Saturday, April 5, 2014

उम्मीद से ज़्यादा धोखेबाज़ कोई हताशा नहीं होती


दिल्ली में रहने वाले मानस भट्टाचार्य कवि हैं और राजनीति विज्ञान के अध्येता. उनकी कवितायेँ अंतर्राष्ट्रीय ख्याति की पत्रिकाओं और संग्रहों में छपी हैं और उनका पहला संग्रह ‘ग़ालिब का मकबरा और अन्य कवितायेँ’ नवम्बर २०१३ में ‘द लन्दन मैगज़ीन’ से प्रकाशित हुआ है. उनकी कुछ कविताओं का अनुवाद यहाँ प्रस्तुत करते हुए मुझे बहुत खुशी हो रही है. अनुवाद की हरेक कमी और गलती का पूरा ज़िम्मा मेरा है.  


१.
दिल्ली में बारिश

शहर का अतीत दुबका रहता है बारिश में

वह गिरती है बगैर छत के खंडहरों के ऊपर
गयी रात स्नान करती हैं टूटी मूर्तियाँ

घुलती है शहर की हवा
सारे परकोटे भीगे हुए हैं गूंजों से

ज़रा सुनो तो सही आँगन को
और कान धरो बादशाहों को अपनी शिकस्तें गिनते

अजनबी लगती थीं दिल्ली की बारिशें बाबर को
फ़तह की खुशबू नहीं

जब बारिश ढंकती है साम्राज्यों को
शायर तरजीह देता है शराब को बनिस्बत पांसे के

जिस तरह सफ़ेद पत्थर के किनारे कर दिया लाल वालों को
बंट जाया करती हैं बारिश की प्रतिबद्धताएं

मल्हार डुबो लेता है उस्ताद की आवाज़ को
वह गिरता है इतिहास के रंध्रों पर

बारिश थपेड़े मारती है १९८४ की स्मृतियों पर
एक विशाल पेड़ गिरता है हज़ार जानों पर

विस्मृति के इन्द्रधनुष बरसते हैं
नए अपराध धो देते हैं पुरानों को

गुजरते वक़्त की छत पर गिरती है बारिश
बारिश गिरती है विष्ठा के ढेर वाली धरती पर

दिल्ली मामूली बारिश के दो सूखे हुरूफ़
गर्द साफ़ करती अपने पपड़ाये अतीत की

 २.

महमूद दरवेश की याद में

मैंने तुम्हारी कविताओं से सीखा
किस तरह इंतज़ार किया जाए मौत का
और किस तरह इंतज़ार एक खेल होता है
मौत की तरह दगाबाज़.

मैंने तुमसे सीखा किस तरह इंतज़ार की जड़
जकड़ी होती है हताशा में
और उम्मीद से ज़्यादा धोखेबाज़
कोई हताशा नहीं होती.

इंतज़ार ने तुम्हारी मदद की उन गुलाबों को इकठ्ठा करने में
जो उन राहों पर सिर्फ उन मुसाफिरों के लिए उगते हैं
जो सफ़र करते हैं सबसे अकेली राह पर.

तुमने उन गुलाबों को संजो कर रखा उन रातों की
निशानियों की मानिंद जब गोलियों की आवाज़
तुम्हें याद दिलाती थी कितना मुश्किल होता है
चन्द्रमा के नीचे प्रेम करना.

जब तुम लादे चल रहे थे अपने कंधों पर लैंडस्केप
और खोज रहे थे अपना पता
दुश्मन हँसता था बादलों में से.

उन्होंने सोचा था कि बेघर हो चुकने की उन्हीं सतरों को
दोहराते तुम उकता ही जाओगे
मगर वे नहीं जानते थे जिनके पास घर नहीं होता
हमेशा लालसा रहती है स्मृतियों की उन्हें.

(यह कविता ‘द पैलेस्टीन क्रोनिकल’ के १५ फरवरी २०१३ के अंक में प्रकाशित हुई थी.)

३.

होली

राधा का दिल लिए
कृष्ण लौटे खुसरो बन कर

एक तोते की अभिलाषा में फंसा हुआ
नीली शरारतों वाला ग्वाला

प्रणय की निगाहों वाला देवता
एक निज़ाम के आगे अँधा हो जाता हुआ

कभी उसकी बांसुरी सुनकर थम जाते थे पैर
अब उसका तबला आज़ाद कर देता है घुंघरुओं को

ब्रज के मदहोश रंग
उनके कपड़ों पर पुत जाते हैं फारसी में

माशूकों की अगिन आँखें
अब एक माशूका की अनंत दीठ

प्रेम नहीं गाता बहाली की बाबत
डूब के राग की लय में

अगर दिल के चेहरे का फकत एक रंग होता है
तो उसकी आँखें, बकौल ख़ुसरो, कई सारी होती हैं

४.

बल्लीमारान की सैर

अब नहीं वो गली
कभी ख़त्म न होने वाले मनबहलावों की
चौपड़ की बाज़ी को थाम देने वाला  
न अब वो शे’र
एक ख़याल को उसकी मंजिल तक पहुंचाने
अब नहीं वह क़दमों की ठिठक
लफ़्ज़ों को पतंगों में तब्दील करती
वह प्रेरणा नहीं अब.

बिक्री के वास्ते टंगे जूतों की
एक मसरूफ़ धार है बल्लीमारान.

न टापों की आवाजें
न पालकियों के नज़ारे
हुक्म चलाते हुए रिआया पर.
जूते-चप्पलों का रंग
और गाड़ियों के हॉर्न
बताते हैं नागरिकों की तबीयत की बाबत.

एक आदमी से पूछता हूँ “किस तरफ पड़ेगा
ग़ालिब का घर?”
उसकी भंवें टेढ़ी हो जाती हैं, “आप ने उनसे पता क्यूँ नहीं पूछा? ख़ाली 
नाम से काम नहीं चलता.”

मैं लगता हूँ अपनी राह, बतलाता हुआ
ग़ालिब के प्रेत को “अपना पता खो चुका
है तुम्हारा नाम, तुम्हारा पता
उसकी पड़ोस. क्या यूं
फतह करता है कोई संसार को?”

नीली पोशाक वाला संतरी
पत्थर के भी ज़्यादा थका हुआ है. वह ले जाता है मुझे
भीतर उस पुराने आँगन में
जिसे बनाया गया है चाक-चौबंद.

बच्चों को बेवकूफ बनाने को
मंच पर की गयी जालसाजी को घूरता हूँ. किसी की
उपेक्षित अनुपस्थिति को ढँक सकना
आसान नहीं होता.

टेलीफोन बूथ
फोन करने वालों की नीरस हड़बड़ी
का एक नेपथ्य है. पुराने समय से बेहतर नहीं तराशता कोई
एक मुहाविरे को सम्पूर्णता में बदलता.

मैं सोचने लगता हूँ. अब कोई नहीं करता
आशीर्वादों की गिनती शराब से. कोई नहीं
करता ईश्वर की नाफ़रमानी विडम्बना के साथ. कोई
नहीं गूंथता रात को शे’रों में.

जब डूबने लगती है रोशनी भीतर चली आती है एक लड़की  
ग़ालिब के दिल की दुविधाओं को पढ़ने. अज़ान
उसकी तन्मय आँखों का ध्यान तोड़ती है. वह
अपने दुपट्टे में एक रहस्य तहाए हुए चली जाती है.

घर जाने का वक़्त हुआ. क़ासिम जान में
जो कुछ भी बच रहा है ग़ालिब का
उसे छोड़ कर जाने का वक़्त हुआ. छोड़ कर
जाने का वक़्त उसे जो क़ासिम जान  
का बच रहा है बल्लीमारान में.

नाम जो वाबस्ता हैं
एक दूसरे ही ज़माने से जब हवा
शायरी की सांस लेती थी. और एक शे’र भारी होता था
जूतों की एक जोड़ी से.


(बल्लीमारान पुरानी दिल्ली का इलाक़ा है जहां मिर्ज़ा ग़ालिब रहा करते थे.)

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नोट- मानस के संग्रह को पाने के लिए आवश्यक सूचना निम्नवत है:
प्रकाशक – द लन्दन मैगज़ीन, लन्दन, यू.के.
कीमत - २.९९ पाउंड/ ३०४ रूपये (किंडल संस्करण). अमेज़न पर उपलब्ध. पेपरबैक संस्करण प्रतीक्षित है.

सचमुच पता ही नहीं चला मंगल भाई

मूलतः छिंदवाड़ा के रहने वाले मोहन डहेरिया केन्द्रीय विद्यालय में नौकरी करते हैं. फ़िलहाल छत्तीसगढ़ के धमतरी में कार्यरत हैं. वे हिन्दी कविता का एक बहुस्वीकृत चेहरा हैं. उनके चार कविता संग्रह प्रकाशित हुए हैं. आज उनकी दो कवितायेँ ‘पहल’ के ताज़ा अंक से साभार –


पता ही नहीं चला

पता ही नहीं चला 
कब बदल गए हमारे रास्ते और मंजिलें मंगल भाई

पता ही नहीं चला

कब शामिल हो गए मेरी भाषा में
पिज्जा, ब्रांडेड जीन्स, लैपटाप, शेयर मार्केट तथा डालर जैसे शब्द
कब तुम्हारी बोली वाणी का हिस्सा हो गए
गरीबी रेखा कार्ड, कंट्रोल की दुकान, मिट्टी का तेल, बोहनी बट्टी, त्यौहारी बाजार जैसे शब्द
कब तीन चार कश के बाद मैं एशट्रे में मसलने लगा कीमती सिगरेट
कब कानों में खोंचने लगे तुम अधजली बीड़ी कि पी सको कई बार
कब लगा लिया मैंने कार में टी.वी. एसी तथा विदेशी म्यूजिक सिस्टम
कब चौड़ा करवा लिया तुमने साइकिल का कैरियर
लगवा ली उसके हैंडिल में लाइट
कब बीतने लगे मेरे गर्मियों के तपते दिन
शिमला, कुल्लू, मनाली, कश्मीर तथा डलहौजी में 
कब जेठ की लू से भरी तुम्हारी दोपहरें गुजरने लगी
गुड़ी, अम्बाड़ा राखीकोल, तांबिया तथा उमरेठ के बाजारों में
लगाते थे थिगड़ेदार पाल वाली दुकान
ऐसा तो नहीं था पहले
एक ही मां की कोख से पैदा हुए हम
एक ही आंगन में पले बढ़े
बचपन में जब फाड़ दी थी बब्बू ने मेरी पतंग
कैसे टूट पड़े थे तुम उस पर
और बेइमानी से टंगड़ी मार गिरा दिया था श्याम बघेल ने तुम्हें हॉकी के खेल में
कैसे गड़ा दिए थे मैंने उसके पैरों पर दांत
ज़ाहिर है
एक ही मिट्टी से जुड़ी थी हमारी जड़ें

पता ही नहीं चला
कब भूल गए मेरे शरीर के जीवाणु रोगों से लडऩे का हुनर
कब शिकार हो गया मैं उच्च रक्तचाप, मधुमेह, अनिद्रा और अवसाद का
कब घास फूस के बिजूके के मुक्के में तब्दील हो गया मेरा क्रोध और प्रतिरोध
कब मेरे जीवन सरोकारों में आ बैठा एक बहेलिया लेकर अपना जाल
जड़ ली मैंने अपने हाथ की अंगूठी में हीरे की जगह अपनी ही आत्मा

पता ही नहीं चला
कब लौह छड़ों में बदल गई बोझ ढोते ढोते तुम्हारे शरीर की हड्डियां
कब सीख ली कुत्ते की तरह जीभ से चाट चाट कर अपने घावों को ठीक करने की कला
किस दुकान से खरीद ली गाढ़ी और गहरी नींद
कब उतार फेंका अपने आक्रोश की देह से रेशमी लिबास
निकलने लगे मुँह से थूक के सच्चे गुस्सैल छींटे
कब करियाकर हो गया तुम्हार माथा प्रखर और ज्यादा मनुष्योचित
श्रम की धूप में झुलस-झुलस कर

सचमुच पता ही नहीं चला मंगल भाई
कब पीछे लग गया बदबू का एक झोंका
फूलों और इत्रों की खुशबू में डूबे मेरे उत्सवों के पीछे
गटर और कीड़ों से बिलबिलाती नालियों से घिरे घर में रहने के बावजूद
कैसे सने हैं जीवन की सुरभि से अभी तक तुम्हारे सारे त्यौहार.
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आओ संगीत आओ

आओ संगीत आओ
मेरे मस्तिष्क की कोशिकाओं को शक्तिशाली बनाओ
सामान्य करो मेरे शरीर के बढ़े हुए रक्तचाप को
कम करो देह की अकड़ी हुई मांसपेशियों का तनाव
पैदा करो मेरी जीभ की नष्ट हो गई स्वादग्रंथियों में संवेदनशीलता
ठीक करो मेरी विकृत वाक्शक्ति को

आओ संगीत आओ

वर्षों से जल रही मेरे कंठ में एक ही प्यास की लौ
वर्षों से एक ही घाव मेरे घर का पता
वर्षों से एक ही आग के दरिया के चारों ओर घूम रहा
कि करूँ तो कैसे करूँ तैर कर पार
वर्षों से एक ही ग्लानि को धुन रहा किसी धुनिये सा
रेशे-रेशे को देखता छाती पीटता

आओ संगीत आओ

मात्र मुझ पर न खत्म हो तुम्हारी यात्रा
लांघों देशों की सरहदें, पार करो महासागर और पहाड़
सोख लो खेतों, कारखानों तथा खदानों में काम करते
दुनिया के सारे मजदूरों के माथे का पसीना
मदद करो बाढ़, भूकंप से ढह गए घरों को खड़ा करने में
पीस डालो बलात्कार के बाद मार डाली गई बेटियों की पिताओं की आँखों में
ऊगी अनिन्द्रा की कीलें
पाठशालाओं में बच्चों के सिरों पर चट्टान सा लदे ज्ञान को कपास के फूल सा हल्का बनाओ
बजो चाहे हिन्दुस्तान के मंदिरों, सऊदी अरब की मस्जिदों या अमेरिका के चर्चों में
अफीम का नशा न पैदा करे तुम्हारी धुन
फुर्तीले, चौकन्ने और विवेकवान बने रहें मनुष्यों के चेतना के घोड़े

आओ संगीत आओ

सुबह की लालिमा में चमकते पर्वतों के सुनहरे शिखरों, शाम के धुँधलके में लिपटे जंगलों
तथा परिन्दों के कलरवों की मायावी दुनिया का रहस्य खोलो
ब्रह्माण्ड के हर कण की अस्मिता को रेखांकित करते हुए करो उसकी लय को उद्घाटित
बनो न किसी फूहड़ स्पर्धा का हिस्सा, न करो लहू की प्यासी किसी सेना का नेतृत्व
साज, साजिन्दे, गायक और श्रोताओं को एकाकार करते हुए आओ
करो मनुष्यों को जन्म और मृत्यु के खेल से मुक्त
सांप्रदायिकता और नस्लवाद के बीहड़ अंधेरे में भटकते दहशतगर्दों की भ्रमित बेचैन रूह को
सुकून के अनगिनत झिलमिलाते जुगनुओं से भर दो

आओ संगीत आओ
.

Friday, April 4, 2014

जो तुम से शहर में हों एक, दो,तो क्यों कर हो?



१९५८ में जन्मीं पाकिस्तानी गायिका मेहनाज़ बेग़म ने संगीत की तमाम विधाओं में काम किया, ख़ास तौर पर ग़ज़ल, ठुमरी, दादरा, ख़याल और ध्रुपद में. उनकी माँ कज्जन बेग़म भी एक ख्यात गायिका थीं. मेहनाज़ चित्रकारी भी किया करती थीं और उनकी पेंटिंग ‘मास्टरपीस’ बहुत प्रसिद्द हुई.

१९ जनवरी २०१३ को बहरीन के हवाई अड्डे पर उनका निधन हुआ जब वे फ्लोरिडा में अपना इलाज करवाने के बाद कराची वापस लौट रही थीं.


उनकी गाई मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़ल पेश है -

 

गयी वो बात के हो गुफ्तगू "तो क्यों कर हो"
कहे से कुछ न हुआ, फिर हो, तो क्यों कर हो ?

तुम्हीं कहो के गुज़ारा सनम परस्तों का,
बुतों की हो अगर ऐसी ही ख़ू तो क्यों कर हो?

उलझते हो तुम अगर देखते हो आइना,
जो तुम से शहर में हों एक, दो,तो क्यों कर हो?

मैं तुम्हारी भाषा में अपना अनुवाद होना चाहता हूं.


गंगोलीहाट, ज़िला पिथौरागढ़ के रहने वाले छब्बीस साल के उमेश पन्त दिल्ली में कुछ मीडिया वगैरह से वाबस्ता हैं. उनसे मुलाक़ात कोई हफ्ते भर और एक ‘ओल्ड कास्क’ रम की बोतल पुरानी है. उनकी ये कवितायेँ बहुत भरोसा दिलाती हैं कि इस मुश्किल, असंभव समय में भी प्रेम संभव है, कि लड़कपन और नई जवानी की मासूमियत बरकरार है और अपने लफ़्ज़ों से आपको गुदगुदा सकने की उसकी ताब में कोई कमी नहीं आई है. शुक्रिया उमेश बाबू इन कविताओं को कबाड़खाने पर भेजने के लिए-  


इफ़रात


काश मैं जीता कुछ दिन
कुछ न होने के लिए.
कुछ बनने की शर्त को 
प्याज के छिलके के साथ
फेंक आता कूड़ेदान में.
और निश्चिंत होकर
लगाता, 
सूरज में रोशनी का अनुमान.


रोशनी को भरकर बाल्टी में
उड़ेल आता
दीवार पर बनी
अपनी ही परछाई पर
और देखता उसे
सुनहला होते.


हवा के बीच कहीं ढ़ूंढ़ता फिरता
बेफिक्र अपने गुनगुनाये गीत
और सहेज लेता कुछ चुने हुए शब्द
अपनी कविता के लिए.


मैं आइने में खुद को देखता
कुछ न होते हुए
और बिखर जाता
जैसे हवा बिखर जाती है 
मन माफिक.
आइने में सिमट जाता
ओस की बूंदों सा
और बदल जाता आईना
दूब के खेत में. 
 

मेरी आंख बंद होती

मुठठी की तरह
और जब हथेली खुलती
वो समय होती
बिखर जाती खेतों में 
इफ़रात से.

 

तुम्हारा ख़याल

 

तुम्हारा ख्याल

गर्मियों में सूखते गले को
तर करते ठंडे पानी-सा
उतर आया ज़हन में.
और लगा
जैसे गर्म रेत के बीच
बर्फ की सीली की परत
ज़मीन पर उग आई हो.

सपने,
गीली माटी जैसे
धूप में चटक जाती है
वैसे टूट रहे थे ज़र्रा-ज़र्रा
तुम्हारा खयाल
जब गूंथने चला आया मिट्टी को
सपने महल बनकर छूने लगे आसमान.


तुम उगी
कनेर से सूखे मेरे खयालों के बीच
और एक सूरजमुखी
हवा को सूंघने लायक बनाता
खिलने लगा खयालों में.


पर खयाल-खयाल होते हैं.
तुम जैसे थी ही नहीं
न ही पानी, न मिट्टी, न महक.
गला सूखता सा रहा.
धूप में चटकती रही मिट्टी.
कनेर सिकुड़ते रहे
जलाती रेत के दरमियान.
और खयाल ... ?

औंधे मुंह लेटा मैं
आंसुओं से बतियाता हूं
और बूंद दर बूंद
समझाते हैं आंसू
के संभाल के रखना
जेबों में भरे खूबसूरत खयाल
घूमते हैं यहां जेबकतरे.


अनुवाद



यूं तो सब कुछ 
अनकहा ही अच्छा है 

फिर भी,
तुम सुनना चाहती हो तो सुनो 

मैं एक ऐसी बात होना चाहता हूं
जो तुम्हारे लहज़े में कही जाय

या फिर ये, कि

मैं तुम्हारी भाषा में 
अपना अनुवाद होना चाहता हूं.

Wednesday, April 2, 2014

लीक से हटना और नाफ़रमानी हरेक गोदने की परिभाषा हैं


टीना दास असम के जोरहट की रहने वाली हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी में एम.ए. कर रही हैं. अंग्रेज़ी में कविता लिखने वाली टीना की इन कविताओं में बकौल उनके उन्हीं की जी हुई चीज़ें अपने आप अपनी जगह बना लेती हैं. इन कविताओं में बहुत साहस नज़र आता है और एक पैनी समकालीन दृष्टि. विषयवस्तु की दृष्टि से भी इनमें एक अनूठापन है. ‘गोदना’ (tattoo) कविता में वे संत टेरेसा की छवि को ले आती हैं तो दूसरी वाली में समलैंगिकता की बेहद नज़दीक से पड़ताल करती हैं.  मैंने कुछ दिन पहले उनकी कुछेक कवितायेँ पढ़ी थीं और उन्हें हिन्दी में अनुवाद करने का मन बनाया था.

सो उन्हें उम्दा साहित्यिक भविष्य की शुभकामनाएं देता मैं उनकी दो कवितायेँ आपके लिए पेश करता हूँ. अनुवाद में हुई गलतियों और कमियों की पूरी ज़िम्मेदारी मेरी है -

गोदना

स्थिरता की स्याही,
एक देह के कैनवस की नसें उकेरती हुई,
दर्द के हरेक हचकोले में
मुझे दीखती है कला और ख़ूबसूरती.
लीक से हटना और नाफ़रमानी हरेक गोदने की परिभाषा हैं:
लेकिन मुझे दीखती है अनंत ख़ूबसूरती बस.
दर्द की मधुमक्खी और सृजन का रक्त
एक पैटर्न में उलझे हुए;
चुभती हुई चीख़ और दर्द की मुस्कराहट,
खुद का उकसाया पागलपन.
हरेक दफ़ा
तुम्हारे “क्यों” का जवाब नहीं देती मैं.
यह आनन्द की बरछी है जैसे संत टेरेसा ने महसूस किया था.
मैं दुनिया के लिए नहीं
अपने लिए परिभाषित करती हूँ इसे.
मैं इसे देखती हूँ स्थाईपन के अस्थायित्व की मानिंद,
मेरा आने वाला कल मेरे आज को नापसंद करेगा
लेकिन मेरे पास यह होगा, मेरे ऊपर हर दिन.

कल्पना का शिशु

अपने दिमाग की गोधूलि में
मैं रचती हूँ
सौन्दर्य की एक छवि?
शायद एक सांवले, उत्तेजक आकर्षण की  
दुलार छोड़ जाएगा अपने घाव: न भरे हुए डर लगता है बहते खून से.
या तो वह मुझे प्यार करेगी या मैं उसे,
क्या फर्क पड़ता है कौन हवा देता है लालसा को?
मैं उसकी पेशाब की आवाज़ सुनूंगी
बहती आती पानी की धार
मैं चाहूंगी उसकी लालसा मुझे डुबो ले,
वह जिसका स्वाद मुझे गली हुई चॉकलेट सा लगेगा गर्मियों में
मैं जानती हूँ कहीं बेहतर होगा उसका स्वाद.
लेकिन जब मैं उसके ख़यालों को महसूस करूंगी कम रह जाएगा स्वाद का मतलब.
उसका इन्कलाब और भारी उसका दिल
जब वह अनावृत्त करती है उन्हें, डूब जाती हूँ मैं
अपने ही द्रवों के ज़लज़ले में.