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Thursday, July 17, 2008

जहां से भी देखो

साहित्य अकादमी पुरुस्कार से सम्मानित श्री लीलाधर जगूड़ी जी हिन्दी कविता के पाठकों के लिये कोई नया नाम नहीं हैं. कबाड़ख़ाने में आप लोग उन्हें एकाधिक बार पढ़ चुके हैं. उनकी एक बहुत छोटी, ताज़ा, अप्रकाशित कविता पढ़िये:

अपने से बाहर

घाटी में था तो
शिखर सुन्दर दिखता था
शिखर पर पहुंचा
तो बहुत सुन्दर दिख रही घाटी.

अपने से बाहर जहां से भी देखो
दूसरा ही सुन्दर दिखता है.

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इस ब्लॉग पर जगूड़ी जी की अन्य कविताओं के लिंक:

प्रेम, गिलहरी और गाय
तुम अपने बाहर को अन्दर जानकर अपने अन्दर से बाहर आ जाओ
ऊंचाई है कि
नंदीग्राम और तसलीमा पर लीलाधर जगूड़ी की एक छोटी कविता

Tuesday, April 22, 2008

प्रेम, गिलहरी और गाय

यह हर किसी के नसीब में नहीं होता कि उसे सुबह सुबह उठा कर उसकी भाषा का कोई बड़ा कवि अपनी नवीनतम कविता का पहला ड्राफ़्ट पढ़ कर सुनाए और इसरार करने पर फ़ोन पर ही लिखा भी दे.

मेरे साथ अभी सुबह सुबह ऐसा ही हुआ.

जब जगूड़ी जी ने ये दो कविताएं मुझे सुनाईं तो मुझे लगा कि यह कवि आयु के साथ साथ और बड़े विषयों की तरफ़ बढ़ रहा है जो हिन्दी में बहुत देखा नहीं जाता. जगूड़ी जी न सिर्फ़ एक कवि के रूप में मेरे पसंदीदा हैं, एक शानदार और खुले-फ़क्कड़ इन्सान के रूप में मैंने उन्हें कभी अपना हमउम्र समझा है, कभी गुरू माना है, कभी बड़ा भाई और कभी पितासदृश. एक सिपाही की मामूली नौकरी से जीवन शुरू करने वाले जगूड़ी जी के अनुभवों का संसार बहुत विस्तृत है और ज्ञान की उनकी कोठरियों तलक बिना सेंध मारे नहीं पहुंचा जा सकता. मैं पिछले कई वर्षों से उनसे एक औपन्यासिक या संस्मरणात्मक गद्य हिन्दी समाज को देने की गुज़ारिश कर चुका हूं.उम्मीद है ऐसा जल्द होगा. आमीन!

कबाड़ख़ाने के पाठक पहले भी जगूड़ी जी को पढ़ चुके हैं. साहित्य अकादमी पुरुस्कार से सम्मानित पद्मश्री लीलाधर जगूड़ी जी की दो बिल्कुल ताज़ा और अप्रकाशित कविताएं आपके लिए खा़सतौर पर:

1

प्रेम


प्रेम ख़ुद एक भोग है जिसमें प्रेम करने वाले को भोगता है प्रेम
प्रेम ख़ुद एक रोग है जिसमें प्रेम करने वाले रहते हैं बीमार
प्रेम जो सब बंधनों से मुक्त करे, मुश्किल है
प्रेमीजनों को चाहिये कि वे किसी एक ही के प्रेम में गिरफ़्तार न हों
प्रेमी आएं और सबके प्रेम में मुब्तिला हों
नदी में डूबे पत्थर की तरह
वे लहरें नहीं गिनते
चोटें गिनते हैं
और पहले से ज़्यादा चिकने, चमकीले और हल्के हो जाते हैं

प्रेम फ़ालतू का बोझ उतार देता है,
यहां तक कि त्वचा भी.


2


गिलहरी और गाय के बहाने


कौन नहीं जानता ये अलग प्रजातियों के प्राणी हैं
पर एक दूसरे से काम लायक जो समाज बनाया जाता है
यह कोई देवताओं से नहीं बल्कि उनके प्रति मनुष्य की श्रद्धा से सीखे
तो नतीज़े कुछ और निकलेंगे

गिलहरी को मनुष्य पालतू नहीं बना सका या बनाना नहीं चाहता था
क्योंकि वह गाय जैसी दुधारू नहीं हो सकती
अगर होती भी तो आदमी कभी उसे दुह नहीं पाते

लतखोर गाय से लाख गुना चंचल है वह
एकदम पारे जैसी
पर पारे की चंचलता पारे को सिर्फ़ लुढ़का सकती है, छितरा सकती है
पारा अपने पैरों से पेड़ पर उतर-चढ़ नहीं सकता

गाय में भी एक ख़ास गाय है हिमालय की चंवरी गाय
जो संभवतः हूणों और खसों के साथ आई थी
जिसके बछड़े को याक कहते हैं
-दोनों की पूंछ के बनते हैं चंवर

चलते चलते भी याक स्थूल और स्थिर दिखाई देता है
चंचल गिलहरी की चंवर जैसी पूंछ देख कर
मुझे सुस्त चंवरी गाय और मोटा मन्द याक याद आये
- यह समुद्र देख कर हिमालय याद आने की तरह है

एक धरती की विराट जांघों के बीच आलोढ़ित जलाशय है
दूसरा उसके सिर पर चढ़कर जमा हुआ
-नीलाशय में पीठाधीश्वर,
महाशय श्वेताशय - मीठी नदियों का अक्षय स्रोत

जैसे किसी पहाड़ से भी दोगुनी-तिगुनी उसकी पगडंडी होती है
वैसे ख़ुद से दुगुनी-तिगुनी होती है गिलहरी की पूंछ
जिसके चेहरे और पूंछ में से कौन ज़्यादा चंचल है कुछ पता नहीं चलता
चंचल लहरों से बनी नदी का संक्षिप्ततम शरीर है गिलहरी
- पूंछ के अंतिम बाल तक धुली-खिली


मुंह से दुम तक की स्पंदित लहरियों में गिन नहीं पा रहा मैं एक भी लहर
गिलहरी की चंवराई चंचलता
क्या याक की घंटे जैसी लटकी ध्यानस्थ दुम बन सकती है?
जो अपनी पीठ पर बैठनेवाली मक्खियों को
हमेशा वैसे ही उड़ा देती है
जैसे दुनिया के अनर्थों से दूर रखने के लिये
हम उसे भगवानों पर डुलाते हैं

Tuesday, February 26, 2008

तुम अपने बाहर को अन्दर जानकर अपने अन्दर से बाहर आ जाओ

लीजिए प्रस्तुत है लीलाधर जगूड़ी जी की दूसरी कविता भी। शब्दों के साथ सतत खेलते जाना और नित उनके वास्ते नवीनतर प्रतिमान गढ़ना उनके काव्यकर्म का अभिन्न हिस्सा है। उनकी ये दो सर्वथा अप्रकाशित और ताज़ातरीन कविताएं यहां कबाड़खा़ने पर पेश करते हुए हम सब कबाड़ी गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं।
अपने अन्दर से बाहर आ जाओ

हर चीज़ यहां किसी न किसी के अन्दर है
हर भीतर जैसे बाहर के अन्दर है
फैल कर भी सारा का सारा बाहर
ब्रह्मांड के अन्दर है
बाहर सुन्दर है क्योंकि वह किसी के अन्दर है

मैं सारे अन्दर - बाहर का एक छोटा सा मॉडल हूं
दिखते - अदिखते प्रतिबिम्बों से बना
अबिम्बित जिस में
किसी नए बिम्ब की संभावना सा ज़्यादा सुन्दर है
भीतर से ज़्यादा बाहर सुन्दर है
क्योंकि वह ब्रह्मांड के अन्दर है

भविष्य के भीतर हूं मैं जिसका प्रसार बाहर है
बाहर देखने की मेरी इच्छा की यह बड़ी इच्छा है
कि जो भी बाहर है वह किसी के अन्दर है
तभी वह संभला हुआ तभी वह सुन्दर है

तुम अपने बाहर को अन्दर जानकर
अपने अन्दर से बाहर आ जाओ


पिछली कविता की प्रतिक्रिया में श्री मनीष जोशी ने लिखा था: "कमाल का दस्तावेज है - कमबख्त महत्वाकांक्षा [ लेकिन पानी बहकर नीचे ही आयेगा - अंततः / शिखर का गदराया पेड़ भी ठूंठ में बदल ही जाएगा ] - अच्छी सुबह की शुरुआत" । इस प्रतिक्रिया से मुझे जगूड़ी जी ही की एक और ताज़ा कविता का भान हो आया। 'अध:पतन' शीर्षक यह कविता 'कथाक्रम' पत्रिका के जनवरी-मार्च २००८ के अंक में छ्पी थी। श्री नरेश सक्सेना (नरेश जी की कुछ कविताएं आप कबाड़ख़ाने में देख चुके हैं) ने इस कविता पर अपने संपादकीय नोट में लिखा था: "जगूड़ी की कविता पढ़कर मुझे लगा कि इस कविता के कुछ अंश मेरी कविता में होने चाहिए थे"। आमतौर पर लम्बी कविताएं लिखने वाले श्री लीलाधर जगूड़ी की यह छोटी सी कविता बहुत शानदार है और यहां मैं इसे प्रिय श्री मनीष जोशी के लिए, जिनकी मैं बहुत इज़्ज़त करता हूं, ख़ासतौर पर लगा रहा हूं। इसके अलावा इन दिनों ब्लॉगजगत पर चल रही एक बहस की दृष्टि से यह कविता बहुत प्रासंगिक भी है।


अध:पतन

इतने बड़े अध:पतन की ख़ुशी
उन आंखों में देखी जा सकती है
जो टंगी हुई हैं झरने पर
ऊंचाई हासिल करके झरने की तरह गिरना हो सके तो हो जाए
गिरना और मरना भी नदी हो जाए
जीवन फिर चल पड़े
मज़ा आ जाए

जितना मैं निम्नगा* होऊंगा
और और नीचे वालों की ओर चलता चला जाऊंगा
उतना मैं अन्त में समुद्र के पास होऊंगा
जनसमुद्र के पास

एक दिन मैं अपार समुद्र से उठता बादल होऊंगा
बरसता पहाड़ों पर, मैदानों में
तब मैं अपनी कोई ऊंचाई पा सकूंगा
उजली गिरावट वाली दुर्लभ ऊंचाई

कोई गिरना, गिरने को भी इतना उज्ज्वल बना दे
जैसे झरना पानी को दूधिया बना देता है.

(*निम्नगा: नदी का पर्यायवाची ** फ़ोटो: बस्तर में चित्तरकोट का प्रपात. फ़ोटूकार: डॉ सबीने लेडर)

ऊंचाई है कि हर बार बची रह जाती है छूने को






साहित्य अकादमी पुरुस्कार से सम्मानित कवि लीलाधर जगूड़ी की यह सबसे ताज़ा कविता है। यह कल ही लिखी गई है। ऐसा बेहद इत्तेफ़ाक़ से हुआ कि जब कापीराइट वाले मसले पर कल मैं पोस्ट लिखते समय उन्हें फ़ोन लगाने की ही सोच रहा था कि उन्हीं का फ़ोन आ गया। बाक़ी बातें तो बाद में हुई, पहले उन्होंने मुझे उसी समय पूरी की हुई अपनी दो कविताएं सुनाईं। फ़िलहाल इस पोस्ट में उन में से एक कविता पढ़िए। दूसरी कविता बाद में लगाऊंगा। जगूड़ी जी ने सारे हिन्दी ब्लागरों को अपनी सारी कविताएं किसी भी रूप में ब्लाग्स पर इस्तेमाल करने की छूट भी दे दी है।






ऊंचाई है कि

मैं वह ऊंचा नहीं जो मात्र ऊंचाई पर होता है
कवि हूं और पतन के अंतिम बिंदु तक पीछा करता हूं
हर ऊंचाई पर दबी दिखती है मुझे ऊंचाई की पूंछ
लगता है थोड़ी सी ऊंचाई और होनी चाहिए थी

पृथ्वी की मोटाई समुद्रतल की ऊंचाई है
लेकिन समुद्रतल से हर कोई ऊंचा होना चाहता है
पानी भी, उसकी लहर भी
यहां तक कि घास भी और किनारे पर पड़ी रेत भी
कोई जल से कोई थल से कोई निश्छल से भी ऊंचा उठना चाहता है छल से
जल बादलों तक
थल शिखरों तक
शिखर भी और ऊंचा होने के लिए
पेड़ों की ऊंचाई को अपने में शामिल कर लेता है
और बर्फ़ की ऊंचाई भी
और जहां दोनों नहीं, वहां वह घास की ऊंचाई भी
अपनी बताता है

ऊंचा तो ऊंचा सुनेगा, ऊंचा समझेगा
आंख उठाकर देखेगा भी तो सवाए या दूने को
लेकिन चौगुने सौ गुने ऊंचा हो जाने के बाद भी
ऊंचाई है कि हर बार बची रह जाती है
छूने को।


(पुनश्च: जगूड़ी जी का नया संग्रह 'ख़बर का मुंह विज्ञापन से ढंका है' वाणी प्रकाशन से शीघ्र प्रकाश्य है।)

Tuesday, December 4, 2007

नंदीग्राम और तसलीमा पर लीलाधर जगूड़ी की एक छोटी कविता



विचारधारा की तरह
कहीं कहीं बची है चोटियों पर बर्फ



पर ठंड की तानाशाही
विचारधारा के बिना भी कायम है।



(यह एक अप्रकाशित रचना है। लीलाधर जगूड़ी जी का फोटो हमारे कबाड़ी फोटूकार मित्र रोहित उमराव का है)