Wednesday, June 10, 2009

'द डिसाइसिव मोमेन्ट': फ़ोटोपत्रकारिता के जनक ब्रेसों के कुछ फ़ोटोग्राफ़

फ़ोटोग्राफ़ी में एक खास मूड, एक खास क्षण को पकड़ा जाना सबसे महत्वपूर्ण होता है. तकनीकी भाषा में इसे decisive moment कहा जाता है. ब्रेसों का कथन है: "There is nothing in this world that does not have a decisive moment."

फ़्रांसीसी मूल के ओनरी कार्तिएर ब्रेसों (२२ अगस्त १९०८ - ३ अगस्त २००४) को आधुनिक फ़ोटोपत्रकारिता का जनक माना जाता है. उनके बारे में इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि फ़ोटोपत्रकारों की कई पीढ़ियां उनसे प्रभावित रहीं और अपने जीवन काल में ही वे एक कल्ट के तौर पर स्थापित हो चुके थे.

इन्दौर में रहने वाले श्री सुशोभित सक्तावत ने मुझे ब्रेसों के कुछ फ़ोटोग्राफ़ मेल से भेजे. क्यों न उन्हें आप के साथ शेयर किया जाए.


मशहूर शिल्पकार अल्बेर्तो ज्याकोमेती एक प्रदर्शनी में


चीन, दिसम्बर १९४८


फ़्रांस, १९६८


फ़्रांस,१९३२


फ़्रांस, १९३२


फ़्रांस, द वार डिपार्टमेन्ट


वडोदरा, गुजरात, १९४८


इटली, १९५१


हाइड पार्क, लन्दन, १९३७


विख्यात पेन्टर ओनरी मातीस अपने घर में


मैक्सिको सिटी, १९३४


पेरिस, १९५९


लूसियाना, अमेरिका, १९४७

मैनहटन, अमेरिका, १९४७

"Photography is not like painting, There is a creative fraction of a second when you are taking a picture. Your eye must see a composition or an expression that life itself offers you, and you must know with intuition when to click the camera. That is the moment the photographer is creative.Oops! The Moment! Once you miss it, it is gone forever." - ब्रेसों (द वॉशिंगटन पोस्ट को दिए गए एक इन्टरव्यू का हिस्सा, १९५७)

एक तरह से सुशोभित सक्तावत साहब की ही वजह से यह पोस्ट लगाई जा रही है, सो उन्हें शुक्रिया भी!

Tuesday, June 9, 2009

गांव का नाम थिएटर, हमार नाम हबीब !


हबीब तनवीर जीते जी एक किंवदंती बन चुके थे। समकालीन भारतीय रंगमंच परिदृश्य में उनकी उपस्थिति एक ऐसे रंगकर्मी की रही है जिन्होंने नाटक को एक नया मुहावरा दिया। एक ऐसी रंगभाषा दी जो अपनी ताकत के लिए अपनी जड़ों से रस लेती है लेकिन आधुनिक संवेदना के साथ थरथराती है। इसीलिए उनके नाटक अपनी आत्मा का उजाला लोक से ग्रहण करते थे लेकिन उनका कथ्य-रूप इतना आधुनिक था कि वे अधिक से अधिक लोगों से तादात्म्य स्थापित कर लेता था। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ से लेकर पूरे हिंदुस्तान में और विदेशों में उन्हें जो सराहना मिली, वह अतुलनीय है। नया थिएटर के साथ उन्होंने जो गंभीर काम किए उसमें जबर्दस्त लोकप्रियता मिली और वे अपने उन प्रयोगों में कामयाब भी हुए। यही कारण है कि जब जर्मनी में इंटरनेशनल ड्रामा फेस्टिवल 1992 में उन्होंने अपना नाटक चरणदास चोर खेला तो पुरस्कृत हुआ था।

श्री तनवीर ने नया थिएटर और छत्तीसगढ़ के लोक कलाकारों के साथ प्रयोग करते हुए जो नई और रोचक रंगभाषा ईजाद की उसके पीछे सिर्फ प्रयोगधर्मिता ही नहीं थी बल्कि अपनी जड़ों को खोजते हुए नाटक का वह रूप हासिल करना था जो लोक से गहरा जुड़ा होकर भी अपने कथ्य और रूप में उतना ही आधुनिक भी हो। यही कारण है कि उनके प्रयोग करने के पीछे सिर्फ नया और प्रयोग करने की मंशा ही नहीं थी बल्कि यह प्रयोगधर्मिता एक गहरी रचनात्मक बेचैनी का नतीजा थी। यह कितने आश्चर्य की बात है कि एक युवा रंगकर्मी इंग्लैंड में रायल एकेडमी आफ ड्रामेटिक आर्ट से ट्रेनिंग लेता है, यूरोप घूमकर नाटक देखता है लेकिन भारत वापस आकर वह अपने नाटकों के लिए किसी यूरोपीय नाट्य रूपों की नकल नहीं करता बल्कि वह नाचा से लेकर पंडवानी जैसे फोक फार्म का बहुत ही कल्पनाशील इस्तेमाल करता हैं। उन्होंने छत्तीसगढ़ के ही कलाकारों के साथ काम किया जो प्रोफेशनल अभिनेता नहीं थे और यही कारण है कि उनके नाटकों में इम्प्रोवाइजेश गजब का मिलता है। यह एक ऐसा लचीला रूप था जिसमें कलाकार को अपने को व्यक्त करने के लिए एक अनौपचारिक और चुनौतीपूर्ण मौका मिलता था। उनके कलाकार अभिनय करते थे, गाते थे और मौके पर नाचने भी लगते थे। कहने की जरूरत नहीं कि उनके नाटक लोकरंजक थे।

एक सितंबर 1923 को रायपुर में जन्में हबीब तनवीर ने नागपुर और अलीगढ़ में शिक्षा हासिल की। 1945 में वे मुंबई चले गए । आल इंडिया रेडियो से जुड़े। हिंदुस्तानी थिएटर में रंगकर्म किया और बच्चों के लिए नाटक किए लेकिन हबीब तनवीर जब इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (इप्टा) और प्रगतिशील लेखक संघ (पीडब्ल्यूए ) से जुड़े तो जाहिर है, वे अपने समय, समाज और शोषित-वंचितों के प्रति प्रतिबद्ध हुए। इन दोनों संस्थाओं से जुड़ने से उन्हें विचारधारात्मक प्रखरता मिली। यही कारण है कि सही सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समझ विकसित हुई जिसका उन्होंने अपने नाटकों के चयन से लेकर उनके निर्माण तक में मदद ली। उन्होंने अपने लिए जो नाटक चुने वे सामाजिक स्तर पर बहुत ही मानीखेज थे लेकिन अपनी अचूक और संवेदनशील रंग दृष्टि की बदौलत उन्होंने इसे कलात्मक ऊंचाईयां भी दी। यानी कंटेंट के साथ ही उन्होंने लगातार प्रयोग किए और अपनी असंदिग्ध प्रतिबद्धता से लगातार और ठोस कोशिशें कीं और नाटकों को नया रूप दिया।
इप्टा और प्रेलसं से जुड़ने के साथ ही उनमें संगीत और कविता में गहरी दिलचस्पी थी। जोश से लेकर मीर, गालिब और फैज की शायरी हो या नजीर अकबराबादी की कविता या फिर समकालीन आधुनिक कवि। वे कविता से गहरे जुड़े रहे। इसीलिए उन्होंने 1954 में आगरा बाजार नाटक किया। यह नजीर अकबराबादी के जीवन और समय पर आधारित था। इसमें एक बाजार के जरिये उन्होंने बहुत ही खूबी के साथ तत्कालीन सामाजिक , आर्थिक और राजनीतिक विद्रूपताओं को मुखर लेकिन कलात्मक अभिव्यक्ति दी। इसे बहुत सराहा गया। 1959 उन्होंने नया थिएटर की स्थापना की और लोक कलाकारों के साथ काम करने की प्रतिबद्धता जाहिर की। इसके बाद उन्होंने शूद्रक के नाटक मृच्छकटिकम को छतीसगढ़ में खेला। फिर गांव नाम ससुराल, मोर नाम दामाद नाटक किया। चरनदास चोर नाटक तो उनका इतना हिट रहा कि इसके कई शोज हुए और इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति मिली।
हबीब तनवीर इतने विलक्षण रंगकर्मी थे कि उन्होंने संस्कृत से लेकर यूरोप के कई नाटकों को छतीसगढ़ में खेला और और अपनी रंगदृष्टि तथा अद्बुत रंगकौशल से यह साबित किया कि किस तरह से क्लासिक और विदेशी नाटकों को ठेठ लोक कला से जोड़कर मनोरंजक, मोहक और मारक बनाया जा सकता है। शेक्सपीयर के मिडसमर्सनाइट ड्रीम को उन्होंने कामदेव का अपना, बसंत ऋतु का सपना नाम से खेला। हिरमा की अमर कहानी के साथ ही उन्होंने समाज के संवेदनशील मुद्दों पर नाटक खेले। बहादुर कलारिन और पोंगा पंडित नाटक को लेकर तो विवाद हुआ और कई बार पोंगा पंडित के प्रदर्शन रोके गए क्योंकि यह पोंगापंथी और पाखंडियों पर तीखा प्रहार करता है। भोपाल गैस त्रासदी पर भी उन्होंने नाटक किया-जहरीली हवा। उनका एक नाटक और मशहूह हुआ । जिस लाहौर नई देख्या वो जन्माई नाही। वस्तुतः कहानीकार असगर वजाहत ने पहले कहानी लिखी थी। जब हबीब तनवीर ने यह पढ़ी तो उनकी अचूक रंगदृष्टि ने उसमें छिपे नाटकीय तत्वों और रूप की तुरंत पहचान की और उन्हें सुझाव दिया कि इसे नाटक के रूप में लिखा जाना चाहिए। असगर वजाहत ने इसे नाटक में बदला और वह हिट रहा। यह नाटक वस्तुतः सांप्रदायिकता पर चोट करता है और एक साझा संस्कृति की वकालत करता हुआ उदात्त मानवीय मूल्यों को खूबसूरती से अभिव्यक्त करता है।
वे जर्मनी के महान नाटककार बर्तोल्त ब्रेख्त से खासे प्रभावित थे और उनकी नाट्य युक्तियों को अपने नाटकों में कल्पनाशील इस्तेमाल कर समृद्ध किया। वे अभिनेता भी बेजोड़ थे। उनकी आवाज भी गजब की थी। रांगेय राघव के उपन्यास कब तक पुकारूं से लेकर फिल्म ये वो मंजिल तो नहीं में उन्होने सशक्त अभिनय भी किया। रिचर्ड एटनबरो की फिल्म गांधी में भी काम किया। मंगल पांडे में उन्होंने बहादुर शाह जफर की भूमिका निभाई और ब्लैक एन व्हाईट में भी। चरनदास चोर पर श्याम बेनेगल ने एक फिल्म भी बनाई थी। 2005 में उन पर एक वृत्तचित्र भी बनाया गया था जिसका शीर्षक है- गांव का नाम थिएटर, हमार नाम हबीब।।
रंगकर्म के इलाके में उनके अमूल्य योगदान के लिए उन्हें संगीत नाटक अकादमी, संगीत नाटक अकादमी की फैलोशिप, पद्मश्री, पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। वे राज्यसभा के सदस्य भी रहे। कहने की जरूरत नहीं कि भारतीय रंगकर्म की बात उनके बिना हमेशा अधूरी रहेगी।

चोप्ता का मौसम, बंबई का फैशन



एक चिड़िया है, जिसे मैं नहीं देख पाया। सुबह से शाम तक लगातार कोमल सुर में मुझी से कहती है- तुई...तुइतुइ...तुई....तुइतुइ। इतना अंतरंग बोलती थी कि किसी अपरिचित से नाम पूछने का मन नहीं हुआ।

फिर ठिठुरती चांदनी में केदार के ऊपर सूनी सफेदी याद आती है और अदहन के उबाल खाने के पहले की सनसनाहट जो हर दोपहर ढलने के साथ कनपटी पर महसूस होती थी....यानि अब बारिश होने वाली है। ...और जंगल जहां अब भी तनों पर लाइकेन का मखमल बचा हुआ है। हरा अंधेरा है जिसके निर्जनपन में भय और शांति एक दूसरे के कंधों पर हाथ डाले हर दिन लकड़ी बीनने या घास काटने के लिए जाते हैं।

सेत्ताराम...अगड़धत्त भोले ने बुलाया है। ढेरों साधु थे, किसिम-किसिम के जो बताते थे बेरोजगारी और पारिवारिक कलह समकालीन अध्यात्म की दो सबसे बड़ी मल्टीनेशनल फैक्ट्रियां है। किसी वरदान की आशा में उन्हें बूटी का पता बताते इंटर पास नौजवान थे जो एक सिगरेट की साझेदारी के तुरंत बाद यह पूछ कर असहाय कर देते थे कि सर उधर नीचे मुझे कोई जॉब मिल सकता है क्या?

उनकी ज्यादातर बातें भैणचो के कसैलेपन या अविश्वास के खूंट में बंधी मां कसम से शुरू या खत्म होती थीं...वे बुग्यालों में कुदरत के नखरों पर ध्यान दिए बगैर अपनी गाय, भैंसों के पीछे कोई पचास मीटर ऊपर चढ़ते थे और सुस्ताने के लिए लद्द से ढह पड़ते थे। नीचे सड़क पर दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, जयपुर, अहमदाबाद के नंबर प्लेटों वाली प्राइवेट गाड़ियां थीं जिनसे निकले देसी टूरिस्ट बाबू अपने अकड़े पैरों को सीधा करते हुए कांखते थे- वाऊ यहां क्या लाइफ है।

मैं पिछले दस दिन वहीं था। चोप्ता घाटी के दुगलभिट्टा की एक कोठरी में। लिमड़े की सब्जी जिंदगी में पहली बार खाई। देखने में चौलाई और भिंडी जैसा स्वाद। चूल्हे की राख का भभूत पोते मड़ुए की रोटी कोई पंद्रह साल बाद।

मैं अब भी वहीं हूं। जहां मक्कू और ताला के लड़के लड़कियां हाइस्कूल में थर्ड डिवीजन पास होने की खुशी में बधाई देने पर थैंक खू कह कर शरमाए जा रहे हैं। कुछ और देर वहीं रहना चाहता था लेकिन कबाड़खाने के संचालक अशोक ने आज शाम काफी खतरनाक अंदाज में धमकाया इसलिए यह सब लिखना पड़ रहा है।

हां, पूरे दिन में एक बार धारी माता की विनती करती एक बस आती जिस पर लिखा होता था न्यूनतम किराया- पांच रूपए और आपका व्यवहार ही आपका परिचय है। उसमें एक गाना बजता था जिसमें दिल्ली में नई सरकार के गठन का रहस्य छिपा हुआ था-

हाथ न पिलाइ हुसुकि, फूल न पिलाइ रम।
हाथ प्याग निर्दली दिदौन, कच्ची में टरकाया हम।

Monday, June 8, 2009

वे हमारे बर्टोल्ट ब्रेख़्त थे



महान संस्कृतिकर्मी हबीब तनवीर को जन संस्कृति मंच की श्रद्धांजलि

कल ८ जून. २००९ के दिन हमारे देश ही नहीं ,बल्कि दुनिया के महान रंगकर्मियों में शुमार हबीब तनवीर साहब का भोपाल में ८५ साल की उम्र में निधन हो गया। हबीब साहब का जाना सचमुच एक युग का अंत है। उन्होंने नाटक को ज़िंदगी के इतना करीब ला दिया कि उनके नाटक देख कर यह लगता था कि हर इंसान में एक अदाकार छिपा है। दिल्ली में ओखला की मज़दूर बस्तियों के मज़दूरों, जामिया के छात्रों और छत्तीसगढ़ के लोक कलाकारों को उन्होंने शानदार अदाकारों में ढाल दिया। उन्होंने अदाकारी के लिए बड़े- बड़े संस्थानों में प्रशिक्षित कलाकारों की जगह आम जनता के सामान्य लोगों पर भरोसा किया।

देश के वामपंथी आंदोलन, प्रगतिशील आंदोलन और इप्टा के साथ १९४५ से ही उनके सघन जुड़ाव ने उन्हें यह सीख दी थी कि जनता की कला जनता के भीतर से पैदा होगी, न कि अभिजन संस्थानों या फ़िर अपनी दुनिया में रहने वाले बुद्धिजीवियों से। हबीब साहब किसी भी जगह को स्टेज बना सकते थे, फ़िर वह बाज़ार हो, गली मुहल्ले हों या गांव। वे दक्षिण एशिया के बर्टोल्ट ब्रेष्ट थे।

सन १९५४ में ही उन्होंने 'आगरा बाज़ार' की प्रस्तुति के ज़रिए अपने रंगकर्म की निराली संकल्पना को अंजाम दिया। नज़ीर अकबराबादी जैसे १९वीं सदी के निराले जनकवि का हबीब साहब ने अपने रंगकर्म के ज़रिए उसी तरह से पुनराविष्कार किया, जैसा कि संगीत के ज़रिए कुमार गंधर्व ने कबीर का। हबीब साहब कवि और अभिनेता भी थे। रिचर्ड एटनबरो की 'गांधी' सहित ९ से ज़्यादा फ़िल्मों में उन्होंने अभिनय किया और फ़िल्मी परदे पर भी वे जहां भी दिखे, बाकी सबको पीछे छोड़ गए। १९६० के दशक से ही वे 'पोंगा पंडित' नाटक खेलते आए थे, लेकिन ९० के दशक में संघ परिवार ने इस नाटक पर बारंबार हमले किए, लेकिन इस निडर कलाकार का वे क्या कर सकते थे?

हबीब साहब को सरकारों और अकादमियों ने बहुत से सम्मानों से नवाज़ा- संगीत नाटक अकादमी अवार्ड,फ़ेलोशिप, पद्मश्री, पद्मभूषण, राज्य सभा की सदस्यता वगैरह, लेकिन ये सब उनके कलाकार के सामने बहुत छोटे साबित होते हैं। पांडवानी और नाच जैसी लोक कलाओं को दुनिया के स्तर पर अगर अपने नाटकों के ज़रिए ख्याति दिलाई तो हबीब तनवीर ने। छ्त्तीसगढ़ी भाषा को दुनिया हबीब साहब के चलते जानती है,जो 'चरनदास चोर' जैसे उनके महान नाटक की भाषा है। आज कितने संस्कृतिकमी ऎसे हैं, जिन्हें विदेशों मे इतना सम्मान मिला,जो योरप के उच्चतम संस्थानों से संबद्ध रहे, लेकिन अपनी माटी के अलावा जिनका न कोई आदि था न अंत, जैसा कि हबीब साहब का?


भोपाल गैस त्रासदी पर उनका नाटक २००२ में 'ज़हरीली हवा' नाम से खेला गया और इसी त्रासदी पर एक फ़िल्म जिसमें उन्होंने खुद अभिनय किया है, आने को है। इसी बीच अब वे हमसे विदा ले चुके हैं। हम सब उदास हैं। 'नया थियेटर' उनके बगैर भी ज़िंदा रहे, ये हम सबकी ख्वाहिश है।

प्रणय कृष्ण, महासचिव, जन संस्कृति मंच
राजेंद्र कुमार, अध्यक्ष, जसम, उत्तर प्रदेश







(ऊपर के चित्र: 'आगरा बाज़ार' के दो दृश्य)

सब ठाठ पड़ा रह जाएगा : हबीब तनवीर को श्रद्धांजलि



रायपुर (अब छत्तीसगढ़), में एक सितम्बर १९२१ को जन्मे देश के महानतम समकालीन नाटककारों में से एक हबीब अहमद ख़ान 'तनवीर' उर्फ़ हबीब तनवीर का आज सुबह करीब साढ़े छः बजे भोपाल में देहान्त हो गया.

हजरत बाबा नज़ीर अकबराबादी के जीवन पर आधारित उनका नाटक 'आगरा बाज़ार' किसी परिचय का मोहताज नहीं है. यही बात उनके एक और नाटक चरणदास चोर के बारे में कही जा सकती है.

कबाड़ख़ाने की तरफ़ से इस बड़े कलाकार को श्रद्धांजलि देता हुआ मैं उम्मीद करता हूं कि बहुत जल्द हबीब साहब पर एक ज़रूरी पोस्ट यहां देखने को मिलेगी.

( हिन्दी की ) किताबों तुम कहाँ हो ?



आवाज दे कहाँ है ?

अभी कुछ ही दिन पहले म. गा. अं हि. वि. की पत्रिका 'पुस्तक वार्ता' का नया अंक आया है. किताबों की दुनिया से रू-ब-रू कराने वाली इस पत्रिका को पढ़ने के बाद से मन बेकल है. पचास करोड़ लोगो द्वारा बोली जाने वाली हिन्दी भाषा के संसार में किताबों की दखल का अंदाजा क्या इसी बात से किया जाय कि दिनों - दिन पुस्तकों के संस्करण क्षीणतर होते जा रहे हैं और हम मुगालता पाले हुए हैं कि 'दुनिया रोज बनती है'. अगर इस पचास करोड़ीय संख्या का एक प्रतिशत भी किताबें पढ़ने वाल जीवधारी है तो यह कितना होता है ? हिसाब लगा लें और अपने अगल - बगल झाँककर आवाज दें - ( हिन्दी की ) किताबों तुम कहाँ हो ?

पहले पाँच हजार , फिर तीन हजार , फिर ग्यारह सौ, फिर पाँच सौ, फिर तीन सौ और अब सुना है कि सौ पर मामला आ गया है. साल बीतते - बीतते महत्वपूर्ण किताबों की सूची बनने - बिगड़ने लगती है, लोकार्पण - विमोचन समारोहों में भी किताबों की खूब धाँय-धूम होती है, पुस्तक मेलों के दौरान जमावड़ा भी कम नहीं होता है. इधर कुछेक समय से पत्रिकायें भी खूब निकल रही हैं - पुस्तक समीक्षाओं से लबालब भरी हुई फिर भी बावरा मन है कि कहे जा रहा है - ( हिन्दी की ) किताबों तुम कहाँ हो ?

पाढ़ाई - लिखाई के संस्थानों में कुंजियों , रिफ्रेशरों , 'एक अध्ययन' नुमा ग्रंथों और गाइडों की बहार है और साहित्य की दुनिया में हल्ला - गुल्ला , हाहाकार है. लगभग हर लिक्खाड़ या तो सेलेब्रिटी है या बनने की जुगत में जी - जान से जुता हुआ दिक्खे है. बड़े - बड़े सेमिनारों संगोष्ठियों छुटभैये बड़भैयों को किताबें सादर भेंट करने की परम्परा को अक्षुण्ण रखे हुए हैं , दुकानों पर किताबें ग्राहकों की बाट जोहती हुई ध्यानस्थ हैं. पुस्तकालयों की खरीद के तंत्र का हाल बेहाल है. खरीद -फरोख्त की दुनिया में किताब और कुछ नहीं बस माल है. इधर अपना बुरा हाल है.

कुछ किताबें हैं जो अब भी धड़ाधड़ छप रही हैं और बिक रही हैं. आपने कभी सोचा है कि उनके सदाबहार होने / बने रहने का रहस्य आखिर क्या है ! वह कहाँ छिपा है - काम में, नाम में या फिर दाम में ? अब दाम का क्या कहें ! क्या ग़ज़ब है साहब एक गत्ता भर लगा देने से दुगना दाम ! इस करिश्माई करामात को नमस्ते - सलाम !

बहुत कुछ है जो मन में घुमड़ रहा है, बादल बनकर बरसने को तैयार है किन्तु - परंतु -लेकिन डर लग रहा है कि अगर सबकुछ लिख दिया गया तो एक किताब बन जायेगी , और अगर ऐसा हो गया तो उसे छापेगा कौन ? कितनी प्रतियों का संस्करण होगा ? पेपरबैक और हार्डबाउण्ड प्रतियों का दाम क्या होगा ? पुस्तकालयों में ठेलने की प्रविधि क्या -कैसी होगी ? पुरस्कार प्राप्त करने की तरकीब कैसी होगी ? ठीक है -ठीक है - पाठक भी कोई चीज है उस पर भी कभी बात कर लेंगे . अभी तो ....

हिन्दी अपनी प्यारी हिन्दी और उसका साहित्यिक संसार..... अहा ! हहा ! आह ! वाह !

अजी सुनती हो !
हिन्दी की किताबों तुम कहाँ हो ?

आवाज दे कहाँ है ? दुनिया मेरी जवाँ है !

Sunday, June 7, 2009

दिल्ली के एक ऑटो का फ़रमान माडरन लड़कियों के नाम

ज़रा देखिये किस क्रियेटिव अदा से इन आटोचालक महोदय ने अपनी खीझ और गुस्से को अभिव्यक्ति दी है.


Saturday, June 6, 2009

हमारी किस्मत में सिर्फ विदूषक हैं!

पं.नेहरू के बाद पहली बार कोई प्रधानमंत्री पांच साल पूरा करने के बाद दोबारा गद्दी पर बैठा है। जाहिर है, कांग्रेस को जश्न मनाने का पूरा हक है। लेकिन सफलता की तुलना में जश्न का गुब्बारा कई गुना बड़ा है। बाजार जिस तरह इस गुब्बारे में हवा भरने में जुटा है, उससे इसके फूटने का खतरा साफ नजर आ रहा है। ऐसा लग रहा है कि जब सेंसेक्स डूबा था तो मनमोहन सिंह नहीं, कोई और प्रधानमंत्री था। गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई, मंदी, आतंकवाद, किसानों की आत्महत्या आदि ऐसे मुद्दे थे, जिन पर किसी भी सरकार की बलि चढ़ सकती थी । लेकिन मनमोहन की गद्दी बरकरार रही तो इसलिए कि जो विकल्प देने वाले नायक होने का दावा कर रहे थे, वे जनता की नजर में महज विदूषक थे। ये विकल्पहीनता लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है।

दरअसल, गैरकांग्रेसवाद के सारे पुरोधा उन्हीं बीमारियों के शिकार हो गए जिनके खिलाफ कभी उन्होंने जनता के बीच अलख जगाने की कोशिश की थी। कांग्रेस पर लोकतंत्र से खिलवाड़ करने, वंशवाद और भ्रष्टाचार जैसे आरोप लगाकर जिन्होंने राजनीति की सीढि़यां चढ़ीं वे शिखर पर पहुंचते ही उसी शक्ल में ढल गए जो कांग्रेस की पहचान थी। देश की जितने भी क्षेत्रीय जनाधार वाले दल हैं, वे किसी न किसी नेता की जागीर बन चुके हैं। न कोई नीति न कोई विचार, जो नेता जी कहें वही स्वीकार। उनके बेटा-बेटी को इस तरह उत्तराधिकारी बतौर पेश किया जाता है जैसे किसी राजवंश की स्थापना हुई हो। जो अविवाहित हैं उन्होंने भी वसीयत कर दी है कि उनके बाद कौन गद्दी संभालेगा। इतना ही नहीं, भ्रष्टाचार के मामले में जिस तरह उन्होंने रिकार्ड बनाए, उसके सामने कांग्रेसी दौर के किस्से कहीं नहीं ठहरते। शायद ही कोई होगा जो आय से ज्यादा संपत्ति के मामले में फंसा न हो।

उधर, क्षेत्रीय दलों के नकार में दोध्रुवीय राजनीति का सपना देख रही बीजपी को भी विकल्प कैसे माना जाता। कम से कम आर्थिक मोर्चे पर कांग्रेस से अलग दिखने के लिए उसके पास कुछ भी नहीं है। स्वेदेशी का विचार तो तभी दफ्ना दिया गया था जब उसे केंद्र में सरकार चलाने का मौका मिला। परमाणु करार मुद्दे का विरोध बाद में कैसे समर्थन में बदल गया, कोई नहीं जानता। कांग्रेस के वंशवाद का विरोध करने वाली पार्टी के तमाम नेताओं के बेटा-बेटी, बतौर उत्तराधिकारी पेश किए गए, पर कोई आवाज नहीं उठी। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भी जगहंसाई कम नहीं हुई। चाहे तहलका कांड हो, या रिश्वत लेकर संसद में सवाल पूछने का मसला, बीजेपी नेता और सांसद हमेशा आगे-आगे नजर आए।

बीजेपी इस मामले में जरूर कांग्रेस से अलग है कि वो अल्पसंख्यकों के नाम पर घड़ियाली आंसू नहीं बहाती। बल्कि उलटे-सीधे तथ्यों के आधार पर बहुसंख्यकों को डराने के लिए उनका इस्तेमाल करती है। लेकिन उसके उन्मादी तेवर देश के मिजाज से मेल नहीं खाते। मोदी या वरुण गांधी के भाषण पर ताली चाहे जितनी बजी हो, लालकिले से ऐसी भाषा सुनने के लिए देश तैयार नहीं। वैसे भी, उन्माद की सबसे बड़ी पहचान यही है कि वो स्थायी नहीं रहता। इसलिए उन्माद का झाग बैठते ही वोटों का सूखा पड़ जाता है।

दूसरी तरफ तीसरे मोर्चे के नाम पर अवसरवादी नेताओं का जमघट तैयार करने वाले वामपंथियों ने भी विचारधारा के नाम पर गजब प्रहसन रचा। जिन नीतियों को लेकर मनमोहन सरकार को कोसते रहे, पश्चिम बंगाल में उन्हीं को लागू करने की कोशिश करते रहे। सिंगूर और नंदीग्राम में उनका जैसा बर्बर चेहरा सामने आया, उसने किसान-मजदूर को लेकर लगाए जाने वाले उनके तमाम नारों को खोखला साबित कर दिया। आखिर जनता ये दोमुंहापन कैसे बर्दाश्त करती। वामपंथियों के शिखर पर भ्रष्टाचार के छींटे चाहे न पड़े हों, कैडर के भ्रष्टाचार की कहानी गांव-गांव सुनाई जा रही थी। हद तो ये हो गई कि कांग्रेसी संस्कृति में पली-बढ़ी ममता कहीं ज्यादा वामपंथी नजर आ रही थीं। ये संयोग नहीं कि महाश्वेता देवी जैसी मशहूर लेखिका ही नहीं वामपंथी छवि के बुद्धिजीवियों, लेखकों, संस्कृतिकर्मियों की बड़ी तादाद ममता के लिए नारे लगाने निकल पड़ी।

ऐसे में, सोनिया-राहुल की जोड़ी लोगों को स्वाभाविक ही बेहतर नजर आई। मनमोहन सिंह की सादगी और ईमानदारी ने भी प्रभावित किया होगा। आम भावना है कि कांग्रेस का शिखर भ्रष्टाचार से मुक्त है। विदेशी मूल को लेकर निशाने पर रहीं सोनिया ने नैतिकता की ऐसी बड़ी रेखा खींची कि बाकी खुद ब खुद छोटे नजर आए। 2004 में जिन्होंने प्रधानमंत्री पद के त्याग को उनकी मजबूरी बताया था, वे भी नहीं कह सकते कि 2009 में राहुल को प्रधानमंत्री न बनाना भी किसी दबाव का नतीजा है। मनमोहन सिंह को दोबारा प्रधानमंत्री बनाकर इस परिवार ने खुद को सत्तालोलुप राजनीतिज्ञों की पांत से अलग दिखा दिया।
लेकिन क्या सचमुच कांग्रेस के विकल्प की जरूरत नहीं है। क्या वे मुद्दे वाकई बेमानी हो गए जिनकी वजह से कभी गैरकांग्रेसवाद का जन्म हुआ था। खासतौर पर किसान, मजदूर, पिछड़ों, दलितों, आदिवासियों या क्षेत्रीय अस्मिताओं की बात करने वालों की बात सुनने को क्या देश सचमुच तैयार नहीं है। आंकड़े ऐसा बिलकुल नहीं कहते। कांग्रेस को बमुश्किल 29 फीसदी मतदाताओं ने वोट दिया है। यानी 71 फीसदी जनता ने उसकी नीतियों को नकारा है। कांग्रेस को बहुमत से 66 सीटें कम मिलीं और यूपीए भी निर्णायक बहुमत नहीं पा सका। जिस उत्तर प्रदेश में मायावती और मुलायम को पिटा हुआ कहा जा रहा है वहां बीएसपी को 27.42 फीसदी और समाजवादी पार्टी को 23.26 फीसदी वोट हासिल हुए हैं। सारे राहुल फैक्टर के बावजूद यूपी में कांग्रेस को महज 18.25 फीसदी लोगों का समर्थन हासिल हुआ।

इन आंकड़ों से साफ है कि देश विकल्प की तलाश में है। आखिर 19 साल पहले मनमोहन सिंह ने उदारीकरण का जो सिलसिला शुरू किया था, उससे अमीरों की अमीरी चाहे बढ़ी हो, गरीबी कम नहीं हुई। 77 फीसदी से ज्यादा लोग 20 रुपये रोज कमा पाते हैं, ये आंकड़ा खुद उनकी सरकार की कमेटी का है। खतरा ये है कि 300 करोड़पतियों वाली संसद में गरीबों, दलितों, आदिवासियों के मुद्दों को दरकिनार न कर दिया जाए। बाजारवादी अर्थव्यवस्था के दिवालिया हो जाने के बावजूद जिस तरह से उसी राह पर तेजी से चलने का जोश दिखाया जा रहा है, उससे आने वाले दिनों में मुश्किलों का बढ़ना तय है। पर भारतीय जनता का दुर्भाग्य है कि जब किसी मौलिक विकल्प की सबसे ज्यादा जरूरत है तो उसके पास नायक नहीं, महज विदूषक रह गए हैं।

कोई तो जान-ए-तसव्वुर हो जिसके हो लें

कुछ दिन पहले सुख़नसाज़ पर मेहदी हसन साहब की गाई जनाब कृष्ण अदीब की लिखी एक मशहूर ग़ज़ल पोस्ट की थी.
सुख़नसाज़ पर उनके बारे में यह लिखा गया था:

"उर्दू के शायर कृष्ण 'अदीब' साहब का जन्म जालंधर ज़िले में २१ नवम्बर १९२५ को हुआ था. पन्द्रह साल की आयु में घर छोड़ने पर विवश हुए - कुलीगिरी की, फ़ैक्ट्री में मज़दूर रहे.अपने जीवन का ज़्यादातर समय उन्होंने लुधियाना में बिताया. पंजाब कृषि विश्वविद्यालय में वरिष्ठ फ़ोटोग्राफ़र के तौर पर काम करने के बाद वे १९८५ में रिटायर हुए. लम्बी बीमारी और आर्थिक कमी के चलते ७ जुलाई १९९५ को उनकी मृत्यु हुई. 'अदीब' साहब की मुख्य किताबों में 'आवाज़ की परछाइयां', 'फूल, पत्ते और ख़ुशबू' और 'रौ में है रख्शे उम्र' प्रमुख हैं."

इस पोस्ट की प्रतिक्रिया में मुझे सात समुन्दर पार से यह ग़ज़ल बतौर सौग़ात प्राप्त हुई. अदीब साहब की ही लिखी हुई है. गाया है सदाबहार मोहम्मद रफ़ी ने.



आप भी आनन्द लीजिए इस सुन्दर ग़ज़ल का:



तल्ख़ि-ए-मै में ज़रा तल्ख़ि-ए-दिल भी घोलें
और कुछ देर यहां बैठ लें पी लें रो लें

हर तरफ़ एक पुर असरार सी ख़ामोशी है
अपने साये से कोई बात करें कुछ रो लें

कोई तो शख़्स हो जी जान से चाहें जिसको
कोई तो जान-ए-तसव्वुर हो जिसके हो लें

आह ये दिल की कसक हाय ये आंखों की जलन
नींद आ जाए अगर आज तो हम भी सो लें

(डाउनलोड यहां से करें: तल्ख़ि-ए-मै में ज़रा तल्ख़ि-ए-दिल भी घोलें)

Thursday, June 4, 2009

बच्चे या कूड़ा!


दिल्ली के गाज़ीपुर गारबेज डंप में दिन बिताने वाले इन बच्चों का कूड़े से अलग कोई वज़ूद नहीं!

(फोटो: रायटर)


(तस्वीर पर क्लिक करें)

Wednesday, June 3, 2009

छाप तिलक



आज सुबह से ही बहुत उमस है . कुछ करने का मन नहीं है सिवाय संगीत सुनने के. तो वही किया जाय और क्या !

आइए सुनते हैं उस्ताद शुजात खान साहब की प्रस्तुति - छाप तिलक . यह रचना कितनी - कितनी आवाजों है , फिर भी हर बार नई .. इसीलिए तो कालजयी ...अमीर खुसरो की इस सर्वाधिक प्रसिद्ध रचना के बारे में क्या कहा जाय ! मेरी क्या बिसात. आइए बस्स सुनें... और क्या !

Monday, June 1, 2009

मेरे खिलाफ एक खामोश साजिश है


पिछले दिनों उपन्यासकार कृष्ण बलदेव वैद इंदौर में थे। मेरे लिए हिंदी में उनकी उपस्थिति बहुत हसीन और मारू है। मुझे उनका गद्य पसंद आता है। वह एक साथ मारक और मोहक है। इतना अलहदा है कि उसकी किसी से तुलना नहीं की जा सकती है। अप्रतिम। अतुलनीय। वे इतने मौलिक है कि उनकी नकल संभव नहीं। यह आकस्मिक नहीं है कि हिंदी में न तो वे किसी गद्य परंपरा में आते हैं और न ही कोई उनकी परंपरा में आता है। उनका रास्ता दूसरों से अलग है, भिन्न है। वे अपने रास्ते पर अकेले हैं। उनका गद्य अकेले और अलग हो जाने का गद्य है। मेरे मन में हिंदी के जिन चार साहित्यकारों से मिलने की बहुत गहरी इच्छा थी उनमें वे एक थे। मैं निर्मल वर्मा, मनोहर श्याम जोशी, कृष्ण बलदेव वैद और विनोदकुमार शुक्ल से मिलना चाहता था। बात करना चाहता था। अब तक मैं सिर्फ वैद साहब से ही नहीं मिल पाया था। इसलिए जब पता चला कि वैद साहब मेरे शहर में है तो मैंने चित्रकार अखिलेश से उनका नंबर लिया। अखिलेश ने उनकी पत्नी चम्पा वैद के चित्रों की एकल नुमाइश इंदौर में आयोजित की थी। वैद साहब अपनी पत्नी के साथ ही इंदौर आए थे। यहां प्रस्तुत है एक लंबी बातचीत का छोटा सा अंश।


जाने-माने उपन्यासकार और कहानीकार कृष्ण बलदेव वैद का कहना है कि हिंदी साहि्त्य में उनके खिलाफ एक खामोश साजिश है। कुछ आलोचकों ने बिना पढ़े उनके बारे में यह हवा उड़ाई गई कि वे अपठनीय हैं और उन्हें पढ़ना वक्त जाया करना है। उन्होंने कहा कि मेरे लेखन की भिन्नता या विलक्षणता (जैसा कि आपने कहा ) के कारण एक सोची-समझी साइलेंसी रही है।
यह मेरा दुर्भाग्य है कि हिंदी में यह हुआ लेकिन बावजूद इसके मेरी जुदा उपस्थिति है तो इसकी वजहें साफ है। और वे ये हैं कि मैंने इन तथाकथित आरोपों का जवाब नहीं दिया। न लिखकर और न ही किसी साक्षात्कार में। मैं तो इसका जवाब सिर्फ रचनात्मक स्तर पर निरंतर रचते हुए दे सकता था जो मैंने किया। मेरे खिलाफ हिंदी में जो खामोश साजिश है उसने मुझे ताकत ही दी है। और मैंने जिद में साहित्य की मुख्यधारा में जाने से इनकार किया। मैं भिन्न हूं, यथार्थ को देखने की मेरी निगाह अलहदा है। मैंने अपने लेखन में सहज और सायास यह कोशिश की कि ऐसा लिखूं जो मुझे पसंद आए। सामाजिक यथार्थवाद मुझे उबाता है। अधिकांशतः एक बने -बनाए ढांचे में इस यथार्थ को अभिव्यक्त किया गया है। इसमें गरीबी से लेकर भूख का खराब चित्रण है। लेकिन मेरी निगाह दूसरी है। मैंने निर्भीकता से रचा। यदि आप समाज का कोई कोढ़ देख रहे हैं तो उसे आंखें खोल कर देखा जाना चाहिए। मैंने किसी भी तरह के औचित्य का अंकुश स्वीकार नहीं किया और अपनी तरह से लिखा।
उल्लेखनीय है कि उसका बचपन, बिमम उर्फ जाएं तो जाएं कहां, काला कोलाज, गुजरा हुआ जमाना, मायालोक उनके ऐसे उपन्यास हैं जो यथार्थ को किसी भी रूढ़ ढांचे में अभिव्यक्त नहीं करते बल्कि नवाचार के जरिये उपन्यास-परिदृश्य में हस्तक्षेप करते हैं।
वे कहते हैं- हिंदी साहित्य में डलनेस को बहुत महत्व दिया जाता है। भारी-भरकम और गंभीरता को महत्व दिया जाता है। आलम यह है कि भीगी भीगी तान और भिंची भिंची सी मुस्कान पसंद की जाती है। और यह भी कि हिंदी में अब भी शिल्प को शक की निगाह से देखा जाता है। बिमल उर्फ जाएं तो जाएं कहां उपन्यास को अश्लील कह कर खारिज किया गया। मुझे पर विदेशी लेखकों की नकल का आरोप लगाया गया लेकिन मैं अपनी अवहेलना या किसी बहसबाजी में नहीं पढ़ा। अब मैं 82 का हो गया हूं और बतौर लेखक मैं मानता हूं कि मेरा कोई नुकसान नहीं कर सका। मैंने अपनी अवहेलना का नजरअंदाज किया और जैसा लिखना चाहा, वैसा लिखा। जैसे प्रयोग करना चाहे किए।