Thursday, December 27, 2007

कबाड़ी की आखि़री पोस्ट

कबाड़खाना मैंने शुरू किया था. अब मैं इस से लौटने का मन बना चुका हूं. पिछले करीब ३ माह से यहां बीस-पच्चीस साथी आ जुड़े और हम सबने सामर्थ्य भर काम किया.

यह न कोई मिशन था न कोई उदात्त कर्म. बस एक नए माध्यम से ज़्यादा लोगों तक पहुंच पाने का मोह (या लालच) था.

२४ तारीख को मोहम्मद रफ़ी साहब का जन्मदिन था. मैंने एक पोस्ट लगाई थी उस आनन्द के प्रति रफ़ी साहब का आभार व्यक्त करते हुए जो उनकी आवाज़ ने कम से कम मुझे तो इतने सालों से लगातार दिया है.

एक कोई बेनाम सज्जन को एक ऐसे शब्द से आपत्ति है जिसका इस्तेमाल पोस्ट की टाइटिल में हुआ है.

माफ़ करेंगे. थोड़ा संवेदनशील हूं. डरपोक नहीं हूं.

बहुत भूमिकाएं नहीं बांधूंगा.

मैं ३१ दिसम्बर से कबाड़ख़ाने से अपना नाम वापस ले रहा हूं. मेरे अलावा इस ब्लाग पर इन तमाम सज्जनों ने अपना नाम बतौर कबाड़ी देने की इजाज़त दी थी: राजेश जोशी (बीबीसी लन्दन में कार्यरत), शिरीष मौर्य (कवि, अनुवादक, अध्यापक), शैलेन्द्र जोशी (कवि, अनुवादक), अविनाश (मीडिया से सम्बद्ध, मोहल्ला नामक ब्लाग चलाते हैं), अजित वडनेरकर (मीडिया से सम्बद्ध, शब्दों का सफ़र नामक ब्लाग चलाते हैं), दिनेश पालीवाल (कम्प्यूटर एक्सपर्ट), दीपा पाठक (मीडिया से सम्बद्ध, हिसालू काफ़ल नामक ब्लाग चलाती हैं), आशुतोष ('हिन्दुस्तान' में कार्यरत, बुग्याल नामक ब्लाग चलाते हैं, मेरे पहले गुरुओं में), सुन्दर ठाकुर (कवि, 'नवभारत टाइम्स' से संबद्ध), इरफ़ान (रेडियो और संगीत और कविता और तमाम इलाकों के जानकार, अभिन्न मित्र, मुख्यत: 'टूटी हुई, बिखरी हुई' और 'सस्ता शेर' नामक ब्लाग चलाते हैं), वीरेन डंगवाल (साहित्य अकादेमी पुरुस्कार से सम्मानित हिन्दी और देश के सबसे बेहतरीन कवियों में एक, महान मित्र और मेरे अपने बरगद), चन्द्रभूषण (मीडिया से सम्बद्ध, पहलू नामक ब्लाग चलाते हैं), विनीता यशस्वी (नैनीताल में मीडिया से सम्बद्ध), भूपेन (मीडिया से सम्बद्ध, काफ़ीहाउस नामक ब्लाग चलाते हैं), काकेश (काकेश की कतरनें नामक ब्लाग चलाते हैं), आशीष (मुक्तेश्वर के पास एक रेसोर्ट चलाते हैं), सिद्धेश्वर (हिन्दी पढ़ाते हैं, मेरे पहले गुरुओं में), रोहित उमराव (फ़ोटोपत्रकार), दिलीप मंडल (मीडिया से सम्बद्ध, ब्लागिंग में जाना माना प्रतिबद्ध नाम), कथाकार (सूरज प्रकाश, कथाकार नामक ब्लाग चलाते हैं, आजकल एक भीषण दुर्घटना का शिकार होने के बाद स्वास्थ्यलाभ कर रहे हैं) और अरुण रौतेला (नैनीताल में वकालत करते हैं).

यह पोस्ट इन सभी सज्जनों को सविनय सूचना है कि मैं आप सब को कबाड़ख़ाने का एडमिनिस्ट्रेटर बना रहा हूं. मेरी यह अंतिम पोस्ट है. ३१ दिसम्बर से मैं अपना नाम कबाड़ख़ाने से हटा लूंगा.

यदि इन सज्जनों को कबाड़खाना चलाने में कोई दिलचस्पी न हो तो उसी दिन से यह ब्लाग हटा लेने पर सभी को सहमत समझ लिया जाएगा.

सभी पाठकों का धन्यवाद.

*'सुख़नसाज़' ३१ दिसम्बर से हटा लिया जाएगा. और 'मेरा रामनगर भी.

18 comments:

Kakesh said...

अशोक दाज्यू,

केवल इतना ही कहुंगा कि अपने निर्णय पर पुनर्विचार करें और ऎसी छोटी छोटी बातों पर ध्यान भी ना दें. आप इस कबाड़खाने में जो कबाड़ जुटा रहे हैं वो शायद ही कोई जुटा पाये. इसलिये आप बने रहें और हम सबको प्रोत्साहित करते रहें.

शास्त्री जे सी फिलिप् said...

कबाडखाने को नियमित रूप से पढने वालों की संख्या आप के अनुमान से अधिक है. इससे हटने का आपका निर्णय दुखद है. कृपया पुनर्विचार करें.

कोई भी लेखक किसी भी विधा में लिखता हो, चाहे एक मिशन हो य न हो, वह हिन्दी के प्रचार प्रसार में एक महत्वपूर्ण कडी है. एक कडी का टूटना सारे जंजीर पर असर डालता है.

जिस तरह से अज्ञात टिप्पणीकार के प्रति आपने संवेदनशीलता दिखाई उसी तरह हम ज्ञात टिप्पणीकारों के प्रति भी संवेदनशीलता दिखायें एवं कबाडखाना एवं चिट्ठाकारी जारी रखें -- शास्त्री जे सी फिलिप


हे प्रभु, मुझे अपने दिव्य ज्ञान से भर दीजिये
जिससे मेरा हर कदम दूसरों के लिये अनुग्रह का कारण हो,
हर शब्द दुखी को सांत्वना एवं रचनाकर्मी को प्रेरणा दे,
हर पल मुझे यह लगे की मैं आपके और अधिक निकट
होता जा रहा हूं.

Raviratlami said...

आपसे पुनर्विचार का आग्रह है...

दरअसल हिन्दी ब्लॉगिंग अभी शैशवावस्था में है. किशोरा वस्था और युवावस्था के आते तक तो टिप्पणियों-पोस्टों, प्रतिटिप्पणियों-प्रतिपोस्टों में जूतमपैजार तक की नौबत आने वाली है और, शर्तिया, पोस्टें-टिप्पणियाँ भी फूहड़ता की सारी सीमाएँ लांघेंगीं.

इनसे बचने का एक ही उपाय है इन्हें अनदेखा करें. पोस्टों को न पढ़ें, जैसा कि इनका वजूद ही न हो. टिप्पणियों को मॉडरेट करें - आपके चिट्ठे पर एक बढ़िया सुविधा है - अवांछित अप्रिय टिप्पणियों को ट्रैश में डालें और अपना काम करते रहें. हो सके तो दोगुना जोश से.

पुनश्च: कबाड़खाना का तो मैं भी मुरीद हूँ.

swapandarshi said...

इतनी ज़्ररा सी बात पर संटियाये नही.

अच्छा ब्लोग है, कबाडी भाग गये तो सब तरफ गन्द फैल जायेगी.

Uday Prakash said...

यह निर्णय क्यो? अभी-अभी आपसे पहचान हुई, कुमार गन्धर्व के निर्गुण सन्गीत से आपने मेरा घर भर दिया। शिम्बोर्स्का, निकोनार पारा की बेहतरीन कविताए पेश की...!यह ठीक है कि मै पहाड का नही हू...लेकिन हिन्दी भाषा की व्याप्ति बडी है और आपका काम दूर-दूर तक पहुन्च रहा था। आपने सन्गीत की सी.डी. भी भेजी...!
यह मेरा अनुरोध है, सच्चा आग्रह कि आप ब्लोग से बाहर न जायेन...। यह एक छोटा-स कम्म्युनिटी सेन्टर था, गाव की एक चौपाल..कस्बे-शहर का नुक्कड जहा मिलते बैठते थे...
ऐसे मे तो बहुत से लोग चले जायेन्गे..! शायद बहुत ज़ल्द मै भी...
नये वर्ष की शुभकामनाये

इरफ़ान said...

चूतियापा न करें.

Sunder Chand Thakur said...

mujhe lagta hai Ashok tu jaldbaji kar raha hai. Kabaadkhaana itne kam arse mein itna lokpriya ho chuka hai ki ab istarah ise band nahin kiya ja sakta. yah aisa hi hai jaise bachcha paida karne ke baad maan ke pas use marne ka adhikar nahin rahta hai. Bhai jara raham kar...baksh de us namurad tippanikar ko aur hamen upkrit kar

Mired Mirage said...

अशोक जी, दो तीन दिन से कोई भी ब्लॉग नहीं पढ़े थे अत: समझ नहीं आया कि बात क्या हुई । अब पिछले चिट्ठों में खोजा तो कारण सामने आ गया ।
संवेदनशील होना बहुत अच्छी बात है और यह लेखन के लिए आवश्यक भी है । परन्तु जिस संवेदनशीलता से लेखन ही छूट जाए या आपके पाठकों को आपका लिखा मिलना बंद हो जाए, उस संवेदनशीलता का क्या लाभ ?
आपके इस कबाड़खाने के प्रयास के कारण हमें बहुत से नए लेखकों व चिट्ठाकारों का लिखा पढ़ने को मिला । मुझ जैसी, अपने पहाड़ से दूर रहने वाली, को नैनीताल के बारे में इतना कुछ जानने को मिला जो किसी सैलानी को कभी भी पता नहीं चल पाता । एक बात हो तो बताऊँ । आपके तो नाम से भी मेरे पहाड़ की सुगन्ध आती है ।
इस आँचलिक विषय को छोड़ भी दिया जाए तो आपने इतने कम समय में एक जबर्दस्त पाठकों की कतार खड़ी कर ली है ।
उपदेश देना सरल है। शायद कोई ऐसी टिप्पणी मेरे चिट्ठे पर करे तो मुझे भी दुख होगा । परन्तु आशा करती हूँ कि जब ऐसा होगा तो आज जैसे हम सब आपके साथ हैं वैसे ही आप भी मेरे साथ खड़े होकर मेरी हिम्मत बढ़ाएँगे व अपने स्नेह से मुझे नाराजगी, उदासी के दलदल से निकाल लेंगे ।
आपसे एक बार फिर हमारे चिट्ठाजगत को न छोड़ने के अनुरोध सहित,
घुघूती बासूती

bhupen said...

अशोक दा, सोचते हो कि इतनी आसानी से पीछा छूट जाएगा? इस फैसले का कोई तुक नहीं है इसलिए एक शानदार पोस्ट के साथ आपको अपने फैसले पर तुरंत अफसोस ज़ाहिर करना चाहिए. एक बात और असहमति का अधिकार तो सबको है ना, अगर कोई बेनाम समहत नहीं तो इसमें दुखी होने की क्या बात है? आशा है आप एक बेनाम के लिए इतने सारे नामधारी शुभचिंतकों को निराश नहीं करेंगे.

Vineeta Yashswi said...

Aap Ko itni chhoti baat par aise react nahi karna chahiye. ek prtikriya apne dekhi par aapka saath dene wale bhi to itne log hai. sabhi sach ko jante hai. isliye mere bhi apse yahe prarthna hai ki aap apna naam wapas na le aur is blog ko ise tarah chlne de.

G Vishwanath said...

पांडेजी,

क्या एक बेनाम टिप्पणीकार ने आपको मैदान छोड़ने पर मज़बूर किया है?
What a pity!
मैं भी कई बार अपने लेखों में अंग्रेज़ी शब्दों का प्रयोग करता हूँ।
कारण ? मेरी हिन्दी कमजोर है। मेरी मतृभाषा हिन्दी नहीं है। अभी सीख रहा हूँ। आजीवन परिस्थितियों के कारण, अंग्रेज़ी में ही लिखते आया हूँ।

इस समय हिन्दी के प्रति प्रेम ज्यादा और ज्ञान कम है लेकिन आशा करता हूँ कि धीरे-धीरे अच्छे चिट्ठाकारों से संबन्ध जोड़कर अपनी हिन्दी सुधारकर एक दिन शुद्ध हिन्दी में लिख सकूँगा। तब तक शुद्ध हिन्दी के शब्द की खोज में मैं ज्यादा समय गंवाना नहीं चाहता। Practical होना चाहता हूँ और समय-समय पर अगर कोई अंग्रेज़ी शब्द आसानी से हाथ आ जाए और उपयुक्त लगे, बिना ज्यादा सोचे उसे ठोंस देता हूँ।

ब्लोग जगत में टिप्पणी चर्चे का काम करता है। यहाँ पांडित्य-प्रदर्शन करने से अच्छा है कि आसान, स्वाभाविक और natural language का प्रयोग हो। इसके कारण यदी किसी बेनामी टिप्पणीकार मेरी हँसी उड़ाता है तो मैं पर्वाह नहीं करूँगा। मेरा गेंडा जैसा खाल है। ऐसा खाल बहुत उपयोगी होता है ऐसे टिप्पणीकारों से निपटने के लिए।

मुझे Happy Birthday शब्दों से कोई आपत्ति नहीं है।
इस टिप्पणीकार को मुहम्मद रफ़ि विषय से हटकर शीर्षक में दो innocent शब्दों के प्रयोग पर आपत्ति करने का भी अधिकार है और उसकी आपत्ति से भी मुझे और आपको कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
आपको भी अधिकार है के आप उनकी बात मानें या नजरन्दाज़ कर दें। यह चिट्ठाजगत है और इस विषय में कोई "नियम" लागू नहीं होनी चाहिए सिवाय यह कि हम सब अपने विचारों को तर्क के साथ और सभ्य भाषा में प्रस्तुत करें और "भ्रष्ट" भाषा का उपयोग न करें।

एक जिज्ञासा अब पूरी होना बाकी है। कौन है यह दिलचस्प टिप्पणीकार जिसे अंग्रे़ज़ी के शब्द पसन्द नहीं लेकिन अंग्रेज़ी लिपि से परहेज़ नहीं और अरबी शब्द पसन्द है और क्यों गुमनाम रहना पसन्द करते हैं? आशा करता हूँ कि दिलीप मंडलजी के sting operation से पहले ही यह सामने आएँगे और अपना परिचय देंगे।

आशा यह भी है कि आपकी यह व्यथा अस्थायी होगी और हम जैसे शुभचिन्तकों के इन सन्देशों से आप अपना यह निर्णय बदलेंगे।
लिखते रहिए।
नव वर्ष की शुभकामानाएँ।
(Happy New Year कहने वाला था कि अचानक इस बेनाम टिप्पणीकार की याद आ गई। नव वर्ष उसके लिए भी शुभ हो। क्यों उस दुखी करूँ?)

G विश्वनाथ, जे पी नगर, बेंगळूरु

मनीषा पांडेय said...

अशोक जी,
क्‍या ये पहली बार हुआ है कि इस तरह की बेनाम टिप्‍पणी ने आपके कामों को मटियामेट करने की कोशिश की और अब वो सफल होता भी जान पड़ रहा है। कविता और संगीत की आपकी पसंद और लस्‍ट फॉर लाइफ के अनुवाद को पढ़कर ऐसा लगता तो नहीं कि इतनी जरा सी बात आपको इस कदर हिला सकती है।
मेरे इनबॉक्‍स में बेदखल की डायरी की हर पोस्‍ट और कविता के लिए ऐसे कमेंट आते हैं कि उन सबको पढ़कर तो मुझे अरब सागर में कूदकर आत्‍महत्‍या ही कर लेनी चाहिए। अविनाश के मोहल्‍ला पर जब मैंने मनीषा की डायरी नाम से कुछ पोस्‍ट लिखीं तो उसका इनबॉक्‍स भी मेरे लिए तमाम अभद्र और अश्‍लील टिप्‍पणियों से भरा होता था। तो क्‍या मुझे लिखना छोड़ देना चाहिए। मैं एक क्षण के लिए भी ये नहीं भूलती कि मैं एक गरीब, पिछड़े, सामंती और पितृसत्‍तात्‍मक मुल्‍क की निवासी हूं। ये सच आप क्‍यूं भूल रहे हैं।
वैन गॉग वाले गीत स्‍टारी नाइट्स के लिए मैं आपको निजी तौर पर बधाई देना चाहती थी और सुखनसाज के उन तमाम गीतों के लिए, जिन्‍हें मैं दिन में एक बार जरूर सुनती हूं। कुछ होंगे विरोध में, लेकिन पक्ष में कहीं ज्‍यादा हैं। कुछ देते होंगे गालियां, लेकिन प्‍यार ज्‍यादा लोग करते हैं। हमें 31 दिसंबर के बाद भी आपकी कविताओं और गीतों का इंतजार रहेगा।
मनीषा

महेंद्र मिश्रा said...

कृपया पुनर्विचार करें.

परमजीत बाली said...

बेनामी टिप्पणी कारॊं की परवाह ना करें। हम जैसे पाठकों की ओर भी ध्यान दे।

जोशिम said...

अमां यार - ये बिल्कुल ग़लत - घोर ग़लत बात है - क्या तुम्हें उन सब की ज़्यादा फिक्र है जो थोथा पढ़ कर सार छोड़ते है ? - उन बाकियों का क्या, जो बगैर हल्ला गुल्ला किए फुरसत की जमां पूंजी का वक्त तुम्हारे खजाने पर सम्हालते है ? तनिक संवेदनाओं की नज़र इधर भी करें - उन सब की ओर जो चुप-चाप सुने हैं / पढ़ें हैं - उम्मीद है वज़न मिलेगा - इस हक को जतलाने के लिए छिमा - हम सब की उम्र का भी लिहाज़ कीजिये - सुखनसाज़ तो कतई बंद न करें - regards

munish said...

Irfan ke kahe ko chorus effect me sunne ka prayas karen.

Dinesh Semwal said...

arry ashok ab maan bhai jaoo,

haati ki mast chaal chalo,bhaunknay walay to bhaunk tay rahigay!!!!

dinesh semwal

बाबुषा said...

कुछ ही महीने हुए हैं मुझे कबाडखाना पढ़ते ! आज थोडा free थी तो सोचा कुछ पुराना कबाड़ टटोला जाए ! यहाँ के तो सारे टीन टप्पर अपने काम के होते हैं ! खोजने निकली तो ये वाली पोस्ट मिल गयी और ये पोस्ट मिल गयी तो बात भले पुरानी हुयी,लेकिन कमेंट्स से लिखे बिना मुझे न रहा गया !

आप ऐसे भी थे क्या अशोक सर ?

चलिए अच्छा है कि आप थोडा बड़े हो गए !

काम बहुत है अभी आप लोगों के पास ! (कभी जो दुबारा ऐसा ख़याल आये तो )ऐसी की तैसी दुनिया की ! आप चलते रहिये !