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Sunday, January 17, 2016

लोकप्रियता और सार्थकता के बीच की दीवार तोड़ने वाला इकलौता कवि - वीरेन डंगवाल पर विष्णु खरे

एक पुरानी याद.
लूकरगंज, इलाहाबाद में बड़े बेटे तुर्की (प्रशान्त) के साथ वीरेन डंगवाल.
फ़ोटो - वीना और रंजना डंगवाल के सौजन्य से

हमारे ज़माने एक अद्वितीय बड़ा कवि
- विष्णु खरे
  
वीरेन डंगवाल (5.8.1947,कीर्ति नगर,टिहरी गढ़वाल – 27.9.2015, बरेली,उ.प्र.) हिंदी कवियों की उस पीढ़ी के अद्वितीय, शीर्षस्थ हस्ताक्षर माने जाएँगे  जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जन्मी और सुमित्रानंदन पन्त के बाद 'पहाड़' या उत्तरांचल के सबसे बड़े आधुनिक कवि. वीरेन की कई कविताएँ इसकी गवाह हैं कि समसामयिक भाषा और शैली का कवि होते हुए छंद और प्रास पर भी उनका असाधारण, अनायास अधिकार था और वह जब चाहते तब उम्दा, मंचीय गीत लिख सकते थे.  इसमें वह अपने प्रशंसकों को नागार्जुन की याद दिलाते थे, जिनसे उन्होंने दोनों तरह की कविताओं में बहुत कुछ सीखा. वह स्वयं अपने को निराला, मुक्तिबोध, त्रिलोचन, शमशेर बहादुर सिंह, केदारनाथ अग्रवाल,नाजिम हिकमत, मार्क्स, ब्रेख्त, वान गोग, चंद्रकांत देवताले, ग़ालिब, जयशंकर प्रसाद, मंगलेश डबराल, शंकर शैलेन्द्र, सुकांत भट्टाचार्य, भगवत रावत, मनोहर नायक, आलोकधन्वा, भीमसेन जोशी, मोहन थपलियाल,अजय सिंह, गिरधर राठी, नीलाभ, रामेन्द्र त्रिपाठी, केदारनाथ सिंह,पंकज चतुर्वेदी, डॉ नीरज, लीलाधर जगूड़ी, सुंदरचंद ठाकुर तथा हरिवंशराय बच्चन आदि की काव्य,  संगीत  तथा मैत्री की राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय परम्परा से सचेतन, निस्संकोच रूप से जोड़ते थे. इन सब के नाम बाक़ायदा उनकी रचनाओं में किसी-न-किसी तरह आते हैं. वीरेन की कविता का वैविध्य तरद्दुद में डालता है.

लेकिन इससे बड़ी ग़लती कोई नहीं हो सकती कि हम वीरेन डंगवाल को सिर्फ कवियों, कलाकारों और मित्रों का अन्तरंग कवि मान लें. उनके तीन संग्रहों ‘’इसी दुनिया में’’ (1991),’’दुश्चक्र में स्रष्टा’’(2002, साहित्य अकादेमी पुरस्कार 2004) तथा ‘’स्याही ताल’’ (2009) की 188 कविताएँ, जिनमें से दस को भी कमज़ोर कहना कठिन है, सम्पूर्ण भारतीय जीवन से भरी हुई हैं जिसके केंद्र में बेशक़ संघर्षरत,वंचित, उत्पीड़ित हिन्दुस्तानी मर्द-औरत-बच्चे तो हैं ही,एक लघु-विश्वकोष की तरह अंडज-पिंडज-स्वेदज-जरायुज,स्थावर-जंगम भी हैं. हाथी, मल्लाह, गाय, गौरैया, मक्खी, मकड़ी, ऊँट, पपीता, समोसे, इमली,पेड़, चूना, रातरानी, कुए, सूअर का बच्चा, नीबू, जलेबी, तोता, आम, पिद्दी, पोदीना, घोड़े, बिल्ली, चप्पल,भात, रद्दीवाला, फ्यूँली का फूल,   पान, आलू, कद्दू, बुरुंस, केले – यह शब्द सिर्फ़ उनकी रचनाओं में नहीं आए हैं बल्कि उनकी कविताओं के विषय हैं. निराला, नागार्जुन और त्रिलोचन  से सीखते हुए वीरेन अपने इन तीनों गुरुओं से आगे जाते प्रतीत होते हैं.

कहने को तो वीरेन डंगवाल हिंदी के एम.ए.पीएच.डी और लोकप्रिय, बढ़िया प्राध्यापक थे, एक बड़े दैनिक के सम्पादक भी रहे, लेकिन इस सब से जो एक चश्मुट छद्म-गंभीर छवि उभरती है उससे वह अपने जीवन और कृतित्व में कोसों दूर थे. उनकी कविता की एक अद्भुत विशेषता यह है कि मंचीय मूर्ख हास्य-कवियों से नितांत अलग वह बिना सस्ती या फूहड़ हुए इतने 'आधुनिक' खिलंदड़ेपन, हास-परिहास,भाषायी क्रीड़ा और कौतुक से भरी हुई हैं कि प्रबुद्धतम श्रोताओं को दुहरा कर देती थी. इसमें भी वह हिंदी के लगभग एकमात्र कवि दिखाई देते हैं और लोकप्रियता तथा सार्थकता के बीच की दीवार तोड़ देते हैं.

वीरेन की जितनी दृष्टि व्यष्टि पर थी, उतनी ही समष्टि पर भी थी. वह न सिर्फ प्रतिबद्ध थे बल्कि वाम-चिन्तक और सक्रियतावादी भी थे. अपने इन आख़िरी दिनों में भी उन्हें जनमंचों पर सजग हिस्सेदारी करते और अपनी रचनाएँ पढ़ते देखा जा सकता था. पिछले कई वर्षों का गंभीर कैंसर भी उनके मनोबल,जिजीविषा और सृजनशीलता को तोड़ न सका बल्कि हाल की उनकी कविताओं, मसलन दिल्ली मेट्रो पर लिखी गई रचनाओं ने उनके प्रशंसकों और समीक्षकों को चमत्कृत किया था क्योंकि उनमें दैन्य और पलायन तो था ही नहीं, उलटे एक नयी भाषा, आविष्कारशीलता, जीवन्तता और अन्य सारे कवियों को चुनौतियाँ थीं. जब डॉक्टरों ने उनसे स्पष्ट कह दिया कि दिल्ली का इलाज छोड़ कर बरेली लौट जाना ही ठीक है तो उन्होंने हँसते हुए कहा था कि ठीक है, अब मैं निश्चिन्त होकर अपनी आख़िरी कविताएँ लिखूँगा – शायद लिखीं भी. पिछले छः वर्षों से उनका कोई संग्रह नहीं आया था, अब तो दुर्भाग्यवश सम्पूर्ण कविताएँ आ सकती हैं. लेकिन वीरेन का जाना नियति का अन्याय ही कहा जाएगा. मुक्तिबोध, रामकृष्ण श्रीवास्तव, केशनी प्रसाद चौरसिया, सतीश चौबे, धूमिल, रघुवीर सहाय, मलयज और नवीन सागर की असामयिक मृत्यु के बाद वीरेन के निधन ने हिंदी और भारतीय कविता का अकूत नुकसान किया है.

(समालोचन से साभार)

Saturday, March 21, 2015

वह रोटी नहीं कर पाई मुझे पराजित - नामदेव ढसाल की कविता

"नामदेव ढसाल मराठी कविता के सर्वकालिक बड़े कवियों में है. आज उसका महत्‍व अपने समय के तुकाराम से कम नहीं, जबकि तुका ने अंततः ईश्वर-भक्ति के जरिये कुछ सहना ही सिखाया. सवर्णों ने आज तुका को पूर्णतः को-ऑप्ट कर लिया है. नामदेव ढसाल की क्रांतिकारी दलित कविता ने सारी भारतीय भाषाओं की आधुनिक दलित कविता को जन्म दिया. उसने सारे दलित ही नहीं, सवर्ण साहित्य को प्रभावित किया और कर रहा है. यह उसका एक अमर योगदान है." 

- विष्णु खरे


दिलीप चित्रे (बाएं से पहले) के साथ नामदेव ढसाल (बीच में) 

मेरी प्रिय कविता

-      नामदेव ढसाल

मुझे नहीं बसाना है अलग से स्वतंत्र द्वीप
मेरी फिर कविता, तू चलती रह सामान्य ढंग से
आदमी के साथ उसकी उँगली पकड़कर,
मुट्ठीभर लोगों के साँस्कृतिक एकाधिपत्य से किया मैंने ज़िन्दगी भर द्वेष
द्वेष किया मैंने अभिजनों से, त्रिमितिय सघनता पर बल देते हुए,
नहीं रंगे मैंने चित्र ज़िन्दगी के.

सामान्य मनुष्यों के साथ, उनके षडविकारों से प्रेम करता रहा,
प्रेम करता रहा मैं पशुओं से, कीड़ों और चीटियों से भी,
मैंने अनुभव किए हैं, सभी संक्रामक और छुतही रोग-बीमारियाँ
चकमा देने वाली हवा को मैंने सहज ही रखा है अपने नियंत्रण में
सत्य-असत्य के संघर्ष में खो नहीं दिया है मैंने ख़ुद को
मेरी भीतरी आवाज़, मेरा सचमुच का रंग, मेरे सचमुच के शब्द
मैंने जीने को रंगों से नहीं, संवेदनाओं से कैनवस पर रंगा है

मेरी कविता, तुम ही साक्षात, सुन्दर, सुडौल
पुराणों की ईश्वरीय स्त्रियों से भी अधिक सुन्दर
वीनस हो अथवा जूनो
डायना हो या मैडोना
मैंने उनकी देह पर चढ़े झिलमिलाते वस्त्रों को खांग दिया है

मेरी प्रिय कविता, मैं नहीं हूँ छात्र 'एकोल-द-बोर्झात' का
अनुभव के स्कूल में सीखा है मैंने जीना, कविता करना 
इसके अलावा और भी मनुष्यों जैसा कुछ-कुछ
शून्य भाव से आकाश तले घूमना मुझे ठीक नहीं लगता,

बादलों के सुंदर आकार आकाश में सरकते आगे आते-जाते हुए
देखने से भर जाता है मेरा अंतरंग .
मैं तरोताज़ा हो जाता हूँ, सम्भालता हूँ, समकालीन जीवन की
सामाजिकता को .
धमनियों से बहता रक्त का ज़बरदस्त रेला,
तेज़ी से फड़फड़ाने वाली धमनी पर उँगली रखना मुझे अच्छा
लगता है .

जिस रोटी ने मुझे निरंतर सताया,
वह रोटी नहीं कर पाई मुझे पराजित,
मैंने पैदा की है जीवन की आस्था
और लिखे हैं मैंने जीने के शुद्ध-अभंग
मनुष्य क्षण भर को अपना दुख भूले-बिसार दे
कविता की ऐसी पंक्ति लिखने की कोशिश की मैंने हमेशा,
भौतिकता की उँगली पकड़कर मैं चैतन्य के यहाँ गया,
परन्तु वहाँ रमना संभव नहीं था मेरे लिए, उसकी उँगली पकड़
मैं फिर से भौतिकता की ओर ही आया,
अस्तित्त्व-अनस्तित्त्व के बीच स्थित
बाह्य रेखाओं का अनुभव मैंने किया है,
मैंने अनुभव किया है साक्षात ब्रह्माण्ड
कविता मेरी, बताओ
इससे अधिक क्या हो सकता है
किसी कवि का चरित्र ?

हे मेरी प्रिय कविता
नहीं बसाना है मुझे अलग से कोई द्वीप,
तू चलती रह, आम से आम आदमी की उँगली पकड़
मेरी प्रिय कविते,
जहाँ से मैंने यात्रा शुरू की थी
फिर से वहीं आकर रुकना मुझे नहीं पसंद,
मैं लाँघना चाहता हूँ
अपना पुराना क्षितिज .


(मूल मराठी से सूर्यनारायण रणसुभे द्वारा अनूदित)

Tuesday, February 24, 2015

अखिल भारतीय होने को लालायित भद्र अश्लीलता के बारे में कुछ बातें


हाँ जी, आधी रात को छुपते छिपाते मैंने भी देख ही लिया AIB (उम्मीद है आप सब को इसका फुल फॉर्म पता होगा) का वह अतिचर्चित कार्यक्रम जिसके बारे में हमारा सचेत मीडिया दबे-ढंके शब्दों में सबको सूचित कर चुकने के बाद पुनः मूषको भव की रजाई में घुस चुका है.

इस घटिया कार्यक्रम में न तो किसी तरह का सेन्स ऑफ़ ह्यूमर था न ही कोई क्लास.

... खैर छोड़िये, अभी मैं आपको अपनी बातों से बोर करने नहीं जा रहा. इस मामले में श्री विष्णु खरे के इस ज़रूरी हस्तक्षेप को मैंने कल रात पहली बार अपने प्रिय कवि श्री कुमार अम्बुज के ब्लॉग पर पढ़ा. थोड़ा देर से ही सही लेकिन मैं इस आलेख तक पहुँच सका. इसका इत्मीनान है. वहीं से इसे साभार ले रहा हूँ.

हमेशा की तरह विष्णु जी अपनी बातों में उन विषयों को उठा रहे हैं जिनसे हमारी गऊपट्टी के बौद्धिकजन सदा बचते रहे हैं. इसी वजह से मैं उनके सबसे बड़े प्रशंसकों में हूँ और इस बात को बार-बार रेखांकित करता रहा हूँ. वे हमारी हिन्दी के उँगलियों पर गिने जा सकने वाले लेखकों में हैं जिनके साथ बात करने के लिए आपके भीतर वह होना ज़रूरी है जिसे अंग्रेज़ी में ग्रे मैटर कहा जाता है.

सलाम विष्णु जी!

विष्णु खरे

गालियाँ खा के बेमज़ा न हुआ                       

-विष्णु खरे

‘सभ्य’,’शरीफ़’,’कल्चर्ड’,’बूर्ज्वा’ बैठकख़ानों और घरों में तो उस अतिचर्चित प्रोग्राम का पूरा ‘हिंग्लिश’ नाम तक नहीं लिया जा सकता ; शायद पति-पत्नी और प्रेमी-प्रेमिका भी अपने एकांत में उसे दुहराना न चाहें.उसका ‘केन्द्रीय’ शब्द भले ही यूपी-बिहार का लोकप्रिय आविष्कार हो,उसे पूरे परिवार में  पढ़े जाने वाले किसी हिंदी अखबार में ज्यों-का-त्यों छापा भी नहीं जा सकता – सिर्फ़ ‘चवर्ग’ को लुप्त कर ‘’आल इंडिया बकओद’’ से संकेत दिया जा सकता है. यों ‘बकओद’ का खुलासा यह है कि जो मौक़े पर खड़ा रहकर कार्यरूप से कुछ भी ‘परफॉर्म’ न कर सके, सिर्फ़ बकबक और शेख़ी से काम चलाए.

मुंबई के महँगे, प्रतिष्ठित नैशनल स्पोर्ट्स क्लब में कथित उच्चवर्ग (कृपया ‘सिने-वर्ग’ पढ़ें )  के ऐसे दर्शकों के सामने, जो 4000 रुपये प्रति व्यक्ति-टिकट पर निजी और गुप्त रूप से आमंत्रित किए गए थे, आयोजित और शूट किया गया यह कार्यक्रम अमेरिकी टेलीविज़न के अतिशय ‘रिअलिटी’, ’इन्सल्ट’ और ‘रोस्टिंग’ शो की श्रेणी में आता है. इसमें उन शब्दों, गालियों और टिप्पणियों से, जिन्हें आप चाहें तो अश्लील, फ़ोह्श, पोर्नोग्राफ़िक कह लें, स्टेज पर बैठाले गए विशिष्ट अतिथिओं का बेइंतिहा बेइज़्ज़ती से तिक्का-बोटी, कीमा, तंदूरी या सीख-कबाब  किया जाता है और ‘’वी आइ पी’’ दर्शकों और अनुपस्थितों के साथ भी कभी-भी वही सुलूक किया जा सकता  है. लोकप्रिय मुहावरे में कहा जाए तो सबकी सिर्फ़ माँ-बहन ही नहीं, हर दूसरे रिश्तेदार और नज़दीकी भी एक कर दिए जाते हैं. बल्कि यह नया ‘स्टेटस सिंबल’ बन गया है – यदि आप को इस प्रोग्राम में देसी हिंदी या हार्लमी अमरीकी में ‘योनि’, ’लिंग’, ’गुदा’, ‘कुटुंबसंभोगी’, ‘अजाचारी’  वगैरह से संबोधित  नहीं किया गया तो साफ़ है कि आप एक मामूली आदमी, ‘नॉन-एंटिटी’ हैं और यूँ ही आमंत्रित या घुस आए हैं. दरअसल एकमात्र और सबसे गंदी अनकही फब्ती यही मानी जाती है.

यह नहीं है कि अपने यहाँ कभी-कभी ऐसा न होता हो. होली के दिन,जो अब दूर नहीं, कपड़ों पर अपठनीय शब्दों के आलू-ठप्पे लगाए जाते हैं, भाँग (की पकौड़ी)  और दारू के नशे की आड़ में औरतों-बच्चों की आमोदित उपस्थिति में किस-किस को सार्वजनिक रूप से क्या-क्या नहीं कहा जाता, नंगे-से-नंगा नाच-गाना-छूना-जुलूस आदि होता है, आचार्य मस्तराम से होड़ लेनेवाली लुग्दी-पुस्तिकाएँ लिखी-छापी-बाँटी जाती हैं. उधर आंचलिक ब्याह-शादियों में ‘’लेडिस’’ वयस्कोचित अपशब्द गाती हैं, आपस में सुहागरात का अतियथार्थ अभिनय करती हैं और घराती-बराती सभी कुलपूज्य बहुत आड़ किन्तु बड़े लाड़ से यह सब सुनते-देखते हैं.

लेकिन होली-सम्ध्याने का यह विरेचन कुछ घंटों का ही होता है, संयुक्त हिन्दू परिवार अपनी‘जैसी हैं जहाँ हैं’ ‘’महान नैतिक परम्पराओं’’ में फिर लौट जाता है. ‘आल इंडिया बकओद’ जैसे भूमंडलीकृत, उदारचरित, बहुराष्ट्रीय, अरबडॉलरी, कॉर्पोरेट ’फ़्रेन्चाइज़्ड’ शो तो बेचारे बच्चनजी की मासूम मधुशाला की तरह ‘दिन होली और रात दिवाली’ रोज़ मनाते हैं.

बात आई-गई हो जाती यदि अपनी जाहिल मग़रूरी में करण जौहर, रणवीर सिंह, अर्जुन कपूर, दीपिका पदुकोणे, आलिया भट्ट, गुरसिमरन खम्बा, तन्मय भट्ट, रोहण जोशी, अदिति मित्तल, आशीष शाक्य, राजीव मसंद और क्लब के क्रमशः अध्यक्ष और सचिव जयंतीलाल शाह तथा रवीन्द्र अग्रवाल ने यह तय न कर लिया होता कि हम इतने नामचीन रसूखी  लोग हैं, देखें हम पर कौन हाथ डालता है. इस तरह इन बंदरों ने अपने राजाओं सलमान खान और आमिर खान की ‘’भावनाओं’’ पर अनायास अनजाने उस्तरा चला दिया.

यह बात अलग है कि सलमान खान की हर फिल्म में कम बाज़ारू और फ़ोह्श सीन,डांस,डायलॉग और गाने नहीं होते और आमिर खान भी बोसडीके को भगा चुके हैं लेकिन बॉक्स ऑफिस कारणों से आज दोनों मुक़द्दस मवेशी बन चुके हैं और अल्लामियाँ ने तो भाई को साक्षात गऊमाता जैसे दिमाग़ से भी नवाज़ रखा है. इन दो जोड़ी सींगों को अपनी जानिब  दौड़ते देखकर जौहर-गिरोह को ठंढा पसीना आ गया, मुआफ़ी की भीख माँगना शुरू हो गया  और हिन्दुस्तानी इन्टरनैट पर जहाँ-जहाँ इनकी ‘अखिल भारतीय बकओद’ मुहय्या थी उसे हटाना शुरू हो गया. लेकिन आज नैट से कुछ-भी नेस्तनाबूद कर पाना नामुमकिन है. उल्टे यह हुआ है कि सलमान खान के हत्या और शिकार के मुक़द्दमों को लेकर हज़ारों बहुत मज़ाहिया और नुकसानदेह जुमले नैट की फ़ास्ट-ट्रैक जन-अदालतों द्वारा लिखे-पढ़े जा रहे हैं.शायद आमिर ‘पी के’ खान को भी निपटाया जा रहा हो.

लेकिन मूल मामला अब इतना तूल पकड़ चुका है कि प्रशासनिक इन्क्वारियाँ शुरू कर दी गई हैं, हाइकोर्ट नेमुल्ज़िमों को नोटिस जारी कर दिए हैं, केन्द्रीय सरकार से पूछा जा रहा है कि सोशल मीडिया पर इस तरह की हरकतों के खिलाफ कार्रवाई का क्या मैकेनिज़्म है या हो, उधर बहती गटर-गंगा में हाथ धोने के लिए नए मामले दर्ज़ होने की दैनिक रिपोर्टें आ रहीं हैं. लेकिन यह भी है कि पुरानी फ़िल्मों के बकवादी ‘’हैम’’ भाजपाई शत्रुघ्न सिन्हा की लाडली बिटिया सोनाक्षी ने खुद को बकोदुओं के पक्ष में झोंक दिया है. नौ मन तेल का इन्तेज़ाम हो चुका हो तो राधा नाचेगी ही.

मुझे हैरत इस बात की है कि सनी लिओने के मामले की तरह इस पर भी हिंदी के ब्लॉग, अख़बार, कथित बुद्धिजीवी और विशेषतः अग्निवर्षक नारीवादी/वादिनियाँ, जो यूँ तो खुद काफ़ी बकोदू-लिखोदू हैं, इस क़दर सनाके में क्यों हैं ? लगता है आज ‘हिंदी’-व्याकरण  में एक ही लिंग बचा है – नपुंसकलिंग. जबकि करण जौहर की बकोदू-मंडली के पक्ष में फिर वही महेश भट्ट, प्रीतीश नंदी और शोभा डे जैसे थर्ड-पेजी ‘रोग्ज़ गैलरी’ वाले ख़सलती मशक़ूक़,जो नाम लेने लायक़ भी नहीं हैं, उसी तरह बकोदने पहुँच गए हैं जैसे किसी घर में बच्चा पैदा होने पर बृहन्नलाएँ पहुँच जाती हैं.

संक्षेप में ऐसे लोग यही मानते हैं कि दूसरे धर्मों को छोड़कर शेष सारे विश्व को किसी के बारे में कुछ भी कहने और बलात्कार को छोड़कर किसी के भी साथ कुछ भी करने का अधिकार है. हालाँकि मुझे यह लगता है कि यह मार्की द साद के मुरीद हैं और इनकी अंतरात्मा, यदि ऐसी कोई फालतू चीज़ इनके पास है तो, शायद हर तरह की हत्या और बलात्कार को भी अपनी सहिष्णुता, उदारता, प्रबुद्धता, आधुनिकता, ’सैंस ऑफ़ ह्यूमर’ आदि का अंग मानती होगी. ऐसे परिवारों के बारे में यह जानना दिलचस्प होगा कि किस तरह से  हर शाम  डाइनिंग-टेबल पर इनके हर छोटे-बड़े एक-दूसरे को देशज हिंदी याझोपड़पट्टी अंग्रेज़ी में प्यार से ‘योनि’, ‘लिंग’, ‘गुदा’, ‘स्तन’, ‘नितम्ब’ आदि कहकर पुकारते होंगे, बात-बात में ‘सम्भोग-सम्भोग’ (‘फ़’ ‘फ़’) का रिवायती हॉलीवुडी तकियाकलाम वापरते होंगे और डिनर के बाद सामूहिक रूप से सनी आंटी की ही एकाध क्लासिक फिल्म देख कर आपस में क्या करते होंगे.


अब मामला अदालत में है और हम नहीं जानते कि फ़ैसला क्या होगा लेकिन खजुराहो,’कामसूत्र’ आदि की दुहाई देना धूर्ततापूर्ण है.1947 तक की सहस्रवर्षीय अल्पसंख्यक शासकीय शामी संस्कृति की अन्य चीज़ों के अलावा प्रतिक्रियावादी यौन-नैतिकता की बहुसंख्यक ग़ुलामी ने इस मुल्क में बेहद बौद्धिक नुकसान किया है. आज हम एक सड़े-गले ‘सुपरस्ट्रक्चर’ के सामने ऐसी पतनोन्मुख ‘’अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता’’  से ‘बेस’ को प्रबुद्ध और आधुनिक नहीं बना सकते. वैसे भी आज भारत को जैसा समतावादी समाज चाहिए उसमें ऐसे शो को जगह और स्वीकृति मिल ही नहीं सकती. और आज क्या मुस्लिम-सिख-जैन-ईसाई सरीखे अल्पसंख्यक भी ऐसे शो को गले लगा लेंगे? देखते नहीं  हैं उस उर्दू अखबार की बेचारी संपादिका और उसके परिवार पर कितना भयानक असली  खतरा मँडरा रहा है? क्या बकओद में भाग लेने वाले ‘गे’ ‘मर्दों’ और महेश भट्ट, प्रीतीश नंदी और शोभा डे आदि ‘अनस्पीकेबिलों’ में इतनी हिम्मत है कि अगला कार्यक्रम ‘’शार्ली एब्दो’’ पर रखें-रखवाएँ और उसमें मंच पर जाएँ? एक पतित, खाते-पीते-अघाए, पूयपूरित ‘’उच्च’’ वर्ग के सामने क्या यह पूँजीपतियों, बिल्डरों, माफ़ियाओं, अखबारों-चैनलों के मालिकों, आइ.ए.ऐसों, आइ.पी.ऐसों, नेताओं और आगे बढ़कर जजों, प्रधानमंत्रियों, राष्ट्रपतियों के बारे में बकओद सकते हैं? तो फिर आप हम कमोबेश लिखोदुओं-पढ़ोदुओं को काहे बकओदना सिखा रहे हैं ?

Friday, June 21, 2013

पथरीले हिंदी उपन्यास पर नई दूर्वा - सुन्दर ठाकुर के उपन्यास पर विष्णु खरे

कबाड़ी और अनन्य मित्र सुन्दर चंद ठाकुर के हाल में छपे उपन्यास 'पत्थर पर दूब' की यह समीक्षा विष्णु खरे जी ने लिखी है और 'समयांतर' में छपी है. आप भी पढ़िए -



पथरीले हिंदी उपन्यास पर नई दूर्वा

विश्व-सिनेमा के अमर दृश्यों में एक स्टेनले क्यूब्रिक की कालजयी फिल्म ‘स्पेस ओडिसी 2001’ का वह मंज़र है जिसमें गुहापुरुषों की दो छोटी मादरज़ाद काल्पनिक सेनाएँ एक डबरे पर पानी पीने के अधिकार के लिए मानव-इतिहास का पहला युद्ध लड़ती हैं और वह फ़ौज जीतती है जिसके नंगे सिपहसालार के हाथ में सिर्फ एक सूखी,सख्त,सुफ़ैद हड्डी का,लेकिन पहला, हथियार होता है जिससे वह ‘दुश्मन’ के सरग़ना को मार डालता है.वह हाड़ कैसे भविष्य के अंतरिक्ष-यान में बदलता है यह एक अलग माजरा है लेकिन लगता है ऋग्वेद और ‘महाभारत’ आदि की सेनाओं और युद्धों की दाग़बेल डल गयी.

मुहब्बत और जंग,’लव एंड वॉर’,विश्व-साहित्य को शुरू करने वाले विषय हैं.’महाभारत’,जो संसार की निर्विवाद महानतम किताब है,इन दोनों से लबरेज़ है, फ़लसफ़े से भी.हमारे यहाँ एक वीर रस है और एक वीरगाथा-काल है जो दरअसल युद्ध-रस और युद्धगाथा-काल हैं.हमलों और जंगों ने भारत को हिन्दोस्तान और फिर इंडिआ बना दिया.अर्जुन का बृहन्नला हो जाना हमारे भविष्य का अद्भुत प्रतीकात्मक पूर्वानुमान था.इस सरज़मीं पर वेद-व्यास और सिकंदर के ज़माने से सैकड़ों युद्ध तो हुए होंगे, साथ में पिछली सदी में  हज़ारों दक्षिण एशिआई फौज़ी दोनों आलमी जंगों में शहीद हुए,जिनके कई बाक़ी निशाँ यूरोप में बिखरे पड़े हैं लेकिन वाह रे रणबाँकुरे हिंदी कहानी और उपन्यास लेखक,एक अंधों में कानी रानी ‘उसने कहा था’ को छोड़ कर मजाल है कि तूने सैनिकों या युद्धों पर स्मरणीय  कुछ रचा हो,जबकि यदि छोटी-बड़ी लड़ाइयों को लेकर शेष विश्व में अब तक जो लिखा गया है उसे इकठ्ठा किया जा सके तो शायद अपने आर्मी हैडक्वार्टर्स से कहीं बड़ी इमारत में एक करोड़ किताबों की लाइब्रेरी बनानी पड़े.

इस पृष्ठभूमि में प्रतिष्ठित कवि-पत्रकार सुंदर चंद ठाकुर के अरंगेत्रम् उपन्यास “पत्थर पर दूब” के महत्व की अतिरंजना करना असंभव-सा है.यह भारतीय साहित्य का सौभाग्य है कि एक नॉन-कमीशंड सैनिक अफ़सर के बेटे सुन्दर बाजाब्ता हिन्दुस्तानी फ़ौज में अपने पिता से बढ़कर कमीशंड ऑफ़िसर बने – कितना गर्व हुआ होगा उस ख़ुशक़िस्मत बाप को – और हिंदी के कवि-लेखक के रूप में भी विकसित हुए.अब यह क़तई लाज़िमी नहीं कि सिर्फ़ एक सैनिक को  फ़ौजी ज़िन्दगी पर लिखना चाहिए – यूँ अगर वह लिख सकता है तो उसमें कुछ स्वागत्य अतिरिक्त प्रामाणिकता आ ही जाएगी.लेकिन लाखों अफ़सर-ग़ैर-अफ़सर फ़ौजियों ने अपने जीवन-वृत्त या रोज़नामचे लिख छोड़े हैं जो न तो सारे-के-सारे पठनीय हैं और न कथात्मक-औपन्यासिक.किसी भी अनुभव को साहित्य में बदल पाने के लिए महज़ प्रामाणिकता अक्सर कुछ नाकाफ़ी साबित होती है.सुन्दर ने कुछ वर्षों तक कविता पर अच्छा मश्क़ करने के बाद गल्प पर हाथ आज़माया जो तीनों के लिए मुफ़ीद साबित हुआ.
यहाँ यह साफ़ कर देना चाहिए कि “पत्थर पर दूब” न तो युद्ध-उपन्यास है और न मिलिटरी-उपन्यास – उसे हम चाहें तो फ़ौज में ‘बालिग़ होने’ (‘कमिंग ऑफ़ एज’) का, ‘एर्त्सीउंग्सरोमान’ (Erziehungsroman, शिक्षण-उपन्यास ) , ‘एंट्विक्लुंग्स- या बिल्डुंग्सरोमान’ ( Entwicklungs- अथवा Bildungsroman) कह सकते हैं.यह कुछ ऐसा ही है जैसे कोई जेंटिलमैन-कैडेट देहरादून या खड़कवासला और उसके आसपास के अपने वर्षों पर कुछ लिखे, लेकिन यहाँ यह ध्यातव्य है कि सुन्दर सीधे शॉर्ट सर्विस कमीशन पर गए थे, हालाँकि सिखलाई वहाँ भी कसाले की होती है.

विदेशों में युद्धों पर शायद हज़ारों उपन्यास लिखे गए हैं,जिनमें से कुछ बड़े और महान भी कहे जा सकते हैं, आगे भी लिखे जाते रहेंगे,एरिष मारिया रेमार्क जैसे लेखक तो युद्ध-उपन्यासकार के रूप में ही अमर हैं,लेकिन सुन्दर चंद ठाकुर का यह पहला उपन्यास उन्हें फ़िलहाल भारतीय साहित्य में अपने लगभग अछूते विषय के कारण स्थायी स्थान तो दे ही रहा है,लेकिन इसलिए भी कि वह बहुत पठनीय भी है – यद्यपि यह सवा तीन सौ सघन पृष्ठों का है लेकिन उसे एक बार शुरू कर के बीच में छोड़ देना कठिन है.उसका नायक कोई शूरवीरता-भरा,दुश्मन को मौत के घाट उतारनेवाला रोबोट-सोल्जर, सुपर- या आयरन-मैन नहीं है,वह कुमाऊँ के गाँव का एक निम्नमध्यवर्गीय युवक है जिसने पहले ही अपने परिवार और जीवन की कुछ लड़ाइयाँ देख रखी हैं,वह एक शुरूआती मुहब्बत में नाकामयाब भी रहा है और सेना में जाने के बाद एक कठिन संघर्ष में उसकी ज़िंदगी और आदर्शों पर कई दचके-दाँचे पड़ते हैं,कई मोहभंग होते हैं लेकिन वह स्वयं में और अपने कुछ जीवन-मूल्यों में कभी आस्था नहीं खोता.

‘पत्थर पर दूब’ मूलतः एक यथार्थवादी कृति है – हिंदी में इतनी असलियत इधर के बहुत कम कहानी-उपन्यासों में देखी गई है.अपनी चाक्षुष और फ्लैशबैक-फ़ॉर्वर्ड तकनीक के कारण वह कभी-कभी एक डॉक्यु-ड्रामा का आभास देने लगता है.उसमें युद्ध नहीं है लेकिन कमांडो-एक्शन है,सस्पेंस,थ्रिल,फ़ेस-ऑफ़,हैपी एन्डिंग है.अंध-देशभक्ति,शत्रु-घृणा,साम्प्रदायिकता,नारेबाज़ी से यथासंभव बचा गया है. हैरत यह है कि सुन्दर का पहला उपन्यास होने के बावजूद इसमें एक ऐसा नैपुण्य और लाघव है जिसकी उम्मीद हम वरिष्ठ और सिद्धहस्त रचनाकारों से ही करते हैं.भाषा,शैली और तकनीक की दृष्टि से कुल मिलाकर ‘पत्थर पर दूब’ में कोई कच्चापन दिखाई नहीं देता.

यह उपन्यास जहाँ हिंदी गल्प की एक आधारभूत कमज़ोरी को रेखांकित करता है वहाँ स्वयं उसके ख़म्याज़े की दिशा की और संकेत भी करता है.हमारे यहाँ या तो सामाजिक-राजनीतिक,गुरु-गंभीर,उत्तर-आधुनिक,जादुई यथार्थ के उपन्यास हैं जिनमें से अधिकांश अपाठ्य या बोगस हैं या फिर फ़ुटपाथ या रेल्वे स्टालों पर बिकनेवाले लोकप्रिय किन्तु नितांत विकलमस्तिष्क क़िस्से.जितना विविध हमारा समाज और हमारे कार्य-क्षेत्र हैं उसमें  गहरे पैठनेवाले और साथ ही पठनीय उपन्यास हिंदी में नहीं हैं.किसी भी विदेशी पुस्तक की दूकान के कथा-साहित्य विभाग में जाकर देखिए – लेखकों,पुस्तकों और विषयों के वैविध्य से सर चकराने लगता है और वे सब हाल के प्रकाशन होते हैं.भारत में भी अब सैकड़ों युवक-युवतियाँ धड़ल्ले से अंग्रेज़ी में ज़माने भर के विषयों पर ‘फ़िक्शन’ लिख रहे हैं,भले ही वह ‘पल्प’ हो, और सच्ची-झूठी लाखों-करोड़ों की रॉयल्टी कमा रहे हैं,सेलेब्रिटी बन रहे हैं.आज हिंदी में सीधा महान  प्रतिबद्ध साहित्यिक उपन्यास है,जो अपने स्तर पर शुद्ध अधपची बकवास है,लेकिन सेना,नेवी,एअर-फ़ोर्स,वकालत,अदालत,डॉक्टरी,इंजीनिअरिंग,अस्पताल,रेआलपोलिटीक,साइबर-विश्व,कॉर्पोरेट-जगत, असल जनजीवन,सिनेमा,टेलीविज़न,प्रिंट-मीडिअम,मंडी,मॉल,थोक और खुर्दा व्यापार,होटल,एअरलाइंस,काला पैसा,तस्करी,आइ ए एस,आइ एफ़ एस,आइ पी एस,इनकम टैक्स,रेल्वे आदि हजारों विषयों पर कुछ भी नहीं है – यानी ‘बेस’ सिरे से ग़ायब है, राहु की तरह अधर में लटका मात्र एक खोखला ‘सुपरस्ट्रक्चर’ है.कुछ नए-पुराने अपवादों को छोड़ कर हमारे लगभग समूचे कथा-साहित्य की यही दुर्दशा है.

ऐसे में सुन्दर चंद ठाकुर का हिंदी में ‘पत्थर पर दूब’ जैसा एकदम अनूठा उपन्यास लेकर आना कई तरह के अभूतपूर्व कारनामे अंजाम दे रहा है.इसने पहली  बार समसामयिक भारतीय फ़ौज को एक चेहरा दिया है.हर रैंक के फ़ौजी को भी इसे अवश्य पढ़ना चाहिए.बहुत कम सिवीलियन लोग इस दुनिया को जानते हैं – ‘उसने कहा था’ एक अमर कृति होते हुए भी  अंततः लगभग एक सदी पुरानी, विदेशी लाम पर घटी, प्रेम और त्याग की सादा,मार्मिक कहानी ही है.हिन्दी पाठकों को ‘पत्थर पर दूब’ की  कई बातें बहुत चौंकाएँगी.यह उपन्यास उन्हें बताएगा कि एक फ़ौजी उन्हीं की तरह का इंसान होता है.एक तरह से यह हिंदी के इक्कीसवीं सदी की अधुनातन दुनिया में प्रवेश करने का पहला उपन्यास है.इसमें सेना के पतनों और विडम्बनाओं को भी बख्शा नहीं गया है.यूँ तो हर आयु-वर्ग का पाठक इसे पढ़कर आल्हादित और समृद्ध होगा लेकिन मुझे लगता है कि यह अनायास ही हिंदी का पहला ‘किशोर-तथा-युवा’ उपन्यास भी बन गया  है और उनमें इसे विशेषतः लोकप्रिय होना चाहिए.एक बड़ी उपलब्धि यह भी है कि जहाँ  हिन्दी के कई जाहिल गल्प-लेखक अपने स्वदेशी-विदेशी पात्रों से अपने  ही स्तर की ख़ानसामा अंग्रेज़ी को सही समझ कर उनसे बुलवाते रहते हैं,सुन्दर ने शायद चार-पाँच ही ऐसी ग़लतियाँ की हैं और वे ब्लंडर नहीं हैं.यदि ‘पत्थर पर दूब’ का अनुवाद अंग्रेज़ी में हो जाए तो चेतन आदि बगुला-भगतों की आरती उतर जाएगी.

स्वयं मेरे पिता दूसरे विश्व-युद्ध में आर्मी मेडिकल कोर में बर्मा के मोर्चे पर किंग्स कमीशंड अफ़सर थे लेकिन 1946 में छँटनी में आ गए और बहुत बाद में मेरे बड़े भाई साहब एअर फ़ोर्स में वारंट अफसर के रैंक से रिटायर हुए.मेरे तीन मुँहबोले भांजे फ़ौज के सर्वोच्च रैंकों पर हैं और उनमें से मेजर-जनरल कैवल्य त्रयम्बक पारनार्ईक तो अगले महीने ही जम्मू-कश्मीर की सर्वाधिक विस्फोटक भारतीय कमांड से रिटायर होने वाला है. मैं अभी तक फ़ौज और सेकंड वर्ल्ड वॉर से आज़ाद नहीं हो पाया हूँ.यह उपन्यास इसलिए भी मुझे बहुत क़रीब और चहीता लगा है.इसे लिखवा लेने के पीछे सबसे पहला इसरार और दबाव  शायद मेरा ही रहा होगा,लेकिन बहुत अच्छा होने के बावजूद यह आंशिक रूप से ही वह उपन्यास निकला जो मैं पढ़ना चाहता था.मेरा वाला विषय है सोमालिया में सुन्दर के बिताए गए पंद्रह महीने, जब वे वहाँ यूनाइटेड नेशंस की शान्ति-सेना में अफसर थे.यह एक दुर्लभ और कई तरह के जोखिमों से भरा राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक अनुभव रहा होगा और शायद विदेशी भाषाओँ में भी ऐसे विषय  पर कोई उपन्यास नहीं है.मेरे लेखे ‘पत्थर पर दूब’ उस उपन्यास का पहला,भले ही अपने में पूर्ण, खंड ही है जो सोमालिया-पर्व के अपने दूसरे खंड के बिना पूरा नहीं माना जा सकेगा. एंड दैट्स एन ऑर्डर,कैप्टेन ! 

Thursday, October 18, 2012

हालाँकि सैलून में इतने आईने थे कि वह पूरे बाज़ार से घिरा लगता था





विष्णु खरे जी की कविताओं की सीरीज में आज पेश कर रहा हूँ यह नायाब कविता. जितनी तरफ से देखेंगे उतने आयाम दिखेंगे. और यह आपकी मर्ज़ी पर.

तभी तो.

ग्राहक

दो बार चक्कर लगा चुकने के बाद
तीसरी बार वह अंदर घुसा. दूकान ख़ाली थी
सिर्फ़ एक पाँच बरस का ख़ुश बच्चा आईने के सामने
कुर्सी पर बैठा हुआ था जिसका बाप लम्बी बेंच से
आधी निगाह अपने स्कूटर डबलरोटी और लांड्री के कपड़ों पर
और आधी तीन माह पुराने फ़िल्मफ़ेयर पर रखे हुए था.
सैलूनवाला एक ही था और बच्चे के साथ ख़ुश
वह भी हँसी-मज़ाक करता जा रहा था.
अंदर घुस कर वह चुपचाप खड़ा रहा
ताकि जब बाल बनानेवाले का ध्यान उस पर जाए तभी वह बोले
और ऐसा ही हुआ.
उसके हाथ की थैली
और पैरों के फटे पाँयचेवाले पजामे को देखकर
सैलूनवाला अचानक बच्चे को छोड़कर उसके पास आया
और उससे पूछा : क्या काम है ?

बाल बनेंगे ? : उसने इतने धीरे से पूछा
कि उसे फिर पूछना पड़ा : बाल बनेंगे?
सैलून वाला तब तक कुछ सँभल चुका था
और उसने कहा : हाँ बनेंगे क्यों नहीं बैठ जाओ,
ज़रा बाबा की कटिंग हो जाए. बैठने के लिए दो जगहें ख़ाली थीं--
एक दूसरे आईने के सामने और दूसरी बेंच पर स्कूटरवाले के पास--
वह दोनों के बीच हिचकिचाता खड़ा रहा.
तब सैलूनवाले ने कहा : बैठ जाओ बैठ जाओ,
कुर्सी पर ही बैठ जाओ,
बस बाबा के बाद तुम्हारा ही नम्बर है.
सैलून में हर दीवार पर आईने लगे थे
जिनमें सारे सामानों वाली दूकानें नज़र आती थीं
उनमें कई गुना होते हुए उसने बेंचवाले बाबू साहब से दूर
अपनी थैली रखी.
आईनों में हँसते लोगों, सुन्दर औरतों, मंदिरों और साईंबाबा के अक्सों को बिल्कुल न
देखता हुआ वह
कुर्सी के बिल्कुल सिरे पर करीब-करीब उठंग बैठा हुआ बाहर देखता रहा.
उसने अपने सामने के आईने में भी
दाग़ों और झुर्रियों से भरा हुआ अपना तीस-बत्तीस का चेहरा
और उसके पीछे प्रधानमंत्री का बातें कम काम ज़्यादा वाला कैलेन्डर नहीं देखा.
बच्चे और बाल बनानेवाले के बीच उस खेल पर भी
वह नहीं मुस्कराया जिसपर बेंचवाले बाबू साहब ख़ुश होते रहे.

बाबा को निपटाकर जब सैलूनवाला उसके पास आया
तो जैसे वह जगा. उसे बतलाया गया कि कटिंग के पाँच रुपये लगते हैं.
उसने कहीं भी न देखते हुए कहा ठीक है जो भी हो.
जब उससे पूछा गया कि कैसे रहेंगे तो उसने कहा
बिल्कुल छोटे, तीन-चार महीने की इल्लत मिटे.
बाल बनाने वाले ने उसके बाल गीले किए, कैंची-कंघा चलाया,
मशीन लगाई. चूँकि दूकान में अब और कोई नहीं था
इसलिए वह कुर्सी पर कुछ ठीक से बैठा और पीछे को थोड़ा सहारा लिया.
उसने तब भी अपने को आईने में नहीं देखा
हालाँकि सैलून में इतने आईने थे कि वह पूरे बाज़ार से घिरा लगता था
लेकिन बाल बनाने वाला उसका सिर जहाँ घुमाता था
उसे बस अपनी थैली साफ़ नज़र आती थी
जिसमें शायद महँगी हो रही प्याज
पड़ोस की चक्की से लिया हुआ फ़र्श बुहारा गया शाम का थोड़ा-सा आख़िरी
आटा
और मज़दूरी के दो-एक पुराने कुछ ज़ंग-लगे औज़ार थे.

Wednesday, October 17, 2012

लड़कियों के बाप


विष्णु खरे जी की कविताओं की सीरीज में आज पेश कर रहा हूँ उनके संग्रह ‘सब की आवाज़ के पर्दे में’ से यह मार्मिक कविता –


लड़कियों के बाप

वे अक्सर वक्त के कुछ बाद पहुँचते हैं
हड़बड़ाए हुए बदहवास पसीने-पसीने
साइकिल या रिक्शों से
अपनी बेटियों और उनके टाइपराइटरों के साथ
करीब-करीब गिरते हुए उतरते हुए
जो साइकिल से आते हैं वे गेट से बहुत पहले ही पैदल आते हैं
उनकी उम्र पचपन से साठ के बीच
उनकी लड़कियों की उम्र अठारह से पच्चीस के बीच
और टाइपराइटरों की उम्र उनके लिए दिए गए किराए के अनुपात में
क्लर्क टाइपिस्ट की जगह के लिए टैस्ट और इन्टरव्यू हैं
सादा घरेलू और बेकार लड़कियों के बाप
अपनी बच्चियों और टाइपराइटरों के साथ पहुँच रहे हैं
लड़कियाँ जो हर इम्तहान में किसी तरह पास हो पाई हैं
दुबली-पतली बड़ी मुश्किल से कोई जवाब दे पाने वालीं
अंग्रेजी को अपने-अपने ढंग से ग़लत बोलनेवालीं
किसी के भी चेहरे पर सुख नहीं
हर एक के सीने सपाट
कपड़ों पर दाम और फ़ैशन की चमक नहीं
धूल से सने हुए दुबले चिड़ियों जैसे साँवले पंजों पर पुरानी चप्पलें
इम्तहान की जगह तक बड़े टाइपराइटर मैली चादरों में बँधे
उठाकर ले जाते हैं बाप
लड़कियाँ अगर दबे स्वर में मदद करने को कहती भी हैं
तो आज के विशेष दिन और मौके पर उपयुक्त प्रेमभरी झिड़की से मना कर देते हैं
ग्यारह किलो वज़न दूसरी मंज़िल तक पहुँचाते हुए हाँफते हुए
इम्तहान के हाल में वे ज़्यादा रुकना चाहते हैं
घबराना नहीं वगैरह कहते हुए लेकिन किसी भी जानकारी के लिए चौकन्ने
जब तक कि कोई चपरासी या बाबू
तंग आकर उन्हे झिड़के और बाहर कर दे
तिसपर भी वे उसे बार-बार हाथ जोड़ते हुए बाहर आते हैं
पता लगाने की कोशिश करते हुए कि डिक्टेशन कौन देगा
कौन जाँचेगा पर्चों को
फिर कौन बैठेगा इन्टरव्यू में
बड़े बाबुओं और अफ़सरों के पूरे नाम और पते पूछते हुए
कौन जानता है कोई बिरादरी का निकल आए
या दूर की ही जान-पहचान का
या अपने शहर या मुहल्ले का
उन्हें मालूम है ये चीज़ें कैसे होती हैं
मुमकिन है कि वे चाय पीने जाते हुए मुलाज़िमों के साथ हो लें
पैसे चुकाने का मौका ढूँढते हुए
अपनी बच्ची के लिए चाय और कोई खाने की चीज़ की तलाश के बहाने
उनके आधे अश्लील इशारों सुझावों और मज़ाकों को
सुना-अनसुना करते हुए नासमझ दोस्ताने में हँसते हुए
इस दफ़्तर में लगे हुए या मुल्क के बाहर बसे हुए
अपने बड़े रिश्तेदारों का ज़िक्र करते हुए
वे हर अंदर आने वाली लड़की से वादा लेंगे
कि वह लौटकर अपनी सब बहनों को बताएगी कि क्या पूछते हैं
और उसके बाहर आने पर उसे घेर लेंगे
और उसकी उदासी से थोड़े ख़ुश और थोड़े दुखी होकर उसे ढाढस बँधाएँगे
अपनी-अपनी चुप और पसीने पसीने निकलती लड़की को
उसकी अस्थायी सहेलियों और उनके पिताओं के सवालों के बाद
कुछ दूर ले जाकर तसल्ली देंगे
तू फिकर मत कर बेटा बहुत मेहनत की है तूने इस बार
भगवान करेगा तो तेरा ही हो जाएगा वगैरह कहते हुए
और लड़कियाँ सिर नीचा किए हुए उनसे कहती हुईं पापा अब चलो
लेकिन आख़िरी लड़की के निकल जाने तक
और उसके बाद भी
जब इन्टरव्यू लेने वाले अफसर अंग्रेजी में मज़ाक़ करते हुए
बाथरूम से लौटकर अपने अपने कमरों में जा चुके होते हैं
तब तक वे खड़े रहते हैं
जैसा भी होगा रिज़ल्ट बाद में घर भिजवा दिया जाएगा
बता दिए जाने के बावजूद
किसी ऐसे आदमी की उम्मीद करते हुए जो सिर्फ़ एक इशारा ही दे दे
आफ़िस फिर आफ़िस की तरह काम करने लगता है
फिर भी यक़ीन न करते हुए मुड़ मुड़कर पीछे देखते हुए वे उतरते हैं भारी टाइपराइटर और मन के साथ जो आए थे रिक्शों पर वे जाते हैं दूर तक
फिर से रिक्शे की तलाश में
बीच बीच में चादर में बँधे टाइपराइटर को फ़ुटपाथ पर रखकर सुस्ताते हुए
ड्योढ़ा किराया माँगते हुए रिक्शेवाले और ज़माने के अंधेर पर बड़बड़ाते हुए
फिर अपनी लड़की का मुँह देखकर चुप होते हुए
जिनकी साइकिलें दफ्तर के स्टैंड पर हैं
वे बाँधते हैं टाइपराइटर कैरियर पर
स्टैंडवाला देर तक देखता रहता है नीची निगाह वाली लड़की को
जो पिता के साथ ठंडे पानी की मशीनवाले से पाँच पैसा गिलास पानी पीती है
और इमारत के अहाते से बाहर बैठती है साइकल पर सामने
दूर से वह अपने बाप की गोद में बैठी जाती हुई लगती है

Tuesday, October 16, 2012

जो मार खा रोईं नहीं


विष्णु खरे जी की एक कविता मैंने कल यहाँ लगाई थी. उसके और आज लगी जा रही कविता के अलावा अगले दिनों में उनकी जो कवितायेँ यहाँ लगने जा रही हैं, वे सब उनके संग्रह “सब की आवाज़ के पर्दे में” में हैं.

संग्रह का शीर्षक बाबा मीर तक़ी मीर के एक शेर का क़ाफ़िया है –

गोश को होश के टुक खोल के सुन शोर-ए-जहां
सब की आवाज़ के पर्दे में सुख़नसाज़ है एक

यहाँ मीर आप को बतला रहे हैं कि ज़रा अपने भीतर के कानों को खोल कर दुनिया के शोर को सुना जाय. अगला इसरार यह करते हैं कि प्रत्यक्षतः सुनाई दे रही दुनिया की आवाज़ ज़िन्दगी की जिन तफ़सीलों पर पर्दा डाले हुए हैं, उन तफ़सीलों की सुख़नवरी को समझिये.

इसके लिए सिर्फ़ कवि हो जाना बहुत नहीं होता. ज़रूरी यह है कि आप के भीतर शोर और आवाज़ की भीड़ में से कविता को अलग करने की क़ूव्वत हो. और वह भी बेहद सचेत तार्किक तरीके से.

इस कविता में और अपनी तमाम बाक़ी कविताओं में विष्णु जी यह करते जाते है. पढ़िए उनकी यह कविता –



जो मार खा रोईं नहीं

तिलक मार्ग थाने के सामने
जो बिजली का एक बड़ा बक्स है
उसके पीछे नाली पर बनी झुग्गी का वाक़या है यह

चालीस के करीब उम्र का बाप
सूखी सांवली लम्बी सी काया परेशान बेतरतीब बड़ी दाढ़ी
अपने हाथ में एक पतली हरी डाली लिए खड़ा हुआ
नाराज़ हो रहा था अपनी
पांच साल और सवा साल की बेटियों पर
जो चुपचाप उसकी तरफ ऊपर देख रही थीं

गुस्सा बढ़ता गया बाप का
पता नहीं क्या हो गया था बच्चियों से
कुत्ता खाना ले गया था
दूध दाल आटा चीनी तेल केरोसीन में से
क्या घर में था जो बगर गया था
या एक या दोनों सड़क पर मरते-मरते बची थीं
जो भी रहा हो तीन बेंतें लगीं बड़ी वाली की पीठ पर
और दो पडीं छोटी को ठीक सर पर
जिस पर मुंडन के बाद छोटे भूरे बाल आ रहे थे

बिलबिलाई नहीं बेटियाँ एकटक देखती रहीं बाप को तब भी
जो अन्दर जाने के लिए धमका कर चला गया
उसका कहा मानने से पहले
बेटियों ने देखा उसे
प्यार करुना और उम्मीद से
जब तक कि वह मोड़ पर ओझल नहीं हो गया.