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Wednesday, September 7, 2016

तोहफ़ों का यह रहस्यमय लेनदेन - कला और नेरूदा

                                    उस भावना को महसूस करना जो उन लोगों से आती है जिन्हें हम नहीं जानते ... हमारे अस्तित्व की सीमा को विस्तार देती है और सभी जीवित चीज़ों को आपस में जोड़ती है.”
-पाब्लो नेरुदा

आदमी कला क्यों रचता है और कैसे उसका आनंद उठा पाता है - यह सवाल हमारे अनुभवों की एक स्थाई छाया की तरह हमें उस समय से लगातार परेशान करता रहा है जब हम गुफाओं  में रहा करते थे. 1950 के अपने एक लेख 'बचपन और कविता' में प्रिय कवि और नोबेल विजेता पाब्लो नेरूदा ने बेजोड़ शालीनता के साथ इस सवाल का उत्तर दिया है.

नेरुदा अपने बचपन के एक किस्से का ज़िक्र करते हैं :

युवा पाब्लो नेरुदा

" बचपन में एक दफ़ा तेमूको के अपने घर के पिछवाड़े में जब मैं अपने संसार की नन्हीं और सूक्ष्म चीज़ों को उलट-पुलट रहा था मुझे चारदीवारी के एक बोर्ड में एक छेद नज़र आया. मैंने छेद में आँख लगाकर देखा तो वही लैंडस्केप नज़र आया जो हमारे घर के पीछे हुआ करता था - परित्यक्त और जंगल से भरा हुआ. मैं कुछ कदम पीछे को हट गया क्योंकि मुझे अजीब सा अहसास हो रहा था कि कोई चीज़ घटने वाली है. अचानक एक हाथ प्रकट हुआ - करीब करीब मेरी ही उम्र वाले एक लड़के का छोटा सा हाथ. जब तक मैं उसके पास पहुंचा वह हाथ गायब हो चुका था और उसकी जगह एक शानदार सफ़ेद खिलौना भेड़ ने ले ली थी."

"भेड़ की ऊन फीकी पड़ चुकी थी. उसके पहिये निकल चुके थे. इस सब ने उसे और भी ज़्यादा वास्तविक बना दिया था. मैंने इतनी शानदार भेड़ कभी नहीं देखी थी. मैंने छेद में आँख लगाकर देखा लेकिन वह लड़का गायब हो चुका था. मैं घर के भीतर गया और वहां से अपना एक ख़ज़ाना बाहर निकाल लाया -  खुशबू और लीसे से भरपूर चीड़ का एक ठीठा जो मुझे बेतरह पसंद था. मैंने उसे उसी जगह पर रखा और भेड़ को अपने साथ ले कर चल दिया."

नेरुदा ने न वह हाथ दुबारा देखा न वह लड़का जिसका वह हाथ था. कुछ सालों बाद आग में जलकर वह खिलौना भेड़ भी ख़त्म हो गयी. लेकिन लड़कपन का वह अनुभव जिसकी सांकेतिकता में एक गहरी सादगी थी, उनके लिए जीवन भर की एक सीख बन गया - जिस पल उस बच्चे ने फीकी ऊन वाली उस भेड़ को थामा था उसी पल उसने पारस्परिकता की उस चाह को थाम लिया था जो हमें कला का निर्माण करने को मजबूर करती है.

"बंधुओं की अंतरंगता को महसूस करना जीवन की एक श्रेष्ठ चीज़ है. उन लोगों के प्यार को महसूस करना जिन्हें हम प्यार करते हैं, एक ऐसी आग की तरह होता है जो हमारे जीवन के लिए भोजन है. लेकिन उस भावना को महसूस करना जो उन लोगों से आती है जिन्हें हम नहीं जानते, उन अनजानों से जो हमारी नींद और हमारे अकेलेपन की पहरेदारी करते हैं, हमारे खतरों और हमारी कमजोरियों से हमारी हिफाज़त करते हैं - वह एक ऐसी चीज़ है जो कहीं ज़्यादा महान और सुन्दर होती है क्योंकि वह हमारे अस्तित्व की सीमा को विस्तार देती है और सभी जीवित चीज़ों को आपस में जोड़ती है."

"उस लेनदेन के बाद मुझे पहली बार एक मूल्यवान विचार आया - कि सारी मानवता किसी न किसी तरह से इकठ्ठा एक है ... आपको इस बात पर आश्चर्य नहीं करना चाहिये कि मैंने मानवीय भाईचारे के बदले में एक लीसेदार, धरती जैसी और खुशबू से भरी एक चीज़ देने की कोशिश की. जिस तरह मैंने चारदीवारी के पास चीड़ के उस ठीठे को रख कर छोड़ दिया था, तब से उसी तरह मैंने इतने सारे लोगों के दरवाजों पर अपने शब्दों को रख छोड़ा है जो मेरे लिए अजनबी थे, कैद में थे या उनका शिकार किया जा रहा था या जो अकेले थे."

1966 में रॉबर्ट ब्लाई को दिए गए एक इंटरव्यू में नेरूदा ने इस घटना का ज़िक्र करते हुए बताया है कि कैसे उसके बाद उनके रचनात्मक अनुभव को आकार मिलना शुरू हुआ. इत्तफाकन यह इंटरव्यू 'द लैम्ब एंड ए पाइनकोन' के नाम से प्रकाशित हुआ था. नेरुदा की कविता की एक पंक्ति है -

           रहस्य से भरा हुआ - तलछट की तरह
            गहरे पैठ गया मेरे भीतर - तोहफों का यह लेनदेन - 

Monday, December 29, 2008

कला में एक ख़ास क़िस्म की ताज़गी और नयापन होना चाहिये



जाने माने चित्रकार मनजीत सिंह बावा की आज सुबह लम्बी बीमारी के बाद मृत्यु हो गई. तीन साल से कोमा में चल रहे थे बावा.

१९४१ में पंजाब में जन्मे बावा ने कॉलेज ऑफ़ आर्ट से डिग्री हासिल की थी. लन्दन स्कूल ऑफ़ प्रिन्टिंग, एसेक्स में उन्होंने स्क्रीन प्रिन्टिंग का डिप्लोमा किया और १९६७ से १९७१ तक लन्दन में स्क्रीन प्रिन्टर का काम किया.

बावा कहा करते थे: "आपकी कला में एक ख़ास क़िस्म की ताज़गी और नयापन होना चाहिये, वरना कला से जुड़े रहने का कोई मतलब नहीं होता. अलग होने का मतलब हुआ कि आप कुछ ऐसा करते हैं जो आपने पहले कभी नहीं किया होता."

रंगों की चमक और चटख से प्यार करने वाले इस कलाकार के जाने से भारतीय कला-संसार की बड़ी हानि हुई है. कबाड़ख़ाना उन्हें अपनी श्रद्धांजलि देता है.





(स्व. मनजीत बावा का फ़ोटो 'ट्रिब्यून' से साभार)

Tuesday, June 24, 2008

पाप का पुरस्कार और कला की राजनीति

(उम्मीद है कि कबाड़खाना के कलाप्रेमी पाठकों, दर्शकों श्रोताओं को इस चर्चा से एतराज न होगा। कला के सामाजिक- राजनीतिक पक्ष को लेकर बातचीत के लिए ये मंच सबसे उचित लगा, इसलिए यहां बात हो रही है। - दिलीप मंडल)
सौमित्र बाबू यानी सौमित्र चटर्जी यानी वो कलाकार जिनकी फिल्मों का मैं बचपन से फैन रहा हूं। मैंने जिंदगी में जो पहली फिल्म (सोनार केल्ला) देखी थी, उसके हीरो थे सौमित्र बाबू। उसके बाद हीरक राजार देशे, गणशत्रु, चारुलता से लेकर न जाने कितनी फिल्मों में उनके निभाए रोल अब भी याद आते हैं। अब उन्हीं सौमित्र बाबू को बेस्ट एक्टर का राष्ट्रीय सम्मान मिल रहा है। इस पर हम सबको खुश होना चाहिए!

लेकिन आज सौमित्र चटर्जी की चर्चा करते समय एक ऐसा चेहरा क्यों सामने आ रहा है जो हत्या के पक्ष में खड़ा है। जो अन्याय का समर्थक है। जो नंदीग्राम में हुए उत्पीड़न से दुखी नहीं है। बल्कि नंदीग्राम में खून-खराबे के पक्ष में हुई रैली में शामिल होता है, रैली को लीड करता है और भाषण में कहता है कि "जिन लोगों को (सीपीएम समर्थकों को) गांवों से खदेड़ दिया गया था वो छल-बल और कौशल से अपने घरों को लौट आए हैं। इसमें गलत क्या है?" जिन लोगों ने नंदीग्राम में सीपीएम की भूमिका की निंदा की उन्हें सौमित्रबाबू बुद्धिजीवी की जगह बुद्धुजीवी कहते हैं। देखिए इसकी रिपोर्टिंग। साथ लगी तस्वीर उसी रैली की है। साथ में जो सज्जन बैठे दिख रहे हैं वो संभवत: अजीजुल हक हैं, जो कभी नक्सली रहे और अब सीपीएम के साथ हैं।

सौमित्र बाबू ने 2001 में अपनी फिल्म देखा में भूमिका के लिए दिया गया स्पेशल ज्यूरी एवार्ड लेने से मना कर दिया था। देखा बनाने वासे फिल्मकार गौतम घोष ने भी उस साल बेस्ट फिल्म का अवार्ड नहीं लिया था। उस समय कई फिल्मकारों ने ये आरोप लगाया था कि ज्यूरी का भगवाकरण कर दिया गया है। ये आरोप सही भी था क्योंकि इस ज्यूरी की प्रमुख वैजयंतीमाला बीजेपी में थी और दूसरे सदस्यों में तरुण विजय, शत्रुध्न सिन्हा के पूर्व सचिव पवन कुमार से लेकर बेल्लारी में सुषमा स्वराज के चुनाव प्रचार की प्रभारी निवेदिता प्रधान तक शामिल थीं। ज्यूरी में मैकमोहन उर्फ सांभा भी थे और ये सिर्फ संयोग हो सकता है कि उस साल बेस्ट एक्ट्रेस का अवार्ड उनकी भतीजी रवीना टंडन को मिला, जो बीजेपी से करीब भी हैं।

बहरहाल 2008 में अलग किस्म की राजनीति आप नेशनल अवार्ड में देख सकते हैं। सौमित्र बाबू को बेस्ट एक्टर का अवार्ड जिस फिल्म (पदक्षेप) के लिए दिया जा रहा है वो खुद सौमित्र बाबू के मुताबिक उनकी श्रेष्ठ फिल्म नहीं है। उनका सबसे अच्छा दौर बीते 30 साल से ज्यादा समय हो चुका है। ऐसे सौमित्र बाबू को नंदीग्राम में उनके स्टैंड के तुरंत बाद राष्ट्रीय पुरस्कार मिलना अगर राजनीति नहीं है तो क्या है? सौमित्र बाबू, आप ये पुरस्कार लेंगे या नहीं?