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Saturday, November 11, 2017

अपनी ही कथा लगती हैं सब कथायें

आज इनका जन्मदिन है. सबसे पुराने मित्रों में शुमार सिद्धेश्वर पहले थे जिन्होंने मुझे हिन्दी साहित्य की आधुनिक धारा से परिचित कराया था सो उनका ऋण हमेशा रहेगा. वे कबाड़खाने से जुड़नेवाले सब से पहले लोगों में से थे. उन्हें शुभकामनाओं के साथ उनके एजाज़ में उनकी एक पसंदीदा कविता प्रस्तुत की जा रही है.


उलटबाँसी
- सिद्धेश्वर सिंह
  
दाखिल होते हैं
इस घर में
हाथ पर धरे
निज शीश

सीधी होती जाती हैं
उलझी उलटबाँसियाँ
अपनी ही कथा लगती हैं
सब कथायें
जिनके बारे में
कहा जा रहा है

कि मन न भए दस बीस

Friday, April 12, 2013

उत्तर पूर्व की कविताएं - ८


मुझे चाहिए
     - ममांग दाई
(उत्तर पूर्व की कविताओं के क्रम में आज प्रस्तुत है अंग्रेजी में लिखने वाली अरुणाचली कवि ममांग दाई की एक और कविता। अनुवाद सिद्धेश्वर सिंह का है)

मेरे प्रियतम
मुझे चाहिए
प्रात:काल का महावर
मुझे चाहिए
ढलती दोपहर की स्वर्णिम सिकड़ी
मुझे चाहिए
चन्द्रमा की पायल
ताकि मैं नृत्य कर सकूँ
पुन: तुम्हारे संग।

मुझसे साझा करो
अपने हृदयंगम रहस्य
अपनी साँसें दो मुझे
फिर से।
कथायें सुनाओ मुझे मानवीय भूलों की
और बतलाओ
कि क्यों परिवर्तित नहीं होता है प्रतिबिंब।

Thursday, April 11, 2013

उत्तर पूर्व की कविताएं - ७


जन्म स्थान
         - ममांग दाई

(ममांग दाई न केवल पूर्वोत्तर  बल्कि समकालीन भारतीय  अंग्रेजी लेखन की  एक प्रतिनिधि हस्ताक्षर है। वह पत्रकारिता ,आकाशवाणी और दूरदर्शन ईटानगर से जुड़ी रही हैं । उन्होंने कुछ समय तक भारतीय प्रशासनिक सेवा में नौकरी भी की , बाद में छोड़ दी । अब स्वतंत्र लेखन । उन्हें `अरूणाचल प्रदेश : द हिडेन लैण्ड´ पुस्तक पर पहला `वेरियर एलविन अवार्ड ` मिल चुका है साहित्य सेवा के लिए  वे  पद्मश्री सम्मान से नवाजी गई हैं।  प्रस्तुत हैं  ममांग दाई की एक कविता जो उनके के संग्रह `रिवर पोएम्स´ से साभार ली गई हैं।कविता का अनुवाद सिद्धेश्वर सिंह का है. )

हम बारिश के बच्चे हैं
बादल - स्त्री की संतान
पाषाणों के सहोदर
पले है बाँस और गुल्म के पालने में
अपनी लंबी बखरियों में
हम शयन करते हैं
जब आती है सुबह तो पातें है स्वयं को तरोताजा।

हमारी उपत्यका में
कोई नहीं अजनबी - अनचीन्हा
तत्क्षण प्रकट हो जाता है परिचय
हम बढ़ते जाते है वंश दर वंश।
बहुत साधारण है हमारा प्रारब्ध।
किसी हरे अँखुए की तरह
अपनी दिशा में तल्लीन
हम अग्रसर होते हैं अपने पथ पर
जैसे चलते हैं सूर्य और चंद्र।

जल की पहली बूँद ने
जन्म दिया मनुष्य को
और रक्तिम आच्छद से हरित तने तक
विस्तारित करता रहा समीरण।

हम अवतरित हुए हैं
एकान्त और चमत्कार से।

Monday, May 5, 2008

हम नींद में भी दरवाजे पर लगा हुआ कान हैं


आज हमारे आसपास विविध संदर्भॉं से उद्भूत ,विविध व्याख्याओं से विस्तारित विविध प्रकार का स्त्रीवाद है।स्त्रीवाद का एक अकादमिक-प्राध्यापकीय एंगल भी है तथा स्त्री स्त्रीवादियों और पुरुष स्त्रीवादियों के विरोध और सामंजस्य की जुगलबंदी से उपजा पापुलर किस्म का स्त्रीवाद भी.राजनीतिक,सामाजिक,आर्थिक,धार्मिक आदि-आदि मोर्चे पर जूझती स्त्रियों की जिजीविषा और जीवट के दस्तावेज भी हमसे दूर नहीं हैं फिर भी स्त्री के लिये अपनी कही बात के ध्यान से सुने जाने की लड़ाई जारी है.इस लड़ाई में उपालंभ,उम्मीद,उत्साह तथा उग्रता के साथ उहापोह भी है जैसा कि हर लड़ाई के आरंभिक दौर में होता है.


'हमारे समाज और साहित्य में महिलायें'विषय पर एक पेपर तैयार करते वक्त बार-बार एक कविता याद आती रही और उस पेपर के आखिरी हिस्से में वह कविता उधृत भी की।मैं जैसा भी लिखता हूं उससे एकाध लोगों को प्रायः यह शिकायत रहती है कि मैं अक्सर 'पर्सनल' हो जाता हूं,कहे -लिखे-बोले से तटस्थ रहना कठिन हो जाता है.इस सवाल का जवाब मेरे पास फिलहाल यही है कि शब्द और कर्म में दूरी कम से कम बनी रहे तो ठीक लगता है.रोजाना सुबह बच्चों के स्कूल चले जाने के बाद और काम पर जाने से पहले का जो वक्फा मिलता है उसमे हम 'दोनो परानी'कविताये सुनते-सुनाते हैं या फिर संगीत.काम भी निरन्तर चलता रहता है और कविता -संगीत भी. प्रस्तुत कविता का वाचन हम लोग अक्सर करते हैं.आप भी पढ़ें-


हम औरतें / वीरेन डंगवाल


रक्त से भरा तसला हैं
रिसता हुआ घर के कोने-अंतरों


हम हैं सूजे हुए पपोटे
प्यार किए जाने की अभिलाषा
सब्जी काटते हुए भी
पार्क में अपने बच्चों पर निगाह रखती हुई प्रेतात्मायें


हम नींद में भी दरवाजे पर लगा हुआ कान हैं
दरवाजा खोलते ही
अपने उड़े-उड़े बालों और फीकी शक्ल पर
पैदा होने वाला बेधक अपमान हैं


हम हैं इच्छा मृग


वंचित स्वप्नों की चरागाह में तो
चौकड़ियां मार लेने दो हमें कमबख्तो।


(कविता 'इसी दुनिया में' संग्रह और कवि वीरेन डंगवाल की तस्वीर कवि शिरीष कुमार मौर्य के ब्लाग'अनुनाद'से साभार)

Friday, April 4, 2008

जिन्दगी की तपती दोपहर के धूप-बैंक की आग

शब्दों के खलिहान में अनाज और भूसा अलग-अलग करने उपक्रम में लगे लोगों के लिए 'इस महादेश के वैज्ञानिक विकास के लिए प्रस्तुत प्रगतिशील रचनाओं की अनिवार्य पुस्तक'या अव्यावसायिक ,अनियतकालिक पत्रिका 'पहल' कितनी जरूरी है,यह बताने की बात नहीं है।अबतक इसके ८७ अंक आ चुके हैं.साहित्य के समकाल में सक्रिय एक लंबी कतार इसके माध्यम से उदित और ऊर्जावान हुई है.इसके संपादक ज्ञानरंजन की सक्रियता,सजगता और सहजता का मूर्त रूप धारण कर 'पहल' हर बार हमारे सामने मौजूद होती है-कछ नया अलहदा और अनिवार्य-सी चीज लेकर.यह अलग तरह का प्रश्न है कि लेखन और संपादन में कौन से ज्ञानजी बेहतर और बड़े हैं.जो भी हो वे एक शानदार इन्सान हैं-आदमीयत से लबालब;जिनसे मिलकर आप चौड़े होकर लौटते हैं सिकुड़-सिमटकर नहीं.

जुलाई-सितम्बर १९९८ में देश निर्मोही की पत्रिका 'पल प्रतिपल' ने ओम भारती के संपादन में एक विशेष अंक 'साठ पार ज्ञानरंजन' निकाला था।इसमें ज्ञानजी पर बहुत जरूरी सामग्री है।इसी से ली गई कुमार विकल एक कविता' आओ पहल करें' प्रस्तुत है-
आओ पहल करें
(ज्ञानरंजन को संबोधित)
कुमार विकल

जब से तुम्हारी दाढ़ी में
सफेद बाल आने लगे हैं
तुम्हारे दोस्त
कुछ ऐसे संकेत पाने लगे हैं
कि तुम
जिन्दगी की शाम से डर खाने लगे हो
औ' दोस्तों से गाहे-बगाहे नाराज रहने लगे हो
लेकिन सुनो ज्ञान !
हमारे पास जिन्दगी की तपती दोपहर के धूप-बैंक की
इतनी आग बाकी है
जो एक सघन फेंस को जला देगी
ताकि दुनिया ऐसा आंगन बन जाए
जहां प्यार ही प्यार हो
और ज्ञान !
तुम एक ऐसे आदमी हो
जिसके साथ या प्यार हो सकता है या दुश्मनी
तुमसे कोई नाराज हो ही नहीं सकता
तुम्हारे दोस्त,पड़ौसी,सुनयना भाभी,तुम्हारे बच्चे
या अपने आपको हिन्दी का सबसे बड़ा कवि
समझने वाला कुमार विकल
कुमार विकल
जिसकी जीवन संध्या में अब भी
धूप पूरे सम्मान से रहती है
क्योंकि वह अब भी धूप का पक्षधर है
प्रिय ज्ञान
आओ हम
अपनी दाढ़ियों के सफेद बालों को भूल जाएं
और एक ऐसी पहल करें
कि जीवन -संध्यायें
दोपहर बन जाएं .

Tuesday, April 1, 2008

मूर्खता के मजे और बुद्धिमानी की तकलीफें

आज सुबह एक सहकर्मी ने 'फूल' बनाया- अप्रेल फूल।बहुत हल्की -सी शरारत थी उनकी लेकिन बड़ा भारी मजा आ गया और मन हल्का हो गया.अब मैं मूर्ख दिवस के इतिहास-भूगोल-अर्थशास्त्र आदि-आदि की चर्चा करके अपने- आपके मजे को खराब नहीं करना चाहता.यह तो सर्वसुलभ जानकारी है कि कब ,कहां ,कैसे इस अंतरराष्ट्रीय पर्व की शुरूआत हुई और कैसे,किन तरीकों से इसके विविध आयाम विकसित हुए हैं.अब तो हालत यह है जो मूर्ख नहीं है वह कुछ नहीं है, नथिंग.एक अनंत और आह्लाद्कारी मूर्खता के उद्यम में सन्नद्ध इस संसार में मूर्खता कितनी दुर्लभ हो गई हैं, यह हर तरफ के हाहाकार में साफ दिखाई दे रहा है. नहीं तो आज के इस 'पावन पर्व 'पर मूर्खता के महासागर में डूबते-उतराते कितना समय ,श्रम और धन बह रहा है वह किसी से छिपा नहीं है. मूर्खता के मजे के भी क्या मजे हैं हुजूर्,खासकर तब जब आप ब-खुशी मूर्ख बनाए जा रहे हों ,सुबह से शाम तक समारोहपूर्वक.

बचपन में हमलोग मूर्खों की कहानियां पढ़ते- सुनते थे।उनमें से कुछ के शीर्षक भी यागद हैं जैसे 'चत्वारि मूर्खाः','मूर्ख मगरमच्छ'आदि.मूर्खता और मूर्ख के पर्याय समझे जाने वाले शब्दों से जैसे-जैसे परिचय बढ़ता गया वैसे-वैसे लोगबाग अपन को अकलमंद और बुद्धिमान मानते चले गए.पढ़ाई-लिखाई के वक्त लगातार चार साल तक अपने होस्टल में मईं महामूर्ख चुना जाता रहा जिसकी परिणति यह हुई कि लोगों ने मूर्ख मानना ही छोड़ दिया.इस प्रक्रिया में सबसे बड़ी दुर्घटना यह हुई कि मूर्खता का आनंद दिनोंदिन दूर होता गया.अब तो अपना पेशा भी ऐसा है कि जनता और कुछ माने या न माने विद्वान जरूर मानती है.बड़ा अजीब-सा लगता यह शब्द सुनकर,लगता है कहीं कुछ खो गया है.वह अपना खोया हुआ सामान आज सुबाह-सुबह मिल गया.खुशी हुई कि अब भी छेड़े जाने की संभावना शेष नहीं हुई है,अब भी अपने आसपास जीवन बचा हुआ है-चतुराईहीन जीवन-सुसंस्कृत के बरक्स प्रकृत जीवन,खांटी,शुद्ध.

जब जबकि गहरा रही है रात।थम गया है शोर.खाना-पीना,रोट्टी-शोट्टी के बाद कुछ लिखने-पढ़ने उपक्रम करते हुए वाचमैन की सीटी और सोंटी घसीटने आवाज ही कानों में आ रही है तब एक मूर्ख दिवस के समारोह की थकान उतारने के लिए नींद का शरण्य ही एक अकेला रास्ता दिखाई दे रहा है.यह भी याद आ रहा है भक्त कवियों ने स्वयं को अगर 'मूरख' कहा है तो यह कम बड़ी बात नहीं है क्योंकि विद्वान बने रहना कठिन काम है लेकिन मूर्ख बने रहना और भी कठिन.जान बूझकर मूर्ख बनना गूंगे का गुड़ है.मैंने आज यह गुड़ खाया और उसकी मिठास के बारे में आपको भी कुछ-कुछ बताया.

क्या आज आपने भी यह गुड़ खाया? कित्ता? चुटकी या डली? आप चाय में चीनी कितनी लेते हैं? गुड़,गुड़ है चीनी नहीं,चीनी छोड़ो गूड़ खाओ।अभी भी वक्त है 'मूरख दिवस' मनाओ-हैपी मूर्ख दिवस! अपने प्रिय कवि वीरेन डंगवाल की बहुपठित-बहुचर्चित काव्य पंक्तियों के साथ आज की इस चर्चा की इति-

इतने भले नहीं बन जाना साथी
जितने भले हुआ करते हैं सरकस के हाथी
गदहा बनने में लगा दी अपनी सारी कूवत सारी प्रतिभा
किसी से कुछ लिया नहीं न किसी को कुछ दिया
ऐसा जीवन जिया भी तो क्या जिया?

Wednesday, March 19, 2008

'आम्र बौर का (एक भोजपुरी) गीत' : तलत महमूद और लताजी की आवाज में


....और मैं कितना चाह कर भी तुम्हारे पास ठीक उसी समय
नहीं पहुँच पाती जब आम्र मंजरियों के नीचे
अपनी बाँसुरी में मेरा नाम भर कर तुम बुलाते हो!
उस दिन तुम उस बौर लदे आम की
झुकी डालियों से टिके कितनी देर मुझे वंशी से टेरते रहे....

धर्मवीर भारती की अद्वितीय पुस्तक 'कनुप्रिया'का ऊपर दिया गया अंश मुझे तलत महमूद और लताजी की आवाज में एक पुराना भोजपुरी गीत सुनते हुए बारबार याद आता रहा.'शब्दों का सफर' वाले भाई अजित वडनेरकर जी को पत्र लिखते समय मैंने 'कनुप्रिया' का 'आम्रबौर का गीत' वसंत की सौगात के रूप में नत्थी कर दिया था। उनका बड़प्पन और मेरे लिए एक सुखद आश्चर्य है कि अजित जी ने बेहद खूबसूरती और शानदार तरीके से इसे अपने ब्लाग पर प्रकाशित कर दिया है.

....लाले-लाले ओठवा से बरसे ललइया
हो कि रस चूवेला
जइसे अमवां क मोजरा से रस चूवेला....

भोजपुरी सिनेमा के शुरुआती दौर की फिल्म 'लागी नाहीं छूटे रामा' का यह गीत मेरे लिये अविस्मरणीय है किन्तु वसंत में यह अधिक परेशान करता है.आम के वृक्षों पर आने वाले बौर, फल और स्वाद के उत्स तथा आगमन का संकेत तो देते ही हैं साथ ही वे वसंत की ध्वजा फहराते हुए भी आते हैं,जिसे हमारे इलाके की भाषा में 'मौर' 'मउर'या 'मोजरा' कहा जाता है.याद करें, पूर्वांचल में विवाह के समय 'लड़का'(वर)सिर पर जो मुकुट धारण करता है उसे भी 'मउर' ही कहते हैं.'सिरमौर' शब्द की व्युत्पत्ति भी हमें खीचकर उसी आम्र-बौर तक ले जाती है जिसे स्पर्श कर खुमार तथा मादकता से भरी बौराई हवा को मेरे घर की कांच लगी खिड़कियां फिलहाल रोक पाने का हौसला और हिम्मत गवां चुकी हैं. असल बात तो यह है कि उसे रोकना भी कौन कमबख्त चाहता है!

'लाले-लाले ओठवा से बरसे ललइया' मूलतः छेड़छाड़ का गीत है;लुब्ध नायक और रूपगर्विता नायिका के बीच की चुहल और छेडछाड़ का गीत। मजरूह सुल्तानपुरी के लिखे मादक शब्दों को संगीतबद्ध किया है चित्रगुप्त ने और स्वर है तलत और लताजी का. तो सुनते हैं भोजपुरी सिनेमा के सुनहरे दौर का यह फगुनाया गीत-


(फोटो- tribuneinda से साभार)

Sunday, March 16, 2008

'मुर्ग-रम बुढ़ैला' उर्फ एक कवितामयी रेसिपी का रहस्योदघाटन



* अब जबकि अशोक पान्डे ने रघुवीर भाई की ओरिजिनल रेसिपी 'बकर तोतला' बनाने का तरीका विस्तार और पूरे विधि-विधान से समझा दिया है और उम्मीद है कि आज इतवार की छुट्टी का सदुपयोग करते हुए 'कबाड़खाना' के सुधी भाई-बहन लोग पाकशास्त्र में पारंगत होने के प्रयोग में लगे होंगे तब अनायास हाथ आये मौके का फायदा उठाकर क्यों न एक ऐतिहासिक रेसिपी का रहस्योदघाटन कर दिया जाय.हो सकता है कि आप इससे तात्कालिक रूप से भले ही लाभान्वित न हों किंतु यदि भविष्य के लिये 'सचेत' हों जायें तो यह इस कबाड़ी के लिये फख्र की बात होगी.

* अब थोडी-सी बात इसके इतिहास और भूगोल पर भी.यह आज से कई बरस पहले हमारी 'गदहपचीसी'के दिनों की दर्द भरी दास्तान है. नैनीताल के 'ब्रुकहिल' और 'हिमालय' में संपन्न पाक कला के प्रयोगों में से एक यह भी था. 'बकर तोतला' ने इसकी याद दिला दी और जब अपनी टिप्पणी में मैने इसका उल्लेख किया तथा 'कबाड़खाना' के पन्नों पर लगाने की मंशा जाहिर की तो अशोक ने हमेशा की तरह हां कर दी.अशोक पांडे इस समय केरल की महत्वपूर्ण यात्रा के बाद बंगलुरु में कयाम किये हुये हैं.दो-चार दिन वहां का आनंद और आस्वाद लेकर दिल्ली दरबार में आयेंगे, फिर होली से पहले हलद्वानी.तब अपन 'बकर तोतला' पर हाथ आजमायेंगे,आप भी आयें 'सुआगत' है।


* ऊपर जिस दौर का उल्लेख किया गया है,उस दौर में मैंने ' मुर्गा: एक दिन जरूर ' शीर्षक एक कविता लिखी थी जो मूलतः 'मुर्गा बूढ़ा निकला' के जवाब में लिखी गई थी या यों कहें कि एक कविता-जुगलबंदी थी.उस कविता को पढ़ने-देखने के लिये मेरे ब्लाग ' कर्मनाशा' http://karmnasha.blogspot.com पर जाने की जहमत उठायें. यहां प्रस्तुत है अशोक पांडे की कविता- 'मुर्गा बूढ़ा निकला'.



मुर्गा बूढ़ा निकला

दो सौ रुपये की शराब का
मजा बिगड़ कर रह गया
मुर्गा बूढ़ा निकला

ढ़ेर सारे
प्याज लहसुन और मसालों में भूनकर
प्रेशर कुकर पर चढ़ा दिया मुर्गा
दस बारह सीटियां दीं
मुर्गा गला नहीं
मुर्गा बूढ़ा निकला

थोड़ा-थोड़ा नशा भी चढ़ने लगा था
सब काफूर हो गया
दांतों की ताकत जवाब दे गई
मुर्गा चबाया नहीं गया
सोचता हूं
मुर्गे अगर बोल पाते तो क्या करते
मशविरा कर कोई रास्ता ढ़ूढते
सारी जालियां तोड़कर
सड़क पर आ जाते मुर्गे

वाह प्रकृति !
तू कितनी भली है
बड़ा अच्छा किया बेजुबान बनाया मुर्गा
जाली के पीछे बनाया मुर्गा

फिर भी
सोचता हूं
अगर जाली में बंद मुर्गा
बोल पाता तो कितना अच्छा होता

कल शाम
मुर्गा खरीदने से पहले
मुर्गे से ही पूछ लेते उसकी उम्र
-हमारी शाम तो खराब नहीं होती
दो सौ रुपये की शराब का
मजा तो न बिगड़ता

Tuesday, March 11, 2008

'कलकतवा से आवेला...' शारदा सिन्हा जी का एक यादगार गीत


आज एक पुराना वादा निभाने की कोशिश कर रहा हूं.अशोक से वादा था कि मैं 'कबाड़खाना 'पर अपनी पसंद के उस संगीत का एक नमूना पेश करूंगा जिसकी धूपछांही रंगत में मैंने किशोरावस्था को पार करते हुए वर्तमान की कंटीली डगर पर चलना सीखा और जब कभी चलते-चलते पांव थोड़े दुखने लगते हैं और दिमाग भन्नाने लगता है तब ऐसा ही संगीत कुछ सकून देता है साथ ही फिर से चलने की ताकत और प्रेरणा भी.प्रस्तुत है शारदा सिन्हा जी की आवाज में यह गीत इस लाजवाब गायिका के प्रति पूरे सम्मान ,आदर और आभार के साथ.साथ ही यह अपनी मातृभाषा भोजपुरी के प्रति आदर का इजहार भी है जो फिलहाल मेरे घर में कम ही बोली और सुनी जाती है.दो साल पहले गुजरी मां के जाने बाद तो और कम ,बेहद कम। तो सुनते हैं-


अवधि-४ मिनट,२३ सेकेंड

Tuesday, March 4, 2008

बहुत दिनों से डाकिया घर नहीं आया + - 'राग दरबारी' का (प्रेम) पत्र


रात के दो के आसपास का समय था।वोल्वो तेज रफ्तार से भाग रही थी. बस में थोड़े-थोड़े अंतराल पर एक ही गाना बार-बार बज रहा था-'चिठ्ठी आई है ,वतन से चिठ्ठी आई है'.लग रहा था कि बस के ड्राइवर और स्टाफ को घर की याद आ रही होगी.मुझसे आगे की सीट पर बैठा युवक अपनी साथी को बता रहा था-'नाम फिल्म इसी गाने से पंकज उधास का नाम फेमस हुआ'.शुक्र है कि युवती ने 'कौन पंकज, कौन उधास' नहीं पूछा.मुझे याद आया एक सहकर्मी ने एक दिन बताया था कि उन दिनों जब यह गाना खूब चला था तब उन्होंने इसी से 'प्रेरणा'लेकर गणित में एम.एस-सी.करने के तत्काल बाद एक विदेशी स्कूल की नौकरी के बदले अपने कस्बेनुमा शहर की मास्टरी को तरजीह दी थी कि 'उमर बहुत है छोटी,अपने घर में भी है रोटी'.हालांकि बाद में,थोड़ी तरलता आने पर उन्होंने बेहद मीठे और मुलायम अंदाज में यह भी खुलासा किया था कि इस निर्णय के केन्द्र में 'प्रेम' भी ( शायद प्रेम ही )एक मजबूत कारण या आधार था.और यह भी कि वह रोजाना बिला नागा 'उसे' एक पत्र लिखा करते थे.

आजकल पत्र कौन लिखता है? सरकारी,व्यव्सायी,नौकरी-चाकरी के आवेदन-बुलावा आदि के अतिरिक्त पारिवारिक-सामाजिक पत्र हमारी जिंदगी के हाशिए से भी सरक गए है.क्या ऐसा संचार के वैकल्पिक संसाधनों-साधनों की सहज उपलब्धता के कारण हुआ है? या कि समय का अभाव,पारिवारिक-सामाजिक संरचना के तंतुजाल में दरकाव,पेपरलेस कम्युनिकेशन की ओर अग्रगामिता आदि-इत्यादि इसकी वजहें हैं? बहरहाल, इस गुरु-गंभीर विषय पर विमर्श की विचार-वीथिका में वरिष्ठ-गरिष्ठ विद्वानों को विचरण करने का अवसर प्रदान करते हुए मैं तो बस यही कहना चाह रहा हूं कि कहां गए वो दिन? वो पत्र-लेखन और पत्र-पठन के दिन अब तो पत्र-लेखन कला स्कूली पाठ्यक्रमों में सिमट कर रह-सी गई है।

कुछ लोग कहेंगे कि ई मेल और एसएमएस पर मेरी नजर क्यों नहीं जा रही है।हां,ये भी पत्र के विकल्प-रूप हैं और इनके जरिए व्यक्त की जाने वाली संवेदना तथा उसके शिल्प को मैं नकार भी नहीं रहा हूं किन्तु यहां मेरी मुराद कागज पर लिखे जाने वाले उस पत्र से है जिससे तमाम भाषाओं का विपुल साहित्य भरा पड़ा है,जिसको लेकर रचा गया समूचे संसार का शास्त्रीय-उपशास्त्रीय-लोक-फ़ोक संगीत अनंत काल तक दिग्-दिगंत में गूंजता रहेगा,जो कभी मानवीय संबंधों की ऊष्मा का कागजी पैरहन था,जो कभी सूखे हुए फूलों के साथ किताबों के पन्नों में मिला करता था और दिक्काल की सीमाओं को एक झटके में तिरोहित कर जीवन-जगत के तमस में आलोक का आश्चर्य भर देता था.

श्रीलाल शुक्ल का उपन्यास 'राग दरबारी'(१९६८) मेरी प्रिय पुस्तकों की सूची में काफी ऊपर है.पिछले महीने दिल्ली में संपन्न पुस्तक विश्व पुस्तक मेले में राजकमल /राधाकृष्ण प्रकाशन के स्टाल पर इसकी जबरदस्त डिमांड मैंने खुद देखी थी. मुझे बार-बार इस उपन्यास से गुजरना अच्छा लगता है.अपने समय और समाज को समझने के लिए यह उपन्यास मेरे लिए एक उम्दा संदर्भ ग्रंथ का काम भी करता रहा है.अपनी इसी प्रिय पुस्तक में शामिल एक पत्र (या प्रेम पत्र )लेखक के प्रति आदर और प्रकाशक के प्रति आभार व्यक्त करते हुए 'कबाड़खाना' के पाठकों की सेवा में इस उम्मीद के साथ प्रस्तुत कर रहा हूं कि इसे इतिहास के बहीखाते में दर्ज होने की तरफ अग्रसर पत्र-लेखन कला एवं(अथवा)विज्ञान का एक उदाहरण मात्र माना जाए- कंटेंट, रेफरेंस और जेंडर से परे.यह जानते हुए कि ऐसा कतई संभव नहीं है,फिर भी-...

'राग दरबारी' का (प्रेम) पत्र

ओ सजना ,बेदर्दी बालमा,
तुमको मेरा मन याद करता है.पर चॉंद को क्या मालूम, चाहता है उसे कोई चकोर.वह बेचारा दूर से देखे करे न कोई शोर.तुम्हें क्या पता कि तुम्हीं मेरे मन्दिर ,तुम्हीं मेरी पूजा ,तुम्ही देवता हो,तुम्हीं देवता हो.याद में तेरी जाग-जाग के हम रात-भर करवटें बदलते हैं.
अब तो मेरी हालत यह हो गई है कि सहा भी न जाए,रहा भी न जाए.देखो न मेरा दिल मचल गया,तुम्हें देखा और बदल गया.और तुम हो कि कभी उड़ जाए,कभी मुड़ जए भेद जिया का खोले ना.मुझको तुमसे यही शिकायत है कि तुमको प्यार छिपाने की बुरी आदत है.कहीं दीप जले कहीं दिल,जरा देख तो आकर परवाने.
तुमसे मिलकर बहुत सी बातें करनी हैं.ये सुलगते हुए जज्बात किसे पेश करें.मुहब्बत लुटाने को जी चाहता है.पर मेरा नादान बालमा न जाने जी की बात.इसलिए उस दिन मैं तुमसे मिलने आई थी .पिय़ा- मिलन को जाना.अंधेरी रात.मेरी चॉदनी बिछुड़ गई,मेरे घर में पड़ा अंधियारा था.मैं तुमसे यही कहना चाहती थी,मुझे तुमसे कुछ न चाहिए .बस, अहसान तेरा होगा मुझ परमुझे पलकों की छांव में रहने दो.पर जमाने का दस्तूर है ये पुराना,किसी को गिराना किसी को मिटाना.मैं तुम्हारी छत पर पहुंची पर वहां तुम्हारे बिस्तर पर कोई दूसरा लेटा हुआ था.मैं लाज के मारे मर गई.बेबस लौट आई.ऑधियों ,मुझ पर हंसो,मेरी मुहब्बत पर हंसो.
मेरी बदनामी हो रही है और तुम चुपचाप बैठे हो.तुम कब तक तड़पाओगे? तड़पा लो,हम तड़प-तडप कर भी तुम्हारे गीत गाएंगे.तुमसे जल्दी मिलना है.क्या तुम आज आओगे क्योंकि आज तेरे बिना मेरा मन्दिर सूना है.अकेले हैं,चले आओ जहां हो तुम.लग जा गले से फिर ये हंसी रात हो न हो.यही है तमन्ना तेरे दर के सामने मेरी जान जाए,हाय़.हम आस लगाए बैठे हैं.देखो जी, मेरा दिल न तोड़ना।

तुम्हारी याद में,
कोई एक पागल।
(फोटो- salilda.com से साभार)

Tuesday, February 19, 2008

आ जाओ प्यारेः नए कबाड़ी तरुण का स्वागत और पुराने कबाड़ी सुंदर का 'गृहविज्ञान'

अब साहब परम्परा है तो है।नए कबाड़ी के स्वागत की परपरा क्यों तोड़ी जाए।

कबाड़खाने में नए कबाड़ी तरुण का स्वागत है.वह अपनी हाजिरी पहले ही लगा चुके हैं और बहुत उम्दा माल भी गेर चुके हैं.यह तो अपने कबाड़खाने के नए मेंबर की विनम्रता है कि वह खुद को 'प्रशिक्षार्थी कबाड़ी'कह रिया है नहीं तो यह जग जहिर है अपना भाई ब्लागिस्तान का पुराना माहिर है.

सात समंदर पर रहने वाले तरुण 'कबाड़खाना' समेत नौ ब्लागों से जुड़े है।सिनेमा, संगीत,फोटोग्राफी,घुमक्कड़ी और लिखत-पढत उनके शौक हैं. इसलिए पूरी उम्मीद है उनके अनुभव और आस्वाद का भरपूर लाभ 'कबाड़खाना' को मिलेगा और कोई नया गुल खिलेगा.

भाई तरुण पहले से ठिया जमाए सारे कबाड़ियों की ओर से आपका स्वागत! आपके ही उम्दा कबाड़ से एक पंक्ति आपके लिए-'तरूण' प्‍यार के गीत सुनाओ, सभी हमारे मीत।

सुंदर चंद ठाकुर की कविता 'गृहविज्ञान'

वे कौन सी तब्दीलियां थीं परंपराओं में
कैसी थीं वे जरूरतें
सभ्यता के पास कोई पुख्ता जवाब नहीं

गृहविज्ञान आखिर पाठ्यक्रम में क्यों शामिल हुआ।

ऐसा कौन सा था घर का विज्ञान
जिसे घर से बाहर सीखना था लड़कियों को
उन्हें अपनी मांओं के पीछे-पीछे ही जाना था
अपने पिताओं या उन जैसों की सेवा करनी थी
आंगन में तुलसी का फिर वही पुराना पौधा उगाना था
उन्हीं मंगल बृहस्पतिशुक्र और शनिवारों के व्रत रखने थे
उसी तरह उन्हें पालने थे बच्चे
और बुढापा भी उनका लगभग वैसा ही गुजरना था।


सत्रह -अठारह साल की चंचल लड़कियां
गृहविज्ञान की कक्षाओं में व्यंजन पकाती हैं
बुनाई-कढ़ाई के नए-नए डिजाइन सीखती हैं
जैसे उन्हें यकीन हो
उनके जीवन में वक्त की एक नीली नदी उतरेगी
उनका सीखा सबकुछ कभी काम आएगा बाद में.
वे तितलियों के रंग के बनायेंगी फ्रॉक
तितलियं वे फ्रॉक पहन उड़ जायेंगी
वे अपने रणबांकुरों के लिए बुनेंगी स्वेटर दस्ताने
रणबांकुरे अनजाने शहरों में घोंसले जमायेंगे
वे गंध और स्वाद से महकेंगी
आग और धुआं उनका रंग सोख लेंगे
कहीं होंगे शयगद उनकी रुचि के बैठकखाने
रंगीन परदों और दिजाइनदार मेजपोशों से सजे हुए
कितनी थका टूटन और उदासी होगी वहां।


सराहनाओं के निर्जन टापू पर
वे निर्वासित कर दी जायेंगी
यथार्थ के दलदल में डूब जाएगा उनका गृहविज्ञान।


(हमारे समय के सर्वाधिक महत्वपूर्ण कवियों में से एक सुंदर चंद ठाकुर की यह कविता 'पहल'के अंक ६३ से साभार!साथ में बेहद प्यार से यह उलाहना भी कि 'अबोला' तोड़ो और कबाड़खाने में कुछ नया जोड़ो सुंदर बाबू!)

Wednesday, January 30, 2008

गांधी के घर में सबके लिये जगह है


वर्ष २००२ के नवंबर महीने में मुझे तीन दिन के लिए सेवाग्राम (वर्धा) में रहने का अवसर मिला था।यह महात्मा गांधी से जुड़ी जगह पर रहकर खुद की गढ़ी 'गांधी छवि' को परखने का एक खास मौका था ,जिसे मैंने कतई गवांया नहीं.

बचपन में पिताजी गांधीजी के कई किस्से सुनाया करते थे और हर किस्सा इस सिरे पर आकर पूर्णता प्राप्त करता था कि उन्होंने एक बार गांधी जी को देखा था।मेरे पिता सेवाग्राम नहीं गए थे,न ही किसी अन्य आश्रम या किसी और जगह ,न ही वह किसी दल-वल के चवन्निया-अठन्निया मेंबर थे जिससे कि सभा-सम्मेलनों में आना-जाना होता रहा हो बल्कि उन्होंने अपने गांव के निकटवर्ती रेलवे स्टेशन पर ट्रेन में सवार गांधी जी को देखा था.पिताजी यह भी बताते थे कि उस दिन जैसे समूचा इलाका दिलदार नगर रेलवे स्टेशन पर उमड़ आया था,एक साधारण-से आदमी की एक झलक पाने के लिये.उस समय मुझे यह् सब अविश्वसनीय लगता था लेकिन अविश्वास की कोई ठोस वजह भी नहीं थी और न ही इतना सारा सोचने की उम्र ही थी.

सेवाग्राम में बापू कुटी के सामने वाले अतिथिशाला में हम लोग रुके थे।सामने वह जगह थी जहां कभी महात्मा गांधी रहा करते थे.शाम की प्रार्थना सभा में जाने का मन था, कौतूहल और जिज्ञासा भी.साथ के कई विद्वान प्रोफेसरों ने बताया कि वहां ऐसा कुछ नहीं है जिसको देखने के लिए तुम इतने उत्साहित हो,मत जाओ निराशा होगी.मैने कहा निराशा ही सही चलो देखते हैं.

प्रार्थना वैसे ही शुरू हुई जैसा कि सुन रखा था।एक फुटही लालटेन की मलगजी रोशनी में गांधीजी के कुछ प्रिय भजन और उनकी किसी पुस्तक के एक अंश का पाठ.सभा में लोग भी कम नहीं थे.बताया गया कि रोज ही इतने लोग तो आते ही हैं,आज विश्वविद्यालय वालों की वजह से थोड़े लोग अधिक हैं.थोड़ा अलग हटकर एक बूढा-सा आदमी जोर से बड़बड़ा रहा था -'गांधी को भगवान बना दिया, पूजा कर रहे हैं उसकी.भगवान तो बाबा अंबेदकर था-वह था भगवान'.ऐसा नहीं था कि उसकी बात किसी को सुनाई नहीं दे रही थी लेकिन कोई प्रतिवाद नहीं कर रहा था, न ही उस आदमी को वहां से चले जाने के लिये कोई कह रहा था.मैंने अपनी आंखों से देखा कि गांधी के घर में सबके लिये जगह है -गांधी के देश में भी.हां,अब तक गांधीजी को लेकर मुझे अपने पिता के सुनाये किस्सों के बाबत जो भी अविश्वास था वह धीरे-धीरे तिरोहित हो रहा था.

आज ३० जनवरी को महात्मा गांधी की 'पुण्य तिथि'पर प्रस्तुत है डा. राम कुमार वर्मा की एक कविता जो पहली बार मार्च १९४८ के 'आजकल' में प्रकाशित हुई थी-

बापू की विदा


आज बापू की विदा है!
अब तुम्हारी संगिनी यमुना,त्रिवेणी,नर्मदा है!

तुम समाए प्राण में पर
प्राण तुमको रख न पाए
तुम सदा संगी रहे पर
हम तुम्हीं को छोड़ आए
यह हमारे पाप का विष ही हमारे उर भिदा है!
आज बापू की विदा है!

सो गए तुम किंतु तुमने
जागरण का युग दिया है
व्रत किए तुमने बहुत अब
मौन का चिर-व्रत लिया है!
अब तुम्हारे नाम का ही प्राण में बल सर्वदा है!
आज बापू की विदा है!

Tuesday, January 22, 2008

नैनीताल - घूमना बस घूमना


क्या लिखें क्या ना लिखें इस हाल में .
लोग कितने अजनबी हैं शहर नैनीताल में .

कोहरे मे डूबा हुआ है चेहरा दर चेहरा,
वादी जैसे गुमशुदा है सुन्दर मायाजाल में .

इस सड़क से उस सड़क तक घूमना बस घूमना ,
इक मुसलसल सुस्ती-सी है इस शहर की चाल में .

धूप में बैठे हुये दिन काट देतें हैं यहां ,
कौन उलझे जिन्दगी के जहमतो-जंजाल में .

आज के हालात का कोई जिकर होता नहीं ,
किस्से यह कि दिन थे अच्छे शायद पिछले साल में .

इस शहर का दिल धड़कता है बहुत आहिस्तगी से,
इस शहर को तुम न बांधो तेज लय-सुर -ताल में

Wednesday, January 2, 2008

हिन्दी ब्लाग का उद्भव (और विकास) - कुछ इतिहास , कुछ झक्कास

नामकरण :

बुझी को राख कहते हैं , जली को आग कहते हैं।
जहाँ से उठता ही रहे धुआँ,उसे तो ब्लाग कहते हैं।।

नाम-स्मरणः

पहिला सुमिरन अशोक का जो मेरा उस्ताद।
उन्नें मुझको राय दी सीखें ब्लागोत्पाद ।
मेरे ज्ञान के खेत में डाला पानी -खाद ,
हे कबाड़श्री धन्य हो धन्य-धन्य उस्ताद ।
नाम तिहारा लेय के लिक्खूं ब्लाग-प्रसंग,
पहिले माफी माँग लूँ यदि होवे कोई तंग ।

उपोदघात/प्रस्तावना/विषय प्रवेशः

यह एक कहानी है।बात बहुत पुरानी है.इतनी पुरानी कि बेचारा पुरानापन शरमा जाये और बेशरम नयेपन को शरम ना आये.मुझे तो बताना है इतिहास.कोई राज है इसमें खास.माई-बाप यह आप का करम है कि बन्दे की बकवास को झेलने जा रहे हैं.खैर ,अब हम हिन्दी ब्लाग का उद्भव (और विकास) नामक अध्याय ठेलने जा रहे हैं.सो एडवांस में थैंक्यू ,धन्यवाद और हे बहन! हे भाई! पुराने साल की विदाई और नये साल की बधाई!


खण्डः एक-

बताने वाले बताते हैं कि हिन्दी ब्लाग का बीज तो आज से कई हजार साल पहले ही पड़ गया था और यह संयोगवश हो गया था, अनायास।क्यों न हो दुनिया के ज्यादतर अन्वेषण-आविष्कार संयोगवश ही तो हुए हैं.भले ही बाद में किसी ने उसका श्रेय ही नहीं बल्कि उसके नाम पर पुरस्कार भी झटक लिया हो.इस संयोग के निमित्त बने थे श्री मुखारविन्द खांण्डेय नामधारी एक जीवधारी जो आजकल विश्व के कुछ कुष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में दिव्य पुरुष के रूप में याद किये जाते हैं.उनकी स्मृति में जगह्-जगह मेले-ठेले-उत्सव आदि भी होते रहते हैं.आप ने देखे होंगे शायद!

अथ संयोग कथा :

एक बार प्रलय हुई।समूची पृथ्वी पर हाहाकार मच गया.सबकुझ समाप्त.सबकुझ खतम.सबकुझ खल्लास.बस बचा रह गया एक अनाम-बेनाम नगर जिसका नाम बाद में खैनीताल पड़ा.वह बचा शायद इसलिये कि वहां के निवासी बड़े ही पुण्यात्मा टाइप के लोग थे क्योंकि इस नगर का नाम खैनी यानी सुर्ती यानी चैतन्य चूर्ण के नाम पर पड़ा था.इस नगर के संस्थापक (प्रातः स्मरणीय) डी.बी. भाई खैनी खाते ही नहीं बल्कि उसके गुण भी गया करते थे,वह भी एक अबूझ सी भाषा में जिसका अर्थ या अनर्थ न समझते हुये लोग समझदारों की तरह मुंडी हिलाया करते थे.जब(प्रातः स्मरणीय) डी.बी. भाई अपना 'खैनियोपाख्यानचरित्सागर' नामक अखंड काव्य पूरा कर चुके तो उन्हें इस नश्वर संसार की नश्वरता का बोध हुआ और वे एक दिन अंतर्ध्यान हो गये.उड़ती-उड़ाती खबरों से पता चला कि (प्रातः स्मरणीय) डी.बी. भाई किल्मोड़ा वाले बद्री काका के साथ देशाटन पर चले गये हैं.तब उनके शिष्यों-प्रशंसकों ने मिलकर नगर का नाम खैनीताल करवा दिया और दे-दिवाकर नामांतरण से संबंधित महकमे से इस पर स्वीकृति की मुहर भी लगवा ली.अगर मेरी बात पर विश्वास न हो तो 'बुग्याल' वाले बड़्बाज्यू या' विलायती रेडियो'वाले राजेश जोशी दद्दा से तसदीक करवा सकते हैं कि मैं झूठ बोल्या?

खण्डः दो -

तो हे पाठक प्रवर! इसी विख्यात-कुख्यात खैनीताल नामक नगर में 'ब्रुकबिल खतरावास' नामक एक अजायबघर था (वह अब नहीं है लेकिन इतिहास और स्मृतियों के कबाड़खाने में तो है ही और रहेगा भी.) जिसमें तरह-तरह के जीवित जीव-जंतु रहा करते थे जिनमें से कुछ तो 'जीवित जीवाष्म' की श्रेणी में गिने जाने लायक हो गये थे. खतरावास के बाशिंदे निरंतर खतरे झेलते रहते थे,वे एक हद तक इसमें विशेषज्ञता प्राप्त कर चुके थे क्योंकि उनका 'वास' बहुत ही जीर्ण दशा में था.वह किसी जमाने में वह अस्तबल रह चुका था और अब उसमें प्रखर मेधावी 'खर' रहा करते थे और ऊपर से एक बवाल यह भी था कि नगर की सबसे ऊंची पहाड़ी 'टाइना टीक' से बड़े-बड़े बोल्डर लुढकते रहते थे और खतरावासी एस्बेस्टस की भयंकर ठंडी छतों के नीचे लेट-बैठकर करवट लिए, तसव्वुरे जानां किये हुए अपने शोल्डर बचाया करते थे. और हां, खतरावासी पढने-लिखने का काम भी करते थे.दरअसल उनका मुख्य काम वही था,वे उसी के लिये अलग-अलग जगहों से भेजे गये थे किन्तु प्राथमिकताओं की सूची में पढने-लिखने की एंट्री सबसे आखीर में दर्ज थी.

ब्रुकबिल खतरावास के खास और (क्रिकेट) खेले - ( दिल पे चोट) खाये खिलाड़ी थे श्री मुखारविन्द खांण्डेय (जिन्हें आगे 'मुखी भाई' कहा जायेगा)।वे ,यानी मुखी भाई रसायन विज्ञान में रस ले-ले कर पेंच.डी. उपाधि प्राप्त करने के उद्देश्य से शोध कर रहे थे जो आज तक पूरी नहीं हुई है और तमाशा यह देखो कि 'इनवरसिट्टी' वाले एडवांस मे डिग्री छाप के उनके पीछे-पीछे कई हजार सालों से डोल रहे हैं कि डाक्साब! ले लो ,ले ही लो.लेकिन डाक्साब मानें तब ना ! वे केवल अपने दिल की मानते हैं और उनका दिल उनके पास है नहीं. कहते हैं- धरे रहो,धरे रहो.अगली प्रलय के बाद लेंगे.

तो हे पाठक प्रवर! हिन्दी ब्लाग के उद्भव का श्रेय इन्हीं मुखी भाई को जाता है।उन्होंने आज से कई हजार वर्ष पहले खैनीताल के खतरावास मे क्रोध में आकर इन पंक्तियों के लेखक के समक्ष श्राप देते हुए भविष्यवाणी कर दी थी कि कलयुग में हिन्दी पत्रकारिता का ब्लागावतार होगा होगा और नौ दो ग्यारह होते हुए पतली गली तथा धाकड़ मोहल्ले से लेकर कबाड़खाने तक इसकी व्याप्ति होगी. सचमुच महापुरुषों की वाणी कभी वृथा नहीं जाती.


अथ श्राप कथा :

विस्तार के भय से इतना भर बताता हूं कि मुखी भाई को प्रेम हो गया था ।यह उस युग में बहुत कामन चीज थी,आज का कुछ कह नहीं सकते।सुना है कि कवियों-कलाकारों को अब भी होता है.मुखी भाई अपनी प्रेम कथा को अमर होते देखना चाहते थे.उनकी इच्छा थी कि उनकी प्रेमकथा को लेकर एक खंडकाव्य तो जरूर लिखा जाना चाहिए ताकि उनकी और उनकी रूपसी प्रेयसी (जो उस खतरावास मे वास करती थी जिसकी टीन की छतों पर रात के अंधेरे में मुहब्बत के भूखे भाई लोग अपना कलेजा निकाल कर फेंका करते थे लेकिन किसी चमत्कार के कारण वे छत तक पहुंचते-पहुंचते पत्थरों में तब्दील हो जाया करते थे ! ऐसा सुना था.) की कथा पाठ्यक्रमों का हिस्सा बन सकें और विद्यार्थी सिर खपायें.इन पंक्तियों का लेखक तब भी कुछ लिखता था,उसके यार दोस्त भी लिक्खाड़ थे.मुखी भाई की इच्छा थी कि मैं उनकी प्रेमकथा को लिपिबद्ध करूं.ऐसा अनुरोध वे कई सालों तक करते रहे और मैं अपनी व्यस्तता या असमर्थता का बहाना बनाकर टालता रहा तब तक जब तक कि उनकी उसी रूपसी प्रेयसी से शादी की नौबत नहीं आ गई.शादी वाले दिन जब वे घोड़ी पर सवार होकर मानो कोई जंग जीतने जा रहे थे तो अपने मुखारविंद पर लटक रहे सेहरे को तनिक खिसका कर पूरे तपोबल को पुंजीभूत करते हुए उन्होंने हाथ उठाकर श्राप दिया था -'सुन ऐ लेखक-वेखक के बच्चे !आज तो मेरी प्रेमकथा का अंत होने जा रहा है और तूने उसे लिखा नहीं किंतु एक दिन ऐसा भी आएगा जब कौआ मोती खाएगा तब कलयुग में मेरा ब्लागावतार होगा और तेरे जैसे लेखक-वेखक कलम छोड़कर कंप्यूटर पकड़ेंगे और बेटा तू तो उसी ब्लाग के किसी कबाड़खाने में बैठकर मेरी प्रेमकथा लिखेगा.' ऐसी श्रापमय भविष्यवाणी कर मुखी भाई घोड़ी समेत अंतर्ध्यान हो गये.पता नहीं खाटिमपुर के झिल्लमिल्ल विहार के मकान नंबर ए-०३ में श्री मुखारविन्द खांण्डेय नाम से रहने वाले मास्साब कौन हैं. इस बारे में उनकी पत्नी और बच्चे भी मौन हैं.


तो हे पाठक प्रवर ! यह तो हुई श्रापकथा यानी ब्लाग कथा । प्रेमकथा फिर कभी ।

Friday, December 28, 2007

आज जो पढ़ा,आज जो सोचा

( कल से जी कुछ उचटा-सा है. जब कभी भी ऐसा होता है खूब पढता हूं ,खासकर कविता की किताबें.कल और आज जो कुछ भी पढा उसी में से कुछ चुनिंदा यहां पेश करने की इजाजत चाह्ता हूं)

" यह बिल्कुल सच है कि मैं फिर कभी कविता और चित्रों के फेर से निकल नहीं पाया. और कहनियां भी. ये सब मेरे अकेलेपन और असुरक्षा के एकमात्र शरण्य बन जायेंगे ऐसा मैंने उन दिनों बिल्कुल नहीं सोचा था. बाद में मैनें कहीं पढा,शायद इतालवी कव इयूजीन मोंताले ने कहा था कि कवि असुरक्षा का जादूगर होता है.वह अपने जय को पराजय और पराजय में बदलने के एक अंतहीन काम में जीवन भर लगा रहता है. वह बहुत अशक्त होता है लेकिन अपने दुखों और निर्वासन की गुफा में कैद उसकी आंखें किसी अपराजेय सम्राट् की तरह आकाश की ओर हमेशा लगी रहती हैं. मेरी अपनी कविता की पंक्ति है कि रात के अकेलेपन में कवि का शरीर चंद्रमा की तरह चमकता है.

कविता ही नहीं किसी भी कला की सृजनात्मकता के गहन पलों में समूचा युग और संसार कवि के स्नायु में किसी द्रव की तरह बहता है.

और जिसका शरीर रात में चंद्रमा की तरह नहीं चमकता ,जो एक अपराजेय सम्राट् की तरहा काश को नहीं ताकता ,काल और संसार जिसकी शिराओं में द्रव की तरह नहीं प्रवाहित ,उसे मैं कभी भी कवि नही मान पाता.चाहे वह कितना भी बड़ा संपादक ,पत्रकार ,राज्नीतिक नेता या अफसर क्यों न हो.

कविता की सत्ता तमाम बाहरी सत्ताओं का विरोध करती है. वह बहुत गहरे अर्थ और प्राचीन अर्थों में नैतिक होती है."

(भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार प्राप्त कविताओं के संग्रह 'उर्वर प्रदेश' में उदय प्रकाश के वक्तव्य का एक अंश)


इच्छा

मुझे हवा चाहिये
जिसमें आजाद होकर मैं सांस ले सकूं
और जिसे गुंजा सकूं
अपने शब्दों से

मुझे घर चहिये
जिसके लोग मुझे प्यार करें
और जहां मैं नाराज हो सकूं
मनाये जाने के लिये

मुझे नीला आसमान चहिये
जिसके नीचे
मैं हरियाली की तरह फैल सकूं
और चूम सकूं उस लड़की को
अपने होठों की पूरी ऊष्मा के साथ -

मुझे खुले हाथ और सधी हुई उंगलियां चाहिये
जिनसे मैं उकेर सकूं
इतिहास की सुन्दरतम कलाकृति
और बजा सकूं
संगीत का सबसे जटिल राग

इन सबके अलावा
मुझे चाहिये एक नश्वर देह
जिसे मैं अपने पापों से गन्दा कर सकूं
और जिसके खत्म होने तक
मैं आदमी की तरह जी सकूं


(यह कविता मेरे अजीज दोस्त अशोक पान्डे के संग्रह 'देखता हूं सपने' से ली गई है,बिना किसी आभार के. साथ ही इस हिदायत के साथ कि भइए उठ अपनी खटारा साइकिल उठा,तराजू -बाट दुरुस्त कर और फेरा लगा.बाबू जी! कबाड़खाने में कोई सोना-चांदी तो ना गेरेगा.आएगा तो लोया ,पिलाट्टिक और रद्दी पेप्पोर ही.हम तो इसी में से काम का 'माल'छांट कर अपनी दुकान चलायेंगे. देख तो आजू-बाजू क्या हो रिया है और तू खुन्नस खा के सो रिया है. चल काम पे लग नहीं तो पिटैगा और 'पीसे' भी ना मिलैंगे....टेंशन काय को लेने का....नराई,प्यार और पुच्च....)

Wednesday, December 26, 2007

'कौन इस शहर में दीवाना हुआ मेरे बाद' उर्फ राही और नीरज के शहरनामे पर क्षण भर

कैस भागा शहर से शर्मिंदा होकर सू-ए-दश्त,
बन गया तकलीद से मेरी ये सौदाई अबस

( ग़ालिब)

शहरनामा लिखने की वैसी सुदीर्घ और प्रौढ़ परम्परा के दर्शन हिन्दी में नहीं होते हैं जैसी कि वह उर्दू साहित्य में दिखाई देती हैऐसा नहीं है कि हिन्दी साहित्य में 'नगर शोभा वर्णन' के रंग-प्रसंग नहीं हैं और न ही यह कि नगरों-शहरों की स्मृति-विस्मृति में हिन्दी वालों ने कोई कम आंसू बहाए हैं फिर भी पहली नजर में ऐसा लगता है कि शहर दर शहर भटकने, उजड़ने, बसने, बिखरने और बनने की जो जद्दोजहद आरम्भ से ही उर्दू भाषा और साहित्य से जुड़े तमाम घटकों के अनुभव जगत का यथार्थ बनी लगभग वैसा ही 'कितने शहरों में कितनी बार' का वाकया या हादसा हिन्दी के हिस्से में शायद नहीं आयाअपनी पुस्तक 'उर्दू भाषा और साहित्य'में काव्य-शास्त्र संबंधी कुछ बातों का उल्लेख करते हुए फिराक गोरखपुरी लिखते हैं-'शहर आशोब (में)किसी शहर के उजड़ने या बरबाद हो जाने पर उसके पुराने वैभव को दुःख के साथ याद किया जाता हैइस प्रकार की कविता अत्यन्त मार्मिक होती है'उर्दू काव्य में शहरे-चराग़ां,शहरे-ख़ामोशां,शहरे-आरजू वगैरह का न केवल जिक्र आया है या कि किसी शहर के तसव्वुर में फकत 'वाह्-वाह् या 'हाय-हाय' ही की गई है बल्कि उसके समुचित वैविध्य,विस्तार और वर्णन के साथ यादगार कलात्मक प्रस्तुति भी की गई है
नास्टैल्जिया शहरनामे का केन्द्रीय सूत्र है जिसके रेशे-रेशे को उधेड्ना ही उसे दोबारा बुनना हैग़ालिब के शब्दों में कहें तो यह 'जले हुए जिस्म और दिल की जगह की राख को कुरेदने की जुस्तजू'हैशहरनामा न तो संस्मरण है और न ही यात्रा वृतांत अपितु मुझे लगता है कि यह किसी शहर से जुड़ी स्मृतियों के कबाड़खाने को खंगालते हुए एक-एक चीज को उलट-पुलट कर जस का तस रख देने का कलात्मक कारनामा है

'चांद तो अब भी निकलता होगा' राही मासूम रज़ा की एक तवील नज़्म है जो राही का 'शहरनामा अलीगढ़'भी कहा जा सकता हैवही अलीगढ़,वही राही का 'शहरे-तमन्ना' जिसकी यूनिवर्सिटी को उन्होंने दूसरी मां का दर्जा दिया थागंगौली,गाजीपुर और अलीगढ़ राही के व्यक्तित्व-निर्माण की भूमियां हैंअलीगढ़ में उन्होंने 'छोटे आदमी की बड़ी कहानी'शीर्षक से परमवीर अब्दुल हमीद की जीवनी लिखी,'आधा गांव' जैसा कालजयी उपन्यास लिखा और अपने पूरे दोस्त कुंवर पाल सिंह को समर्पित कियाइसी अलीगढ़ को उन्होंने अपने उपन्यास 'टोपी शुक्ला' में अमर कर दिया और यह वही अलीगढ़ है जिसके 'कूए यार' से रुस्वा होकर उन्हें बंबई या मुंबई के 'सूए दार, की जानिब चलना पड़ा जहां फिल्मी दुनिया के चकाचौंध में अपनी कलम के बूते एक अपरिहार्य जगह बनाकर रहते हुए भी वे निरंतर अपने शहरे-तमन्ना को याद करते रहे -

कुछ उस शहरे-तमन्ना की कहो
ओस की बूंद से क्या करती है अब सुबह सुलूक
वह मेरे साथ के सब तश्ना दहां कैसे हैं
उड़ती-पड़ती ये सुनी थी कि परेशान हैं लोग
अपने ख्वाबों से परेशान हैं लोग
****
जिस गली ने मुझे सिखलाए थे आदाबे-जुनूं
उस गली में मेरे पैरों के निशां कैसे हैं
शहरे रुसवाई में चलती हैं हवायें कैसी
इन दिनों मश्गलए-जुल्फे परीशां क्या है
साख कैसी है जुनूं वालों की
कीमते चाके गरीबां क्या है
****
कौन आया है मियां खां की जगह
चाय में कौन मिलाता है मुहब्बत का नमक
सुबह के बाल में कंघी करने
कौन आता है वहां
सुबह होती है कहां
शाम कहां ढ़लती है
शोबए-उर्दू में अब किसकी ग़ज़ल चलती है
****
चांद तो अब भी निकलता होगा
मार्च की चांदनी अब लेती है किन लोगों के नाम
किनके सर लगता है अब इश्क का संगीन इल्जाम
सुबह है किनके बगल की जीनत
किनके पहलू में है शाम
किन पे जीना है हराम
जो भी हों वह
तो हैं म्रेरे ही कबीले वाले
उस तरफ हो जो गुजर
उनसे ये कहना
कि मैंने उन्हें भेजा है सलाम


राही मासूम रज़ा के महाकाव्य '१८५७'(बाद में 'क्रांति कथा' नाम से प्रकाशित) की भूमिका'गीतों का राजकुमार'कहे जाने वाले नीरज ने लिखी थी कवि सम्मेलनों ,किताबों,कैसेटों के माध्यम से हिन्दी कविता को आम आदमी की जुबान तक पहुंचाने वाले कवि नीरज ने अपार लोकप्रियता हासिल की हैवे कविता की लोकप्रियता के जीवित कीर्तिमान है लेकिन उनकी यही लोकप्रियता हिन्दी साहित्य के इतिहासकारों की दृष्टि में 'शाप' बन गई('लोकप्रियता बनाम साहित्यिकता' के मुद्दे को हिन्दी के साहित्यिक विमर्श का विषय कभी बनने ही नहीं दिया गया और यदि कभी ऐसा हुआ भी तो उस पर कोई गंभीर चर्चा शायद ही कभी हुई होहां,'पापुलर कल्चर' के अध्येता अब इस पर बात जरूर कर रहे हैं)राही अलीगढ़ छोड़कर मुंबई गये और नीरज कानपुर छोड़कर अलीगढ़ आएराही फिल्मी दुनिया में अपनी जगह बनाकर वहीं के हो गये और नीरज फिल्मी दुनिया का फेरा कर "कांरवां गुजर गया गुबार देखते'हुए अलीगढ़ लौट आए,पर कानपुर को भूल नहीं पाएअपने शहरे तमन्ना को कोई भूलता है भला! प्रस्तुत है नीरज के शहरनामा 'कानपुर के प्रति' के कुछ अंश -

कानपुर!आह!आज तेरी याद आई फिर
स्याह कुछ और मेरी रात हुई जाती है
आंख पहले भी यह रोई थी बहुत तेरे लिये
अब तो लगता है कि बरसात हुई जाती है
****
और ऋषियों के नाम वाला वह नामी कालिज
प्यार देकर भी न्याय जो न दे सका मुझको
मेरी बगिया की हवा जो तू उधर से गुजरे
कुछ भी कहना न,बस सीने से लगाना उसको
****
बात यह किन्तु सिर्फ जानती है 'मेस्टन रोड'
ट्यूब कितने कि मेरी साइकिल ने बदले हैं
और 'चित्रा' से जो चाहो तो पूछ लेना यह
मेरी तस्वीर में किस किसके रंग धुंधले हैं
****
शोख मुस्कान वही और वही ढीठ नजर
साथ सांसों के यहां तक रे! चली आई है
तीन सौ मील की दूरी भी कोई दूरी है
प्रेम की गांठ तो मरके भी न खुल पई है
****
कानपुर ! आज जो देखे तू अपने बेटे को
अपने 'नीरज' की जगह लाश उसकी पायेगा
सस्ता कुछ इतना यहां मैंने खुद को बेचा है
मुझको मुफलिस भी खरीदे तो सहम जायेगा


(हर्ष,विषाद,उल्लास, उपालंभ,मान-अभिमान की काव्यात्मक कारगुजारियों से गुजरते हुए मैं यहां राही मासूम रज़ा और नीरज के शहरनामे के बहाने अपने उस शहरनामे को भी भीतर ही भीतर दोहरा लेना चाहता हूं जो पिछले कई सालों से लगातार लिखा जा रहा है; बकौल अपने प्रिय शायर इब्ने इंशा-
किसका-किसका हाल सुनाया तू ने ऐ अफसानागो
हमने एक तुझी को ढुंढा इस सारे अफसाने में)

Friday, December 21, 2007

स्मृतियों के एकांत संगीत में गोविन्द बल्लभ पंत की स्मृति और शमशेर की एक कविता

गोविन्द बल्लभ पंत का निधन ९८ वर्ष की अवस्था में २६ अगस्त १९९६ को हुआ था। अगर वे दो साल और जीवित रहते तो 'जीवेम शरदः शतम' की उक्ति को चरितार्थ करते। आश्चर्य है कि तत्कालीन संचार माध्यमों के लिए उनकी मौत कोई खबर नहीं बन सकी थी। वैसे देखा जाय तो इसमें आश्चर्य ही क्या है क्योंकि पंत जी उस युग के साहित्यकार थे जब साहित्य का मतलब सिर्फ साहित्य होता था ,साहित्यबाजी नहीं। यह भी कोई आश्चर्य की बात नहीं कि बहुधा लोग नाम की समानता के कारण उनमें और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री पं० गोविन्द बल्लभ पंत में भ्रमित हो जाया करते थे। इस बारे में कुमांऊंनी समाज में कई तरह के किस्से कहे-सुने-सुनाये जाते रहे हैं।'हिन्दी साहित्य कोश' में भी गोविन्द बल्लभ पंत-१ और गोविन्द बल्लभ पंत-२ लिखा गया है। इसमें साहित्यकार पंत पहले स्थान पर हैं और राजनेता पंत दूसरे स्थान पर।

गोविन्द बल्लभ पंत ने अठारह-उन्नीस उम्र से काव्य रचना आरंभ की। उनकी ख्याति मुख्यत: नाटककार और कथाकार के रूप में रही है। उनके नाटकों में 'कंजूस की खोपडी','राजमुकुट','वरमाला','अंत:पुर का छिद्र','अंगूर की बेटी','सुहाग बिन्दी','ययाति' आदि प्रमुख हैं। उन्होंने कई नाटक कंपनियों -व्याकुल भारत, राम विजय, न्यू एल्फ्रेड,पृथ्वी थिएटर्स आदि के लिए नाटक लिखे और अभिनय भी किया। ऐसे नाटकों में 'अहंकार','प्रेमयोगी','मातृभूमि','द्रौपदी स्वयंवर'प्रमुख हैं। पंत जी ने जीवन और जगत के विविध अनुभवों पर कई उपन्यासों की रचना की है जिनमें 'प्रतिमा','मदारी','तारिका','अमिताभ','नूरजहां','मुक्ति के बंधन','फॉरगेट मी नाट','मैत्रेय','यामिनी'आदि चर्चित रहे हैं। उनकी अन्य प्रसिद्ध रचनाओं में'विषकन्या'( एकांकी संग्रह) तथा 'एकादशी' और 'प्रदीप'(दोनों कहानी संग्रह) शामिल हैं। उन्होंने लगभग ७५ वर्षों तक लेखन किया लेकिन १९६० के बाद से वे एक रचनाकार के रूप में चुप ही रहे। अगर उनकी यह चुप्पी टूटती तो संभवत: पुस्तकों की संख्या की दृष्टि से वे महापंडित राहुल सांकृत्यायन के निकट पहुंच जाते।

मई-जून १९८८ में मैने पहली बार पंत जी को देखा-पहचाना जबकि कफी लंबे समय से नगर की साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय रहते हुए भी यह सुनता भर था कि प्रख्यात साहित्यकार गोविन्द बल्लभ पंत मेरे छात्रावास ब्रुकहिल के आसपास ही कहीं रहते हैं लेकिन उनसे मिलने का प्रयास कभी नहीं किया था पता नहीं वह कौन सी हिचक थी जो रोके रखती थी जबकि अन्य नये-पुराने साहित्यकारों के नैनीताल में होने की खबर मेरे जैसे नौसिखिये कलमघिस्सुओं में जोश भर देती थी और हम उनसे मिलते भी थे १९८८ की गर्मियों में शमशेर बहादुर सिंह् नैनीताल में थेइस मौके पर 'पहाड़' और 'नैनीताल समाचार ने 'एक शाम शमशेर के नाम' काव्य गोष्ठी का आयोजन कियाप्रोफेसर शेखर पाठक ने मुझे यह काम सौंपा कि कार्यक्रम की अध्यक्षता के लिये गोविन्द बल्लभ पंत जी से बात हो गई है और मैं उन्हें आयोजन स्थल सी.आर.एस.टी.इंटर कालेज तक लिवा लाऊंतब मैनें पहली बार जाना कि पंत जी के पुत्र कृषि या ऐसे ही किसी विभाग में बड़े अफसर हैं और पंत जी उन्हीं के साथ ओक पार्क में रहते हैं

खैर, नियत तारीख और समय पर मैं पंत जी के निवास पर पहुंचादरवाजा उनकी पुत्रवधु ने खोला ,मैंने अप्ना मंतव्य बताया तो उन्होने बैठने के लिये कहामैंने ध्यान दिया एक सुरुचि संपन्न बैठक,सोफे पर बैठा एक वृद्ध व्यक्ति-भूरे रंग की लंबी कमीज और सफेद पायजामा पहनेऐसा लगा इनको कहीं देखा है.. प्रणाम किया तो उन्होंने हाथ जोड़कर उत्तर दिया वे साहित्यकार गोविन्द बल्लभ पंत थे'ऐसा क्या खास है इस मनुष्य में...'मैंने गौर करना चाहाअरे! इन्हें तो अक्सर अपने छात्रावास के सामने वाली सड़क पर घूमते-टहलते देखा हैक़्या यह वही मनुष्य है जो अपने युग का चमकता हुआ सितारा था;अपने जमाने का मशहूर कथाकार और नाटककार क़्या यह वही मनुष्य है जो पं.राधेश्याम कथावाचक और पृथ्वीराज कपूर जैसी महान हस्तियों के साथ काम कर चुका है इतना ही नहीं असहयोग आंदोलन का दमदार सिपाही और एक लोकप्रिय शिक्षक भी रहा है...मुझे शर्म आई कि तब तक एकाध छिटपुट कहानियों के अतिरिक्त मैंने उनकी कोई भी किताब नहीं पढी थी,यहां तक कि बी.ए.के कोर्स में उनका नाटक 'पन्ना'शामिल था परंतु हमने उसका विकल्प 'लहरों के राजहंस'(मोहन राकेश)ही पढा था
पंत जी कार्यक्रम में आएशायद कई दशकों बाद उनकी और शमशेर जी की यह प्रत्यक्ष मुलाकात थीशमशेर जी कुछ-कुछ पूछते रहे और पंत जी चुपशमशेर जी ने अपनी दो-तीन कविताओं का पाठ किया और थक गयेडा.रंजना अरगड़े ने उनकी कुछ कवितायें पढीं, कुछ और लोगों ने भी कविता पाठ किया त्रिनेत्र जोशी अपने कैमरे से सचल और अचल तस्वीरें उतारते रहेपंत जी चुप मुस्कुराते रहेशमशेर जी का भी यही हाल थाहम सबके लिए यह एक साथ एक मंच पर 'दो सितारों के मिलन' का एक ऐसा अद्भुत क्षण था जो दोबारा लौटकर नहीं आने वाला थाकार्यक्रम सफल रहा इसके बाद लगभग दो साल तक मैं प्रायः रोज ही पंत जी को छड़ी थामे सड़क पर टहलते हुये देखता रहाकभी सामने पड़ जाने पर प्रणाम भी करता और वह कुछ पहचानने की कोशिश करते हुए आगे बढ जातेमन करता था कि उनके साथ चलूं,ढेर सारी बातें पूछूं,ढेर सारी बातें सुनूं लेकिन वे इतने चुप-चुप रहते थे कि उनके एकांत संगीत की लय में खलल डालने की हिम्मत नहीं होती थीवक्त गुजरता रहा और मैं पंत जी को दूर से देखते हुए उनके साहित्य के निकट आता रहा

अंततः एक दिन मेरी पढाई पूरी हुई और सरोवर नगरी से प्रत्यक्ष नाता टूटाइस बीच देश-दुनिया में बहुत कुछ बना,बिगड़ा,बदलाइस बीच कई साहित्यकरों क निधन हुआ और पत्र-पत्रिकाओं ,रेडियो- टी.वी.पर उनको खूब याद किया गया यह जरूरी भी था और जायज भी लेकिन उस वक्त जब गोविन्द बल्लभ पंत का निधन हुआ था तब उनके स्मरण को लेकर जो ठंडापन व्याप्त हुआ था वह आज तक दिखाई देता है-अनुभव होता हैऐसा ठंडापन क्या यह प्रदर्शित-प्रकट नहीं करता है कि आज की दुनिया में आप तभी तक महान हैं जब तक कि मंच पर हैं और मुखर हैं

शमशेरबहादुर सिंह की कविताः महुवा

यह अजब पेड़ है जिसमें कि जनाब
इस कदर जल्द कली फूटती है
कि अभी कल देखो
मार पतझड़ ही पतझड़ था इसके नीचे
और अब
सुर्ख दिये,सुर्ख दियों का झुरमुट
नन्हें-नन्हें,कोमल
नीचे से ऊपर तक -
झिलमिलाहट का तनोबा मानो-
छाया हुआ हैयह अजब पेड़ है
पत्ते कलियां
कत्थई पान का चटक रंग लिये -
इक हंसी की तस्वीर -
(खिलखिलाहट से मगर कम- दर्जे)
मेरी आंखों में थिरक उठती है

मुझको मालूम है ,ये रंग अभी छूटेंगे
गुच्छे के गुच्छे मेरे सर पै हरी
छतरियां तानेंगेः गुच्छे के गुच्छे ये
फिर भी,फिर भी, फिर भी
एक बार और भी फिर भी शाम की घनघोर घटायें
-आग-सी लगी हो जैसे हर -सू-
सर पै छा जाएँगी :
कोई चिल्ला के पुकारेगा ,कि देखो,देखो
यही महुवे का महावन है !

Monday, December 17, 2007

कर्मनाशाः एक अपवित्र नदी की(अपवित्र!)कथा


"काले सांप का काटा आदमी बच सकता है, हलाहल जहर पीने वाले की मौत रुक सकती है, किन्तु जिस पौधे को एक बार कर्मनाशा का पानी छू ले, वह फिर हरा नहीं हो सकता. कर्मनाशा के बारे में किनारे के लोगों में एक और विश्वास प्रचलित था कि यदि एक बार नदी बढ़ जाये तो बिना मानुस की बलि लिये नहीं लौटती।"


"कर्मनाशा को प्राणों की बलि चाहिऐ ,बिना प्राणों की बलि लिये बाढ़ नहीं उतरेगी ... फिर उसी की बलि क्यों न दी जाय, जिसने यह पाप किया ... पारसाल जान के बदले जान दी गई, पर कर्मनाशा दो बलि लेकर ही ... त्रिशंकु के पाप की लहरें किनारों पर सांप की तरह फुफकार रही थीं।"


हिन्दी के मशहूर कथाकार शिवप्रसाद सिंह की कहानी 'कर्मनाशा की हार' के ये दो अंश उस नदी के बारे में हैं जो लोक प्रचलित किंवदंतियों -आख्यानों में एक अपवित्र नदी मानी गई है क्योंकि वह कर्मों का नाश करती है. उसके जल के स्पर्श मात्र से हमारे सारे पुण्य विगलित हो जाते हैं. गंगा में स्नान करने से पुण्य लाभ होता है क्योंकि वह पतितपावनी -पापनाशिनी है, हमारे पापों को हर लेती है और इसके ठीक उलट कर्मनाशा का जलस्पर्श हमें पुण्यहीन कर देता है.ऐसा माना गया है. लेकिन विंधयाचल के पहाड़ों से निकलने वाली यह छुटकी-सी नदी चकिया में सूफी संत बाबा सैय्यद अब्दुल लतीफ शाह बर्री की मजार पर मत्था टेकती हुई,मेरे गांव मिर्चा के बगल से बतियाती हुई, काफी दूर तक उत्तर प्रदेश और बिहार की सीमारेखा उकेरती हुई अंततः बक्सर के पास गंगा में समाहित हो जाती है.पुण्य और पाप की अलग - अलग धारायें मिलकर एकाकार हो जाती हैं. कबीर के शब्दों में कहें तो 'जल जलहिं समाना' की तरह आपस में अवगाहित-समाहित दो विपरीतार्थक संज्ञायें.


कर्मनाशा की हार'कहानी इंटरमीडिएट के कोर्स में थी.हमारे हिन्दी के अध्यापक विजय नारायण पांडेय जी ने( जो एक उपन्यासकार भी थे.उनके लिखे 'दरिया के किनारे'को हम उस समय तक हिन्दी का एकमात्र साहित्यिक उपन्यास मानते थे क्योंकि हमने पढा ही वही था.)कहानी कला के तत्वों के आधार पर 'प्रस्तुत' कहानी की समीक्षा तथा इसके प्रमुख पात्र भैरों पांड़े का चरित्र चित्रण लिखवाते हुये मौखिक रूप से विस्तारपूर्वक कर्मनाशा की अपवित्रता की कथा सुनाई थी जिसमें कई बार त्रिशंकु का जिक्र आया था. इस कथा के कई 'अध्यायों' की पर्याप्त सामग्री पीढी दर पीढी चली आ रही परम्परा का अनिवार्य हिस्सा बनकर हमारे पास पहले से ही मौजूद थी क्योंकि कर्मनाशा हमारी अपनी नदी थी -हमारे पड़ोस की नदी. और मेरे लिये तो इसका महत्व इसलिये ज्यादा था कि यह मेरे गांव तथा ननिहाल के बीच की पांच कोस की दूरी को दो बराबर -बराबर हिस्सों में बांट देती थी.गर्मियों में जब इसमें पानी घुटने-घुटने हो जाया करता था तब उसके गॅदले जल में छपाक-छपाक करते हुये,पिता की डांट खाते हुये उस पार जाना पैदल यात्रा की थकावट को अलौकिक -अविस्मरणीय आनंद में अनूदित-परिवर्तित कर देता था. वर्ष के शेष महीनों में नाव चला करती थी.मल्लाह को उतराई देने के लिये अक्सर पिताजी मुझे दो चवन्नियां इस हिदायत के साथ पकड़ा दिया करते थे कि इन्हें पानी में नहीं डालना है.क्यों? पूछने की हिम्मत तो नहीं होती थी लेकिन बालमन में यह सवाल तो उठता ही था कि जब हम गाजीपुर जाते वक़्त गंगाजी में सिक्के प्रवाहित करते हैं तो कर्मनाशा में क्यों नहीं? हां, एक सवाल यह भी कौंधता था कि गंगाजी की तर्ज पर कर्मनाशाजी कहने की कोशिश करने से डांट क्यों पड़ती है? इनमें से कुछ प्रश्नों के उत्तर उम्र बढ़ने के साथ स्वतः मिलते चले गये,कुछ के लिये दूसरों से मदद ली, कुछ के लिये किताबों में सिर खपाया और कुछ आज भी,अब भी अनसुलझे हैं-जीवन की तरह्. नीरज का एक शेर याद आ रहा है-


कोई कंघी न मिली जिससे सुलझ पाती वो,
जिन्दगी उलझी रही ब्रह्म के दर्शन की तरह्। '


वृहत हिन्दी कोश'(ज्ञानमंडल,वाराणसी)और 'हिन्दू धर्म कोश'(डा० राजबली पांडेय) के अनुसार सूर्यवंशी राजा त्रिंशंकु की कथा के साथ कर्मनाशा के उद्गम को जोड़ा गया है.राजा त्रिंशंकु को सत्यवादी हरिश्चन्द्र(भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा लिखित नाटक 'सत्य हरिश्चन्द्र' का नायक) का पिता बताया जाता है. 'तैत्तिरीय उपनिषद' में इसी नाम के एक ऋषि का उल्लेख भी मिलता है किन्तु वे दूसरे हैं.त्रिंशंकु दो ऋषियों -वसिष्ठ और विश्वामित्र की आपसी प्रतिद्वंदिता और द्वेष का शिकार होकर अधर में लटक गये. विश्वामित्र उन्हें सदेह स्वर्ग भेजना चाहते थे जबकि वसिष्ठ ने अपने मंत्र बल से उन्हें आकाशमार्ग में ही उल्टा लटका दिया,तबसे वे इसी दशा में लटके हुये पृथ्वी की परिक्रमा कर रहे हैं.उनके मुंह जो लार-थूक आदि गिरा उसी से कर्मनाशा नदी उद्भूत हुई है.जहां बाकी नदियां या तो प्राकृतिक या दैवीय स्रोतों से अवतरित हुई हैं वहीं कर्मनाश का स्रोत मानवीय है संभवतः इसीलिये वह अस्पृश्य और अवांछित है,कर्मों का नाश करने वाली है. एक अन्य कथा में त्रिशंकु को तारा होना बताया गया है साथ ही कहीं-कहीं यह उल्लेख भी मिलता है कि इंद्र ने त्रिशंकु को स्वर्ग से धकेल दिया था.

खैर ,कथा-पुराण-आख्यान-लोक विश्वास जो भी कहें इस सच्चाई को झुठलाने का कोई ठोस कारण नहीं है कि कर्मनाशा एक जीती जागती नदी का नाम है.इसके तट की बसासतों में भी वैसा ही जीवनराग-खटराग बजता रहा है,बजता रहेगा जैसा कि संसार की अन्य नदियों के तीर पर बसी मानव बस्तियों में होता आया है ,होता रहेगा. संभव है और इसका कोई प्रमाण भी नहीं है कि इतिहास के किसी कालखंड में सिंधु-सरस्वती-दजला फरात-नील जैसी कोई उन्नत सभ्यता इसके किनारे पनपी-पली हो ,हो सकता है कि इसने राजाओं-नरेशों, आततायिओं-आक्रमणकारियों के लाव-लश्कर न देखे हों,हो सकता है कि इसके तट पर बसे गांव-जवार के किसी गृहस्थ के घर की अंधेरी कोठरी में किसी महान आत्मा ने जन्म न लिया हो, न ही किसी महत्वपूर्ण निर्माण और विनाश की कोई महागाथा इसके जल और उसमें वास करने वाले जीवधारियों-वनस्पतियों की उपस्थिति से जुड़ी हो फिर भी क्या इतना भर न होने से ही इसे महत्वहीन,मूल्यहीन् तथा अपवित्र मान लिया जाना चहिये?

Wednesday, December 12, 2007

शहर में सर्दियाँ :सर्दियों में शहर


सर्दियों में शहर
(एक दो दिन हुये जब से समाचारों में सुना-पढा-देखा है कि नैनीताल में मौसम का पहला हिमपात हुआ है तब से मन में कुछ्कुछ हो रहा है.वहां की ठंडक अपनी हथेलियों पर नहीं बल्कि ह्रदय में मह्सूस कर रहा हूं.शायद लगभग पूरा शहर सफेदी की चादर में लिपट कर सो रहा होगा.वैसे कोई भी मौसम हो यह प्रायः शहर ऊंघता-अनमना सा ही रह्ता है. आज से कई बरस पहले सम्भवतः १९८६-८७ में ऐसी ही किसी ठन्डी रात के गुनगुने एकान्त संगीत के साथ यह कविता लिखी थी.पूरा तो याद नहीं लेकिन इतना जरूर याद है कि रात थी,कंपकंपा देने वाली सर्दी थी,बर्फ गिर रही थी और मैं कविता जैसा कुछ लिख रहा था.प्रस्तुत है वही ठन्ड वाली कविता.)

शहर में सर्दियों का मौसम है
हवा में नमी है

धूप में खुशनुमा उदासी है
अभी बस अभी बर्फ गिरने ही वाली है
और शहर चुपचाप सो रहा है।


सो रही है झील
सो रहे हैं पहाड़.
मेरा शहर जागती आँखों में सो रहा है.
शहर की आंखों में एक नींद है
जो जाग रही है
शहर की आंखों में एक सपना है
जो सो रहा है।


आजकल लगभग आधा शहर
हल्द्वानी की तरफ नीचे उतर गया है
बस बच गई है नींद
बच गये हैं सपने.

बच्चे घरों में कैद हैं
उनके स्कूल की युनिफार्म्
छत पर धूप में सूख रही है
और किताब-कापियों के बीच
छुट्टियों की बर्फ भर गई है
जो शायद फरवरी के बाद ही पिघलेगी।


औरतों का वक्त
अब चुप्पी को सुनते हुये गुजरता है
आश्चर्य है कि वे फिर भी जी रही हैं।


मर्द लोगों के पास
बातें है,किस्सें है,किताबें हैं,शराब है
और वे अलाव की तरह सुलग रहे हैं


लड़कियां
अपनी कब्रगाहों में निश्शब्द दफ्न हैं
उनके पास देखने के लिये
ग्रीटिन्ग कार्डस और सपने हैं
उनके पास बोलने को बहुत कुछ है
लेकिन वे जाडों के बाद बोलेंगी।


सोने दो शहर को
वह लोरी और थपकियों के बिना भी
लम्बी-गहरी नींद सो सकता है
मेरा शहर कोई जिद्दी बच्चा नहीं है.

Monday, December 10, 2007

बाबा त्रिलोचन:धरती का कवि अनंत में


बाबा नहीं रहे।

हम सबके बाबा त्रिलोचन २० अगस्त १९१७ को चिरानी पट्टी, सुल्तानपुर में जन्मे और ९ दिसम्बर २००७ को दिल्ली में अनंत यात्रा पर चले गए। इस कवि, लेखक, कोष निर्माता और संपादक का जीवन और साहित्य विविध और विपुल है। अपने अन्तिम वर्षों वे लगभग भुला से दिए गए थे।हिन्दी साहित्य और हिन्दी भाषी समाज का यह कमीनापन , यह क्रूरता नयी बात नहीं है।


'कबाड़खाना ' बाबा त्रिलोचन को याद करते हुए कृतज्ञता पूर्वक यह भी याद कर रह है कि १९९२ में अशोक पांडे के कविता संग्रह 'देखता हूँ सपने' का विमोचन उन्होंने ही किया था। शमशेर, नागार्जुन,केदार के बाद हिन्दी का यह बड़ा स्तंभ ढहा है। नमन।

बाबा की एक कविता:

परिचय की गाँठ


यूं ही कुछ मुस्काकर तुमने
परिचय की वो गांठ लगा दी!

था पथ पर मैं भूला भूला
फूल उपेक्षित कोई फूला

जाने कौन लहर ती उस दिन

तुमने अपनी याद जगा दी।


कभी कभी यूं हो जाता है
गीत कहीं कोई गाता है

गूंज किसी उर में उठती है

तुमने वही धार उमगा दी।


जड़ता है जीवन की पीड़ा
निस्-तरंग पाषाणी क्रीड़ा
तुमने अन्जाने वह पीड़ा
छवि के शर से दूर भगा दी।

(बाबा का फोटो इरफान कबाड़ी के संग्रह से साभार)