Showing posts with label कबीरदास. Show all posts
Showing posts with label कबीरदास. Show all posts

Monday, February 29, 2016

उठो ज्ञानी खेत संभारो


पंडित कुमार गंधर्व जी के स्वर में  कबीरदास जी का एक और अति प्रिय भजन-  

अवधूता गगन घटा गहरानी रे

पश्चिम दिशा से उलटी बादलरुम झूम बरसे मेहा
उठो ज्ञानी खेत संभारोबह निसरेगा पानी 

निरत सुरत के बेल बनावोबीजा बोवो निज धानी
दुबध्या दूब जमन नहिं पावेबोवो नाम की धानी 

चारो कोने चार रखवालेचुग ना जावे मृग धानी
काट्या खेत भींडा घर ल्यावेजाकी पुरान किसानी 

पांच सखी मिल करे रसोईजिहमे मुनी और ग्यानी
कहे कबीर सुनो भाई साधोबोवो नाम की धानी 


युगन युगन हम योगी अवधूत



पंडित कुमार गन्धर्व की आवाज़ में कबीरदास जी का एक कम सुना गया भजन -


अवधूता युगन युगन हम योगी
आवै ना जाय मिटै ना कबहूं
सबद अनाहत भोगी
सभी ठौर जमात हमरी
सब ही ठौर पर मेला
हम सब माय सब है हम माय
हम है बहुरी अकेला
हम ही सिद्ध समाधि हम ही
हम मौनी हम बोले
रूप सरूप अरूप दिखा के
हम ही हम तो खेलें
कहे कबीर जो सुनो भाई साधो
ना हीं न कोई इच्छा
अपनी मढ़ी में आप मैं डोलूं
खेलूं सहज स्वेच्छा

Wednesday, February 24, 2016

Saturday, March 7, 2015

हमन है इश्क मस्ताना हमन को होशियारी क्या - दो और स्वर

कबीरदास जी के इस भजन को मैंने आशा भोसले के स्वर में सुनवाने का वादा किया था. अपने कबाड़ में ढूंढते खोजते मुझे एक और नगीना मिल गया. पंडित मधुप मुदगल ने भी इसे गाया था. दोनों से सुनिए –


पहले आशा भोसले –


हमन है इश्क मस्ताना हमन को होशियारी क्या 
रहें आजाद या जग से हमन दुनिया से यारी क्या   

जो बिछुड़े हैं पियारे से भटकते दर-ब-दर फिरते
हमारा यार है हम में हमन को इंतजारी क्या   

खलक सब नाम अपपे को बहुत कर सिर पटकता है
हमन गुरनाम साँचा है हमन दुनिया से यारी क्या   

न पल बिछुड़े पिया हमसे न हम बिछड़े पियारे से
उन्हीं से नेह लागी है हमन को बेकरारी क्या   

कबीरा इश्क का नाता दुई को दूर कर दिल से
जो चलना राह नाज़ुक है हमन सिर बोझ भारी क्या 


अब पंडित मधुप मुदगल-

Wednesday, December 17, 2014

माया महाठगिनी हम जानी


पंडित कुमार गन्धर्व सुना रहे हैं कबीरदास जी का भजन   -


Wednesday, September 18, 2013

गुरु की करनी गुरु जाएगा, चेले की करनी चेला


पंडित कुमार गंधर्व जी के स्वर में सुनिए कबीरदास जी का एक और भजन. इस सीरीज की यह अंतिम प्रस्तुति-  

उड़ जाएगा हंस अकेला, जग दर्शन का मेला.

जैसे पात गिरे तरुवर के, मिलना बहुत दुहेला.
ना जाने किधर गिरेगा, लग्या पवन का रेला.

जब होवे उमर पूरी, जब छुटेगा हुकुम हुजूरी.
जम के दूत बड़े मरदूद, जम से पड़ा झमेला.

दास कबीर हर के गुण गावे, वाह हर को पार न पावे.

गुरु की करनी गुरु जाएगा, चेले की करनी चेला

Tuesday, September 17, 2013

उठो ज्ञानी खेत संभारो, बह निसरेगा पानी


पंडित कुमार गंधर्व जी के स्वर में सुनिए कबीरदास जी का एक और अत्यधिक प्रिय भजन-  

अवधूता गगन घटा गहरानी रे||

पश्चिम दिशा से उलटी बादल, रुम झूम बरसे मेहा
उठो ज्ञानी खेत संभारो, बह निसरेगा पानी ||

निरत सुरत के बेल बनावो, बीजा बोवो निज धानी
दुबध्या दूब जमन नहिं पावे, बोवो नाम की धानी ||

चारो कोने चार रखवाले, चुग ना जावे मृग धानी
काट्या खेत भींडा घरल्यावे, जाकी पुरान किसानी ||

पांच सखी मिल करे रसोई, जिहमे मुनी और ग्यानी
कहे कबीर सुनो भाई साधो, बोवो नाम की धानी|| 


Monday, September 16, 2013

तीजे बन पग नहीं धरना


पंडित कुमार गंधर्व जी के स्वर में सुनिए कबीरदास जी का एक और भजन- 

हिरना  समझ  बूझ  बन  चरना
एक बन चरना, दूजे बन चरना, तीजे बन पग नहीं धरना
पांच हिरना, पच्चीस हिरनी उनमें एक चतुर ना
तोये मार, तेरो मास बिकावे, तेरे खाल का करेंगे बिछोना
कहे कबीर जो सुनो भाई साधो गुरु के चरण चित्त धरना 


Sunday, September 15, 2013

दास कबीर जतन करि ओढ़ी


पंडित कुमार गंधर्व जी के स्वर में सुनिए कबीरदास जी का एक और भजन. उनके भजनों के अतिप्रिय अल्बम ‘निर्गुण के गुण’ से एकाध कबीर-भजन और सुनाने का इरादा रखता हूँ -  



झीनी झीनी बीनी चदरिया ॥
काहे कै ताना काहे कै भरनी, 
कौन तार से बीनी चदरिया ॥
इङ्गला पिङ्गला ताना भरनी, 
सुखमन तार से बीनी चदरिया ॥
आठ कँवल दल चरखा डोलै,
पाँच तत्त्व गुन तीनी चदरिया ॥
साँ को सियत मास दस लागे, 
ठोंक ठोंक कै बीनी चदरिया ॥
सो चादर सुर नर मुनि ओढ़ी,
ओढ़ कै मैली कीनी चदरिया ॥

दास कबीर जतन करि ओढ़ी, 
ज्यों कीं त्यों धर दीनी चदरिया ॥

Saturday, September 14, 2013

कहत कबीर सुनो भाई साधो जग से नाता छूटल हो


पंडित कुमार गंधर्व जी के स्वर में सुनिए कबीरदास जी का भजन. इसे यहाँ पहले भी सुनवाया जा चुका है पर क्या फर्क पड़ता है  - “कौन ठगवा नगरिया लूटल हो”

कौन ठगवा नगरिया लूटल हो ।।
चंदन काठ के बनल खटोला ता पर दुलहिन सूतल हो। 
उठो सखी री माँग संवारो दुलहा मो से रूठल हो। 
आये जम राजा पलंग चढ़ि बैठा नैनन अंसुवा टूटल हो। 
चार जाने मिल खाट उठाइन चहुँ दिसि धूं धूं उठल हो।
कहत कबीर सुनो भाई साधो जग से नाता छूटल हो।


Monday, July 22, 2013

बिन सतगुरु नर रहत भुलाना, खोजत फिरत न मिलत ठिकाना



आज के सुअवसर पर फिर से पण्डित कुमार गन्धर्व जी के स्वर में कबीरदास जी:

Saturday, June 15, 2013

मूरख मैली कीन्ही चदरिया


मुख्तियार अली की आवाज़ में कबीरदास जी की यह रचना एक बार पुनः पेश है -

Wednesday, November 28, 2012

बाहर क्यों भटके


कबीरदास जी की  सीरीज जारी है. आज दुबारा से महेशा राम –

Tuesday, November 27, 2012

Monday, November 26, 2012

म्हाने अब के बचा ले


एक बार पुनः मुख्तियार अली से सुनिए कबीरदास जी को –


Sunday, November 25, 2012

हमारे राम रहीम करीमा




शोभा मुद्गल से सुनिए एक और कबीर भजन. अभी कुछेक दिन और आप को हर रोज़ अलग अलग आवाजों में कबीरदास जी की अमर वाणी सुनाई जाएगी. आनंद लीजिये - 


Saturday, November 24, 2012