विनोद मेहता की किताब ‘मीना कुमारी –
अ क्लासिक बायोग्राफ़ी’ एक बार फिर से चाट डाली. १९७२ में छपी यह किताब आज के फिल्मप्रेमी
युवाओं ने ज़रूर पढनी चाहिए. विनोद मेहता की मीनाकुमारी से एक भी मुलाक़ात नहीं हुई थी.
किताब में उनके जीवन से जुड़े रहे लोगों के तमाम दिलचस्प इंटरव्यू हैं – और आपको हिन्दी
सिनेमा की सबसे बड़ी ‘ट्रेजेडी क्वीन’ को खासे करीब से देखने का मौका मिलता है.
हाल के सालों में इस किताब का
रीप्रिंट आया है. विनोद मेहता की नई भूमिका के साथ.
एक अंश – “मीना कुमारी में मेरी
दिलचस्पी का स्रोत सीधे मीनाकुमारी नहीं थीं. उसे एक और स्त्री ने पाला-पोसा था (ज़ाहिर
है, वह एक गोरी स्त्री थी) जिसने मेरे लडकपन के दिनों पर ऐसा इरोटिक और
संवेदनात्मक प्रभाव डाला था जिस बारे में मुझे अभी सोचना बाकी है. वह स्त्री मर्लिन
मुनरो थी. और अलबत्ता मेरी नायिका (मीना कुमारी) और मर्लिन के दरम्यान हज़ारों मील
का फ़ासला था, उनके बीच कुछ दिलचस्प समानताएं भी हैं. सार्वजनिक रूप से उनमें कुछ
भी समान नहीं था; मगर स्क्रीन से परे वे सगी बहनें थीं. वही शारीरिक शक्तियां
जिन्होंने दोनों को गाथाओं में तब्दीलकर दिया था, वही आधे-अधूरे अतृप्त सम्बन्ध,
वही अदम्य हसरतें, वही आत्मघाती हठ.”
किताब हार्पर कॉलिन्स ने छपी है. खोजिये,
मंगाइए, पढ़िए - अच्छी किताब है.
यह मेरा रचनात्मक हिस्सा था जिसने मुझे
आगे बढाते जाने की ताकत दी जब मैं अभिनेत्री बनने की कोशिश कर रही थी. जब आप अपनी
बात सही सही तरीके से कह दें तब मुझे वाकई अभिनय में आनंद आता है. मेरे ख़याल से
मेरे भीतर ज़रुरत से ज्यादा फंतासी थी कि मैं फ़क़त हाउसवाइफ बन कर नहीं जी सकती थी.
हाँ, मुझे अपना पेट भी पालना था. सीधे शब्दों में कहूं तो मुझे किसी ने “रखा”
नहीं; मैंने हमेशा खुद को रखा है. मुझे हमेशा इस बात का फख्र रहा कि मैं
आत्मनिर्भर थी. और लॉस एंजेल्स में मेरा घर था और जब उन्होंने कहा “अपने घर जाओ!”
तो मैंने जवाब दिया “मैं अपने घर में ही हूँ.” जिस वक़्त मुझे लगना शुरू हुआ था कि
मैं प्रसिद्ध हो गयी थी, एक दफा मैं किसी को ड्राइव करके एयरपोर्ट ले जा रही थी,
और जब मैं वापस आई तो एक सिनेमाघर में मैंने रोशनियों में लिखा अपना नाम देखा.
मैंने सड़क पर थोड़ी दूरी पर गाडी खड़ी की. अचानक इतने करीब से उसे देख पाना ज़रा
परेशानी की बात थी. और मैं बोली “हे भगवान! किसी ने कोई गलती कर दी है.” लेकिन वह
वहीं था, रोशनियों में. मैं वहीं बैठकर खुद से कहने लगी “तो यह ऐसा दिखाई देता
है.” और वह सब मेरे लिए अजीब था और स्टूडियो में वे मुझसे कह चुके थे “याद रखना,
तुम कोई स्टार नहीं हो.” मगर वह वहां पर था रोशनियों में. मुझे इस बात का अहसास
पत्रकार पुरुषों ने कराया कि मैं एक स्टार हूँ; मैं पुरुष कह रही हूँ स्त्रियाँ
नहीं जो आपका इंटरव्यू करती हैं और आपके साथ दोस्ताना और गर्मजोशी से भरी रहती
हैं. खैर, प्रेस का वह हिस्सा, मेरा मतलब पुरुष पत्रकारों से है, जो हमेशा बहुत
दोस्तीभरे होते थे बशर्ते उनमें से किसी को मुझसे कोई व्यक्तिगत शिकायत न हो, कहा
करते थे “पता है, तुम इकलौती स्टार हो.” और मैं कहती “स्टार?” और वे मुझे इस तरह
देखते जैसे मैं कोई पागल होऊं. मेरा ख्याल है कि अपने तरीके से उन्होंने मुझे
अहसास दिलाया कि मैं प्रसिद्ध हो गयी हूँ.
मुझे याद है जब मुझे ‘जेंटलमैन प्रेफर
ब्लौन्ड्स’ में रोल मिला. जेन रसेल फिल्म में ब्रूनेट थी और मैं ब्लौंड. उसे दो
लाख डॉलर मिले जबकि मुझे हफ्ते के पांच सौ. लेकिन मेरे लिए वह भी ठीकठाक रकम थी.
और उसका सुलूक मेरे साथ बहुत अच्छा होता था. इकलौती बात यह थी कि मुझे एक ड्रेसिंग
रूम नहीं मिल सका. आखिरकार मुझ से बर्दाश्त नहीं हुआ और मैंने कहा “देखिये, जो भी
हो मैं ब्लौंड हूँ और फिल्म का नाम ‘जेंटलमैन प्रेफर ब्लौन्ड्स’!” तो भी वे कहते
रहे “याद रखो तुम एक स्टार नहीं हो.”मैंने कहा “मैं जो भी होऊं मैं ब्लौंड हूँ!”
और मैं लोगों से कहना चाहती हूँ कि अगर मैं एक स्टार हूँ तो मुझे लोगों ने स्टार
बनाया है. ऐसा न किसी स्टूडियो ने किया, न व्यक्ति ने – सिर्फ लोगों ने किया.
स्टूडियो में प्रतिक्रिया पहुँच रही थी, फैन मेल या जब मैं एक प्रीमियर में जाती
थी या जब कोई प्रोड्यूसर मुझसे मिलना चाहता था. क्यों, मुझे मालूम नहीं. जब वे
सारे मेरी तरफ बढ़ रहे थे तो मैंने पलटकर देखा मेरे पीछे कौन है और मेरे मुंह से निकला
“हे ईश्वर!” मुझे भयानक डर लगा. मुझे ऐसा अहसास होता था, और अब भी कभी होता है कि
कभी कभी मैं किसी को उल्लू बना रही हूँ; किस आदमी या चीज़ को या खुद अपने आप को –
मुझे मालूम नहीं.
छोटे से छोटे सीन के बारे में भी – चाहे
मुझे उसके भीतर आकर सिर्फ “हैलो” कहना होता – मैंने हमेशा सोचा है कि लोगों को
उनके पैसे की पूरी कीमत मिलनी चाहिए और यह भी कि मेरा सबसे बेहतरीन उन तक पहुंचाना
मेरा फ़र्ज़ है. किन्हीं दिनों मुझे अजीब से चीज़ महसूस होती है जब सीन में उसके अर्थ
के प्रति आपकी बड़ी ज़िम्मेदारी होती है, ता मैं इच्छा करती हूँ “काश मुझे सिर्फ
कपडे धोने वाली का रोल करना होता.” स्टूडियो जाते हुए अगर मैं किसी को सफाई करते
हुए देखती तो मैं कहती “मुझे यही बनना है. यही मेरी ज़िन्दगी की ख्वाहिश है.” लेकिन
मैं सोचती हूँ सारे अभिनेता इस से गुजरते हैं. हम हमेशा अच्छे बने रहना नहीं
चाहते, हमें होना ही होता है. जब मैंने अपने अध्यापक ली स्ट्रासबर्ग से नर्वसनेस
के बारे में बात करते हुए कहा “मुझे नहीं पता क्या ठीक नहीं है पर मैं थोड़ी नर्वस
हूँ. वे बोले “जब तुम नर्वस न रहो तो अभिनय छोड़ देना, क्योंकि नर्वसनेस
संवेदनशीलता की तरफ इशारा करती है.” और इसके अलावा अभिनेताओं को शर्माने से संघर्ष
किसी भी और व्यक्ति से ज्यादा करना होता है. हमारे भीतर एक सेंसर होता है जो बताता
है की हम किस सीमा तक आगे जा सकते हैं, जैसा बच्चे के खेलने में होता है. मुझे
लगता है लोग समझते हैं हम बस काम करने चले जाया करते हैं. सही है, ऐसा हम सब करते
हैं. हम सब काम करते हैं. लेकिन बड़ा संघर्ष है. मैं दुनिया में खुद को लेकर सब से
सचेत रहने वाले लोगों में से हूँ. मुझे सचमुच बहुत संघर्ष करना पड़ता है.
अभिनेता कोई मशीन नहीं होता, चाहे वह
कितना ही कहे कि वह है. रचनात्मकता की शुरुआत मानवीयता से होती है और जब आप एक
मानव होते हैं आप महसूस करते हैं, सहते हैं, आप खुश हैं, आप बीमार हैं, आप नर्वस
हैं या कुछ भी हैं. किसी भी रचनात्मक मनुष्य की तरह मैं थोडा अधिक नियंत्रण
चाहूंगी ताकि चीज़ें मेरे लिए उस वक़्त तनिक आसान हो सकें जब निर्देशक कहता है “एक
आंसू, अभी.” ताकि एक आंसू बाहर निकल सके. लेकिन एक दफा मेरे दो आंसू आए क्योंकि
मैंने सोचा “इसके ऐसी हिम्मत कैसे हुई?” गेटे ने कहा था “प्रतिभा का विकास एकाकीपन में होता है.” आप को पता है? और वह किस
कदर सही था. आपको एकाकीपन की ज़रुरत महसूस होती है, और मैं समझती हूँ अभिनेता के
तौर पर अधिकतर लोग इस बात को नहीं समझते. यह अपने वास्ते कुछ किस्म के रहस्यों के
अस्तित्वमान होने जैसा है, जिन्हें आप अभिनय करते समय थोड़े ही समय के लिए सारी दुनिया
के आगे रख देते हैं. लेकिन हर आदमी आपकी बांह खींच रहा है. हर किसी को जैसे आपका
कोई टुकड़ा चाहिए
मुझे
लगता है कि जब आप विख्यात होते हैं आपकी हर कमजोरी को अतिरंजित किया जाता है. इंडस्ट्री
ने एक ऐसी माँ की तरह व्यवहार करना चाहिए जिसका बच्चा एक कार के सामने घिसट गया
हो. लेकिन बजाय बच्चे को गोद में उठाने के लोग उसे दंड देना शुरू कर देते हैं.
जैसे कि आपको जुकाम लगने तक का अधिकार तक नहीं. भई आप को हिम्मत कैसे हुई खुद को
ज़ुकाम लगाने की! मेरा मतलब है एक्जीक्यूटिव्ज़ को ज़ुकाम हो सकता है और वे जब तक
चाहें अपने घर रह सकते हैं और इसकी सूचना फोन पर दे सकते हैं लेकिन एक अभिनेता
होने के नाते तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई कि तुम्हें ज़ुकाम हो गया या वायरल. और आप
जानते हैं आप को कितना खराब महसूस होता है जब आप बीमार होते हैं. कभी मेरी इच्छा
होती है कि बुखार और वायरल इन्फेक्शन को लेकर वे एक कॉमेडी बनाते. मैं वैसी
अभिनेत्री नहीं हूँ जो सेट पर केवल अनुशासन के उद्देश्य से पहुँचती है. इसका कला
से कोई लेना देना नहीं. मैं खुद चाहूंगी अपने काम के भीतर ज़्यादा अनुशासित होना.
मैं एक परफोर्मेंस देने आई हूँ न किसी स्टूडियो द्वारा अनुशासित किए जाने के लिए.
जो भी हो मैं किसी मिलिट्री स्कूल में तो नहीं हूँ. माना जाता है कि यह एक आर्ट
फॉर्म है न कि कुछ उत्पादन करने वाला कोई प्रतिष्ठान. देखिये जो संवेदनशीलता मुझसे
अभिनय करवाती है वहीं से मेरी प्रतिक्रया भी आती है. एक अभिनेता को एक संवेदनशील
उपकरण माना जाता है. आइजैक स्टर्न अच्छे तरीके से अपने वायोलिन की देखभाल करते
हैं. क्या होगा अगर हर कोई उनके वायोलिन पर कूदना शुरू कर दे? (जारी. अगली क़िस्त में समाप्य.)
ज़ाहिर है यह सारा लोगों पर
निर्भर करता है पर कभी कभी मुझे किसी जगह डाइनिंग टेबल को रोशन करने के लिए
आमंत्रित किया जाता है जैसे रात के खाने के बाद पियानो बजाने वाला एक संगीतकार
आमंत्रित होता है, और मैं जानती हूँ मुझे मेरे लिए नहीं बुलाया गया. आप सिर्फ एक
गहना भर होते हैं.
जब मैं पांच साल की थी, मैंने
एक अभिनेत्री बनने का सपना देखना शुरू कर दिया था. मुझे नाटक करने में मज़ा आता था.
मुझे अपने आसपास का संसार उसकी बेहिसी की वजह से पसंद नहीं था लेकिन मैं घर-घर
खेला करती थी. यह अपने लिए अपनी सरहदें बना लेने जैसा था. वह घर से बाहर निकल जाया
करती, आप अपने लिए सिचुएशंस बनाते और दिखावा कर सकते थे, और अगर कोई दूसरा बच्चा
कल्पना करने में उतना तेज़ नहीं भी होता तो आप उस से कह सकते थे “अरे देखो अगर तुम
फलां होते और मैं फलां तो कितना मज़ा आता न!” और तब वे कहते “हाँ हाँ” और मेरा जवाब
होता “तो ये होगा घोड़ा और ये ...” वह खेल होता था, खिलंदरी. जब मैंने सुना कि इसे
अभिनय करना कहते हैं तो मैंने सोच लिया मुझे यही करना है. आप खेल सकते हैं. लेकिन
तब आप बड़े होते हैं और खेलने के बारे में जानना शुरू करते हैं, लोग खेलने को आपके
वास्ते बहुत मुश्किल बना देते हैं. मुझे गोद लेने वाले कुछ परिवार मुझे घर से बाहर
भेजने की नीयत से फ़िल्में देखने भेजा करते थे और दिन-रात मैं वहीं बैठी रहती. वहां
सामने, उस विशाल परदे के आगे एक नन्हा बच्चा बेहद अकेला होता है. और यह मुझे बहुत
पसंद था. वहां गतिमान हरेक चीज़ और हरेक घटना को देखना मुझे अच्छा लगता था और हाँ
खाने को पॉपकॉर्न भी नहीं होते थे.
जब मैं ग्यारह की थी, सारा
संसार जैसे मुझ पर घिर आया. मुझे बस ऐसा महसूस हुआ जैसे मैं संसार के बाहर खडी थी.
अचानक हरेक चीज़ खुल सी गयी. यहाँ तक कि लड़कियों ने भी यह सोचते हुए मुझ पर थोड़ा
ध्यान देना चालू किया “हूँ, इसे भी बर्दाश्त करना ही पडेगा!” और स्कूल तक का कोई
ढाई मील लंबा रास्ता था और उतना ही लंबा वहां से वापस लौटना. वह बेहद आनंददायक
होता था. हरेक आदमी – काम पर निकल रहे मजदूर - अपना हॉर्न बजाया करता, हाथों से
इशारे करता – और मैं भी हाथ हिलाया करती. संसार दोस्ताना बन गया. अखबार बांटने
वाले लड़के अपना काम करते हुए यह देखने आते कि मैं कहाँ रहती हूँ, और मैं एक पेड़ की टहनी से टंगी रहना पसंद करती
थी और मैं एक तरह की स्वेट – शर्ट पहना करती थी. उन दिनों मुझे स्वेट – शर्ट की
कीमत पता नहीं थी, मैं उन्हें पसंद करना शुरू कर रही थी हालांकि मुझे उनकी आदत
नहीं पडी थी और उन दिनों मेरी स्थिति यह नहीं थी कि मैं स्वेटरें खरीद सकूं.
फिलहाल वे लड़के अपनी साइकिलें लेकर आया करते थे और मुझे मुफ्त में अखबार मिला करते
थे और यह बात परिवार वालों को अच्छी लगती थी, और वे अपनी साइकिलें पेड़ के गिर्द
टिका दिया करते और मैं किसी बन्दर जिसे टंगी रहती थी. मेरे ख़याल से मुझे नीचे
उतरने में शर्म आया करती थी. खैर मैं उतर कर उन बाधाओं तक पहुँचती, एक तरह से
उन्हें और पत्तियों को लतियाती हुई और बडबडाती हुई, लेकिन ज़्यादातर मैं उनकी बातें
सुना करती थी. और कभी कभी परिवार को चिंता होने लगती थी क्योंकि मैं इतनी जोर जोर
से खुश होकर हंसा करती थी; मुझे लगता है वे मुझे हिस्टीरिकल समझते थे. यह अभी अभी
पाई हुई स्वतंत्रता थी कि मैं लड़कों से पूछ लिया करती “क्या अब मैं तुम्हारी
साइकिल की सवारी कर सकती हूँ?” और वे कहते “हाँ.” और तब मैं हवा की तरह निकल जाया
करती, हवा में हंसती हुई, साइकिल की सवारी करती और वे सारे मेरे आने तक वीं खड़े
रहते. लेकिन मुझे हवा से प्यार था. वह मुझे दुलारा करती. लेकिन वह एक तरह की
दोधारी चीज़ थी. जब संसार मेरे सामने खुला तो मैंने भी पाया कि लोग आपको कुछ नहीं
समझते, जैसे कि वे दोस्ताना हो सकते थे और अचानक ही ज़रुरत से ज़्यादा दोस्ताना और
बहुत कम के एवज में आपसे बहुत कुछ चाहते थे. जब मैं थोडा और बड़ी हुई मैं ग्राउमैंस
चाइनीज़ थियेटर जाया करती थी और वहां सीमेंट पर बने प्रिंट्स में अपने पैर फ़िट करने
की कोशिश करती थी. और मैं कहा करती “अरे शायद मेरे पैर ज़्यादा ही बड़े हैं. बाहर
निकल आए शायद!” बाद में जब मैंने अपना पैर उस गीले सीमेंट में रख ही दिया तो एक
अजीब सा अहसास हुआ. मुझे यकीनन पता था इस बात का मेरे लिए क्या मतलब था. कुछ भी
संभव था, करीब करीब कुछ भी.
मर्लिन मुनरो के साथ ‘लाइफ़’
के एसोसोयेट एडीटर रिचर्ड मेरीमेन की कई मुलाकातों, बातचीतों के बाद यह गद्य १७
अगस्त १९६२ को छपा था. इसका अनुवाद ‘पहल’ के नवीनतम अंक में छपा है. आपके लिए यहाँ
लगाया जा रहा है -
जब से उसे ‘सम्थिन्ग्ज़ गॉट
टू गिव’ से बाहर निकाला गया है, मर्लिन मुनरो ने एक तकरीबन तिरस्कारभरी खामोशी
अख्तियार कर ली है. जहाँ तक ट्वेंटिएथ सेंचुरी फॉक्स के साथ उनकी दिक्कतों का सवाल
है, उसने साफ़ कहा कि वह काम करने से ऊब चुकी है – वह जानबूझकर वैसी सुस्त और
बिगडैल नहीं है जैसा कि प्रोड्यूसर ने उस पर आरोप लगाया है. जहाँ एक तरफ ट्वेंटिएथ
सेंचुरी फॉक्स और मर्लिन के वकील उस से फिल्म पर दुबारा काम पर जाने के समझौतों
में लगे हुए थे, मर्लिन अपने करियर के व्यापक आयामों के बारे में सोच रही थी – उन
इनामात और ख्याति के बोझ के बारे में जिसे उस पर निछावर करने को उसके प्रशंसक उसकी
फ़िल्में देखने पर दो सौ मिलियन डॉलर खर्च करते थे, उन आवेगों के बारे में जो उसे
धकेला करते थे और उसके वर्तमान जीवन पर उसके बचपन और अनाथालयों की अनुगूंजों के
बारे में. इन सब के बारे में उसने वार्तालापों की एक दुर्लभ और बेबाक सीरीज में
‘लाइफ़’ के एसोसोयेट एडीटर रिचर्ड मेरीमेन को बतलाया था. जहाँ एक तरफ एक कैमरा उसके
व्यक्तित्व की ऊष्मा और उमंग को कैद कर रहा था, मर्लिन के शब्द मर्लिन मुनरो के
बारे में उसके अपने व्यक्तिगत विचारों को प्रकट कर रहे थे ...
कभी कभी मैं एक स्कार्फ और
पोलो कोट पहने बिना मेक अप के एक ख़ास तरह से टहलती हुई शौपिंग करने या जी रहे
लोगों को देखने निकल पड़ती हूँ. लेकिन तब कुछ किशोर वहां ज़रूर होते हैं जो एक ख़ास
तरह से दिमागदार होते हैं और कहा करते हैं “अरे एक मिनट. तुम जानते हो वो कौन है”
और वे मेरा पीछा करना शुरू कर देते हैं. मैं बुरा नहीं मानती. मैं इस बात को समझती
हूँ कि कुछ लोग देखना चाहते हैं कि आप वास्तविक हैं. वे किशोर, वे बच्चे – उनके
चेहरों पर चमक आ जाती है. वे कहते हैं “अरे” और वे अपने दोस्तों को इस बारे में
बताने के लिए बेचैन हो उठते हैं. और बुज़ुर्ग लोग पास आकर कहते हैं “ठहरना जब तक
मैं अपनी बीवी को इस बारे में बताकर आता हूँ.” आप ने उन का समूचा दिन बदल दिया है.
सुबह के वक़्त कूड़ा उठाने वाले जो फिफ्टी सेवेंथ स्ट्रीट से गुज़रा करते हैं, दरवाज़े
से मेरे बाहर आने पर सवाल करते हैं “हैलो मर्लिन, क्या हाल हैं?” मेरे लिए यह गौरव
की बात होती है, और इसके लिए मैं उन्हें प्यार करती हूँ. और कामकाजी आदमी, मैं
उनके पास से गुज़रती हूँ और वे सीटियाँ बजाना शुरू कर देते हैं. शुरू में वे इस लिए
सीटियाँ बजाते है कि वे समझते हैं कोई लडकी जा रही है. उसके बाल सुनहरे हैं और
फिगर भी ठीकठाक है. और तब वे कह उठते हैं “या खुदा ये तो मर्लिन मुनरो है!” और आप
समझिये कि उस समय यह सब अच्छा महसूस होता है. जो जानते हैं कि यह आप हैं और बाकी
सब. और यह जानना की आपके होने का उनके लिए कोई मतलब है.
मुझे ठीकठीक नहीं पता पर
मुझे महसूस होता है कि वे जानते हैं कि जो मैं करती हूँ, वैसा ही चाहती भी हूँ,
चाहे जब मैं स्क्रीन पर अभिनय कर रही होऊं या जब मैं उन्हें रू-ब-रू मिलकर उनका
अभिवादन करती हूँ. कि मैं वाकई कह रही हूँ हैलो आप कैसे हैं. अपनी फंतासियों में वे
महसूस करते हैं “या खुदा, ऐसा मेरे साथ भी हो सकता है!” लेकिन जब आप प्रसिद्ध हो
जाते हैं तो आपकी औचक मुलाक़ात इंसानियत की एक कच्ची किस्म की फितरत से हुआ करती
है. वहां ईर्ष्या उपजती है - प्रसिद्धि ऐसा करती ही है. जिनसे आप इस तरह मिलते हैं
उन्हें महसूस होता है कि अच्छा ये समझती क्या है अपने आप को, मर्लिन मुनरो? उन्हें
लगता है कि मेरी प्रसिद्धि के कारण उन्हें कोई विशेषाधिकार मिल गया है और वे मेरे
पास आ कर मुझ से कुछ भी कह जाएं, यानी किसी भी तरह की कोई बात और यह कि इस से आप
की भावनाओं को चोट नहीं पहुंचेगी. जैसे वे आपकी पोशाक के साथ वह सुलूक कर रहे हों. एक बार मैं खरीदने के लिए एक घर
तलाश रही थी और मैं एक जगह पहुँची. एक उम्दा, खुशचेहरा आदमी बाहर आकर बोला “अरे एक
मिनट. मैं चाहता हूँ मेरी पत्नी आप से मिले.” खैर वह बाहर आई और कहने लगी “क्या आप
इस परिसर से दफा हो सकेंगी?” आपका सामना इसी तरह लोगों के अचेतन से होता रहता है.
कुछ अभिनेताओं, निर्देशकों
की बात की जाए. आम तौर पर वे ऐसी बातें मुझ से नहीं कहते, वे उन्हें अखबारों से
कहते हैं क्योंकि वह एक बड़ा खेल है. देखिये, अगर वे सिर्फ मेरे सामने आकर मेरा
अपमान करें तो तमाशा उतना बड़ा नहीं बनेगा क्योंकि मेरे पास उनसे कहने को सिर्फ यही
होता है कि “आप दफा हो सकते हैं.” लेकिन यही बात अगर अखबारों में हो, उसने सक
समुद्र से दूसरे समुद्र दुनिया भर में फैल जाना है. मेरी समझ में यह नहीं आता कि
लोग एक दूसरे के साथ थोड़ा ज्यादा उदार क्यों नहीं हो सकते. मुझे यह कहना अच्छा
नहीं लग रहा पर इस धंधे में बहुत ज़्यादा ईर्ष्या है. मैं सिर्फ यही कर सकती हूँ कि
ठहरूं और सोचूँ “मैं बिलकुल ठीक हूँ मगर दूसरों के बारे में मैं उतने यकीन से नहीं
कह सकती.” मिसाल के लिए आपने पढ़ा होगा कि एक अभिनेता ने एक दफा कहा था कि मुझे
चूमना हिटलर को चूमने जैसा लगता है. ठीक है, वह आपकी समस्या है. अगर मुझे किसी के
साथ अन्तरंग प्रेम का दृश्य करना है और वह मेरे बारे में ऐसी भावनाएं रखता है तो
मेरी फंतासी अपना काम नहीं कर सकती. दूसरे लफ़्ज़ों में कहा जाए तो भाड़ में गया वह,
मैं अपनी फंतासी के साथ चली जाती हूँ. वह तो वहां था ही नहीं.
लोगों की फंतासियों में
शामिल हो जाना अच्छी बात है लेकिन आप यह भी चाहते हैं कि आपको अपने लिए भी स्वीकार
किया जाए. मैं अपने आप को एक जिन्स की तरह नहीं देखती, लेकिन मैं यकीनन कह सकती
हूँ बहुत से लोगों ने इसी तरह देखा है. इनमें एक ख़ास कारपोरेशन शामिल है, जिसका
नाम यहाँ नहीं लूंगी. अगर मेरी बातों से ऐसा लगता है कि आरोप लगाने को मुझे चुना
गया है तो ऐसा लगना चाहिए. मुझे लगता था मेरे बहुत सारे दोस्त हैं और अचानक कुछ घट
जाता है. वे तो बहुत सारे काम करते हैं. वे आपके बारे में प्रेस को बताते हैं,
अपने दोस्तों को बताते हैं, कहानियां गढ़ते हैं और आप जानते हैं यह निराशाजनक होता
है. ऐसे लोगों को आप हर रोज़ अपने जीएवन में नहीं देखना चाहते. (जारी)
इस स्त्री का नाम बताने की ज़रूरत तो नहीं होनी चाहिए. निकारागुआ के महान कवि अर्नेस्तो कार्देनाल, मर्लिन मुनरो की मौत से गहरे प्रभावित हुए थे और इस घटना को उन्होंने एक अद्भुत कविता में दर्ज़ भी किया था. मैं चाहता था उस कविता को यहां आप हिन्दी में पढ़ पाते (अनुवाद मंगलेश डबराल ने किया है) लेकिन बदक़िस्मती से वह अनुवाद मेरे कबाड़ में इधर उधर हो गया है. इसलिए फ़िलहाल अभी अंग्रेज़ी अनुवाद लगा रहा हूं (मूल कविता स्पानी में है).
मर्लिन तमाम स्थापित सामाजिक मानदण्डों के हिसाब से पूरी तरह गिरी हुई औरत के रूप में 'बदनाम' भी रही.
मर्लिन मुनरो (१९२६-१९६२) आज दुनिया भर में एक 'कल्ट फ़िगर' की तरह देखी जाती हैं. इस बेहतरीन अदाकारा के जीवन का दर्द सारे संसार की औरतों के दर्द जैसा ही भीषण था. बेहद गरीब घर में पैदा हुई मर्लिन अपनी संभावित आत्महत्या से पहले हालीवुड की सर्वकालीन सर्वलोकप्रिय अभिनेत्री के तौर पर प्रतिष्ठित हो चुकी थी.
माफ़ करेंगे मैं यहां मर्लिन की जीवनी सुनाने नहीं आया हूं. वह सब आपको किताबों और इन्टरनेट पर आसानी से मिल ही जाएगा. पहले प्रस्तुत है कार्देनाल की कविता 'मर्लिन मुनरो के लिए प्रार्थना' और उस के बाद उस की किशोरियों जैसी अल्हड़ आवाज़ में चार छोटे-छोटे गीत. उसका गीत 'Teach me Tiger' स्कूल के समय से मेरा पसंदीदा रहा है.
Prayer for Marilyn Monroe
Lord in this world polluted with sin and radioactivity You won't blame it all on a shopgirl who, like any other shopgirl, dreamed of being a star. Her dream just became a reality (but like Technicolor's reality). She only acted according to the script we gave her —the story of our own lives. And it was an absurd script. Forgive her, Lord, and forgive us for our 20th Century for this Colossal Super-Production on which we all have worked. She hungered for love and we offered her tranquilizers. For her despair, because we're not saints Psychoanalysis was recommended to her. Remember, Lord, her growing fear of the camera and her hatred of makeup—insisting on fresh makeup for each scene— and how the terror kept building up in her and making her late to the studios. Like any other shopgirl she dreamed of being a star. And her life was unreal like a dream that a psychiatrist interprets and files.
Her romances were a kiss with closed eyes and when she opened them she realized she had been under floodlights as they killed the floodlights! and they took down the two walls of the room (it was a movie set) while the Director left with his scriptbook because the scene had been shot.
Or like a cruise on a yacht, a kiss in Singapore, a dance in Rio the reception at the mansion of the Duke and Duchess of Windsor
all viewed in a poor apartment's tiny living room. The film ended without the final kiss.
She was found dead in her bed with her hand on the phone. And the detectives never learned who she was going to call. She was like someone who had dialed the number of the only friendly voice and only heard the voice of a recording that says: WRONG NUMBER. Or like someone who had been wounded by gangsters reaching for a disconnected phone.
Lord whoever it might have been that she was going to call and didn't call (and maybe it was no one or Someone whose number isn't in the Los Angeles phonebook)
You answer that telephone!
-ERNESTO CARDENAL
मर्लिन मुनरो की आवाज़ में क्रमश: 'Teach me Tiger', 'Lazy', 'I'm through with Love' और 'Two Little Girls from Little Rock' सुनिये.