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Thursday, March 17, 2011

‘कोका कोला के सबक’ से: एक बूढ़ी स्त्री की डायरी

करीब तीन एक साल पहले यह पोस्ट कबाड़खाने पर कबाड़ी सरदार अशोक पांडे द्वारा लगाई जा चुकी है |

एक बूढ़ी स्त्री की डायरी : शुन्तारो तानिकावा

अनुवादकीय नोट :

‘बूढ़ी स्त्री ’ (ओल्ड वूमन) से मूल जापानी शब्द ‘ओबासान’ का सही सही अर्थ समझ में नहीं आता। ‘ओबासान’ का सबसे नजदीकी अर्थ ‘छोटी मां’ हो सकता है जो किसी भी स्त्री सम्बंधी या आदरणीय स्त्री के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

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किनारे पर उकड़ूं बैठी है वह बूढ़ी स्त्री । उसके पीछे एक विशाल चिमनी धुआं उगल रही है। आप उससे नहीं कह सकते कि अब यह करो तुम बूढ़ी स्त्री । उससे नहीं कह सकते कि अब यह करो। बूढ़ी स्त्री होती है बूढ़ी स्त्री । वह कह रही है कि आज रात वह थोड़ा सा कोन्याकू उबालेगी।

2

उसने अभी अभी क्या कहा वह भूल जाती है और फिर से दोहराती है वही कहानी। आप समझते हो कि वह गुस्से में है पर अगले ही पल वह खुश नजर आने लगती है। पुराने दिनों में मैं बढ़िया चावल पकाया करती थी मगर देखो कैसे जल गए हैं वे।जो भी हो क्या फर्क पड़ता है। भुला दिया जाता है जल जाना। मगर कितने शर्म की बात है ! किसी भी चीज को इस तरह जला देना! अपने में खोई बूढ़ी स्त्री किसी और पर दोष मढ़ देती है। इस मुश्किल बूढ़ी स्त्री के भीतर पुराने समय की कर्मठ बूढ़ी स्त्री लुकाछिपी खेल रही है। क्या कहीं चली गई बूढ़ी स्त्री ? नहीं वह यहीं है। सूरज में दमकते अपने सुन्दर सफेद केशों के साथ वह बनी रहती है जिन्दा।

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बूढ़ी स्त्री कहती है छोड़ो जाने दो ¸ कहती है वह। एक टूटी कील से फंसकर फट गया था एप्रन। उस आदमी ने झटक लिए थे अपने हाथ। वह एक नालायक आदमी है; गुस्से में है बूढ़ी स्त्री । हालांकि यह घटा था तीस साल पहले पर फड़फड़ाते नथुनों के साथ कुछ देर के लिए बूढ़ी स्त्री वाकई बहुत गुस्सा होती है।

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केवल दिखाई देने वाली बूढ़ी स्त्रियां ही नहीं होतीं सारी बूढ़ी स्त्रियां। किसी वाइरस की तरह बूढ़ी स्त्रियां मुझे लगातार नष्ट करती जाती हैं। न दिखाई देने वाली बूढ़ी स्त्रियां ज्यादा खतरनाक होती हैं दिखाई देने वाली बूढ़ी स्त्रियों से¸ और अब मैंने उनमें और अपने आप में फर्क करना बन्द कर दिया है। न दिखाई देने वाली बूढ़ी स्त्रियोंको देखने के लिए मैं बूढ़ी स्त्रियों के स्केच बनाने की कोशिश करता हूं। इम्म्यूनिटी? किस काम के होते हैं इस तरह के शब्द?

5

चाय के दाग लगे चटखे हुए बरतन का बहुत ख्याल रखती है बूढ़ी स्त्री । जब वह उस बरतन से प्याले में चाय डाल रही होती है वह बेहद गरिमावान लगती है। फिर वह खामोशी से अखबार पर निगाह डालती है ; वह अच्छे से जानती है कि छोड़े गए एक बच्चे की कहानी और जबरिया सत्ता परिवर्तन की खबर का बराबर महत्व है क्योंकि दोनों का प्रिन्टसाइज़ एक है। बूढ़े लोगों को मिलने वाले चश्मों की तीन जोड़ियां खो चुकी है वह। यह चौथी है।

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हमारे संसार में किसी भी चीज को स्पष्ट नाम दे पाना सम्भव नहीं होता। जिस तरह खाना बनाने का बरतन बहुत सी ऐसी चीजों से बना होता है जो खाना बनाने का बरतन नहीं होतीं¸ उदासी भी उसी तरह पुराने समय की असंख्य भयानक रूप से थका देने वाली चीजों की परछाईं भर होती है। ब्लैक होल की तरह एक नाम अपने भीतर निगल जाता है सारे नाम। नाम जड़ जमाते हैं बेनाम में। (जल्दबाजी में जोड़ा गया एक नोट।)

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बूढ़ी स्त्री कहती है कि संसार एक बेहतर जगह बन के रहेगा। लेकिन दुनिया ऐसी होती है वह कहती है। दीवार की तरफ मुंह किए रोती है बूढ़ी स्त्री । मैंने देखा है उसे। मैं कुछ नहीं कर सकता सिवा उसे देखते चले जाने के। मैं भयाक्रान्त तरीके से असहाय हूं। और कई दफे मुझे अहसास होता है कि उसकी तुलना किसी से भी नहीं की जा सकती। इस कदर खूबसूरत है वह।

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मुझे इस खौफनाक सच्चाई का अहसास हो गया था कि दुनिया में कविता के सिवाय किसी चीज का अस्तित्व नहीं होता। सारी चीजें और सारी संभव चीजें कविताएं होती हैं; भाषा के जन्म के बाद से ही यह एक अकथनीय सत्य है। मैं हैरत करता हूं कि खुद को कविता से आजाद करने के लिए हर किसी ने कितना कुछ नष्ट किया। जो भी हो यह रही है एक बेहद मुश्किल बहस। इस कदर बेतहाशा बेतुकी लगने वाली बातचीत।


9

जब भूख लगती है बूढ़ी स्त्री एक बरतन में कुछ खोज लेती है और उसे मुंह में ठूंस लेती है। कभी तो वह लगातार तीन दिनों तक नहाती है और कभी पूरे महीने नहीं नहाती। अपने खोए हुए चीथड़ा अन्तर्वस्त्र चुरा ले जाने वाले को वह गालियां देती है। उस वक्त वह गद्दे के नीचे छिपा कर रखे हुए स्टाक सर्टिफिकेट्स के बारे में भूल जाती है। टुकड़ों में तब्दील कर दी गई है यह स्त्री। उसके भीतर एक और बूढ़ी स्त्री रह रही है। वह उन छोटे बक्सों जैसी है जो मुझे बचपन में तोहफे में मिले थे। एक बक्से के अन्दर एक और ¸ फिर उसके अन्दर एक और छोटा बक्सा और उसके अन्दर एक और भी छोटा बक्सा और उसके अन्दर ॰॰॰ । किसी छिपी हुई चीज को खोजने के लिए वह एक के बाद एक उन्हें खोलती जाती है लेकिन वह उस खालीपन तक कभी नहीं पहुंचती जहां बक्से पहुंचते हैं। इस बारे में बात करना बेमानी है कि असली बूढ़ी स्त्री कौन सी है ; निश्चय ही वह विरोधाभासों और संशयों से भरपूर है। सो वह अतिशय ईमानदार स्त्री से मुझे कभी कभी बेहद नफरत होने लगती है। क्योंकि जो मुझ पर लदी है वह मैं ही हूं।

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मैं किसी भी वक्त ले जाए जाने के लिए तैयार हूं ¸ बूढ़ी स्त्री कहती है। लेकिन जब तक मुझे ले जाया नहीं जाता में मरने नहीं जा रही¸ वह कहती है। अपनी चीजों का ख्याल रखने में नाकाम, वह हमेशा दूसरों के मामलें में टांग अड़ाती है। बस मुझे अकेला छोड़ दो¸ कहती है बूढ़ी स्त्री।मैं नहीं कह सकता कि इस तरह से आत्मसम्मान का मैं थोड़ा इस्तेमाल नहीं कर सकता। क्योंकि बूढ़ी स्त्री के सामने मैं आखिरकार मैं बन जाता हूं।

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दुनिया एक सनकभरी रजाई है। हालांकि पागलपन की तरह उस में तमाम रंग और कपड़े चिप्पी किए गए हैं ¸ उसके चार किनारे बहुत दक्षता के साथ सिए गए हैं। सौ साल पहले उत्तरी अमेरिका में रही होगी कोई बूढ़ी स्त्री बिल्कुल इस बूढ़ी स्त्री की तरह। किसी बड़ी नदी के नजदीक¸ पेड़ों के झुरमुट में¸ शहर की सीमा के जरा सा बाहर किसी जर्जर मकान के अहाते में।

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शायद किसी दिन मैं भी बन जाऊंगा वही बूढ़ी स्त्री। शायद मैं अभी से बन चुका हूं वह बूढ़ी स्त्री। मेरा नाम¸ मेरा धन¸ मेरा भविष्य¸ मेरा यह, मेरा वह … इनमें से कोई भी चीज मुझे बूढ़ी स्त्री से अलग नही कर सकती। मेरे हाथ¸ मेरे बाल¸ मेरे शब्द¸ गुजरती हुई मेरी चेतना¸ वे सारी चीजें जिन्हें मेरा कहा जा सकता है और उस बूढ़ी स्त्री की तमाम चीजें - अण्डों की तरह एक सी नजर आती हैं।

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एक कुत्ते का पेट सहलाती हुई वह बूढ़ी स्त्री कुत्ते से दबी जबान में बात करती है। कुत्ते के आनन्द से उसे बहुत खुशी मिलती है। हैरत करते हुए कि क्या वह बूढ़ी स्त्री कुत्ते को अनन्त तक दुलारती जाएगी¸ मैं उस दृश्य से आंखें नहीं हटा पाता। तो भी आखिरकार बूढ़ी स्त्री धीरे धीरे उठती है और घर के भीतर जाती है। मेरे भीतर बचती है उखड़ी सांसों वाली एक संवेदना जिसे मैं किसी भी तरह कोई नाम नहीं दे सकता।

Wednesday, July 14, 2010

मिलान कुंदेरा के ( निजी ) शब्दकोश से कुछ शब्द


                                 


मिलान कुंदेरा की किताब 'द आर्ट आफ़ द नावेल' में एक अध्याय है -'सिक्स्टी -थ्री वर्डस'।. यह एक कथाकार के निजी शब्दकोश जैसा है। इसमें शामिल किए गए तिरसठ शब्द वे शब्द हैं जो उसकी कथाकृतियों में प्राय: व्यवहृत होते रहे हैं या फिर इन्हें वे शब्द कहा जा सकता है जिनके माध्यम से कृति को समझा जा सकता है। दुनिया भर के तमाम शब्दकोशों के होते हुए इसकी जरूरत क्यों आन पड़ी? इस 'शब्दकोश' की भूमिका या पूर्वकथन में लेखक ने अनुवाद और अनुवादकों को लेकर कुछ बातें कही हैं :

" १९६८ और ६९ में 'द जोक' का पश्चिम की सभी भाषाओं में अनुवाद हुआ। आश्चर्य तो तब हुआ जब फ्रांस के एक अनुवादक ने मेरी शैली की सजावट करते हुए उपन्यास का पुनर्लेखन कर दिया। इंगलैंड में प्रकाशक ने बहुत से महत्वपूर्णस और जरूरी परिच्छेदों को उड़ा दिया,और एक तरह से यह दोबारा लिख दिया गया। एक अन्य देश में मैं एक ऐसे अनुवादक से मिला जिसे चेक भाषा का एक भी शब्द नहीं आता था। जब मैंने यह पूछा - 'तो तुमने इसका अनुवाद कैसे किया?' क्या ही विलक्षण और मासूम उत्तर था उसका - 'दिल से' और उसने अपने बटुए से मेरी तस्वीर निकाल कर दिखला दी। वह व्यक्ति इतना प्रेमिल और सौहार्द्रपूर्ण था कि मुझे लगभग विश्वास करना पड़ा कि हृदय की टेलीपैथी या इसी तरह के किसी दूसरे उपाय से अनुवाद भी किया जा सकता है।"

कुंदेरा आगे बताते है कि इसी तरह और भी कई बातें हुईं और मुझे अपनी ही कृतियों के अनुवाद पढ़कर यह पता लगाना पड़ा कि अब वे वास्तव में कैसी हैं तथा उनकी काया में अब कितना मेरा लिखा / कहा हुआ विद्यमान है। यह एक तरह से जंगली भेड़ों के झुंड में से अपनी वाली भेड़ को खोज निकालने जैसा काम है। इस तरह के काम में गड़रिया तो परेशान होता है लेकिन दूसरे लोग हँसी उड़ाते हैं। आइए उन्हीं के शब्दों इस बात का अगला सिरा देखते हैं :

" मुझे आशंका है इस गड़रिए की 'हुनरमंदी' को देखते हुए मेरे मित्र और 'ला देबात' पत्रिका के संपादक पियरे नोरा ने बहुत उदार सलाह देते कहा कि - देखो, कुछ समय के लिए तुम इस यंत्रणा को भूल जाओ और मेरे लिए  भी लिखना फिलहाल मुल्तवी कर दो। इन अनुवादों ने तुम्हारे ऊपर एक तरह से यह दबाव बनाया है कि तुम अपने लिखे एक - एक शब्द के बारे में गंभीरता से सोचो। अपने लिए एक निजी शब्दकोश का निर्माण करो। अपने उपन्यासों के लिए शब्दकोश बनाओ। इसमें अपने बीज शब्दों, समस्यामूलक शब्दों और प्यारे शब्दों को स्थान दो। तो लिजिए ये रहे...."

मिलान कुंदेरा का यह शब्दकोश कोई आम शब्दकोश नहीं है। यह एक लेखक की संवेदना का संवहन - संचरण करने वाले माध्यम / प्रतीक की एक पड़ताल और परख है। इसमें शब्द तो हैं लेकिन परंपरागत अर्थों में अर्थ नहीं हैं। यह एक तरह से एक लेखक की उन चाभियों का गुच्छा है जिससे वह कथानक और चरित्रों की रहस्यमयी दुनिया के कपाटों पर लगे ताले खोलने का उपक्रम करता है। तो , आइए आज इन तिरसठ शब्दों में से चुने हुए केवल तीन शब्द और उनके बाबत लिखे गए अर्थों को देखते हैं:

* हैट ( Hat )  : जादुई वस्तु। मैं एक सपना याद करता हूँ : दसेक साल का एक लड़का काला हैट पहले तालाब में कूद जाता है। लोग उस डूबते हुए को बचाते हैं। हैट अब भी उसके सिर पर शोभायमान है।

** हैटस्टैंड ( Hatstand ) : जादुई वस्तु। 'द जोक ' में लुडविक को चिन्ता होती है कि कहीं हेलेना ने स्वयं को खत्म तो नहीं कर लिया है। इसी दौरान उसे एक हैटस्टैंड दिखाई दे जाता है। " तीन पैरों पर टिकी हुई धातु की एक राड और धतु की ही तीन शाखाओं में विभक्त। चूँकि उस पर कोट आदि नहीं टँगे रहते हैं अत: यह एक इंसान की तरह दिखाई देता है - अनाथ इंसान की तरह। यह धातुई नग्नता है ,फूहड़पन और उत्सुकता में बाँहे पसारे।" " समर्पण करने को तैयार एक दुर्बल सैनिक की तरह"।  मैंने 'द जोक' के आवरण पर हैटस्टैंड लगाने की आलोचना की थी।

*** अक्षर ( Letters ) : वे पुस्तकों में दिन - प्रतिदिन छोटे और लगातार छोटे होते जा रहे हैं। मैं शनै: - शनै: साहित्य की मृत्यु की कल्पना करता हूँ - किसी के संज्ञान में आए बगैर। टंकण सिकुड़ता जा रहा है जब तक कि वह अदृश्य न हो जाय।
 ---------
मिलान कुंदेरा जब अपने शब्दकोश के निर्माण के लगभग बीचोबीच में थे तब उन्होंने उनचासवें स्थान पर एक एंट्री की है ; आक्तावियो। यह न तो बीज शब्द है , न समस्यामूलक शब्द बल्कि यह वैसा ही शब्द है जिसे भूमिका में 'प्यारे शब्द' कहा गया है। इस प्यारे शब्द और कुछ अन्य शब्दों के बारे में आगे..फिर.. ।

Wednesday, December 30, 2009

बिल्लियों जैसी होती हैं भाषाएं

येहूदा आमीखाई की ये कविता पहले भी लगा चुका हूं. आज पुनः लगा रहा हूं. इसलिए लगा रहा हूं कि इसकी प्रासंगिकता कभी ख़त्म नहीं होती:


येहूदा आमीखाई (१९२४-२०००) इज़राइल में पैदा हुए बीसवीं सदी के बहुत बड़े कवि थे. तीस से अधिक भाषाओं में अनूदित हो चुके येहूदा की कविता युद्ध और नफ़रत से जूझ रहे संसार की ख़ामोश पुकार है. उनके बग़ैर बीसवीं सदी की विश्व कविता ने अधूरा रह जाना था. ज़्यादा लिखने से बेहतर है उनकी आख़िरी रचनाओं में से एक आप के सम्मुख रख दी जाए.

मेरे समय की अस्थाई कविता

हिब्रू और अरबी भाषाएं लिखी जाती हैं पूर्व से पश्चिम की तरफ़
लैटिन लिखी जाती है पश्चिम से पूर्व की तरफ़
बिल्लियों जैसी होती हैं भाषाएं
आपको चाहिये उन्हें ग़लत तरीके से न सहलाएं
बादल आते हैं समुद्र से
रेगिस्तान से गर्म हवा
पेड़ झुकते हैं हवा में
और चारों हवाओं से पत्थर उड़ते हैं
चारों हवाओं तलक. वे पत्थर फेंकते हैं
इस धरती को फेंकते हैं एक दूसरे पर
लेकिन धरती वापस गिरती है धरती पर.
इसके पत्थर, इसकी मिट्टी -
आप इससे छुटकारा पा ही नहीं सकते.
वे मुझ पर पत्थर फेंकते हैं
पत्थर फेंकते हैं
सन १९३६ में १९३८ में १९४८ में १९८८ में
सेमाइट* पत्थर फेंकते हैं सेमाइटों पर
और एन्टी सेमाइट पत्थर फेंकते हैं
एन्टी सेमाइटों पर
दुष्ट पत्थर फेंकते हैं और उदारजन
पापी लोग पत्थर फेंकते हैं और फुसलाने वाले
भूगर्भवेत्ता पत्थर फेंकते हैं और दार्शनिकगण
गुर्दे और पित्ताशय पत्थर फेंकते हैं
सिरों के पत्थर
माथों के पत्थर और दिलों के पत्थर
पुरातत्ववेत्ता पत्थर फेंकते हैं और महाशैतान
चीखते मुंह के आकार के पत्थर
आपकी आंख की नाप के पत्थर
चश्मे की जोड़ी जैसे
बीता हुआ वक्त पत्थर फेंकता है भविष्य पर
और वे सारे के सारे गिरते हैं वर्तमान के ऊपर.
रोते हुए पत्थर और हंसते हुए कंकड़
यहां तक कि ईश्वर ने भी पत्थर फेंके थे बाइबिल के मुताबिक
यूरिम और तूमिम को भी फेंका गया था
और वे जा चिपके थे न्याय की तश्तरी पर
और हैरड ने फेंके थे
उसके बाद जो निकल कर सामने आया वह एक मन्दिर था

उफ़, पत्थरों की उदासी की कविता!
उफ़, पत्थरों पर फेंकी गई कविता!
उफ़, फेंके ग पत्थरों की कविता!
क्या इस धरती पर एक भी ऐसा पत्थर है
जिसे कभी फेंका न गया हो
न बनाया गया हो न पलटा गया हो
जो कभी किसी दीवार पर से न चीखा हो
और जिसे किसी भवन निर्माता ने अस्वीकार न किया हो
जिसे कभी न धरा गया हो किसी कब्र के ऊपर
जिसके ऊपर कभी न लेटे हों प्रेमीजन
और जिसे कभी किसी बुनियाद में तब्दील न किया गया हो

कृपा करके अब और पत्थर मत फेंको
तुम धरती को हटा रहे हो
इस पवित्र
सम्पूर्ण खुली धरती को
तुम उसे समुद्र में डाल रहे हो
जबकि समुद्र उसे नहीं चाहता
समुद्र कहता है "ना मेरे भीतर नहीं"

मेहरबानी करके नन्हे पत्थर फेंको
सीपियों के जीवाश्म फेंको
कंकड़ फेंको
मिगदाल त्सादेक की खदानों से न्याय और अन्याय को फेंको
मुलायम पत्थर फेंको
मीठे ढेले फेंको
चूने के पत्थर फेंको
मिट्टी फेंको
समुद्रतट की रेत फेंको
लोहे की जंग फेंको
मिट्टी फेंको
हवा फेंको
कुछ मत फेंको
जब तक कि तुम्हारे हाथ थक न जाएं
और युद्ध भी थक जाए
और यह भी हो कि शान्ति थक जाए
और बनी रहे.

*सेमाइट: मध्यपूर्व और उत्तरी अफ़्रीका में सेमाइटिक भाषा बोलने वालों का समूह

Monday, October 26, 2009

मुझे इस वशीकरण के पाश से मुक्त करो

निज़ार कब्बानी (1923-1998) न केवल सीरिया में बल्कि साहित्य के समूचे अरब जगत में प्रेम , ऐंद्रिकता , दैहिकता और इहलौकिकता के कवि माने जाते हैं ( हालाँकि वे सिर्फ इतना भर ही नहीं हैं !) इस वजह से उनकी प्रशंसा भी हुई है और आलोचना भी किन्तु इसमें कोई दो राय नहीं है कि उन्होंने अपनी कविता के बल पर बहुत लोकप्रियता हासिल की है. तमाम नामचीन गायकों ने उनके काव्य को वाणी दी है. साहित्यिक संस्कारों वाले एक व्यवसायी परिवार में जन्में निज़ार ने दमिश्क विश्वविद्यालय से विधि की उपाधि प्राप्त करने के बाद दुनिया के कई इलाकों में राजनयिक के रूप में अपनी सेवायें दीं जिनसे उनकी दृष्टि को व्यापकता मिली. उनके अंतरंग अनुभव जगत के निर्माण में स्त्रियों की एक खास भूमिका रही है ; चाहे वह बहन की आत्महत्या हो या बम धमाके में पत्नी की मौत. निज़ार कब्बानी की किताबों की एक लंबी सूची है. दुनिया की कई भाषाओं में उनके रचनाकर्म का अनुवाद हुआ है.इस कवि और गद्यकार के जीवन प्रसंगों पर जल्द ही अलग से और विस्तार से . अभी तो प्रस्तुत हैं उनकी दो कवितायें -


मैं शब्दों से जीत लूँगा संसार

मैं शब्दों से जीत लूँगा संसार
जीत लूँगा -
मातृभाषा को
संज्ञा को
क्रिया को
वाक्य विज्ञान को
हाँ ,सब कुछ को जीत लूँगा मैं मात्र शब्दों से ।

बुहार कर रख दूँगा
चीजों के उपजाव व आग़ाज़ को
और एक नई भाषा में चीन्हूँगा
पानी का संगीत और आग का संदेश ।

तुम्हारी आँखों में
मैं जगमग करूँगा आने वाले वक्त को
स्थिर कर दूँगा समय की आवाजाही
और काल के असमाप्य चित्रपट से
पोंछ दूँगा उस लकीर को
जिससे विलग होता है यह क्षण ।


समुद्र के तल से एक पत्र

अगर तुम मेरे दोस्त हो
तो मदद करो कि तुमसे जुदा हो सकूँ
या फिर गर हो तुम मेरे महबूब
तो मदद करो कि मैं मुहब्बत की मार से बच जाऊँ ।
अगर मालूम होता कि समुद्र बहुत गहरा है
और मुझे नहीं आती तैरने की तरकीब
तो यहाँ नहीं ही रखता अपने पाँव ।
अगर मुझे मालूम होता
कि कैसे करना है खुद का खात्मा
तो शुरुआत ही नहीं करता इस सिलसिले की ।

मुझे तुम्हारी चाह है सो, मुझे सिखाओ ख्वाहिशें न करना
मुझे सिखाओ
कि कैसे काट देना है प्रेम की जड़ को गहराई से ।
मुझे सिखाओ
कि कैसे आँखों में ही करनी है आँसुओं की मौत
और प्रेम को किस विधि से करना है आत्महत्या के लिए प्रेरित ।

अगर तुम फरिश्ते हो
तो मुझे इस वशीकरण के पाश से मुक्त करो
नास्तिकता के भँवर से पार करो मेरा बेड़ा ।
तुम्हारा प्रेम नास्तिकता जैसा है
मुझे इससे शुद्ध करो
कर दो मेरे अस्तित्व को निष्पाप ।

अगर तुम बलशाली हो
तो मुझे इस समुद्र से बाहर निकालो
क्योंकि मुझे नहीं आती तैरने की तरकीब ।
तुम्हारी आँखों की नीली लहरें
मुझे गहराइयों की ओर खींच रही हैं
नीला..
नीला...
कुछ नहीं बस हर ओर एक ही नीला रंग ।
मुझे प्यार का कोई तजुर्बा भी नहीं
और कोई नौका भी नहीं दीख रही है आसपास ।

अगर मैं तुम्हें प्रिय हूँ , तनिक भी
तो थाम लो मेरा हाथ
मैं सर से पाँव तलक ख्वाहिशों से भर कर
होता जा रहा हूँ भारी ।

मैं बमुश्किल
पानी के भीतर ले रहा हूँ साँस
मैं डूब रहा हूँ...
डूब रहा हूँ...
डूब रहा हूँ... ।

Tuesday, October 13, 2009

हमने क्यों ओढ़ रखी है अजनबियत से भरी जमी हुई मुस्कान ?


अन्ना अख़्मातोवा (जून ११, १८८९ - मार्च ५, १९६६) की कवितायें अप 'कबाड़ख़ाना' पर एकाधिक बार पढ़ चुके हैं और उन्हें पसन्द भी किया गया है , ऐसा भान है। तमाम तरह की प्रतिकूलताओं के बावजूद कविता के लिए जगह बची है और सदैव बनी रहेगी. हिन्दी ब्लाग की बनती हुई दुनिया में तरह - तरह की कवितायें आ रही हैं, इसमें हिन्दीतर और खासकर वैश्विक कविता का भी एक बड़ा हिस्सा सामने आ रहा है. इस सिलसिले में 'कबाड़ख़ाना' की कोशिश संभवत: अथाह - अतल समुद्र में विलीन हो जाने को आतुर एक बूँद के बराबर हो सकती है लेकिन यह कोशिश जारी रहे तो बुरा क्या है! इस बीच अनुवाद के जारी क्रम में अन्ना की कविताओं से बार - बार गुजरते हुए अक्सर यह ( यह भी ) लगता रहा है कि छोटी - छोटी चीजें कैसे एक कवि के संवेदन जगत का अंग बनकर स्वयं बड़ी व कालातीत बन जाती हैं. अच्छा हो कि कवितायें खुद बोलें , कवि को जो कहना था कह गया है और पाठकों के हिस्से में गुनना - बुनना- सुनना - समझना रह गया है ,सो अनुवादक कुछ न ही बोले तो ठीक है. तो लीजिए प्रस्तुत हैं अन्ना अख़्मातोवा की दो कवितायें -

गर बीमार पड़ो तो हो जाना चाहिए नीमपागल

गर बीमार पड़ो तो हो जाना चाहिए नीमपागल
और करनी चाहिए सबसे फिर से मुलाकात.
हवा और धूप से भरपूर
सागर तट की बगीची की चौड़ी पगडंडियों पर
करनी चाहिए बेमकसद घुमक्कड़ी।
आज के दिन
मृतात्मायें भी आने को हैं सहर्ष तैयार
और मेरे घर वास करना चाहता है निर्वासन भी.
किसी खोए बच्चे की उंगली थाम
इधर - उधर डोलने का मन कर रहा है आज के दिन.

मृत मनुष्यों के साथ चखूँगी मैं नीले द्राक्ष
पीऊँगी बर्फानी शराब.
और अपने कड़ियल बिस्तरे पर
गिर रहे जलप्रपात को
निहारती रहूँगी खूब देर तलक.

जब आप पिए हुए हों, खूब होती है मौज

तयशुदा समय से थोड़ा पहले
आ पहुँचा है पतझड़
पीले परचमों के साथ शोभायमान हैं एल्म के पेड़.
वंचनाओं की जमीन पर बिखर गए हैं हम
पछतावे में उभ - चुभ करते
और तिक्तता से लबरेज.

हमने क्यों ओढ़ रखी है
अजनबियत से भरी जमी हुई मुस्कान ?
और शान्तचित्त प्रसन्नता के बदले
चाह रहे हैं बेधक संताप....

मैंने खुद को त्याग नहीं दिया है साथी !
अब मैं हूँ व्यसनी और सौम्य
जानते हो साथी !
जब आप पिए हुए हों, खूब होती है मौज !

( अन्ना अख़्मातोवा की विस्तृत जीवनकथा से कुछ अंश शीघ्र ही आप यहाँ देख सकेंगे.अन्ना का पोर्ट्रेट: निकोलाइ यर्सा , १९२८ )

Sunday, October 4, 2009

सितारों को बनाकर कासिद भेजो अपना संदेश


अन्ना अख़्मातोवा (जून ११, १८८९ - मार्च ५, १९६६) की कवितायें आप 'कबाड़ख़ाना' पर पहले कई बार पढ़ चुके हैं. अन्ना की कविताओं के अनुवादों का सिलसिला जारी है जो जल्द ही किताब की शक्ल में सामने होगा. फिलहाल बिना किसी नोट / टिप्पणी के लीजिए आज पढ़िए इस महान कवयित्री की दो और छोटी कवितायें.....

आखिरी जाम

मैं पीती हूँ -
अपने ढहा दिए गए घर के लिए
तमाम -तमाम दुष्टताओं के लिए
तुम्हारे लिए
संगी - साथी की तरह हिलगे अकेलेपन के लिए...
हाँ....इन्हीं सबके लिए
उठाती हूँ अपना प्याला.

मुर्दनी आँखों के लिए
उस झूठ के लिए जिसने धोखा ही दिया है लगातार
इस भदेस , क्रूर , जालिम दुनिया के लिए
उस प्रभु , उस ईश्वर के लिए
जिसने नहीं की कोई कोशिश
और बचाने से बचता रहा हर बार. .


सपने में

यह अँधियारा
और सहन किए जा सकने लायक बिछोह
तुम्हारे साथ बाँटती हूँ बराबर - एकसार
रुदन किसलिए ?
लाओ बढ़ाओ अपना हाथ
और वचन दो कि आओगे फिर एक बार .

ऊँचे पहाड़ों के मानिन्द हैं
तुम और मैं
जो कभी नहीं आ सकते हैं नजदीक - पासपास.
बस इतना करो
सितारों को बनाकर कासिद
भेजो अपना संदेश
उस वक्त
जब गुजर चुकी हो आधी रात.

Saturday, November 15, 2008

नायक की पैदाइश के घर में

विस्वावा शिम्बोर्स्का में एक तटस्थ दार्शनिक की क्रूर निगाह है जो बहुत ही आम दिख रहे दृश्यों, अनुभवों को न सिर्फ़ बारीकी से उधेड़ती है, मानव जीवन की क्षुद्रता और महानता दोनों को एक ही आंख से देख-परख पाने का माद्दा भी रखती है. इस महान पोलिश कवयित्री की कुछेक कविताएं आप इस ब्लॉग पर पहले भी पढ़ चुके हैं आज प्रस्तुत है उनकी कविता 'पीएता'.(पीएता: ईसामसीह की मृत देह पर विलाप करती वर्जिन मैरी का प्रतिनिधित्व करती एक स्त्री को दी जाने वाली उपमा)

पीएता


नायक की पैदाइश के घर में आप
स्मारक पर निगाहें गड़ा सकते हैं, उसके आकार पर हैरत कर सकते हैं
खाली संग्रहाल की सीढ़ियों से भगा सकते हैं दो मुर्गियों को
उसकी माता का पता पूछ सकते हैं
खटखटा सकते हैं, धक्का देकर खोल सकते हैं चरमराते दरवाज़ों को
आप सीधे खड़े हैं आदर में, उसके बाल कढ़े हुए हैं और उसकी निगाह स्पष्ट
आप उसे बता सकते हैं कि आप बस अभी अभी पोलैण्ड से आए हैं
आप उसे नमस्ते कह सकते हैं. अपने सवाल साफ़ और ऊंची आवाज़ में पूछें

हां, वह उसको बहुत प्यार करती थी. हां जी वह इसी तरह पैदा हुआ था.
हां, वह जेल की दीवार से लगकर खड़ी थी उस दिन
हां उसने सुनी गोलियां चलने की आवाज़
आपको अफ़सोस हो रहा है आप कैमरा नहीं लाए
और टेपरिकॉर्डर. हां वह इसी तरह की चीज़ें देख चुकी है.
उसके आख़िरी पत्र को उसी ने सुनाया था रेडियो पर
एक बार तो उसने उसकी प्रिय लोरियां भी गाई थी टीवी पर
और एक बार एक फ़िल्म में भी काम किया
चमकीली रोशनियों के कारण उसकी आंखों में आंसू आ गए थे. हां, स्मृतियां
अब भी उसे विह्वल बना देती हैं. हां, अब वह थोड़ा थक गई है ...
हां यह क्षण भी बीत ही जाएगा.
आप खड़े हो सकते हैं. उसे शुक्रिया कह सकते हैं
विदा कह सकते हैं
हॉल में आ रहे नवागंतुकों की बग़ल से हो कर बाहर जा सकते हैं

Friday, October 10, 2008

क्या इस धरती पर एक भी ऐसा पत्थर है जिसे कभी फेंका न गया हो


येहूदा आमीखाई (१९२४-२०००) इज़राइल में पैदा हुए बीसवीं सदी के बहुत बड़े कवि थे. तीस से अधिक भाषाओं में अनूदित हो चुके येहूदा की कविता युद्ध और नफ़रत से जूझ रहे संसार की ख़ामोश पुकार है. उनके बग़ैर बीसवीं सदी की विश्व कविता ने अधूरा रह जाना था. ज़्यादा लिखने से बेहतर है उनकी आख़िरी रचनाओं में से एक आप के सम्मुख रख दी जाए.

मेरे समय की अस्थाई कविता

हिब्रू और अरबी भाषाएं लिखी जाती हैं पूर्व से पश्चिम की तरफ़
लैटिन लिखी जाती है पश्चिम से पूर्व की तरफ़
बिल्लियों जैसी होती हैं भाषाएं
आपको चाहिये उन्हें ग़लत तरीके से न सहलाएं
बादल आते हैं समुद्र से
रेगिस्तान से गर्म हवा
पेड़ झुकते हैं हवा में
और चारों हवाओं से पत्थर उड़ते हैं
चारों हवाओं तलक. वे पत्थर फेंकते हैं
इस धरती को फेंकते हैं एक दूसरे पर
लेकिन धरती वापस गिरती है धरती पर.
इसके पत्थर, इसकी मिट्टी -
आप इससे छुटकारा पा ही नहीं सकते.
वे मुझ पर पत्थर फेंकते हैं
पत्थर फेंकते हैं
सन १९३६ में १९३८ में १९४८ में १९८८ में
सेमाइट* पत्थर फेंकते हैं सेमाइटों पर
और एन्टी सेमाइट पत्थर फेंकते हैं
एन्टी सेमाइटों पर
दुष्ट पत्थर फेंकते हैं और उदारजन
पापी लोग पत्थर फेंकते हैं और फुसलाने वाले
भूगर्भवेत्ता पत्थर फेंकते हैं और दार्शनिकगण
गुर्दे और पित्ताशय पत्थर फेंकते हैं
सिरों के पत्थर
माथों के पत्थर और दिलों के पत्थर
पुरातत्ववेत्ता पत्थर फेंकते हैं और महाशैतान
चीखते मुंह के आकार के पत्थर
आपकी आंख की नाप के पत्थर
चश्मे की जोड़ी जैसे
बीता हुआ वक्त पत्थर फेंकते हैं भविष्य पर
और वे सारे के सारे गिरते हैं वर्तमान के ऊपर.
रोते हुए पत्थर और हंसते हुए कंकड़
यहां तक कि ईश्वर ने भी पत्थर फेंके थे बाइबिल के मुताबिक
यूरिम और तूमिम को भी फेंका गया था
और वे जा चिपके थे न्याय की तश्तरी पर
और हैरड ने फेंके थे
उसके बाद जो निकल कर सामने आया वह एक मन्दिर था

उफ़, पत्थरों की उदासी की कविता!
उफ़, पत्थरों पर फेंकी गई कविता!
उफ़, फेंके ग पत्थरों की कविता!
क्या इस धरती पर एक भी ऐसा पत्थर है
जिसे कभी फेंका न गया हो
न बनाया गया हो न पलटा गया हो
जो कभी किसी दीवार पर से न चीखा हो
और जिसे किसी भवन निर्माता ने अस्वीकार न किया हो
जिसे कभी न धरा गया हो किसी कब्र के ऊपर
जिसके ऊपर कभी न लेटे हों प्रेमीजन
और जिसे कभी किसी बुनियाद में तब्दील न किया गया हो

कृपा करके अब और पत्थर मत फेंको
तुम धरती को हटा रहे हो
इस पवित्र
सम्पूर्ण खुली धरती को
तुम उसे समुद्र में डाल रहे हो
जबकि समुद्र उसे नहीं चाहता
समुद्र कहता है "ना मेरे भीतर नहीं"

मेहरबानी करके नन्हे पत्थर फेंको
सीपियों के जीवाश्म फेंको
कंकड़ फेंको
मिगदाल त्सादेक की खदानों से न्याय और अन्याय को फेंको
मुलायम पत्थर फेंको
मीठे ढेले फेंको
चूने के पत्थर फेंको
मिट्टी फेंको
समुद्रतट की रेत फेंको
लोहे की जंग फेंको
मिट्टी फेंको
हवा फेंको
कुछ मत फेंको
जब तक कि तुम्हारे हाथ थक न जाएं
और युद्ध भी थक जाए
और यह भी हो कि शान्ति थक जाए
और बनी रहे.

*सेमाइट: मध्यपूर्व और उत्तरी अफ़्रीका में सेमाइटिक भाषा बोलने वालों का समूह

कोई कितनी दफ़ा मर सकता है प्रेम के कारण



हालीना पोस्वियातोव्स्का की एक कविता कई महीने पहले यहां लगाई थी. इधर अन्ना अख़्मातोवा की कविताओं से आकंठ उद्वेलित रहते हुए मेरी निगाह मारीना स्वेतायेवा और हालीना पोस्वियातोव्स्का के अनुवादों पर अटकती रही. अब जब कि हालीना के अनुवादों की किताब अगले साल विश्व पुस्तक मेले में आने को है, मुझे लगा कि इस कवयित्री से कबाड़ख़ाने के पाठकों का परिचय ज़रूर करवाना चाहिये.

पोलैण्ड की रहने वाली हालीना (१९३४-१९६७) को बचपन में टीबी हो गई. वह स्कूल नहीं जा सकी. मां के साथ सैनिटोरियमों के चक्कर लगाते लगाते एक बार उस की मुलाकात अडोल्फ़ नामक एक फ़िल्म-निर्देशन के छात्र से हुई. हालीना तब बीस की थी. अडोल्फ़ चौबीस का. टीबी अडोल्फ़ को भी थी. सारी चेतावनियों के बावजूद दोनों ने शादी कर ली. दो साल बाद अडोल्फ़ हालीना को अकेला छोड़ चल बसा.

इधर हालीना का स्वास्थ्य इस कदर बिगड़ा कि पोलैण्ड के चिकित्सकों ने उसे अमेरिका ले जाने की राय दी. पर पैसा कहां से आता. उसकी कविताएं तब तक छपनी शुरू हो चुकी थीं और वह पोलिश पाठकों की चहेती बन चुकी थी. पोलैण्ड के महाकवि चेस्वाव मिवोश और ताद्यूश रूज़ेविच के प्रयासों से उसके इलाज का खर्च निकल आया.

अमरीका में पहला ऑपरेशन सफल रहा. सभी को चौंकाते हुए हालीना ने अमरीका रहकर कुछ साल दर्शनशास्त्र की पढ़ाई करने का फ़ैसला लिया. फिर वह पोलैण्ड लौटी और विश्वविद्यालय में बाकायदा पढ़ाने लगी. लेकिन १९६७ में हुए दूसरे ऑपरेशन के दौरान मात्र ३३ साल की अवस्था में हालीना पोस्वियातोव्स्का की मौत हो गई.

तब तक उसके तीन कविता-संग्रह आ चुके थे. १९६८ में एक संग्रह और आया. उसे प्रेम-कविताओं के कारण ख्याति मिली. पोलिश साहित्य में पहली बार किसी स्त्री ने दैहिक प्रेम और अपनी ऐन्द्रिकता को कविता का विषय बनाया था. उसे लगातार भान था कि कभी भी उसकी मृत्यु हो सकती है. यही वजह है कि उसकी कविता में उपस्थित प्रेम की उथल-पुथल के साथ मृत्यु के ठहराव का विकट सामंजस्य देखने को मिलता है.

मृत्यु के परे जाने जैसी किसी उम्मीद का सहारा वह नहीं लेती. सिर्फ़ प्रकृति है जो दूसरे रूप और आयाम धारण कर पाने में सक्षम होने के कारण ऐसा माद्दा रखती है. जब वह मृत अडोल्फ़ को याद करती है, वह उसे पेड़ों और प्रकृति की विपुलता में तलाशती है.

चेस्वाव मिवोश, विस्वावा शिम्बोर्स्का और ताद्यूश रूज़ेविच जैसे विश्वविख्यात कवियों के देश पोलैण्ड के साहित्यालोचकों ने हालीना को समुचित सम्मान देने में कृपणता बरती लेकिन आज की युवा पोलिश पीढ़ई के बीच उसे ज़बरदस्त लोकप्रियता हासिल है. इधर दसेक सालों से हालीना पर दुनिया भर में गम्भीर कार्य हो रहा है. प्रेम और अस्तित्ववाद के गहन ज्ञान और दुर्जेय साहस से भरपूर उस की कविताएं बार-बार उसे एमिली डिकिन्सन और अन्ना अख़्मातोवा के समकक्ष ला खड़ा करती हैं.

प्रस्तुत कर रहा हूं उसकी कुछ कविताओं के अनुवाद:


संसार से लड़ने को

संसार से लड़ने को
फ़क़त दो जबड़े थे उसके पास
दांतों से लैस फ़क़त दो जबड़े
और कुछ नहीं

दर्शनशास्त्र आख़िर कहां था उस वक़्त
कहां था अध्यात्म
सफ़ेद रंग पर किया जाने वाला यक़ीन कहां था

वह सिर्फ़ आदमी के हाथों पर विश्वास करता था
जो भोजन लेकर आते थे
और कभी-कभी मृत्यु भी

वह उतना ही कृतज्ञ था
-भोजन के प्रति
और मृत्यु के प्रति.

मेरी मृत्युएं

कोई कितनी दफ़ा मर सकता है प्रेम के कारण

पहली दफ़ा वह धरती का कड़ा स्वाद थी
कड़वा फूल
जलता हुआ सुर्ख़ कार्नेशन

दूसरी दफ़ा बस ख़ालीपन का स्वाद
सफ़ेद स्वाद
ठण्डकभरी हवा
खड़खड़ाते जाते पहियों की अनुगूंज

तीसरी दफ़ा, चौथी दफ़ा, पांचवीं दफ़ा
मेरी मृत्युएं कम अतिशयोक्त थीं
- अधिक नियमबद्ध
कमरे की चार औंधी दीवारें
और तुम्हारी आकृति मेरे ऊपर.

स्मृति पत्र

अगर तुम मर जाओगे
तो मैं नहीं पहनूंगी हल्की बैंगनी पोशाक
फुसफुसाती हवाओं से भरे रिबनों से बंधी
रंगीन कोई भी चीज़ नहीं
कुछ भी नहीं

घोड़ागाड़ी पहुंच जाएगी - पहुंचेगी ही
घोड़ागाड़ी चली जाएगी - जाएगी ही
मैं खिड़की से लगी खड़ी रहूंगी - देखती रहूंगी
हाथ हिलाऊंगी
रूमाल लहराऊंगी
उस खिड़की पर खड़ी
अकेली कहूंगी :
"अलविदा"

और भीषण मई की
गर्मी में
गर्म घास पर लेट कर
मैं अपने हाथों से
छुऊंगी तुम्हारे बाल
अपने होठों से सहलाऊंगी
मधुमक्खियों के रोओं को
जिसका डंक उतना ही सुन्दर
जैसे तुम्हारी मुस्कान
जैसे गोधूलि का समय
उस समय वह
सोना-चांदी होगी
या शायद सुनहरी और सिर्फ़ लाल
जो ढिठाई से घास के कान में फुसफुसाती जाती है
- प्रेम, प्रेम
- वह उठने नहीं देगी मुझे
और ख़ुद चल देगी
मेरे अभिशप्त ख़ाली घर की ओर

मैं जूलियट हूं

मैं जूलियट हूं
मैं तेईस साल की हूं
मैंने एक दफ़ा छुआ था प्रेम को
कड़वा था उसका स्वाद
काली कॉफ़ी के प्याले की तरह
उसने बढ़ा दी
मेरे दिल की रफ़्तार
बेचैन
मेरा जीवित अस्तित्व
-झूलने लगी मेरी तमाम इन्द्रियां

वह चला गया

मैं जूलियट हूं
एक ऊंची बालकनी पर
दूसरों पर निर्भर
चिल्लाती हुई - वापस आ जाओ
पुकारती हुई - वापस आ जाओ
ख़ून से रंगे
अपने कटे होठों के
धब्बों से

वह वापस नहीं आया

मैं जूलियट हूं
मैं हज़ार साल की हूं
मैं ज़िन्दा हूं.

Saturday, October 4, 2008

मुझे देखने को मत उठाना अपनी निगाह



दिसम्बर ९, १९१३

अन्ना अख़्मातोवा

साल के सबसे अंधेरे दिनों ने
बन जाना चाहिये सबसे साफ़.
मुझे तुलना के लिए शब्द नहीं मिल रहे
- कितने मुलायम, कितने प्यारे हैं तुम्हारे होंठ

मुझे देखने को मत उठाना अपनी निगाह
ताकि मैं जीवित रह सकूं
वे सबसे उम्दा ज़हर की शीशियों से भी हल्की है
और मेरे वास्ते उतनी ही घातक

अब समझती हूं मैं, कि हमें शब्द नहीं चाहिये होते
कि बर्फ़ लदी टहनियां हल्की होती हैं, और
बहेलिये ने
नदी किनारे फैला लिया है अपना जाल!

(फ़ोटो: अन्ना के जीवन का एक दुर्लभ खु़शनुमा समय - पति निकोलाई गुमिल्योव और पुत्र लेव के साथ, १९१३)

ऐसा लगता है



ऐसा लगता है

अन्ना अख़्मातोवा

ऐसा लगता है जैसे कभी नहीं सुनाई देगी
आदमी की आवाज़ इस जगह.
बस प्रस्तरयुगीन हवा
दस्तक दे रही है काले द्वारों पर

ऐसा लगता है
मानो आसमान के नीचे बस मेरा ही स्वास्थ्य रहा है ठीक,
शायद इसीलिये, सब से पहले मैंने चाहा,
वह ख़तरनाक शराब पी जाना!



(फ़ोटो: ऊपर- सेन्ट पीटर्सबर्ग में अन्ना का स्मारक, नीचे - अन्ना की कब्र)

मैं खिड़की से बाहर देखने की जेहमत नहीं उठाती, मुझे मालूम है मुझे क्या दिखाई देगा

यक़ीन मानिये, परसों रात से नहीं सोया हूं. अन्ना अख़्मातोवा के अनुवाद किये थे कुछ साल पहले. फिर पता नहीं किसी प्रकाशक से बनी बात आधी रही और मैंने इस पाण्डुलिपि को अपने नितान्त व्यक्तिगत तहख़ाने में सहेज दिया था. मारीना स्वेतायेवा की एक कविता यहां क्या लगाई, अन्ना की उस विस्मृत पाण्डुलिपि को सश्रम खोजने के बाद बस सारा जीवन उसी के गिर्द घूम रहा है.

ज़्यादती न हो, इस लिहाज़ से मैंने तय किया है कि आज उसकी तीन कविताएं अलग-पलग पोस्ट्स में लगाऊंगा नियमित अन्तराल पर.

फ़िलहाल!

लगे हाथों, बोरिस पास्तरनाक की कई कविताओं के बिसराये हुए अनछपे अनुवाद भी कबाड़ में मिल गए हैं. साहब लोग बुरा न मानना अगर अगले कुछ दिन मैं रूस की महाकविता में डूबा आपको वही पेश करता रहूं.


मेरी डेस्क पर रात

अन्ना अख़्मातोवा

मेरी डेस्क पर रात.
काग़ज़ सफ़ेद है.
शहर की रात की गर्मी में
कोई भी चीज़ उड़ती नहीं.

मैं उसकी एक सिगरेट पीती हूं
मैं आख़्रिरी रूसी वोदका ख़त्म करती हूं
मैं खिड़की से बाहर देखने की जेहमत नहीं उठाती
मुझे मालूम है मुझे क्या दिखाई देगा

वह भी जाग गया है
और वह मेरा नाम नहीं लेगा
कैसी ताक़त है इस आदमी के भीतर
मेरा प्यार पाने के लिए कुछ भी नहीं करता

Friday, October 3, 2008

मेरी याद करना और सोचना: वह चाहती थी तूफ़ान आएं



तुम सुनोगे तूफ़ान को

अन्ना अख़्मातोवा

तुम सुनोगे तूफ़ान को, तुम मेरी याद करना
और सोचना: वह चाहती थी तूफ़ान आएं. आकाश की किनारी
कड़े कत्थई रंग की होगी
और लपटें उठ रहॊ होंगी तुम्हारे दिल में, जैसा तब हुआ करता था.

यह सब सच होगा एक दिन मॉस्को में
जब मैं तुमसे अन्तिम विदा लूंगी
और जल्दी से चल दूंगी उन ऊंचाइयों की तरफ़
जहां मैं जाना चाहती थी
अपनी परछाईं को छोड़कर, तुम्हारे पास रह जाने के लिये.

मुझे सुनाई पड़ती है हमेशा विलाप करती एक चिड़िया


मुझे सुनाई पड़ती है हमेशा विलाप करती एक चिड़िया

अन्ना अख़्मातोवा

मुझे सुनाई पड़ती है हमेशा विलाप करती एक चिड़िया
और मैं सुनती हूं भरपूर गरमियों को विदा होते
सांप जैसा फुंफकारता है हंसिया
मुझे कटते हुए मक्के के तनों की आवाज़ सुनाई देती है

छरहरी चरवाहिनों के नन्हे घाघरे
हवा में उड़ते हैं छुट्टियों में फहराए जाने वाले झंडों सरीखे
प्रसन्न घंटियों की टनटन, और धूल ढंकी पलकों के नीचे से
सरक आने वाली वह निगाह

प्यारभरी बातों से मुझे
आने वाली किसी काली घटना का अन्देशा तक होने की उम्मीद नहीं
पर तुम आओ फिर भी, और देखो तो इस स्वर्ग को
जहां हम साथ थे कभी -प्रसन्न और छलहीन!

मेरे भीतर

एक स्मृति का वास है मेरे भीतर
जिससे न मैं लड़ सकती हूं, न लड़ूंगी
कुंए की गहराई में किसी स्फटिक कंकड़ सी है वह -
ख़ुशी भी, दर्द भी!

मेरी आंखों को देखने वाला शख़्स
इसे देखे बिना नहीं रह पाता
जैसे किसी दुःखभरी कथा को सुनते हुए
वह अधिक विचारवान, शान्त और उदास हो जाता है -

मुझे पता है ईश्वर चीज़ों में बदल देता है लोगों को
मुक्त छोड़कर उनकी जीवित चेतना को
उनकी चमत्कारभरी यातना को जिलाए रखकर.

तुम बदल दिये गए हो मुझ में!

(फ़ोटो: बीमार अन्ना अख़्मातोवा, १९२४)

क्या तुम्हें इस धरती पर अब भी खोजा जा सकता है



रूसी साहित्य पर गहरा प्रभाव छोड़ने वाली अन्ना अख़्मातोवा की एक कविता आप ने परसों कबाड़ख़ाने में पढ़ी थी. मैंने वायदा किया था कि अन्ना की और कविताएं यहां पेश करूंगा.

अन्ना अख़्मातोवा (जून ११, १८८९ - मार्च ५, १९६६) का काव्य-संसार समय, स्मृति, रचनात्मक स्त्री की नियति और स्टालिन के खौफ़नाक युग से जुड़ी कई विषयवस्तुओं से मुख़ातिब है. 'शोकगीत' नामक महाकाव्यात्मक रचना स्टालिन के कहर का आधिकारिक दस्तावेज़ गिना जाता है.

अख्मातोवा के माता-पिता १९०५ में अलग हो गये थे. त्सारस्को सेलो में उनकी शिक्षा हुई जहां उन्हें उनके भविष्य के जीवनसाथी निकोलाई गुमिल्योव ने मिलना था. अन्ना ने बचपन से की कविता लिखना शुरू कर दिया था - पुश्किन, रेसीन और बरातिन्स्की उनके प्रिय कवि थे.

बहुत सारे रूसी कवियों ने अन्ना के प्रति अपने प्रेम का इज़हार किया. अन्ना ने १९१० में कवि निकोलाई गुमिल्योव से शादी कर ली. निकोलाई गुमिल्योव जल्द ही शेरों के शिकार के एक अभियान पर अफ़्रीका चल दिए. निकोलाई गुमिल्योव ने अन्ना की कविता को कभी भी गम्भीरता से नहीं लिया. बाद में रूस में तत्कालीन जीवित महानतम कवि अलैक्सान्द्र ब्लोक द्वारा सार्वजनिक घोषणा किये जाने पर वह अन्ना की कविताओं को अपनी रचनाओं से कहीं आगे का मानता है, गुमिल्योव को 'सदमा' लगा था.

१९१२ में अन्ना के पहले पुत्र लेव का जन्म हुआ और 'शाम' शीर्षक से पहला संग्रह भी आया. पाठकों को इस संग्रह में रॉबर्ट ब्राउनिंग और टॉमस हार्डी के रंग नज़र आए.

१९१४ में उनका दूसरा संग्रह आया. तब तक हज़ारों रूसी स्त्रियां "अन्ना की इज़्ज़त में" कविताएं रच रही थीं. अन्ना की तब तक की कविताओं में अपने संबंध के बेहद जटिल बिन्दु पर पहुंचे स्त्री-पुरुष की थीम हुआ करती थी.

अपने उच्चवर्गीय तौर तरीकों के चलते अन्ना को "नेवा की महारानी" और "रजत युग की आत्मा" जैसे विशेषणों से नवाज़ा गया. इस स्वर्णिम काल को बहुत साल बाद अन्ना ने अपनी सबसे लम्बी रचना 'पोयम विदाउट अ हीरो' में याद किया है.
गुमिल्योव को सोवियत-विरोधी गतिविधियों में लिप्त रहने के आरोप में फांसी पर लटका दिया गया. बाद में अन्ना ने दो विवाह किए. स्टालिन के गुलाग-शिविरों में इन में से दूसरे पति कला-विशेषज्ञ निकोलाई पुनिन की मौत के बाद अन्ना ने बोरिस पास्तरनाक के कई प्रेम-प्रस्ताव ठुकराए.

१९२२ में अख़्मातोवा को बूर्ज़्वा घोषित कर दिया गया और १९४० तक उनकी रचनाओं पर प्रतिबन्ध लगा. पश्चिम में बहुत कम लोगों को यकीन था कि अन्ना जीवित बची हैं. पर १९४० में उन्हें एक नया काव्य-संग्रह छपाने की इजाज़त दे दी गई.
१९४६ में लातवियाई दार्शनिक इसाइयाह बर्लिन द्वारा अन्ना अख़्मातोवा से मुलाकात किये जाने की ख़बर सुनकर स्टालिन के सांस्कृतिक सलाहकार आन्द्रेई ज़्दानोव ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की कि अन्ना "अर्श वैश्या और अर्ध भिक्षुणी" है. इस के बाद अन्ना की कविताओं पर दुबारा प्रतिबन्ध लगा दिया गया और लेखक संघ से उसके निष्कासन का प्रयास किया गया जो मृत्युदण्ड के बराबर माना जाता था. अन्ना का बेटा यंत्रणा-शिविरों में सड़ रहा था जिसे मुक्त कराने को अन्ना ने स्टालिन की तारीफ़ तक में कविताएं लिखीं.

आधिकारिक प्रतिबन्ध के बावजूद अन्ना का काम और नाम रूस भर में फैलता रहा और उन्हें रूसी संस्कृति की धरोहर का पहरेदार माना जाने लगा था.

स्टालिन की मौत के बाद १९६४ में अन्ना की ७५वीं वर्षगांठ पर उनकी समग्र रचनाएं प्रकाशित हुईं. इसके बाद उन्हें कई यूरोपीय सम्मान दिये गए. ७६ की आयु में सेन्ट पीटर्सबर्ग में उनकी मृत्यु हुई.

आज अन्ना विश्व साहित्य का विशिष्ट नाम हैं. उनके नाम पर संग्रहालय बने हुए हैं. १९८२ में सोवियत अंतरिक्षयात्री लुडमिला ज्योर्जियाना द्वारा खोजे गए एक सुदूर ग्रह का नाम ३०६७ अख्मातोवा रखा गया.

पेश हैं अन्ना की दो छोटी कविताएं.:


आर्मेनिया के लिए

काली भेड़ की तरह आऊंगी मैं तुम्हारे सपनों में
अपनी कमज़ोर टांगों पर
मैं तुम तक आ कर पूछना शुरू करूंगी:
"बादशाह सलामत! क्या आपने लज़ीज़ भोजन किया?
मोती की तरह जकड़े हुए हैं आप ब्रह्माण्ड को
आपको नसीब हुआ अल्लाह का दैवीय आशीर्वाद ...
क्या स्वादिष्ट था मेरा बच्चा?
क्या वह खुश कर पाया आपको? क्या वह
आपके बच्चे को खुश कर पाया?"

मैं नहीं जानती

मैं नहीं जानती तुम जीवित हो या मर चुके
यह भी नहीं कि क्या तुम्हें इस धरती पर अब भी खोजा जा सकता है
या क्या उस वक़्त जब सूरज डूब जाता है
मुझे गम्भीरतापूर्वक तुम्हारा शोक मनाना चाहिये?

तुम्हारे वास्ते है सब कुछ - नित्य की प्रार्थना
रातों की निद्राहीन गर्मी
और मेरी कविताओं का सफ़ेद रेवड़
और मेरी आंखों में नीली आग

इतना प्रिय कोई नहीं था मुझे, इतनी पीड़ा भी नहीं दी
मुझे किसी ने, उसने भी नहीं
जिसने यातना देने को मुझे धोख़ा दिया
उसने तक नहीं जिसने मुझे दुलार दिया और भूल गया.

(अन्ना की कुछेक और कविताएं जल्दी ही और पढ़वाऊंगा आपको)

Wednesday, October 1, 2008

अन्ना अख़्मातोवा की 'शाम'



सुबह मारीना स्वेतायेवा की कविता लगाने के बाद दिन भर रूस की एक और महान कवयित्री अन्ना अख़्मातोवा (२३ जून १८८९-५ मार्च १९६६) को पढ़ता रहा.

कोई पच्चीस साल पहले की बात है. घर में डाक से 'सोवियत लिटरेचर' आया करती थी. एक अंक में अन्ना अख़्मातोवा की 'शाम' कविता ने इस क़दर प्रभावित किया कि मैंने तुरन्त उसका अनुवाद कर डाला था. हालांकि कविता की समझ न तब थी न अब है, उस कविता में कुछ था जो समझ में न आते हुए भी समझ में आ रहा था.

आज मारीना स्वेतायेवा के बहाने अन्ना अख़्मातोवा की याद आई तो एक पुरानी डायरी को खोजने के के चक्कर सारा घर ज़मींदोज़ कर डाला. उसी में लिखा धरा था वह अनुवाद. मेरी अपनी याददाश्त में जाने-अनजाने किया गया वह पहला साहित्यिक अनुवाद था, सो ज़ाहिर है उसमें हज़ार खोट होंगे. मगर कुछ ऐसा नाता है इस से कि आपको पढ़वाने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा.

हो तो यह भी सकता है कि अगले दो-एक दिन लगातार आपको अन्ना की कुछेक और नायाब कविताएं पढ़वाऊं. अन्ना की विस्तृत जीवनकथा भी तभी.
.

शाम

शॉल के पीछे अपने हाथों को मज़बूती से जकड़ लेती हूं मैं
इतनी ज़र्द क्यों दिख रही हूं आज की शान
... शायद मैंने ज़्यादा ही पिला दी थी उसे
दुःख और हताशा की कड़वी शराब

कैसे भूल सकती हूं! - वह बाहर चला गया था,
दर्द की रेखा में खिंचे हुए थे उसके होंठ
पगलाई सी मैं दौड़ती चली गई थी
सीढ़ियां उतर कर उसके पीछे, सड़क तक

मैं चिल्लाई: "मैं तो मज़ाक कर रही थी, सच्ची!
मुझे ऐसे छोड़कर मत जाओ, मैं मर जाऊंगी" - और
एक भयानक, ठण्डी मुस्कान अपने चेहरे पर लाकर
उसने हिदायत दी मुझे: "बाहर हवा में मत खड़ी रहो!"

कवियों के ग्रहण का पूर्वानुमान नहीं लगा सकता कोई पंचांग



१८९२ में मास्को में जन्मी मारीना स्वेतायेवा के पिता पुश्किन संग्रहालय के निदेशक थे और माता विख्यात पियानोवादक. बहुत छुटपन से कविता में रुचि लेने वाली मारीना का पहला संग्रह १९१० में छपकर आया.

१९२२ में वे देश छोड़ कर क्रमशः जर्मनी और चेकोस्लोवाकिया में जा बसीं. सत्रह साल के ख़ुद के चुने निर्वासन के उपरान्त जब वे १९३९ में वापस रूस लौटीं, उनकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी - हताशा और बीमारी के बीच १९४१ में उन्होंने आत्महत्या कर ली. उनके कुल पांच कविता-संग्रह छपे.

बीसवीं सदी की विश्व कविता को रूस ने जो महाकवि दिए उनमें मारीना भी एक मानी जाती हैं. उनकी तुलना अक्सर रूस की ही एक अन्य महान कवयित्री अन्ना अख़्मातोवा से की जाती है. मारीना स्वेतायेवा की कविता 'कवि' प्रस्तुत है:


कवि

बहुत दूर की बात छेड़ता है कवि
बहुत दूर की बात खींच ले जाती है कवि को

ग्रहों, नक्षत्रों ... सैकड़ों मोड़ों से होती कहानियों की तरह
हां और ना के बीच
वह घंटाघर की ओर से हाथ हिलाता है
उखाड़ फेंकता है सब खूंटे और बन्धन ...

कि पुच्छलतारों का रास्ता होता है कवियों का रास्ता -
बहुत लम्बी कड़ी कारणत्व की -
यही है उसका सूत्र! ऊपर उठाओ माथा -
निराश होना होगा तुम्हें
कि कवियों के ग्रहण का पूर्वानुमान नहीं लगा सकता कोई पंचांग.

कवि वह होता है जो मिला देता है ताश के पत्ते
गड्डमड्ड कर देता है भार और गिनती
कवि वह होता है जो पूछता है स्कूली डेस्क से
जो काण्ट का भी खा डालता है दिमाग
जो बास्तील के ताबूत में भी
लहरा रहा होता है हरे पेड़ की तरह
जिसके हमेशा क्षीण पड़ जाते हैं पदचिन्ह
वह ऐसी गाड़ी है जो हमेशा आती है लेट

इसलिये कि पुच्छलतारों का रास्ता
होता है कवियों का रास्ता, जलता हुआ
न कि झुलसाता हुआ,
यह रास्ता टेढ़ा-मेढ़ा
पंचांग या जन्त्रियों के लिए बिल्कुल अज्ञात!

Sunday, August 17, 2008

एंडी गार्सीया की आवाज़ में नेरूदा की 'सैडेस्‍ट पोएम'



पाब्‍लो नेरूदा की 'सैडेस्‍ट पोएम' के बारे में पहले भी कई बार लिखा जा चुका है.  जो कविता के क़रीब रहते हैं, उन्‍हें पता है कि यह कितनी लोकप्रिय रही है. कबाड़ख़ाना में कुछ समय पहले अशोक पांडे ने इस कविता का हिंदी अनुवाद और होसे हुआन तोर्रेस की आवाज़ में इसे सुनाते हुए इसके बारे में लिखा भी था. उसे यहां पढ़ें-सुनें.

कहने की बात नहीं है कि कई लोगों की तरह मुझे भी यह कविता बहुत पसंद है और कई-कई बार मैं इस तक लौटकर जाता हूं. जब कभी रात में हवा का भंवर गाता हुआ-सा ऊपर उठता है या यह अहसास होता है कि एक बार फिर मैंने किसी को खो दिया है. जब यह लगता है कि प्रेम का क्षण कितना छोटा होता है और उसे भुला पाना कितनी लंबी प्रक्रिया. शायद एक अनंत प्रक्रिया. जब आत्‍मा यह मानने से इंकार कर देती है कि कोई हमेशा के लिए उसके घर से निकल चुका है और आंख चुराने से बड़ी कोई चोरी नहीं लगती. पूरे चांद की रात जब किसी उदास अकेले पेड़ पर बेआवाज़ उतरती है और अपने उतरने के सबूत में एक सफ़ेदी उस पर छोड़ जाती है. इस वक़्त मशीन गोद में ले मैं छत पर बैठा हूं और नीचे काली शाल ओढ़े जाती एक आकृति बार-बार नींद से लंबी इस सड़क पर, दूर, उभर-उभर आती है. मेरी दाहिनी हथेली पर एक बूंद गिरती है. बारिश की. शब्‍दों के आसमान से ऐसे ही गिरती होगी कविता. बेआवाज़. फिर झमाझम बरसती हैं स्‍मृतियां, जिनसे बचने का दुनियावी उपाय खोजना होता है.

किताब में जिस पेज पर यह कविता है, ऐसा लगता है, कि वह अपने पहले की पेज की कविताओं से कुछ पूछ रही है और अपने बाद की कविताओं को कुछ बता रही है. जैसे नेरूदा अपनी एक छोटी कविता में कहते हैं- 'क्‍या कहता होगा गुरुवार आने वाले शुक्रवार से'.

फिल्‍म है 'इल पोस्तिनो'  (अंग्रज़ी में 'द पोस्‍टमैन'. साल 1994). पाब्‍लो नेरूदा की जि़ंदगी के एक टुकड़े पर बनी है. इसमें नेरूदा की कई कविताओं को पढ़ा गया है. 'सैडेस्‍ट पोएम' का पाठ एंडी गार्सीया ने किया था. हमारे यहां, आम लोगों ने तो नहीं ही, फिर भी ढंग का पढ़ने-लिखने, ढंग का सुनने-देखने वालों ने ज़रूर देखी होगी और इन कविताओं का आस्‍वाद भी लिया होगा. फिल्‍म के स्‍कोर्स की एक सीडी भी जारी हुई थी, जिसमें नेरूदा की कविताओं का पाठ मैडोना, जूलिया रॉबर्ट्स, स्टिंग, सैमुएल एल जैकसन, मिरांडा रिचर्डसन, विंसेंट पेरेस आदि ने किया था. दिल्‍ली-मुंबई जैसे शहरों में मिल भी सकती है.

कविता का अंग्रेज़ी पाठ यहां दिया गया है और उसके नीचे हिंदी में.




Tonight I can write the saddest lines.

Write, for example,'The night is shattered
and the blue stars shiver in the distance.'

The night wind revolves in the sky and sings.

Tonight I can write the saddest lines.
I loved her, and sometimes she loved me too.

Through nights like this one I held her in my arms
I kissed her again and again under the endless sky.

She loved me sometimes, and I loved her too.
How could one not have loved her great still eyes.

Tonight I can write the saddest lines.
To think that I do not have her. To feel that I have lost her.

To hear the immense night, still more immense without her.
And the verse falls to the soul like dew to the pasture.

What does it matter that my love could not keep her.
The night is shattered and she is not with me.

This is all. In the distance someone is singing. In the distance.
My soul is not satisfied that it has lost her.

My sight searches for her as though to go to her.
My heart looks for her, and she is not with me.

The same night whitening the same trees.
We, of that time, are no longer the same.

I no longer love her, that's certain, but how I loved her.
My voice tried to find the wind to touch her hearing.

Another's. She will be another's. Like my kisses before.
Her voide. Her bright body. Her inifinite eyes.

I no longer love her, that's certain, but maybe I love her.
Love is so short, forgetting is so long.

Because through nights like this one I held her in my arms
my sould is not satisfied that it has lost her.

Though this be the last pain that she makes me suffer
and these the last verses that I write for her.

Pablo Neruda

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लिख सकता हूं आज की रात बेहद दर्दभरी कविताएं

लिख सकता हूं उदाहरण के लिये: "तारों भरी है रात
और तारे हैं नीले, कांपते हुए सुदूर"

रात की हवा चक्कर काटती आसमान में गाती है.

लिख सकता हूं आज की रात बेहद दर्दभरी कविताएं
मैंने प्रेम किया उसे और कभी कभी उसने भी प्रेम किया मुझे

ऐसी ही रातों में मैं थामे रहा उसे अपनी बांहों में
अनन्त आकाश के नीचे मैंने उसे बार-बार चूमा.

उसने प्रेम किया मुझे और कभी-कभी मैंने भी प्रेम किया उसे.
कोई कैसे प्रेम नहीं कर सकता था उसकी महान और ठहरी हुई आंखों को.

लिख सकता हूं आज की रात बेहद दर्दभरी कविताएं.
सोचना कि मेरे पास नहीं है वह. महसूस करना कि उसे खो चुका मैं.

सुनना इस विराट रात को जो और भी विकट उसके बग़ैर.
और कविता गिरती है आत्मा पर जैसे चारागाह पर ओस.

अब क्या फ़र्क़ पड़ता है कि मेरा प्यार संभाल नहीं पाया उसे.
तारों भरी है रात और वह नहीं है मेरे पास.

इतना ही है. दूर कोई गा रहा है. दूर.
मेरी आत्मा संतुष्ट नहीं है कि वह खो चुकी उसे.

मेरी निगाह उसे खोजने की कोशिश करती है जैसे इस से वह नज़दीक आ जाएगी.
मेरा दिल खोजता है उसे और वह नहीं है मेरे पास.

वही रात धवल बनाती उन्हीं पेड़ों को
हम उस समय के, अब वही नहीं रहे.

मैं उसे और प्यार नहीं करता, यह तय है पर कितना प्यार उसे मैंने किया
मेरी आवाज़ ने हवा को खोजने की कोशिश की ताकि उसे सुनता हुआ छू सकूं

किसी और की. वह किसी और की हो जाएगी. जैसी वह थी
मेरे चुम्बनों से पहले. उसकी आवाज़ उसकी चमकदार देह उसकी अनन्त आंखें

मैं उसे प्यार नहीं करता यह तय है पर शायद मैं उसे प्यार करता हूं
कितना संक्षिप्त होता है प्रेम, भुला पाना कितना दीर्घ.

क्योंकि ऐसी ही रातों में थामा किया उसे मैं अपनी बांहों में
मेरी आत्मा संतुष्ट नहीं है कि वह खो चुकी उसे.

हालांकि यह आख़िरी दर्द है जो सहता हूं मैं उसके लिये
और ये आख़्रिरी उसके लिये कविताएं जो मैं लिखता हूं.

(अनुवाद: अशोक पांडे, संवाद प्रकाशन द्वारा प्रकाशित 'बीस प्रेम कविताएं और हताशा का एक गीत' से)

Tuesday, October 30, 2007

‘कोका कोला के सबक’ से: शुन्तारो तानिकावा

एक बूढ़ी स्त्री की डायरी

अनुवादकीय नोट :

‘बूढ़ी स्त्री ’ (ओल्ड वूमन) से मूल जापानी शब्द ‘ओबासान’ का सही सही अर्थ समझ में नहीं आता। ‘ओबासान’ का सबसे नजदीकी अर्थ ‘छोटी मां’ हो सकता है जो किसी भी स्त्री सम्बंधी या आदरणीय स्त्री के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

1

किनारे पर उकड़ूं बैठी है वह बूढ़ी स्त्री । उसके पीछे एक विशाल चिमनी धुआं उगल रही है। आप उससे नहीं कह सकते कि अब यह करो तुम बूढ़ी स्त्री । उससे नहीं कह सकते कि अब यह करो। बूढ़ी स्त्री होती है बूढ़ी स्त्री । वह कह रही है कि आज रात वह थोड़ा सा कोन्याकू उबालेगी।

2

उसने अभी अभी क्या कहा वह भूल जाती है और फिर से दोहराती है वही कहानी। आप समझते हो कि वह गुस्से में है पर अगले ही पल वह खुश नजर आने लगती है। पुराने दिनों में मैं बढ़िया चावल पकाया करती थी मगर देखो कैसे जल गए हैं वे।जो भी हो क्या फर्क पड़ता है। भुला दिया जाता है जल जाना। मगर कितने शर्म की बात है ! किसी भी चीज को इस तरह जला देना! अपने में खोई बूढ़ी स्त्री किसी और पर दोष मढ़ देती है। इस मुश्किल बूढ़ी स्त्री के भीतर पुराने समय की कर्मठ बूढ़ी स्त्री लुकाछिपी खेल रही है। क्या कहीं चली गई बूढ़ी स्त्री ? नहीं वह यहीं है। सूरज में दमकते अपने सुन्दर सफेद केशों के साथ वह बनी रहती है जिन्दा।

3

बूढ़ी स्त्री कहती है छोड़ो जाने दो ¸ कहती है वह। एक टूटी कील से फंसकर फट गया था एप्रन। उस आदमी ने झटक लिए थे अपने हाथ। वह एक नालायक आदमी है; गुस्से में है बूढ़ी स्त्री । हालांकि यह घटा था तीस साल पहले पर फड़फड़ाते नथुनों के साथ कुछ देर के लिए बूढ़ी स्त्री वाकई बहुत गुस्सा होती है।

4

केवल दिखाई देने वाली बूढ़ी स्त्रियां ही नहीं होतीं सारी बूढ़ी स्त्रियां। किसी वाइरस की तरह बूढ़ी स्त्रियां मुझे लगातार नष्ट करती जाती हैं। न दिखाई देने वाली बूढ़ी स्त्रियां ज्यादा खतरनाक होती हैं दिखाई देने वाली बूढ़ी स्त्रियों से¸ और अब मैंने उनमें और अपने आप में फर्क करना बन्द कर दिया है। न दिखाई देने वाली बूढ़ी स्त्रियोंको देखने के लिए मैं बूढ़ी स्त्रियों के स्केच बनाने की कोशिश करता हूं। इम्म्यूनिटी? किस काम के होते हैं इस तरह के शब्द?

5

चाय के दाग लगे चटखे हुए बरतन का बहुत ख्याल रखती है बूढ़ी स्त्री । जब वह उस बरतन से प्याले में चाय डाल रही होती है वह बेहद गरिमावान लगती है। फिर वह खामोशी से अखबार पर निगाह डालती है ; वह अच्छे से जानती है कि छोड़े गए एक बच्चे की कहानी और जबरिया सत्ता परिवर्तन की खबर का बराबर महत्व है क्योंकि दोनों का प्रिन्टसाइज़ एक है। बूढ़े लोगों को मिलने वाले चश्मों की तीन जोड़ियां खो चुकी है वह। यह चौथी है।

6

हमारे संसार में किसी भी चीज को स्पष्ट नाम दे पाना सम्भव नहीं होता। जिस तरह खाना बनाने का बरतन बहुत सी ऐसी चीजों से बना होता है जो खाना बनाने का बरतन नहीं होतीं¸ उदासी भी उसी तरह पुराने समय की असंख्य भयानक रूप से थका देने वाली चीजों की परछाईं भर होती है। ब्लैक होल की तरह एक नाम अपने भीतर निगल जाता है सारे नाम। नाम जड़ जमाते हैं बेनाम में।
(जल्दबाजी में जोड़ा गया एक नोट।)

7

बूढ़ी स्त्री कहती है कि संसार एक बेहतर जगह बन के रहेगा। लेकिन दुनिया ऐसी होती है वह कहती है। दीवार की तरफ मुंह किए रोती है बूढ़ी स्त्री । मैंने देखा है उसे। मैं कुछ नहीं कर सकता सिवा उसे देखते चले जाने के। मैं भयाक्रान्त तरीके से असहाय हूं। और कई दफे मुझे अहसास होता है कि उसकी तुलना किसी से भी नहीं की जा सकती। इस कदर खूबसूरत है वह।

8

मुझे इस खौफनाक सच्चाई का अहसास हो गया था कि दुनिया में कविता के सिवाय किसी चीज का अस्तित्व नहीं होता। सारी चीजें और सारी संभव चीजें कविताएं होती हैं; भाषा के जन्म के बाद से ही यह एक अकथनीय सत्य है। मैं हैरत करता हूं कि खुद को कविता से आजाद करने के लिए हर किसी ने कितना कुछ नष्ट किया। जो भी हो यह रही है एक बेहद मुश्किल बहस। इस कदर बेतहाशा बेतुकी लगने वाली बातचीत।


9

जब भूख लगती है बूढ़ी स्त्री एक बरतन में कुछ खोज लेती है और उसे मुंह में ठूंस लेती है। कभी तो वह लगातार तीन दिनों तक नहाती है और कभी पूरे महीने नहीं नहाती। अपने खोए हुए चीथड़ा अन्तर्वस्त्र चुरा ले जाने वाले को वह गालियां देती है। उस वक्त वह गद्दे के नीचे छिपा कर रखे हुए स्टाक सर्टिफिकेट्स के बारे में भूल जाती है। टुकड़ों में तब्दील कर दी गई है यह स्त्री। उसके भीतर एक और बूढ़ी स्त्री रह रही है। वह उन छोटे बक्सों जैसी है जो मुझे बचपन में तोहफे में मिले थे। एक बक्से के अन्दर एक और ¸ फिर उसके अन्दर एक और छोटा बक्सा और उसके अन्दर एक और भी छोटा बक्सा और उसके अन्दर ॰॰॰ । किसी छिपी हुई चीज को खोजने के लिए वह एक के बाद एक उन्हें खोलती जाती है लेकिन वह उस खालीपन तक कभी नहीं पहुंचती जहां बक्से पहुंचते हैं। इस बारे में बात करना बेमानी है कि असली बूढ़ी स्त्री कौन सी है ; निश्चय ही वह विरोधाभासों और संशयों से भरपूर है। सो वह अतिशय ईमानदार स्त्री से मुझे कभी कभी बेहद नफरत होने लगती है। क्योंकि जो मुझ पर लदी है वह मैं ही हूं।

10

मैं किसी भी वक्त ले जाए जाने के लिए तैयार हूं ¸ बूढ़ी स्त्री कहती है। लेकिन जब तक मुझे ले जाया नहीं जाता में मरने नहीं जा रही¸ वह कहती है। अपनी चीजों का ख्याल रखने में नाकाम, वह हमेशा दूसरों के मामलें में टांग अड़ाती है। बस मुझे अकेला छोड़ दो¸ कहती है बूढ़ी स्त्री।मैं नहीं कह सकता कि इस तरह से आत्मसम्मान का मैं थोड़ा इस्तेमाल नहीं कर सकता। क्योंकि बूढ़ी स्त्री के सामने मैं आखिरकार मैं बन जाता हूं।

11

दुनिया एक सनकभरी रजाई है। हालांकि पागलपन की तरह उस में तमाम रंग और कपड़े चिप्पी किए गए हैं ¸ उसके चार किनारे बहुत दक्षता के साथ सिए गए हैं। सौ साल पहले उत्तरी अमेरिका में रही होगी कोई बूढ़ी स्त्री बिल्कुल इस बूढ़ी स्त्री की तरह। किसी बड़ी नदी के नजदीक¸ पेड़ों के झुरमुट में¸ शहर की सीमा के जरा सा बाहर किसी जर्जर मकान के अहाते में।

12

शायद किसी दिन मैं भी बन जाऊंगा वही बूढ़ी स्त्री। शायद मैं अभी से बन चुका हूं वह बूढ़ी स्त्री। मेरा नाम¸ मेरा धन¸ मेरा भविष्य¸ मेरा यह, मेरा वह … इनमें से कोई भी चीज मुझे बूढ़ी स्त्री से अलग नही कर सकती। मेरे हाथ¸ मेरे बाल¸ मेरे शब्द¸ गुजरती हुई मेरी चेतना¸ वे सारी चीजें जिन्हें मेरा कहा जा सकता है और उस बूढ़ी स्त्री की तमाम चीजें - अण्डों की तरह एक सी नजर आती हैं।

13

एक कुत्ते का पेट सहलाती हुई वह बूढ़ी स्त्री कुत्ते से दबी जबान में बात करती है। कुत्ते के आनन्द से उसे बहुत खुशी मिलती है। हैरत करते हुए कि क्या वह बूढ़ी स्त्री कुत्ते को अनन्त तक दुलारती जाएगी¸ मैं उस दृश्य से आंखें नहीं हटा पाता। तो भी आखिरकार बूढ़ी स्त्री धीरे धीरे उठती है और घर के भीतर जाती है। मेरे भीतर बचती है उखड़ी सांसों वाली एक संवेदना जिसे मैं किसी भी तरह कोई नाम नहीं दे सकता।