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Thursday, March 10, 2016

दस मार्च को तेनज़िन त्सुन्दू के लिए रीपोस्ट - 5


तिब्बतपन

तेनज़िन त्सुंदू

निर्वासन के उन्तालीस साल. 
तो भी कोई देश हमारा समर्थन नहीं करता.
एक भी देश तक नहीं!

हम यहाँ शरणार्थी हैं.
खो चुके एक देश के लोग.
किसी भी देश के नागरिक नहीं.

तिब्बती - दुनिया की सहानुभूति के पात्र;
शांत मठवासी और जिंदादिल परम्परावादी;
एक लाख और कुछ हज़ार
अच्छे से घुले-मिले हुए 
आत्मसात कर लेने वाले तमाम सांस्कृतिक आधिपत्यों में.

हरेक चेक-पोस्ट और दफ्तर में
मैं एक "भारतीय - तिब्बती" हूँ.
मुझे हर साल अपना रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट
रिन्यू करना होता है एक सलाम के साथ -
भारत में जन्मा एक शरणार्थी.

मैं भारतीय अधिक हूँ.
सिवा अपने चपटे तिब्बती चेहरे के.
"नेपाली?" "थाई?" "जापानी?"
"चीनी?" "नागा?" "मणिपुरी?"
कोई नहीं पूछता - "तिब्बती?"

मैं तिब्बती हूँ.
अलबत्ता मैं तिब्बत से नहीं आया.
कभी गया भी नहीं वहां.
तो भी सपना देखता हूँ
वहां मरने का.        

दस मार्च को तेनज़िन त्सुन्दू के लिए रीपोस्ट - 4


मेरी मुम्बई कथा

- तेनज़िन त्सुन्दू

मैं तिब्बती समुदाय से बच भागने को मुम्बई आया था. १९९७ में बिना कागज़ात के तिब्बत चला गया था जहां मुझे चीनी सीमा पुलिस ने गिरफ्तार किया था. तीन महीने की पिटाई, अपमान और मानसिक यंत्रणा के बाद मुझे तिब्बत से बाहर फेंक दिया गया. मुझे सहारा देने के बजाय, मेरे रिश्तेदारों ने मुझे बहुत झिड़का कि मैंने जाने से पहले उन्हें सूचित क्यों नहीं किया था. वे मुझ पर चिल्लाए कि मेरी वजह से उन्हें बेहद मानसिक त्रास से गुजरना पड़ा – इस बात का अहसास किये बिना कि जेल में महीनों तक पुलिस की बर्बरता और जांच-पड़ताल के बाद मैं किस अनुभव से गुज़र रहा था. 

मुम्बई कोई टिपिकल तिब्बती अड्डा नहीं है. शहर में बमुश्किल तीस से अधिक तिब्बती रहते हैं जो रेस्तरांओं में काम करते हैं, नूडल बनाते हैं और आजकल सूचना-प्रौद्योगिकी में काम करने वाले युवा इनमें हैं. जाड़ों में करीब दो सौ तिब्बती शहर में आकर स्वेटरें बेचने का काम करते हैं; दो महीने के बाद प्रवासी पक्षियों की तरह वे वापस अपने शरणार्थी कैम्पों में चले जाते हैं ताकि लोसर मना सकें. चंद्रमा पर आधारित पंचांग के अनुसार तिब्बती नववर्ष लोसर फरवरी के आसपास पड़ा करता है. मुम्बई में स्वेटर बेचने वाले तिब्बतियों का आगमन शहर में सर्दियों के आने की घोषणा जैसा होता है, जहाँ अन्यथा केवल दो ही मौसम होते हैं – गर्मियां और बरसातें. जब मैं मुम्बई आया था, फिल्मों के प्रचार के लिए लगे बड़े-बड़े होर्डिंग्स में से रानी मुखर्जी मुझे देखकर मुस्करा रही थी. साधारण तिब्बतियों के लिए बंबई किसी स्वप्न-सरीखी मिथकीय नगरी थी जिसे उन्होंने अमिताभ बच्चन की फिल्मों में देखा था; बड़ा शहर, बड़ा पैसा और ढेर सारे गुंडे. इसे बॉलीवुड अभिनेताओं के लिए भी जाना जाता है, सो लोग मुझसे अक्सर ककगते हैं कि मैं उनके लिए आमिर खां और ऐश्वर्या राय की असली फोटूएं लेकर आऊँ. औसत तिब्बती की समझ में इस शहर को मुम्बई कहे जाने के पीछे के आग्रह का पचड़ा समझ में नहीं आता. सो आज तिब्बती इसे बीच के एक नाम से पुकारते हैं – मुम्बे.

यहाँ पहले तिब्बती १९५० की शुरुआत में आये थे जब यह बंबई ही था और तिब्बत भी एक आज़ाद देश था. दार्जिलिंग और कालिम्पोंग में बस चुके तिब्बती अपने नज़दीक के बंदरगाह-नगर कलकत्ता में अक्सर जाया करते थे. लेकिन बंबई आये हुए तिब्बती चीन में १९४९ की कम्युनिस्ट क्रान्ति के बाद भागे चीनियों के साथ आये थे. वे नूडल व्यवसाय के मित्र थे.

आज भी, मुम्बई के कुछ बेहतरीन रेस्तराओं में नूडल की आपूर्ति शहर की छोटी तिब्बती नूडल फैक्ट्रियों से होती है. कोई बीस नौजवान ‘चाइनीज़’ रेस्तराओं में रसोइये का काम करते हैं. इस प्रत्यक्ष राजनैतिक विरोधाभास पर एक पत्रकार का जवाब एक बार चालीस साल के कुंगा ने दिया था जिन्होंने इस पेशे के लिए कोई तीस तिब्बती युवाओं को प्रशिक्षित किया था. उनका स्पष्टीकरण था: “खाना पकाना एक कौशल होता है, चाहे आप तिब्बती खाना बनें, चीनी या दक्षिण भारतीय.”

बंबई आये पहले तिब्बतियों को लेकर एक मिथकीय किस्सा चलता है, कहानी के मुताबिक़ उनके एक समूह ने एक डबल डेकर बस की ऊपरी मंजिल पर सीटें लीं. बस ने घर्राना शुरू किया और वह स्टार्ट होने को ही थी. तभी सारे तिब्बती हड़बड़ी में नीचे उतर आये. कंडक्टर ने पूछा कि भाई माजरा क्या है. वे सारे एक साथ चिल्लाए: “ऊपर कोई ड्राइवर नहीं है और बस तब भी चल रही है.” पता नहीं यह किस्सा सच है या नहीं लेकिन तिब्बतियों के बीच यह आज तक चल रहा है. और यह किस्सा साबित करता है कि तिब्बती बहुत चौकन्ने होते हैं और हर मामले को लेकर दोहरी सुनिश्चितता रखना चाहते हैं.

इस महानगर में, जो कि मुम्बई है, तिब्बती में बात करना और हंसना किस कदर प्रफुल्लित करने वाला होता है. किसी दुर्लभ मौके पर जैसे परमपावन दलाई लाम के जन्मदिन पर, सभी तिब्बती नाचने-गाने और बढ़िया तिब्बती भोजन के लिए इकठ्ठा होते हैं. ट्रैफिक के शोर और नज़दीकी चाल में बज रहे किसी बॉलीवुड गीत की पृष्ठभूमि में से कोई एक पहाड़ी गीत छेड़ देता है. अपने तिब्बती मेहमानों को हम समुद्र का विस्तार दिखाने मरीन ड्राइव लेकर जाते हैं. वहीं शहर में रहने को नए आने वालों को हम रश आवर्स में मुंबई की लोकल ट्रेनों में प्रशिक्षण दिया करते हैं.

बच भागने के अलावा, मैं यहाँ आगे की पढ़ाई करने भी आया था. बंबई विश्वविद्यालय के कालीना कैम्पस में साहित्य और दर्शनशास्त्र पढ़ने के साथ ही मैंने यहीं लिखना भी शुरू किया. मैंने डॉम मोराईस, निसीम एज़ेकील, आदिल जस्सावाला और अरुण कोल्हटकर जैसे स्थापित लेखकों और कलाकारों से मिलना शुरू किया और उनकी कला और उसके प्रति उनके बर्ताव से प्रेरणा लेना शुरू किया. इसके अलावा मैंने रंगमंच अभिनय, ललित कलाओं और प्रदर्शनियों के व्यवसाय, फिल्म निर्माण की भीतरी कहानियों और मीडिया संबंधों के बारे में बहुत कुछ सीखा.

यह वे वर्ष थे जब मैंने बहुत कड़ी मेहनत की. मेरे पास रहने को कोई जगह नहीं थी क्योंकि मेरे पास पैसा नहीं था. मैं अंधेरी, बोरीवली, कफ परेड, सान्ताक्रुज़ और अम्बोली में दोस्तों के घरों में कैम्प किया करता था. बोरीवली से शहर जाने और  विरार-चर्चगेट की लोकल ट्रेन में पैर जमाने की जगह के लिए जद्दोजहद करना रोज़ की चुनौती था. एक दफा रश आवर में मैं गिरते-गिरते मरने से बचा लेकिन मुझे हैरत हुई कि अगले दिन मैं फिर से उसी ट्रेन में पैर जमाने की जगह खोजने की जद्दोजहद में लगा था. मैं दिनों तक वडा-पाव पर जिंदा रहा, शोक के बारे में कविताएं लिखते मरीन ड्राइव प्रोमेनेड मैं मैंने मूंगफली खाई.

बंबई विश्वविद्यालय से एमए के बाद अपने सहपाठियों से चंदा करके कविताओं की अपनी पहली किताब छपवाई. बाद में हमने उसकी प्रतियाँ कॉलेजों और क्रॉसवर्ड, पृथ्वी थियेटर, एनसीपीए और पोयट्री सर्कल जैसी जगहों पर होनेवाले कविता-पाठ समारोहों में बेचा. २००१ में मुझे पहला आउटलुक-पिकाडोर अखिल भारतीय निबंध लेखन पुरुस्कार मिला; चूंकि तब मैं मुम्बई में रह रहा था, मीडिया में रपट छपी, “मुम्बई के छात्र ने निबंध प्रतियोगिता जीती.” मैं एक मुम्बईकर के तौर पर स्वीकृत किये जाने पर प्रसन्न था.

विश्वविद्यालय के कैम्पस में इकलौता तिब्बती था. मुझे तिब्बतियों की कमी खलती थी पर मैंने ढेर सारे भारतीय मित्र बनाए. सच तो यह है कि आज मेरे भारतीय मित्र ज़्यादा हैं तिब्बती कम. अब मैं यहाँ हिमालय में रहता हूँ, धर्मशाला नाम के एक हिलस्टेशन में जहाँ परमपावन दलाई लामा का निवासस्थान है. मैं तिब्बत से सम्बंधित कई कारणों से मुम्बई अता हूँ और मैं जब भी यहाँ आता हूँ मुझे तमाम दोस्तों से मिलना होता है. मैं मुम्बई में किसी भी जगह पर रह और खा सकता हूँ. मैं मुम्बई की मनःस्थिति, भाषा, संस्कृति और चलता है वाले नज़रिए के साथ कम्फर्टेबल महसूस करता हूँ. इन सब कारणों से मुझे मुम्बई घर जैसा लगता है.

तिब्बत के मामले को लेकर मुम्बई में सहानुभूति पाई जाती है. वर्ष २००२, जब चीन के राष्ट्रपति झू रोंग्ज़ी ने शहर का दौरा किया तो मैंने ओबेरॉय होटल (अब हिल्टन) की स्कैफोल्डिंग पर चढ़कर अपना विरोध दर्ज कराया. चौदहवीं मंजिल से टंगकर मैंने “तिब्बत को आज़ाद करो” लिखा हुआ एक बैनर फहराया. हमें दुनिया भर में मीडिया कवरेज हासिल हुई लेकिन जिस तरह मुम्बई के अखबारों ने उसे पहले पन्ने पर जगह दी और जनता का जैसा समर्थन मिला, वैसा कुछ कहीं और नहीं हुआ. अचानक ही यह हुआ कि तिब्बत के स्वतंत्रता संग्राम में मुम्बई ने अपनी जगह बना ली. उस रात मुझे देर तक कफ़ परेड पुलिस स्टेशन में रहना पड़ा लेकिन मेरे लिए वह मुम्बई में मेरे सबसे यादगार पल थे.

लेकिन खुद तिब्बती समाज के भीतर आन्दोलन को मज़बूत बनाए बगैर किसी भी तरह का बाहरी समर्थन किसी काम का नहीं होगा. उसके लिए मुझे ज़रुरत थी तिब्बती समाज के भीतर काम करने की, सो मैं मुम्बई से चला गया, लेकिन केवल शरीर के तौर पर. मेरा सपना है तिब्बत को चीनी कब्ज़े से मुक्त कराकर वहां अपने घर का पुनर्निर्माण करना. तब तक मैं कहीं भी होऊं मेरे पास अपना घर कभी नहीं हो सकता. कानूनी तौर पर हम एक राष्ट्र्हीन जन हैं, दलाई लामा भी उनमें सम्मिलित हैं. कल, जब हम अपनी आज़ादी के बाद तिब्बत वापस चले जाएंगे मैं आमची मुम्बई आना नहीं छोडूंगा.

एक दफा मैं अपने एक दोस्त की चिठ्ठी लेकर उसकी बूढ़ी माँ के पास जा रहा था. मैं अपने पहुँचने के दिन उस चिठ्ठी को नहीं पहुंचा सका. अगले दिन मुझे बताया गया कि पिछली रात उसकी माँ की नींद में मृत्यु हो गयी. वे ७९ साल की थीं. वे हम छोटों को तिब्बत के जीवन के बारे में बताया करती थीं. उनका जीवनवृत्त मैंने घंटों तक सुना था. मैं उन्हें बताता रहता था कि तिब्बत जल्द ही आज़ाद होगा और हम सब अपने घर वापस लौटेंगे. हमने चन्दनवाड़ी के सार्वजनिक संस्कार गृह में उनका अंतिम संस्कार किया. पिछले ही साल हमने दादर के श्मशान में ८० साल के एक वृद्ध का अंतिम संस्कार किया था. बहुत तेज़ी से हमारी बुज़ुर्ग पीढ़ी गायब होती जा रही है जो तिब्बत में रहा करती थी, जिसने चीनी आक्रमण को देखा था, सो जल्द ही हमारे बीच ऐसा कोई नहीं बचेगा जिसने तिब्बत को आज़ाद देखा था और जो हमें चीनियों के हमारे देश में घुस आने के पहले के जीवन के बारे में बता सके. जब तक हम अपनी धरती को वापस नहीं पा लेते हमें अपनी कहानियों को बताते सुनाते चले जाना है अभी जब हम मुम्बई में रह रहे हैं – अपने पहाड़ी घरों से बहुत दूर.

धर्मशाला, जनवरी २००६ 

दस मार्च को तेनज़िन त्सुन्दू के लिए रीपोस्ट - 3


मैं थक गया हूँ

तेनज़िन त्सुन्दू

मैं थक गया हूँ
थक गया हूँ दस मार्च के उस अनुष्ठान से
धर्मशाला की पहाड़ियों से चीखता हुआ.

मैं थक गया हूँ
थक गया हूँ सड़क किनारे स्वेटरें बेचता हुआ
चालीस सालों से बैठे-बैठे, धूल और थूक के बीच इंतज़ार करता 

मैं थक गया हूँ
दाल-भात खाने से
और कर्नाटक के जंगलों में गाएं चराने से.

मैं थक गया हूँ
थक गया हूँ मजनू टीले की धूल में 
घसीटता हुआ अपनी धोती.

मैं थक गया हूँ
थक गया हूँ लड़ता हुआ उस देश के लिए 
जिसे मैंने कभी देखा ही नहीं.

दस मार्च को तेनज़िन त्सुन्दू के लिए रीपोस्ट - 2

2002 में तत्कालीन चीनी राष्ट्रपति झू रोंग्जू भारत के दौरे पर आये थे. इस सिलसिले में वे बंबई के ओबेरॉय टावर्स में भारतीय कूटनीतिकों और व्यापारियों के साथ मीटिंग कर रहे थे जब एक युवा तिब्बती ने अपने दुस्साहस से न केवल ओबेरॉय में उस दिन मौजूद लोगों को हकबका दिया, तिब्बत की आज़ादी का संघर्ष कर रहे लोगों की आवाज़ को नए सिरे से अंतर्राष्ट्रीय मंच भी मुहैया कराया. वह युवक था तेनज़िन त्सुन्दू. 

अपने उसी अनुभव के बारे में बता रहे हैं तेनज़िन. 


अभी और चढूँगा इमारतें और मीनारें 

बचपन की बात है, एक बार मेरे माता-पिता मुझे मेरे दादा-दादी के पास छोड़कर पड़ोस के गाँव में फिल्म देखने चले गए. उनका तर्क था कि मैं रात को चलकर वापस नहीं आ सकूंगा. सो मैंने घर पर पानी रखने वाले बर्तन को फोड़ डाला. मेरी मंशा अपना विरोध जतलाने की थी न कि रसोई में छोटी-मोटी बाढ़ ला देने की.

पिछले महीने, चीन के राष्ट्रपति झू रोंग्ज़ी ने भारत का दौरा किया. यह मेरे लिए ऐसा था जैसे मेरे दुश्मन मुल्क का बड़ा गुंडा टहलता हुआ नज़दीक आ पहुंचे. मैं उन्हें आमने-सामने कहना चाहता था “मेरे देश से बाहर निकलो.” सो मैं स्कैफोल्डिंग चढ़ता हुआ ओबेरॉय टावर्स की चौदहवीं मंजिल तक जा पहुंचा जहाँ झू भारतीय कूटनीतिकों और बड़े व्यवसाइयों को सम्बोधित कर रहे थे. वहां पहुँच कर मैंने तिब्बत का राष्ट्रीय ध्वज फहराया और एक लाल बैनर भी जिसपर लिखा था “तिब्बत को मुक्त करो”, मैंने हवा में करीब ५०० पर्चे भी उड़ाए जिनमें मेरे विरोध और नारों के पक्ष में तर्क दिए गए थे. बहुत समय नहीं लगा जब समूची चौदहवीं मंजिल पर परदे उठाये जाने लगे और चीनी चेहरे मुझे ताकने लगे थे. वह एक क्षण ही उस सब से कहीं अधिक मूल्यवान है. भाग्यवश मैंने कॉन्फ्रेंस रूम में जाकर झू को थप्पड़ मारने का अपना इरादा बदल दिया. बाद में पुलिस की हिरासत में मैंने यह पंक्तियाँ लिखीं:

“वह लम्बा था
कमर पर एवरेस्ट जैसी
उसकी बाँहें
मैंने आरोहण किया एवरेस्ट का
और मैं अधिक ऊंचा था
मुक्त मेरे हाथ थे.”

मेरे उद्देश्य को लेकर पुलिस का रवैया सहानुभूतिपूर्ण था. यह उनके भी फायदे की बात थी. वे जानते थे कि अगर एक बार तिब्बत आज़ाद हो गया तो उन्हें मुझ जैसे छोटे-मोटे प्रदर्शनकारियों और उन एक लाख तिब्बती शरणार्थियों के बारे में फ़िक्र करने की ज़रुरत नहीं रहेगी जो अपने तब देश लौट जाएंगे. उसके साथ एक औए अच्छी बात जो होगी वो यह कि हिमालय से लगी हुई भारतीय सरहद सुरक्षित हो जाएगी. यह १९४९ के बाद इतिहास में पहली बार हुआ था कि तिब्बत पर चीन के कब्ज़े के बाद भारत को अपनी सरहद चीन के साथ साझा करनी पड़ी थी. एक पुलिस अफसर ने मुझसे कहा: “हमें साथ काम करना चाहिए.”  

निर्वासन में तिब्बत की आज़ादी की लड़ाई तिब्बत में चल रही आमने-सामने की लड़ाई के मुकाबले सांकेतिक ज़्यादा है. पिछले चालीस सालों में हम इतना ही कर सके हैं कि असल तिब्बत को एक ऐसे देश की तरह प्रस्तुत कर सकें जहाँ हाड़-मांस के बने वास्तविक लोग रहते हैं और दर्द और क्रोध को महसूस करने की जिनके भीतर समान क्षमता होती है.

हम लोग तिब्बत को एक ऐसे रहस्यमय स्थान के तौर पर समझे जाने के घिसे-पिटे मिथक को ध्वस्त कर सकने में कामयाब रहे हैं जहाँ लामा ज़मीन से दो इंच ऊपर चला करते हैं. लेकिन ऐसा लगता है कि हमारा स्वतंत्रता संग्राम सहानुभूति के उस उच्चबिंदु पर पहुँच चुकने के बाद विकसित होना बंद हो गया है, जहां वह १९८९ में परमपावन दलाई लामा को नोबेल पुरूस्कार मिलने पर पहुँच गया था.  १९७९ से यानी जब से हमारी निर्वासित सरकार ने चीन से बात करना शुरू किया है, तिब्बती स्वतंत्रता संग्राम एक जनांदोलन नहीं रह गया है. जब तक यह एक मज़बूत जनांदोलन नहीं बनता, मैं नहीं समझता कि चीन के साथ संवाद करने का स्वप्न देखने वाली हमारी निर्वासित सरकार तिब्बत को उसकी आजादी दिला सकेगी. तीस साल हो चुके हैं और पाने के नाम पर हमें “बातचीत के बारे में सोचे जाने” के लिए सिर्फ कुछ अस्वीकार्य शर्तें मिली हैं.

हाल ही में तिब्बत से वापस लौटे मेरे एक मित्र का कहना है कि इन दिनों तिब्बत में विश्वस्त दोस्तों का मिलना बहुत मुश्किल है. हर दूसरा आदमी चीनियों का मुखबिर हो सकता है. कार्यकर्ताओं को रात के अँधेरे में उठा लिया जाता है और उनकी मृत देहें शहरों के बाहरी इलाकों में पुनर्प्रकट होती हैं. कुछ को लकवा पड़ने तक पीटा जाता है. मानवाधिकारों के लिए आवाज़ उठाने का कोई भी प्रयास आत्महत्या का पर्यायवाची हो गया है. तिब्बती अपने ही देश में अल्पसंख्यक हैं. आतंक और उत्पीड़न के घने बादल तिब्बत के ऊपर मंडरा रहे हैं.

वर्तमान में उत्तरपूर्वी तिब्बत से ल्हासा के लिए दो रेलवे लाइनें बिछाई जा रही हैं. इससे तिब्बत में चीनियों की बाढ़ आ जाने वाली है जो उसके संसाधनों का भरपूर दोहन करेंगे; पारिस्थिकीय असंतुलन के चलते संसार की छत ढह जायेगी. वह दिन दूर नहीं जब गंगा, ब्रह्मपुत्र यांग्त्से और मेकोंग में रक्त और मृत शरीर बहा करेंगे. तिब्बत में जमा किया जा रही हथियारों और नाभिकीय मिसाइलों का ज़खीरा चीन ने शस्त्रहीन तिब्बतियों के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए इकठ्ठा नहीं किया होगा.

तिब्बत को लेकर एक आम संवेदनहीनता और यह ‘अहिंसक स्वतंत्रता संग्राम’ धीरे-धीरे आन्दोलन को ख़त्म कर रहे हैं. हालांकि एक्ज़ोटिक तिब्बत पश्चिम में अच्छा बिकता है, जब भी वास्तविक मुद्दों की बात आती है, ज्यादा लोग पक्ष में खड़े होते नज़र नहीं आते. वास्तविक मुद्दा आज़ादी का है.

अभी जब मैं यह लिख रहा हूँ, मैं सुन रहा हूँ कि परमपावन गुरु दलाई लामा ने अपने खराब स्वास्थ्य के कारण कालचक्र धार्मिक उत्सव को रद्द कर दिया है. मैं खुश हूँ कि एक लाख से अधिक तिब्बती निराश हुए हैं. अचानक केंद्र खिसक गया है, परिधि गड़बड़ा गयी है और उन सब को दुबारा से चीज़ों को व्यवस्थित करना है. कई लोगों के लिए यह आने वाले समय की और भी बुरी स्थितियों के लिए जाग जाने का आह्वान है.

अगले बीस साल तिब्बत के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं. इन सालों में तिब्बत के भाग्य पर मोहर लग जाएगी: जीवन या मृत्यु. एक बार केंद्र गायब हो गया तो परिधि में उथलपुथल मचेगी. ‘अहिंसक और शांतिप्रेमी तिब्बती’ एक देश की तरह, एक सभ्यता की तरह बचे रहने के लिए एक आख़िरी कोशिश करेंगे. यह सब कितना हिंसापूर्ण होगा?

तिब्बती समस्या की मूल प्रकृति राजनैतिक है और इसका समाधान भी राजनैतिक ही होना चाहिए. भारत ने हमें जो भी सहायता और सहारा दिया है उसके लिए हम उसके आभारी हैं लेकिन अगत तिब्बत की समस्या का समाधान निकाला जाना है तो उसे हमारे स्वाधीनता संघर्ष को समर्थन देना होगा.

अभी बीत कल की बात है जब “हिन्दी-चीनी भाई-भाई” का नारा लेकर आये माओ त्से तुंग ‘मित्रता के बंधन’ से भारत को फंसाने में कामयाब हो गए थे, और उन्होंने ही १९६२ में भारत की पीठ पर छुरा भोंका था. प्रधानमंत्री नेहरू इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर सके थे. और आज झू रोंग्ज़ी “हिन्दी-बाई-बाई-चीनी” कहकर भारत को ‘आर्थिक बन्धनों’ का प्रस्ताव दे रहे हैं. 

चीन को हम लम्बे समय से एक मुश्किल पड़ोसी के रूप में जानते रहे हैं. हम एक हारी हुई लड़ाई लड़ रहे हैं, जब दुनिया हमसे उम्मीद छोड़ चुकी है. हो सकता है हम नष्ट हो जाएं लेकिन यह भारत के लिए कैंसर जैसा एक ज़ख्म छोड़ जाएगा और अपने साथ चीन के साथ ३५०० किलोमीटर की एक स्थाई सीमा भी.

क्या भारत जागृत होकर इस वास्तविकता को पहचानेगा? समय आ है जब हम मिलकर तिब्बत की आज़ादी के लिए और भारत के लिए एक सुरक्षित सीमा के उद्देश्यों के वास्ते संघर्ष करें.


धर्मशाला, मार्च २००२   

दस मार्च को तेनज़िन त्सुन्दू के लिए रीपोस्ट - 1

एक साल पहले आज के दिन मैं धर्मशाला में था. इस यात्रा के प्रमुख उद्देश्यों में प्रमुख था तिब्बत के युवा विद्रोही कवि तेनज़िन त्सुन्दू से मिल पाने की कोशिश करना, जिसकी कुछेक कविताओं के मैंने अनुवाद किये थे और उन्हें कबाड़खाने पर छापा था. उन अनुवादों को ज्ञानरंजन जी ने 'पहल' में भी बहुत प्रमुखता के साथ प्रकाशित किया था. मैक्लोडगंज में घूमते हुए किताबों की एक दुकान से मुझे उसका टेलीफोन नंबर मिल गया. फोन किया तो उसने कहा दस मार्च को वह दो बजे के बाद मिल सकेगा.

मुझे दस मार्च की याद थी क्योंकि इस तारीख का ज़िक्र उसने अपनी एक कविता में किया था. साल १९५९ को इसी दिन निहत्थे और शांतिप्रिय तिब्बतियों ने अपने देश पर हुए चीनी कब्ज़े और अत्याचार के खिलाफ पहला सामूहिक प्रतिरोध किया था.

मैं धर्मशाला में एक होटल में रुका हुआ था. सुबह से ही ऊपर मैक्लोडगंज की दिशा से नारों की आवाज़ आ रही थी. दस बजे के आसपास जब ये आवाजें नज़दीक आना शुरू हुईं तो मैं बाहर निकल आया.

बहुत जल्दी बहुत बड़ी संख्या में नारे लगाता विशाल हुजूम धर्मशाला में मुख्य चौराहे की तरफ बढ़ रहा था. स्कूली लड़के, लड़कियां, बच्चे, बूढ़े, नौजवान, दुधमुंहे बच्चों को छाती से लगाए महिलाएं सब से सब बेहद अनुशासित तरीके से प्रदर्शन कर रहे थे. हर दिशा से लोग आकर उससे जुड़ रहे थे. तभी मुझे तेनज़िन दिख गया.

तेनज़िन को पहचान सकना मुश्किल नहीं था. मैंने उसकी तस्वीरें देखी थीं. वह एक खुले ट्रक के ऊपर माइक थामे लगातार इस पूरे हुजूम को नियंत्रित कर रहा था. 

हज़ारों की भीड़ को इस तरह सम्पूर्ण अनुशासन में रख सकने वाले और उनके संघर्ष की अन्तर्राष्ट्रीय आवाज़ बन जाने वाले तेनज़िन से हुई वह पहली मुलाक़ात अब एक आत्मीय मित्रता में तब्दील हो चुकी है. मैं मैक्लोडगंज में उसके साथ रहने वाले उसके तमाम मित्रों को अच्छे से जानता हूँ और खुद वह पिछले साल अक्टूबर में यहाँ मेरे घर आकर रह गया है. मेरी माँ और मेरे सबसे अच्छे दोस्त उसे जानते हैं और प्यार करते हैं. 

तिब्बत की आज़ादी के संघर्ष की मशाल को जलाए रखने की ज़िद तेनज़िन के जीवन की आग है. वही उसकी कविताओं की आत्मा भी है.

आज के कवि को ऐसा ही होने की ज़रुरत है.

सलाम तेनज़िन.

आज दस मार्च को मैं तुम्हारे मिशन को भी सलाम करता हूँ. आज दिन भर तेनज़िन की रचनाएं पढ़िए कबाड़खाने पर.


ल्हासा, 10 मार्च 1959

देखिये 10 मार्च 2014 की कुछ तस्वीरें:




















Wednesday, March 11, 2015

ये एक कवि की तस्वीरें हैं जनाब

कल यानी दस मार्च को धर्मशाला में
तिब्बत प्रतिरोध दिवस के जुलूस का नेतृत्व करते तेनज़िन त्सुन्दू. फ़ोटो आभार : न्या नेकोडा










आतंकवादी

-तेनज़िन त्सुन्दू

मैं एक आतंकवादी हूँ
मुझे हत्या करने में आनंद आता है.

मेरे सींग हैं
दो विषैले दांत
और ड्रैगनफ्लाई की पूंछ.

अपने घर से भगाया हुआ मैं
डर के मारे छिपा हुआ
बचाता अपना जीवन
दरवाजे भेड़े जाते मेरे चेहरे पर.

लगातार लगातार नहीं मिलता न्याय
धैर्य का इम्तेहान लिया जाता है
टेलीविजन पर, तोड़ा जाता हुआ
एक खामोश बहुमत के सामने
दीवार से सटाया गया,
उस मृत छोर से
लौट कर आया हूँ मैं,

मैं हूँ वह अपमान
जिसे तुमने निगला था
चपटी नाक के साथ.

मैं हूँ वह शर्म
जिसे दफनाया था तुमने अँधेरे में.

मैं आतंकवादी हूँ
गोली मार गिरा दो मुझे

डर और कायरता
मैं छोड़ आया था
घटी में
मिमियाती बिल्लियों
और जीभ लपलपाते कुत्तों के बीच.

मैं अविवाहित हूँ
खोने को
कुछ नहीं मेरे पास.

मैं बन्दूक की गोली हूँ
मैं कुछ नहीं सोचता.

टीन के खोल से
मैं झपटता हूँ
उस दो-सेकेण्ड के जीवन के रोमांच के लिए
और मर जाता हूँ मृतकों के साथ.

मैं जीवन हूँ

जिसे तुम छोड़ आए थे पीछे.

Tuesday, March 10, 2015

एक तिब्बती की मुम्बई दास्तान


मेरी मुम्बई कथा

- तेनज़िन त्सुन्दू

मैं तिब्बती समुदाय से बच भागने को मुम्बई आया था. १९९७ में बिना कागज़ात के तिब्बत चला गया था जहां मुझे चीनी सीमा पुलिस ने गिरफ्तार किया था. तीन महीने की पिटाई, अपमान और मानसिक यंत्रणा के बाद मुझे तिब्बत से बाहर फेंक दिया गया. मुझे सहारा देने के बजाय, मेरे रिश्तेदारों ने मुझे बहुत झिड़का कि मैंने जाने से पहले उन्हें सूचित क्यों नहीं किया था. वे मुझ पर चिल्लाए कि मेरी वजह से उन्हें बेहद मानसिक त्रास से गुजरना पड़ा – इस बात का अहसास किये बिना कि जेल में महीनों तक पुलिस की बर्बरता और जांच-पड़ताल के बाद मैं किस अनुभव से गुज़र रहा था. 

मुम्बई कोई टिपिकल तिब्बती अड्डा नहीं है. शहर में बमुश्किल तीस से अधिक तिब्बती रहते हैं जो रेस्तरांओं में काम करते हैं, नूडल बनाते हैं और आजकल सूचना-प्रौद्योगिकी में काम करने वाले युवा इनमें हैं. जाड़ों में करीब दो सौ तिब्बती शहर में आकर स्वेटरें बेचने का काम करते हैं; दो महीने के बाद प्रवासी पक्षियों की तरह वे वापस अपने शरणार्थी कैम्पों में चले जाते हैं ताकि लोसर मना सकें. चंद्रमा पर आधारित पंचांग के अनुसार तिब्बती नववर्ष लोसर फरवरी के आसपास पड़ा करता है. मुम्बई में स्वेटर बेचने वाले तिब्बतियों का आगमन शहर में सर्दियों के आने की घोषणा जैसा होता है, जहाँ अन्यथा केवल दो ही मौसम होते हैं – गर्मियां और बरसातें. जब मैं मुम्बई आया था, फिल्मों के प्रचार के लिए लगे बड़े-बड़े होर्डिंग्स में से रानी मुखर्जी मुझे देखकर मुस्करा रही थी. साधारण तिब्बतियों के लिए बंबई किसी स्वप्न-सरीखी मिथकीय नगरी थी जिसे उन्होंने अमिताभ बच्चन की फिल्मों में देखा था; बड़ा शहर, बड़ा पैसा और ढेर सारे गुंडे. इसे बॉलीवुड अभिनेताओं के लिए भी जाना जाता है, सो लोग मुझसे अक्सर ककगते हैं कि मैं उनके लिए आमिर खां और ऐश्वर्या राय की असली फोटूएं लेकर आऊँ. औसत तिब्बती की समझ में इस शहर को मुम्बई कहे जाने के पीछे के आग्रह का पचड़ा समझ में नहीं आता. सो आज तिब्बती इसे बीच के एक नाम से पुकारते हैं – मुम्बे.

यहाँ पहले तिब्बती १९५० की शुरुआत में आये थे जब यह बंबई ही था और तिब्बत भी एक आज़ाद देश था. दार्जिलिंग और कालिम्पोंग में बस चुके तिब्बती अपने नज़दीक के बंदरगाह-नगर कलकत्ता में अक्सर जाया करते थे. लेकिन बंबई आये हुए तिब्बती चीन में १९४९ की कम्युनिस्ट क्रान्ति के बाद भागे चीनियों के साथ आये थे. वे नूडल व्यवसाय के मित्र थे.

आज भी, मुम्बई के कुछ बेहतरीन रेस्तराओं में नूडल की आपूर्ति शहर की छोटी तिब्बती नूडल फैक्ट्रियों से होती है. कोई बीस नौजवान ‘चाइनीज़’ रेस्तराओं में रसोइये का काम करते हैं. इस प्रत्यक्ष राजनैतिक विरोधाभास पर एक पत्रकार का जवाब एक बार चालीस साल के कुंगा ने दिया था जिन्होंने इस पेशे के लिए कोई तीस तिब्बती युवाओं को प्रशिक्षित किया था. उनका स्पष्टीकरण था: “खाना पकाना एक कौशल होता है, चाहे आप तिब्बती खाना बनें, चीनी या दक्षिण भारतीय.”

बंबई आये पहले तिब्बतियों को लेकर एक मिथकीय किस्सा चलता है, कहानी के मुताबिक़ उनके एक समूह ने एक डबल डेकर बस की ऊपरी मंजिल पर सीटें लीं. बस ने घर्राना शुरू किया और वह स्टार्ट होने को ही थी. तभी सारे तिब्बती हड़बड़ी में नीचे उतर आये. कंडक्टर ने पूछा कि भाई माजरा क्या है. वे सारे एक साथ चिल्लाए: “ऊपर कोई ड्राइवर नहीं है और बस तब भी चल रही है.” पता नहीं यह किस्सा सच है या नहीं लेकिन तिब्बतियों के बीच यह आज तक चल रहा है. और यह किस्सा साबित करता है कि तिब्बती बहुत चौकन्ने होते हैं और हर मामले को लेकर दोहरी सुनिश्चितता रखना चाहते हैं.

इस महानगर में, जो कि मुम्बई है, तिब्बती में बात करना और हंसना किस कदर प्रफुल्लित करने वाला होता है. किसी दुर्लभ मौके पर जैसे परमपावन दलाई लाम के जन्मदिन पर, सभी तिब्बती नाचने-गाने और बढ़िया तिब्बती भोजन के लिए इकठ्ठा होते हैं. ट्रैफिक के शोर और नज़दीकी चाल में बज रहे किसी बॉलीवुड गीत की पृष्ठभूमि में से कोई एक पहाड़ी गीत छेड़ देता है. अपने तिब्बती मेहमानों को हम समुद्र का विस्तार दिखाने मरीन ड्राइव लेकर जाते हैं. वहीं शहर में रहने को नए आने वालों को हम रश आवर्स में मुंबई की लोकल ट्रेनों में प्रशिक्षण दिया करते हैं.

बच भागने के अलावा, मैं यहाँ आगे की पढ़ाई करने भी आया था. बंबई विश्वविद्यालय के कालीना कैम्पस में साहित्य और दर्शनशास्त्र पढ़ने के साथ ही मैंने यहीं लिखना भी शुरू किया. मैंने डॉम मोराईस, निसीम एज़ेकील, आदिल जस्सावाला और अरुण कोल्हटकर जैसे स्थापित लेखकों और कलाकारों से मिलना शुरू किया और उनकी कला और उसके प्रति उनके बर्ताव से प्रेरणा लेना शुरू किया. इसके अलावा मैंने रंगमंच अभिनय, ललित कलाओं और प्रदर्शनियों के व्यवसाय, फिल्म निर्माण की भीतरी कहानियों और मीडिया संबंधों के बारे में बहुत कुछ सीखा.

यह वे वर्ष थे जब मैंने बहुत कड़ी मेहनत की. मेरे पास रहने को कोई जगह नहीं थी क्योंकि मेरे पास पैसा नहीं था. मैं अंधेरी, बोरीवली, कफ परेड, सान्ताक्रुज़ और अम्बोली में दोस्तों के घरों में कैम्प किया करता था. बोरीवली से शहर जाने और  विरार-चर्चगेट की लोकल ट्रेन में पैर जमाने की जगह के लिए जद्दोजहद करना रोज़ की चुनौती था. एक दफा रश आवर में मैं गिरते-गिरते मरने से बचा लेकिन मुझे हैरत हुई कि अगले दिन मैं फिर से उसी ट्रेन में पैर जमाने की जगह खोजने की जद्दोजहद में लगा था. मैं दिनों तक वडा-पाव पर जिंदा रहा, शोक के बारे में कविताएं लिखते मरीन ड्राइव प्रोमेनेड मैं मैंने मूंगफली खाई.

बंबई विश्वविद्यालय से एमए के बाद अपने सहपाठियों से चंदा करके कविताओं की अपनी पहली किताब छपवाई. बाद में हमने उसकी प्रतियाँ कॉलेजों और क्रॉसवर्ड, पृथ्वी थियेटर, एनसीपीए और पोयट्री सर्कल जैसी जगहों पर होनेवाले कविता-पाठ समारोहों में बेचा. २००१ में मुझे पहला आउटलुक-पिकाडोर अखिल भारतीय निबंध लेखन पुरुस्कार मिला; चूंकि तब मैं मुम्बई में रह रहा था, मीडिया में रपट छपी, “मुम्बई के छात्र ने निबंध प्रतियोगिता जीती.” मैं एक मुम्बईकर के तौर पर स्वीकृत किये जाने पर प्रसन्न था.

विश्वविद्यालय के कैम्पस में इकलौता तिब्बती था. मुझे तिब्बतियों की कमी खलती थी पर मैंने ढेर सारे भारतीय मित्र बनाए. सच तो यह है कि आज मेरे भारतीय मित्र ज़्यादा हैं तिब्बती कम. अब मैं यहाँ हिमालय में रहता हूँ, धर्मशाला नाम के एक हिलस्टेशन में जहाँ परमपावन दलाई लामा का निवासस्थान है. मैं तिब्बत से सम्बंधित कई कारणों से मुम्बई अता हूँ और मैं जब भी यहाँ आता हूँ मुझे तमाम दोस्तों से मिलना होता है. मैं मुम्बई में किसी भी जगह पर रह और खा सकता हूँ. मैं मुम्बई की मनःस्थिति, भाषा, संस्कृति और चलता है वाले नज़रिए के साथ कम्फर्टेबल महसूस करता हूँ. इन सब कारणों से मुझे मुम्बई घर जैसा लगता है.

तिब्बत के मामले को लेकर मुम्बई में सहानुभूति पाई जाती है. वर्ष २००२, जब चीन के राष्ट्रपति झू रोंग्ज़ी ने शहर का दौरा किया तो मैंने ओबेरॉय होटल (अब हिल्टन) की स्कैफोल्डिंग पर चढ़कर अपना विरोध दर्ज कराया. चौदहवीं मंजिल से टंगकर मैंने “तिब्बत को आज़ाद करो” लिखा हुआ एक बैनर फहराया. हमें दुनिया भर में मीडिया कवरेज हासिल हुई लेकिन जिस तरह मुम्बई के अखबारों ने उसे पहले पन्ने पर जगह दी और जनता का जैसा समर्थन मिला, वैसा कुछ कहीं और नहीं हुआ. अचानक ही यह हुआ कि तिब्बत के स्वतंत्रता संग्राम में मुम्बई ने अपनी जगह बना ली. उस रात मुझे देर तक कफ़ परेड पुलिस स्टेशन में रहना पड़ा लेकिन मेरे लिए वह मुम्बई में मेरे सबसे यादगार पल थे.

लेकिन खुद तिब्बती समाज के भीतर आन्दोलन को मज़बूत बनाए बगैर किसी भी तरह का बाहरी समर्थन किसी काम का नहीं होगा. उसके लिए मुझे ज़रुरत थी तिब्बती समाज के भीतर काम करने की, सो मैं मुम्बई से चला गया, लेकिन केवल शरीर के तौर पर. मेरा सपना है तिब्बत को चीनी कब्ज़े से मुक्त कराकर वहां अपने घर का पुनर्निर्माण करना. तब तक मैं कहीं भी होऊं मेरे पास अपना घर कभी नहीं हो सकता. कानूनी तौर पर हम एक राष्ट्र्हीन जन हैं, दलाई लामा भी उनमें सम्मिलित हैं. कल, जब हम अपनी आज़ादी के बाद तिब्बत वापस चले जाएंगे मैं आमची मुम्बई आना नहीं छोडूंगा.

एक दफा मैं अपने एक दोस्त की चिठ्ठी लेकर उसकी बूढ़ी माँ के पास जा रहा था. मैं अपने पहुँचने के दिन उस चिठ्ठी को नहीं पहुंचा सका. अगले दिन मुझे बताया गया कि पिछली रात उसकी माँ की नींद में मृत्यु हो गयी. वे ७९ साल की थीं. वे हम छोटों को तिब्बत के जीवन के बारे में बताया करती थीं. उनका जीवनवृत्त मैंने घंटों तक सुना था. मैं उन्हें बताता रहता था कि तिब्बत जल्द ही आज़ाद होगा और हम सब अपने घर वापस लौटेंगे. हमने चन्दनवाड़ी के सार्वजनिक संस्कार गृह में उनका अंतिम संस्कार किया. पिछले ही साल हमने दादर के श्मशान में ८० साल के एक वृद्ध का अंतिम संस्कार किया था. बहुत तेज़ी से हमारी बुज़ुर्ग पीढ़ी गायब होती जा रही है जो तिब्बत में रहा करती थी, जिसने चीनी आक्रमण को देखा था, सो जल्द ही हमारे बीच ऐसा कोई नहीं बचेगा जिसने तिब्बत को आज़ाद देखा था और जो हमें चीनियों के हमारे देश में घुस आने के पहले के जीवन के बारे में बता सके. जब तक हम अपनी धरती को वापस नहीं पा लेते हमें अपनी कहानियों को बताते सुनाते चले जाना है अभी जब हम मुम्बई में रह रहे हैं – अपने पहाड़ी घरों से बहुत दूर.

धर्मशाला, जनवरी २००६ 

थक गया हूँ दस मार्च के उस अनुष्ठान से


मैं थक गया हूँ

तेनज़िन त्सुन्दू

मैं थक गया हूँ
थक गया हूँ दस मार्च के उस अनुष्ठान से
धर्मशाला की पहाड़ियों से चीखता हुआ.

मैं थक गया हूँ
थक गया हूँ सड़क किनारे स्वेटरें बेचता हुआ
चालीस सालों से बैठे-बैठे, धूल और थूक के बीच इंतज़ार करता 

मैं थक गया हूँ
दाल-भात खाने से
और कर्नाटक के जंगलों में गाएं चराने से.

मैं थक गया हूँ
थक गया हूँ मजनू टीले की धूल में 
घसीटता हुआ अपनी धोती.

मैं थक गया हूँ
थक गया हूँ लड़ता हुआ उस देश के लिए 
जिसे मैंने कभी देखा ही नहीं.