Friday, November 16, 2007

`राग दरबारी´ : यह संगीत हमारे भीतर भी बज रहा है क्या ?


1970 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित श्रीलाल शुक्ल का उपन्यास `राग दरबारी´ आजादी के बाद के भारतीय जनमानस के सामाजिक जीवन की बहुरंगी छवियों , परिवर्तित - परावर्तित जनाकांक्षाओं , राजनीतिक सदाचार - कदाचार के सार्वजनिक स्वीकार - अस्वीकार , सरकारी - गैर सरकारी योजनाओं - परियोजनाओ -कार्यक्रमों की नीति-अनीति-परिणति , शैक्षिक संस्थानो में फल-फूल रही दार्शनिक दरिद्रता - दकियानूसी और दुकानदारी , बुद्धजीवी तबके की निस्पृह-निस्सार निस्संगता आदि-आदि का जीवंत दस्तावेज तो है ही साथ ही यह आम जनता की उस दुर्दम्य जिजीविषा का प्रमाण भी है जिसके लिए प्रतिकूलताओं का मतलब दैनंदिन चुनौती और दैनिक जीवन -व्यापार का एक पड़ाव भर है । शायद यही वजह है कि यह उपन्यास समाज के हर तबके द्वारा सराहा गया ।

`राग दरबारी´ की कथाभूमि शिवपालगंज हैं , एक छोटा-सा कस्बा या एक बड़ा-सा गांव ।यहां की पंचायत, कोआपरेटिव सोसाइटी , कालेज की प्रबंध समिति ,सबके सब आजादी के बाद के भारतीय सामाजिक तानबाने के प्रतिनिधि हैं । इनके बीच स्वार्थ, लोभ ,लिप्सा का खेल तो है ही , इन्ही के बीच जगह-जगह मानवीय करूणा, अपननत्व,, प्रेम,पीड़ा आदर्श की वे सरितायें भी हैं जिन्हें सदानीरा बनाये रखने की जद्दोजहद को हम लोग साहित्य , संस्कृति, कला , आस्था आदि-आदि का उद्देश्य या प्रयोजन के नाम से जानते समझते -समझाते हैं । यह उपन्यास हिन्दी कथा साहित्य में तेजी से तिरोहित होते हुए उस `स्पेस´ की उपस्थिति भी है जिसे गांव या कस्बा कहते हैं । साथ इस `स्पेस´ को लेकर बनी -बनाई उस रोमानी छवि के ध्वस्तीकरण की ईमानदार कोशिश भी जो ` अहा ग्राम्य जीवन भी क्या है ´ और मादल -मृदंग के `डिमिक - डिमिक ´ से आस्वाद ग्रहण कर उसी में आंख मूंदकर मुदित रहने की अभ्यस्त है ।
`राग दरबारी´ की भाषा-शैली का अपना एक अलग रंग है । लेखक के सामने इस बात की पूरी गुंजाइश थी कि वह बड़ी सरलता से इसकी भाषा को लोकल कलर या आंचलिक पुट दे सकता था लेकिन संभवत: ऐसा करने पर उसके कथानक की व्यापकता सीमाबद्ध हो जाती , वह अपनी लघुता में विराटता का रूपक प्रस्तुत करने में पिछड़ जाता , वह उतना बेधक और विध्वंसक नहीं रह पाता । कथ्य भाषा को किस तरह साधता है और भाषा कथ्य को कैसे कसती है ,यह इस उपन्यास के माध्यम से सीखा जा सकता है ।
`राग दरबारी´ निरन्तर वर्णनात्मकता में चलने वाला एक असमाप्त गद्य है । इसके पात्रों का एक अपना संसार है , वे शिवपालगंज के `गंजहे´ हैं । वैद्य जी, रूप्पन बाबू , रंगनाथ , सनीचर ,बद्री पहलवान , छोटे पहलवान, बाबू रामाधीन भीमखेड़वी, लंगड़ ,प्रिन्सिपल साहब, पं0 राधेलाल , खन्ना मास्टर ,मास्टर मोतीराम , कुसहर प्रसाद ,जोगनाथ इत्यादि पात्र अपनी दुनिया के भीतर ही एक सार्वजनिक दुनिया ( पब्लिक स्फीयर ) का खाका खीते चलते हैं । पाठक के लिए यह दुनिया नई भी है और अपनी भी । आजादी के बाद के हिन्दी उपन्यास साहित्य में `मैला आंचल´( फणीश्वर नाथ रेणु) के बाद `आधा गांव´( राही मासूम रज़ा) ,`तमस´( भीष्म साहनी) और `राग दरबारी´ की त्रयी ने काफी हलचल पैदा की थी । तीनों की कथाभूमि और कहने का अंदाज जुदा-जुदा था फिर भी तीनों ही एक साथ मिलकर भरतीय जनमानस के वृत्त को पूरा करते हैं ।

`राग दरबारी´ का आखरी हिस्से को श्रीलाल शुक्ल जी ने पलायन संगीत का नाम दिया है । तो आइए ! सुनते हैं वही संगीत । पर ध्यान रहे यह सुनना भी निहायत जरूरी है कि कहीं किसी कोने -कांतर में यह संगीत हमारे भीतर भी बज रहा है क्या ?

पलायन संगीत

तुम मंझोली हैसियत के मनुष्य हो और मनुष्यता के कीचड़ में फंस गए हो । तुम्हारे चारों ओर कीचड़ ही कीचड़ है। कीचड़ की चापलूसी मत करो । इस मुगालते में न रहो कि कीचड़ से कमल पैदा होता है । कीचड़ में कीचड़ ही पनपता है । वही फैलता है वही उछलता है ।
कीचड़ से बचो । यह जगह छोड़ो ।यहां से पलायन करो।

वहां ,जहां की रंगीन तस्वीरें तुमने `लुक´ और `लाइफ´ में खोजकर देखी हैं ( जहां के फूलों के मुकुट, गिटार और लड़कियां तुम्हारी आत्मा को हमेशा नए अन्वेषणों के लिए ललकारती हैं (जहां की हवा सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर है, जहां रविशंकर - छाप संगीत और महर्षि-योगी छाप अध्यात्म की चिरंतन स्विप्नलता है । जाकर कहीं छिप जाओ। यहां से पलायन करो । यह जगह छोड़ो.

नौजवान डाक्टरों की तरह ,इंजीनियरों ,वैज्ञानिकों , अंतरराष्ट्रीय ख्याति के लिए हुड़कने वाले मनीषियों की तरह ,जिनका चौबीस घंटे यही रोना है कि सबने यहां मिलकर उन्हे सुखी नहीं बनाया , पलायन करो, यहां के झंझटों में मत पड़ो।

अगर तुम्हारी किस्मत ही फूटी हो ,और तुम्हें यहीं रहना पड़े तो अलग से अपनी एक हवाई दुनिया बना लो । उस दुनिया में रहो जिसमें बहुत -से बुद्धिजीवी आंख मूंदकर पड़े हैं होटलों और क्लबों में ।शराबखानों और कहवाघरों में, चण्डीगढ़ - भोपाल - बंगलौर के नवनिर्मित भवनों में ,पहाड़ी आरामगाहों में ,जहां कभी न खत्म होने वाले सेमिनार चल रहे हैं। विदेशी मदद से बने हुए नए-नए शोध - संस्थानों में , जिनमें भारतीय प्रतिभा का निर्माण हो रहा है। चुरूट के धुयें ,चमकीली जैकेट वाली किताब और गलत , किन्तु अनिवार्य अंग्रेजी की धुन्ध वाले विश्वविद्यालयों में । वहीं जाकर जम जाओ ,फिर वहीं जमे रहो।

यह न कर सको तो तो अतीत में जाकर छिप जाओ । कणाद, पतंजलि, गौतम में , अजन्ता, ऐलोरा ,एलिफेंटा में , कोणार्क और खजुराहो में ,शाल -भंजिका -सुर -सुंदरी-अलसकन्या के स्तनों में, जप-तप-मंत्र में ,सन्त -समागम -ज्योतिष -सामुद्रिक में- जहां भी जगह मिले , जाकर छिप रहो।

भागो, भागो, भागो । यथार्थ तुम्हरा पीछा कर रहा है ।

12 comments:

munish said...

sara hindi sahitya ek taraf or raag darbari ek taraf. ye to har bharatvasi ke padhne ki cheej hai sidhu babu!

swapandarshi said...

राग दरबारी जिसने भी एक बार पढी होगी, ये तय है की बार बार पढी होगी। मेने ये किताब नैनीताल मे १९८८ मे पहली बार पढी थी। पहली बार इस पलायन संगीत की ध्वनी ने मुझे अगले पांच सालों से ज्यादा समय के लिए देश मे रोके रखा। जो अब मुझे बेवकूफी की माँ लगती है। इतनी मेहनत अगर इन पांच सालों मे मेने भारत से बाहर जा कर की होती, तो एक बहुत अच्छा शोध होता, ज्यादा की उम्मीद नही पर कुछ अच्छे पर्चे होते, और विज्ञान की गागर मे कुछ एक दो बूंदे गिर जाती, मेरे हाथ से भी। सो पलायन संगीत की मार खाने वालों का नुकशान ही होने वाला है। और शायद वृह्तर समाज का भी इससे क्या भला होने वाला है, जहाँ महत्व कंशाये, सपने और उर्जा कुंठा की पोटली बनकर घूमती रहे.

फिर दुबारा २००० मे पढी। इस बार कुछ ज्यादा मज़ा आया, एक तो इतना लम्बा समय अवध मे बिताया था और इस लिहाज़ से सामाजिक पृष्ठ भूमी थोडी और ज्यादा साफ हो गयी। दूसरा ये की हवाई आदर्शवाद से मैं बाहर निकल चुकी थी। हालांकी कुछ दूसरी चीजे भी मैंने इसमे नोटिस की जो पहली मर्तबा नही की थी। एक तो महिलाओं के किसी भी रोल की नामौजूदगी, परिवार और समाज मे भी, जो भारत के छोटे से छोटे गांवों का सच नही है। महिलाओं का संदर्भ पूरी किताब मैं सिर्फ वासना की एक वस्तु की तरह है। हमारे रामायण और महाभारत मे भी कई तरह की औरते है, जो विमर्श करती है, विद्रोह भी, ताडन भी देती है, मर्यादाये पूरी न पड़े तो नयी बनाती है। पर इस पुस्तक मे औरते इस तरह से गायब है, जैसे अक्सर आजकल की वन्शावालियों मे, जो बड़ी फशिनेबल है।
दूसरी चौकाने वाली बात है भारतीय संदर्भ मे समलैंगिकों की उपस्थिती, जो बहुतों के लिए चौकाने वाली बात उस समय लिखी गयी किताबों के परिपेक्ष्य मे है। बाक़ी जनवाद की पोलपट्टी और व्यक्ती की हैसियत की जितनी कलई इस किताब ने खोली है, दूसरी कोई मुझे याद नही।

बहुत बहुत धन्यवाद इसकी याद दिलाने के लिए.

अजित said...

शुक्रिया हुजूर....बद्रीपहलवान, दूरबीनसिंह, लंगड़, छोटेपहलवान समेत रंगनाथ की याद दिलाने के लिए। काफी अर्सा हो गया पढ़े हुए लगता है जल्दी ही फिर पढ़ना पड़ेगा।

काकेश said...

राग दरबारी सचमुच नायाब चीज है.

दीपा पाठक said...

मैंने भी राग दरबारी कालेज के दिनों में पढी थी, अच्छी भी लगी थी। लेकिन तब शायद उसके गूढ को समझने की अक्ल नहीं थी (वैसे तो अब भी ज्यादा नहीं है ः)। सुषमा की समीक्षा पढ कर इस किताब को फिर से पढने की इच्छा कर रही है।

आनंद said...

जी हाँ, यह संगीत बीच-बीच में बजता रहता है, आईना दिखाने लगता है। पर इसे अनसुना कर हम आगे बढ़ जाते हैं। कभी कभी यह संगीत तेज हो जाता है और जीना मुश्किल कर देता है। - आनंद

Ashok Pande said...

धन्यवाद सिद्धेश्वर! राग दरबारी जैसी रचनाएं एक दो बार नहीं, सौ पचास बार पढे जाने की दरकार रखती हैं। इस के भाषाई पहलुओं के नए आयाम दिखाने का भी धन्यवाद। 'ऊब का महाकाव्य' कहा था इसे किसी आलोचक ने (शायद श्रीपत राय ने)। शुक्ल जी की महानता इस बात में है कि कथ्य की दृष्टि से सीमित समझे जाने वाली व्यंग्य विधा को लेकर उन्होने एक पूरे उपन्यास की सर्जना की। आमतौर पर इस तरह की किताबें linear होती हैं। लेकिन 'राग दरबारी' का शिल्प इसे एक दुर्लभ circular किताब बनाता है। यानी आप कहीं से भी इसे शुरू कर सकते हैं और कहीं भी पढना बंद कर सकते हैं।

Vineeta Yashswi said...

kareeb 6-7 saal pahle pari thi rag darbari par uska geet PALAYAN abhi tak yaad hai. aaj apka alekh par ke wo thora aur majboot ho gaya
dhanyawaad

कथाकार said...

मेरी प्रिय किताबों में है ये और हर बार नये अर्थ खुलते हैं. बिहार के रंगकर्मी विजय ने इस पर बहुत उम्‍दा नाटक भी खेला है.

munish said...

jald hi irfan babu ke blog pe iske ansh apko sunvavenge, hain ji kyon?suniyo jarooooor.

Ashok Pande said...

Thanks Munish. We wait to hear your mellifluous voice.

डा० अमर कुमार said...

यथार्थ की व्याख्या में कहीं कुछ खटक रहा है । वह क्या है ? अबूझ पहेली की तरह मथ रहा है, यदि हम यथार्थ को स्वीकार कर जहां के तहां होते, तो शायद पाषाणयुग में आखेट कर रहे होते, जब जठराग्नि एवं दैहिक क्षुधा शांत करने मात्र से दिनचर्या की पूर्ति हो जाया करती थी ।
दूसरी ओर यथार्थ से मुंह मोड़ने पर हम पारिवारिक एवं सामाजिक दायित्व से पलायन करने के कलंक से विभूषित होते हैं । यहां नैतिक दायित्व का उल्लेख अप्रासंगिक सा है, क्योंकि वह हमारे स्वयं का गढा हुआ है ।
तो फिर हमारा यथार्थ आखिर कहां पर जाकर टिकता है, यह विचारणीय है ।
शब्दाचित्रण सराहनीय है, किंतु मन को अशांत करता है, इसमें आपने अवश्य सफलता पायी है । साधुवाद स्वीकार हो ।