Wednesday, July 6, 2011

मेरे बाद किसी मां को यह दर्द न मिले

कल आपने शहीद पत्रकार हेम चन्द्र पांडे के छोटे भाई की स्मृतियां पढ़ी थीं. आज इसी जांबाज़ पत्रकार की आदरणीय माता जी श्रीमती रमा पांडे झूठतन्त्र द्वारा छीन लिए गए अपने बेटे को याद कर रही हैं -


गणतंत्र अपने बच्चों को मारने की इजाजत नहीं देता. सुप्रीम कोर्ट का यह बयान मेरे लिए उम्मीद की एक किरण की तरह है. मैं अपने बेटे के हत्यारों को फांसी के फंदे पर लटके हुए देखना चाहती हूं. यह बयान उन लोगों के लिए नई बात होगी जो अब तक केवल एक ही पक्ष सुन रहे थे. यह उन लोगों के लिए भी नई बात हो सकती है जो पुलिस की बताई कहानी लिखते और छापते हैं. कोर्ट के इस बयान के बाद मेरे बेटे की शहादत के मायने मजबूत होते होते हैं.

मुझे यकीन था कि मेरा बेटा हथियार नहीं उठा सकता. पैदा होने के बाद से लेकर फर्जी मुठभेड़ में उसके मारे जाने के बीच, मुझे कोई ऐसा वाक़या याद नहीं आता जिसमें वह कभी हिंसक दिखा हो. बेहद जिम्मेदार था मेरा बेटा. सामान्य तौर पर हर बच्चे पर उसके माता-पिता का प्रभाव पड़ता है लेकिन मेरे बेटे ने हमें प्रभावित किया था. कुछ बातों में मेरा जरूर उससे मतभेद था इसके बावजूद वह अपना धर्म पूरी तरह निभाता था. समाज से जुड़े रहने की उसकी चाहत ही थी कि वह घोर नास्तिक होते हुए भी वो लोगों की धार्मिक भावनाओं का सम्मान करता था.

बचपन से ही उसे कई काम एक साथ करने की उसे आदत थी. कक्षा नौ में रहा होगा जब हमारा परिवार आर्थिक तंगी से गुजर रहा था. तब हम रामपुर में रहते थे. उसने अपने लिए लॉटरी के टिकटों पर मोहर लगाने का काम खोज लिया. एक साबुन फैक्टरी में भी उसने काम किया. उसकी योग्यता को देखर फैक्टरी स्वामी उसे गोद लेने की बात कहने लगे थे. आज सोचती हूं कि मैंने इनकार न किया होता तो शायद वो जीवित होता.

बाद में हम देवलथल चले आए. यहां भी संसाधनों का अभाव था. पर पहाड़ तो पहाड़ है जीवन किसी तरह चलता रहा. इन बदलावों और अभावों को मैं तो जी रही थी, लेकिन वह इन अभावों के कारण खोजने लगा था. वह ग्यारहवीं या बारहवीं में पढ़ता होगा तभी से उसने कोर्स से बाहर की किताबें पढ़नी शुरू कर दी. इसी बीच उसने पूजा-पाठ करना भी छोड़ दिया. कुछ दिन हमें सबकुछ अटपटा लगा लेकिन धीरे-धीरे हमें भी इसकी आदत हो गई. बाद में कई बार मुझे लगता कि मेरा बेटा आज के युवाओं से बिलकुल अलग है. जिस दौर में युवाओं को अपने करियर की चिंता सताती है उस दौर में वह सताये हुए गरीब लोगों की चिंता करने लगा था.
मुझे अच्छी तरह याद है देवलथल में अवैध खड़िया खनन के खिलाफ पहली बार उसने आवाज उठाई थी. उसके पापा बहुत नाराज हुए थे लेकिन वह नहीं डिगा.

घर की परिस्थितियों की चर्चा करते हुए मैंने कई बार उसे नौकरी के लिए कहा लेकिन उसने नौकरी के लिए कभी आवेदन नहीं किया. हां, इसके बाद उसने घर से पैसा लेना बंद कर दिया. वह पिथौरागढ़ के छात्र आंदोलनों और जन आंदोलनों का भागीदार था. पहली बार इसका पता मुझे तब चला जब हमने अखबार में उसका फोटो देखा. इस बार भी उसके पापा बहुत नाराज़ हुए थे. लेकिन मैं इस बार भी खुश थी. उसकी लड़ाई लगातार तेज हो रही थी और हमारा जीवन उसी मंथर गति से चल रहा था. अब वह बड़े-बड़े सेमिनारों में जाने लगा था. कई लोगों ने मुझसे कहा कि तुम्हारा बेटा बहुत अच्छा भाषण देता है. सुनने का मौका ही नहीं मिला और वह खामोश हो गया.

कॉलेज खत्म होने के बाद भी वह अपनी पढ़ाई में मस्त रहा. अखबारों में उसके लेख छपने लगे थे कहा करता था मम्मी एक शब्द नहीं काटा है. वह क्या लिखता था मेरी समझ में कभी नहीं आया, इसके बावजूद मैं उसके सभी लेख पढ़ती थी. उसके लेखों में किसानों, बेरोजगारों और बढ़ती महंगाई की चिंता को मैंने जरूर महसूस किया था. ऐसे युवा को क्यों गोली मार दी गई? इसका जवाब मिल पाएगा क्या कभी? जवाब मिल भी जाए तो क्या हेम जैसे युवाओं की क्षतिपूर्ति कर सकती है पुलिस? अकेला हेम नहीं उससे पहले भी कई लोग हैं जिनकी मां के पास अपनी बात लिखने के साधन तक नहीं. मैं कहीं तो भाग्यशाली हूं जो अपनी बात कह पा रही हूं. इसलिए जरूरी है कि यह तय किया जाए कि मेरे बाद किसी मां को यह दर्द न मिले. वरना फिर किसी बेगुनाह को गरीबों, दलितों और पिछड़ों की बात करने पर गोली मार दी जाएगी.

(विचारधारा वाला पत्रकार - हेम चन्द्र पांडे से. पुस्तक प्राप्त करने हेतु इस पते पर मेल करें - bhupens@gmail.com अथवा भूपेन से इस नम्बर पर बात करें -.+91-9999169886 पुस्तक की कीमत है १५० रुपए)

बीबी हव्वा गाए बधावा, मरियम्मा दे नेग


क़व्वाल बच्चा घराने से ताल्लुक रखने वाले बड़े गायक उस्ताद नसरुद्दीन सामी साहब का एक छोटा सा वीडियो लंका चल्यो राम मैंने काफ़ी समय पहले कबाड़ख़ानेमें लगाया था. आज यूं ही ज़फर हुसैन बंदायूनी की गाई क़व्वाली "बारो घी के दीये" सुनता हुआ नैट खंगाल रहा था कि पता लगा उस्ताद सामी साहब के सुपुत्र रऊफ़ सामी ने अपने भाईयों के साथ बाक़ायदा सामी बिरादरान क़व्वाल नाम से अपना ग्रुप बना रखा है जिसे शोहरत मिलना फ़िलहाल बाक़ी है. उन्होंने भी इस रचना को गाया है और अच्छा गाया है. बेहद अच्छा.

मोहम्मद साहब के जन्म के अवसर गाए गए इस बधावे को जो शक्ल सामी बिरादरान ने बख़्शी है, आप लम्बे समय तक भूल न सकेंगे.

Baro Ghi Ke Diye by Saami Qawwals from Tasawwuf on Vimeo.


नामवर फ़नकार बहाउद्दीन कुतुबुद्दीन क़व्वाल भी इस ठेठ पूरबी शैली की क़व्वाली को गा चुके हैं. कभी मौका लगा तो सुनवाऊंगा.

Tuesday, July 5, 2011

ददा, मुझे भगत सिंह की याद दिलाता था

१-२ जुलाई की रात को आन्ध्रप्रदेश की पुलिस द्वारा सीपीआई (माओवादी) के प्रवक्ता चेरुकुरी राजकुमार उर्फ़ आज़ाद के साथ फ़र्ज़ी मुठभेड़ में मार डाले गए युवा पत्रकार हेम चन्द्र पाण्डे की पहली पुण्य स्मति के अवसर पर दिल्ली में हेम के मित्रों ने कबाड़ी भूपेन की कमान/सम्पादन तले "विचारधारा वाला पत्रकार - हेम चन्द्र पाण्डे" नाम से एक स्मारिका/पुस्तक प्रकाशित की. किताब में गौतम नवलखा, आनन्द स्वरूप वर्मा, सुभाष गाताड़े, जावेद नक़वी, सुकुमार मुरलीधरन, नीलाभ, अनिल चमड़िया और राहुल पंडिता इत्यादि के आलेख तो हैं ही हेम के लिखे चुनिन्दा लेख भी हैं. हेम चन्द्र पांडे से गहरे जुड़े रहे लोगों ने अपने आत्मीय तरीक़े से उसे याद किया है. इस किताब से आपको कुछेक चुनिन्दा हिस्से पढ़वाए जाएंगे. शुरू में पढ़िये हेम के छोटे भाई राजीव द्वारा अपने ददा की याद. राजीव स्वयं अच्छे पत्रकार हैं और वर्तमान में हल्द्वानी में अमर उजाला से जुड़े हुए हैं.


ददा, मुझे भगत सिंह की याद दिलाता था

राजीव पांडे

एक जुलाई को दिन में करीब ढाई बजे उसके लापता होने की ख़बर फोन पर मिली तो मैं नहीं घबराया. मुझे उम्मीद थी, जल्द ही उसका फोन आएगा और आवाज गूंजेगी ‘क्या हाल हैं बॉबी’. ऐसा नहीं हुआ. उसकी आवाज बंद कर दी गई थी. तीन जुलाई को उसके न रहने की अपुष्ट खबर मिली. मुझे जैसे ही सूचना मिली मैं हल्द्वानी में मां को घर पर अकेला छोड़कर दिल्ली के लिए रवाना हो गया. दिल्ली पहुंचकर पता चला कि एक फर्जी मुठभेड़ में पुलिस ने उसकी हत्या कर दी है. हत्या इसलिए की गई क्योंकि वो नक्सली नेता आजाद के साथ था. यह लोकतांत्रिक देश में तानाशाही का चरम था.

उत्तराखंड के छोटे से कस्बे देवलथल में पहली सांस लेने वाले हेम ने अंतिम सांस आंध्र प्रदेश में के जंगलों में ली या उसका शव वहां लाकर फेंक दिया गया, यह तो उसके हत्यारे ही बता पाएंगे. पर वह ख़ामोशी से नहीं मरा. उसकी मौत की हलचल पूरे देश में थी. विदेशों तक भी इसकी गूंज गई. जिस भाई ने तीन दिन पहले मुझसे दो-चार दिन में घर आने का वायदा किया था उसका शव लेने मुझे भाभी के साथ आंध्र प्रदेश के आदिलाबाद जाना था. यह किसी चुनौती से कम नहीं था. उसकी शहादत से ही मुझे हिम्मत मिली. वह जाते-जाते मुझे सच के लिए मरना भी सिखा गया.

दिल्ली से हैदराबाद के तीन घंटे के सफर में एकाएक सब बीती बातें याद आने लगीं. बचपन से लेकर जवानी तक. देवलथल के सामाजिक परिवेश और पारिवारिक स्थितियों ने उसे समय से पहले ही समझदार बना दिया था. वह मजबूरियों से हारा नहीं, स्थितियों में बदलाव की इच्छा उसमें पैदा हो गई. यह इच्छा हर गरीब, निम्न मध्यवर्गीय परिवार में होती है. पर हेम पांडे ने अपने परिवार से आगे निकलकर व्यापक स्तर पर बदलाव का सपना देखा-समाज को बदलने का सपना देखा.

हर बच्चे की तरह उसमें भी मां-पापा का पूरा असर था. मां की तरह धार्मिक होने के कारण ही वह मंगलवार और बृहस्पतिवार का उपवास रखता था बाद में स्थितियां बदल गईं. वह चीजों को तर्कों में तौलने लगा और किसी भी ऐसी चीज में विश्वास नहीं करता, जिसका अस्तित्व न हो. पापा की तरह शांत और गंभीर भी वह था. सबकी तरह पापा का भी साधारण-सा सपना था कि दोनों बच्चे नौकरी में लगें और परिवार का वक्त बदले. घर में किसी के पास भी स्थाई आय का जरिया न होने के कारण आर्थिक तंगी साथ चलती रही. हालांकि मां-पापा ने दिन-रात मेहनत कर हर जरूरत की चीज हमें दी. हम बढ़े हो रहे थे. सबकी उम्मीदें उस पर टिकी थीं. वह पढ़ने में भी तेज़ था. पर बदलाव की जो इच्छा उसके मन में घर कर गई थी उस रास्ते में करियर नाम का कोई पड़ाव नहीं आता.

वह जान गया था कि अकेले लड़ाइयां नहीं जीती जातीं. बदलाव के लिए संगठन की जरूरत उसकी समझ में आई. किताबें उसकी दोस्त बनने लगीं. उसने आइसा ज्वाइन कर ली. वामपंथ की तरफ उसका रुझान बढ़ता गया. शोषण के खिलाफ पहली लड़ाई उसने अपने घर से ही शुरू की. देवलथल में होने वाले अवैध खड़िया खनन के खिलाफ वह पहली बार बोला. इस धंधे में ठेकेदार गरीब दलितों की जमीन से खड़िया निकाल लाखों कमाते और जमीन के मालिकों को मिलती दो वक्त की रोटी और दिनभर दारू. इसे लेकर कई बार उसका घर में विवाद भी हुआ. क्योंकि कई ठेकेदार हमारे पारिवारिक मित्र थे. लेकिन वह शोषण के खिलाफ खड़ा रहा.

पापा उसे काम-धंधे में झोंकने की सोचने लगे थे लेकिन वह बचता रहा. पापा ने उसे कई बार नौकरी से चिपकाने की कोशिश की पर ऐसा नहीं हुआ. बीए अंतिम वर्ष में उसने पापा से किसी भी तरह की सरकारी नौकरी करने से इनकार कर दिया. परिवार के लिए यह एक झटका था. उस समय समाज को बदलने का उसका यह जज्बा हमारे लिए पागलपन था. चार लोगों के परिवार में तीन उसे लेकर चिंतित थे पर वह मस्त था, उसके कमरे में लगातार किताबों की संख्या बढ़ रही थी. अब मां के कहने पर उपवास रखने वाला बेटा भगवान को लेकर सवाल करने लगा. वह सवाल करता था लेकिन किसी की आस्था का मजाक उसने कभी नहीं उड़ाया. वह किसी भी कुरीति के खिलाफ बोलता था तो बड़ी संजीदगी से. उसे पता था कि आदमी के पैदा होने के साथ ही रूढ़ियों में उसे कैसे जकड़ लिया जाता है. इन रूढ़ियों को किसी से दूरी बनाकर नहीं उन्हें तर्कों से काटकर और सामने वाले की सोच बदलकर जीता जाता है. जबकि आज के बहुत से युवा मार्क्स, लेनिन या माओ की जीवनी पढ़कर ही खुद को क्रांतिकारी मानने लगते हैं. माथे पर चंदन-टीका लगाने वालों से वह एक दूरी रखते हैं, हालांकि, संकट के समय इन्हें हनुमान चालीसा याद आ जाती है. हेम इन सबसे अलग था. प्रत्येक विचारधारा का व्यक्ति उसका मित्र बन जाता था. उसकी नजर में कभी कोई व्यक्ति बुरा नहीं था. मैं कभी किसी की बुराई भी करता तो वह मुझे पूर तर्कों के साथ समझाता कि परिस्थितियां कैसे आदमी को बुरा बनने पर मजबूर करती हैं. वह उन परिस्थतियों को बदलना चाहता था. किसी भी बुराई के लिए उसने व्यक्ति को कभी दोषी नहीं माना. मैंने उसकी यह बात मान ली थी, लेकिन उसके जाने के बाद मैं उसकी इस बात से असहमत हूं. आज वह होता तो मैं उससे पूछता उसके उन चुनिंदा दोस्तों के बारे में, जिन्होंने उसकी मौत पर दुख तक व्यक्त नहीं किया. उनमें से अधिकांश उसके वैचारिक मित्र थे. मैं उससे पूछता कि क्या किसी विचारधारा से जुड़ा व्यक्ति धूर्त हो सकता है कि वह उसका इस्तेमाल सिर्फ़ अपने हित के लिए करे. ऐसे बहुत से सवाल हैं जो मैं अपने उस भाई से पूछता, जिसने अपने विचार के लिए प्राण दे दिए.

वैचारिक मतभेद पाटने की कला उसे आती थी. वह तर्कों से अपनी बात मनवाता था, किसी पर कभी कुछ थोपता नहीं था. अपने विचार के प्रति उसकी यह प्रतिबद्धता ही थी कि कई दक्षिणपंथियों को वह वामपंथ की धारा में ले आया. कभी घोर अराजक रहे पापा को भी उसने सही दिशा दी थी. उसकी राजनीति में रुचि पहले उन्हें काफ़ी अखरती थी. बाद में व्यवस्था को लेकर पापा से उसकी अक्सर बहस होने लगी. इन बहसों का ही असर था कि धीरे-धीरे वे उसके साथ सेमिनारों में जाने लगे, कई बार मैं भी गया. कभी गुमसुम रहने वाले हेम पांडे का भाषण सुनने लायक होता था. उसके संबोधन का केंद्र हमेशा समाज का सबसे पिछड़ा व्यक्ति रहा. कभी अपने बेटे के लिए नौकरी का रोना रोने वाले पापा को अब उस पर गर्व होने लगा था. पापा समझ गए थे कि हेम ऐसे लोगों की मदद कर रहा है जिनके लिए न संविधान में कोई जगह और न ही सरकार की कोई योजना उन तक पहुंचती है. उसने हमारे परिवार को दुनिया को नए तरीक़े से देखने का नजरिया दिया था. हम खुशकिस्मत हैं कि इस बार भगत सिंह हमारे परिवार में पैदा हुआ.

नेतृत्व और संगठन बनाने की क्षमता भी हेम पांडे में कूट-कूट कर भरी हुई थी. आइसा छोड़ने के बाद वह एआईपीएसएपफ संगठन से जुड़ा. इसके बाद वह अपने कई मित्रों से अलग-थलग पड़ गया. लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी क्योंकि अपने विचार के लिए वह हमेशा समर्पित रहा. इसी का परिणाम था कि पिथौरागढ़ में उसने धीरे-धीरे इस छात्र संगठन को मजबूत बना दिया. हालांकि उसके सारे साथी उसकी तरह प्रतिबद्ध नहीं निकले. उसके जाने के बाद आज जब मैं आकलन करता हूं तो कई जगह वह मुझे अकेला नजर आता है. उसके मौकापरस्त दोस्तों को लेकर भी मेरी उससे कई बार चर्चा हुई. इसे लेकर उसका हमेशा एक ही जवाब होता, लोग आते-जाते रहते हैं लेकिन विचार अपनी जगह रहता है. उसकी मजबूती ही थी कि वह मरते दम तक अपने विचार के साथ रहा.
पढ़ाई पूरी करने के बाद जब पहाड़ के युवा रोजगार की तलाश में मैदानों की ओर भागते हैं उसने गांवों की ओर जाने वाला रास्ता चुना. जहां आज पढ़े लिखे युवाओं की सबसे अधिक जरूरत थी. पहाड़ के गांवों की तरफ जहां जवानी और पानी नहीं ठहरते. उन गांवों में रहकर उसने कई सालों तक गरीबों के लिए काम किया. लोगों को उनके हक के लिए जागरूक किया. मुझे आज भी याद है एक बार मैं अल्मोड़ा उसके कमरे में रुका था. कमरे में बिजली के कई बिल पड़े थे. मैंने पूछा तो पता चला कि वह गरीब गांव वालों के बिल थे. उन बिलों की गड़बड़ियों को ठीक कर उन्हें जमा करना था. यह सब ऐसे काम थे जिनके लिए किसानी, पशुपालन करने वाले किसानों को अपना पूरा दिन देना पड़ता था. निरक्षर लोगों के लिए यह और भी मशक्कत का काम होता था. इन सब कामों को ददा बड़ी जिम्मेदारी से निभाता. गांवों में घूमना और पढ़ना-लिखना ही उसका जीवन बन गया था. खाने-पीने की अनियमितता से उसका शरीर कमजोर हो रहा था. लेकिन उसकी चेहरे पर मासूम चमक लगातार तेज़ हो रही थी. आदिलाबाद के जंगल में पड़े उसके शव के चेहरे पर भी मुस्कराहट थी.

शादी और एक लंबे दौर तक गांवों में काम करने के बाद आजीविका के लिए वह दिल्ली तो गया लेकिन गरीब और जरूरतमंद लोगों से वह कभी दूर नहीं हुआ. दिल्ली में पत्रकारिता को उसने पेशा बनाया. गांव छोड़ने के बावजूद उसकी कलम में हमेशा गांव और गरीब किसान ही रमे रहे. आज जब पत्रकारों की कलम से बाजार की बोली के अलावा और कुछ नहीं निकलता वह शोषित समाज के दर्द को शब्द देता रहा. लोगों की पीड़ा समझने के लिए उसकी यात्रा अनवरत तब तक चलती रही जब तक उसकी सांस नहीं रोक दी गई. सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ वह खुद और उसकी कलम हमेशा मुखर रही. उसकी कलम से निकले प्रतिरोध के स्वरों को कभी खामोश नहीं किया जा सकता. कागजों में छूट गए उसके शब्द बोलेंगे और तब तक बोलेंगे जब तक अन्याय जिंदा है.


(पुस्तक प्राप्त करने हेतु इस पते पर मेल करें - bhupens@gmail.com अथवा भूपेन से इस नम्बर पर बात करें -.+91-9999169886 पुस्तक की कीमत है १५० रुपए)

मैं नईं जाणा खेड़ेया दे नाल


पिछली पोस्ट लगाने के बाद से मेरे पास कुछेक मित्रों के शिकायती फ़ोन आ चुके हैं कि आधे आधे घन्टे के दो पीस सुनने की उनके पास फ़िलहाल फ़ुरसत नहीं है और मुझे ऐसा ही कुछ छोटा कर के लगाना चाहिए. तुफ़ैल नियाज़ी से ही सुनिए हीर का एक हिस्सा जिसमें रांझे की मोहब्बत में डूबी हीर ज़बरन सैदा खेड़ा के साथ न ब्याहे जाने का असहाय अनुरोध अनुरोध करती है. यह पीस केवल छः मिनट का साब! यारों को अब कोई दिक्कत नहीं होगी शायद.



(फ़ोटोग्राफ़:हीर के गृहनगर झंग में हीर-रांझा की साझा मज़ार)

तुफ़ैल नियाज़ी साहब की हीर


आप इस पोस्ट को कलेक्टर्स आइटम भी कह सकते हैं. कल मैंने तुफ़ैल नियाज़ी साहब की गाई हुई हीर का ज़िक्र किया था. चार दोस्तों को फ़ोन वगैरह किये गए और बरसों से गुम हो चुकी यह रचना मुझे मेल के मार्फ़त मिल गई.

हीर-रांझा की अमर प्रेम कहानी को जिस प्रांजलता और गहराई से तुफ़ैल नियाज़ी ने गाया है वह अतुलनीय है. ठेठ क्लासिकल रागों के वैविध्य से भरी इस रचना को एक बार पूरा सुनने के बाद आप बार-बार इस तक लौटना चाहेंगे. कम-अज़-कम मेरा ऐसा मानना है. यह अलग बात है कि दोनों हिस्से क़रीब आधे-आधे घन्टे के हैं और इनका पूरा रस फ़ुरसत में ही लिया जा सकता है. डाउनलोड के लिंक भी लगा रहा हूं.

भाग एक



(डाउनलोड लिंक: http://www.divshare.com/download/15240579-d7f)

भाग दो



(डाउनलोड लिंक: http://www.divshare.com/download/15240590-944)

(चित्र: अब्दुर्रहमान चुग़ताई की पेटिंग "हीर रांझा")

Monday, July 4, 2011

"चिड़ियां दा चम्बा" तुफ़ैल नियाज़ी की आवाज़ में


वायदे के मुताबिक मैं आपको "चिड़ियां दा चम्बा" सुनवा रहा हूं जनाब तुफ़ैल नियाज़ी की आवाज़ में. अपनी दर्दभरी आवाज़ से एक ज़माने तक तुफ़ैल साहब ने मुझे अपने जादू से बांधे रखा था. मेरे अज़ीज़ दोस्त अभिनेता रघुबीर यादव उनकी गाई हीर का एक कैसेट मेरे वास्ते पाकिस्तान से लाए थे. उस रचना में उनके गाने की शैली अद्वितीय रूप से विज़ुअल्स रच पाने में कामयाब थी. यह अलग बात है कि उन्हें पाकिस्तान के बाहर बहुत कम प्रसिद्धि हासिल हुई लेकिन उनका नाम "हीर" गायन से अपरिहार्य रूप से जुड़ चुका है. कपूरथला घराने के शागिर्द लोकसंगीत के इस ख़लीफ़ा गायक के बेटे बाबर नियाज़ी और जावेद नियाज़ी अपने पिता के काम को संरक्षित रखने के काम में जुटे हुए हैं. कहना न होगा ये दोनों सुपुत्र स्वयं भी ऊंचे दर्ज़े के कलाकार हैं.

पाकिस्तान टीवी पर प्रसारित हुए पहले गीत को गाने का श्रेय भी तुफ़ैल नियाज़ी को जाता है. फ़िलहाल डूबिए उनके गाए इस गीत में

साडी लम्मियां उडारियां वे ...


पंजाब का यह दर्दभरा विदागीत सुना रही हैं रेशमा. इस रचना का मूल संस्करण मुझसे कहीं खो गया है. इस वाले में आधुनिक वाद्ययन्त्रों का थोड़ा ज़्यादा ही इस्तेमाल हुआ है अलबत्ता रेशमा की गहरी, आत्मा में उतरने वाली, विकल बना देने वाली आवाज़ गीत में सन्तुलन बनाए रखती है. अगर मिल गया तो मैं आपको आज या कल बहुत बड़े गायक तुफ़ैल नियाज़ी की आवाज़ में यही गीत एकदम दूसरी ही लेकिन अधिक पारम्परिक शैली में सुनवाने का जतन करता हूं.

बोशे आंको


सुमन चटर्जी जिन्होंने पिछले कुछ सालों में अपना नया नामकरण कबीर सुमन कर लिया है, एक अर्से से मेरे प्रियतम संगीतकारों में रहे हैं. उनके एक शुरूआती अल्बम "बोशे आंको" से पेश करता हूं अपना एक पसन्दीदा गीत. यह उस अलबम का शीर्षकगीत भी है -




गीत के बोलों का अंग्रेज़ी में तर्ज़ुमा सुदीप्त चटर्जी ने किया है. फ़िलहाल अनुवाद करने की मेरी कोई ख़ास इच्छा नहीं हो रही, सो अंग्रेज़ी अनुवाद जस का तस लगा दे रहा हूं.

SIT'N'DRAW

Children--now stay quiet
No questions, no more riot
No more games and pranks
Sit quietly, no guffaw.
Today's gonna' be great for you
The elders now have more to do
Your festival's on, full crank--
"Sit'n'draw," "Sit'n'draw."
Neatly in fields and halls
We'll catch and bring you all
You'll stand like soldiers in a row
No more hee and haw.
Coloring pencils--get them yourselves
Any store'll have `em on their shelves
Then you'll see how the fun will grow--
"Sit'n'draw," "Sit'n'draw."
Draw flowers, rivers and butterflies
A Mickey Mouse (if nothing else flies).
Although it's in concrete houses you stay
Draw huts thatched with straw.
Never draw the face of the land apart
Its broken cheeks, its broken heart
Its Life-bee that's about to fly away--
"Sit'n'draw," "Sit'n'draw."
Draw patterns, branches, leaves (all the same)
Draw umbrellas (with brand-name fame)
Draw what you learnt in the English school--
"Twinkle, twinkle little Star."
Never draw the one you see on familiar roads
Gathering scrap paper in burlap totes
The boy who walks away all by himself--
His face is ugly and scarred.
Does he draw, too, somewhere, in his nook?
Who gives him colors or a drawing book?
Never ask these questions, never
Pretend to be deaf-mute, without ado.
I am a fake as well, like many others
With songs I cover Life's blisters
But still I'll say, "Don't forget to see, ever
Draw other pictures, too."

कृष्ण खन्ना की एक पेन्टिंग

कल मैंने राजेश सकलानी की कविता के साथ मशहूर चित्रकार कृष्ण खन्ना की एक पेन्टिंग लगाई थी. उनकी एक पेन्टिंग मुझे काफ़ी समय से हॉन्ट करती रही है. पेन्टिंग का शीर्षक है "ज्ञानी जी के ढाबे पर अजनबी". आप भी निहारिये -

Sunday, July 3, 2011

डी. एल. रोड पर एलेक्जेंडर रहते हैं

राजेश सकलानी के संग्रह "पुश्तों का बयान" से प्रस्तुत है एक कविता:


डी. एल. रोड पर एलेक्जेंडर रहते हैं

हर वर्ष नए उत्पाद की तरह है
जिसका बीते समय से कोई आंतरिक और
आत्मीय संबंध नहीं है
राजपुर रोड पर नए-नए शोरूम और चमाचम मोटरों
के बीच होते जाइए बेग़ाने

बमुश्किल आधा कोस पर है संकरी डी. एल. रोड
दुकानों और घरों से पटी हुई
आधी रात तक चहल-पहल बिल्कुल घरेलू क़िस्म की
मोहल्लेबाज़ी भी जम कर होती है सड़क पर
दोस्तों के मामले भी निपटते हैं यहीं बीचोबीच
गुज़रने वाले ख़ुद अपनी राह निकालें दाएं-बाएं
प्यार-व्यार के छींटे भी शालीनता के साथ
चुपचाप

पास के कॉलेजों से रहती है यहां हवा तृप्त
नालापानी रोड कटने से जो त्रिकोण बनता है
वहीं स्कूटर रिपेयर वाली दुकान के ठीक सामने
तबेले के ऊपर वाले घर में एलेक्जेंडर रहते हैं
रफ़ी, किशोर, मन्नाडे, महेन्द्र कपूर, तलत महमूद से लेकर
उदित नारायण, यहां तक कि लता, आशा के स्वर को भी
पुनः सृजित करने वाले गायक जिनके बिना
देहरादून के पिछले चालीस सालों की यादों का
बयान पूरा नहीं होता

गाढ़े रंग और भारी बदन के एलेक्जेंडर
हमेशा उत्साह से भरे हुए, पहनावे में टिपटॉप
घूम खाती हुई ज़ुल्फ़ें
लौटते हैं अक्सर देर रात गए कार्यक्रमों से
रास्ते भर हाय-हैलो करते

कोई एलबम नहीं निकला यह कोई बात नहीं
समय बदल गया है तेज़ी से इसका भी नहीं कोई रोना
कई सी.डी., डी.वी.डी. नए गायकों के आकर
पुराने पड़ गए
उनके गानों में वही आदमी है सुख-दुःख का संगी
साथ रहने का हौसला बराबर देता हुआ
न हो वे चतुर चालाक पर यह भी नहीं
कि रहें भौंचक पिलपिले
समझें कि पीछे छूट गए आज की तारीख़ में

यह मिजाज़ डी.एल. रोड का है, वही मैक्डोनाल्ड
एडिडास, पिज़्ज़ा हट वाली राजपुर रोड के समानान्तर
बरसाती रिस्पना नदी से लगे पूरे इलाक़ों में
जहां बढ़ई, मोची, राज मिस्त्री, सफ़ाईकर्मी
मैकेनिक, रंगसाज़ जैसे हुनरमंद शहर में रोज़
कुछ जोड़कर लौटते हैं तंग गलियों में
शाम होते यहां गाढ़े रंग का चमकदार फूल
खिलता है

रात-बिरात कोई अजनबी मुश्किल में फंस जाय यहां
यही होगा कि विक्रम, जगदीश या पवन ख़राब स्कूटर को
रखवा दें कहीं सुरक्षित जग
एलेक्जेंडर अपनी मोटरसाइकिल लेकर आए
कहें कि छोड़ देता हूं आपके घर
आधी रात भला आप क्या करेंगे
ख़राब मौसम की चिन्ता न करें
दूरी की क्या बात करते हैं
पूरा अपना ही है देहरादून.

(पेन्टिंग: बैन्डमास्टर्स, चित्रकार - कृष्ण खन्ना)

लहर लहर कबीर - प्रह्लादसिंह टिपाणिया एवम साथी

लहर लहर कबीर का एक वीडियो - प्रह्लादसिंह टिपाणिया एवम साथी

सुन, सुन साधो जी


पंडित भीमसेन जोशी के कबीर-भजनों की श्रृंखला जारी रखता हुआ आज आपको सुनवाता हूं एक और रचना "सुन, सुन साधो जी"