उदयप्रकाश का पुरस्कार लेना और इसके बाद उठे बवंडर से शायद ही साहित्य जगत अछूता रहे। लेकिन इतना तय है कि यह एक ऐसा गंभीर मसला है जो चुप्पी साधेगा इतिहास उसका भी अपराध लिखेगा। सवाल कई है। उनका जवाब वह नहीं जो हम चाहते हैं, वह भी नहीं जो हम नहीं चाहते हैं। मामला है आधा गिलास खाली है या आधा गिलास पानी भरा हुआ है।
पहले उदयप्रकाश की सफाई पर बात करें तो क्या वह यह मानने के लिए तैयार हैं कि गोरखपुर में हुए समारोह उनका निजी मामला था। योगी के सम्बन्ध उनके परिवार से अच्छे हैं या नहीं उससे साहित्य जगत को कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन यदि बतौर साहित्यकार वह योगी से पुरस्कार ग्रहण करते हैं, तो उस पर आपत्ति जताने का पूरा अधिकार साहित्यप्रेमियों और उनके लेखन के तमाम प्रशंसकों को है। यदि यह पुरस्कार उनका पारिवारिक या निजी मामला है तो क्या वे इस बात पर मुहर लगते हैं कि हर साल यह पुरस्कार उनके किसी परिवार के सदस्यों को दिया जाएगा। क्या वे इस बात पर मुहर लगते हैं उनको यह पुरस्कार इसलिए दिया गया कि वे उनके सम्बन्धी हैं और उन्हें व्यक्तिगत कारणों से सम्मानित किया गया न कि उनकी लेखनी के लिए।
हमाम में सब नंगे हैं। कोई देख लिया तो हम ग़लत साबित होते हैं नहीं देखा तो दुनिया के सबसे बेहतर। (बेहतर की परिभाषा अपने नैतिक और बौद्धिक आधार पर रच लें )। वही हाल इस मामले में भी है। यदि उदयप्रकाश की ही बात मान लें कि वह उनका निजी या पारिवारिक मामला है तो क्या वह इसका विरोध नहीं कर सकते थे कि योगी जैसे व्यक्ति को सम्मान देने के लिए क्यों बुलाया जा रहा है। हाँ, यदि वे यह कहते हैं कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं हैं तो वे साफ-साफ झूठ बोल रहे है।
दूसरा मुद्दा यह है कि जो लोग उनका विरोध कर रहे हैं उनकी इस बारे में क्या गारंटी है कि उन्हें यदि इस तरह का सम्मान पाने का मौका मिले तो वह ग्रहण नहीं करेंगे। भले ही लोग इस मामले पर बात न करें लेकिन अपने गिरेबान में झाँकने की आदत डालनी चाहिए। तमाम विरोध करने वालों में ऐसे कई नाम शामिल हैं जिन्होंने जब भी कोई सम्मान ठुकराया है तो उन्हें इसके पीछे कई राज छुपाये रखा है , चाहे पोपुलारिटी पाने की चाहत क्यों न हो.
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Thursday, July 16, 2009
उदयप्रकाश या विरोधी : जवाब देना होगा
Tuesday, July 14, 2009
ये सूरत बदलनी चाहिए...
(मुझे खुशी है कि मैं गलत साबित हुआ। हिंदी में गलत को गलत कहने वाले वीरों की कोई कमी नहीं है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण नीचे का विरोधपत्र है। हिंदी के 50 से ज्यादा महत्वपूर्ण लेखकों ने योगी आदित्यनाथ के हाथों सम्मानित होने के लिए उदयप्रकाश की निंदा की है। नीचे हस्ताक्षर करने वाले कुछ लेखकों ने सक्रियता दिखाते हुए बाकी लेखकों से टेलीफोन पर विरोधपत्र जारी करने पर सहमति ली है। क्या उदय प्रकाश अब भी कहेंगे कि उनकी आलोचना जातिवादी फासीवादियों की साजिश का नतीजा है...)
विरोध-पत्र
---------------
हमें इस घटना से गहरा आघात पहुँचा है कि कुछ दिन पहले हिन्दी के प्रतिष्ठित और लोकप्रिय साहित्यकार उदय प्रकाश ने गोरखपुर में पहला " कुँवर नरेंद्र प्रताप सिंह स्मृति सम्मान " योगी आदित्यनाथ जैसे कट्टर हिन्दुत्ववादी , सामन्ती और साम्प्रदायिक सांसद के हाथों से ग्रहण किया है , जो ' उत्तर प्रदेश को गुजरात बना देना है ' जैसे फ़ासीवादी बयानों के लिए कुख्यात रहे हैं . हम अपने लेखकों से एक ज़िम्मेदार नैतिक आचरण की अपेक्षा रखते हैं और इस घटना के प्रति सख्त-से-सख्त शब्दों में
अपनी नाखुशी और विरोध दर्ज करते हैं .
-------
ज्ञानरंजन ,
विद्यासागर नौटियाल ,
विष्णु खरे ,
मैनेजर पाण्डेय ,
लीलाधर जगूड़ी,
भगवत रावत ,
राजेन्द्र कुमार ,
राजेन्द्र राव ,
चंचल चौहान ,
आनंदस्वरूप वर्मा
पंकज बिष्ट ,
इब्बार रब्बी ,
नीलाभ ,
वीरेन डंगवाल ,
आलोक धन्वा,
मंगलेश डबराल ,
त्रिनेत्र जोशी,
मनीषा पाण्डेय,
रविभूषण ,
प्रदीप सक्सेना ,
अजय सिंह ,
जवरीमल्ल पारख ,
वाचस्पति ,
अतुल शर्मा,
विजय राय ,
मनमोहन
असद ज़ैदी ,
मदन कश्यप ,
रवीन्द्र त्रिपाठी ,
नवीन जोशी,
अजेय कुमार ,
वीरेन्द्र यादव ,
कुमार अम्बुज
देवीप्रसाद मिश्र ,
कात्यायनी ,
निर्मला गर्ग ,
अनीता वर्मा ,
योगेन्द्र आहूजा ,
शुभा,
बोधिसत्व,
संजय खाती ,
नवीन कुमार नैथानी ,
कृष्णबिहारी ,
विनोद श्रीवास्तव ,
प्रणय कृष्ण ,
राजेश सकलानी ,
इरफ़ान,
मुनीश शर्मा,
विजय गौड़ ,
आशुतोष कुमार ,
मनोज सिंह
सुन्दर चन्द ठाकुर ,
नीलेश रघुवंशी ,
आर. चेतनक्रान्ति ,
पंकज चतुर्वेदी ,
शिरीष कुमार मौर्य ,
रामाज्ञा शशिधर ,
प्रियम अंकित ,
अंशुल त्रिपाठी ,
प्रेमशंकर ,
मृत्युंजय ,
धीरेश सैनी ,
अनुराग वत्स ,
व्योमेश शुक्ल .
रविकांत
विरोध-पत्र
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हमें इस घटना से गहरा आघात पहुँचा है कि कुछ दिन पहले हिन्दी के प्रतिष्ठित और लोकप्रिय साहित्यकार उदय प्रकाश ने गोरखपुर में पहला " कुँवर नरेंद्र प्रताप सिंह स्मृति सम्मान " योगी आदित्यनाथ जैसे कट्टर हिन्दुत्ववादी , सामन्ती और साम्प्रदायिक सांसद के हाथों से ग्रहण किया है , जो ' उत्तर प्रदेश को गुजरात बना देना है ' जैसे फ़ासीवादी बयानों के लिए कुख्यात रहे हैं . हम अपने लेखकों से एक ज़िम्मेदार नैतिक आचरण की अपेक्षा रखते हैं और इस घटना के प्रति सख्त-से-सख्त शब्दों में
अपनी नाखुशी और विरोध दर्ज करते हैं .
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ज्ञानरंजन ,
विद्यासागर नौटियाल ,
विष्णु खरे ,
मैनेजर पाण्डेय ,
लीलाधर जगूड़ी,
भगवत रावत ,
राजेन्द्र कुमार ,
राजेन्द्र राव ,
चंचल चौहान ,
आनंदस्वरूप वर्मा
पंकज बिष्ट ,
इब्बार रब्बी ,
नीलाभ ,
वीरेन डंगवाल ,
आलोक धन्वा,
मंगलेश डबराल ,
त्रिनेत्र जोशी,
मनीषा पाण्डेय,
रविभूषण ,
प्रदीप सक्सेना ,
अजय सिंह ,
जवरीमल्ल पारख ,
वाचस्पति ,
अतुल शर्मा,
विजय राय ,
मनमोहन
असद ज़ैदी ,
मदन कश्यप ,
रवीन्द्र त्रिपाठी ,
नवीन जोशी,
अजेय कुमार ,
वीरेन्द्र यादव ,
कुमार अम्बुज
देवीप्रसाद मिश्र ,
कात्यायनी ,
निर्मला गर्ग ,
अनीता वर्मा ,
योगेन्द्र आहूजा ,
शुभा,
बोधिसत्व,
संजय खाती ,
नवीन कुमार नैथानी ,
कृष्णबिहारी ,
विनोद श्रीवास्तव ,
प्रणय कृष्ण ,
राजेश सकलानी ,
इरफ़ान,
मुनीश शर्मा,
विजय गौड़ ,
आशुतोष कुमार ,
मनोज सिंह
सुन्दर चन्द ठाकुर ,
नीलेश रघुवंशी ,
आर. चेतनक्रान्ति ,
पंकज चतुर्वेदी ,
शिरीष कुमार मौर्य ,
रामाज्ञा शशिधर ,
प्रियम अंकित ,
अंशुल त्रिपाठी ,
प्रेमशंकर ,
मृत्युंजय ,
धीरेश सैनी ,
अनुराग वत्स ,
व्योमेश शुक्ल .
रविकांत
Sunday, July 12, 2009
जीतेंगे डोमा जी उस्ताद!
(बन्दर के हाथों कुत्ते की लेंडी को पुरुस्कार की तरह लेना बन्द करो दोस्तो! और अपनी भाषा का सम्मान करना सीखो!.....ब्राह्मणवाद मुर्दाबाद! ठाकुरवाद मुर्दाबाद!--योगी उदयप्रकाश प्रकरण पर कवि वीरेन डंगवाल की टिप्पणी)
चलिए दिल से बोझ कुछ कम हुआ। वरना लग रहा था कि गोबर पट्टी वाकई वीर विहीन हो गई है। वीरेन जी ने खुलकर जो बात कही है वो बहुत लोगों के दिल की बात हो सकती है। फिलहाल वे चुप हैं। चुप हैं क्योंकि उन्हें उदय प्रकाश के नाराज होने का डर है। वैसे उदय प्रकाश खुद को बेहद सताया हुआ बताते हैं लेकिन उनका क्या जलवा है, वो इसी से पता चलता है कि कबाड़खाने से उनका ब्लाग हटा नहीं कि वापस लगा दिया गया। ऐसे प्रतापी लेखक और योगी आदित्यनाथ के करकमलों से सम्मानित व्यक्ति से टकराने वाले अहमक ही हो सकते हैं।
क्या अद्भुत दृश्य है। लोग गिड़गिड़ा रहे हैं कि प्रभो माफी मांग नहीं सकते तो कोई ठीक-ठाक बहाना ही बता दो ताकि जान छूटे। किसी तरह ये प्रसंग समाप्त हो। लेकिन उदय हैं कि मानते नहीं। उलटा हुंकार कर कह रहे हैं कि कुछ भी ऐसा नहीं किया जिसकी सफाई दूं। पुरस्कार नहीं सम्मान ग्रहण किया है। हाय-हाय,इस सादगी पर कौन न मर जाए ऐ खुदा..!
ये कोई सामान्य घटना नहीं है। ये दृश्य बता रहा है कि लोगों के सामाजिक सरोकार किस तरह से छीज रहे हैं। किसी सवाल पर स्टैंड लेने की एक जो एक गर्वीली परंपरा थी, उसे दफ्न करने की कोशिशें हो रही हैं। कहां तो नोबेल पुरस्कार को आलू का बोरा कहने वालों के वंश का होने का दावा, और कहां रक्त सने बोरे के आलू से भी सम्मानित होने से परहेज नहीं। पहले कहा जाता था कि बुराई को खत्म नहीं कर सकते तो उसको गलत ही कहो। ये भी नहीं कर सकते तो उसके खिलाफ सोचते रहो। यानी हर हाल में दूरी तो बनानी ही होगी। पर इधर बुरे को बुरा कहने में खासा नुकसान होता है तो चुप रहना ही बेहतर।
वैसे इधर, दो महत्वपूर्ण घटनाएं हुई हैं जिनसे पता चलता है कि सब लोग उदयप्रकाश की ही राह नहीं चल रहे हैं। कवि नीलाभ ने साहित्य अकादमी का पुरस्कार ठुकराया और कवि पंकज चतुर्वेदी ने सलवाजूडम के संरक्षक छत्तीसगढ़ के आला पुलिस अफसर के दरबार में हो रहे साहित्यिक जमावड़े में जाने से इंकार किया। खास बात ये है कि दोनों ने पहले स्वीकृति दी थी, लेकिन पुनर्विचार किया और लगा कि उनका फैसला गलत है तो बदल दिया। लेकिन कवि सुंदरचंद ठाकुर लाख अपील करें, उदयप्रकाश क्यों माफी मांगेंगे।
कुछ लोग कह रहे हैं कि कौन किससे मिलता है और कौन किससे सम्मानित होता है ये उसका निजी मसला है। इस तर्क पर तो कल कोई बलात्कारी और हत्यारा भी ब्लाग बनाकर कबाड़खाने पहुंच जाएगा,तो क्या उसका स्वागत होगा। उदय प्रकाश जिसके हाथों सम्मानित होने को सफाई देने लायक बात नहीं समझते, वो क्या है, ये राजनीतिक लिहाज से मंदबुद्धि भी बता सकते हैं। जो लोग पूर्वांचल को सांप्रदायिक हिंसा की आग में झोंकने की साजिश रचने वालों को पहचान नहीं पा रहे हैं, उनके बारे में क्या कहा जाए।
तुर्रा ये कि उदयप्रकाश जातिवादी फासीवाद से लड़ने के लिए मैदान में उतरे हैं और सम्मानित हो रहे हैं योगी आदित्यनाथ के हाथों। ऐसी उलटबांसी क्या पहली सुनी गई है। दलित आंदोलन के नए पुरोधा का ब्राह्मणवादी सामंती झंडाबरदारों के हाथों सम्मान, किसी साजिश का इशारा तो नहीं।
इस पूरे मसले में मैं एक ख्वामखाह की तरह आया। आदत से मजबूर पूंछ उठा दी। सहज बुद्धि कहने लगी कि ऐसे लोगों से दूरी बनानी चाहिए सो उदयप्रकाश का ब्लाग कबाड़खाने से हटाने की मांग कर बैठा। क्या पता था कि ये मांग लोकतंत्र के खिलाफ है। इस लोकतंत्र में तो भेड़-भेड़िये एक घाट पानी पीते हैं। बेचारे भेड़ियों की बिना मेहनत भूख भी मिट जाती है और भेड़ों की प्यास। जय हो..फिर भी ये तो मानना ही पड़ेगा कि लोग थोड़ी देर के लिए ही सही, मेरे झांसे में आ जरूर गए। कबाड़खाने से उदय प्रकाश का ब्लाग हट गया। ये अलग बात है कि ऐसा करने वालों को जब बताया गया कि ऐसा करना तानाशाही और ब्राह्मणवाद है तो वे फिर से लोकतांत्रिक हो गए।
तो अब मैं, न पिद्धी न पिद्दी का शोरबा, इस कबाड़खाने से अलग होने का एलान करता हूं। ....मुझे नहीं लगता कि मैं किसी के भी साथ एक मंच पर रह सकता हूं। रक्त सने हाथों से सम्मानित होने वालों के साथ तो एकदम नहीं।.....
अरे, जरा ठहरिए, आप मुझे बिलकुलै बुड़बक समझते हैं का.... मैं ऐसा कुछ नहीं करने जा रहा हूं। मैं उदय जी भइया साहब कुंवर से अकेले क्यों बिगाड़ लूं। डटे रहो उस्ताद।
अब मैं सिर्फ किसी पेड़ से कहूंगा कि राजा के सिर में सींग जमी है।
चलिए दिल से बोझ कुछ कम हुआ। वरना लग रहा था कि गोबर पट्टी वाकई वीर विहीन हो गई है। वीरेन जी ने खुलकर जो बात कही है वो बहुत लोगों के दिल की बात हो सकती है। फिलहाल वे चुप हैं। चुप हैं क्योंकि उन्हें उदय प्रकाश के नाराज होने का डर है। वैसे उदय प्रकाश खुद को बेहद सताया हुआ बताते हैं लेकिन उनका क्या जलवा है, वो इसी से पता चलता है कि कबाड़खाने से उनका ब्लाग हटा नहीं कि वापस लगा दिया गया। ऐसे प्रतापी लेखक और योगी आदित्यनाथ के करकमलों से सम्मानित व्यक्ति से टकराने वाले अहमक ही हो सकते हैं।
क्या अद्भुत दृश्य है। लोग गिड़गिड़ा रहे हैं कि प्रभो माफी मांग नहीं सकते तो कोई ठीक-ठाक बहाना ही बता दो ताकि जान छूटे। किसी तरह ये प्रसंग समाप्त हो। लेकिन उदय हैं कि मानते नहीं। उलटा हुंकार कर कह रहे हैं कि कुछ भी ऐसा नहीं किया जिसकी सफाई दूं। पुरस्कार नहीं सम्मान ग्रहण किया है। हाय-हाय,इस सादगी पर कौन न मर जाए ऐ खुदा..!
ये कोई सामान्य घटना नहीं है। ये दृश्य बता रहा है कि लोगों के सामाजिक सरोकार किस तरह से छीज रहे हैं। किसी सवाल पर स्टैंड लेने की एक जो एक गर्वीली परंपरा थी, उसे दफ्न करने की कोशिशें हो रही हैं। कहां तो नोबेल पुरस्कार को आलू का बोरा कहने वालों के वंश का होने का दावा, और कहां रक्त सने बोरे के आलू से भी सम्मानित होने से परहेज नहीं। पहले कहा जाता था कि बुराई को खत्म नहीं कर सकते तो उसको गलत ही कहो। ये भी नहीं कर सकते तो उसके खिलाफ सोचते रहो। यानी हर हाल में दूरी तो बनानी ही होगी। पर इधर बुरे को बुरा कहने में खासा नुकसान होता है तो चुप रहना ही बेहतर।
वैसे इधर, दो महत्वपूर्ण घटनाएं हुई हैं जिनसे पता चलता है कि सब लोग उदयप्रकाश की ही राह नहीं चल रहे हैं। कवि नीलाभ ने साहित्य अकादमी का पुरस्कार ठुकराया और कवि पंकज चतुर्वेदी ने सलवाजूडम के संरक्षक छत्तीसगढ़ के आला पुलिस अफसर के दरबार में हो रहे साहित्यिक जमावड़े में जाने से इंकार किया। खास बात ये है कि दोनों ने पहले स्वीकृति दी थी, लेकिन पुनर्विचार किया और लगा कि उनका फैसला गलत है तो बदल दिया। लेकिन कवि सुंदरचंद ठाकुर लाख अपील करें, उदयप्रकाश क्यों माफी मांगेंगे।
कुछ लोग कह रहे हैं कि कौन किससे मिलता है और कौन किससे सम्मानित होता है ये उसका निजी मसला है। इस तर्क पर तो कल कोई बलात्कारी और हत्यारा भी ब्लाग बनाकर कबाड़खाने पहुंच जाएगा,तो क्या उसका स्वागत होगा। उदय प्रकाश जिसके हाथों सम्मानित होने को सफाई देने लायक बात नहीं समझते, वो क्या है, ये राजनीतिक लिहाज से मंदबुद्धि भी बता सकते हैं। जो लोग पूर्वांचल को सांप्रदायिक हिंसा की आग में झोंकने की साजिश रचने वालों को पहचान नहीं पा रहे हैं, उनके बारे में क्या कहा जाए।
तुर्रा ये कि उदयप्रकाश जातिवादी फासीवाद से लड़ने के लिए मैदान में उतरे हैं और सम्मानित हो रहे हैं योगी आदित्यनाथ के हाथों। ऐसी उलटबांसी क्या पहली सुनी गई है। दलित आंदोलन के नए पुरोधा का ब्राह्मणवादी सामंती झंडाबरदारों के हाथों सम्मान, किसी साजिश का इशारा तो नहीं।
इस पूरे मसले में मैं एक ख्वामखाह की तरह आया। आदत से मजबूर पूंछ उठा दी। सहज बुद्धि कहने लगी कि ऐसे लोगों से दूरी बनानी चाहिए सो उदयप्रकाश का ब्लाग कबाड़खाने से हटाने की मांग कर बैठा। क्या पता था कि ये मांग लोकतंत्र के खिलाफ है। इस लोकतंत्र में तो भेड़-भेड़िये एक घाट पानी पीते हैं। बेचारे भेड़ियों की बिना मेहनत भूख भी मिट जाती है और भेड़ों की प्यास। जय हो..फिर भी ये तो मानना ही पड़ेगा कि लोग थोड़ी देर के लिए ही सही, मेरे झांसे में आ जरूर गए। कबाड़खाने से उदय प्रकाश का ब्लाग हट गया। ये अलग बात है कि ऐसा करने वालों को जब बताया गया कि ऐसा करना तानाशाही और ब्राह्मणवाद है तो वे फिर से लोकतांत्रिक हो गए।
तो अब मैं, न पिद्धी न पिद्दी का शोरबा, इस कबाड़खाने से अलग होने का एलान करता हूं। ....मुझे नहीं लगता कि मैं किसी के भी साथ एक मंच पर रह सकता हूं। रक्त सने हाथों से सम्मानित होने वालों के साथ तो एकदम नहीं।.....
अरे, जरा ठहरिए, आप मुझे बिलकुलै बुड़बक समझते हैं का.... मैं ऐसा कुछ नहीं करने जा रहा हूं। मैं उदय जी भइया साहब कुंवर से अकेले क्यों बिगाड़ लूं। डटे रहो उस्ताद।
अब मैं सिर्फ किसी पेड़ से कहूंगा कि राजा के सिर में सींग जमी है।
Saturday, July 11, 2009
उदयप्रकाश पर दो-चार बातें खरी-खरी
- उदयप्रकाश मेरी राय में हमारे समय के सबसे सफल रचनाकारों में से हैं। हिंदी के इस समय के संभवत: अकेले सुपर स्टार। जैसे कि बॉलिवुड में अमिताभ बच्चन हैं या फिर मॉलिवुड में रजनीकांत। हिंदी साहित्य के दो कौड़ी के या महान कहे जाने वाले और ताल-तिकड़म से हासिल होने वाले पुरस्कारों से अलग एक कामयाब साहित्यकार।
- उदयप्रकाश किसी से भी पुरस्कार लें या न लें, ये उन्हें ही तय करना है। जैसे कि मुझे ये तय करने का अवसर मिला होता तो मैं आदित्यनाथ के हाथों कोई पुरस्कार लेना शायद स्वीकार नहीं करता। लेकिन चूंकि इसका अवसर आया नहीं है, इसलिए अपने आचरण के बारे में ये एक हायपोथेटिकल स्थिति ही है। मिसाल के तौर पर जब मै नौकरी नहीं करता था तो मुझे लगता था कि मैं किसी की नौकरी नहीं कर पाऊंगा। मुझे लगता है कि किसी को भी कांग्रेस के किसी नेता से कोई पुरस्कार नहीं लेना चाहिए क्योंकि वो देश में अब तक हुए ज्यादातर दंगों के पीछे यही पार्टी है। सिख विरोधी दंगा कांग्रेस का इतना बड़ा अपराध है कि उसके नेता पुरस्कार देने के लिए नाकाबिल ठहरा दिए जाने चाहिए। नरेंद्र मोदी ने जिस तरह गुजरात में दंगाइयों को भड़काया, वही काम तो राजीव गांधी ने अपनी मां की हत्या के बाद किया था (पेड़ गिरने पर धरती हिलने वाला बयान आपको याद होगा)। बुद्धदेव भट्टाचार्य और सीपीएम के नेताओं से तो सिंगुर, नंदीग्राम और लालगढ़ के कुकर्मों के कारण कोई पुरस्कार नहीं लेना चाहेगा। बेशुमार नरसंहारों में निजी सेनाओं के साथ षड्यंत्र में शरीक रहे लालू प्रसाद और उनकी पार्टी के नेताओं से भी पुरस्कार और सम्मान नहीं लिए जाने चाहिए। रामपुर तिराहा कांड की वजह से मुलायम सिंह यादव भी पुरस्कार देने के काबिल नहीं हैं। इन पार्टियों के सरकार में रहते समय क्या सरकारी नौकरी करना, सरकारी कमेटियों और पदों पर बैठना अनैतिक नहीं है? इस मामले में पत्थर फेंकने का अधिकार उन्हें ही होना चाहिए, जो किसी "पाप" में शरीक नहीं है। हम खुद तो सेठों की नौकरी करें, और दूसरों से क्रांति के लिए सबकुछ छोड़ देने की उम्मीद करें, ये गैरवाजिब है। खासकर तब जबकि सामने वाला कह भी न रहा हो कि वो क्रांति कर रहा है या क्रांति करना चाहता है।
- उदयप्रकाश के बारे में अनिल यादव की टिप्पणी तीखी है लेकिन मेरी राय में गलत नहीं है। अनिल यादव को पूरा हक है कि किसी रचनाकार से कैसे आचरण की अपेक्षा करें। रचनाकार का जीवन पूरी तरह निजी नहीं हो सकता। उदयप्रकाश के लेखन और उनके अब तक के व्यवहार के आधार पर अनिल यादव को लगता है कि उदयप्रकाश को आदित्यनाथ के हाथों पुरस्कार या सम्मान नहीं लेना चाहिए। तरुण विजय या किसी भाजपाई साहित्यकार से तो वो इसकी अपेक्षा नहीं कर रहे हैं। मेरी भी उदयप्रकाश से वैसी ही उम्मीद है, जैसी उम्मीद अनिल यादव को है। उदयप्रकाश की ये संघी या जातिवादी आलोचना नहीं है। अनिल यादव क्या इस बारे में इसलिए बात न करें कि वो पायोनियर मैं नौकरी करते हैं?
- अनिल यादव की टिप्पणी पर बिफरकर उदयप्रकाश ने कबाड़खाना और उसके मुख्य मॉडरेटर के बारे में जो लिखा है और जैसी भाषा का इस्तेमाल किया है, वो गलत है। उदयप्रकाश से मेरी अपेक्षा है कि वो अपनी उस टिप्पणी को दोबारा पढ़ेंगे और जो उन्हें अनुचित लगे, उन्हें वापस ले लेंगे। जिस उदयप्रकाश का मैं इतने साल से फैन हूं, उनसे मैं ऐसे ही व्यवहार की उम्मीद करता हूं। (यहां ये स्पष्ट करना जरूरी है कि उनसे मेरी अब तक मुलाकात नहीं हुई है और हम कहीं टकरा गए तो एक दूसरे को पहचान भी नहीं पाएंगे)। हालांकि वो ऐसा न करें तो कोई आसमान नहीं फट जाएगा। कबाड़खाना की एक लोकतंत्रिक मंच के रूप में अहमियत इससे कम नहीं हो जाएगी। कबाड़खाना की ये ताकत है कि कोई यहां आकर कबाड़खाना को गालियां दे सकता है और इसके बावजूद इस मंच का बना रह सकता है। मेरा निजी अनुभव मुझे ये मानने से रोकता है कि कबाड़खाना कोई जातिवादी मंच है। लोकतांत्रिक मंच होने के कारण मैं इसे जातिवाद विरोधी मंच मानता हूं। अनिल यादव की एक आलोचना भर से उदयप्रकाश को ये मंच जातिवादी लगने लगा, ये आश्चर्यजनक है।
- मैं उदयप्रकाश से ये भी उम्मीद करता हूं कि हिंदी साहित्य में जातिवादी सड़न पर वो वैसी ही खरी-खरी बातें करते रहेंगे, जैसा कि वो अब तक करते रहे हैं। हिंदी साहित्य में सड़ांध बहुत बढ़ गई है। हिंदी साहित्य के मठ अब टूटने ही चाहिए। इन मठों पर खास जातियों के महानुभावों का कब्जा है, जबकि उनका रचनाकर्म दो पैसे की औकात नहीं रखता। आम तौर पर 500 प्रिंट ऑर्डर के गणित पर चलने वाले हिंदी साहित्य की इस दशा के पापी वहीं हैं जो इन मठों पर जमे बैठे हैं। मैं उनकी चेलामंडली समेत विदाई की और उनके नाश की कामना करता हूं। हिंदी भाषा का मठाधीशी साहित्य मर चुका है। नया हिंदी साहित्य संभवत: ब्लॉग पर रचा जाएगा। इसकी शुरुआत हो चुकी है। हिंदी के पंडितों को न इसकी समझ है, न ही परवाह। हिंदी के ज्यादातर साहित्कारों का कंप्यूटर ज्ञान शून्य है। सामंती मिजाज के ये महानुभाव टाइपिंग करते नहीं, कराते हैं। मनोरंजन की दुनिया में हिंदी के विस्फोट से पैदा हुए अवसर उन्हें छुए बगैर निकल गए हैं। उदयप्रकाश कम से कम ब्लॉग पर तो हैं और इसी नाते हम उन्हें कोस भी सकते हैं और उनसे पूछे गए सवालों के जवाब की अपेक्षा भी करते हैं। वरना हिंदी के ज्यादातर पंडित तो अपने को इतना वलनरेबल बनाने को तैयार ही नहीं है।
- और एक बात जिसका जिक्र पंकज श्रीवास्तव कर रहे हैं वो है हिंदी के बारे में उदयप्रकाश के विचारों को लेकर। देखिए हम सब अपने दिल पर हाथ रखकर पूछें कि क्या हिंदी को लेकर हममें दरअसल कोई रोमांटिसिज्म बचा भी है। मैं मेट्रो शहरों के किसी मध्यवर्गीय हिंदी सेवी या हिंदी प्रेमी को नहीं जानता, जो अपनी संतानों को हिंदी माध्यम में शिक्षा दिला रहा हो। जो भी "समझदार" हैं वो हिंदी के भविष्य के बारे में शंकाएं नहीं पालते और अपने बच्चों का भविष्य खतरे में नहीं डालते। देश के बाकी लोग हिंदी से प्यार करें लेकिन मैं अपने बच्चे को हिंदी माध्यम के स्कूल में नहीं पढ़ा सकता- ये दोहरापन नहीं चलने वाला। हिंदी की बात करने वालों के व्यवहार और व्यक्त किए जाने वाले विचारों में गहरा अंतर्विरोध है। मौजूदा पावर स्ट्रक्चर में हिंदी की ज्ञान और रोजगार की भाषा के रूप में स्थापना आसान नहीं है। इसलिए इस मामले में अब अपने द्वंद्व खत्म कर लेने का समय शायद आ गया है। मैं खुद इस बात का समर्थक हूं कि देश में शिक्षा का माध्यम अगर कुछ लोगों के लिए अंग्रेजी है, तो ये सरासर गलत है और बहुसंख्य आबादी के बच्चों को अच्छे रोजगार से वंचित रखने का षड्यंत्र है। उदयप्रकाश कुछ अलग तर्कों के आधार पर हिंदी सहित्य संसार को ब्राह्मणवादी और अंग्रेजी को प्रगतिशील मान रहे हैं। इस पर बहस होनी चाहिए। इस आधार पर किसी को खारिज नहीं कर देना चाहिए कि इतने समय तक हिंदी की रोटी खाने के बाद अब अंग्रेजी का गाने लगे।
- उदयप्रकाश किसी से भी पुरस्कार लें या न लें, ये उन्हें ही तय करना है। जैसे कि मुझे ये तय करने का अवसर मिला होता तो मैं आदित्यनाथ के हाथों कोई पुरस्कार लेना शायद स्वीकार नहीं करता। लेकिन चूंकि इसका अवसर आया नहीं है, इसलिए अपने आचरण के बारे में ये एक हायपोथेटिकल स्थिति ही है। मिसाल के तौर पर जब मै नौकरी नहीं करता था तो मुझे लगता था कि मैं किसी की नौकरी नहीं कर पाऊंगा। मुझे लगता है कि किसी को भी कांग्रेस के किसी नेता से कोई पुरस्कार नहीं लेना चाहिए क्योंकि वो देश में अब तक हुए ज्यादातर दंगों के पीछे यही पार्टी है। सिख विरोधी दंगा कांग्रेस का इतना बड़ा अपराध है कि उसके नेता पुरस्कार देने के लिए नाकाबिल ठहरा दिए जाने चाहिए। नरेंद्र मोदी ने जिस तरह गुजरात में दंगाइयों को भड़काया, वही काम तो राजीव गांधी ने अपनी मां की हत्या के बाद किया था (पेड़ गिरने पर धरती हिलने वाला बयान आपको याद होगा)। बुद्धदेव भट्टाचार्य और सीपीएम के नेताओं से तो सिंगुर, नंदीग्राम और लालगढ़ के कुकर्मों के कारण कोई पुरस्कार नहीं लेना चाहेगा। बेशुमार नरसंहारों में निजी सेनाओं के साथ षड्यंत्र में शरीक रहे लालू प्रसाद और उनकी पार्टी के नेताओं से भी पुरस्कार और सम्मान नहीं लिए जाने चाहिए। रामपुर तिराहा कांड की वजह से मुलायम सिंह यादव भी पुरस्कार देने के काबिल नहीं हैं। इन पार्टियों के सरकार में रहते समय क्या सरकारी नौकरी करना, सरकारी कमेटियों और पदों पर बैठना अनैतिक नहीं है? इस मामले में पत्थर फेंकने का अधिकार उन्हें ही होना चाहिए, जो किसी "पाप" में शरीक नहीं है। हम खुद तो सेठों की नौकरी करें, और दूसरों से क्रांति के लिए सबकुछ छोड़ देने की उम्मीद करें, ये गैरवाजिब है। खासकर तब जबकि सामने वाला कह भी न रहा हो कि वो क्रांति कर रहा है या क्रांति करना चाहता है।
- उदयप्रकाश के बारे में अनिल यादव की टिप्पणी तीखी है लेकिन मेरी राय में गलत नहीं है। अनिल यादव को पूरा हक है कि किसी रचनाकार से कैसे आचरण की अपेक्षा करें। रचनाकार का जीवन पूरी तरह निजी नहीं हो सकता। उदयप्रकाश के लेखन और उनके अब तक के व्यवहार के आधार पर अनिल यादव को लगता है कि उदयप्रकाश को आदित्यनाथ के हाथों पुरस्कार या सम्मान नहीं लेना चाहिए। तरुण विजय या किसी भाजपाई साहित्यकार से तो वो इसकी अपेक्षा नहीं कर रहे हैं। मेरी भी उदयप्रकाश से वैसी ही उम्मीद है, जैसी उम्मीद अनिल यादव को है। उदयप्रकाश की ये संघी या जातिवादी आलोचना नहीं है। अनिल यादव क्या इस बारे में इसलिए बात न करें कि वो पायोनियर मैं नौकरी करते हैं?
- अनिल यादव की टिप्पणी पर बिफरकर उदयप्रकाश ने कबाड़खाना और उसके मुख्य मॉडरेटर के बारे में जो लिखा है और जैसी भाषा का इस्तेमाल किया है, वो गलत है। उदयप्रकाश से मेरी अपेक्षा है कि वो अपनी उस टिप्पणी को दोबारा पढ़ेंगे और जो उन्हें अनुचित लगे, उन्हें वापस ले लेंगे। जिस उदयप्रकाश का मैं इतने साल से फैन हूं, उनसे मैं ऐसे ही व्यवहार की उम्मीद करता हूं। (यहां ये स्पष्ट करना जरूरी है कि उनसे मेरी अब तक मुलाकात नहीं हुई है और हम कहीं टकरा गए तो एक दूसरे को पहचान भी नहीं पाएंगे)। हालांकि वो ऐसा न करें तो कोई आसमान नहीं फट जाएगा। कबाड़खाना की एक लोकतंत्रिक मंच के रूप में अहमियत इससे कम नहीं हो जाएगी। कबाड़खाना की ये ताकत है कि कोई यहां आकर कबाड़खाना को गालियां दे सकता है और इसके बावजूद इस मंच का बना रह सकता है। मेरा निजी अनुभव मुझे ये मानने से रोकता है कि कबाड़खाना कोई जातिवादी मंच है। लोकतांत्रिक मंच होने के कारण मैं इसे जातिवाद विरोधी मंच मानता हूं। अनिल यादव की एक आलोचना भर से उदयप्रकाश को ये मंच जातिवादी लगने लगा, ये आश्चर्यजनक है।
- मैं उदयप्रकाश से ये भी उम्मीद करता हूं कि हिंदी साहित्य में जातिवादी सड़न पर वो वैसी ही खरी-खरी बातें करते रहेंगे, जैसा कि वो अब तक करते रहे हैं। हिंदी साहित्य में सड़ांध बहुत बढ़ गई है। हिंदी साहित्य के मठ अब टूटने ही चाहिए। इन मठों पर खास जातियों के महानुभावों का कब्जा है, जबकि उनका रचनाकर्म दो पैसे की औकात नहीं रखता। आम तौर पर 500 प्रिंट ऑर्डर के गणित पर चलने वाले हिंदी साहित्य की इस दशा के पापी वहीं हैं जो इन मठों पर जमे बैठे हैं। मैं उनकी चेलामंडली समेत विदाई की और उनके नाश की कामना करता हूं। हिंदी भाषा का मठाधीशी साहित्य मर चुका है। नया हिंदी साहित्य संभवत: ब्लॉग पर रचा जाएगा। इसकी शुरुआत हो चुकी है। हिंदी के पंडितों को न इसकी समझ है, न ही परवाह। हिंदी के ज्यादातर साहित्कारों का कंप्यूटर ज्ञान शून्य है। सामंती मिजाज के ये महानुभाव टाइपिंग करते नहीं, कराते हैं। मनोरंजन की दुनिया में हिंदी के विस्फोट से पैदा हुए अवसर उन्हें छुए बगैर निकल गए हैं। उदयप्रकाश कम से कम ब्लॉग पर तो हैं और इसी नाते हम उन्हें कोस भी सकते हैं और उनसे पूछे गए सवालों के जवाब की अपेक्षा भी करते हैं। वरना हिंदी के ज्यादातर पंडित तो अपने को इतना वलनरेबल बनाने को तैयार ही नहीं है।
- और एक बात जिसका जिक्र पंकज श्रीवास्तव कर रहे हैं वो है हिंदी के बारे में उदयप्रकाश के विचारों को लेकर। देखिए हम सब अपने दिल पर हाथ रखकर पूछें कि क्या हिंदी को लेकर हममें दरअसल कोई रोमांटिसिज्म बचा भी है। मैं मेट्रो शहरों के किसी मध्यवर्गीय हिंदी सेवी या हिंदी प्रेमी को नहीं जानता, जो अपनी संतानों को हिंदी माध्यम में शिक्षा दिला रहा हो। जो भी "समझदार" हैं वो हिंदी के भविष्य के बारे में शंकाएं नहीं पालते और अपने बच्चों का भविष्य खतरे में नहीं डालते। देश के बाकी लोग हिंदी से प्यार करें लेकिन मैं अपने बच्चे को हिंदी माध्यम के स्कूल में नहीं पढ़ा सकता- ये दोहरापन नहीं चलने वाला। हिंदी की बात करने वालों के व्यवहार और व्यक्त किए जाने वाले विचारों में गहरा अंतर्विरोध है। मौजूदा पावर स्ट्रक्चर में हिंदी की ज्ञान और रोजगार की भाषा के रूप में स्थापना आसान नहीं है। इसलिए इस मामले में अब अपने द्वंद्व खत्म कर लेने का समय शायद आ गया है। मैं खुद इस बात का समर्थक हूं कि देश में शिक्षा का माध्यम अगर कुछ लोगों के लिए अंग्रेजी है, तो ये सरासर गलत है और बहुसंख्य आबादी के बच्चों को अच्छे रोजगार से वंचित रखने का षड्यंत्र है। उदयप्रकाश कुछ अलग तर्कों के आधार पर हिंदी सहित्य संसार को ब्राह्मणवादी और अंग्रेजी को प्रगतिशील मान रहे हैं। इस पर बहस होनी चाहिए। इस आधार पर किसी को खारिज नहीं कर देना चाहिए कि इतने समय तक हिंदी की रोटी खाने के बाद अब अंग्रेजी का गाने लगे।
बेईमानी का उदय और चुप्पी साधे हिंदी वीर
उदयप्रकाश को पखाने तक पहुंचना ही था। रंगे हाथ पकड़े जाने के बाद अक्सर ऐसा ही होता है। उदय प्रकाश हिंदी के एक प्रतिभाशाली लेखक हैं। उन्हें दर्द है कि उन्हें लांछित किया गया, समझा नहीं गया। पर ये समस्या तो नब्बे फीसदी लोगों की है। इससे उनके धतकरम जायज नहीं हो जाते।
उदय प्रकाश किस कदर अपने पाठकों से बेईमानी कर रहे हैं उसे जानने के लिए उनके ब्लाग पर ही चले जाइए। जनाब ने पूर्वाचल से लौटकर 9 जुलाई को जो पोस्ट लिखी उसका नाम दिया "कुशीनगर से लौटकर।" बहुत अच्छे। इसमें एक-आध बार ये भी लिख दिया कि वे गोरखपुर भी गए थे। लेकिन ये नहीं बताया कि गोरखपुर में उनका सम्मान भी हुआ और वो भी योगी आदित्यनाथ के हाथों। कबाड़खाना में अनिल यादव की पोस्ट आने के पुनश्च लिखना पड़ा। आखिर ये इतनी ही सम्मानजनक बात थी तो छिपाई क्यों महाराज।
इसके बाद भी वे जो लिख रहे हैं, उसमें भी वे इस विषय पर कोई सीधी बात करने को तैयार नहीं हैं। प्रलाप यही कि उनके खिलाफ षड़यंत्र हो रहा है। बढ़ते-बढ़ते ये बात यहां तक पहुंचती है कि हिंदी पट्टी में कोई विभूति जन्मी ही नहीं। अब बुद्ध, महावीर की उन्हें याद दिलाना तो फिजूल है ही, कबीर की बात भी वे भूल गए। बहुत पुरानी बात है..?..तो प्रेमचंद क्या गऊपट्टी में नहीं नागपुर में पैदा हुए थे। जिन त्रिलोचन और नागार्जुन पर वे कभी फिदा रहे होंगे वो भी इसी माटी के बने थे। हां भगत सिंह नहीं पैदा हुए, पर चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, अश्फाकउल्ला खां, रोशन सिंह जैसे उनके हमप्याला और हमनिवाला में जान इसी गोबरपट्टी ने फूंकी थी।
कितना बुरा लग रहा है कि एक कठपेलई पर उतारू लेखक की वजह से दुनिया को बदलने की समझ देने वालों के क्षेत्र पर विचार हो रहा है।
तुर्रा ये कि अब अशोक पांडेय के जवाब पर टिप्पणी करते हुए जनाब ये भी बता रहे हैं कि उनके साथ योगी आदित्यनाथ ने ज्यादा बेहतर व्यवहार किया। बेहतर व्यवहार तो हिटलर ने भी कइयों के साथ किया होगा तो क्या यहूदियों को गैस चैंबर में झोंकने का अपराध कम हो जाता है। हिटलर के हाथ क्या कोई संवेदनशील लेखक पुरस्कार ले सकता था।
वैसे, हिंदीवालों के प्रति उदयप्रकाश जैसा व्यवहार कर रहे हैं, शायद वो उसी के लायक हैं। वरना इस विराट चुप्पी का अर्थ क्या है। क्यों नहीं तमाम संगठन और विचारधारा से जुड़े लेखक उदयप्रकाश के कृत्य की सार्वजनिक निंदा कर रहे हैं। ये कैसी गिरोहबंदी है जिसमें उदयप्रकाश से बैर लेने की हिम्मत नहीं पड़ रही है। मोर्चा लिया तो अनिल यादव ने जो पत्रकार के नाते उनका धर्म भी था। लेकिन उदयप्राश बताने लगे कि अनिल के अखबार के मालिक उनके जेएनयू के दिनों के दोस्त हैं। धमकी देने का क्या अंदाज है उदयप्रकाश का। करीने से बता दिया कि नौकरी ले सकते हैं। ज्याद चूं-पूं न करो।
अब अंदाजा ही लगाया जा सकता है कि बाकी नामवर लेखकों को क्या कहकर उन्होंने मुंह सिलने को मजबूर किया होगा।
और अशोक भाई, उदयप्रकाश तमाम किस्से गढ़ सकते हैं, लेकिन योगी आदित्यनाथ के हाथ सम्मानित होने के सीधे सवाल पर पखाने ही पहुंचेंगे। ऐसे गंधाते लोगों का कबाड़खाना में बना रहना कबाड़ियों का अपमान है। हटाओ इन्हें। कम से कम हम दोस्तों के चुनाव में तो सतर्क रहे।
उदय प्रकाश किस कदर अपने पाठकों से बेईमानी कर रहे हैं उसे जानने के लिए उनके ब्लाग पर ही चले जाइए। जनाब ने पूर्वाचल से लौटकर 9 जुलाई को जो पोस्ट लिखी उसका नाम दिया "कुशीनगर से लौटकर।" बहुत अच्छे। इसमें एक-आध बार ये भी लिख दिया कि वे गोरखपुर भी गए थे। लेकिन ये नहीं बताया कि गोरखपुर में उनका सम्मान भी हुआ और वो भी योगी आदित्यनाथ के हाथों। कबाड़खाना में अनिल यादव की पोस्ट आने के पुनश्च लिखना पड़ा। आखिर ये इतनी ही सम्मानजनक बात थी तो छिपाई क्यों महाराज।
इसके बाद भी वे जो लिख रहे हैं, उसमें भी वे इस विषय पर कोई सीधी बात करने को तैयार नहीं हैं। प्रलाप यही कि उनके खिलाफ षड़यंत्र हो रहा है। बढ़ते-बढ़ते ये बात यहां तक पहुंचती है कि हिंदी पट्टी में कोई विभूति जन्मी ही नहीं। अब बुद्ध, महावीर की उन्हें याद दिलाना तो फिजूल है ही, कबीर की बात भी वे भूल गए। बहुत पुरानी बात है..?..तो प्रेमचंद क्या गऊपट्टी में नहीं नागपुर में पैदा हुए थे। जिन त्रिलोचन और नागार्जुन पर वे कभी फिदा रहे होंगे वो भी इसी माटी के बने थे। हां भगत सिंह नहीं पैदा हुए, पर चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, अश्फाकउल्ला खां, रोशन सिंह जैसे उनके हमप्याला और हमनिवाला में जान इसी गोबरपट्टी ने फूंकी थी।
कितना बुरा लग रहा है कि एक कठपेलई पर उतारू लेखक की वजह से दुनिया को बदलने की समझ देने वालों के क्षेत्र पर विचार हो रहा है।
तुर्रा ये कि अब अशोक पांडेय के जवाब पर टिप्पणी करते हुए जनाब ये भी बता रहे हैं कि उनके साथ योगी आदित्यनाथ ने ज्यादा बेहतर व्यवहार किया। बेहतर व्यवहार तो हिटलर ने भी कइयों के साथ किया होगा तो क्या यहूदियों को गैस चैंबर में झोंकने का अपराध कम हो जाता है। हिटलर के हाथ क्या कोई संवेदनशील लेखक पुरस्कार ले सकता था।
वैसे, हिंदीवालों के प्रति उदयप्रकाश जैसा व्यवहार कर रहे हैं, शायद वो उसी के लायक हैं। वरना इस विराट चुप्पी का अर्थ क्या है। क्यों नहीं तमाम संगठन और विचारधारा से जुड़े लेखक उदयप्रकाश के कृत्य की सार्वजनिक निंदा कर रहे हैं। ये कैसी गिरोहबंदी है जिसमें उदयप्रकाश से बैर लेने की हिम्मत नहीं पड़ रही है। मोर्चा लिया तो अनिल यादव ने जो पत्रकार के नाते उनका धर्म भी था। लेकिन उदयप्राश बताने लगे कि अनिल के अखबार के मालिक उनके जेएनयू के दिनों के दोस्त हैं। धमकी देने का क्या अंदाज है उदयप्रकाश का। करीने से बता दिया कि नौकरी ले सकते हैं। ज्याद चूं-पूं न करो।
अब अंदाजा ही लगाया जा सकता है कि बाकी नामवर लेखकों को क्या कहकर उन्होंने मुंह सिलने को मजबूर किया होगा।
और अशोक भाई, उदयप्रकाश तमाम किस्से गढ़ सकते हैं, लेकिन योगी आदित्यनाथ के हाथ सम्मानित होने के सीधे सवाल पर पखाने ही पहुंचेंगे। ऐसे गंधाते लोगों का कबाड़खाना में बना रहना कबाड़ियों का अपमान है। हटाओ इन्हें। कम से कम हम दोस्तों के चुनाव में तो सतर्क रहे।
Friday, July 10, 2009
आपको कैसा लगा ?


(फ़ोटो और समाचार अमर उजाला, ६ जुलाई २००९ से साभार)
"और अंत में प्रार्थना" (जिसके नाट्य रूपांतर के मंचन पर कई शहरों में सांप्रदायिक तत्वों ने हमले किए) लिखने वाले मेरे प्रिय कथाकार (आज शाम तक) एवं कबाड़ी उदय प्रकाश ने पांच जुलाई को गोरखपुर में गोरक्षपीठ के उत्तराधिकारी, भाजपा सांसद योगी आदित्य नाथ के हाथों पहला 'नरेंद्र स्मृति सम्मान' साभार प्राप्त किया। रकम कितनी थी, पता नहीं। डा. कुंवर नरे्द्र प्रताप सिंह जिनका कुछ समय पहले निधन हो गया, योगी के संरक्षकत्व में चलने वाले दिग्विजय नाथ पीजी कालेज के प्रिंसिपल और गोरक्षनाथ पीठ के सलाहकार थे।
भाजपा सांसद योगी को आप जानते ही होगे। वरूण गांधी के उदय के पहले उन्हें पूरब का प्रकाश और नरेंद्र मोदी कहा जाता था और एक नारा "गोरखपुर में रहना है तो योगी-योगी कहना है", वे क्या हैं इसकी बानगी देता है।
इस समारोह में हिंदी के एक और प्रतिष्ठित साहित्यकार परमानंद श्रीवास्तव भी सुशोभित थे। जो उदय प्रकाश ने अब किया वह परमानंद बहुत पहले कर चुके हैं। कोई चार-पांच साल पहले राम मंदिर आंदोलन के प्रमुख नेता एवं गोरक्षपीठ के महंत अवैद्यनाथ ने गोरखपुर के नवरत्नों का सम्मान किया था, तब स्थानीय कलक्टर के साथ परमानंद भी सम्मानित ही नही हुए थे उन्होंने महंत की चरण रज माथे से लगाकर अपना आभार ज्ञापन भी किया था।
उदय प्रकाश ने अपने भाषण में कहा कि नरेंद्र प्रताप सिंह कभी वैचारिकता से विचलित नहीं हुए और शिक्षा से प्यार के कारण उन्होने डिप्टी कलक्टरी की नौकरी तक छोड़ दी। छोड़ने के बाद लिखा भी- मुझसे डिप्टी गिरी नही होगी। अपनी खपरैल कहां कम है। अगले दिन नरेंद्र प्रताप सिंह के बेटे को गोरखपुर के प्रेमचंद पुस्तकालय में अपने प्रशंसकों से यह कहते हुए मिलवाया कि इनसे मिलिए ये मेरे भतीजे कुंवर सामंत राज सिंह हैं।
भाजपा सांसद योगी ने कहा कुंवर नरेंद्र प्रताप सिंह ने कालेज प्रिंसिपल एवं गोरक्षपीठ के सलाहकार के रूप में जो योगदान दिया वह अविस्मरणीय है।
मुझे पता नहीं क्यों उनकी एक कहानी दद्दू तिवारी-गणनाधिकारी की कनक्लूडिंग लाइनें याद आ रही हैं-
सुबह जब वे नाके की ओर अपनी ड्यूटी पर जा रहे थे तो गली में खेलते दो-तीन बच्चों ने उन्हें देखकर जोर से नारा लगाया-
दद्दू तिवारी
गन्ना धिकारी
मारा कसके
है पटवारी.....
और भाग गए।
दद्दू तिवारी के पैरों को कोई वजनी चीज खींच रही थी और एक अथाह सन्नाटा उनके कान में बजने लगा था।
आपको कैसा लगा बताइएगा।
(पोस्ट पर आई पंकज श्रीवास्तव की टिप्पनी में सन्दर्भित इकॉनॉमिक टाइम्स वाले लेख का लिंक : English in postcolonial India is a language of liberation and modernity)
Tuesday, January 1, 2008
आज उदय प्रकाश जी का जन्मदिन है
Sunday, December 30, 2007
छ्प्पन तोले की करधन के मालिक नए कबाड़ी का स्वागत

हिन्दी साहित्य में उदय प्रकाश जी का नाम किसी परिचय का मोह्ताज नहीं है. समय समय पर अपने रचनाकर्म से हमें आनन्दित और उत्तेजित करने वाले उदय जी को भारत से बाहर भी जाना और प्रशंसित किया जाता है. विएना में रहने वाली मेरी मित्र बेआत्रीस रिक्रोथ ने जब पिछले साल मुझे उदय जी की कुछ रचनाओं का जर्मन अनुवाद दिखाया था तो जाहिर है मुझे बहुत प्रसन्नता हुई थी. अब जब मेरे इसरार पर उन्होंने कबाड़ख़ाने में आने की सहमति दी है तो आप समझ सकते हैं यह किसी उपलब्धि से कम नहीं है हम सब के लिए. उन्हीं की एक शुरुआती कहानी का शीर्षक उधार ले कर मुझे यह सूचित करने में हर्ष हो रहा है कि निखालिस सोने से बनी छ्प्पन तोले की करधन का मालिक भी आज से कबाड़ी बन गया है. जय हो.
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