Showing posts with label शेफ़ाली फ्रॉस्ट. Show all posts
Showing posts with label शेफ़ाली फ्रॉस्ट. Show all posts

Sunday, February 7, 2016

अगर रोने दिया उसे आज

जलसा से शेफ़ाली फ्रॉस्ट की कविताएं – 6

फ़ोटो टाइम्स ऑफ़ इण्डिया से साभार

खाड़ी का युद्ध और चौराहा  

गरज रहे हैं विमान पुष्पक 
दमदार ट्रकों की गोद में
बह रहा है क्षुधित टन्कियों से 
गाढ़े पुरषत्व का सन्देश
उतना ही काला और लेसदार,
जितना हज़ार शेषनागों का 
रिसता हुआ हाथ,
"मिशन अकंपलिश्ड! 
ओके टाटा !"

तोड़ती है सम्मोहन 
त्वरित इंजन तले  
टैम्पोवाले की गुनगुनाती हुई लाश,
लेटी है स्खलित 
समुंदर में पौरुष की
सिग्नल वाले चौराहे पर लड़ रहा है शहर 
उसका
किसका

सिहर रहे हैं सड़क पर बुरी नज़र वालों के मुहं,  
टपक रहे हैं फ़ुटपाथ पर 
जले हुए बादलों के अनाथ,
भरती है तेल गालों में फिर-फिर
पुरुषोत्तमो की उदार मुस्कान,
कर देता है समर्पण हँस-हँस 
टैम्पोवाला ससम्मान 

उफ़न रहा है फुटपाथ पर लेकिन,  
फ़ोन चार्जर बेचने वाला, आख़री लड़का,  
बिखरते शहर की बेखबर परेशानियों को मारता हुआ लात
बौखला के खोलता है शीशा
हर दौड़ती हुई कार का,
"यहीं तो था?" 
कहाँ गया वो जहाज 
जिसमे बैठ उसे
वापस घर जाना था?

नहा रही है हारी हुई एम्बुलैन्स तले 
शनि का दान मांगने वाली आख़री लड़की,  
बदलती है पट्टी पुराने नासूर की
उबल रहा है खून,  
काला और लेसदारउतना ही,
जितना हज़ार शेषनागों का 
रिसता हुआ हाथ,
सींच रही है पुरुषोत्तमो की सड़क,  
फुटपाथ की आख़री क़तार
लड़ पड़ेगी शायद,
अगर रोने दिया उसे आज !

Saturday, February 6, 2016

बह रही है पूजा आज भी डरी हुई आँखों से

जलसा से शेफ़ाली फ्रॉस्ट की कविताएं – 5

फ़ोटो firozeshakir.com से साभार

फटी ईंट 

वो पाँव जो फंसे थे सीमेंट और पानी में,   
रंग रहा था जंग लगा सरिया
केसरिया नाखून जिनके
निकल गएबूढ़ी पैजनियों सेठुमक,
उड़ गएबिना लिंटर की छत से,
फड़फड़ाते हुए टांग  

पीछे की चहारदीवारी पर रंगा लाल वानर,  
हज़ार सिर एक पूँछ में बाँध,
पोखर में कूद जाता था जो
चला गया वो भी,  
पाँव के कमल से,
हाथ के चँवर से,
तोड़ कर पुल,  
संकट मोचितसेवा से विमुख 

भूल चुका है यह मंदिर 
वो नाम
जो फटे भक्तों की ईंट पर लिख कर आया था,
जिसके टूटे हुए गुस्से पर
कोई और आ के बैठ गया है... 
सींच रहा है मरा हुआ सीमेंट अब भी लेकिन 
भूखे पुजारियों का दंश,
बह रही है पूजा आज भी  
डरी हुई आँखों से

अविरल.

Friday, February 5, 2016

जब ज़िंदा थे तब सबसे डरे, मुसलमान थे, मुसलमान ही मरे!

जलसा से शेफ़ाली फ्रॉस्ट की कविताएं – 4
फ़ोटो thewire.com से साभार
मान लो 

'मान लो कि ख़ैरख़्वाह हूँ मैं,
इश्क़ करती हूँ उस क़ौम से 
जो तुम्हारी है
जो तुम हो... '

'मेरी है, मैं हूँ?'

'हाँ, बात करो न उनकी प्लीज़,
वो पुरखे तुम्हारे ईरान से, तूरान से,
गोरे, चमकीले, ब्राह्मण तुम्हारी जात के,
सुना है उनकी बीवियों ने
पर्दा नहीं किया कभीहै ना?'

'बुर्क़ा पहनती हैं।'  

'कौन?'

'अम्मी मेरी।'  

'रियली! बट हाऊ कैन यू अलाऊ दैट?'

'अलाऊ मतलब? उनकी मर्ज़ी।

'पर तुम तो वैसे नहीं?'

'कैसे?'

'अरे हैं न वो काले काले
काजल लगे, लोबान वाले,
मांगते हैं मज़ारों का चंदा,
हरी चादर में गाड़ी रोक,
अकेली पड़ जाऊं उनके हाथ कभी,
तौबा ! सोचो क्या हशर होगा मेरा!'

'क्यों, छू लेंगे तुम्हे?'

'उफ़! शैतान!
उनकी सुनाओ ना मुझे
कार्ल मार्क्स की हंसिया पकड़े,  
फैज़ लपेटे कान में,
नाप दें रोज़े सालहा साल,  
दाब दें ताज़िए बा-एहतराम, लेकिन
पड़ोसियों को ख़लल न पड़े
लड़कियाँ न्यूयॉर्क रहे, बीवियां कुरआन पढ़ें  
शराब से तौबा नहीं, पर... '

'अरे! वो नहीं हूँ मैं, मेरी जान!
अलिफ़ बे का तालिब,
मीर, मोमिन और ग़ालिब,
सड़क से गुज़रूँ तो  
चप्पल की चाप में उर्दू बसे
भीड़ में चलाता हूँ मारुती  
हॉर्न बजा बजा कर, एक्सैक्टली वैसे
जैसे तुम्हारे बाप
गालियां देता हूँ पैदलों को बाकी,
कुछ हिन्दुआनी, कुछ मुसलमानी,
मेरा हुजूम मुझे वैसे ही निगलता है
जैसा तुम्हारा तुम्हे
वो अमरीकी आसमान जब औंधा गिरा ज़मीन पर 
उतना ही बेखबर रहा मैं जितना की तुम,
नामा देखा, ट्रैफिक का अफ़सोस किया,
सब्ज़ियों के दाम कर्फ्यू में कितने बढ़ेंगे  
तिजारत की …'

'दैट इस ऑपर्चुनिज़्म!   
यह आइडेंटिटी दोगे हमारे बच्चों को तुम?' 

'आइडेंटिटी
अमरीकियों की नौकरी बजाता हूँ,
साइबर पार्क में नौ से पांच,
वीकेंड पर शराब पीता हूँ, जर्मन,
जो न हिन्दू है, न मुसलमान
जुम्मा कब आया याद नहीं,
ईद उतनी ही इर्रेल्वेन्ट है जितनी दीवाली
पर दोनों पर दिए जलाता हूँ,
हाँ, जब हिन्दुओं के गढ़ में मकान ढूंढने जाता हूँ,
सोचता हूँ, ले चलूँ तुम्हे भी साथ,
बिंदी लगाए, छै गज़ की साड़ी लिपटाये!
देर रात, बैरियर किनारे
मांगता है लाइसेंस, पान चबाता ठुल्ला
डर यह नहीं कि
गाड़ दिया जाऊं, कि जला दिया जाऊं
बस इसलिए कि गुआंटानमो में न मार दिया जाऊं
कर देता हूँ तुम्हे आगे, बड़ा शर्मसार
सोचा है नाम दूंगा बच्चों को अपने  
पीटर, टोनी, और निर्वाण,
अगली पुश्त के लाइसेंस तो न कहलायें मुसलमान!'

'अरे, अरे! ना कहीं
यह कैसा कुफ्र है तुम्हारा मेरे ख़िलाफ़!
तुम मुसलमान न होगे,
मैं ख़ुद को क्या कहूँगी
नारे लगाऊंगी, गाने गाऊंगी
जेल के गेट पर धरना करवाऊंगी
शान से कहूंगी,
हैं तो वही, पर वैसे नहीं!
इन्हे मैं प्यार करती हूँ...

मर भी जाओ तुम ऐसे-वैसे, इधर-उधर,
हक़ होगा मेरा तुम पर, मय्यत पर करूंगी सोज़ख़्वानी,
मेरे महबूब, तुम्हे मेरी मुहब्बत की क़सम,
डोंट थिंक इलेक्ट्रिक क्रेमटोरियम में होने दूँगी क्विक एंड ईज़ी!
मुंह घुमा दूँगी तुम्हारा, जिस तरफ कहेंगे क़ाबा
पूरे साढ़े छै फुट नीचे करवाऊँगी दफ़न,  
रो रो कर कहूँगी सबसे 
जब ज़िंदा थे तब सबसे डरे
पर प्यार देखो मेरा

मुसलमान थे, मुसलमान ही मरे!'

Thursday, February 4, 2016

जो मरने से बच गया है कहीं, वहां उगाया जाये

जलसा से शेफ़ाली फ्रॉस्ट की कविताएं – 3


फ़ोटो गार्जियन से साभार 
           
आत्महत्या के विरुद्ध 

 .

इस गढ़ी हुई दास्तान को 
काट सकता है वो कौतूहल,
जो पन्ने से सरक
अब हाशिये पर अटक गया है ?

यह डरी हुई भाषा 
गा सकती है वो गीत,
जो पिटा हुआ हाथ,  
आख़री हरारत से लिख गया है ?

बची है इस शहर में क्या
वो कविता नयी ?
लड़ रही है, असहाय
किताबों में कहीं
उसे लाया जाए 
सुनाया जाए ... 

२ .

क्या संवेदना का बीज,
इस डामर से पटे शहर में   
बच गया है कहीं ?
गिन रहा है सांसें,  
सड़ रहा है लड़ता हुआ,
आख़री गोदामों में कहीं ?

उसे ढूँढा जाये,
लाया जाये,
फुटपाथ का वो कोना
जो मरने से बच गया है कहीं,
वहां लगाया जाये

उगाया जाये

Wednesday, February 3, 2016

स्वजातिभक्ष उन्माद शेष, टंकार शेष, अट्ठहास शेष

जलसा से शेफ़ाली फ्रॉस्ट की कविताएं – 2

फ़ोटो - http://www.brookings.in/ से साभार

मृत्युगीत 

-  शेफ़ाली फ्रॉस्ट 

मदकाल सृजन का बीत चुका,
गढ़ चुका एक सम्मत विशेष,
मधुमिश्र वृन्द अब उखड़ गया
दृढ बध्य ताल पर नृत्य एक,
नतकर्तल पर सहमत जन की
वीभत्स शून्य का त्वरित नाद,
अब दृश्य अनेक पर भाव एक,
अनुभव अनेक, अनुभाव एक    


इकरंगी अस्ताचल में 
वृत्त नारंगी अब फैल चुका,
श्वेत एक, अब श्याम एक,
अधश्वेत एक, अध्श्याम एक
चौकोर धरा पर आवर्तित 
सरकटा सूर्य और चाँद एक,
संपूर्ण विलय, सम्पूर्ण प्रलय
विध्वंस स्मृति, परिणाम एक

कृशभार सिंधु का रन्ध्र रन्ध्र   
लील चुका अब कीच पुष्प,
निर्जल लहरों पर उलट उलट  
कामाग्निहीन, कामांध भुजंग    
पीता अपना ही रंग विशेष
गरल शेष, बस वमन शेष,
मुहं फाड़ खड़ी बस क्षुधा शेष

दिव्य पुलक में हुड़क हुड़क 
मूष गीध गीदड़ सियार,
भूखी सड़कों में सड़प सड़प
धरते स्वअनुज माँस पर दाढ़,
स्नेहिल जिह्वा का दन्तप्रवण
हन्त-मुग्ध अनुराग शेष
मानुषविहीन भयभीत निशा,
स्वजातिभक्ष उन्माद शेष,  
टंकार शेष, अट्ठहास शेष,
अब अंत शेष
बस अंत शेष !


जो काफ़ी था कल, आज उतर रहा है सड़कों पर उनींदा

जलसा से शेफ़ाली फ्रॉस्ट की कविताएं – 1 

फ़ोटो urbanruralfabric.blogspot.com से साभार

क्या ?
-शेफ़ाली फ्रॉस्ट

क्या यह चौराहे पर सिटपिटाई हुई औरत
हरे कनटोप में संभाले दुधमुंहा बच्चा
हार सकती है अपने पांच पति, लाल बत्ती के जुए में ?
उतार सकती है गले में बंधा रतजगों का तमगा ?
बढ़ कर आगे उलट सकती है अमरुद वाले का ठेला
'दो रूपए का एक दो, वर्ना शोर मचाउंगी!
तुम लुटेरे हो, छीन रहे हो बच्चे से मेरे पेड़ पर झूलने का हक़
और टहनी पर लटक जाने का हक़,
जो सिर्फ़ मेरा है !'

क्या तोड़ सकता है
रोडवेज़ की नीली बस का ड्राइवर रामगुलाम, चढ़ा कर पहिया
सूर्या प्रॉपर्टीज़ की खाली पड़ी, दस मंज़िला इमारत
जहाँ घुप्प अँधेरे में चाँद की अर्थी,
दे रही है कन्धा उन पांच परिवारों को,
जो जकड कर बाजुओं में एक दूसरे, फिर तीसरे को
मर गए शहर की सर्दी से,  
उन्हें और कोई घर नहीं मिला 

फैब इण्डिया की सुनहरी किनारी निगल रही है उस लड़की का दुपट्टा,  
जो बीच ट्रैफिक में खड़ी है मेरे लिए
कटोरा भर कड़वे तेल से भरे मीठे उलाहने के साथ
'अठन्नी डाल रही हो, यह है तुम्हारा शनि का दान?'
दस रूपए में पांच बेच रहा है बॉल पेन, नारियल और रूमाल
खटखटा कर बंद गाड़ियों के शीशे
बाजू से नाक पोंछने वाला अधनंगा लड़का ।  
वो सड़क किनारे पैदल चलता,
पचास पैसे का एक गिलास पानी पी कर, कुल्ले करता
तेल लगे बालों में कंघी घुमाता आदमी
उतार सकता है धूल से भरा चेहरा,  
जो शहर की गलियों ने उसे बिना पूछे पहनाया है ?

उड़ सकता है क्या राजीव चौक पर, चीर कर मैट्रो की छत
पीली लाइन की भीड़ में अटका, वो मॉल में टाइल पोंछने वाला लड़का
जिसने आज लड़की देखी, नवेली !
जो हवाई जहाज में बैठ कर कल जा रही है सिंगापोर,
सधे हुए मांबाप के साथ
जहाँ वो ढांक देगी उबासियों से अपनी 
आइफ़िल टावर, स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी, लीनिंग टावर ऑफ़ पीज़ा
और वो जितनी भी इमारतें हैं जिन्हे देखा है उस लड़के ने,  
कुओनी ट्रेवल के परचे में
पहली फ्लोर के एस्कलेटर से निकलते ही, बास्किन रौबिन के बाजू वाले बाथरूम के पास 

छोटी, काली गाड़ी में चालीस पार की औरत
जो हरी बत्ती के बीचों बीच  
रिवर्स गियर से निकाल रही है, बीस साल में पहली बार,  
पति की नामुरादी, ससुर का गुस्सा
बिना सिन्दूर की माँग,
बच्चे की फीस, चावल के दाम,
बिफ़र रहा है कमख़याली पर उसकी 
वो हरी पट्टी वाले स्वेटर का आदमी,   
ऑफिस कैब से उगल दिया जाता है जो 
साइबर पार्क की सीढ़ियों पर,
अंदर और अंदर,
नीचे और नीचे,
जो हर लंच में बाहर आ कर गुमटी पर कॉफ़ी पीता है, शकरकंदी खाता है
ठहाके लगाता है उन पट्टियों पर,
जो रौंद रौंद कर उसका सीना, सिलाई और ऊन से 
भेजती हैं चिट्ठियां, हर महीने की पहली तारीख
"बाथरूम की छत धसक गयी पिछली बरसात 
ब्लड टेस्ट वाले का उधार चुकाना है इस बार ।"

उतार सकता है कपड़े,
खुले आसमान तले, वो बंगाली रिक्शेवाला 
जो आगे वाले ऑटो की पीली पिछ्वाड़ी पर देखता है
कोकाकोला पीती हीरोइन
झटकता है माथे का पसीना, बाएं हाथ की मुड़ी हुई उंगली से,  
एक हाथ से घुमाता टेढ़ा पहिया
दूसरे से उठाता है, कीचड़ में गिरा मोटा आदमी
तरेरती है खटकती आँख,
टैरिलीन की पीली साड़ी में उसकी जोरू
'ए जी, इससे तो गाँव क्या बुरा था?' 

वो आदमी मुँह से निकालता हुआ झाग
जो खड़ा है हाथ लपेटे उखड़ी दीवार के प्लास्टर से
जिसके शरीर के नीचे का हिस्सा
गीला हो रहा है
और जो अब नहीं सोचता कि 
सड़क पार करती धानी साड़ी में लिपटी औरत उसे देख कर मुहं बिचका रही है,
कैसे कहे उस बड़ी गाड़ी में चढ़े आदमी से
"तेल लगी मुस्कान से तुमने दिल नहीं खींचा मेरा! 
भर दिया बस्ते में मेरे  
वो ढेर सारा आक्रोश,
जो काफ़ी था पहनने के लिए कल !
आज उतर रहा है सड़कों पर उनींदा,
सैंकड़ों पहियों की मशक्कत के बाद
टैम्पो के पिछवाड़े में
पहिये की रौंद में,   
कॉफ़ी की दुकान में
शनि के दान में,
अमरुद के पेड़ में
मैट्रो की चेन में
भीड़ इतनी है लेकिन
आदमी कुल्ला करे की तक़रार
प्यार करे कि मन भर सिन्दूर डाल कर  
ताकता रहे आसमान
निगल जाता है यह शहर 
खिड़की से आँख
दरवाज़े से धड़
अकेले ही अकेले
अलग ही अलग ।"