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Thursday, October 23, 2008

सुमित्रानंदन पंत की कविताः विजय

कौसानी (बागेश्वर, अल्मोड़ा) में जन्में सुमित्रानंदन पंत को प्रकृति का सुकुमार कवि भी कहा जाता था, उनका वास्तविक नाम गौंसाई दत्त था जिसे बाद में पसंद ना आने के कारण उन्होंने बदल कर सुमित्रानंदन रख लिया। उन्ही की लिखी है ये कविता विजय।

मैं चिर श्रद्धा लेकर आई
वह साध बनी प्रिय परिचय में,
मैं भक्ति हृदय में भर लाई,
वह प्रीति बनी उर परिणय में।

जिज्ञासा से था आकुल मन
वह मिटी, हुई कब तन्मय मैं,
विश्वास माँगती थी प्रतिक्षण
आधार पा गई निश्चय मैं।

प्राणों की तृष्णा हुई लीन
स्वप्नों के गोपन संचय में,
संशय भय मोह विषाद हीन
लज्जा करुणा में निर्भय मैं।

लज्जा जाने कब बनी मान,
अधिकार मिला कब अनुनय में
पूजन आराधन बने गान,
कैसे, कब? करती विस्मय मैं।

उर करुणा के हित था कातर
सम्मान पा गई अक्षय मैं,
पापों अभिशापों की थी घर,
वरदान बनी मंगलमय मैं।

बाधा-विरोध अनुकूल बन
अंतर्चेतन अरुणोदय में,
पथ भूल विहँस मृदु फूल बने,
मैं विजयी प्रिय, तेरी जय में।

Tuesday, September 30, 2008

डा शिवमंगल सिंह सुमन की कविता: आभार

कबाड़खाने के एक साल पूरा होने के उपलक्ष्य में डा शिवमंगल सिंह सुमन (जीवनकालः १९१५-२००२) की लिखी कविता आभार स्वरूप पेश है। शिवमंगल सिंह सुमन को सन् १९७४ में साहित्य अकादमी पुरस्कार और सन् १९९९ में पद्म भूषण से नवाजा गया है।

आभार

जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद।
जीवन अस्थिर अनजाने ही, हो जाता पथ पर मेल कहीं,
सीमित पग डग, लम्बी मंज़िल, तय कर लेना कुछ खेल नहीं।
दाएँ-बाएँ सुख-दुख चलते, सम्मुख चलता पथ का प्रमाद
जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद।

साँसों पर अवलम्बित काया, जब चलते-चलते चूर हुई,
दो स्नेह-शब्द मिल गये, मिली नव स्फूर्ति, थकावट दूर हुई।
पथ के पहचाने छूट गये, पर साथ-साथ चल रही याद
जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद।

जो साथ न मेरा दे पाये, उनसे कब सूनी हुई डगर
मैं भी न चलूँ यदि तो क्या, राही मर लेकिन राह अमर।
इस पथ पर वे ही चलते हैं, जो चलने का पा गये स्वाद
जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद।

कैसे चल पाता यदि न मिला होता मुझको आकुल अंतर
कैसे चल पाता यदि मिलते, चिर-तृप्ति अमरता-पूर्ण प्रहर
आभारी हूँ मैं उन सबका, दे गये व्यथा का जो प्रसाद
जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद।