Showing posts with label पॉल एलुआर. Show all posts
Showing posts with label पॉल एलुआर. Show all posts

Monday, March 23, 2015

उन्होंने शवों को सलामी दी, उन्होंने एक दूसरे पर शिष्टाचारों का ढेर लगाया

पिकासो की 'गुएर्निका'
नोट- स्पानी गृहयुद्ध के दौरान २६ अप्रैल १९३७ को स्पेन के बास्के काउंटी के एक गाँव गुएर्निका पर जर्मन और इतालवी हवाई जहाज़ों ने स्पानी राष्ट्रवादी शक्तियों के उकसावे पर बमबारी की थी. आधुनिक सैन्य इतिहास में निहत्थे नागरिकों पर की गयी यह पहली बमबारी थी. सरकारी आंकड़ों के हिसाब से १६५४ लोगों की जान गई और कई घायल हुए. पिकासो की मशहूर पेंटिंग गुएर्निका इसी घटना की गवाह है जैसे पॉल एलुआर की यह कविता.

गुएर्निका के खंडहर

गुएर्निका की जीत

१.
भला संसार मांद,
खदान और खेत का.

२.
जलाए जाने के लिए दुरुस्त चेहरे बर्फीले जमाए जाने के लिए दुरुस्त
खंडित किये जाने लिए अँधेरे के लिए तोहमत की चोटों के लिए.

३.
किसी भी चीज़ के लिए दुरुस्त चेहरे
यहाँ ख़ालीपन है जो घूरता है तुम्हें
तुम्हारी मौत हमारे लिए मिसाल का काम करेगी.

४.
मौत एक हताश दिल.

५.
वे तुमसे दाम वसूलते हैं रोटी का
सूरज धरती पानी नींद का
और तुम्हारी जिन्दगानियों की
ग़रीबी का.

६.
उन्होंने कहा वे चाहते हैं बेहतर रिश्ते
उन्होंने राशनिंग की शक्तिशालियों ने पागलों पर फ़ैसले सुनाये
उन्होंने भीख दी एक पैसे को तोड़ा दो हिस्सों में   
उन्होंने शवों को सलामी दी
उन्होंने एक दूसरे पर शिष्टाचारों का ढेर लगाया

७.
उन्होंने मशक्कत की वे ज़रुरत से ज़्यादा करते हैं इसे वे नहीं हैं हम जैसे

८.
स्त्रियों और बच्चों के पास वही दौलतें हैं
हरी पत्तियों वसंत और निखालिस दूध की
और
सहनशक्ति की
उनकी साफ़ सुथरी आँखों में.

९.
स्त्रियों और बच्चों के पास वही दौलतें हैं
उनकी आँखों में.
पुरुष उनकी रक्षा करते हैं जितना कर सकते हैं.

१०.
स्त्रियों और बच्चों के पास वही लाल ग़ुलाब हैं
उनकी आँखों में.
उनमें से हरेक दिखलाता है अपना रक्त.

११.
जीने का और मरने का डर और साहस
मौत इतनी मुश्किल और इतनी आसान.

१२.
पुरुष जिनके वास्ते इस दौलत की प्रशस्तियाँ गाई गईं
पुरुष जिनके वास्ते इस दौलत को नापाक बनाया गया.

१३.
सच्चे लोगो, जिनके लिए हताशा
उम्मीद की लपटभरी आग को भोजन देती है
आओ मिलकर खोलते हैं भविष्य की आखिरी कोंपल को.

१४.
बहिष्कृत मौत मैदान वीभत्स नज़ारा
हमारे दुश्मनों का सब पर है
हमारी रात का धुंधला रंग
उन सब के बावजूद फ़तह हमारी होगी.

१९३७

Thursday, November 7, 2013

उन सब के बावजूद फ़तह हमारी होगी - पॉल एलुआर की कवितायेँ - ७

पिकासो की 'गुएर्निका'
नोट- स्पानी गृहयुद्ध के दौरान २६ अप्रैल १९३७ को स्पेन के बास्के काउंटी के एक गाँव गुएर्निका पर जर्मन और इतालवी हवाई जहाज़ों ने स्पानी राष्ट्रवादी शक्तियों के उकसावे पर बमबारी की थी. आधुनिक सैन्य इतिहास में निहत्थे नागरिकों पर की गयी यह पहली बमबारी थी. सरकारी आंकड़ों के हिसाब से १६५४ लोगों की जान गई और कई घायल हुए. पिकासो की मशहूर पेंटिंग गुएर्निका इसी घटना की गवाह है जैसे एलुआर की यह कविता.

गुएर्निका के खंडहर

गुएर्निका की जीत

१.
भला संसार मांद,
खदान और खेत का.

२.
जलाए जाने के लिए दुरुस्त चेहरे बर्फीले जमाए जाने के लिए दुरुस्त
खंडित किये जाने लिए अँधेरे के लिए तोहमत की चोटों के लिए.

३.
किसी भी चीज़ के लिए दुरुस्त चेहरे
यहाँ ख़ालीपन है जो घूरता है तुम्हें
तुम्हारी मौत हमारे लिए मिसाल का काम करेगी.

४.
मौत एक हताश दिल.

५.
वे तुमसे दाम वसूलते हैं रोटी का
सूरज धरती पानी नींद का
और तुम्हारी जिन्दगानियों की
ग़रीबी का.

६.
उन्होंने कहा वे चाहते हैं बेहतर रिश्ते
उन्होंने राशनिंग की शक्तिशालियों ने पागलों पर फ़ैसले सुनाये
उन्होंने भीख दी एक पैसे को तोड़ा दो हिस्सों में   
उन्होंने शवों को सलामी दी
उन्होंने एक दूसरे पर शिष्टाचारों का ढेर लगाया

७.
उन्होंने मशक्कत की वे ज़रुरत से ज़्यादा करते हैं इसे वे नहीं हैं हम जैसे

८.
स्त्रियों और बच्चों के पास वही दौलतें हैं
हरी पत्तियों वसंत और निखालिस दूध की
और
सहनशक्ति की
उनकी साफ़ सुथरी आँखों में.

९.
स्त्रियों और बच्चों के पास वही दौलतें हैं
उनकी आँखों में.
पुरुष उनकी रक्षा करते हैं जितना कर सकते हैं.

१०.
स्त्रियों और बच्चों के पास वही लाल ग़ुलाब हैं
उनकी आँखों में.
उनमें से हरेक दिखलाता है अपना रक्त.

११.
जीने का और मरने का डर और साहस
मौत इतनी मुश्किल और इतनी आसान.

१२.
पुरुष जिनके वास्ते इस दौलत की प्रशस्तियाँ गाई गईं
पुरुष जिनके वास्ते इस दौलत को नापाक बनाया गया.

१३.
सच्चे लोगो, जिनके लिए हताशा
उम्मीद की लपटभरी आग को भोजन देती है
आओ मिलकर खोलते हैं भविष्य की आखिरी कोंपल को.

१४.
बहिष्कृत मौत मैदान वीभत्स नज़ारा
हमारे दुश्मनों का सब पर है
हमारी रात का धुंधला रंग
उन सब के बावजूद फ़तह हमारी होगी.

१९३७

Wednesday, November 6, 2013

तुम्हारी उन आँखों ने संकेत बना दिए हैं सड़कों पर - पॉल एलुआर की कविताएँ - ६


नहीं जाना जा सकता मुझे

-पॉल एलुआर

नहीं जाना जा सकता मुझे
जितना तुम जानती हो मुझे, उस से ज़्यादा
तुम्हारी आँखें जिनमें हम सोया करते हैं
हमने मिलकर
निर्माण किया है एक बेहतर नियति का
मेरे पौरुष के उल्लास के लिए
बजाय हस्बे-मामूल आने वाली रातों के
जिनमें यात्रा करता हूँ में
तुम्हारी उन आँखों ने संकेत बना दिए हैं सड़कों पर  
जिनका अर्थ बाकी धरती के लिए अजनबी
तुम्हारी आँखों में जो खोलती हैं हमारे आगे
हमारा अंतहीन एकाकीपन
वे नहीं रहीं जो वे अपने को समझती थीं
नहीं जाना जा सकता तुम्हें
जितना मैं जानता हूँ तुम्हें, उस से ज़्यादा.

Saturday, November 2, 2013

हर चेहरे को अधिकार होगा चुम्बन का – पॉल एलुआर की कविताएँ – ५



उम्मीद की बहनें

अरी साहसी स्त्रियो
तुमने उठाया एक कौल मौत के ख़िलाफ़
सारी अच्छाइयों को जोड़ते हुए सारी मोहब्बतों की
अरी मेरी फ़तहयाब बहनो
तुमने दांव पर लगा दिए अपने जीवन
ताकि जीत जीवन हो की
नज़दीक है वह दिन, मेरी शानदार बहनो
जब हम सब युद्ध और दर्द जैसे शब्दों पर हंसेंगे
और कुछ भी नहीं बचेगा उसका जो दर्द हुआ करता था
हर चेहरे को अधिकार होगा चुम्बन का.


१९३६ 

Monday, October 21, 2013

हम भूल गए शरद को और हम भूल जाएंगे अपने मालिकों को - पॉल एलुआर की कवितायेँ - ४


नवम्बर १९३६

देखो काम कर रहे हैं खंडहर निर्माता
वे रईस हैं, धैर्यवान, चुस्त, काले और बदसूरत
लेकिन धरती पर अकेले बने रहने के लिए वे हर तरकीब करते हैं
आदमी से अलग-थलग, वे धूल का ढेर लगा देते हैं आदमी के ऊपर
तोड़ मोड़ कर कोठियों को चौरस बना देते हैं वे बगैर सोचे.

आपको हर चीज़ की आदत पड़ जाती है
सिवा इन भारी चिड़ियों के
सिवा चमकीली चीज़ों के लिए उनकी नफ़रत के
सिवा उनके लिए रास्ता बनाने के.

आसमान की बातें करो तो ख़ुद को खाली कर देता है आसमान
शरद का कोई ख़ास मतलब नहीं
हमारे मालिकों ने अपने पैर पटके
हम भूल गए शरद को
और हम भूल जाएंगे अपने मालिकों को.

ख़त्म होता हुआ एक शहर, बख्श दी गयी पानी की एक बूँद से बना एक समुन्दर
खुली धूप में तराशे गए एक हीरे से बना
मैड्रिड एक परिचित शहर उनके लिए जिन्होंने यातनाएं भोगीं
इस भयानक आशीर्वाद से जिसमें एक मिसाल तक पर पाबंदी
वे जिन्होंने यातनाएं भोगीं   
उस अत्याचार से जिसकी इस आशीर्वाद की चमक को ज़रूरत है.

लौटने दो मुंह को अपने सच की तरफ
किसी टूटी ज़ंजीर की तरह फुसफुसाओ एक दुर्लभ मुस्कान
पाने दो आदमी को निजात उसके बेमतलब बीते समय से
उठने दो अपने भाई के सामने उसे दोस्ताना चेहरे के साथ
और दो उसे विवेक के आवारागर्द डैने.


१९३६

Sunday, October 20, 2013

एक स्पेनिश चरवाहे के लिए समाधिलेख - पॉल एलुआर की कवितायेँ - ३


एक स्पेनिश चरवाहे के लिए समाधिलेख

जनरल फ्रान्को ने भर्ती किया मुझे
और मैं बन गया एक अभागा सिपाही.
मैं मैदान छोड़ कर नहीं भागा था,
मैं डरा हुआ था, समझ रहे हैं न, वे मुझे गोली मार देते वर्ना.
मैं डरा हुआ था, और इसी वजह से, सेना में,
मैं लड़ा किया स्वाधीनता और न्याय के ख़िलाफ़,
ईरून की दीवारों के साये में.
लेकिन मौत आ ही पहुँची मुझ तक फिर भी.


१९३६

अस्तित्व

मेरी भवें - समर्पण किया हुआ एक झंडा,
जब अकेला होता हूँ
धकेलता हूँ तुम्हें अपने हाथों से ठंडी गलियों में,
अँधेरे कमरों में.
रोता हुआ अपनी इच्छाएँ.
नहीं छोडूंगा उन्हें -
तुम्हारे पेचीदा निर्भार हाथों को
जो जन्मे मेरे ख़ुद अपने के काले पड़ गए आईने में.
बाकी सब शानदार है.
बाक़ी सब कुछ अब भी
जीवन से ज़्यादा व्यर्थ.  
अपनी परछाईं के तले की धरती को खोदो -
तुम्हारी छातियों के नज़दीक पानी की एक चादर
जहां डूब सकता हूँ मैं
एक पत्थर की तरह.

१९३६

Saturday, October 19, 2013

उसके सपने भाप बना कर उड़ा देते हैं सूरज को - पॉल एलुआर की कवितायेँ - २


सच की वस्त्रहीनता

जानता हूँ अच्छे से.
पंख नहीं होते दुःख के,
प्रेम के भी नहीं,
न चेहरा कोई:
वे बोलते नहीं
न उनमें कोई हलचल,
नहीं देखता टकटकी लगाए उन्हें मैं
मैं बोलता नहीं उनसे,
लेकिन मैं अपने प्रेम और दुःख की तरह वास्तविक हूँ.

१९२४




प्रेम में स्त्री

वह खड़ी है मेरी आँखों पर
और उसके बाल मेरे बालों में;
उसकी आकृति है मेरे हाथों की
और रंग मेरी दृष्टि का.
वह निगल ली जाती है मेरी परछाईं में
जैसे आसमान के सामने पत्थर.
वह अपनी आँखें बंद नहीं करेगी कभी
न कभी सोने देगी मुझे;
और दिन की भरपूर रोशनी में उसके सपने
भाप बना कर उड़ा देते हैं सूरज को,
मुझे हंसाओ और रुलाओ और हंसाओ,
बोलना तब जब मेरे पास कुछ न बचे बोलने को.

१९२४



एक नई रात को

स्त्री जिसके साथ मैं जिया हूँ,
स्त्री जिसके साथ मैं जीता हूँ,
स्त्री जिसके साथ मैं जियूँगा;
हमेशा वही वही स्त्री,
लाल होना चाहिए तुम्हारा लबादा,
लाल दस्ताने, एक लाल मुखौटा,
और काली स्टॉकिंग्स:
वजहें, सबूत
अनावृत्त देखने को तुम्हें
बेदाग़ अनावृत्तता, ओ सजीली पोशाक!
छातियाँ, ओ मेरे दिल!


१९३२