Wednesday, September 9, 2009

हैनरी द तुलूस लौत्रेक का बचपन: दूसरा हिस्सा

हैनरी का बनाया विन्सेन्ट वान गॉग का चित्र


(हैनरी द तुलूस लौत्रेक की पुण्यतिथि के अवसर पर पिछली पोस्ट से जारी)

"इसका मतलब हुआ कि मरने के बाद मैं स्वर्ग में जाऊंगा." उसकी आवाज़ में यह बात तय हो जाने की प्रसन्नता थी.

"हां शायद ... अगर तुम एक अच्छे लड़के बनोगे और दिल से भगवान को प्यार करोगे तो."

"वो मुझ से नहीं हो पाएगा" उसके स्वर में अन्तिम फ़ैसला था "मैं उसे पूरे दिल से प्यार नहीं कर सकता क्योंकि में तुम्हें ज़्यादा प्यार करता हूं."

"तुम्हें ऐसी बातें नहीं कहनी चाहिए हेनरी."

"लेकिन मैं कहूंगा!" उसकी आंखों में बच्चों वाली ज़िद थी जिसके आगे आपको हथियार फ़ेंक देने होते हैं "मैं वाक़ई आपको ज़्यादा प्यार करता हूं."

घुटनों पर बांहें धरे वे उसे देख रही थीं. इस बात पर वह कभी हार मानने वाला नहीं. लेकिन शायद किसी बच्चे से ऐसे भगवान को प्यार कर्ने को कहना कुछ ज़्यादा ही होता है जो आपको न गले से लगा सके न बिस्तर में सुला सके....

"ठीक है. मैं भी तुम्हें प्यार करती हूं हेनरी" उन्होंने कहा. वे जानती थीं उसे उनकी तरफ़ से पूरी तरह से आश्वस्ति चाहिए थी. "और अब बार बार बीच में टोकना बन्द करो वरना मैं तुम्हें वो बैल के बारे में नहीं बताऊंगी. तो ... ये कोई चार साल पुरानी बात है, तुम ज़रा से थे, कुल तीन साल के ..."

बहुत कोमल आवाज़ के साथ उन्होंने उसे रिचर्ड के बप्तिस्मे का कि़स्सा बताया. हेनरी को इस घटना की ज़रा भी याद नहीं थी. रस्म पूरी हो जाने पर आर्चबिशप ने सभी लोगों से पवित्र रजिस्टर में दस्तख़त करने को कहा. अब तक हेनरी चुप़चाप बैठा रहा था पर दस्तख़त की बात आने पर वह भी ऐसा करने पर अड़ गया.

"लेकिन मेरे बच्चे," पादरी ने कहा था " जब तुम्हें लिखना ही नहीं आता, तुम द्स्तख़त कैसे कर सकोगे?"

हेनरी ने तनिक ढिठाई से जवाब दिया था, " तब मैं एक बैल का स्केच बना दूंगा!"

इस क़िस्से से उसे ख़ास मज़ा नहीं आया और एक झतके के साथ उसने पेन्सिल का आखिरी स्ट्रोक चलाया.

"ये रहा!"

किसी विजेता के भाव से हेनरी ने स्केच अपने हाथों में ले कर उनके सामने किया.* (लॉत्रेक के बचपन में बनाए आश्चर्यजनक पोर्ट्रेट्स एल्बी म्यूज़ियम में प्रदर्शित हैं.)

"देखा पांच मिनट भी नहीं लगे!"

उन्होंने पोर्ट्रेट की तारीफ़ का दिखावा किया : "बढ़िया! बहुत बढ़िया! तुम एक असली आर्टिस्ट हो!" उन्होंने स्केचबुक को गार्डन-बेन्च पर रखा..

"यहां आकर मेरे पास बैठो, रिरी."

वह अचानक चौकन्ना हो गया. मम्मा के अलावा उसे और कोई रिरी नहीं कहता था. ऐसा भी कभी-कभार ही होता था. यह उन दोनों के बीच का गुप्त पासवर्ड था. या तो उस पर कोई बड़ी मेहरबानी होने वाली होती थी - अगर वह इतवार की प्रार्थना में असाधारण रूप से शान्त बैठा रहता या सौ तक गिनती गिन देता - या किसी अपशकुन या बुरी ख़बर जैसा कुछ होता था.

"तुम सात साल के हो गए हो" उन्होंने शुरू किया, वह उनसे लिपट कर और पास आ गया, "तुम एक बड़े लड़के हो अब. तुम एक बड़े जहाज़ के कप्तान बनना चाहते हो ना? दुनिया भर में घूम कर शेरों और बाघों के स्केच बनाना चाहते हो ना?"

उसने बेचैन सहमति में सिर हिलाया. उन्होंने उसे अपने नज़दीक खींचकर मानो उस आघात को ज़रा हल्का करने का जतन किया.

"तो - अब तुम्हारे स्कूल जाने का वक़्त आ गया है."

"स्कूल?" अस्पष्ट तरीके से परेशान होते हुए उसने दोहराया, "लेकिन मैं स्कूल जाना नहीं चाहता."

"मुझे पता है मेरे छोटू, लेकिन तुम्हें जाना ही होगा. सारे छोटे लड़के स्कूल जाते हैं." उन्होंने उसके काले बालों को सहलाया. "पेरिस में फ़ोन्तेन्स नाम का एक बड़ा स्कूल है. सारे अच्छे लड़के वहीं जाते हैं. वहां वे साथ साथ खेलते हैं और मज़े करते हैं. कितने सारे मज़े!"

"लेकिन मैं स्कूल जाना नहीं चाहता!"

उसकी आंखों में आंसू भर आए. उसकी समझ में पूरी तरह नहीं आया कि मां के शब्दों का वास्तविक तात्पर्य क्या था, लेकिन उसे अस्पष्ट सा आभास हुआ कि उस के आसपास दुनिया ढह रही है: कुत्तागाड़ी, मम्मा और आन्ट आर्मान्दीन से मिलने वाले पाठ, खच्चर की सवारी, उसका ड्रम, जोसेफ़, अस्तबलों में जाना, एनेट के साथ गलियारों में लुकाछिपी खेलना ....

"श्श्श्श!" उन्होंने होंठों पर उंगली रखते हुए कहा "अच्छे बच्चे कभी नहीं कहते 'हम ये नहीं चाहते.' और तुम रोओ मत. तुलूस लॉत्रेक कभी नहीं रोया करते."

उन्होंने उसकी आंखें पोंछी, नाक साफ़ की और उसे विस्तार में बताया कि तुलूस लॉत्रेक परिवार के किसी भी सदस्य ने क्यों रोना नहीं बल्कि हर वक़्त हंसते रहना चाहिए. उन्होंने उसे उस के पर-पर-पर-पर-पर दादा रेमण्ड चतुर्थ काउन्ट दे तुलूस लौत्रेक और उनके पहले अभियान के बारे में बताया.

"इस के अलावा, " उन्होंने जोड़ा "जोसेफ़ और एनेट भी तुम्हारे साथ आ रहे हैं."

"वो भी?"

इस से उसे थोड़ी राहत पहुंची.

एनेट मम्मा की पुरानी नर्स थी. वह बहुत छोटी थी. उसकी आंखें चमकदार नीली थीं और उस के चेहरे पर झुर्रियां घिरी हुई थीं. उसके दांत भी नहीं थे और वह अपने होंठों को अन्दर की तरफ़ खींच लिया करती थी जिससे लगता था कि उस का मुंह भी नहीं है. वह सुबह से शाम तक गलियारों में यहां से वहां भागा करती थी, उसके सफ़ेद टोपे के किनारे किसी चिड़िया के पंखों की तरह फड़फड़ाया करते. ऊन कातते समय वह हेनरी को अपने पास एक ऊंचे स्टूल में बैठने दिया करती और तीखे स्वर में उसे लोकगीत सुनाया करती.

जोसेफ़ की उपस्थिति भी विश्वासवर्धक थी. वह हमेशा से हर जगह था - 'ओल्ड टॉमस' - बग़ीचे में, डाइनिंग रूम में लगे पोर्ट्रेट्स में. हालांकि वह बमुश्किल मुस्कराता था, दोस्त वह बहुत पक्का था; और इस के अलावा वह हेनरी के पोर्ट्रेट्स के लिए अच्छा विषय था: उसकी पंखों वाली हैट, घुटनों पर ख़त्म हो जाने वाली सफ़ेद पतलून और कोचवान का नीला कोट.

"और इतना ही नहीं है" उन्होंने अपनी बात जारी रखी "पेरिस में तुम्हारी मुलाकात मालूम है किस से होने वाली है ... सोचो ज़रा ..." एक क्षण के लिए उन्होंने आखिरी बात को रोके रखा, "वहां तुम्हें पापा मिलेंगे."

"पापा!"

अच्छा! इस बात ने चीज़ों को बिल्कुल ही बदल दिया. पापा बहुत शानदार थे. जब भी वे यहां आते थे, पढ़ाई भुला दी जाती थी और रूटीन पूरी तरह बिगड़ जाया करता. जीवन में एक ख़ास तरह की साहसिकता आ जाया करती. पुराना क़िला उनके बूटों की धमक और उनकी आवाज़ की गूंज के कारण जैसे नींद से जाग जाया करता. वह पापा के साथ लम्बी सवारी पर जाया करता और वे उसे घोड़ों, युद्धों और शिकार-अभियानों की कहानियां सुनाया करते.

"तो क्या वहां हम उनके साथ उनके महल में रहेंगे?" हेनरी की आंखें ख़ुशी से चमकने लगीं.

"पेरिस में लोग महलों में नहीं रहते. वे या तो होटलों में रहते हैं या सुन्दर अपार्टमेन्टों में जिनकी बालकनियों से नीचे सड़क पर देखा जा सकता है."

"लेकिन हम रहेंगे तो उन के साथ ही ना?" उसकी आवाज़ में अब थकान आने लगी थी.

"हां हां, कुछ दिनों के लिए ज़रूर. वो तुम्हें सवारी के लिए Bois de Bologne ले जाएंगे - वहां विशाल जंगल के बीच एक झील है जिसमें लोग जाड़ों में स्केटिंग किया करते हैं. पेरिस में जाड़ों में बर्फ़ पड़ती है न इसलिए. और वे तुम्हें सर्कस भी दिखाएंगे. असली शेर, जोकर और हाथी! ओह ... पेरिस में कितनी सारी अच्छी-अच्छी चीज़ें होती हैं - कठपुतलियों के नाच, बच्चागाड़ियां ... "

उसकी आंखें और होंठ खुले हुए थे; सुनते वक्त वह अपनी पलकों के कोरों पर कांप रहे आंसुओं को पोंछना भूल ही गया.

आने वाले दिनों में, महल के भीतर सब कुछ अस्तव्यस्त हो गया. हर दिशा से बहकी हुई मुर्गियों जैसे लोग महल में आने लगे थे. हेनरी के साथ खेलने के बजाय मम्मा अब 'ओल्ड टॉमस', मुख्य माली ऑगस्ट और अस्तबल के इंचार्ज सिमोन के साथ लम्बे लम्बे वार्तालापों में व्यस्त रहा करतीं. गलियारों में खुले हुए सन्दूक धरे रहते थे. घुड़सवारी के पाठ बन्द हो गए थे ....

फिर एक सप्ताह बाद, विदाई की उत्तेजना थी. "अलविदाएं", गालों पर थपकियां, रेलवे स्टेशन, युद्ध के लिए तत्पर होता जैसा भाप फेंकता इंजन. उसके बाद रेल के कम्पार्टमेन्ट के भीतर - अजीब सी सीटें, सामान रखने की जाली और ऊपर-नीचे होने वाली खिड़कियां.

तीन तीखी सीटियां, लोहे के पहियों की खड़खड़ और लोगों से भरा स्टेशन पीछे की तरफ़ छूटना शुरू हो गया.

जल्द ही एल्बी के ग्रामीण इलाके की झलक दिखने लगी: पेड़, नदियां, खपरैलों वाले फ़ार्महाउस - उस ने यह सब कभी नहीं देखा था.

"देखो मम्मा! देखो!"

शुरू में यह उत्तेजनापूर्ण था, फिर थकानभरा हुआ और आखिरकार उस से ऊब होने लगी.

उसे नींद आ गई.

उसे अगली बात यही पता चली कि गाड़ी पेरिस के उपनगरों से होती हुई रफ़्तार में भाग रही थी और उसका चेहरा खिड़की से सटा हुआ था.

"देखो मम्मा, बारिश हो रही है!"

सलेटी छत वाली ऊंची वर्गाकार बदसूरत इमारतें जिनकी खिड़कियों से सूखते कपड़े झूल रहे थे. फ़ैक्ट्रियों की धुंएदार चिमनियां. मकानों के बईच टूटी बाड़ों वाले बग़ीचों के टुकड़े जिनमें झाड़-झंखाड़ उग रहा था. बारिश में भीगते मुड़े-तुड़े लोहे के ढेर. कीचड़भरी गलियों में बरसातियों में लिपटे,सिर झुकाए, चींटियों जैसे स्त्री-पुरुष आ-जा रहे थे. आल्बी के नीले आसमान के बदले यहां था सलेटी बादलों का एक झुंड. इस कदर कुरूप, यह पेरिस ...

आखिरकार ट्रेन एक इत्मीनानभरी सांस के साथ थम गई. नीले ओवरऑल पहने कुछ मजबूत आदमी कम्पार्टमेन्ट में घुसे और उनका सामान इस तरह उठा कर बाहर निकले जैसे वे अपना सामान ले जा रहे हों. मम्मा ने दस्ताने पहने और अपना स्कार्फ़ ठीक किया.

प्लेटफ़ॉर्म पर प्रतीक्षारत चेहरों का हुजूम था.

और वहां भीड़ में सबसे ऊंचे, अपनी छंटी हुई दाढ़ी के साथ मुस्कराते , चमकदार काली हैट में बहुत सुदर्शन दिखते, बांह के नीचे सुनहरे मूठ वाली छड़ी दबाए, कोट पर सफ़ेद कार्नेशन का फूल लगाए खड़े थे - पापा!

सैल्फ़ पोर्ट्रेट


(फ़िलहाल के लिए इस किताब से इतना ही.)

हैनरी द तुलूस लौत्रेक का बचपन: पहला हिस्सा



24 नवम्बर 1864 को हैनरी द तुलूस लौत्रेक एक बेहद अमीर घर में जन्मे थे. बचपन से ही बीमार रहने वाले हैनरी के स्वास्थ्य के साथ एक के बाद एक त्रासद चीज़ें घटती गईं और इसका असर यह हुआ कि वे कुल साढ़े चार फ़ीट का कद पा सके.

एक सामान्य देह के साथ एक सामान्य शारीरिक जीवन न बिता पाने लायक रह चुके होने के लिए अभिशप्त हैनरी ने अपना सारा जीवन अपनी कला पर वार दिया. पेरिस के मोन्तमार्त्रे इलाके में अपने जीवन का आधे से ज़्यादा हिस्सा बिताते हुए उन्होंने उस इलाके में बहुतायत में पाए जाने वाले नाचघरों और वैश्यालयों की ज़िन्दगी के छुए-अनछुए पहलुओं पर अपनी कूची चलाई और एक से एक शानदार तस्वीरें बनाईं. वहां का एक मशहूर नृत्यघर 'मूलां रूज़' तो समूचे संसार में इसी महान कलाकार के नाम के साथ जुड़ चुका है.





आज हैनरी द तुलूस लौत्रेक के बग़ैर १८८० के दशक में उभरे उस क्रान्तिकारी इम्प्रैशनिस्ट आन्दोलन की कल्पना तक नहीं की जा सकती, जिसने आने वाले कई दशकों के लिए चित्रकला के संसार की परिभाषा ही बदल डाली थी. विन्सेन्ट वान गॉग, क्लाउद मॉने, मैने, पॉल गोगां, हैनरी रूसो और तमाम अन्य महान नामों की सूची हैनरी द तुलूस लौत्रेक के ज़िक्र के बग़ैर अधूरी है.



गलियों में लोग उसके कद और उसकी आकृति के कारण उसका मज़ाक उड़ाया करते थे - नतीज़तन १८९० के दशक के आते न आते वह भीषण अल्कोहोलिक बन गया. उसे एक सैनेटोरियम में भर्ती कराया गया और बाद में उसकी मां उसे अपने साथ ले गई, लेकिन कुछ हुआ नहीं.

९ सितम्बर १९०१ के दिन वह अपने घर में मर गया.

यानी आज हैनरी द तुलूस लौत्रेक की पुण्यतिथि है. आज से कुछ साल पहले नाचीज़ ने विन्सेन्ट वान गॉग के जीवन पर आधारित पुस्तक 'लस्ट फ़ॉर लाइफ़' का अनुवाद करते हुए यह तय किया था कि मौका मिलते ही कुछ अन्य कलाकारों के जीवनवृत्तों के अनुवाद अवश्य करूंगा. तो इस महान महबूब चित्रकार को नमन करते हुए उस श्रृंखला को जारी रखते हुए पियरे ला म्यूर की लिखी हैनरी द तुलूस लौत्रेक की जीवनी 'मूलां रूज़' के के पहले अध्याय के अनुवाद का पहला हिस्सा प्रस्तुत है. दूसरा कल.





मूलां रूज़ - अध्याय: एक

"प्लीज़ मम्मा, हिलो मत! मैं आपका पोर्ट्रेट बनाने जा रहा हूं."

"क्या, एक और! लेकिन हेनरी तुमने कल ही तो मेरा पोर्ट्रेट बनाया था." तुलूस-लौत्रेक की काउन्टेस, अदेले ने अपना कशीदाकारी का काम गोद में रखा और लॉन पर अपने सामने झुके बैठे नन्हे लड़के पर मुस्कराते हुए निगाह डाली. "कल से आज तक मुझमें कोई बदलाव तो नहीं आया ना, या आया है? मेरे पास वही नाक है, वही मुंह, वही ठोड़ी ..."

अदेले की निगाह काले बालों के छितराव, दिल के आकार वाले चेहरे के हिसाब से ज़्यादा बड़ी याचनारत भूरी आंखों, सिलवट पड़े हुए सेलर सूट और खुली स्केचबुक पर उत्सुकता के साथ ठहरी हुई टेढ़ी पेन्सिल पर एक साथ पड़ी. रिरी, मेरा सबसे प्यारा रिरी! उनके पास बस वही अपना था, लेकिन वह हर बाक़ी चीज़ की भरपाई के लिए पर्याप्त था - वे निराशाएं, पछतावे, अकेलापन.

"तुम डन का पोर्ट्रेट क्यों नहीं बनाते?" उन्होंने सुझाव दिया.

"मैं बना चुका हूं, दो बार." उसने मेज़ के नीचे ऊंघते गोर्डन सेटर की ओर निगाह डाली, जिसकी नाक इस वक़्त उसके पंजों के बीच में थी. "इसके अलावा वह अभी सोया हुआ है, और जब वह सो रहा होता है, उसके चेहरे पर कोई भाव ही नहीं होते. वैसे मैं तो आपकी तस्वीर ही बनाऊंगा. और आप ज़्यादा सुन्दर भी हैं."

इस भोली तारीफ़ को उन्होंने गम्भीरता के साथ स्वीकार किया.

"ठीक है, पर सिर्फ़ पांच मिनट. उस से एक मिनट भी ज़्यादा नहीं." एक गरिमामय भंगिमा के साथ उन्होंने अपना चौड़ा गार्डन हैट उतार दिया जिससे उनके मुलायम भूरे बाल नज़र आने लगे - बीच से बनाए गए बाल कानों के ऊपर पहुंचते-पहुंचते पंखों की तरह मुड़ जाते थे. "सवारी के लिए चलने का वक्त हो ही गया है. जोसेफ़ कभी भी आता होगा. आज हम कहां जाने वाले हैं?"

उसने कोई उत्तर नहीं दिया. उसकी पेन्सिल अभी से काग़ज़ पर दौड़ना शुरू कर चुकी थी.

सितम्बर १८७२ की इस चमकदार दोपहर को वे दोनों ही थे वहां - दुनिया से दूर, पुरानी ख़ामोश और दोस्ताना चीज़ों की संगत में और प्रसन्न. उनके चारों तरफ़ हरा लॉन था. आकाश में सूर्य चमक रहा था. घोंसलों के किनारों पर गपशप में मसरूफ़ पक्षी थे जो कभी कभार रोज़मर्रा के कामकाज के वास्ते ज़रा देर को फ़ुर्र हो जाया करते. पेड़ की पीली पत्तियों की सघनता के बीच से अपनी मीनारों और खिड़कियों के साथ एक मध्यकालीन किला उभरता सा उठता था.

एक क्षण पहले ही अपनी नीली पोशाक पहने मोटे और गम्भीर दिखते "ओल्ड टॉमस" ने अवसर के हिसाब से किसी रईस घर के खा़नसामे के नख़रों के साथ चाय की ट्रे हटाई थी. उसके पीछे मात्र अट्ठावन साल का जवान डोमिनिक भी था जिसे काम करते हुए बारह साल ही हुए थे. कुछ मिनटों के बाद आन्ट आर्मान्दीन ने, जो किसी की आन्ट नहीं बल्कि दूर की रिश्तेदार थीं और सात साल पहले एक हफ़्ता रहने भर को आई थीं, अपना अख़बार मोड़कर "कुछ चिट्ठियां लिखने" की बात कहकर उन दोनों से इजाज़त ली थी, जिसका मतलब होता था कि वे डिनर से पहले कुछ देर को सोएंगी.

आज रात जोसेफ़ नाम का गठीला कोचवान आकर मादाम काउन्टेस को बग्घी के पहुंचने की सूचना देगा. आज पुरखों की हंसती तस्वीरों और फ़ानूसों से सजे एक ज़रूरत से ज़्यादा बड़े डाइनिंग रूम में बुज़ुर्ग वेटरों द्वारा एक साधारण किन्तु औपचारिक डिनर परोसा जाएगा. मीठा खाने के बाद युवा काउन्ट विशाल सीढ़ीयां चढ़कर अपने शयनकक्ष में पहुंचेगा जहां उसकी मां उससे मिलेंगी. मां उसे ईसा मसीह के बारे में बताएंगी और यह भी कि वह कितना अच्छा लड़का है. वे उसे जोन ऑफ़ आर्क के बारे में बताएंगी और उस युद्ध के बारे में जिस में उस के पर-पर-पर-पर-पर दादा रेमण्ड चतुर्थ काउन्ट दे तुलूस लौत्रेक ने ईसाई योद्धाओं को येरूशलम तक पहुंचाया था जहां उन्होंने दुष्ट तुर्कों से पवित्र मकबरे को बचाया था. फिर एक चुम्बन, एक आखिरी दुलार. एक उनींदा "गुडनाइट मम्मा". फिर कम्बल में घुस जाना. एक आखिरी निगाह डाल कर मां अपने बगल वाले शयनकक्ष में चली जाएंगी.

खिड़कियों पर से रोशनियां एक एक कर बुझाई जाएंगी. और जैसा कि सदियों से होता आया था, रात अपना काला लबादा तुलूस के काउन्टों के किले के ऊपर डाल कर पसर जाएगी.

"आज हम कहां जाने वाले हैं?" उन्होंने फिर से पूछा. "पुराने खेतों की ओर या सेन्ट एन के चर्च में?"

उसने व्यस्तता में सिर हिलाया जिसका मतलब था उसे दोनों जगहों में कोई दिलचस्पी नहीं.

उनके चेहरे की गम्भीर उदासी में कोई चीज़ तिड़क कर रह गई. बेचारा रिरी, उसे इस बात का ज़रा भी भान नहीं था कि वह उनकी अन्तिम सवारी होने वाली है. उसने अभी यह नहीं सीखा था कि जीवन लगातार दोहराई जाती विदाओं के सिवा कुछ नहीं और यह कि आने वाला कल आज जैसा ही नही होता. अब ऐसा कभी नहीं होगा जब वह घोड़ों की लगामें सम्हालती अपनी मां से चिपट पाएगा, या गांव की सड़कों में सवारी के मज़े उठाता हुआ कुछ भी गाता रहेगा: न वह बग्घी के पीछे हाथ बांधे बैठे जोसेफ़ को चिढ़ा सकेगा, न ही अपनी चमकती निगाहों के यहां-वहां दौड़ाता अनगिनत सवाल पूछा करेगा. उनकी अन्तरंगता का पहला धागा ढीला पड़ने वाला था. धीरे धीरे बाक़ी धागे भी निकलना शुरू हो जाएंगे और आख़िरकार बाक़ी लड़कों की तरह वह भी चला जाएगा...

अदेले के होंठ एक आह से थर्राए.

"हिलो मत!" वह चहका "मैं मुंह बना रहा हूं और यही सबसे मुश्किल होता है ..."

अदेले की आंखों ने एक बार फिर से उस झुकी हुई नन्ही आकृति को देखा. बहुत ध्यान से काम करने के कारण उसका निचला होंठ अन्दर को चला गया था. पेन्टिंग का यह अजीब शौक़ उसे कहां से मिला है विरासत में? उनके लिए यह किसी पहेली की तरह था जबकि वे उसके सबसे अंतरंग विचारों को इतनी अच्छी तरह समझती थीं - उसे पड़ने वाले अड़ियलपन के दौरे, प्रेम और स्वीकृति के लिए उसकी चाह, उसके नन्हे दिल की वह भूख जिनके चलते वह लड़ाइयों के बीच में ही उनकी बांहों में धंस जाया करता था. उनका अचरज उअर भी ज़्यादा इस लिए था कि उअसके भीतर कला के लिए कोई विशेष रुझान नहीं था. ख़ैर समय के साथ यह भी गुज़र जाएगा जैसे समुद्री कप्तान बनने का उसका सबसे हालिया फ़ैसला ....

"क्या मैंने तुम्हें कभी उस समय के बारे में बताया था जब तुम मौश्ये आर्चबिशप के लिए एक बैल का स्केच बनाना चाहते थे?"

"वो मोटा आदमी जो हमारे यहां खाना खाने आता है?"

"खाना खाने नहीं हेनरी, 'डिनर पर' और -" अब उन्होंने उस कठोर स्वर में बोलना शुरू किया जिसकी अब उसे आदत पड़ चुकी थी "तुम ने मौश्ये को मोटा आदमी नहीं कहना चाहिए."

"लेकिन वो मोटा है. है ना?" उसने कुछ न समझने की मुद्रा में अपनी गोल आंखें ऊपर उठाईं, "वह करीब करीब टॉमस जितना मोटा तो है ही."

"हां. लेकिन वे ईश्वर के बन्दे हैं और महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं. इसीलिए हम उनकी अंगूठी को चूमते हैं और कहते हैं 'हां श्रीमान' या 'नहीं श्रीमान'"

"लेकिन..."

"ख़ैर" आगे बहस की संभावना को थामते हुए उन्होंने जल्दी से कहा "ये तुम्हारे भाई रिचर्ड के बपतिस्मे की बात है..."

"मेरा भाई? मुझे नहीं पता था कि मेरा कोई भाई भी है. कहां है वो?"

"वह स्वर्ग वापस चला गया. कुछ ही महीने रहा यहां"

"ओह...." उसकी निराशा असली थी, लेकिन बहुत संक्षिप्त. "तब उसका बपतिस्मा कराने की क्या ज़रूरत थी?"

"क्योंकि स्वर्ग में जाने के लिए हर किसी का बपतिस्मा कराना होता है."

"मेरा भी?"

"हां, और क्या!"

इस से उसकी उत्सुकता संतुष्ट हुई और वह दुबारा ड्रॉइंग में लग गया.

(जारी)

(पेन्टिंग्स के बारे में: क्रमशः . रेने प्रिन्स्तौ द्वारा बनाया गया उन्नीस साल के हैनरी का पोर्ट्रेट . हैनरी द तुलूस लौत्रेक की पेन्टिंग 'द किस' ३, ४ और . हैनरी द तुलूस लौत्रेक द्वारा बनाए गए मूलां रूज़ के असंख्य चित्रों में से चयनित)

Monday, September 7, 2009

तुम्हारी आवाज से जाग रही हैं सूरज की मधुमक्खियाँ



सिद्धेश्वर बाबू ने पोलैन्ड की एक बड़ी कवयित्री हालीना पोस्वियातोव्स्का की कुछ कविताओं के बहुत जानदार अनुवाद भेजे हैं. पेश कर रहा हूं. साथ में लगा हुआ नोट भी उन्हीं का है. ये कविताएं बहुत जल्द प्रकाशित होने वाले हालीना के हमारे साझे अनुवादों का हिस्सा बनने जा रही हैं. हालीना पर मैंने कुछ समय पहले एक पोस्ट लगाई थीं. हिन्दी कविता के अपने पहले गुरुओं में एक सिद्धेश्वर बाबू को दिल से शुक्रिया भी.:

हालीना पोस्वियातोव्सका के जीवन और कविताओं से गुजरते हुए अगर बार - बार निराला की पंक्ति याद आती रही -' दु:ख ही जीवन की कथा रही.'

हिन्दी कविता के प्रेमियों और पाठकों को लग सकता है कि महादेवी वर्मा की याद क्यों नहीं आई? हिन्दी कविता के पढ़ने - पढ़ाने वाली बिरादरी में महादेवी को दु:ख , पीड़ा और विरह का कवि माना जाता है.अपनी बात की तसदीक में उनकी बहुत कविताओं के मुखड़े पेश किए जा सकते हैं , मसलन -

- पंथ होने दो अपरिचित प्राण रहने दो अकेला.

- आज दे वरदान !
वेदने वह स्नेह - अंचल - छाँह का वरदान !


लेकिन इस बात से यह अनुमान न लगा लिया जाय अथवा धारणा न बना ली जाय कि हालीना और महादेवी की कविताओं में कोई समानता है या कि स्त्री होने के कारण व दु:ख तथा प्रेम की घनीभूत सांद्र उपस्थिति के कारण समनता के काव्यमय तंतुजाल तलाश किए जाएं.दोनो की भाषा अलग है , भूगोल अलग है , समय और समाज की निर्मिति व्याप्ति अलग - अलग है फिर भी न जाने क्यों हालीना की कविताओं से गुजरते हुए लगभग पूरा छायावाद याद आता रहा , संभवत: इसलिए भी कि वहाँ जो नहीं है , उसका यहाँ दीखना केवल चमत्कृत और चकित नहीं करता बल्कि हिन्दी कविता के प्रेमी व पाठक होने के नाते इस बात का अनुभव होता है कि अपने निकट के अतीत की हिन्दी कविता में उस पर बात होनी चाहिए जो कि जरूरी था किन्तु छूट गया है. दु:ख और ऊहात्मकता , प्रेम और ऐन्द्रिकता के घालमेल के बाबत जो साफगोई हालिना के यहाँ है , उसका हिन्दी कविता में गैरहाजिर होना खलता तो जरूर है. यही कारण है कि आधुनिक पोलिश कविता के एक सशक्त हस्ताक्षर पर बात करते - करते आधुनिक हिन्दी कविता पर बात करने की जरूरत आन पड़ी. ऐसा इसलिए भी कि यह अनुवाद मूलत: और अंतत: उसी पाठक के लिए है जो कि हिन्दी का पाठक है और उसे विश्व कविता के बरक्स देखने - परखने का हिमायती है.

हालीना पोस्वियातोव्सका की कवितायें पढ़ते समय हम इस बात से सजग रहते हैं कि पोलिश कविता की समृद्ध और गौरवमयी परम्परा में वह एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं .उनकी कवितायें उनके अपने जीवन की ही तरह कलेवर में 'लघु' हैं , न केवल कलेवर में बल्कि कहने अंदाज में भी 'लघु' किन्तु अपनी लघुता व निजता में निरन्तर एक 'रिजोनेन्स' पैदा करती हुई. हालीना की कवितायें यह स्पष्ट और बिना लाग लपेट के बताती हैं कि दरअसल जीवन और मृत्यु के बीच का अंतराल ही हमारी भूमिका है , रंगमंच पर अपना पार्ट अदा करने के वास्ते दिया गया स्पेस . अस्तु , इसी में वह सब कर गुजरना है जिसकी चाह है , इसे नियति मान लेना निष्क्रियता है - एक तरह से अपने से , खुद से नफरत करने जैसा कोई काम. इस आलोक में पेम एक वायवी वस्तु बनकर नहीं रह जाता है और न ही ऐन्द्रिकता सिर्फ देह.जिस तरह प्रकृति में तमाम चीजें प्रकट व विलुप्त होती रहती हैं वैसे ही हालिना की कविताओं में व्याप्त दु:ख और मत्यु की छायाएं अवतरण व अवसान के क्षण हैं न कि उत्पन्न होने और विनष्ट होने की गौरव गाथायें. एक जगह वह कहती हैं -

मैंने अपनी अंतरात्मा के साज दुरुस्त कर लिए हैं
अब गाती है मेरे लिए मिठास
जिस तरह भोर में
गाती है चिड़िया


प्रस्तुत अनुवाद कविता के प्रेमियों के लिए कविता के प्रेमियों द्वारा किया गया अनुवाद है. ऐसे प्रेमियों के लिए जिनकी निगाह में कविता सिर्फ कविता है उसे किसी एक भाषा की सीमा में महदूद कर देखने हामी नहीं. यह विश्व कविता की विपुल थाती से लिया गया एक कण भर है शायद ! साथ ही यह कहने में कोई संकोच नहीं है पोलिश कविता की समृद्ध और गौरवमयी परम्परा से रू - ब-रू होने के लिए हालीना पोस्वियातोव्सका की कविताओं को देखना - परखना बहुत जरूरी है.

जहाँ तक अपनी जानकारी है हिन्दी में हालीना की कविताओं अनुवाद -उपस्थिति बहुत विरल है. यही कारण था कि इस नोट का एक हिस्सा हिन्दी कविता के बाबत सायास लिखा गया . देखते हैं इस विरलता को सरलता में बदलने के काम में ( नवारुण भट्टाचार्य के शब्दों में कहें तो ) - 'आखिर एक किताब मचा सकती है कितना कोलाहल !'

१. कुछ अंतरे मालगोसिआ के लिए

*
तुम जब आते हो
मुख पर आ जाती है मुस्कान
और मैं दरपन हो जाती हूँ
आँखों में भर जाता है चौंधापन
तुम जब देखना चाहते हो मुझमें अपनी तस्वीर.
सेब और चेरी से भरी, भारी- भरपूर हाथों के साथ
खुद को पाती हूँ बगीचे में
तुम जब आते हो .

तुम्हारी भूख के लिए
मेरे पास रखे होते हैं फल
और प्यास के वास्ते घास के मैदानों की नमी
खुली खिड़की से उठँगी हुई मैं
आकुल हो तकती हूँ रात को
और सितारे बन जाते हैं मेरी आँख

**

मेरे प्यार ! अभी कायदे से नहीं हुई है भोर
पंखों की नर्म चादर ओढ़े सो रहे हैं परिन्दे
तुम्हारी आवाज से जाग रही हैं सूरज की मधुमक्खियाँ
और नींद से भरे मेरे माथे के गिर्द डोल रही हैं
मेरी पलकों की नीरवता को तोड़ रहे हैं तुम्हारी आहट के झींगुर
और परिन्दे अब भी सो रहे हैं.

अभी बहुत जल्दी है मेरे प्यार !
मेरे घर , मेरे आकाश में
तुम्हारे चुम्बन से उदित होता है उष:काल
पापलर की डोलती पत्तियों पर सूर्योदय उकेरता है रेखाचित्र
जिन पर सुबह चमक रही है बूँद - बूँद
तुम्हारे रसपान के वास्ते ही तैयार किया गया है यह आसव
गो कि गहरी नींद में डूबे सोए पड़े है पेड़.


२.मैं तुम्हारे बारे में लिखना चाहती हूँ


मैं तुम्हारे बारे में लिखना चाहती हूँ
तिरछी बाड़ फुसफुसाती है तुम्हारा नाम
तुम्हारे होठॊं के बारे में लिखना चाहती हूँ -
बर्फबारी में जमा हुआ चेरी वृक्ष.

मैं लिखना चाहती हूँ कुछ लहरदार सतरें
तुम्हारी काली बरौनियों - पलकों के बारे में
अपनी उँगलियों की सलाइयों से
बुनना चाहती हूँ तुम्हारे बाल.
खोजना चाहती हूँ तुम्हारे कंठ में फँसी हुई फाँस
जिससे मफलर की मानिन्द लिपटी हैं अस्फुट आवाजें.

मैं चाहती हूँ कि
सितारों में घोल दूँ तुम्हारा नाम
रुधिर बनकर तुम्हारे भीतर बहना चाहती हूँ
संग - साथ रहने की साध भर नहीं
रात में भीगी हुई बारिश की बूँद सरीखी मैं
तुम्हारे भीतर लुप्त हो जाना चाहती हूँ .

हाँ, ऐसा ही कुछ चाहती हूँ मैं
ऐसा ही लिखना चाहती हूँ.


३. मेरा प्रियतम उतना खूबसूरत नहीं है


मेरा प्रियतम उतना खूबसूरत नहीं है
सीदी - सादी है उसकी फितरत.
अगर उसे पलटने से बरज दूँ
तो मेरे आसमान की घनीभूत दोपहर में
कौन करेगा जामुनी रंगों की चित्रकारी.
उसके होंठ हैं दहकते हुए अंगार
और जब वह हँसता है
तो दमकती है दाँतों की नुकीली धवल पंक्ति
मानो दुनियावी चुनौतियों के बरक्स एक माकूल जवाब.

मेरी हर रात के आसमान पर
उदित होता है प्रियतम का अर्धचन्द्राकार आनन
वह कमसिन मिजाज नहीं है
गलियों की ज्यामितीय रूपाकारों में
नाचते ही रहते हैं उसके नैन
युवतियों में धधकाते हुए अग्नि - ज्वाल.
उसके बालों में हाथ डाल
परछाँई को पकड़ लेती हूँ मैं
और एक अधखिले दुबले नुकीले तृण की छाँव
बन जाती है अप्रेल मास के सेब की गठीली गाछ.


४.उसने कहा - 'मैंने किया प्रेम'


उसने कहा - 'मैंने किया प्रेम'
- यह उसने कहा.

अब मैं उसकी मुस्कान में जिन्दा हूँ
बीती रात
जी भर निहारी थी जिसकी शोभा
और मन भर किया था गुणगान
उसी युवा स्प्रूस के छरहरे तने में
टटोलती - तलाशती हूँ कूल्हों की रूपाकृति.

इससे पहले कि
मेरे लरजते हाथों में
अंगूठे के कोरों पर भार धरे पैरों में
दाँतों की पाँत में
वह रोप दे
इच्छाओं की गुनगुनाती पौध.
घेर लेता है अजब नैराश्य
अपने ही हथेली पर अपनी ही ठोड़ी टेक
सोचती हूँ त्वचा के बारे में
जिसका तीखा चरपरा सुनहरा स्वाद
रह गया है याद.


५.तुम्हारी सुघड़ उँगलियों में


मैं एक सिहरन हूँ
फक़त एक लरज
तुम्हारी सुघड़ उँगलियों में सँजोयी हुई.
तुम्हारे तप्त होंठों के भार तले
दबी हुई पत्तियों का गीत हूँ मैं.

तुम्हारी गमक परेशान करती है - बताती है - तुम्हारा होना
तुम्हारी गमक परेशान करती है - अपने साथ लिए चली जाती है रात
तुम्हारी सुघड़ उँगलियों में
मैं एक रोशनी हूँ - एक उजास.

मृत अँधियारे दिन के ऊपर
मैं हरे चन्द्रमाओं के साथ चमकती हूँ
अचानक
तुम्हें पता चलता है कि मेरे होंठ हैं सुर्ख
-और उनके भीतर बह रहा है
नमकीन स्वाद से लबरेज लहू.

(नोट और अनुवाद सरताज कबाड़ी सिद्धेश्वर सिंह के)

Sunday, September 6, 2009

उत्तराखंड सरकार जल्दी में थी

(सुधी पाठको, नैनीताल समाचार अब इंटरनेट पर पढ़ा जा सकता है. एक वो दिन भी था जब राजीव लोचन साह ने "अब नहीं चलता, अब बंद करता हूँ" की अपील छापी और पत्रों की बाढ़ ऐसी आई कि संपादक जी को अपना फ़ैसला बदलना पड़ा. आज उत्तराखंड की वो ख़बरें आप पढ़ सकते हैं जो "अख़बार" नहीं छापते. प्रस्तुत है वरिष्ठ पत्रकार हरीश चंद्र चंदोला का सद्य:प्रकाशित आलेख.)


जोशीमठ के ऊपर 10,000 फीट ऊँचे ऑली में जो 200 करोड़ रुपए से अधिक का काम दक्षिण एशिया के शीत खेलों के लिये केन्द्र तथा उत्तराखंड सरकार ने दिया था, उसका काफी कुछ भाग इस साल की पहली ही वर्षा में बह कर जोशीमठ शहर तथा उसके आसपास के गाँवों में आ गया। ये खेल पिछले शीत काल में होने थे, किंतु तब तक तैयारियाँ न होने के कारण इन्हें नवंबर-दिसंबर 2009 तक के लिये आगे बढ़ा दिया गया। अब इसे जनवरी 2010 तक फिर बढ़ा दिया गया है। मगर तब तक भी इसकी सारी तैयारियाँ पूरी हो पायेंगी, संभव नहीं लगता। ऑली में खेल प्रतियोगिताओं में भाग लेने विदेशों से आने वाले प्रतिभागियों के लिए जो बड़ा होटल बन रहा है, वह भी अभी पूरा नहीं हुआ है।

सबसे बड़ी समस्या आ रही है बर्फ पर तेजी से फिसलने स्की की प्रतियगिता के लिए बने 20 मीटर चौड़े तथा सवा किलोमीटर लम्बे रास्ते डबल स्की स्लोप की। यह ऑली के सबसे ऊपर जंगल से आरंभ होकर नीचे जाने वाली मोटर सड़क तक आता है। जिस ढलान पर वह बना है, उस पर हरी घास उगी रहती थी। उसे मशीनों से उखाड़ कर यह प्रतियोगिता मार्ग बनाया गया है। यह घासवाली भूमि, जिसे हम पहाड़ के लोग बुग्याल कहते हैं, अत्यंत संवेदनशील है। इसकी घास को कहीं भी जरा सा भी छीलें-उखाड़ें तो उसके नीचे की मिट्टी झर कर बहने लगती है। मिट्टी का यह घाव तब फैल कर बढ़ता रहता है, जब तक उसमें फिर से घास नहीं उग जाती।

पिछले साल इस रास्ते पर स्की स्लोप के खोदने का असर यह हुआ कि भारी वर्षा उस घास-उखाडे़ रास्ते की मिट्टी बहाकर नीचे 15 किलो मीटर की ढलान पर बसे डाँडों गाँव, जोशीमठ शहर तथा नरसिंह मंदिर के घरों में ले आई। यह बह कर आई मिट्टी घरों में भर गई। पानी घरों की निचली मंजिलों में भर कर ऊपरी मंजिलों की खिड़कियों से निकलने लगा। इस मिट्टी को निकालने व घरों को साफ करने में बहुत मेहनत तथा धन लगा। बाद में जोशीमठ नगरपालिका ने कुछ नागरिकों को इससे हुई हानि का मुवावजा भी दिया।

यह फिसनले वाला रास्ता मध्य योरोप की एक कंपनी ने बनाया था। उसका इंजीनियर और कर्मचारी अपना काम पूरा करके वापस चले गए। यह ऊँचा पर खुदा लंबा-चौड़ा रास्ता अभी भी बिना घास के वैसे ही नंगा ही है, जैसे पिछली वर्षा में था। इस महीने की पहली वर्षा फिर से वहाँ की बहुत सी मिट्टी बहा कर खेतों, सड़कों तथा घरों में ले आई। अभी यहाँ वर्षा काल आरंभ ही हुआ है और पानी अधिक नहीं पड़ा है। जब तेज वर्षा होगी तो उस रास्ते की और मिट्टी बहकर नीचे फिर से घरों में भर जाएगी। आशंका है कि अब वह घरों को ढहा न दे! इस खतरे से लोग बहुत डरे हैं। यह खेल न हुए, विपदा हो गये।

मैं ऊपर स्की स्लोप को देखने गया। उसमें कहीं-कहीं दस-दस फीट के गहरे गड्ढे बन गए हैं। उसमें भरी मिट्टी बह कर नीचे आ गई है। लेकिन अभी वहाँ की सारी मिट्टी नहीं बही है। अगर बहती है तो जोशीमठ का एक बड़ा भाग उससे भर जाएगा। वहाँ बरसात के पानी की निकासी का समुचित प्रबंध नहीं किया गया है। पिछले साल राज्य सरकार जल्दी में थी। स्लोप जल्दी बनाओ और खेल शुरू करो। इसके कारण सब काम तेजी से कराया गया। सोचा-समझा नहीं गया कि उस सब विकास के क्या परिणाम होंगे। राज्य के खेल विभाग के सचिव तथा अन्य अफसर 300 किमी. दूर देहरादून से आते थे और केवल यही बताते थे कि आयोजन कब तक पूरा हो जाएगा। ठेकदारों पर बड़ा दबाव था। ढाल कैसा है, उसका पानी कहाँ जाएगा, यह सोचने का किसी के पास समय नहीं था। जोशीमठ तथा आस-पास के गाँवों के पुराने लोगों को बुलाने-पूछने का किसी अधिकारी को समय नहीं था। अब जब कठिनाई आई है तो यहाँ के निवासी पूछते हैं कि ये सचिव-अफसर क्यों इतनी जल्दी में थे ? क्या इतनी बड़ी रकम खर्च करने पर उनका कमीशन बनता था ? इसे जल्दी खर्च करो और फिर कोई दूसरा काम पकड़ो ! यह विकास पर खर्च होने वाले धन का एक नमूना है: जल्दी खर्च करो और कमीशन बनाओ !
पानी घरों की निचली मंजिलों में भर कर ऊपरी मंजिलों की खिड़कियों से निकलने लगा। इस मिट्टी को निकालने व घरों को साफ करने में बहुत मेहनत तथा धन लगा।
स्की-स्लोप की भूमि दलदली थी। उसका पानी निकालने के लिये नालियाँ बनाई गई थीं। उनके ऊपर जालियाँ लगाई गई हैं, ताकि मिट्टी छन कर पानी नालियों में जाये। किन्तु जालियाँ मिट्टी से इतनी भर गई हैं कि उनसे पानी की निकासी नहीं हो पा रही है और बहता पानी उस घास-उखाड़े स्लोप पर गड्ढे बनाता जा रहा है। वहाँ चौकीदारी के लिए कुछ लोग लगा दिए गए हैं, लेकिन वे सरकारी लोग हैं, जो पानी की नालियों से मिट्टी हटाने का काम नहीं करते। नीचे एक पानी निकासी का नाला बनाया गया है, लेकिन वह ऐसा बना है कि पानी उसमें जाता ही नहीं। वह उसके समानान्तर बह कर गहरे गड्ढे बना रहा है।

खेलों की कुछ अन्य तैयारियाँ हो गई हैं। ऊपर एक बड़ी झील बनाई जा चुकी है, जिसके पानी से स्की-स्लोप पर बिछाने के लिये बर्फ बनाई जाएगी। बर्फ बनाने की मशीन आयात की जा चुकी है और बर्फ को फिसलने के लिए ठोस बनाने की भी। अन्य जरूरी मशीनें भी आ गई हैं। पहले बर्फ के खेलों के लिए जो रिंक अलग से कुछ नीचे 2006 में बनाया जाना था, वह अभी तक नहीं बना है। देखने से लगता है कि वह दिसंबर तक शायद ही बन पाए।

खेलों के रास्ते पर स्की स्लोप के ऊपरी भाग में एक बहुत बड़ा रिसोर्ट बना है। उसके बारे में अनेक विवाद हैं। वह किसी स्थानीय व्यक्ति की भूमि पर ही नहीं, वन भूमि पर भी अतिक्रमण कर बना है। दो वर्ष पहले जोशीमठ की उप-जिलाधिकारी वहाँ जा कर अतिक्रमित सरकारी वन भूमि पर बने उस रिसोर्ट के कमरों को तोड़ कर आई थीं। किन्तु उसके मालिक एक बहुत प्रभावशाली व्यक्ति माने जाते हैं। वे नैनीताल उच्च न्यायालय जाकर उस रिसोर्ट के विरुद्ध कोई कदम उठाने पर स्थगनादेश लेकर आ गए और जो कमरे उप-जिलाधिकारी ने तोड़े थे, उन्हें उन्होंने फिर से बना दिया।

बर्फ पर फिसलने के रास्ते, स्की स्लोप जिसके बीचोबीच यह रिसोर्ट बना है, उसके बने रहने के लिये स्की स्लोप को घुमा दिया गया है। लेकिन समस्या यह है कि रिसोर्ट में खाना बनाने, नहाने-धोने में गर्म पानी का इस्तेमाल होता है, जिसकी निकासी फिसलने वाले रास्ते के पास या नीचे है। इसका बहता गर्म पानी रास्ते पर जमा बर्फ को पिघलाता रहेगा, जिसके कारण फिसलने वाले खेलों में बाधा आएगी। इस समस्या का समाधान अभी तक नहीं निकल पाया है।

जो समिति इन शीतकालीन खेलों का आयोजन कर रही है, उसका मुख्य कार्यस्थल ऑली से 300 किमी. दूर देहरादून में है। समिति के अध्यक्ष और उसके सरकारी सदस्य कभी-कभी ही ऑली-जोशीमठ आ पाते हैं। इस काम की लगातार निगरानी नहीं कर पाते। समिति का कहना है कि वह इन खेलों को अगले वर्ष के आरंभ में अवश्य करा लेगी। किन्तु तैयारियों को देखने से यह कठिन लगता है। अभी यह भी स्पष्ट नहीं है कि कितने दक्षिण एशियाई देश इनमें भाग लेंगे।

Saturday, September 5, 2009

कहाँ गए बंजारे

बंजारों के संगीत का मज़ा लेने के बाद हाल-फिलहाल इंतज़ार है अशोक भाई के उस आलेख का जो बंजारों
पर लिखने का उन्होंने वायदा किया है । जिन बुजुर्गों ने बंजारे देखे हैं वो कहते हैं की आज सभी घुमंतू कबीलों को बन्जारा कह दिया जाता है मगर वो बहुत अलग होते थे। कहते हैं दुनिया भर में फैले बंजारों की भाषा के शब्द आपस में मिलते जुलते हैं और रीति-रिवाज भी । ये भी सुनते हैं की उनकी पोशाक रंग -बिरंगी होती थी और कद-काठी लम्बी चौडी , औरतें अक्सर दो चोटियाँ बनाती थीं और उन्हें अक्सर गाते-बजाते और कलाबाज़ियां करते देखा जाता था और ऐसे किस्सों की कमी न थी जब किसी मनचले ने किसी बंजारन पर कोई फिकरा कसा और फ़िर उसकी लाश ही मिली । । बहरहाल , मैंने तो ऐसे बंजारे नहीं देखे मगर मेरे एक जानकार बुजुर्गवार का फरमाना है की १९७७ में आई' धरम-वीर ' के एक गाने में तमाम अतिरेक और लटके-झटकों के बावजूद बंजारों को ७० फीसदी देखा जा सकता है । क्या आपने देखे हैं बंजारे ?

Friday, September 4, 2009

बंजारों का संगीत : दो



आज प्रस्तुत है अल्बानिया और बल्गारिया के बंजारों का संगीत.

बंजारों के इतिहास और उनके संगीत को लेकर एक लम्बा लेख लिख रहा हूं. जल्द ले कर हाज़िर होता हूं.



यहां से डाउनलोड करें:

http://www.divshare.com/download/8384274-34f



यहां से डाउनलोड करें:

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Thursday, September 3, 2009

पानी, बालू और बारिश के इलाके में पहली बार

(एक पुरानी पोस्ट की पुनर्प्रस्तुति )
तारीख़: १५ अगस्त, साल: १९९१

बारिश के अपने नियम हैं
अपने कायदे,
जब दिन होता है खाली - उचाट
तब पहाड़ की भृकुटि पर उदित होता है
स्मृति का अंधड़,
हरे पेड़ होने लगते हैं और हरे -और ऊंचे '

जहां जाना था उसके बारे में कोई खास जानकारी नहीं मिल पाई थी । भूगोल विभाग के प्रोफेसर रघुवीर चन्द जी ने एक बड़े से नक्शे में एक छोटे से बिन्दु की ओर संकेत कर बताया था कि वहां पहुंचने के लिए सबसे पहले एक बड़ी नदी पार करनी होगी और उसके बाद एक छोटी नदी, फिर उससे छोटी एक नदी और। फिर?`फिर तो तुम्हें जाकर ही पता चल पाएगा ।´ और मैं चल पड़ा था।
रात तिनसुकिया रेलवे स्टेशन के रिटायरिंग रूम में काटी थी, मच्छरों की कवितायें सुनते हुए। सुबह सूरज जल्दी निकल आया था - शायद राह दिखाने के लिए। आओ सूरज दद्दा! आओ मेरे गाइड! तुम यहां भी वैसे ही हो। वैसा ही है तुम्हारा ताप। लेकिन इतनी जल्दी? रात को ठीक से सोए नहीं क्या ?

बस के कंडक्टर से जब तेजू का टिकट मांगा तो वह ऐसे देखने लगा मानो मैं किसी अन्य ग्रह-उपग्रह से आया हूं - एलियन।` तेजू का टिकट तु फिफ्तीन अक्तूबर के बाद मिलेगा।´ तब तक मैं? कहां? छोटी - छोटी मिचमिची आंखों वाले कंडक्टर को मेरी `मूर्खता´ शायद पसंद आई। वह गंभीर हो गया । बोला - अभी नामसाई का तिकत लो उसके बाद का रस्ता हाम बता देगा। बाद का रस्ता? यह कैसा रहस्यमय रास्ता है भाई!

नामसाई यानी पानी , बालू और बारिश। नामसाई में प्रवेश से पहले नोवादिहिंग या दिबांग को पार करना पड़ता है। मानो स्वर्ग में प्रवेश से पहले वैतरणी। यह वही बड़ी नदी है ! नोवादिहिंग बारिश के मौसम में मजे की खुराक ले कर मस्ता गई है। उसका हहराता बहाव डराता कम है , बांधता ज्यादा है। क्या ऐसे ही दृश्यों के लिए बांग्ला में ` भीषण शुन्दर ´ उपमान गढ़ा गया है ? वह अपने प्रवाह में सब कुछ बहाये चली जा रही है- मिट्टी , वनस्पतियां , जीव- जंतु। बस उसकी धार को संभल- संभल कर चीरते हुए चल रही है हमारी फेरी। मानव की बनाई एक नौका मशीन की ताकत के सहारे प्रचंड प्रकृति की प्रवाहमान पटिट्का पर अपने हस्ताक्षर कर रही है।नामसाई के आगे दूसरी बस से जाना है चौखाम तक। बारिश हो रही धीरे-धीरे ।यहां आप बारिश को सुन सकते हैं। उसके बरसने की लय के साथ बदलती जाती हैं आवाजें। सत्यजित दा की `पथेर पंचाली´ का बारिश वाला दृश्य ! उससे भी थोड़ा और आगे , थोड़ा और सूक्ष्म । `वृष्टि पड़े टापुर- टुपुर ´ । बारिश बाधा नहीं है यहां । जीवन चलता रहता है अविराम । यह एक नया संसार है , छोटी -सी जगह । मैं भी तो ऐसी ही छोटी जगह से आया हूं , पर जाना कहां है?

लाइफ मैटर्स लाइक दिस
इन स्माल टाउन्स बाइ द रिवर
वी आल वान्ट टु वाक विद द गाड्स।
´

चौखाम से दिगारू तक छोटी नाव में जाना है । यात्री कुल पांच हैं और नाविक सात । बड़े- बडे रस्सों और लग्गी के सहारे हमारी नाव आगे बढ़ रही है मानव की ताकत और तरकीब के बूते । हर तरफ पानी , पानी और पानी । जहां पानी नहीं वहां बालू है और जहां न पानी न बालू वहां पेड़ - हरे और ऊंचे । मल्लाह सचेत करते हैं यह दिगारू बाबा का `मेन करेन्ट´ है - सावधान !

`बोल दिगारू बबा की जय ´ और मेन करेन्ट पार । अगर पार न हो पाते तो ? सुना है लगभग हर साल बह जाती हैं कुछ नावें , हर साल `उस पार ´ की अनंत यात्रा पर चले जाते हैं कुछ यात्री कुछ मल्लाह । नदी नहीं नद है दिगारू , ब्रह्मपुत्र की तरह । तभी तो मल्लाह दिगारू बाबा की जय बोलते हैं दिगारू माता की नहीं । दिगारू `नदी´ का भी नाम है और जगह का भी । दिगारू को तीन तरफ से काट रहा है दिगारू का प्रवाह । यहां एक छोटी -सी बस्ती है और छोटा -सा प्राइमरी स्कूल । अपना प्यारा तिरंगा लहरा है वहां । आज पन्द्रह अगस्त है -आजादी का दिन , आजादी की सालगिरह।

यहां से अब कहां ? यह खड़खड़िया बस तेजू तक ले जाएगी । बात बस इतनी है कि पगली नदी में ज्यादा पानी न हो नही तो हाथी पर सवार होकर नदी पार करनी पड़ेगी । `सुबे तु जब हाम आया था तब थोरा पानी था।´ बस चालक अपनी वीरता का बखान कर रहा है कि कैसे उसने सुबे थोरे पानी में `बरी´ बस को निकाल लिया था , बिना किसी नुकसान के।

पगली नदी तेरा नाम क्या है? सहयात्रियों से पूछने पर सब हंसते हैं।कहते हैं पगली नदी है यह। ऊपर पहाड़ों पर जब बारिश होती है तो इसमें उफान आ जाता है अचानक। कभी इस पर पुल भी बना था जिसे यह एक दिन अपने पागलपन में बहा ले गई। वह देखो पुल का टूटा हिस्सा- पागलपन के इतिहास का प्रमाण , बंधन से मुक्ति का स्मारक। पहाड़ अब करीब आ रहे हैं। जंगल का घनापन घट रहा है। दिखने लगी हैं छोटी - छोटी बसासतें। शायद करीब आ रहा है तेजू- धुर पूरबी अरूणाचल प्रदेश के लोहित जिले का मुख्यालय , मेरा नया निवास स्थल। सड़क अब सड़क जैसी लग रही है। नहीं तो इससे पहले जगह-जगह पानी और बालू मे खड़े-गड़े सीमा सड़क संगठन के बोर्ड ही बताते थे कि यहां एक सड़क है ( या सड़क थी ) - नेशनल हाई वे।

सड़क के हर कदम पर अंकित हैं
कई- कई तरह के निशान
मैं फिर देखती हूं नदी को ।
पेड़ की टहनियों को मरोड़ती हुई हवा
धंसा देती है मुझे स्मृतियों के जंगल में।´

अपनी बस अब तेजू में दाखिल हो रही है। सबसे पहले छावनी ,फिर कालेज, केन्द्रीय विद्यालय, इण्डेन गैस गोदाम ,जिला अस्पताल और यह बाजार। बस रूक गई है, सवारियां उतर रही हैं । सबसे आखीर मैं उतरता हूं ,अपनी अटैची और बैग के साथ । सामने चौराहा है - चार रास्ते । बाद में पता चला कि चौराहे को यहां `चाराली´ कहते हैं- चार रास्ते । मैं अपने आप से प्रश्न करता हूं- ` तुम्हें किस रास्ते पर जाना है डाक्साब?´ इससे पहले कि जवाब आए अरे वह देखो आ गई बारिश । और मैं भीग रहा हूं नए जगह की नई बारिश में नए रास्ते को खोजता हुआ।


( * चित्र : प्रशांतो पी. दास / lohit .nic.in से साभार . ** इस सफरनामे में शामिल किए गए कवितांश/ कविता ममांग दाई के संग्रह `रिवर पोएम्स´ से साभार ली गई हैं । वह पत्रकारिता ,आकाशवाणी और दूरदर्शन ईटानगर से जुड़ी रही हैं । उन्होंने कुछ समय तक भारतीय प्रशासनिक सेवा में नौकरी भी की , बाद में छोड़ दी । अब स्वतंत्र लेखन । उन्हें `अरूणाचल प्रदेश : द हिडेन लैण्ड´ पुस्तक पर पहला `वेरियर एलविन अवार्ड ` मिल चुका है। )

Wednesday, September 2, 2009

बंजारों का संगीत : एक




आपकी ख़िदमत में पेश हैं रूमानिया और हंगरी के बंजारों के पारम्परिक गीत.

पहली प्रस्तुति है १९६५ में जन्मे रोबी लाकातोस नामक अतिविख्यात बंजारे वॉयलिनवादक की. बुडापेस्ट की बेला बारतोक कन्ज़रवेटरी से संगीत की औपचारिक शिक्षा प्राप्त रोबी का परिवार हंगरी के बंजारे वॉयलिनवादकों की सुदीर्घ परम्परा से जुड़े परिवार से तल्लुक रखते हैं.



यहां से डाउनलोड करें:

http://www.divshare.com/download/8371615-f27

दूसरी प्रस्तुति है रूमानिया के तराफ़ुल-दिन-बाइया नामक जिप्सी बैन्ड की. ग्रामीण रूमानिया का कोई भी वैवाहिक अनुष्ठान इस संगीत के बग़ैर पूरा नहीं माना जाता. ट्रान्सिल्वैनिया में गाया जाने वाला यह गीत 'त्रेक तिगानी' यानी 'गुज़र रहे हैं बंजारे' यूरोप के एक हिस्से में कल्ट की सी अहमियत रखता है.



यहां से डाउनलोड करें:

http://www.divshare.com/download/8371616-0d8

इस संग्रह से दो राजस्थानी हिस्से मैं पहले आपको सुनवा चुका हूं

अपने कने हैगा काम और - और ! उर्फ कीर्तन के सिवा !!


जय लोया - जय पिलाट्टिक.... !

आज 'कबाड़खाना' की सैर करते हुए बाबा मीर तक़ी 'मीर' से मुलाकात हुई आए. आइए सबसे पहले उन्हीं की बात सुनते हैं -

जो इस शोर से 'मीर' रोता रहेगा.
तो हमसाया काहे को सोता रहेगा.


मुझे काम रोने से है अक्सर नासेह,
तू कब तक मेरे मुँह को धोता रहेगा.


बस ऐ गिरिया आँखें तेरे क्या नहीं हैं,
तू कब तक जहाँ को डुबोता रहेगा .



थोड़ा आगे बढ़ा तो आसमान में उगे टेढ़े मुँह के चाँद को देखते हुए मुक्तिबोध साथ हो लिए. सोचा कुछ पूछेंगे लेकिन पूछा नहीं कि - " पार्टनर ! तुम्हारी ....' और एक मुड़े तुड़े कागज पर कुछ घसीट कर 'अँधेरे में' गुम हो गए -


अजीब है ! !
गगन में करफ्यू

धरती पर चुप
जहरीली छी: थू;
पीपल के सुनसान घोंसलॊं में पैठे हैं

कारतूस - छर्रे

इससे
कि हवेली में हवाओं के पल्लू भी सिहरे.
गंजे - सिर चाँद की सँवलाई किरनों के जासूस

साम - सूम नगर में धीरे- धीरे घूम - घाम

नगर के
कोनों के तिकोनों में छुपे हुए
करते हैं महसूस
गलियों की हाय - हाय ! !

चाँद की कनखियों की किरनों ने

नगर छान डाला है

अँधेरे को आड़े - तिरछे काटकर

पीली - पीली पट्टियाँ बिछा दीं,

समय काला- काला हैं !


और अंत में प्रार्थना की तरह किन्तु प्रार्थना के शिल्प में नही -


बड़े - बड़े लोगाँ की बड्डी - बड्डी बात.
कभी करें शह तो कभी करें हैं मात.

अपनी दूकान छोटी छोटा - सा ठौर .

अपने कने हैगा काम और - और !


जय लोया - जय पिलाट्टिक.... !

उदय प्रकाश, नामवर सिंह ,अशोक वाजपेयी के गिर्द पृथ्वी नहीं घूमती . और भी काम हैं अपने पास ; अप्रासंगिक लोगों के कीर्तन के सिवा !

- कहे कबाड़मंडल का एक अदना - सा कबाड़ी।
चलने दो बाबूजी हौले - हौले अपनी भी गाड़ी !



Tuesday, September 1, 2009

कविता से पहले अनुवाद देखिये! - मजाज़ हैं आज



अर्नेस्ट हैमिंग्वे की कहानियों (उपन्यासों नहीं) पर पी एच डी कर चुके श्री सैयद अली हामिद म्रेरे अंग्रेज़ी के अध्यापक थे एम ए में. नैनीताल के डी एस बी कैम्पस में. अब जीवन सिखाते हैं. जब तब. उनके साथ सीखा हुआ जॉन डन अब तलक हॉन्ट करता है. वे जैसे द फ़्ली के या अर्नेस्ट हैमिंग्वे के फ़्रान्सिस मैकॉम्बर के बारे में बताया करते थे, हम लौंडो-लबारों को ज़रा तहज़ीब आ जाया करती थी भाषा की.

मेरे सर्वप्रिय अध्यापकों में शुमार प्रोफ़ेसर हामिद का ताज़िन्दगी अहसान रहेगा मुझ पे - कई बातों के लिए - उन्हें बताना फ़िलहाल नहीं चाहता. लेकिन जिस अन्दाज़ में उन्होंने ये तर्ज़ुमा मजाज़ लखनवी की इस जगतप्रसिद्ध नज़्म का किया है, एकबारगी उनके पैर छू लेने का मन करता है.

तो सर यूं है कि आप का किया अनुवाद आज कबाड़ख़ाने पे लगाते हुए मैं क्या कहते हैं उसे उर्दू में ... हां ... मसर्रत से लबालब हूं. थैंक्स सर!

दो अनुवादों के बीच में तलत बाबा की गाई गयी, अमर बना दी गई रचना को याद करना न भूलें.


THE VAGABOND

At night I roam the city, sad and woebegone
A vagabond on the lively, glittering streets
In an alien land, how long can one wander ?
O this sorrow, this despair !

The glittering lamps stretch like a chain
A mellow image of day on the palms of night
But in my breast is a flaming sword.
O this sorrow, this despair !

This silvery shade, this web of stars above
Like a Sufi's imagination, a lover's fancy
But who feels, who understands my pain ?
O this sorrow, this despair !

Once again a star breaks, with a trail of fire
In whose lap will fall, this bead of pearls ?
Something strikes the heart and a painful sigh rises
O this sorrow, this despair !

To drink some wine, the night gently persuades
Knock at the door of a beautiful woman
Or, my friend, be lost in the wilderness
O this sorrow, this despair !

Everywhere is a carnival of colour and beauty
At every step I encounter pleasure and joy
But disgrace approaches with open arms
O this sorrow, this despair !

To stop for rest is not my habit
To retrace my steps is not my nature
And to meet a companion is not in my destiny
O this sorrow, this despair !

A devastating beauty waits for me
My touch can still open many doors
But my vow of fidelity comes in the way
O this sorrow, this despair !

Often the thought of breaking the vows
Relinquish the hope of winning her love
Demolish the castle I have built in air
O this sorrow, this despair !

From behind a castle rises the yellow moon
Like a muezzin's turban, a money-lender's ledger
A pauper's youth, a young widow's beauty
O this sorrow, this despair !

A flame rises from my heart , what to do ?
My endurance has collapsed, what to do ?
The fragrance of my wound cries out, what to do ?
O this sorrow, this despair !

At times the impulse to pluck the dead stars
Starting from one side and reaching the other
Not here and there, but a total demolition
O this sorrow, this despair !

Poverty stares at such scenes of plenty
So many tyrants are having their way
Hundreds of Chengez and Nadirs flourish
O this sorrow, this despair !

To snatch a Chengez's sword has become an urge
Break the jewel glittering on his crown
If no one helps, then do it single-handed
O this sorrow, this despair !

To destroy the despots is my aspiration
Burn their chambers and pleasure-gardens
Ravage the throne, the entire palace
O this sorrow, this despair !



ये रहा ओरिजिनल

शहर की रात और मैं, नाशाद-ओ-नाकारा फिरूँ
जगमगाती जागती, सड़कों पे आवारा फिरूँ
ग़ैर की बस्ती है, कब तक दर-ब-दर मारा फिरूँ
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

झिलमिलाते कुमकुमों की, राह में ज़ंजीर सी
रात के हाथों में, दिन की मोहिनी तस्वीर सी
मेरे सीने पर मगर, चलती हुई शमशीर सी
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

ये रुपहली छाँव, ये आकाश पर तारों का जाल
जैसे सूफ़ी का तसव्वुर, जैसे आशिक़ का ख़याल
आह लेकिन कौन समझे, कौन जाने जी का हाल
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

फिर वो टूटा एक सितारा, फिर वो छूटी फुलझड़ी
जाने किसकी गोद में, आई ये मोती की लड़ी
हूक सी सीने में उठी, चोट सी दिल पर पड़ी
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

रात हँस – हँस कर ये कहती है, कि मयखाने में चल
फिर किसी शहनाज़-ए-लालारुख के, काशाने में चल
ये नहीं मुमकिन तो फिर, ऐ दोस्त वीराने में चल
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

हर तरफ़ बिखरी हुई, रंगीनियाँ रानाइयाँ
हर क़दम पर इशरतें, लेती हुई अंगड़ाइयां
बढ़ रही हैं गोद फैलाये हुये रुस्वाइयाँ
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

रास्ते में रुक के दम लूँ, ये मेरी आदत नहीं
लौट कर वापस चला जाऊँ, मेरी फ़ितरत नहीं
और कोई हमनवा मिल जाये, ये क़िस्मत नहीं
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

मुंतज़िर है एक, तूफ़ान-ए-बला मेरे लिये
अब भी जाने कितने, दरवाज़े है वहां मेरे लिये
पर मुसीबत है मेरा, अहद-ए-वफ़ा मेरे लिए
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

जी में आता है कि अब, अहद-ए-वफ़ा भी तोड़ दूँ
उनको पा सकता हूँ मैं ये, आसरा भी छोड़ दूँ
हाँ मुनासिब है ये, ज़ंजीर-ए-हवा भी तोड़ दूँ
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

एक महल की आड़ से, निकला वो पीला माहताब
जैसे मुल्ला का अमामा, जैसे बनिये की किताब
जैसे मुफलिस की जवानी, जैसे बेवा का शबाब
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

दिल में एक शोला भड़क उठा है, आख़िर क्या करूँ
मेरा पैमाना छलक उठा है, आख़िर क्या करूँ
ज़ख्म सीने का महक उठा है, आख़िर क्या करूँ
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

मुफ़लिसी और ये मज़ाहिर, हैं नज़र के सामने
सैकड़ों चंगेज़-ओ-नादिर, हैं नज़र के सामने
सैकड़ों सुल्तान-ओ-ज़बर, हैं नज़र के सामने
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

ले के एक चंगेज़ के, हाथों से खंज़र तोड़ दूँ
ताज पर उसके दमकता, है जो पत्थर तोड़ दूँ
कोई तोड़े या न तोड़े, मैं ही बढ़कर तोड़ दूँ
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

बढ़ के इस इंदर-सभा का, साज़-ओ-सामाँ फूँक दूँ
इस का गुलशन फूँक दूँ, उस का शबिस्ताँ फूँक दूँ
तख्त-ए-सुल्ताँ क्या, मैं सारा क़स्र-ए-सुल्ताँ फूँक दूँ
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

जी में आता है, ये मुर्दा चाँद-तारे नोंच लूँ
इस किनारे नोंच लूँ, और उस किनारे नोंच लूँ
एक दो का ज़िक्र क्या, सारे के सारे नोंच लूँ
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

(बहुत जल्द मजाज़ साहब पर कुछेक पोस्ट का इन्तज़ार करें)

Monday, August 31, 2009

घड़ी एक बालमा थांसूं एक-दो बात करूं - अल्लाह जिलाई बाई



कुछ दिन पहले कबाड़ख़ाने में लगी राजस्थानी संगीत की श्रृंखला में एक पोस्ट बीकानेर की अल्लाह जिलाई बाई के संगीत पर आधारित थी. इस पोस्ट पर आई एक टिप्पणी में भाई प्रियंकर जी ने कमेन्ट किया था :

"उनका एक और अद्भुत गीत है ’ए मां हेलो देती लाज मरूं, झालो म्हासूं दियो न जाय/ बोलूं तो पोंचूं नहीं, हेलो देती लाज मरूं/ घड़ी एक बालमा थांसूं एक-दो बात करूं’. जब सुनता हूं मन तरल हो उठता है. परम्परा और पर्दा-प्रथा की अमानवीयता की पृष्ठभूमि में उठता दाम्पत्य-प्रेम का यह उत्कट स्वर - स्वकीय प्रेम की यह करुण पुकार भला किसे द्रवित न करेगी."

मैंने उनसे आग्रह किया था कि उक्त गीत हमें उपलब्ध करवाने की कोशिश करें. तो कल उन्होंने मेल पर यह लिंक भेज कर मेहरबानी की है.

सुनिये और आनन्दित होइये:



प्रियंकर जी का धन्यवाद.

यूट्यूब पर ही एक और शानदार गीत मिला 'बाईसा रा बीरा'

फ़क़त इसलिए कि "मुलाक़ात का वक़्त" ख़त्म हो चुका


१९६५ में बग़दाद में जन्मी दुन्या मिखाइल अब अमेरिका में रहती हैं. अपने विचारों की वजह से उन्हें ईराक में बेतहाशा धमकियां मिलीं और नब्बे के दशक के आखिरी सालों में उन्हें मातॄभूमि छोड़ने पर विवश होना पड़ा. कई राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय इनामात से नवाज़ी जा चुकी दुन्या मिखाइल की तीन कविताएं पेश हैं:

१.
क़ैदी


वह नहीं समझती
क्या होता है "अपराधी" होना
वह क़ैदख़ाने के द्वार पर प्रतीक्षा करती है
जब तक कि वह उसकी निगाहों के सामने नहीं आ जाता
ताकि उस से कह सके "अपना ख़याल रखना"
ठीक जिस तरह वह उसे याद दिलाया करती थी
जब वह स्कूल जा रहा होता था
या काम पर
या आने वाला होता था लम्बी छूट्टियों के लिए
वह नहीं समझती
सींखचों के पार
वर्दी पहने वे लोग
क्या बक रहे हैं
अलबत्ता तय उन्होंने ही किया है
कि वह वहां रहेगा
उदास दिनों वाले अजनबियों के साथ
उसे कभी ख़याल नहीं आया था
उन सुदूर रातों के दौरान
उसके बिस्तर के पास लोरियां गाते हुए
कि उसे कभी रखा जाएगा
बग़ैर खिड़कियों और चन्द्रमाओं वाली
इस ठंडी जगह में
वह नहीं समझती
नहीं समझती वह जो माता है क़ैदी की
कि वह क्यों छोड़ जाए उसे
फ़क़त इसलिए कि "मुलाक़ात का वक़्त" ख़त्म हो चुका!

२.
अमेरिका


मेहरबानी कर के मुझ से मत पूछो, अमेरिका
- मुझे याद नहीं
किस कूचे में
किसके साथ
या किस सितारे के नीचे

मुझसे मत पूछो
मुझे याद नहीं
लोगों की त्वचाओं का रंग
या उनके दस्तख़त
मुझे याद ही नहीं
कि उनके पास हमारे चेहरे थे
या हमारे ख़्वाब
कि वे गा रहे थे
या नहीं
कि वे बांए से लिखना शुरू कर रहे थे
कि दांए से
या लिख भी रहे थे कि नहीं
घरों में सो रहे थे
या फ़ुटपाथों पर
या हवाई अड्डों में

३.
नगीना


अब वहां से नदी पर निगाह नहीं डाली जा सकती
वह शहर में भी नहीं है अब
नक्शे में भी नहीं
वह पुल जो था
वह पुल जिसे हम पार किया करते थे हर दिन
वह पुल
युद्ध ने उछाल दिया उसे नदी की तरफ़
ठीक जिस तरह 'टाइटैनिक' पर सवार वह महिला
उछाल देती थी अपना नीला हीरा