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Wednesday, November 12, 2014
Tuesday, November 11, 2014
Monday, November 10, 2014
एक-एक बुत को ख़ुदा उस ने बनाया होगा - मीना कुमारी के स्वर उन्हीं की नज़्में – ८
आबला-पा कोई इस दश्त में आया होगा
वर्ना आँधी में दिया किस ने जलाया होगा
ज़र्रे-ज़र्रे पे जड़े होंगे कुँवारे सजदे,
एक-एक बुत को ख़ुदा उस ने बनाया होगा
प्यास जलते हुए काँटों की बुझाई होगी,
रिसते पानी को हथेली पे सजाया होगा
मिल गया होगा अगर कोई सुनहरी पत्थर,
अपना टूटा हुआ दिल याद तो आया होगा
ख़ून के छींटे कहीं पोंछ न लें रेह्रों से,
किस ने वीराने को गुलज़ार बनाया होगा
वर्ना आँधी में दिया किस ने जलाया होगा
ज़र्रे-ज़र्रे पे जड़े होंगे कुँवारे सजदे,
एक-एक बुत को ख़ुदा उस ने बनाया होगा
प्यास जलते हुए काँटों की बुझाई होगी,
रिसते पानी को हथेली पे सजाया होगा
मिल गया होगा अगर कोई सुनहरी पत्थर,
अपना टूटा हुआ दिल याद तो आया होगा
ख़ून के छींटे कहीं पोंछ न लें रेह्रों से,
किस ने वीराने को गुलज़ार बनाया होगा
Sunday, November 9, 2014
बदनाम सही लेकिन गुमनाम नहीं होता - मीना कुमारी के स्वर उन्हीं की नज़्में – ७
आगाज़ तो होता है अंजाम नहीं होता
जब मेरी कहानी में वो नाम नहीं होता
जब ज़ुल्फ़ की कालिख़ में घुल जाए कोई राही
बदनाम सही लेकिन गुमनाम नहीं होता
हँस- हँस के जवां दिल के हम क्यों न चुनें टुकडे़
हर शख्स़ की किस्मत में ईनाम नहीं होता
बहते हुए आँसू ने आँखॊं से कहा थम कर
जो मय से पिघल जाए वो जाम नहीं होता
दिन डूबे हैं या डूबे बारात लिये कश्ती
साहिल पे मगर कोई कोहराम नहीं होता
जब मेरी कहानी में वो नाम नहीं होता
जब ज़ुल्फ़ की कालिख़ में घुल जाए कोई राही
बदनाम सही लेकिन गुमनाम नहीं होता
हँस- हँस के जवां दिल के हम क्यों न चुनें टुकडे़
हर शख्स़ की किस्मत में ईनाम नहीं होता
बहते हुए आँसू ने आँखॊं से कहा थम कर
जो मय से पिघल जाए वो जाम नहीं होता
दिन डूबे हैं या डूबे बारात लिये कश्ती
साहिल पे मगर कोई कोहराम नहीं होता
Saturday, November 8, 2014
Friday, November 7, 2014
जलती-बुझती-सी रोशनी के परे सिमटा-सिमटा-सा एक मकाँ तन्हा - मीना कुमारी के स्वर उन्हीं की नज़्में – ५
चाँद तन्हा है आसमाँ तन्हा,
दिल मिला है कहाँ-कहाँ तन्हा
बुझ गई आस, छुप गया तारा,
थरथराता रहा धुआँ तन्हा
ज़िन्दगी क्या इसी को कहते हैं,
जिस्म तन्हा है और जाँ तन्हा
हमसफ़र कोई गर मिले भी कभी,
दोनों चलते रहें कहाँ तन्हा
जलती-बुझती-सी रोशनी के परे,
सिमटा-सिमटा-सा एक मकाँ तन्हा
राह देखा करेगा सदियों तक
छोड़ जाएँगे ये जहाँ तन्हा
दिल मिला है कहाँ-कहाँ तन्हा
बुझ गई आस, छुप गया तारा,
थरथराता रहा धुआँ तन्हा
ज़िन्दगी क्या इसी को कहते हैं,
जिस्म तन्हा है और जाँ तन्हा
हमसफ़र कोई गर मिले भी कभी,
दोनों चलते रहें कहाँ तन्हा
जलती-बुझती-सी रोशनी के परे,
सिमटा-सिमटा-सा एक मकाँ तन्हा
राह देखा करेगा सदियों तक
छोड़ जाएँगे ये जहाँ तन्हा
Thursday, November 6, 2014
मेरे अधूरेपन के दोस्त तमाम ज़ख्म जो तेरे हैं मेरे दर्द तमाम - मीना कुमारी के स्वर उन्हीं की नज़्में – ४
मेरा माज़ी
मेरी तन्हाई का ये अंधा शिगाफ़
ये के सांसों की तरह मेरे साथ चलता रहा
जो मेरी नब्ज़ की मानिन्द मेरे साथ जिया
जिसको आते हुए जाते हुए बेशुमार लम्हे
अपनी संगलाख़ उंगलियों से गहरा करते रहे, करते गये
किसी की ओक पा लेने को लहू बहता रहा
किसी को हम-नफ़स कहने की जुस्तुजू में रहा
कोई तो हो जो बेसाख़्ता इसको पहचाने
तड़प के पलटे, अचानक इसे पुकार उठे
मेरे हम-शाख़
मेरे हम-शाख़ मेरी उदासियों के हिस्सेदार
मेरे अधूरेपन के दोस्त
तमाम ज़ख्म जो तेरे हैं
मेरे दर्द तमाम
तेरी कराह का रिश्ता है मेरी आहों से
तू एक मस्जिद-ए-वीरां है, मैं तेरी अज़ान
अज़ान जो अपनी ही वीरानगी से टकरा कर
थकी छुपी हुई बेवा ज़मीं के दामन पर
पढ़े नमाज़ ख़ुदा जाने किसको सिजदा करे
Wednesday, November 5, 2014
तो सुनो, कैसे बसर होती है - मीना कुमारी के स्वर उन्हीं की नज़्में – ३
पूछते हो तो सुनो, कैसे बसर होती है
रात ख़ैरात की, सदक़े की सहर होती है
साँस भरने को तो जीना नहीं कहते या रब
दिल ही दुखता है, न अब आस्तीं तर होती है
जैसे जागी हुई आँखों में, चुभें काँच के ख़्वाब
रात इस तरह, दीवानों की बसर होती है
ग़म ही दुश्मन है मेरा, ग़म ही को दिल ढूँढता है
एक लम्हे की जुदाई भी अगर होती है
एक मर्कज़ की तलाश, एक भटकती ख़ुशबू
कभी मंज़िल, कभी तम्हीदे-सफ़र होती है
दिल से अनमोल नगीने को छुपायें तो कहाँ
बारिशे-संग यहाँ आठ पहर होती है
काम आते हैं न आ सकते हैं बे-जाँ अल्फ़ाज़
तर्जमा दर्द की ख़ामोश नज़र होती है.
रात ख़ैरात की, सदक़े की सहर होती है
साँस भरने को तो जीना नहीं कहते या रब
दिल ही दुखता है, न अब आस्तीं तर होती है
जैसे जागी हुई आँखों में, चुभें काँच के ख़्वाब
रात इस तरह, दीवानों की बसर होती है
ग़म ही दुश्मन है मेरा, ग़म ही को दिल ढूँढता है
एक लम्हे की जुदाई भी अगर होती है
एक मर्कज़ की तलाश, एक भटकती ख़ुशबू
कभी मंज़िल, कभी तम्हीदे-सफ़र होती है
दिल से अनमोल नगीने को छुपायें तो कहाँ
बारिशे-संग यहाँ आठ पहर होती है
काम आते हैं न आ सकते हैं बे-जाँ अल्फ़ाज़
तर्जमा दर्द की ख़ामोश नज़र होती है.
Tuesday, November 4, 2014
Monday, November 3, 2014
जिसका जितना आँचल था, उतनी ही सौगात मिली - मीना कुमारी के स्वर उन्हीं की नज़्में – १
टुकड़े-टुकड़े दिन बीता, धज्जी-धज्जी रात मिली
जिसका जितना आँचल था, उतनी ही सौगात मिली
रिमझिम-रिमझिम बूँदों में, ज़हर भी है और अमृत भी
आँखें हँस दीं दिल रोया, यह अच्छी बरसात मिली
जब चाहा दिल को समझें, हँसने की आवाज़ सुनी
जैसे कोई कहता हो, ले फिर तुझको मात मिली
मातें कैसी घातें क्या, चलते रहना आठ पहर
दिल-सा साथी जब पाया, बेचैनी भी साथ मिली
होंठों तक आते आते, जाने कितने रूप भरे
जलती-बुझती आँखों में, सादा-सी जो बात मिली
जिसका जितना आँचल था, उतनी ही सौगात मिली
रिमझिम-रिमझिम बूँदों में, ज़हर भी है और अमृत भी
आँखें हँस दीं दिल रोया, यह अच्छी बरसात मिली
जब चाहा दिल को समझें, हँसने की आवाज़ सुनी
जैसे कोई कहता हो, ले फिर तुझको मात मिली
मातें कैसी घातें क्या, चलते रहना आठ पहर
दिल-सा साथी जब पाया, बेचैनी भी साथ मिली
होंठों तक आते आते, जाने कितने रूप भरे
जलती-बुझती आँखों में, सादा-सी जो बात मिली
Tuesday, October 22, 2013
स्क्रीन से परे वे सगी बहनें थीं
विनोद मेहता की किताब ‘मीना कुमारी –
अ क्लासिक बायोग्राफ़ी’ एक बार फिर से चाट डाली. १९७२ में छपी यह किताब आज के फिल्मप्रेमी
युवाओं ने ज़रूर पढनी चाहिए. विनोद मेहता की मीनाकुमारी से एक भी मुलाक़ात नहीं हुई थी.
किताब में उनके जीवन से जुड़े रहे लोगों के तमाम दिलचस्प इंटरव्यू हैं – और आपको हिन्दी
सिनेमा की सबसे बड़ी ‘ट्रेजेडी क्वीन’ को खासे करीब से देखने का मौका मिलता है.
हाल के सालों में इस किताब का
रीप्रिंट आया है. विनोद मेहता की नई भूमिका के साथ.
एक अंश – “मीना कुमारी में मेरी
दिलचस्पी का स्रोत सीधे मीनाकुमारी नहीं थीं. उसे एक और स्त्री ने पाला-पोसा था (ज़ाहिर
है, वह एक गोरी स्त्री थी) जिसने मेरे लडकपन के दिनों पर ऐसा इरोटिक और
संवेदनात्मक प्रभाव डाला था जिस बारे में मुझे अभी सोचना बाकी है. वह स्त्री मर्लिन
मुनरो थी. और अलबत्ता मेरी नायिका (मीना कुमारी) और मर्लिन के दरम्यान हज़ारों मील
का फ़ासला था, उनके बीच कुछ दिलचस्प समानताएं भी हैं. सार्वजनिक रूप से उनमें कुछ
भी समान नहीं था; मगर स्क्रीन से परे वे सगी बहनें थीं. वही शारीरिक शक्तियां
जिन्होंने दोनों को गाथाओं में तब्दीलकर दिया था, वही आधे-अधूरे अतृप्त सम्बन्ध,
वही अदम्य हसरतें, वही आत्मघाती हठ.”
किताब हार्पर कॉलिन्स ने छपी है. खोजिये,
मंगाइए, पढ़िए - अच्छी किताब है.
Tuesday, December 11, 2007
फिर से एहसास ने पहना है बेहिसी का लिबास : मीनाकुमारी की नज़्म

चलिए आज आप को ले जाया जाए एक बहुत पुराने सफर पर। मीनाकुमारी की आवाज़ में सुनिए उनकी एक नज़्म 'अकेलापन'। भारतीय फिल्मों की इस नायाब ट्रेजेडी क्वीन का असली नाम महजबीन बानो था। उनके पैदा होते वक़्त उनके अब्बू के पास उन की परवरिश तक को पैसा न था और वे उन्हें एक अनाथालय में छोड़ आये थे हालांकि वहां मेह्जबीन फ़क़त कुछ घंटे ही रहीं। मोहब्बत से भरे उन के संघर्षरत पिता उन्हें वापस ले आये थे। जीवन के आखिरी दिनों में, इतनी शोहरत पा लेने के बावजूद मीनाकुमारी अकेली थीं। निहायत अकेली। शराब में डूब चुकी उनकी जिंदगी 'पाकीजा' जैसी अविस्मरणीय फिल्म के तीन हफ्तों बाद ख़त्म हो गई। अस्पताल का बिल तक चुकाने को उनके बैंक अकाउंट में पैसा नहीं बचा था। मीना कुमारी शायरी करती थीं और यह गुलज़ार के कारण संभव हुआ की उनकी शायरी न सिर्फ आज हमें सुनने को मिलती है बल्कि वह 'हिंद पॉकेट बुक्स' से गुलज़ार द्वारा ही संपादित 'मीनाकुमारी की शायरी' के नाम से करीब ४० साल पहले छाप चुकी है। कुल चालीस साल का संक्षिप्त जीवन जिया उन्होंने लेकिन टूटे दिलों पर उनका राज़ चालीस सदियों तक चलता रहेगा।
(१ मिनट १ सेकेंड)
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