदना थी और वे हमेशा मानते थे कि उनकी सफलता के लिए वे बेहद अहम हैं.

रोशन और मदनमोहन जैसे कम्पोज़रों के साथ काम करने की आपकी क्या यादें हैं?

रोशन और मदनमोहन के साथ मैंने कई गानों में बजाया. दोनों की संगीत-शैलियाँ अलहदा थीं. दोनों ने उच्च कोटि का विशुद्ध भारतीय संगीत दिया. दोनों अपनी रचनाओं में ख़ास लेकिन छोटी छोटी चीज़ों को जगह देते थे जो उनके संगीत को परिभाषित करती थीं.

आपने रवि और चित्रगुप्त के साथ भी काम किया ...

इनके साथ भी मैंने ख़ूब काम किया. ‘वक़्त’ का गाना “आगे भी जाने न तू” उन दिनों खासा लोकप्रिय हुआ था. मैंने एन. दत्ता के लिए भी संगीत अरेंज किया था हालांकि मुझे किसी फ़िल्म का नाम याद नहीं आ रहा.


(जारी, अगली क़िस्त में समाप्य)     

Wednesday, July 24, 2013

मनोहारी सिंह का साक्षात्कार – ४


(पिछली क़िस्त से आगे)

बाद में आपने बासुदा से साथ टीम बनाई और ‘सबसे बड़ा रुपैय्या’ और ‘चटपटी’ जैसी फिल्मों का संगीत किया. एक कम्पोज़र, अरेंजर और असिस्टेंट म्यूजिक डायरेक्टर के बीच क्या अंतर है?

कम्पोजर गाने का पूरा स्केच तैयार करता है; यानी उसका पूरा कैनवास. असिस्टेंट्स अपने अपने हिस्से की मदद मुहैय्या करते हैं. संगीत निर्माण के वक़्त जो सिटिंग टीम होती है, उसका वे हिस्सा होते हैं. अरेंजर का काम होता है नोटेशन लिखना और गाने को एक संरचना देने के लिए ज़रूरी तत्व जोड़ना. आप कह सकते हैं कि वह गीत का सज्जाकार होता है. प्रभावी रूप से सारे के सारे किसी रचनात्मक काम में लगे रहते हैं और सभी को कम्पोज़र कहा जा सकता है.

आर.डी. बर्मन के साथ आपका लम्बा जुड़ाव क्या उनकी पहली फ़िल्म ‘छोटे नवाब’ से शुरू हुआ था?

नहीं, ‘छोटे नवाब’ में मैंने बांसुरी और सैक्सोफोन बजाये थे. लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल उसके अरेंजर थे. पंचम की दूसरी फ़िल्म ‘भूत बंगला’ से मैंने अरेंजर के तौर पर अपनी पारी शुरू की. हालांकि लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल फ़िल्म के आधिकारिक अरेंजर थे, मैंने टाइटिल सांग के लिए संगीत अरेंज किया था.

पंचम के साथ आपकी ट्यूनिंग इतनी ख़ास किस वजह से बन सकी?

पंचम मुझे एक प्रतिभावान और जानकार संगीतकार मानते थे. मुझे पा लेने की उन्हें ख़ुशी थी. और हमने क्या बेहतरीन टीम तैयार की – मारुती राव, बासु, मैं, केसरी लार्ड, भूपिंदर सिंह, देवीचंद चौहान, भानु गुप्ता, टोनी वाज़, होमी मुल्लन, सुनील कौशिक, रमेश अय्यर, रंजीत गाजमेर और बाकी. अधिकतर सिटिंग्स में हम सब साथ होते थे.  

पंचम गाने कैसे बनाते थे?

गानों की सिचुएशन्स के लिए हम सिटिंग्स किया करते थे. निर्देशक सिचुएशन समझा दिया करते थे – रोमांस, डांस, कैबरे वगैरह; हम ज़रुरत के हिसाब से संगीत तैयार करते थे. यह मेरे एच.एम.वी.. सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा और नाईट-क्लबों में हासिल किया गया अनुभव था कि मैं अलग अलग सिचुएशन के गाने के लिए कुछ न कुछ अर्थपूर्ण तत्व जोड़ पाता था. जाने-माने संगीतकार और अरेंजर केसरी लार्ड आज भी याद करते हैं कि नाईट-क्लबों का मेरा लम्बा अनुभव किस तरह अरेंजिंग के मेरे कौशल को, खासतौर पर ब्रास सैक्शन में, पैना बनाता था.    

पंचम की कम्पोजीशन की शैली के बारे में आप क्या सोचते हैं? एक कम्पोज़र के तौर पर उनकी क्या ताकतें थीं?

पंचम एक अच्छे प्रतिभावान कम्पोज़र थे. उन्होंने कितनी महान धुनें बनाईं. उनके भीतर एक ख़ास कम्पोजिंग प्रतिभा थी. वे अपनी गानों में हमेशा कुछ नया करना चाहते थे. वे सुनिश्चित करते थे कि उनके गानों में उनका ट्रेडमार्क पंचम “पंच” होना चाहिए. मिसाल के लिए मादल के एक नोट का इस्तेमाल या गाने में सीटी का एक टुकड़ा या या अलग अलग धुनों के पैटर्नों को आपस में गूंथ देना एक गाने के लिए तीन या चार तबले ... ये सब उनके आइडिया होते थे!  साथ ही उनकी धुनें भी शानदार होती थी. मुझे कहना नहीं चाहिए पर कुछ कम्पोजर पंचम पर ‘वेस्टर्न’ होने का ग़लत ठप्पा लगाते थे जो ठीक नहीं था. पूरी तरह से भारतीय गीत रचने में भी उन्हें वैसी ही महारत हासिल थी. आप ‘अमर प्रेम’, ‘आंधी’ या ‘महबूबा’ (“मेरे नैना सावन भादों”) जैसी फिल्मों के गीत देखिये. यह कहने का किसी को हक़ नहीं कि वे ‘वेस्टर्न’ कम्पोज़र थे. आज सारी इंडस्ट्री उनसे प्रेरणा लेती है. यह दिखाता है कि वे अपने समय से बीस साल आगे के आदमी थे. और सबसे बड़ी बात यह है कि उनके गाने आज भी वैसे ही ताज़गीभरे हैं.    

 (जारी)     


Tuesday, July 23, 2013

मनोहारी सिंह का साक्षात्कार – ३

(पिछली क़िस्त से आगे)


उन दिनों आप म्यूजिक अरेंजिंग का काम भी कर रहे थे?

‘इंसान जाग उठा’ के बाद मैं बासु चटर्जी के साथ एस. डी. बर्मन का आधिकारिक अरेंजर बन गया. हाँ धुनें बर्मनदा ही बनाया करते थे. साथ साथ मैंने ‘सोलवां साल’ ‘बात एक रात की’ और १९६५ की लैंडमार्क फ़िल्म ‘गाइड’ का संगीत भी अरेंज किया.

क्या लक्ष्मीकांत और प्यारेलाल बर्मनदा की टीम के नियमित संगीतकार थे?

लक्ष्मीकांत थे. प्यारेलाल कभी कभी टीम का हिस्सा बनते थे. मुझे एक घटना अब तक याद है. ‘माया’ फ़िल्म में सलिलदा के गीत ‘जा रे उड़ जा रे पंछी’ में मेरे बांसुरी और सैक्सोफोन पीसेज सुनने के बाद प्यारेलाल जी ने मुझे सौ रूपये का नोट दिया था. ख़ुद प्यारेलाल उस गीत में ग्रुप वायोलिनिस्ट के तौर पर शामिल थे.

आपने जयदेव जी का ज़िक्र किया था. एस. डी. बर्मन के सहायक के रूप में उनकी क्या भूमिका होती थी?

वे अन्य संगीतकारों जैसे सुमंत राज, लक्ष्मीकांत और पंचम के साथ संगीत निर्माण में सहयोग दिया करते थे

‘काला बाज़ार’ का गीत “न मैं धन चाहूं” मुझे काफ़ी कुछ जयदेव जी का बनाया लगता है ...

आप सही कह रहे हैं. गीत की धुन और कम्पोजीशन दोनों जयदेव जी के थे. उनकी धुनों को हम ‘जलेबी’ कहा करते थे क्योंकि उनमें इतने सारे घुमाव और मोड़ होते थे. लेकिन वे क्या शानदार संगीतकार थे! बेहतरीन!

एक साधारण श्रोता के लिए हमें बताइये कि सैक्सोफोन में ऑल्टो, टेनर और सोप्रानो के बीच क्या फर्क है.

ऑल्टो का इस्तेमाल धुन को भिगोने लिए होता है. सोप्रानो ऑल्टो से एक ओक्टेव ऊंचा होता है जबकि टेनर एक ओक्टेव नीचे. सोप्रानो सैक्सोफोन आमतौर पर सीधे होते हैं लेकिन कभी कभार उनकी गर्दन तनिक मुड़ी हुई होती है. ऑल्टो सैक्सोफोन छोटे और हलके होते हैं जबकि टेनर सैक्सोफोन बड़े और भारी. टेनर सैक्सोफोन की आवाज़ गहरी और भारी होती है. हालांकि तीनों का इस्तेमाल मैलोडी इंस्ट्रूमेंट्स की तरह होता है, उन्हें संगीत की वांछित रेंज के हिसाब से छांटा जाता है खासतौर पर जैज़ में. तीनों का इस्तेमाल सोलो पीसेज बजाने में भी किया जा सकता है.

क्या आप तीनों को बजाते थे?

हाँ, शुरू में. ‘शोले’ के “महबूबा महबूबा” और ‘रॉकी’ के “क्या यही प्यार है” जैसे गानों में आप मेरा सोप्रानो सैक्सोफोन सुन सकते हैं. उन दिनों मैं मुख्य सोप्रानो सैक्सोफोन प्लेयर हुआ करता था. अब मैं ज़्यादातर ऑल्टो सैक्सोफोन बजाता हूँ. पिछले कई सालों से श्यामराज एक उस्ताद टेनर सैक्सोफोन वादक हैं

क्या ट्रौमबोन, ट्रम्पेट और सैक्सोफोन आपस में बहुत ज़्यादा फर्क होते हैं?

हाँ, उनसे निकलने वाली आवाज़ें फर्क होती हैं. सलिलदा इन वाद्यों का शानदार इस्तेमाल करते थे; वे इन्हें सोलो इंस्ट्रूमेंट्स के तौर पर बरतते थे. मिसाल के लिए आप ‘आनंद’ के “ज़िन्दगी कैसी है पहेली” में ट्रम्पेट की आवाज़ और ‘माया’ के “जा रे उड़ जा रे पंछी” के सैक्सोफोन की आवाज़ का अंतर पकड़ सकते हैं.

 (जारी)     


Wednesday, January 9, 2013

आपकी विषयवस्तु में दम है तो नामचीनों की चुप्पी के बावजूद अपनी जगह बना लेंगे


अनिल का यह इंटरव्यू कुछ समय पहले ‘तहलका’ में शाया हुआ था. तब यहाँ लगाने की सोचते सोचते जाने कैसे रह गया. खैर ... अब लगा दे रहा हूँ. फॉर द रेकॉर्ड ...


अनिल यादव पेशे से पत्रकार हैं और प्रवृत्ति से घुमक्कड़ लेखक. उनकी हालिया प्रकाशित किताब वह भी कोई देस है महाराजपूर्वोत्तर पर केंद्रित एक यात्रा वृत्तांत है. इसमें देश के ऐसे भूभाग की बातें और समस्याएं हैं जो हिंदी पट्टी और देश के दूसरे हिस्सों के लिए अब भी अबूझ पहेली की तरह हैं. किताब के जरिए अनिल अपने साथ पाठकों को भी सुदूर पूर्वोत्तर की सैर कराते हैं. विकास कुमार की उनसे बातचीत.

आम तौर पर कहा जाता है कि भारत सरकार और पूर्वोत्तर के बीच संवादहीनता है. क्या संवादहीनता केवल सरकारी स्तर पर है? क्या साहित्य और पत्रकारिता के स्तर पर कोई संवादहीनता नहीं है

पूर्वोत्तर से जो भी संवाद है वह सरकारी ही है या फिर व्यापारियों ने बना रखा है. अगर वहां सरकार की भेजी फौजें, किसिम-किसिम के दफ्तर, आयोग और हजारों कर्मचारी न होते तो यह अलगाव और भी गहरा होता. लेकिन यह सिलसिला बहुत फूहड़ है क्योंकि वहां उग्रवाद और आदिवासियों की अन्य जटिल समस्याओं को हल करने का जिम्मा जिन बड़े अफसरों पर है वे पूर्वोत्तर को पिकनिक की जगह समझते हैं जहां जंगली रहते हैं जो उनके स्वागत में नाचने चले आते हैं. वहां के बहुत-से लोगों की तरह अरुणाचल के मुख्यमंत्री गेगांग अपांग की बहू आद्री ने भी एक मुलाकात में व्यंग्य करते हुए मुझसे पूछा था, ‘आप क्या समझते थे मैं घर में नहीं पेड़ पर बैठी मिलूंगी.जबकि वह औरत दिल्ली में पढ़ाई और उत्तर प्रदेश में भंगियों पर रिसर्च करके गई थी. दिल्ली के अफसरों ने वहां दलालों, ठेकेदारों और भ्रष्ट अफसरों का एक विशाल तंत्र विकसित किया है जो आदिवासियों को उन्हीं की नजर से देखता है. सरकार की नजर में वहां की हर समस्या का समाधान या तो दमन है या पैसे बांटना है. माफ कीजिएगा, मीडिया और साहित्य से आप कुछ ज्यादा ही उम्मीद लगाए बैठे हैं जबकि दोनों ही हाइली लोकलाइज्ड धंधे हैं. उन्हें पूर्वोत्तर या किसी और जगह के आम लोगों से क्या लेना-देना. मीडिया ने पूर्वोत्तर को सदा से ब्लैक आउट कर रखा है. कोकराझार और दूसरे बोडो इलाकों में आदिवासियों और मैमनसिंघिया मुसलमानों के बीच मारकाट को जरा तवज्जो इसलिए मिल गई कि उसकी प्रतिक्रिया मुंबई और लखनऊ जैसी रेवेन्यू देने वाली जगहों में होने लगी थी. और रही बात हिंदी साहित्य की तो इन दिनों उसकी सबसे बड़ी समस्या पुरस्कार, अफसर लेखक का ट्रांसफर, बच्चे का इम्तिहान और मिडिल क्लास का सड़ियल प्रेम है. हरिश्चंद्र चंदोला की नागा कथा के कुछ अंशों के कई साल पहले हंस में छपने को छोड़ दें तो लोगों की समस्याओं पर प्रामाणिक ढंग से किसी साहित्यिक पत्रिका में कुछ नहीं छपा है. अब हिंदी का लेखक अपने चरित्रों के भी पास नहीं जाता. लेखक चाहता है कि पात्र खुद आएं और उसके पैरों पर गिर कर अपना हाल बता जाएं.   

पूर्वोत्तर से हिंदीभाषियों  के खिलाफ हिंसा की खबरें आती रहती हैं. आखिर इस इलाके में हिंदीभाषियों के लिए इतनी नफरत  क्यों है?

वहां अलगाव की राजनीति करने वाले लोग चुनावी फायदे के लिए हिंदी बोलने वाले आदमी को इंडिया के प्रतिनिधि के रूप में रंग देते हैं और वह अंधी हिंसा का शिकार बन जाता है. इंडिया शब्द वहां देशप्रेम नहीं दमन और भेदभाव की स्मृति जगाता है. लेकिन इससे भी बड़ा मसला जीने के संसाधनों पर कब्जे का है. पहले असम में जमीन बहुत ज्यादा थी और आबादी कम. तब सबका स्वागत था. लेकिन अब सीमित संसाधनों पर दखल के लिए असमिया, बोडो, मिरी, हिंदीभाषी और बांग्लादेशी मुसलमान सभी जूझ रहे हैं और खूनखराबा जारी है. राजनेता इस जटिल प्रश्न को हल करने के बजाय नफरत को सत्ता पाने की सीढ़ी की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं.

क्या आप पूर्वोत्तर की यात्रा पर निकलते समय ही यह तय कर चुके थे कि इस यात्रा संस्मरण को एक किताब की शक्ल में लाएंगे?

नहीं, जाते समय सिर्फ रिपोर्टिंग का इरादा था. किताब के बारे में सोचना उन दिनों की मनःस्थिति में मुमकिन नहीं था. मेरे दोस्त पंकज श्रीवास्तव (जो इन दिनों एक हिंदी समाचार चैनल में हैं) ने यह कह कर एक डायरी जरूर दी थी कि लौटने के बाद वहां के संस्मरणों को दोस्तों के बीच सुना जाएगा. लेकिन लौटते ही मैं प्रेम में पड़ गया. कुछ दिन बनारस में नौकरी की, फिर आदिवासी नायकों पर कामिक्स लिखने, बिरसा मुंडा पर फिल्म बनाने और एक ट्राइबल म्यूजियम बनाने की एक महत्वाकांक्षी योजना पर मुग्ध होकर झारखंड में भटकने लगा जो बुरी तरह फ्लाप हुई. फिर अचानक लखनऊ में घर बस गया. मैं पूर्वोत्तर को एकदम भूल गया. वह तो सेंटर फॉर साइंस एंड इनवायरनमेंट की रिपोर्टिंग फेलोशिप के कारण अरुणाचल का एक और लंबा चक्कर लगा कर लौटने के बाद 2005 में मुद्राराक्षस ने लखनऊ से एक पत्रिका निकाली जिसके लिए यह संस्मरण लिखना शुरू किया. उन्होंने झक में चार अंक बाद पत्रिका बंद कर दी. मैंने लिखना बंद कर दिया. तब से वही पत्रिकाओं, अखबारों, ब्लागों में यदा-कदा छपता रहा और कोई न कोई पाठक या दोस्त कहता रहा कि इसे किताब की शक्ल में आना चाहिए. जब अंतिका प्रकाशन के गौरीनाथ पीछे पड़ गए तब इतने साल बाद मैंने पूर्वोत्तर में पहने कपड़ों, वहां के नक्शों, डायरियों, स्केचों, चिट्ठियों, तस्वीरों, जुटाए गए दस्तावेजों से भरा झोला खोला और उस यात्रा को रिकंस्ट्रक्ट किया. सच कहूं तो यह गौरीनाथ और मेरे बच्चे टीपू की किताब है. वे दोनों न होते तो यह कभी न लिखी जाती. मैं छपने न छपने से उदासीन हो चुका था.   

आपने बताया कि आपने एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में झारखंड की भी यात्रा की है. क्या इस इलाके के बारे में भी कुछ लिखेंगे?

झारखंड तो मैं एक साल रह गया. इसके अलावा मैं पंजाब, हिमाचल और दक्षिण के छोटे कस्बों और गांवों में भी कुछ वक्त बाइक से बेमकसद भटका हूं. लेकिन अब मैं कुछ ठोसशोधपरक काम करना चाहता हूं. ऐसी जगहें जहां सरकार, लोकतंत्र, विकास वगैरह लगभग अनुपस्थित हैं, जहां बस आदमी है और निर्मम प्रकृति है वहां लोग कैसे जीते हैं, इस बारे में लिखना चाहता हूं. मसलन तिब्बत के भीतरी हिस्सों के बारे में रहस्य की जो कहानियां हैं वे मुझे उकसाती हैं. जानना चाहता हूं कि मध्य प्रदेश के अबूझमाड़ के जंगल के भीतर आदिवासी और नक्सली कैसे रहते हैं या एक समुद्री मछुआरे का जीवन कैसा होता है. अगली यात्रा पुस्तक का अस्तित्व मेरे पास संसाधनों के होने न होने पर निर्भर है. हो सकता है मेरी अपनी शर्तों पर कोई प्रायोजक भी मिल जाए.   

पूर्वोत्तर को लेकर अज्ञेय का भी काफी महत्वपूर्ण काम रहा है. उनके काम को किस तरह से देखते हैं?

अज्ञेय के यात्रा वृत्तांत मैं पहले पढ़ चुका था. लेकिन वे कहानियां जो पूर्वोत्तर में घटित होती हैं, मैंने इस यात्रा के दौरान ही पढ़ीं. उनमें भारत और फौज के प्रति असंतोष की ध्वनि है. लेकिन तब से अब के बीच ब्रह्मपुत्र में काफी पानी और खून बह चुका है. अब हर आदिवासी समुदाय की अपनी एक साहित्य सभा है जो उनकी बोली की लिपि बना रही है और एक गुरिल्ला संगठन है जो एक अलग राज्य या देश मांग रहा है. साथ ही उनके गुस्से के ढेरों आदिवासी राजनीतिक सौदागर हैं. लेकिन अज्ञेय के काम और बहुआयामी व्यक्तित्व की हमने क्या कद्र की? हिंदी के गोष्ठीबाजों ने उन्हें रिड्यूस कर एक साहित्यिक गिरोह के नेता और कलावादी के रूप में नई पीढ़ी को पहचनवाया. मुझे लगता है कि हिंदी के पास अज्ञेय के रूप में एक अपना रवींद्र नाथ टैगोर था. हमने उसे नहीं पहचाना और खो दिया.

हिंदी साहित्य का कोई भी नामचीन समीक्षक इस किताब के बारे में कुछ भी लिख-बोल नहीं रहा है.

हिंदी के दो बड़े लेखकों स्वयं प्रकाश और ज्ञानरंजन ने इस किताब की समीक्षा की है. टीवी और प्रिंट के कुछ अच्छे पत्रकारों ने भी रिव्यू किया है इसलिए यह कहना कि कोई लिख-बोल नहीं रहा है, ठीक नहीं होगा. दूसरी बात, मैं नितांत निजी वजहों से लिखता हूं इसलिए आलोचकों, समीक्षकों की परवाह नहीं करता और उनसे किसी प्रकार की अपेक्षा नहीं रखता. मुझे लगता है कि लेखक जरा उपेक्षित और गुमनाम रहकर ही अच्छा काम कर सकता है. उपेक्षा मेरे भीतर की आग को लहकाने का काम करती है. ज्यादा नामवरी किसी भी लेखक के लिए फंदा है जो फंसा कर अपनी कीमत अंततः वसूल ही लेती है. आलोचना अब रचना को विश्लेषित करने के बजाय चमचे और विपुल मात्रा में घटिया साहित्य निर्मित करने का जरिया बन रही है. हिंदी का सबसे बड़ा आलोचक सबसे बड़ा जोकर बन चुका है. असल बात यह है कि यदि आपकी विषयवस्तु में दम है तो नामचीनों की चुप्पी के बावजूद अपनी जगह बना लेंगे. नहीं तो कितनी भी शुरुआती हाइप बना लें फुस्स हो जाएंगे.

(http://www.tehelkahindi.com से साभार.)