Friday, January 27, 2012

नए तिब्बत की कविता - ५

अड़तीस साल के तेनजिन त्सुंदे कहते हैं - "मानवीय कथाओं में हमेशा एक सार्वभौमिक अनुगूंज होती है. मैं मानता हूँ कि जहां मेरा दिल में अपने परिवार के साथ अपने घर में रह सकने के एक सपने की टीस होगी, यह नैसर्गिक होगा कि हर कोई उस दर्द को पहचान लेगा, चाहे मेरा पाठक एक चीनी ही क्यों न हो."

तेनजिन की एक और कविता -



हताश समय

मार डालो मेरे दलाई लामा को
ताकि मैं बंद कर दूं यकीन करना.

दफ़ना दो मेरा सिर
फोड़ दो उसे
मेरे कपड़े उतार दो
जंजीरों में बाँध दो.
बस मुझे आजाद न करना.

इस कैदखाने के भीतर
यह शरीर तुम्हारा है.
लेकिन इस शरीर के भीतर
मेरा यकीन बस मेरा है.

तुम चाहते हो न?
मुझे मार डालना यहीं - ख़ामोशी के साथ.
ध्यान रखना एक भी सांस न बचे.
बस मुझे आजाद न करना.

अगर तुम चाहो
तो ऐसा फिर से करना.
बिलकुल शुरू से -
मुझे अनुशासित करो
नए सिरे से शिक्षित करो
अपने सिद्धांत सिखलाओ
मुझे दिखलाओ अपनी कम्युनिस्ट तिकड़में
बस मुझे आजाद न करना.

मार डालो मेरे दलाई लामा को
और मैं
बंद कर दूंगा यकीन करना.

नए तिब्बत की कविता - ४

तेनजिन त्सुंदे की कविताओं की सीरीज जारी है -


क्षितिज

अपने घर से तुम पहुँच गए हो
यहाँ क्षितिज तलक.
यहाँ से अगले की तरफ
ये चले तुम.

वहां से अगले
अगले से अगले
क्षितिज से क्षितिज.
हर कदम है एक क्षितिज.

कदमों की गिनती करो
और उनकी संख्या याद रखना.

सफ़ेद कंकडों को पहचान लो
और विचित्र अजनबी पत्तियों को.
घुमावों को चीन्ह लो
और चारों तरफ की पहाड़ियों को
क्योंकि तुम्हें
दोबारा घर आने की ज़रूरत पड़ सकती है.

Thursday, January 26, 2012

साजन ये मत जानियो की तोरे बिछरत मोहे चैन


महान क़व्वाल मरहूम मुंशी रज़ीउद्दीन अहमद खान (१९१२-२००३) भारतीय उपमहाद्वीप के बड़े क्लासिकल गवैयों में शुमार किए जाते थे. उनका ताल्लुक़ क़व्वाली के सबसे बड़े घराने यानी दिल्ली के क़व्वाल बच्चा घराने से रहा. उनके ख़ानदान को शाही संरक्षण हैदराबाद के निजाम के दरबार से मिलता आ रहा था. निजाम के पतन के बाद वे पाकिस्तान चले आये. यहाँ उन्होंने अपने भाई मंज़ूर नियाज़ी और अपने चचेरे भाई बहाउद्दीन क़व्वाल के साथ अपनी क़व्वाली पार्टी बनाई. यह टीम १९६६ तक ही चल सकी. इस के बाद उन्होंने अकेले ही इस क्षेत्र में काम किया और अपने बच्चों फरीद अयाज़ और अबू मोहम्मद को क़व्वाली के गुर सिखाए अपनी मौत तक वे भारतीय शास्त्रीय संगीत की बारीकियों का अध्ययन करते रहे.

दीगर है कि उस्ताद बहाउद्दीन क़व्वाल को आप एकाधिक बार कबाड़खाने पर सुन चुके हैं. और उनके लायक बेटों फरीद अयाज़ और अबू मोहम्मद को भी. बल्कि फरीद अयाज़ और अबू मोहम्मद को तो आपने कल ही सुना होगा. आज बड़े उस्ताद को सुनिए. उनके बेटे उनके साथ जुगलबंदी कर रहे हैं -

नए तिब्बत की कविता - 3

तेनजिन त्सुंदे की कविताओं की सीरीज जारी है -


मुंबई में एक तिब्बती

मुंबई में एक तिब्बती
को विदेशी नहीं समझा जाता.

वह एक चाइनीज़ ढाबे
में रसोइया होता है.
लोग समझते वह चीनी है
बीजिंग से आया कोई भगौड़ा

वह परेल ब्रिज की छाँह में
स्वेटरें बेचता है गर्मियों में.
लोग समझते हैं वह
कोई रिटायर हो चूका नेपाली बहादुर है.

मुंबई में एक तिब्बती
बम्बइया हिन्दी में गाली देता है
तनिक तिब्बती मिले लहज़े के साथ
और जब उसकी शब्द - क्षमता खतरे में पड़ती है
ज़ाहिर है वह तिब्बती बोलने लगता है.
ऐसे मौकों पर पारसी हंसने लगते हैं.

मुंबई में एक तिब्बती को
पसंद आता है मिड-डे उलटना
उसे पसंद है एफ़ एम. अलबत्ता वह नहीं करता
तिब्बती गाना सुन पाने की उम्मीद

वह एक लालबत्ती पर बस पकड़ता है
दौडती ट्रेन में घुसता है छलांग मारता
गुज़रता है एक लम्बी अंधेरी गली से
और जा लेटता है अपनी खोली में.

उसे गुस्सा आता है
जब लोग उस पर हँसते हैं
"चिंग-चौंग-पिंग-पौंग"

मुंबई में एक तिब्बती
अब थक चूका है
उसे थोड़ी नींद चाहिए और एक सपना.
११ बजे रात की विरार फास्ट में
वह चला जाता है हिमालय.
सुबह ८:०५ की फास्ट लोकल
उसे वापस ले आती है चर्चगेट
महानगर में - एक नए साम्राज्य में.

नए तिब्बत की कविता - २

सत्तर की दहाई के शुरुआती सालों में मनाली के नज़दीक भारत की सरहदों पर बन रही सडकों पर मज़दूरी कर रहे एक गरीब तिब्बती शरणार्थी परिवार में जन्मे तेनजिन की तीन पुस्तकें छाप चुकी हैं. इनमें दो कविता-संग्रह हैं और एक उनके लेखों का संग्रह. अपना पहला कविता संग्रह छपने के लिए उन्होंने अपने सहपाठियों से पैसे उधार मांगे थे - तब वे बम्बई में अंग्रेजी साहित्य में एम. ए. कर रहे थे.

१९९९ में तेनजिन ने फ्रेंड्स ऑफ तिब्बत (इण्डिया) की सदस्यता ग्रहण की. तब से अब तक वे इस संगठन से जुड़े हैं और वर्तमान में महासचिव हैं. २००२ में उन्होंने बम्बई के ओबेरॉय टावर्स में तिब्बती झंडा और एक बैनर फहराया था जिस पर लिखा था - "तिब्बत को आजाद करो". भारत का दौरा कर रहे चीनी राष्ट्रपति उसी इमारत में भारत के बड़े व्यापारियों की एक सभा को संबोधित कर रहे थे. इस घटना ने अंतर्राष्ट्रीय मीडिया का ध्यान इस कारनामे की तरफ खींचा और भारतीय पुलिस अफसरान ने जेल में उन्हें अपने अधिकारों की पैरवी करने की हिम्मत रखने की दाद भी दी.

आज उनकी एक और कविता -



निर्वासन का घर

चू रही थी हमारी खपरैलों वाली छत
और चार दीवारें ढह जाने की धमकी दे रही थीं
लेकिन हमें बहुत जल्द लौट जाना था अपने घर.

हमने अपने घरों के बाहर
पपीते उगाये,
बगीचे में मिर्चें,
और बाड़ों के वास्ते चंगमा,
तब गौशालों की फूंस-ढंकी छत से लुढ़कते आए कद्दू
नांदों से लड़खड़ाते निकले बछड़े,

छत पर घास
फलियों में कल्ले फूटे
और बेलें दीवारों पर चढ़ने लगीं,
खिड़की से होकर रेंगते आने लगे मनीप्लांट,
ऐसा लगता है हमारे घरों की जड़ें उग आयी हों.

बाड़ें अब बदल चुकी हैं जंगल में.
अब मैं कैसे बताऊँ अपने बच्चों को
कि कहाँ से आये थे हम?

(चंगमा - बेंत जैसा लचीले तने वाला एक पेड़)

Wednesday, January 25, 2012

ईश्वर और गीध

ईश्वर और गीध


बहुत पहले जब कायदा कानून नही था , गीध बहुत ताक़त वर पक्षी था, और इनसानी बच्चों को खा जाया करता था . वे हमेशा अकेले खेल रहे बच्चों की ताक मे रहता और मौका पाते ही उन्हे उठा ले जाता था . एक गाँव मे लोग गीध के इस कृत्य से परेशान हो गए थे. अतः उन्हो ने ईश्वर के पास शिकायत लगाई. प्रभु इस गीध का कुछ करो वर्ना यह तो हमारी संतति को आगे बढ़ने ही न देगा . ईश्वर ने उन्हे आश्वस्त किया और गीध के पास गया. गीध उस समय बच्चे का गोश्त चबा रहा था. ईश्वर ने गीध से पूछा , तुम इंसानी बच्चों को क्यों उठा ले जाते हो? गीध ने कहा क्यों कि मुझे उन का माँस बहुत पसन्द है. ईश्वर ने कहा , यदि युम इन्हे छोड़ कर कुछ और खाना शुरू कर दो तो तुम्हे अपना मंत्री बनाऊँगा. गीध ने उत्तर दिया, तुम मुझे इस से बेहतर माँस बताओ, तो आगे से इसे मुँह से नही लगाऊँगा. ईश्वर सोचने लगा, इंसानी माँस से बेह्तर और कौन सा माँस हो सकता है ? उसे कुछ नही सूझा. फिर उस ने धमकाया, देखो मै यहाँ का राजा होता हूँ तुम्हे मेरी बात माननी चाहिए. गीध ने कहा , राजा उसे मानता हूँ जिस के पास ताक़त होती है. ईश्वर का चेहरा उतर गया. उसे गीध की ताक़त का पता था . लेकिन प्रकट मे बोला, बहुत घमण्ड है अपनी ताक़त पर ? गीध ने कहा कि उसे कोई घमण्ड वमण्ड नहीं है, वह सिद्ध कर सकता है कि उस के पास ताक़त है. ईश्वर की आँखों मे कुटिल चमक आ गई. बोला अच्छा एक गेम खेलते हैं . यदि तुम जीत गए तो तुम्हे बच्चे खाने की अनुमति मिल जाएगी. हार गए तो इनसानी बच्चे तो क्या , किसी भी ज़िन्दा जानवर का शिकार नही कर पाओगे . ठीक है बताओ क्या गेम है ? ईश्वर ने शर्त रखी-- - मक्खन के ढेले को अपनी चोंच से टुकड़े टुकड़े करना होगा . गीध हँसा...... मंज़ूर है. रखो इस पत्थर पे मक्खन का ढेला. ईश्वर अपनी कुटिल बुद्धि पर प्रसन्न हो रहा था...... गीध शोर मचाते हुए गोल गोल ऊपर उड़ने लगा. उस का कंफिडेंस देख कर ईश्वर संशय मे पड़ गया. कहीं इस ने मक्खन के टुकड़े कर दिए तो ? उसे एक चाल सूझी. जब गीध ऊपर उड़ रहा था तो उस ने चुपके से मक्खन की जगह पर एक सफेद चकमक पत्थर रख दिया. उधर गीध तीर की तरह लक्ष्य पर झपटा. जब उस की वज्र जैसी चोंच चकमक पत्थर से टकराई तो पत्थर के सैकड़ों टुकड़े हो गये. लेकिन खुद गीध भी बेहोश हो गया.
अब क्या करें ईश्वर तो हार गया ! लेकिन ईश्वर को कैसे हरा दें ? तो बच्चो, ईश्वर ने यह किया कि चुपके से चकमक पत्थर समेट के एक तरफ कर दिए, और मक्खन के ढेले मे बेहोश गीध की चोंच घुसा कर चलता बना. होश मे आने पर गीध ने देखा कि मक्खन का ढेला टूटा न था फक़त एक छेद भर निकली थी उस में. गीध को अपनी घमण्ड का अहसास हुआ. तब से गीध अपना बचन निभा रहा है. केवल मरे हुए जानवरों को खा कर गुज़ारा कर रहा है.

संस्कृत से उर्दू, उर्दू से फ़ारसी और जाने कहाँ कहाँ


फ़रीद अयाज़ और अबू मोहम्मद क़व्वाल की एक और लाइव रेकॉर्डिंग आपके लिए पेश करता हूँ. बेहतरीन चीज़ है. अवश्य सुनें.

नए तिब्बत की कविता - १

आज से आप को तिब्बत के युवा विद्रोही कवि तेनजिन त्सुंदे की कुछ कविताओं से परिचित करने जा रहा हूँ. २००१ का पहला आउटलुक-पिकाडोर नौन-फिक्शन अवार्ड पाने वाले तेनजिन ने मद्रास से स्नातक की डिग्री लेने के बाद तमाम जोखिम उठाते हुए पैदल हिमालयी दर्रे पार किए और अपनी मातृभूमि तिब्बत का हाल अपनी आँखों से देखा. चीन की सीमा पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर तीन माह ल्हासा की जेल में रखा. उसके बाद उन्हें वापस भारत में "धकेल दिया गया." तेनजिन के बारे में कुछ और बातें बाद में -


जब धर्मशाला में बारिश होती है

मुक्केबाजी के दस्ताने पहने बारिश की बूँदें
हज़ारों हज़ार
टूट कर गिरती हैं
और उनके थपेड़े मेरे कमरे पर.
टिन की छत के नीचे
भीतर मेरा कमरा रोया करता है
बिस्तर और कागजों को गीला करता हुआ.

कभी कभी एक चालक बारिश
मेरे कमरे के पिछवाड़े से होकर भीतर आ जाती है
धोखेबाज़ दीवारें
उठा देती हैं अपनी एड़ियाँ
और एक नन्ही बाढ़ को मेरे कमरे में आने देती हैं.

मैं बैठा होता हूँ अपने द्वीप-देश बिस्तर पर
और देखा करता हूँ अपने मुल्क को बाढ़ में,
आज़ादी पर लिखे नोट्स,
जेल के मेरे दिनों की यादें,
कॉलेज के दोस्तों के ख़त,
डबलरोटी के टुकड़े
और मैगी नूडल
भरपूर ताक़त से उभर आते हैं सतह पर
जैसे कोई भूली याद
अचानक फिर से मिल जाए.

तीन महीनों की यंत्रणा
सुई-पत्तों वाले चीड़ों में मानसून,
साफ़ धुला हुआ हिमालय
शाम के सूरज में दिपदिपाता.

जब तक बारिश शांत नहीं होती
और पीटना बंद नहीं करती मेरे कमरे को
ज़रूरी है कि मैं
ब्रिटिश राज के ज़माने से
ड्यूटी कर रही अपनी टिन की छत को सांत्वना देता रहूँ.

इस कमरे ने
कई बेघर लोगों को पनाह दी है,
फिलहाल इस पर कब्ज़ा है नेवलों,
चूहों, छिपकलियों और मकड़ियों का,
एक हिस्सा अलबत्ता मैंने किराये पर ले रखा है.
घर के नाम पर किराए का कमरा -
दीनहीन अस्तित्व भर.

अस्सी की हो चुकी
मेरी कश्मीरी मकानमालकिन अब नहीं लौट सकती घर.
हमारे दरम्यान अक्सर ख़ूबसूरती के लिए प्रतिस्पर्धा होती है -
कश्मीर या तिब्बत.

हर शाम
लौटता हूँ मैं किराए के अपने कमरे में
लेकिन मैं ऐसे ही मरने नहीं जा रहा.
यहाँ से बाहर निकलने का
कोई रास्ता ज़रूर होना चाहिए.
मैं अपने कमरे की तरह नहीं रो सकता.
बहुत रो चूका मैं
कैदखानों में
और अवसाद के नन्हे पलों में.

यहाँ से बाहर निकलने का
कोई रास्ता ज़रूर होना चाहिए.
मैं नहीं रो सकता -
पहले से ही इस कदर गीला यह कमरा.

Tuesday, January 24, 2012

रश्दी- विवाद और शत्रुओं के पक्ष में बार-बार खड़ी भारत की पुलिस

अभिनव कुमार मेरे अन्तरंग मित्र हैं. खूब पढ़ते-लिखते हैं और अपनी बेबाकी के लिए खासे विख्यात. फिलहाल देहरादून में डी आई जी के पद पर हैं.


कुछ अरसा पहले उनके लिखे एक लेख को लेकर ख़ासा विवाद हुआ था और हमने उसे कबाड़खाने में छापा था. हालिया रश्दी विवाद के बाद आज सुबह उनका एक लेख छपा था. मैंने उनसे उसका अनुवाद करने की अनुमति माँगी जो उन्होंने सहर्ष दे दी. पढ़िए एक साहसी आई पी एस अफसर कैसे प्रतिक्रिया देने की हिम्मत रख सकता है. शुक्रिया अभिनव!



प्रतिक्रियावादियों और स्वतन्त्र अभिव्यक्ति के शत्रुओं के पक्ष में बार-बार खड़ी होकर भारत की पुलिस ने निर्भयता और तटस्थता के साथ कानून को बनाए रखने के अपने क़ौल के साथ धोख़ेबाज़ी की है.


एम. एफ़. हुसैन, तसलीमा नसरीन और अब सलमान रश्दी. कानून की रखवाली न कर सकने और मनुष्य की अस्मिता को बचा न पाने के भारतीय पुलिस क्र इतिहास में एक और शानदार अध्याय जुड़ गया है. यह लिस्ट यहीं ख़त्म नहीं होती. चाहे मुम्बई की सड़कें हों, बंगलौर के शराबख़ाने हों, दिल्ली की रातों के अड्डे हों, गोवा के समुद्रतट हों, वैलेन्टाइन-डे का उत्सव हो, हत्यारी खाप पंचायतें हों या मनचाहे तरीके से खा, पी और कपड़े पहन सकने वाले हमारे आधे नागरिकों के व्यापक अधिकार हों, भारत की पुलिस ने, अन्यथा बेहद महत्वपूर्ण उत्तर-दक्षिण और शहरी-ग्रामीण विभाजन के आरपार, चाहे कोई भी राजनैतिक दल सत्ता में हो, लगातार धार्मिक प्रतिक्रियावाद और सांस्कृतिक कट्टरपंथी शक्तियों का ही पक्ष लिया है. ऐसा करते हुए उसने ऐसे नीतिगत आदर्श का समर्थन किया है जो लगातार एक ऐसी नैतिक संहिता का पक्षधर है जिसे सीधे-सीधे खुमैनी के ईरान और मुल्ला उमर के अफ़गानिस्तान से उठाया गया होता है. जैसा की इस घटना ने दिखाया है, हम सत्ताधारी राजनैतिक ठगों से बेहतर नहीं हैं. कानून से बंधकर रहने वाली जनता के लिए हम विघ्नसंतोषी और कायर हैं.

दुनिया में बहुत कम लोकतंत्र हैं जिनमें पुलिस को आज इतनी सारी शक्तियां मिली हुई हैं खासतौर पर किसी भी घटना के घटने से पहले उस पर लगाम कसने कीं. हमारे वर्तमान अधिनियमों के चलते पुलिस अधिकारियों को सार्वजनिक-व्यवहार पर काबू करने के लिए काफी अधिक आज़ादी मिली हुई है जिनके तहत वह सुरक्षात्मक गिरफ्तारियों से लेकर क़ानून द्वारा स्वीकृत घातक ताकत का अतीव इस्तेमाल तक कर सकती है. हमारे औपनेविशिक इतिहास और आज़ादी के बाद की आन्तरिक सुरक्षा सम्बंधित चुनौतियों ने इस बात को सुनिश्चित किया है भारत में पुलिस को मिले इस संवैधानिक अधिकार को उल्लेखनीय रूप से व्यापक स्तरों पर जनता की सोच का लगातार समर्थन मिलता रहे.

तब ऐसी कौन सी वजहें हैं की हमारा पुलिस बल उतने ही उल्लेखनीय तरीके से लगातार कायरपन का प्रदर्शन करता आया है? कुछ अनुभव से मैं कह सकता हूँ कि रश्दी के जयपुर साहित्य महोत्सव में आ सकने के लिए इतना भर किया जाना था कि जयपुर के किसी एक वरिष्ठ पुलिस अफसर ने आयोजकों और रश्दी को अपने सहयोग का आश्वासन देकर हिंसा की धमकी देने वालों को सख्त चेतावनी देते हुए आवश्यक उपाय करने थे. इसके स्थान पर हमें बताया गया है की स्थानीय पुलिस ने आयोजकों से कह दिया कि वे रश्दी से समारोह से दूर रहने को कहें. यह भी आरोप लगाया गया है कि उसने इन अफवाहों को बढ़ावा दिया की मुंबई से पेशेवर हत्यारे बुलाए जा रहे हैं, जिस से मुंबई पुलिस ने इन्कार किया. इसमें कोई शक नहीं कि राजस्थान पुलिस के आला अफसरों ने खामोश रहने को तरजीह दी और कट्टरपंथी और रुढ़िवादी ताकतों की ऐश आ गयी.

आप किसी भी उच्च पुलिस अफसर से पूछेंगे तो रटारटाया उत्तर मिलता है - "हमारी प्राथमिकता होती है क़ानून और व्यवस्था बनाये रखना." चाहे इसका मतलब हो कि आप गुंडों की गैंग के अवैध व्यवहार के आँखें फेर लें जो राजनैतिक धाराओं के दक्षिणी और वाम के दोनों धडों के सी अतिवादी सिद्धांत की पैरवी करते हों या नस्ली गौरव और धार्मिक घृणा के किसी कट्टर स्वप्न फैलाने का काम करते हों.

ऐसे क़ानून और व्यवस्था को बनाये रखने का क्या मतलब है? इस उदासीनता को उस उत्साह के बरअक्स देखिये जिसका प्रदर्शन पुलिस तब करती है जब कोई नारे लगाने की कोशिश करता है या किसी बड़े नेता की रैली में काले झंडे दिखने की. इसे "सुरक्षा में गंभीर सेंध" और संगीन खामी मानते हुए ऐसा करने वाले को तुरतफुरत दबोच लिया जाता है और उसे कानून की पूरी ताक़त महसूस करा दी जाती है. ऐसा कई दफा तब भी किया जाता है जब की ड्यूटी पर तैनात पुलिस अफसर को कर्तव्य की उपेक्षा करने के कारण अनुशासनात्मक कारवाई से रू-ब-रु होना पड़ सकता है.

देश के वर्तमान नीतिगत प्रतिमान निम्नलिखित पारंपरिक बुद्धिमत्ता से निर्देशित लगती है - सुरक्षा कारणों से साधारण नागरिक जनप्रतिधियों के खिलाफ न तो नारे लगा सकते हैं न काले झंडे दिखा सकते हैं, भड़काऊ कपडे पहनने वाली स्त्रियाँ अपने को बलात्कार के लिए पेश करती हैं, अपनी जाति और धर्म के बाहर प्रेम और विवाह करने वाले जोड़ों को कानून से किसी तरह की सुरक्षा की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए, सार्वजनिक जगहों पर अंतरंगता का प्रदर्शन यौन-अपमान और हिंसा का न्यायसंगत कारण हो सकता है, और इस घटना के परिप्रेक्ष्य में किसी सम्प्रदाय के किसी भी स्वयंभू रक्षक की धार्मिक भावनाएं किसी मूल अधिकार से ऊपर हो जाती हैं. और अंततः सत्ताधारी दल की राजनैतिक मजबूरियां क़ानून के ऊपर कभी भी और हमेशा ही वरीयताएँ पाती रही हैं.

पुलिस की आलाकमान, जिसका मैं भी हिस्सा हूँ, अक्सर राजनेताओं को बाधा पहुँचाने, आई ए एस अफसरों पर अवरोधवाद, मीडिया को पक्षपातपूर्ण कवरेज और न्यायपालिका को व्यावहारिक सीमाओं को पहचानने की कमी का आरोप लगाते हैं. यह पूरी तरह से छल है. हमारी राजनैतिक ताकतों को सिद्धान्तपूर्ण नेतृत्व मुहैया न करा पाने की पुलिस की साफ़ असफलता को यह लंगोटी अब और नहीं छिपा सकती.

आई पी एस का गठन सरदार पटेल और नेहरू ने ज़ाती उम्मीदों से किया था कि वे शासन करने की सीमित अर्थों भर में ही सेवा नहीं करेगी बल्कि संविधान द्वारा रक्षित पहरुवों की तरह राष्ट्रीय अखंडता और सुरक्षा के साथ साथ स्वयं संविधान और क़ानून की रक्षा करेगी. नेहरू के परपोते को अपने पुरखे के आदर्शों के बारे में बात करने की इच्छा शायद न हो, लेकिन अखिल भारतीय सेवा में कार्यरत हम सब भी उतने ही नेहरू की सन्ततियां हैं और जब हमारी थाती को इस तरह लगातार बेख़ौफ़ अपवित्र किया जा रहा हो, हमें आगे आकर बोलना चाहिए.

हालिया घटनाओं ने मुझे हैरत करने पर विवश किया है की क्या मैंने इन्डियन पुलिस सर्विस जौइन की थी या इन्डियन अयातुल्लाह सर्विस? कहीं किसी छिपी हुई इबारत को पढने में मुझसे चूक हो गयी होगी. सिर्फ अमीरों और ताकतवर लोगों के लिए साधारण 'स्टॉर्म ट्रूपर' (स्टॉर्म ट्रूपर - नाज़ी सेना के सदस्य जिन्हें अपनी हिंसा और पाशविकता के कारण बहुत कुख्याति मिली थी) बनने भर के लिए और उस समय चुप रहने के लिए जब क़ानून और समानता के मूलभूत सिद्धांतों को ऐसे भयहीन तरीके से उपहास बनाया जा रहा हो, मैंने ऐसा नहीं किया था. ऐसा पुलिस बल जो सही काम करने के लिए कुछ नहीं करता, जो सत्ता के सामने सच बोलने की हिम्मत न रखता हो, जो एक पगलाई भीड़ के भौंकने के समक्ष मनुष्य के स्वाभिमान की बलि दे देता हो, को न तो जनता के सम्मान का अधिकार है न कानूनी ताक़त का. हम आई पी एस अगर इन मूलभूत सच्चाइयों को याद रखें तो हमारे लिए बेहतर होगा.

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इन लेखों को भी देखें -

क्या देश के आम नागरिक को वास्तविकता के बारे में बताना अपराध है
सच्चाई गले नहीं उतरती हमारे आला अफ़सरान के

Monday, January 23, 2012

उनके चेहरों पर मानवीय चिंताएं क्यों नहीं दिखतीं

भाई शिव प्रसाद जोशी का आलेख -

अण्णा ग्रुप का भ्रमणः काश पता होता लड़ाई किससे है


जनलोकपाल आंदोलन के चार सिपहसालार जो स्वयंभू टीम अण्णा है, उसका उत्तराखंड दौरा कई सवाल खड़े कर रहा है. वे पहले हरिद्वार गए, वहां उनसे कुछ सवाल कुंभ मेले की अनियमितता से जुड़े पूछे गए. क्या कैग की रिपोर्ट उन लोगों ने देखी है. ख़ैर देहरादून में भी जूता फेंकने की घटना हुई. वो आदमी भ्रष्टाचार से परेशानहाल सब्ज़ी विक्रेता है जिसे लगता है कि सिविल सोसाइटी कहा जा रहा ये ग्रुप भी सही नहीं है. हालांकि जूता फेंकने की घटना से ग्रुप के एक सदस्य ने साफ़ इंकार कर दिया जबकि कैमरे पर वो दृश्य क़ैद हो चुका था कि पुलिस के लोग जूता चलाने वाले को दबोच कर क़ैद में ले जा रहे हैं.

उत्तराखंड रक्षा मोर्चा नाम के एक नवगठित राजनैतिक दल ने किरण बेदी से पूछा कि क्या उन्होंने उत्तराखंड का लोकायुक्त बिल पढ़ लिया है. इस पर जवाब आने के पहले ही इंडिया अंगेस्ट करप्शन नामक संगठन जिसके बैनर तले ये मीटिंग हो रही थी, उसके लोग उस वरिष्ठ पार्टी पदाधिकारी के पास जमा हो गए. पुलिस उन्हें बाहर ले गई. सवाल का जवाब नहीं दिया गया.

अब कुछ दृश्य और हैं इसी मीटिंग के जो यूं तो वर्णन में अटपटे से लगेंगे लेकिन न जाने क्यों उनकी संगति बनती हुई दिखती है पर्दे के पीछे जो खेल जारी है वहां की परछाइयां हिलती हैं. अण्णा ज़िंदाबाद के नारे से ग्रुप की हॉल में एंट्री होती है, वे सब आते हैं. समर्थकों के सिरों पर रामलीला मैदान वाली टोपियां हैं. वे इंडिया अंगेस्ट करप्शन संगठन से बताए जाते हैं लेकिन संगठन के पीछे जो शक्ति उन्हें इस कार्यक्रम के लिए एकजुट किए हुए है वो नज़र नहीं आती. पर उस अनुशासन, कतारबद्धता, वंदे मातरम का समूह गान, वे पीले कुछ कुछ भगवा जैसे दुपट्टे जो कुछ मेहमानों को भेंट भी किए गए, ये सब उलझा हुआ है.

क्या यहां आरएसएस का कोई कार्यक्रम चल रहा है. फुसफुसाते हुए कोई पूछता है. फिर एक सुनियोजित सा दिखता गुणगान शुरू होता है. पहले लोकपाल नाम के बिल के लिए फिर लोकायुक्त बिल लाने वाले खंडूरी के लिए.

ऐसा ही बिल केंद्र सरकार में और बीजेपी शासित अन्य राज्यों में भी चाहिए. वे बोले.

ऐसा ही बिल...

ऐसा ही बिल...जिसमें मुख्यमंत्री विधायक टॉप ब्युरोक्रेसी के खिलाफ कार्रवाई एक लगभग असंभव मामला है. इसमें लोकायुक्त समेत उस टीम के सभी सदस्यों की अनुमति यानी सर्वसम्मति का प्रावधान है वरना हर सदस्य के पास वीटो का अधिकार है.

ऐसा ही बिल...जिसमें लोकायुक्त को हटाने की प्रक्रिया राज्य की ज्युडिश्यरी को लांघते हुए सुप्रीम कोर्ट के पास रखी गई है. उसे बताएगी सरकार फिर कोर्ट राज्यपाल को कहेगा लोकायुक्त हटाओ...सुप्रीम कोर्ट कहेगा.

ऐसा ही बिल... जिसमें लोकायुक्त और सदस्यों की नियुक्ति के प्रावधान गड्डमड्ड हैं.

ऐसा धुंधला बिल..इस धुंधलेपन में चालाकियां गढ़ी गई हैं.

क्या यही बैठकर तय हुआ था जनलोकपाल के इन बांकुरों के साथ कुछ महीनों पहले देहरादून में जब खंडूरी दूसरी बार मुख्यमंत्री बनकर आए थे.

भ्रष्टाचार मिटाने का आंदोलन क्या कोई नेटवर्क है. क्या एक जाल बुना जा रहा है. अपने अपने हिसाब से.


अब अगर जनलोकपाल टीम के मुताबिक खंडूरी का लोकायुक्त बिल 100 फ़ीसदी सही और निर्दोष है और सर्वथा अनुकरणीय है तो फिर किस चीज़ के लिए अलख जगाने वे लोग उत्तराखंड के दौरे पर निकले.

वे लोग कहते हैं किसी दल के ख़िलाफ़ प्रचार नहीं कर रहे हैं. उस मीटिंग में जो देखा और सुना गया वो तो कुछ अलग ही था. “हम राजनीति करने नहीं आए हैं, हम किसी दल की जीत हार के लिए नहीं आए हैं हम ये नहीं बता रहे हैं कि आप इन्हें वोट दें या न दें. कुछ दल जाति और धर्म के नाम पर वोट मांग रहे हैं, कोई मुस्लिमों को लुभा रहा है कोई दलितों को आप उन्हें वोट मत दीजिये......आप जिसे वोट देना है उसे दीजिए पर उससे पूछिए कि वोट के बदले हमें क्या मिलेगा, क्या भ्रष्टाचार मुक्त माहौल मिलेगा.”

जैसे वो हां कह देगा जैसे वोट उसे चला जाएगा जैसे वो अपनी कसम याद रखेगा जैसे वो पहले से भ्रष्टाचार न करता होगा. जैसे वो हार जाएगा तो वोटर का कल्याण हो जाएगा. जैसे जैसे... न जाने कितने सवाल. जैसे भ्रष्टाचार को मिटाने की लड़ाई वोट देकर और वोट न देकर पूरी हो जाने वाली है. जैसे वोट मांगने के लिए जाते नेता के भ्रष्टाचार मिटाने पर हां या ना कहते ही एक आईना उग आएगा और वहां उसका सच झूठ दिख जाएगा.

क्या हम इस देश के इतने सारे लोग इस चुनावी राजनीति से ही मारे जा रहे हैं या हमारे गलों पर दिन रात की यातना की ये रस्सी कुछ और है इसकी डोर कहीं और है. भ्रष्टाचार महादेश की आर्थिक नीतियों व्यवस्थाओं और एक सामरिक फ़ुर्ती के साथ चलाए जा रहे नवउपनिवेशवादी नवउदारवादी एजेंडे की वजह से आ रही भीषणताओं की एक नुकीली कड़ी है. और भी ज़ालिम कड़ियां हैं. इतनी आसान तो नहीं होगी ये लड़ाई. इसे सही दिशा में मोड़ने से कौन रोक रहा है. कौन. प्रतिरोध की सुई उन निवेशकों मुनाफ़ाखोरों दलाल पूंजीपतियों नवउदारवादियों यथास्थितिवादी एनजीओज़ की ओर क्यों नहीं मोड़ रहे हैं वे. लोकतंत्र की रट लगाते लगाते आख़िर ये किस चीज़ की आहुति दी जा रही है कौन से यज्ञ में कौन सा है ये आंदोलन.

तो इस तरह से कुछ अजीबोग़रीब कुछ संशय भरे ढंग से ये सब चला. ग्रुप के एक सज्जन मंचों पर कविता के ज़रिए हंसाने गुदगुदाने वाले रहे हैं. अपने भाषण में वो न जाने भावुकता में बहे या आक्रोश में या बदले की भावना में कि राहुल सोनिया से लेकर लालू तक परोक्ष ढंग से कोसते ही रहे. उनकी बॉडी लैंग्वेंज में सरोकार शिष्टता और गंभीरता क्यों नहीं दिखती थी. क्या ये अपनी ही आंखों का कोई दोष था.

और वे सब इतने चहकते हुए, आनन्दित और मुदित क्यों हैं. उनके चेहरों पर अपने पिसते हुए समाज और सह नागरिकों के लिए मानवीय चिंताएं क्यों नहीं दिखतीं. उन्हें क्या चाहिए. क्या सिर्फ़ जनलोकपाल.

Sunday, January 22, 2012

वो जो इश्क था, वो जूनून था




खुदा कसम, तुम्हारी बेहद याद आती है । तुम उसी मुसाफिर की तरह हो जिसके बारे में अक्सर बात करते हैं मैं और मेरी यादें । कई शामें गुजर गयी उसके बाद आँखों में नमी लिए । अम्मा की बातें जो सच होती थी, नानी की बातें जिनमे परियां अक्सर डेरा डालती थी, जादू के खिलौने में इस तरह के कई कोनों से तुमने मिलाया था । हाथों की लकीरों में बसा लेने का अनुरोध, या आँखों के समंदर में उतर जाने की गुजारिश, तुम्हारे बगैर नामुमकिन होती । काँटों से ही सही, इस गुलशन की जीनत हो । कोई चिट्ठी, कोई सन्देश उस देश से भेजो न, जानता हूँ कि पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है ।  मैं बेहद अकेला हूँ धुंध में ।


Sunday, January 15, 2012

भूल रहा हूँ वनस्पतियों की संज्ञा

निज़ार क़ब्बानी (21 मार्च 1923- 30 अप्रेल1998) की कविताओं के अनुवाद आप 'कबाड़ख़ाना' के अतिरिक्त कई अन्य  वेब ठिकानों और हिन्दी की कुछ प्रतिष्ठित पत्र - पत्रिकाओं में पढ़ चुके हैं। सीरिया के इस बड़े कवि को हिन्दी  कविता के प्रेमियों की बिरादरी में पसंद किया गया है। आज प्रस्तुत है उनकी एक और कविता :



निज़ार क़ब्बानी की कविता
वर्षा उत्सव
(अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह)

किसी एक ठाँव ठिकाना नहीं मेरा
अप्रत्याशित है मेरा हाल मुकाम
एक पागल मछली की मानिन्द दूर तलक की है मेरी यात्रा
मेरे रक्त में ज्वाल है
चिंगारियाँ हैं मेरी आँखों में।

अन्वेषण कर रहा हूँ समीरण की स्वतंत्रता का
वश में कर लिया है अपने भीतर के घुमंतुओं को
दौड़ रहा हूँ हरिताभ मेघों के पीछे
अपनी आँखों से पी रहा हूँ हजारों छवियों को
अग्रसर हूँ यात्रा के अंतिम पड़ाव तक की यात्रा पर।

जलयात्रा पर हूँ एक दूसरे अंतरिक्ष की ओर
उठ रहा हूँ गर्द - गुबार से
भूल रहा हूँ अपना नाम
भूल रहा हूँ वनस्पतियों की संज्ञा
वृक्षों का इतिहास
उड़ान भर रहा हूँ सूर्य से
वहाँ की ऊब थकाने लगी है अब
भाग रहा हूँ नगरों- बस्तियों से
शताब्दियाँ बीत गईं  सोया नहीं
चंद्रमा के पदतल में।

अपने पीछे छोड़ रहा हूँ
कँचीली आँखे
पथरीला आकाश
अपना पैतृक वास -  स्थान
मुझे सूर्य की ओर लौट चलने के लिए न कहो
क्योंकि अब मैं सम्बद्ध हूँ बारिश के उत्सव संग।
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( चित्र : जोआन मीरो की कलाकृति)