Wednesday, February 5, 2014

अधिक से अधिक लोगों को अधिक से अधिक गीत गाने को प्रोत्साहित करो - पीट सीगर


पिछले दिनों पीट सीगर का देहांत हो गया था. मैं चाहकर भी उस मौके पर कबाडखाने पर कुछ पोस्ट नहीं कर सका था.  

पिछले पचास सालों में अमेरकी संगीत पर पीट सीगर से ज़्यादा किसी का प्रभाव नहीं है. पीट सीगर यानी गायक, गीतकार, गीतों के अन्वेषक, बैंजो वादक, लोकगीतों के पितामह और सबसे ऊपर मानवाधिकारों के पक्ष में खड़ी एक आवाज़.

पीट राजनैतिक और सांगीतिक, दोनों दृष्टियों से ‘रेडिकल’ रहे हैं. उन्हें पूजा जाता है (और ब्लैकलिस्ट भी किया जाता है) क्योंकि उनका संगीत संसार को बदलता जाता है – वे अन्याय की पहचान करते हैं चाहे वह कहीं भी हो रहा हो और दुनिया को बेहतर स्थान बनाने के अपने संघर्ष में लगे रहते हैं.

संगीत उनके स्वप्न के वाहक का काम करता है. पीट के लिए किसी भी तरह का संगीत जीवन की महान और बेहतर वस्तुओं में शुमार है. संगीत को परफॉर्म करना – चाहे गाना हो या बजाना – सिर्फ “मनोरंजन” नहीं उसे बेहतर बनाते जाना है. उन्होंने लोकसंगीत की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं ली. उन्होंने उसे सीखा, गाया, बजाया, सिखाया और किसी इवांजेलिस्ट की तरह उसका प्रचार किया. यह सब उन्होंने खुद भी किया, वूडी गुट्री और लीडबेली जैसे मेंटरों के साथ भी और ‘वीवर्स’ और ‘अल्मनाक सिंगर्स’ जैसे ग्रुप्स के साथ भी.

अगर पीट के जीवन में कोई योजना थी तो उसे थोड़े ही शब्दों में बताया जा सकता है – अधिक से अधिक लोगों को अधिक से अधिक गीत गाने को प्रोत्साहित करो. ताकि और ज्यादा लोग एक दूसरे को सुन सकें. और ज्यादा लोग गाने गायें और सुनने लायक चीज़ें सुनाएं. इन विचारों ने कई पीढ़ियों को प्रभावित किया. और जिन लोगों ने पीट के ज्ञान का अनुसरण किया उन्हें अपने संगीत में कुछ ख़ास खोज पाने का मौक़ा मिला. उन्हें खुद अपने ऐसे बेहतरीन संस्करण मिले जिनके बारे में उन्होंने सोचा तक न था.

जल्द ही आपको पीट सीगर के अल्बम 'द एसेंशियल पीट सीगर' से कई गीत सुनने को मिलेंगे. फिलहाल उन्हें श्रद्धांजलि के साथ उनका सबसे ख्यात गीत "वी शैल ओवरकम"



We shall overcome, 
We shall overcome, 
We shall overcome, some day.

Oh, deep in my heart,
I do believe
We shall overcome, some day.

We'll walk hand in hand, 
We'll walk hand in hand, 
We'll walk hand in hand, some day.

Oh, deep in my heart,
I do believe
We shall overcome, some day.

We shall live in peace, 
We shall live in peace, 
We shall live in peace, some day.

Oh, deep in my heart,
I do believe
We shall overcome, some day.

We are not afraid, 
We are not afraid, 
We are not afraid, TODAY 

Oh, deep in my heart,
I do believe
We shall overcome, some day.

The whole wide world around
The whole wide world around
The whole wide world around some day

Oh, deep in my heart,
I do believe

We shall overcome, some day.

एक वसंत ऐसा भी - हरिशंकर परसाई

घायल वसंत
-हरिशंकर परसाई

  

कल बसंतोत्सव था. कवि वसंत के आगमन की सूचना पा रहा था -

प्रिय, फिर आया मादक वसंत.

मैंने सोचा, जिसे वसंत के आने का बोध भी अपनी तरफ से कराना पड़े, उस प्रिय से तो शत्रु अच्छा. ऐसे नासमझ को प्रकृति-विज्ञान पढ़ाएँगे या उससे प्यार करेंगे. मगर कवि को न जाने क्यों ऐसा बेवकूफ पसंद आता है .

कवि मग्न होकर गा रहा था -

'प्रिय, फिर आया मादक वसंत!'

पहली पंक्ति सुनते ही मैं समझ गया कि इस कविता का अंत 'हा हंत' से होगा, और हुआ. अंत, संत, दिगंत आदि के बाद सिवा 'हा हंत' के कौन पद पूरा करता? तुक की यही मजबूरी है. लीक के छोर पर यही गहरा गढ़ा होता है. तुक की गुलामी करोगे तो आरंभ चाहे 'वसंत' से कर लो, अंत जरूर 'हा हंत' से होगा. सिर्फ कवि ऐसा नहीं करता. और लोग भी, सयाने लोग भी, इस चक्कर में होते है. व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में तुक पर तुक बिठाते चलते है. और 'वसंत' से शुरू करके 'हा हंत' पर पहुँचते हैं. तुकें बराबर फिट बैठती हैं, पर जीवन का आवेग निकल भागता है. तुकें हमारा पीछा छोड़ ही नहीं रही हैं. हाल ही में हमारी समाजवादी सरकार के अर्थमंत्री ने दबा सोना निकालने की जो अपील की, उसकी तुक शुद्ध सर्वोदय से मिलाई - 'सोना दबानेवालो, देश के लिए स्वेच्छा से सोना दे दो.' तुक उत्तम प्रकार की थी; साँप तक का दिल नहीं दुखा. पर सोना चार हाथ और नीचे चला गया. आखिर कब हम तुक को तिलांजलि देंगे? कब बेतुका चलने की हिम्मत करेंगे?

कवि ने कविता समाप्त कर दी थी. उसका 'हा हंत' आ गया था. मैंने कहा, 'धत्तेरे की!' 7 तुकों में ही टें बोल गया. राष्ट्रकवि इस पर कम से कम 51 तुकें बाँधते. 9 तुकें तो उन्होंने 'चक्र' पर बाँधी हैं. (देखो 'यशोधरा' पृष्ठ 13) पर तू मुझे क्या बताएगा कि वसंत आ गया. मुझे तो सुबह से ही मालूम है. सबेरे वसंत ने मेरा दरवाजा भी खटखटाया था. मैं रजाई ओढ़े सो रहा था. मैंने पूछा - 'कौन?' जवाब आया - मैं वसंत. मैं घबड़ा उठा. जिस दुकान से सामान उधार लेता हूँ, उसके नौकर का नाम भी वसंतलाल है. वह उधारी वसूल करने आया था. कैसा नाम है, और कैसा काम करना पड़ता है इसे! इसका नाम पतझड़दास या तुषारपात होना था. वसंत अगर उधारी वसूल करता फिरता है, तो किसी दिन आनंदकर थानेदार मुझे गिरफ्तार करके ले जाएगा और अमृतलाल जल्लाद फाँसी पर टाँग देगा!

वसंतलाल ने मेरा मुहूर्त बिगाड़ दिया. इधर से कहीं ऋतुराज वसंत निकलता होगा, तो वह सोचेगा कि ऐसे के पास क्या जाना जिसके दरवाजे पर सबेरे से उधारीवाले खड़े रहते हैं! इस वसंतलाल ने मेरा मौसम ही खराब कर दिया.

मैंने उसे टाला और फिर ओढ़कर सो गया. आँखें झँप गईं. मुझे लगा, दरवाजे पर फिर दस्तक हुई. मैंने पूछा - कौन? जवाब आया - 'मैं वसंत!' मैं खीझ उठा - कह तो दिया कि फिर आना. उधर से जवाब आया - 'मैं. बार-बार कब तक आता रहूँगा? मैं किसी बनिए का नौकर नहीं हूँ; ऋतुराज वसंत हूँ. आज तुम्हारे द्वार पर फिर आया हूँ और तुम फिर सोते मिले हो. अलाल, अभागे, उठकर बाहर तो देख. ठूँठों ने भी नव पल्लव पहिन रखे हैं. तुम्हारे सामने की प्रौढ़ा नीम तक नवोढ़ा से हाव-भाव कर रही है - और बहुत भद्दी लग रही है.'

मैने मुँह उधाड़कर कहा - 'भई, माफ करना, मैंने तुम्हें पहचाना नहीं. अपनी यही विडंबना है कि ऋतुराज वसंत भी आए, तो लगता है, उधारी के तगादेवाला आया. उमंगें तो मेरे मन में भी हैं, पर यार, ठंड बहुत लगती है. वह जाने के लिए मुड़ा. मैंने कहा, जाते-जाते एक छोटा-सा काम मेरा करते जाना. सुना है तुम ऊबड़-खाबड़ चेहरों को चिकना कर देते हो; 'फेसलिफ्टिंग' के अच्छे कारीगर हो तुम. तो जरा यार, मेरी सीढ़ी ठीक करते जाना, उखड़ गई है.

उसे बुरा लगा. बुरा लगने की बात है. जो सुंदरियों के चेहरे सुधारने का कारीगर है, उससे मैंने सीढ़ी सुधारने के लिए कहा. वह चला गया.

मैं उठा और शाल लपेटकर बाहर बरामदे में आया. हजारों सालों के संचित संस्कार मेरे मन पर लदे हैं; टनों कवि-कल्पनाएँ जमी हैं. सोचा, वसंत है तो कोयल होगी ही. पर न कहीं कोयल दिखी न उसकी कूक सुनाई दी. सामने की हवेली के कंगूरे पर बैठा कौआ 'काँव-काँव' कर उठा. काला, कुरूप, कर्कश कौआ - मेरी सौदर्य-भावना को ठेस लगी. मैंने उसे भगाने के लिए कंकड़ उठाया. तभी खयाल आया कि एक परंपरा ने कौए को भी प्रतिष्ठा दे दी है. यह विरहणी को प्रियतम के आगमन का संदेसा देने वाला माना जाता है. सोचा, कहीं यह आसपास की किसी विरहणी को प्रिय के आने का सगुन न बता रहा हो. मै. विरहणियों के रास्ते में कभी नहीं आता; पतिव्रताओं से तो बहुत डरता हूँ. मैंने कंकड़ डाल दिया. कौआ फिर बोला. नायिका ने सोने से उसकी चोंच मढ़ाने का वायदा कर दिया होगा. शाम की गाड़ी से अगर नायक दौरे से वापिस आ गया, तो कल नायिका बाजार से आनेवाले सामान की जो सूची उसके हाथ में देगी, उसमें दो तोले सोना भी लिखा होगा. नायक पूछेगा, प्रिये, सोना तो अब काला बाजार में मिलता है. लेकिन अब तुम सोने का करोगी क्या? नायिका लजाकर कहेगी, उस कौए की चोंच मढ़ाना है, जो कल सबेरे तुम्हारे आने का सगुन बता गया था. तब नायक कहेगा, प्रिय, तुम बहुत भोली हो. मेरे दौरे का कार्यक्रम यह कौआ थोड़े ही बनाता है; वह कौआ बनाता है जिसे हम 'बड़ा साहब' कहते हैं. इस कलूटे की चोंच सोने से क्यों मढ़ाती हो? हमारी दुर्दशा का यही तो कारण है कि तमाम कौए सोने से चोंच मढ़ाते हैं, और इधर हमारे पास हथियार खरीदने को सोना नहीं हैं. हमें तो कौओं की चोंच से सोना खरोंच लेना है. जो आनाकानी करेंगे, उनकी चोंच काटकर सोना निकाल लेंगे. प्रिये, वही बड़ी गलत परंपरा है, जिसमें हंस और मोर की चोंच तो नंगी रहे, पर कौए की चोंच सुंदरी खुद सोना मढ़े. नायिका चुप हो जाएगी. स्वर्ण-नियंत्रण कानून से सबसे ज्यादा नुकसान कौओं और विरहणियों का हुआ है. अगर कौए ने 14 केरेट के सोने से चोंच मढ़ाना स्वीकार नहीं किया, तो विरहणी को प्रिय के आगमन की सूचना कौन देगा? कौआ फिर बोला. मैं इससे युगों से घृणा करता हूँ; तब से, जब इसने सीता के पाँव में चोंच मारी थी. राम ने अपने हाथ से फूल चुनकर, उनके आभूषण बनाकर सीता को पहनाए. इसी समय इंद्र का बिगड़ैल बेटा जयंत आवारागर्दी करता वहाँ आया और कौआ बनकर सीता के पाँव में चोंच मारने लगा. ये बड़े आदमी के बिगड़ैल लड़के हमेशा दूसरों का प्रेम बिगाड़ते हैं. यह कौआ भी मुझसे नाराज हैं, क्योंकि मैंने अपने घर के झरोखों में गौरैयों को घोंसले बना लेने दिए हैं. पर इस मौसम में कोयल कहाँ है? वह अमराई में होगी. कोयल से अमराई छूटती नहीं है, इसलिए इस वसंत में कौए की बन आई है. वह तो मौकापरस्त है; घुसने के लिए पोल ढूँढ़ता है. कोयल ने उसे जगह दे दी है. वह अमराई की छाया में आराम से बैठी है. और इधर हर ऊँचाई पर कौआ बैठा 'काँव-काँव' कर रहा है. मुझे कोयल के पक्ष में उदास पुरातन प्रेमियों की आह भी सुनायी देती है, 'हाय, अब वे अमराइयाँ यहाँ कहाँ है कि कोयलें बोलें. यहाँ तो ये शहर बस गए हैं, और कारखाने बन गए है.' मैं कहता हूँ कि सर्वत्र अमराइयाँ नहीं है, तो ठीक ही नहीं हैं. आखिर हम कब तक जंगली बने रहते? मगर अमराई और कुंज और बगीचे भी हमें प्यारे हैं. हम कारखाने को अमराई से घेर देंगे और हर मुहल्ले में बगीचा लगा देंगे. अभी थोड़ी देर है. पर कोयल को धीरज के साथ हमारा साथ तो देना था. कुछ दिन धूप तो हमारे साथ सहना था. जिसने धूप में साथ नही दिया, वह छाया कैसे बँटाएगी? जब हम अमराई बना लेंगे, तब क्या वह उसमें रह सकेगी? नहीं, तब तक तो कौए अमराई पर कब्जा कर लेंगे. कोयल को अभी आना चाहिए. अभी जब हम मिट्टी खोदें, पानी सींचे और खाद दें, तभी से उसे गाना चाहिए. मैं बाहर निकल पड़ता हूँ. चौराहे पर पहली बसंती साड़ी दिखी. मैं उसे जानता हूँ. यौवन की एड़ी दिख रही है - वह जा रहा है - वह जा रहा है. अभी कुछ महीने पहले ही शादी हुई है. मैं तो कहता आ रहा था कि चाहे कभी ले, 'रूखी री यह डाल वसन वासंती लेगी' - (निराला). उसने वसन वासंती ले लिया. कुछ हजार में उसे यह बूढ़ा हो रहा पति मिल गया. वह भी उसके साथ है. वसंत का अंतिम चरण और पतझड़ साथ जा रहे हैं. उसने माँग में बहुत-सा सिंदूर चुपड़ रखा है. जिसकी जितनी मुश्किल से शादी होती है, वह बेचारी उतनी ही बड़ी माँग भरती है. उसने बड़े अभिमान से मेरी तरफ देखा. फिर पति को देखा. उसकी नजर में ठसक और ताना है, जैसे अँगूठा दिखा रही है कि ले, मुझे तो यह मिल ही गया. मगर यह क्या? वह ठंड से काँप रही है और 'सीसी' कर रही है. वसंत में वासंती साड़ी को कँपकँपी छूट रही है.

यह कैसा वसंत है जो शीत के डर से काँप रहा है? क्या कहा था विद्यापति ने - ' सरस वसंत समय भल पाओलि दछिन पवन बहु धीरे! नहीं मेरे कवि, दक्षिण से मलय पवन नहीं बह रहा. यह उत्तर से बर्फीली हवा आ रही है. हिमालय के उस पार से आकर इस बर्फीली हवा ने हमारे वसंत का गला दबा दिया है. हिमालय के पार बहुत-सा बर्फ बनाया जा रहा है जिसमें सारी मनुष्य जाति को मछली की तरह जमा कर रखा जाएगा. यह बड़ी भारी साजिश है बर्फ की साजिश! इसी बर्फ की हवा ने हमारे आते वसंत को दबा रखा है. यों हमें विश्वास है कि वसंत आएगा. शेली ने कहा है, 'अगर शीत आ गई है, तो क्या वसंत बहुत पीछे होगा?’ वसंत तो शीत के पीछे लगा हुआ ही आ रहा है. पर उसके पीछे गरमी भी तो लगी है. अभी उत्तर से शीत-लहर आ रही है तो फिर पश्चिम से लू भी तो चल सकती है. बर्फ और आग के बीच में हमारा वसंत फँसा है. इधर शीत उसे दबा रही है और उधर से गरमी. और वसंत सिकुड़ता जा रहा है.


मौसम की मेहरबानी पर भरोसा करेंगे, तो शीत से निपटते-निपटते लू तंग करने लगेगी. मौसम के इंतजार से कुछ नहीं होगा. वसंत अपने आप नहीं आता; उसे लाया जाता है. सहज आनेवाला तो पतझड़ होता है, वसंत नहीं. अपने आप तो पत्ते झड़ते हैं. नए पत्ते तो वृक्ष का प्राण-रस पीकर पैदा होते हैं. वसंत यों नहीं आता. शीत और गरमी के बीच से जो जितना वसंत निकाल सके, निकाल लें. दो पाटों के बीच में फँसा है, देश का वसंत. पाट और आगे खिसक रहे हैं. वसंत को बचाना है तो जोर लगाकर इन दोनों पाटों को पीछे ढकेलो - इधर शीत को, उधर गरमी को. तब बीच में से निकलेगा हमारा घायल वसंत.

चमकाया हुस्ने यार ने क्या-क्या बसन्त का


जोशे निशात ओ ऐश है हर जा बसन्त का
हर तरफ़ा रोज़गारे तरब जा बसन्त का
बाग़ों में लुत्फ़ नश्वोनुमा की हैं कसरतें
बज़्मों में नग़्मा ख़ुशदिली अफ़्जा बसन्त का
फिरते हैं कर लिबास बसन्ती वो दिलबरां
है जिनसे ज़ेर निगार सरापा बसन्त का
जा दर पे यार के ये कहा हमने सुबह दम
ऐ जान है अब तो कहीं चर्चा बसन्त का
तशरीफ़ तुम न लाए जो करके बसन्ती पोश
कहिये गुनाह हमने क्या किया बसन्त का
सुनते ही इस बहार से निकला कि जिसके तईं
दिल देखते ही हो गया शैदा बसन्त का 
अपना वो ख़ुश लिबास बसन्ती दिखा नज़ीर
चमकाया हुस्ने यार ने क्या-क्या बसन्त का

Tuesday, February 4, 2014

धरती के बेल बूटे, अन्दाज़े नौ से फूटे



ताहिरा सैयद कर रही हैं बसन्त का इस्तकबाल.



यहां इस बात का ज़िक्र बेमानी नहीं होगा कि यही रचना उनकी माता मल्लिका पुखराज भी गा चुकी हैं.

लो फिर बसन्त आईलो फिर बसन्त आईफूलों पे रंग लाई.
...लो फिर बसन्त आईलो फिर बसन्त आईफूलों पे रंग लाई...
चलो बे दरंगलबे आबे गंगबजे जलतरंगमन पर उमंग छाई
लो फिर बसन्त आई फूलों पे रंग लाई , 

आफत गई खिज़ां कीकिस्मत फिरी जहाँ की,

चले मै गुसारसूये लाला जारमै पर्दादारशीशे के दर से झाँकी ,
आफत गई खिज़ां कीकिस्मत फिरी जहाँ की,
खेतों का हर चरिंदाखेतों हर चरिंदाबागों का हर परिंदा ,
कोई गर्म खेज़कोई नग़मा रेज़सुब को और तेज़,
फिर हो गया है ज़िन्दाबागों का हर परिंदा , 
खेतों का हर चरिंदा , धरती के बेल बूटे
अन्दाज़े नौ से फूटेहुआ पख्त सब्ज़मिला रख्त सब्ज़,
हैं दरख्त सब्ज़ , बन बन के सब्ज़ निकले ,
धरती के बेल बूटेअन्दाज़े नौ से फूटे,
है इश्क़ भीजुनूं भीहै इश्क़ भीजुनूं भी
कहीं दिल में दर्दकहीं आह सर्दकहीं रंग ज़र्द ,
है यूँ भी और यूँ भी , मस्ती भी जोशे खूँ भी , 
है इश्क़ भीजुनूं भी,

फूली हुई है सरसों , फूली हुई है सरसों
भूली हुई है सरसों , नहीं कुछ भी याद,
यूँ ही बामुरादयूँ ही शाद शाद ,
गोया रहे कि बरसोंफूली हुई है सरसों,
फूली हुई है सरसोंइक नाज़नीं ने पहनेइक नाज़नीं ने पहने
फूलों के ज़र्द गहनेहै मगर उदासनही पी के पास,
घमो रंजो यास , दिल को पड़े हैं सहने , इक नाज़नीं ने पहने,
फूलों के ज़र्द गहनेलो फिर बसन्त आई

लो फिर बसन्त आईफूलों पे रंग लाईलो फिर बसन्त आई ,

(फ़ोटो 'ट्रिब्यून' से साभार)

इकदम तो सब जमीनो जमां जर्द जर्द हो

कोई तीन साल पहले कबाड़खाने में बाबा नजीर अकबराबादी की वसंत छाई हुई थी. आज वसंत पंचमी के अवसर पर उसी वसंत को दोबारा लगा रहा हूँ इस उम्मीद के साथ कि यह ब्लॉग अब एक नई ऊर्जा से दुबारा खड़ा होगा.

आमीन.



आलम में जब बहार की लगन्त हो
दिल को नहीं लगन ही मजे की लगन्त हो
महबूब दिलबरों से निगह की लड़न्त हो
इशरत हो सुख हो ऐश हो और जी निश्चिंत हो

जब देखिए बसंत कि कैसी बसंत हो

अव्वल तो जाफरां से मकां जर्द जर्द हो
सहरा ओ बागो अहले जहां जर्द जर्द हो
जोड़े बसंतियों से निहां जर्द जर्द हो
इकदम तो सब जमीनो जमां जर्द जर्द हो

जब देखिए बसंत तो कैसी बसंत हो

मैदां हो सब्ज साफ चमकती रेत हो
साकी भी अपने जाम सुराही समेत हो
कोई नशे में मस्त हो कोई सचेत हो
दिलबर गले लिपटते हों सरसों का खेत हो

जब देखिए बसंत तो कैसी बसंत हो

ऑंखों में छा रहे हों बहारों के आवो रंग
महबूब दुलबदन हों खिंचे हो बगल में तंग
बजते हों ताल ढोलक व सारंगी और मुंहचंग
चलते हों जाम ऐश के होते हों रंग रंग

जब देखिए बसंत तो कैसी बसंत हो

चारों तरफ से ऐशो तरब के निशान हों
सुथरे बिछे हों फर्श धरे हार पान हों
बैठे हुए बगल में कई आह जान हों
पर्दे पड़े हों जर्द सुनहरी मकान हों

जब देखिए बसंत को कैसी बसंत हो

कसरत से तायफो की मची हो उलटपुलट
चोली किसी की मसकी हो अंगिया रही हो कट
बैठे हों बनके नाजनी पारियों के गट के गट
जाते हों दौड़-दौड़ गले से लिपट-लिपट

जब देखिए बसंत तो कैसी बसंत हो

वह सैर हो कि जावे जिधर की तरफ निगाह
जो बाल भी जर्द चमके हो कज कुलाह
पी-पी शराब मस्त हों हंसते हों वाह-वाह
इसमें मियां 'नज़ीर' भी पीते हों वाह-वाह

जब देखिए बसंत को कैसी बसंत हो

Thursday, January 30, 2014

पूछते पूछते पाटण

बचपन में घरवाले अक्सर कहते थे कि' पूछते पूछते तो आदमी पाटण भी पहुँच जाता है'.मैंने इस कहावत पर कभी गौर नहीं किया.घर से कहा जाता कि जाओ बाज़ार से कोकम के फूल ले आओ,या कि अरंडी का तेल ले आओ तो वाजिब बहाने के तौर पर झट से कह बैठता कि कहाँ मिलता है ये,मुझे नहीं पता.और जवाब आता बुधाणियों की दुकान पर मिल जाएगा.फिर टाला जाता कि नहीं मालूम कहाँ है इनकी दुकान. और फिर वही कहावत-'पूछते पूछते तो लोग पाटण भी पहुँच जाते हैं.'

एकाध बार सोचा था उस वक्त कि ये पाटण कौनसी जगह है और कहाँ है? फिर अपने पाठ्यक्रम में कहीं लिखा याद आता 'पाटलिपुत्र'.पटना.वही हो सकता है.वही, दूर,बिलकुल उस छोर पर,पूरब में.

पर अब जानता हूँ वो पाटण गुजरात का पाटण है.कभी थे इसके भी गर्व भरे दिन.इसकी कीर्ति दूर दूर तक थी और राजस्थान के हमारे इलाके तक पाटण की गौरव-पताका लहराती थी.राजस्थान के रेतीले अरण्य में पाटण नगर तक पहुंचना एक हसरत थी.फिर धीरे धीरे पाटण अपने वैभव को खोता गया.अचानक हुआ ये सब या धीरे धीरे पता नहीं पर इस तक पहुँचने की हसरत बनी रही.सिकुड़ने,सिमटने या ख़त्म होने के बावजूद पाटण एक हसरत के रूप में बना रहा.

पाटण अब एक छोटा सा शहर है.

पिछले साल पूछते पूछते यहाँ पहुँच गया था.कह नहीं सकता कि वहां जाना अपने पुरखों की हसरतों के शहर पहुँचने जैसा था या नहीं पर तात्कालिक वजह थी वहां एक बेहद ख़ास जगह को देखना.और ये जगह थी एक प्राचीन बावड़ी-'राणी नी वाव' यानी 'रानी की बावड़ी'.ये पाटण की एक ज़बरदस्त विरासत है. इसके शानदार अतीत का एक उदाहरण.कुछ फोटुओं में इसे आप भी देखें.







Saturday, January 18, 2014

टिम टिम रास्तों के अक्स - संजय व्यास को बधाई दीजिये

प्रिय  भाई और जोधपुर में रहने वाले श्रेष्ठ कबाड़ी संजय व्यास की किताब जल्द ही छप कर आ रही है. यह सूचना देते हुए मुझे बहुत खुशी और संतोष हो रहा है. संजय भाई को बधाई और किताब की सफलता के लिए शुभकामनाएं.


हिन्द युग्म प्रकाशन से ब्लॉग पर पोस्ट हुई गद्य रचनाओं का किताब के रूप में संग्रह 'टिम टिम रास्तों के अक्स' आने ही वाला है.किताब की ऑनलाइन बुकिंग व खरीद के लिंक्स ये रहे -

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Friday, January 3, 2014

एक पूर्व प्रेमी छिपता है एक हवा में, चिठ्ठियों के भंवर में चक्कर खाता - बेई दाओ की कवितायेँ ५


कल से शुरू कर के

मैं प्रवेश नहीं कर सकता संगीत के भीतर
सिर्फ़ झुका सकता हूँ अपने आप को काले रेकॉर्ड पर घूमने को
समय के एक धुंधले पार्क में घूमने को
बिजली के तय किये गए एक पार्श्व में
कल एक गूढ़ खुशबू निकल आई थी हरेक फूल के भीतर से
कल खोली गयी थीं फोल्डिंग कुर्सियां एक एक कर
हर किसी को बैठने की जगह मुहैया करतीं
बहुत देर से इंतज़ार कर रहे थे रोगी
सर्दियों के दिल को लेकर आओ
जब सोते का पानी और विशाल गोलियां
बन जाते हैं रात के शब्द
जब स्मृति भौंकती है
एक इंद्रधनुष से अभिशप्त होता है कालाबाजार

मेरे पिता के जीवन की लपट एक मटर के दाने जितनी
मैं उनकी प्रतिध्वनि हूँ
मुलाक़ातों के कोने को पलटता
एक पूर्व प्रेमी छिपता है एक हवा में
चिठ्ठियों के भंवर में चक्कर खाता

बीजिंग, , जाम उठाने दो मुझे
अपने लैम्पपोस्टों के नाम
बनाने दो मेरे सफ़ेद बालों को
काले नक़्शे पर अपना रास्ता
जैसे कि एक तूफ़ान आपको उड़ाये लिए जा रहा हो

मैं कतार में खड़ा इंतज़ार करता हूँ जब तक कि
छोटी खिड़की बंद नहीं हो जाती: ओ चमकीले चन्द्रमा
मैं घर जाता हूँ पुनर्मिलन
एक कम होते है
अलविदाओं से

Thursday, January 2, 2014

कंकाल का भुरभुरा सपना अब भी बचा हुआ है - बेई दाओ की कवितायेँ ४

कविता की कला

उस बड़े घर में जिसका मैं हूँ
सिर्फ़ एक मेज़ बच रही है , अथाह
दलदल से घिरी हुई
अलग -अलग कोनों से मुझ पर चमकता है चाँद
कंकाल का भुरभुरा सपना अब भी बचा हुआ है
दूर कहीं ध्वस्त कर दिए गए किसी चबूतरे की तरह,
और सादे पन्ने पर हैं कीचभरे पैरों के निशान
कई वर्षों तक खाना दिया गया था जिस लोमड़ी को
अपनी गुस्सैल फ़र के झटके से मुझे मनाती है और घायल करती है

और वहां हैं आप , ज़ाहिर है, अब भी मेरे सामने
खुशनुमा मौसम की बिजली जो दमकती है आपकी हथेली में
बदलती है लकड़ी में बदलती है राख में

Wednesday, January 1, 2014

जो भी देखता है समय, पाएगा कि वह अचानक बूढ़ा हो गया है - बेई दाओ की कवितायेँ ३


हमेशा ऐसा ही था यह ...

हमेशा ऐसा ही था यह
कि आग है सर्दियों का केंद्र
जब दहक रही होती हैं लकड़ियाँ
सिर्फ़ वही पत्थर जारी रखते हैं अपनी भयंकर चिंघाड़
जो नजदीक आना नहीं चाहते
हिरन के सींग पर बंधी घंटी बंद कर चुकी है बजना
जीवन एक अवसर है
सिर्फ़ एक अवसर
जो भी देखता है समय

पाएगा कि वह अचानक बूढ़ा हो गया है