Friday, November 11, 2016

एवरीबडी नोज़ दैट द कैप्टेन लाईड


पसंदीदा गायक, कवि, चिन्तक लेनर्ड कोहेन का बीते दिनों देहांत हो गया. कबाड़ख़ाने में उन पर कई बार लिखा जा चुका है. श्रद्धांजलि के तौर पर उन्हीं का एक पुराना गीत जो आज भी ख़ासा प्रासंगिक है -
   


Everybody knows that the dice are loaded
Everybody rolls with their fingers crossed
Everybody knows that the war is over
Everybody knows the good guys lost
Everybody knows the fight was fixed
The poor stay poor, the rich get rich
That's how it goes
Everybody knows

Everybody knows that the boat is leaking
Everybody knows that the captain lied
Everybody got this broken feeling
Like their father or their dog just died

Everybody talking to their pockets
Everybody wants a box of chocolates
And a long stem rose
Everybody knows

Everybody knows that you love me baby
Everybody knows that you really do
Everybody knows that you've been faithful
Ah give or take a night or two
Everybody knows you've been discreet
But there were so many people you just had to meet
Without your clothes
And everybody knows

Everybody knows, everybody knows
That's how it goes
Everybody knows

Everybody knows, everybody knows
That's how it goes
Everybody knows

And everybody knows that it's now or never
Everybody knows that it's me or you
And everybody knows that you live forever
Ah when you've done a line or two
Everybody knows the deal is rotten
Old Black Joe's still pickin' cotton
For your ribbons and bows
And everybody knows

And everybody knows that the Plague is coming
Everybody knows that it's moving fast
Everybody knows that the naked man and woman
Are just a shining artifact of the past
Everybody knows the scene is dead
But there's gonna be a meter on your bed
That will disclose
What everybody knows

And everybody knows that you're in trouble
Everybody knows what you've been through
From the bloody cross on top of Calvary
To the beach of Malibu
Everybody knows it's coming apart
Take one last look at this Sacred Heart
Before it blows
And everybody knows

Everybody knows, everybody knows
That's how it goes
Everybody knows

Oh everybody knows, everybody knows
That's how it goes
Everybody knows

Everybody knows

Thursday, September 8, 2016

बच्चों को कैसे बताएं पाब्लो नेरूदा कौन थे

नोबेल विजेता पाब्लो नेरूदा (12 जुलाई 1904 - 23 सितम्बर 1973) न केवल मानव इतिहास के महानतम कवियों में से एक थे, वे एक ऐसे दुर्लभ मनुष्य भी थे जिन्हें मानव आत्मा का असाधारण और गहरा अंतर्ज्ञान भी था. मिसाल के तौर पर कबाड़खाने पर कल लगाई गयी पोस्ट एक अद्वितीय विषय पर उनके विचारों की बाबत बताती है कि किस तरह बचपन के एक अनुभव ने उन्हें सिखाया कि हम कला का निर्माण क्यों  करते हैं - इस विषय पर इससे बेहतर उपमा ढूँढने पर भी मिलना मुश्किल है.



इतने बड़े कवि को बच्चों से परिचित करा सकना खासा मुश्किल काम हो सकता है लेकिन मोनिका ब्राउन और जूली पाश्किस ने यह कारनामा कर दिखाया है. 'पाब्लो नेरुदा - पोयट ऑफ़ द पीपुल' नाम की किताब को मोनिका ब्राउन ने लिखा है और जूली ने उसमें इलस्ट्रेशन्स बनाए हैं और अपनी हैण्डराईटिंग में किताब को तैयार किया है. एक प्रिय मित्र के माध्यम से इस किताब का मिलना एक नए अनुभव से गुज़रना है. वही यहाँ साझा कर रहा हूँ.

किताब की शुरुआत में नेरुदा का परिचय इस तरह दिया गया है -

Once there was a little boy named Neftali, who loved wild things wildly  and quiet things quietly.

 From the moment he could talk, he surrounded himself with words.   Neftali discovered the magic between the pages of books. When he   was sixteen he began publishing his poems as Pablo Neruda.


 Pablo Neruda wrote poems about the things he loved - things made his artist friends, things found at the marketplace, and things he saw in   nature. He wrote about the people of Chile and their stories of struggle, because above all things and above all words, Pablo Neruda  loved people.              

कहानी शुरू होती है चिली में 1904 में कवि के जन्म से जिसे रेकार्दो एलीसेर नेफ्ताली रेयेस बासोआल्तो नाम दिया जाता है. उनके पिता को कविता लिखना पसंद नहीं है सो वे सोलह की आयु में अपना नाम पाब्लो नेरुदा रख लेते हैं और अपना काम प्रकाशित करवाना शुरू करते हैं. किताब में एक लेखक, राजनैतिक एक्टिविस्ट के तौर पर उनके विकसित होने की प्रक्रिया को तो साधारण शब्दों में दर्ज किया ही गया है यह भी बताया गया है कि भाषा, जन और जीवन को भरपूर प्रेम करने की चमकदार समझ और उत्साह उनके भीतर कैसे आये.

किताब से कुछ इलस्ट्रेशन्स पेश कर रहा हूँ.







Wednesday, September 7, 2016

तोहफ़ों का यह रहस्यमय लेनदेन - कला और नेरूदा

                                    उस भावना को महसूस करना जो उन लोगों से आती है जिन्हें हम नहीं जानते ... हमारे अस्तित्व की सीमा को विस्तार देती है और सभी जीवित चीज़ों को आपस में जोड़ती है.”
-पाब्लो नेरुदा

आदमी कला क्यों रचता है और कैसे उसका आनंद उठा पाता है - यह सवाल हमारे अनुभवों की एक स्थाई छाया की तरह हमें उस समय से लगातार परेशान करता रहा है जब हम गुफाओं  में रहा करते थे. 1950 के अपने एक लेख 'बचपन और कविता' में प्रिय कवि और नोबेल विजेता पाब्लो नेरूदा ने बेजोड़ शालीनता के साथ इस सवाल का उत्तर दिया है.

नेरुदा अपने बचपन के एक किस्से का ज़िक्र करते हैं :

युवा पाब्लो नेरुदा

" बचपन में एक दफ़ा तेमूको के अपने घर के पिछवाड़े में जब मैं अपने संसार की नन्हीं और सूक्ष्म चीज़ों को उलट-पुलट रहा था मुझे चारदीवारी के एक बोर्ड में एक छेद नज़र आया. मैंने छेद में आँख लगाकर देखा तो वही लैंडस्केप नज़र आया जो हमारे घर के पीछे हुआ करता था - परित्यक्त और जंगल से भरा हुआ. मैं कुछ कदम पीछे को हट गया क्योंकि मुझे अजीब सा अहसास हो रहा था कि कोई चीज़ घटने वाली है. अचानक एक हाथ प्रकट हुआ - करीब करीब मेरी ही उम्र वाले एक लड़के का छोटा सा हाथ. जब तक मैं उसके पास पहुंचा वह हाथ गायब हो चुका था और उसकी जगह एक शानदार सफ़ेद खिलौना भेड़ ने ले ली थी."

"भेड़ की ऊन फीकी पड़ चुकी थी. उसके पहिये निकल चुके थे. इस सब ने उसे और भी ज़्यादा वास्तविक बना दिया था. मैंने इतनी शानदार भेड़ कभी नहीं देखी थी. मैंने छेद में आँख लगाकर देखा लेकिन वह लड़का गायब हो चुका था. मैं घर के भीतर गया और वहां से अपना एक ख़ज़ाना बाहर निकाल लाया -  खुशबू और लीसे से भरपूर चीड़ का एक ठीठा जो मुझे बेतरह पसंद था. मैंने उसे उसी जगह पर रखा और भेड़ को अपने साथ ले कर चल दिया."

नेरुदा ने न वह हाथ दुबारा देखा न वह लड़का जिसका वह हाथ था. कुछ सालों बाद आग में जलकर वह खिलौना भेड़ भी ख़त्म हो गयी. लेकिन लड़कपन का वह अनुभव जिसकी सांकेतिकता में एक गहरी सादगी थी, उनके लिए जीवन भर की एक सीख बन गया - जिस पल उस बच्चे ने फीकी ऊन वाली उस भेड़ को थामा था उसी पल उसने पारस्परिकता की उस चाह को थाम लिया था जो हमें कला का निर्माण करने को मजबूर करती है.

"बंधुओं की अंतरंगता को महसूस करना जीवन की एक श्रेष्ठ चीज़ है. उन लोगों के प्यार को महसूस करना जिन्हें हम प्यार करते हैं, एक ऐसी आग की तरह होता है जो हमारे जीवन के लिए भोजन है. लेकिन उस भावना को महसूस करना जो उन लोगों से आती है जिन्हें हम नहीं जानते, उन अनजानों से जो हमारी नींद और हमारे अकेलेपन की पहरेदारी करते हैं, हमारे खतरों और हमारी कमजोरियों से हमारी हिफाज़त करते हैं - वह एक ऐसी चीज़ है जो कहीं ज़्यादा महान और सुन्दर होती है क्योंकि वह हमारे अस्तित्व की सीमा को विस्तार देती है और सभी जीवित चीज़ों को आपस में जोड़ती है."

"उस लेनदेन के बाद मुझे पहली बार एक मूल्यवान विचार आया - कि सारी मानवता किसी न किसी तरह से इकठ्ठा एक है ... आपको इस बात पर आश्चर्य नहीं करना चाहिये कि मैंने मानवीय भाईचारे के बदले में एक लीसेदार, धरती जैसी और खुशबू से भरी एक चीज़ देने की कोशिश की. जिस तरह मैंने चारदीवारी के पास चीड़ के उस ठीठे को रख कर छोड़ दिया था, तब से उसी तरह मैंने इतने सारे लोगों के दरवाजों पर अपने शब्दों को रख छोड़ा है जो मेरे लिए अजनबी थे, कैद में थे या उनका शिकार किया जा रहा था या जो अकेले थे."

1966 में रॉबर्ट ब्लाई को दिए गए एक इंटरव्यू में नेरूदा ने इस घटना का ज़िक्र करते हुए बताया है कि कैसे उसके बाद उनके रचनात्मक अनुभव को आकार मिलना शुरू हुआ. इत्तफाकन यह इंटरव्यू 'द लैम्ब एंड ए पाइनकोन' के नाम से प्रकाशित हुआ था. नेरुदा की कविता की एक पंक्ति है -

           रहस्य से भरा हुआ - तलछट की तरह
            गहरे पैठ गया मेरे भीतर - तोहफों का यह लेनदेन - 

Wednesday, August 3, 2016

सेनेका की सीखें - 4


"समय का इस्तेमाल करने में आपने उसकी तेज़ी को अपनी रफ़्तार से टक्कर देनी चाहिए, और आपने उस तेज़ रफ्तार से बह रही धारा में से जल्दी जल्दी पी लेना चाहिए जो हमेशा बहती नहीं रहेगी. ठीक जिस तरह यात्री वार्तालाप करने या पढ़ने से या गहरा चिंतन कर लेने से छला जाता है, और यह जानने से पहले कि वह अपनी मंजिल पर पहुँचने वाला था उसे लगता है वह अपनी मंजिल पर पहुँच गया है, जीवन की अनवरत और बेहद तेज़-रफ़्तार यात्रा के साथ भी यही होता है जिसे हम सोते और जागते उसी रफ़्तार से कर रहे होते हैं - चिंताओं में डूबे लोगों को इसका पता तब लगता है जब वह समाप्त हो चुकी होती है.

सारे लोगों में से केवल उन्हीं लोगों के पास खाली समय होता है जो दर्शन-विचार के लिए समय बनाते हैं, केवल वे ही लोग वास्तव में जीवित हैं. क्योंकि वे न सिर्फ अपनी जिन्दगानियों की भले से पहरेदारी करते हैं, वे हर युग को अपने समय के साथ मिला लेते हैं. जितने भी साल उनसे पहले बीत चुके हैं, वे उनके अपने सालों में जुड़ जाते हैं. अगर हम बहुत ज़्यादा अहसानफरामोश न हों तो उन सारे पवित्र मतों-सम्प्रदायों के प्रतिष्ठित संस्थापक हमीं में से पैदा हुए थे और उन्होंने हमारे लिए जीवन जीने का एक रास्ता बनाया. दूसरों की मेहनत से हमें उन चीज़ों की उपस्थिति के भीतर ले जाया जाता है जिन्हें अँधेरे से उजाले में लाया गया है.  
   
उनसे आप जो मर्जी चाहें ले सकते हैं: यह उनकी ग़लती नहीं होगी अगर आप उनमें से अपना हिस्सा न लें. जिस आदमी ने अपने आप को उनका मुवक्किल बना लिया उसके लिए क्या शानदार खुशी और कैसा ज़बरदस्त बुढ़ापा इंतज़ार कर रहा है! उसके पास दोस्त होंगे, सबसे महत्वपूर्ण और सबसे छोटी चीज़ों की बाबत जिनकी सलाह वह ले सकता है, जिनसे वह अपने खुद के बारे में रोज़ मशविरा कर सकता है, जो बिना उसे शर्मिंदा करे उसे सच बताएंगे और बिना उसकी चापलूसी किये उसकी तारीफ़ करेंगे, जो उसके आगे एक आदर्श पेश करेंगे जिस पर वह अपने आप को ढाल सकता है.


हमें यह कहने की आदत पड़ चुकी है कि यह हमारे अधिकार में नहीं था कि हम उन माता-पिताओं को चुन पाते जो हमें दिए गए और यह कि वे हमें बस यूं ही दे दिए गए. लेकिन हम यह तो चुन ही सकते हैं कि हम किसके बच्चे बनना चाहेंगे. सबसे उच्चकुलीन ज्ञान के घराने हुआ करते 
हैं - उनमें से उसे चुन लो जिसमें तुम गोद लिए जाना चाहते हो, और तुम्हें न सिर्फ उसका नाम मिलेगा उसकी संपत्ति भी तुम्हारी होगी. और इस संपत्ति का पहरा कंजूसी से या द्वेष के साथ करने की ज़रुरत नहीं होगी: उसे जितना बांटा जाएगा, वह उतनी ही अधिक होती जाएगी. वे तुम्हें अमरत्व का रास्ता पेश करेंगे और आपको एक ऐसे बिंदु तक उठा देंगे जहाँ से किसी को भी गिराया नहीं जाता. मनुष्य की भंगुरता को लंबा करने का यही इकलौता रास्ता है - यहाँ तक कि उसे अमरता में बदलने का भी."

Tuesday, August 2, 2016

सेनेका की सीखें - 3

पेंटिंग: 'द डैथ ऑफ़ सेनेका' - पीटर पॉल रूबेंस की कृति

"वे सब जो आपको अपने पास बुला रहे होते हैं, आपको अपने आप से दूर कर रहे होते हैं.

मुझे हमेशा हैरत होती है जब मैं देखता हूँ कि जब कुछ लोग दूसरों का समय मांगते हैं और उन्हें बहुत मेहरबान किस्म का रेस्पोंस मिलता है. दोनों पक्षों के पास उस कारण को देखने की दृष्टि होती है जिसके लिए समय को माँगा जा रहा है और उनमें से कोई भी समय की बाबत नहीं सोचता - जैसे कि कुछ भी न माँगा जा रहा हो और कुछ भी न दिया जा रहा हो. वे जीवन की सबसे मूल्यवान वास्तु के साथ खिलवाड़ कर रहे होते हैं; उन्हें धोखा होता है कि वह कोई अमूर्त चीज़ है, जिसका निरीक्षण नहीं किया जा सकता और जिस वजह से उसे बहुत सस्ता समझा जाता है - दरअसल उसकी कोई कीमत ही नहीं मानी जाती.

समय की कीमत को कोई नहीं आंकता: आदमी उसे इस तरह खुले हाथों इस्तेमाल करते हैं जैसे कि उसकी कोई कीमत ही न हो. हमें उसे बचाने के लिए ज़्यादा सावधान रहना चाहिए जो एक अनजाने बिंदु पर ख़त्म हो जाने वाला है.

बीत गए सालों को कोई भी वापस लेकर नहीं आएगा; कोई भी आपको आपके भीतर वापस लौटाने वाला नहीं. जीवन उसी राह पर चलता जाएगा जिस पर उसने चलना शुरू किया है, न वह वापस उसी दिशा में  लौटेगा न अपने रास्ते की पड़ताल करेगा. वह आपको अपनी तेज़ रफ़्तार की बाबत बताने के लिए कोई कोलाहल नहीं करेगा, बल्कि बिना आवाज़ किये बहता चला जाएगा. वह किसी राजा के आदेश या लोगों पर किसी अहसान के लिए  खुद को लंबा नहीं करेगा. जिस तरह वह पहले दिन शुरू हुआ था, वह उसी तरह चलता जाएगा - न वह थमेगा, न पलटेगा. नतीजा क्या होगा? जीवन भागा जाता है और आप अपने में उलझे रहे हैं. इसी दरम्यान मृत्यु आ जाएगी और आपके पास कोई विकल्प नहीं बचेगा सिवाय इसके कि आप खुद को उसके लिए उपलब्ध बनाएं.

चीज़ों को टालना जीवन की सबसे बड़ी बर्बादी है: यह हर दिन को उसके आते ही छीन लेता है, और भविष्य का वायदा करके हमसे हमारा वर्तमान छीन लेता है. जीवन को जीने में सबसे बड़ी बाधा है उम्मीद जो आने वाले कल वाले कल पर निर्भर करती है और आज को खो देती है. आप उसकी योजना बना रहे हैं जो भविष्य के नियंत्रण में है, और उसे त्याग रहे हैं जिस पर आपका नियंत्रण है. आपकी निगाह है किस चीज़ पर? आप किस लक्ष्य के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं? सारा भविष्य अनिश्चितता में है: अभी जियो."

(जारी)

सेनेका की सीखें - 2

"चिंतित आदमी किसी भी काम को सफलतापूर्वक नहीं कर सकता ... क्योंकि जब आप अन्यमनस्क होते हैं   आपका दिमाग किसी भी बात को गहरे नहीं समझ सकता,  उलटे वह हर उस चीज़ को नकारता है जो उसके भीतर दरअसल  ठूंसी जा रही होती हैं.  जीना एक अन्यमनस्क व्यक्ति के लिए सबसे गैरज़रूरी गतिविधि होती है; लेकिन सीखने को इससे मुश्किल कोई भी चीज़ नहीं. यह सीखना कि कैसे जिया जिया जाय पूरा जीवन ले लेता है; और आपको यह जानकर हैरत होगी कि यह सीखने में पूरा जीवन लग जाता है कि मरा कैसे जाय.

हर कोई अपने जीवन को आगे ठेलता जाता है और भविष्य की कामना और वर्तमान की थकन से परेशान रहता है. ऐसा आदमी जो अपने दिन को इस तरह व्यवस्थित करता है मानो वह उसका आख़िरी दिन हो, न तो अगले दिन की कामना करता है न उससे डरता है. इस जीवन में से कुछ भी निकाला नहीं जा सकता, और उसमें आप सिर्फ इतना ही जोड़ सकते हैं जैसे कि आप किसी पूरी तरह संतुष्ट व्यक्ति को वह भोजन दें जिसकी उसे इच्छा नहीं है और जिसे वह केवल थामे रह सकता है. सो आपको यह कभी नहीं सोच लेना चाहिए कि फलां व्यक्ति ने लंबा जीवन जिया है क्योंकि उसके बाल सफ़ेद हैं और जिस पर झुर्रियां गिर चुकी हैं. वह लम्बे समय तक जिया नहीं है, उसका बस लम्बे समय तक अस्तित्व बना रहा है. मान लीजिये कि एक आदमी एक ऐसी लम्बी यात्रा पर रहा जिसमें बंदरगाह छोड़ने के बाद से वह भीषण तूफानों में फंसा रहा और एक दूसरे के खिलाफ बहती हवाओं ने उसे इधर से उधर और उधर से इधर के तमाम चक्रों में उलझाए रखा. उसने कोई लम्बी यात्रा नहीं की, वह बस डोलता रहा.

यह अवश्यम्भावी है कि उन लोगों के लिए जीवन न सिर्फ बेहद छोटा होगा जो कड़ी मशक्कत से चीज़ों को हासिल करते हैं और जिन्हें अपने पास बनाए रखने के लिए जिन्हें और भी कड़ी मशक्कत करनी पड़े. उनका जीवन बहुत दुखी भी होगा. वे उन चीज़ों को श्रम करके प्राप्त करते हैं जिनकी उन्हें चाह होती है. उनके पास वह होता है जिसे उन्होंने बड़ी चिताओं से हासिल किया है. और इस दरम्यान वे उस समय का कोई हिसाब नहीं रखते जो कभी लौट कर नहीं आने वाला. नई चिताएं पुरानी चिंताओं की जगह ले लेती हैं, उम्मीद उत्तेजित होकर और उम्मीदें पैदा करती है और महत्वाकांक्षा और अधिक महत्वाकांक्षाएं. वे अपने दुख का अंत करने का जतन नहीं करते, वे बस उसके कारण को बदलते रहते हैं.


असल में उन सारे लोगों की स्थिति दुखभरी होती है जिनका मन कहीं और लगा होता है. लेकिन सबसे ज्यादा दुखी वे लोग होते हैं जो अपनी खुद की चिंताओं पर मेहनत नहीं करते; उलटे उन्हें अपनी नींद को दूसरों की नींद के आधार पर नियमित करना होता है, दूसरे के कदमों के हिसाब से चलना होता है, और उन्हें दुनिया की सबसे स्वतंत्र चीज़ों - प्रेम और घृणा - में दूसरों के आदेश मानने होते हैं. अगर ऐसे लोग यह जानना चाहते हैं कि उनके जीवन कितने संक्षिप्त हैं तो उन्हें इस बात पर विचार करने दो कि उनके जीवन का कितना हिस्सा उनका अपना है."

(जारी)

सेनेका की सीखें - 1


इटली के प्राचीन दार्शनिक सेनेका ने अपनी दो हज़ार साल पुरानी किताब 'ऑन द शॉर्टनेस ऑफ़ लाइफ़' में लिखा है - 

"ऐसा नहीं है कि हमें जीने के लिए कम समय मिलता है. दरअसल हम बहुत सारा समय बर्बाद कर देते हैं. जीवन पर्याप्त लम्बा होता है और अगर हम उसका सही निवेश करें तो उच्चतम उपलब्धियों को पा सकने के लिए वह समुचित मात्रा में उदार भी है. लेकिन जब उसे अनावश्यक सुख के लिए तबाह किया जाता है और अच्छे कामों में नहीं लगाया जाता, अंत में मृत्यु की आख़िरी लाचारी हमें मजबूर कर देती है कि हमें अहसास होने लगे कि वह बीत चुका है इसके पहले कि उसके बीतने का हमें पता लगता. सो दरअसल यह बात है: हमें संक्षिप्त जीवन नहीं मिलता मगर हम उसे संक्षिप्त बना देते हैं. और यह कि उसकी आपूर्ति हमारे लिए कम नहीं     है और हम उसे बर्बाद करते जाते हैं ... अगर हम जान सकें कि उसे कैसे इस्तेमाल किया जा सके, जीवन लंबा होता है. लोग अपनी व्यक्तिगत संपत्ति को बचाने के मामले में कंजूस होते हैं लेकिन जैसे ही मसला समय को बर्बाद करने का आता है वे उस चीज़ को यानी समय को लेकर सबसे ज़्यादा बर्बादी करते हैं जिसके लिए कंजूसी बरतना उनके हित में होता."

समय बर्बाद करने वालों के लिए उनके पास एक स्पष्ट फटकार भी है -

"तुम इस तरह जी रहे हो जैसे हमेशा जिए चले जाओगे. तुम्हें अपनी भंगुरता का ज़रा भी अहसास नहीं होता; तुम इस बात पर ध्यान नहीं देते कि कितना समय बीत चुका है, उलटे तुम उसे इस तरह बर्बाद करते हो जैसे  कि तुम्हारे पास उसकी भरपूर सप्लाई मौजूद है - जबकि हो सकता है कि जिस दिन को आप किसी और चीज़ या किसी और व्यक्ति पर लगा रहे हैं, वह आपका आख़िरी दिन हो. जिस चीज से तुम्हें भय लगता है उसके  सामने तुम नश्वर प्राणी की तरह व्यवहार करते हो, और जिसकी तुम्हें कामना होती है उसके सामने तुम अमर बन जाते हो ... जब जीवन ख़त्म होते को होता है,तब तक जीना शुरू करने के लिए कितनी देर हो चुकी होती है! अपनी नश्वरता को भूल जाना और अपनी विवेकपूर्ण योजनाओं को उम्र के पचासवें या साठवें साल तक  स्थगित करते जाना कितनी बड़ी मूर्खता है! कितनी बड़ी मूर्खता है कि आप जीवन को उस बिंदु से शुरू करने को लक्ष्य बना लेते हैं जहाँ तक बहुत कम लोग पहुँच सके हैं!"
                                                                                                                        (जारी)

ओपन हाउस फॉर बटरफ्लाइज़ - 3









ओपन हाउस फॉर बटरफ्लाइज़ - 2









ओपन हाउस फॉर बटरफ्लाइज़ - 1

अपने चालीस साल के लेखन करियर में बच्चों के लिए कोई तीस बेहतरीन किताबें रूथ क्रॉस (25 जुलाई 1901 -10 जुलाई 1993) ने लिखीं लेकिन उन्हें सबसे अधिक ख्याति उस लेखक-इलस्ट्रेटर जोड़ी ने दी जिसका एक हिस्सा वे खुद थीं और दूसरा मॉरिस सेन्डाक. आठ सालों की अपनी भागीदारी में उन्होंने कुछ बेहतरीन किताबें दीं जिनमें से एक मित्रता के बारे में थी - 'आई विल बी यू एंड यूं बी मी'. लेकिन इन दोनों की जोड़ी ने जो सबसे शानदार किताब तैयार की वह उनकी आठवीं और अंतिम थी जिसका शीर्षक था - 'ओपन हाउस फॉर बटरफ्लाइज़' 1960 में छपी यह किताब लम्बे इंतज़ार के बाद 2001 में पुनर्मुद्रित होकर आई. बच्चों और बड़ों को सामान रूप से आनंदित करने वाली यह किताब एक दफ़ा देखे-पढ़े जाने की दरकार रखती है. कुछ पन्ने देखिये -









उच्चवर्गीय कुत्ते का वर्ग चिंतन

एक मध्यवर्गीय कुत्ता
- हरिशंकर परसाई

मेरे मित्र की कार बंगले में घुसी तो उतरते हुए मैंने पूछा, “इनके यहां कुत्ता तो नहीं है?“ मित्र ने कहा, “तुम कुत्ते से बहुत डरते हो!मैंने कहा, “आदमी की शक्ल में कुत्ते से नहीं डरता. उनसे निपट लेता हूं. पर सच्चे कुत्ते से बहुत डरता हूं.
कुत्तेवाले घर मुझे अच्छे नहीं लगते. वहां जाओ तो मेजबान के पहले कुत्ता भौंककर स्वागत करता है. अपने स्नेही से नमस्तेहुई ही नहीं कि कुत्ते ने गाली दे दी- क्यों यहां आया बे? तेरे बाप का घर है? भाग यहां से !

बंगले में हमारे स्नेही थे. हमें वहां तीन दिन ठहरना था. मेरे मित्र ने घण्टी बजायी तो जाली के अंदर से वही भौं-भौंकी आवाज़ आयी. मैं दो क़दम पीछे हट गया. हमारे मेजबान आये. कुत्ते को डांटा- टाइगर, टाइगर!उनका मतलब था- शेर, ये लोग कोई चोर-डाकू नहीं हैं. तू इतना वफ़ादार मत बन.

कुत्ता ज़ंजीर से बंधा था. उसने देख भी लिया था कि हमें उसके मालिक खुद भीतर ले जा रहे हैं पर वह भौंके जा रहा था. मैं उससे काफ़ी दूर से लगभग दौड़ता हुआ भीतर गया. मैं समझा, यह उच्चवर्गीय कुत्ता है. लगता ऐसा ही है. मैं उच्चवर्गीय का बड़ा अदब करता हूं. चाहे वह कुत्ता ही क्यों न हो. उस बंगले में मेरी अजब स्थिति थी. मैं हीनभावना से ग्रस्त था- इसी अहाते में एक उच्चवर्गीय कुत्ता और इसी में मैं! वह मुझे हिकारत की नज़र से देखता.

शाम को हम लोग लॉन में बैठे थे. नौकर कुत्ते को अहाते में घुमा रहा था. मैंने देखा, फाटक पर आकर दो सड़कियाआवारा कुत्ते खड़े हो गए. वे सर्वहारा कुत्ते थे. वे इस कुत्ते को बड़े गौर से देखते. फिर यहां-वहां घूमकर लौट आते और इस कुत्ते को देखते रहते. पर यह बंगलेवाला उन पर भौंकता था. वे सहम जाते और यहां-वहां हो जाते. पर फिर आकर इस कु्ते को देखने लगते. मेजबान ने कहा, “यह हमेशा का सिलसिला है. जब भी यह अपना कुत्ता बाहर आता है, वे दोनों कुत्ते इसे देखते रहते हैं.’’

मैंने कहा, “पर इसे उन पर भौंकना नहीं चाहिए. यह पट्टे और ज़ंजीरवाला है. सुविधाभोगी है. वे कुत्ते भुखमरे और आवारा हैं. इसकी और उनकी बराबरी नहीं है. फिर यह क्यों चुनौती देता है!

रात को हम बाहर ही सोए. ज़ंजीर से बंधा कुत्ता भी पास ही अपने तखत पर सो रहा था. अब हुआ यह कि आसपास जब भी वे कुत्ते भौंकते, यह कुत्ता भी भौंकता. आखिर यह उनके साथ क्यों भौंकता है? जब वे मोहल्ले में भौंकते हैं तो यह भी उनकी आवाज़ में आवाज़ मिलाने लगता है, जैसे उन्हें आश्वासन देता हो कि मैं यहां हूं, तुम्हारे साथ हूं.

मुझे इसके वर्ग पर शक़ होने लगा है. यह उच्चवर्गीय कुत्ता नहीं है. मेरे पड़ोस में ही एक साहब के पास थे दो कुत्ते. उनका रोब ही निराला ! मैंने उन्हें कभी भौंकते नहीं सुना. आसपास के कुत्ते भौंकते रहते, पर वे ध्यान नहीं देते थे. लोग निकलते, पर वे झपटते भी नहीं थे. कभी मैंने उनकी एक धीमी गुर्राहट ही सुनी होगी. वे बैठे रहते या घूमते रहते. फाटक खुला होता तो भी वे बाहर नहीं निकलते थे. बड़े रोबीले, अहंकारी और आत्मतुष्ट.

यह कुत्ता उन सर्वहारा कुत्तों पर भौंकता भी है और उनकी आवाज़ में आवाज़ भी मिलाता है. कहता है- मैं तुममें शामिल हूं.उच्चवर्गीय झूठा रोब भी और संकट के आभास पर सर्वहारा के साथ भी- यह चरित्र है इस कुत्ते का. यह मध्यवर्गीय चरित्र है. यह मध्यवर्गीय कुत्ता है. उच्चवर्गीय होने का ढोंग भी करता है और सर्वहारा के साथ मिलकर भौंकता भी है. तीसरे दिन रात को हम लौटे तो देखा, कुत्ता त्रस्त पड़ा है. हमारी आहट पर वह भौंका नहीं, थोड़ा-सा मरी आवाज़ में गुर्राया. आसपास वे आवारा कुत्ते भौंक रहे थे, पर यह उनके साथ भौंका नहीं. थोड़ा गुर्राया और फिर निढाल पड़ गया. मैंने मेजबान से कहा, “आज तुम्हारा कुत्ता बहुत शांत है.’’

मेजबान ने बताया, “आज यह बुरी हालत में है. हुआ यह कि नौकर की गफ़लत के कारण यह फाटक से बाहर निकल गया. वे दोनों कुत्ते तो घात में थे ही. दोनों ने इसे घेर लिया. इसे रगेदा. दोनों इस पर चढ़ बैठे. इसे काटा. हालत ख़राब हो गयी. नौकर इसे बचाकर लाया. तभी से यह सुस्त पड़ा है और घाव सहला रहा है. डॉक्टर श्रीवास्तव से कल इसे इंजेक्शन दिलाउंगा.’’

मैंने कुत्ते की तरफ़ देखा. दीन भाव से पड़ा था. मैंने अन्दाज़ लगाया. हुआ यों होगा-

यह अकड़ से फाटक के बाहर निकला होगा. उन कुत्तों पर भौंका होगा. उन कुत्तों ने कहा होगा- अबे, अपना वर्ग नहीं पहचानता. ढोंग रचता है. ये पट्टा और ज़ंजीर लगाये हैं. मुफ़्त का खाता है. लॉन पर टहलता है. हमें ठसक दिखाता है. पर रात को जब किसी आसन्न संकट पर हम भौंकते हैं, तो तू भी हमारे साथ हो जाता है. संकट में हमारे साथ है, मगर यों हम पर भौंकेगा. हममें से है तो निकल बाहर. छोड़ यह पट्टा और ज़ंजीर. छोड़ यह आराम. घूरे पर पड़ा अन्न खा या चुराकर रोटी खा. धूल में लोट.’’ यह फिर भौंका होगा. इस पर वे कुत्ते झपटे होंगे. यह कहकर- अच्छा ढोंगी. दग़ाबाज़, अभी तेरे झूठे दर्प का अहंकार नष्ट किए देते हैं.

इसे रगेदा, पटका, काटा और धूल खिलायी.


कुत्ता चुपचाप पड़ा अपने सही वर्ग के बारे में चिन्तन कर रहा है.