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Tuesday, October 31, 2017

तो उतना दुख नहीं होता

क्रोध
- अष्टभुजा शुक्ल

पकी फसल
लाट ले गए होते
खेतों से
आँखों के सामने
तो उतना दुख नहीं होता

जितना कि
कच्ची फसल
काटकर छोड़ गए
खेतों में रातों-रात

जाने क्यों
दस्युओं से भी
अधिक क्रोध आता है
तस्करों पर

Friday, January 22, 2016

थू यमराज और हाय आदमी

द सेल्फ़ सीयर्स - डैथ एंड मैन : ईगोन शीले के कृति 

देह की सत्ता
-अष्टभुजा शुक्ल


देह की सत्ता ही
है आख़िरी पत्ता
यही सबके पास
और यही पत्ता सबको चलना है

लेकिन किसी को भी
नहीं पहुँचना है
देह से चलकर देह तक

हा बुद्ध ! हे राम !
थू यमराज और हाय आदमी
लघुशंका ऐसी हिंसा पर !

Thursday, January 21, 2016

चाय जैसा पानी पिया, चाय जैसा पानी

अष्टभुजा शुक्ल
जीवन वृत्तान्त

-अष्टभुजा शुक्ल

उठाया ही था पहला कौर
कि पगहा तुड़ाकर भैंस भागी कहीं और

पहुंचा ही था खेत में पानी
कि छप्पर में आग लगी,बिटिया चिल्लानी

आरंभ ही किया था गीत का बोल
कि ढोलकिया के अनुसार फूट गया ढोल

घी का था बर्तन और गोबर की घानी
चाय जैसा पानी पिया, चाय जैसा पानी

मित्रों ने मेहनत से बनाई ऐसी छवि
चटक और दबावदार कविता का कवि

एक हाथ जोड़ा तो टूट गया डेढ़ हाथ
यही सारा जीवन वृत्तांत रहा दीनानाथ !

Wednesday, January 20, 2016

हमारे ऊपर हैं बीज और हम ज़मीन हैं

फ्रान्ज़ क्लाइन की पेन्टिंग
माकोटर्बो - 1950

और हम ज़मीन हैं

- अष्टभुजा शुक्ल

हमारे ऊपर
है एक मोटरसाइकिल
उसके ऊपर एक मारूति कार
उसके ऊपर वायुयान
और हम पदाति हैं

हमारे ऊपर
है एक चौकीदार
उसके ऊपर सिपाही
उसके ऊपर दरोगा
उसके ऊपर कप्तान
उसके ऊपर गृहमंत्री
और हम अपराधी हैं

हमारे ऊपर
है ग्राम प्रधान
उसके ऊपर विधायक
उसके ऊपर मंत्री
और हम नागरिक हैं

हमारे ऊपर
हैं बीज
उसके ऊपर पौधे
उसके ऊपर बालियाँ
उसके ऊपर भक्षक

और हम ज़मीन हैं

Tuesday, January 19, 2016

संभव हो तो घंटे दो घंटे मोबाइल का स्विच ऑफ रखने का संयम बरतना


जवान होते बेटो
-अष्टभुजा शुक्ल

जवान होते बेटो!
इतना झुकना
इतना
कि समतल भी ख़ुद को तुमसे ऊँचा समझे
कि चींटी भी तुम्हारे पेट के नीचे से निकल जाए
लेकिन झुकने का कटोरा लेकर मत खड़े होना घाटी में
कि ऊपर से बरसने के लिए कृपा हँसती रहे

इस उमर में
इच्छाएँ कंचे की गोलियाँ होती हैं
कोई कंचा फूट जाए तो विलाप मत करना
और कोई आगे निकल जाए तो
तालियाँ बजाते हुए चहकना कि फूल झरने लगें

किसी को भीख न देना पाना तो कोई बात नहीं
लेकिन किसी की तुमड़ी मत फोडऩा
किसी परेशानी में पड़े हुए की तरह मत दिखाई देना
किसी परेशानी से निकल कर आते हुए की तरह दिखना
कोई लड़की तुमसे प्रेम करने को तैयार न हो
तो कोई लड़की तुमसे प्रेम कर सके
इसके लायक ख़ुद को तैयार करना
जवान होते बेटो!

इस उमर में संभव हो तो
घंटे दो घंटे मोबाइल का स्विच ऑफ रखने का संयम बरतना
और इतनी चिकनी होती जा रही दुनिया में
कुछ ख़ुरदुरे बने रहने की कोशिश करना

जवान होते बेटो!
जवानी में न बूढ़ा बन जाना शोभा देता है
न शिशु बन जाना
यद्यपि बेटो
यह उपदेश देने का ही मौसम है
और तुम्हारा फर्ज है कोई भी उपदेश न मानना ...

Thursday, March 8, 2012

अष्टभुजा शुक्ल का जीवन वृत्तांत

अष्टभुजा शुक्ल की एक और कविता पढ़िए -

 जीवन वृत्तांत



उठाया ही था पहला कौर
कि पगहा तुड़ाकर भैंस भागी कहीं और

पहुंचा ही था खेत में पानी
कि छप्पर में आग लगी,बिटिया चिल्लानी

आरंभ ही किया था गीत का बोल
कि ढोलकिया के अनुसार फूट गया ढोल

घी का था बर्तन और गोबर की घानी
चाय जैसा पानी पिया, चाय जैसा पानी

मित्रों ने मेहनत से बनाई ऐसी छवि
चटक और दबावदार कविता का कवि

एक हाथ जोड़ा तो टूट गया डेढ़ हाथ
यही सारा जीवन वृत्तांत रहा दीनानाथ

Wednesday, March 7, 2012

और हम ज़मीन हैं


हम ज़मीन हैं

अष्टभुजा शुक्ल 


हमारे ऊपर

है एक मोटरसाइकिल

उसके ऊपर एक मारूति कार

उसके ऊपर वायुयान

और हम पदाति हैं




हमारे ऊपर

है एक चौकीदार

उसके ऊपर सिपाही

उसके ऊपर दरोगा

उसके ऊपर कप्तान

उसके ऊपर गृहमंत्री

और हम अपराधी हैं



हमारे ऊपर

है ग्राम प्रधान

उसके ऊपर विधायक

उसके ऊपर मंत्री

और हम नागरिक हैं



हमारे ऊपर

हैं बीज

उसके ऊपर पौधे

उसके ऊपर बालियाँ

उसके ऊपर भक्षक

और हम ज़मीन हैं

Tuesday, March 6, 2012

कविजन खोज रहे अमराई

अष्टभुजा शुक्ल के चंद पद प्रस्तुत हैं -

कविजन खोज रहे अमराई।
जनता मरे, मिटे या डूबे इनने ख्याति कमाई ॥

शब्दों का माठा मथ-मथकर कविता को खट्टाते।
और प्रशंसा के मक्खन कवि चाट-चाट रह जाते॥

सोख रहीं गहरी मुषकैलें, डांड़ हो रहा पानी।
गेहूं के पौधे मुरझाते, हैं अधबीच जवानी॥

बचा-खुचा भी चर लेते हैं, नीलगाय के झुंड।
ऊपर से हगनी-मुतनी में, खेत बन रहे कुंड॥

कुहरे में रोता है सूरज केवल आंसू-आंसू।
कविजन उसे रक्त कह-कहकर लिखते कविता धांसू॥

बाली सरक रही सपने में, है बंहोर के नीचे।
लगे गुदगुदी मानो हमने रति की चोली फींचे॥

जागो तो सिर धुन पछताओ, हाय-हाय कर चीखो।
अष्टभुजा पद क्यों करते हो कविता करना सीखो॥

Friday, February 10, 2012

यह उपदेश देने का ही मौसम है और तुम्हारा फर्ज है कोई भी उपदेश न मानना...


जवान होते बेटो!

अष्टभुजा शुक्ल

जवान होते बेटो
इतना झुकना
इतना
कि समतल भी खुद को तुमसे ऊँचा समझे
कि चींटी भी तुम्हारे पेट के नीचे से निकल जाए
लेकिन झुकने का कटोरा लेकर मत खड़े होना घाटी में
कि ऊपर से बरसने के लिए कृपा हँसती रहे
इस उमर में
इच्छाएँ कंचे की गोलियाँ होती हैं
कोई कंचा फूट जाए तो विलाप मत करना
और कोई आगे निकल जाए तो
तालियाँ बजाते हुए चहकना कि फूल झरने लगें
किसी को भीख न देना पाना तो कोई बात नहीं
लेकिन किसी की तुमड़ी मत फोडऩा
किसी परेशानी में पड़े हुए की तरह मत दिखाई देना
किसी परेशानी से निकल कर आते हुए की तरह दिखना
कोई लड़की तुमसे प्रेम करने को तैयार न हो
तो कोई लड़की तुमसे प्रेम कर सके
इसके लायक खुद को तैयार करना
जवान होते बेटो
इस उमर में संभव हो तो
घंटे दो घंटे मोबाइल का स्विच ऑफ रखने का संयम बरतना
और इतनी चिकनी होती जा रही दुनिया में
कुछ खुरदुरे बने रहने की कोशिश करना
जवान होते बेटो
जवानी में न बूढ़ा बन जाना शोभा देता है
न शिशु बन जाना
यद्यपि के बेटो
यह उपदेश देने का ही मौसम है
और तुम्हारा फर्ज है कोई भी उपदेश न मानना...

Thursday, February 9, 2012

चलल चलल चलल चलल


अष्टभुजा शुक्ल की कविता पर एक पोस्ट कुछ दिन पहले लगाई थी. आज उन की एक कविता और पढ़िए-

यजामहे यजामहे

अष्‍टभुजा शुक्‍ल

कूच किए ललमुँहे
कि कूद पड़े कलमुँहे
चलल चलल चलल चलल
लुहे लुहे लुहे लुहे !

रात को सियार चुहे
दिन में झट-उखार चुहे
गन्ने के गेंड़ हरे
ढीठ नीलगाय चुहे
भगल भगल भगल भगल
लुहे लुहे लुहे लुहे !

धरती को लोग दुहे
जंगल को लोग दुहे
सेठ क्षीरसागर के
साँड छानकर दुहे
चलल चलल चलल चलल
लेहे लुहे लुहे लुहे !

कुछ रहे बिना, रहे
कुछ बिना रहे, रहे
कुछ बिना कहे, रहे
कुछ बिना सहे, रहे
स्वाहा जजमान्हे
यजामहे ! यजामहे !

Thursday, February 2, 2012

निन्यानबे पैसे सिर्फ बाटा वालों के लिए अब भी एक कीमत है

किसी धर्मस्थल के
विवाद में
तीन हज़ार लोग बम से
दो हज़ार गोली से
एक हज़ार चाकू से
और पाँच सौ
जलाकर मार डाले जाते हैं

चार सौ महिलाओं की
इज्ज़त लूटी जाती है
और तीन सौ शिशुओं को
बलि का बकरा बनाया जाता है

धर्म में
सहिष्णुता का
प्रतिशत ज्ञात कीजिए


यह मेरा पहला परिचय था अष्टभुजा शुक्ल की कविता से. कोई बीस साल पहले जनमत के एक अंक में इन पंक्तियों को पढ़ना थर्रा देने वाला अनुभव था. तब से लगातार खोज-खोज कर उन्हें पढ़ने का शौक़ बना हुआ है.

अपनी एक कविता 'साफ़-साफ़' में वे लिखते हैं -

जो रोशनी में खड़े होते हैं वे
अंधेरे में खड़े लोगों को
तो देख भी नहीं सकते

लेकिन अंधेरे के खड़े लोग
रोशनी में खड़े लोगों को
देखते रहते हैं साफ़-साफ़


आज उनकी एक प्रिय कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ-



सतयुग, कविता और एक रुपया

अष्टभुजा शुक्ल


जैसे कि एक रूपये माने चूतियापा यानि कि कुछ भी नहीं
वैसे ही एक रूपये माने बल्ले बल्ले यानि कि बहुत कुछ
और कभी कभी सब कुछ
निन्यानबे पैसे सिर्फ बाटा वालों के लिए अब भी एक कीमत है
हकीकत यह है कि एक रूपया
एक कौर या सल्फॉस की गोली से भी कम कीमत का है
एक रूपये का एक पहलू एक रूपये से भी कम है
तो दूसरा पहलू अशोक-स्तम्भ यानि कि समूचा भारत
और भारतीयता की कीमत बाटा के तलवों से भी नीचे है
उसके नीचे नंगी इच्छाएँ कफन के लिए सिसक रही हैं
आधा भारत एक रूपये से शुरू होकर सिर्फ धकधकाता है
और भिवानी की तरह सिकुड़कर एक रूपये तक सिमट जाता है
गर्मियों में इतनी ठंडी किसी कोने में रख देने की चीज है
जैसे बेइमानियाँ बहुत जतन से रखी जाती हैं
वहीं पर अब एक रूपये कबूल करने में गोल्लक मुँह बिचकाता है
और बिजली नहीं रहती तो जनरेटर से फोटो कॉपी करने वाले
एक का तीन वसूलते हैं
एक रूपये तेल का दाम बढऩे से दस मिनट लेट से निकलते हैं
लोग घर से कि इतनी तेज उडऩे लगेंगी सवारी गाडिय़ाँ
कि दुर्घटनाओं की खबरों से पटे मिलेंगे सुबह के अखबार
न एक रूपये में अगरबत्ती न नहाने धोने का सर्फ साबुन
न आत्मा की मैल छुड़ाने वाला कोई अध्यात्म
उखड़ी हुई कैची का रिपिट लगाने में भी एक रूपया नाकाफी
एक पन्ने पर एक रूपया एक रूपया लिखकर भर डालने के लिए भी
कोई एक रूपये का मेहनताना लेने के लिए तैयार नहीं होगा
बल्कि मुफ्त में वह काम करके अपमानित कर देगा
एक रूपये को जैसे इसे केन्द्र में रखकर लिखी गई
यह कविता नामक चीज जिससे पटा हुआ बाजार
ऐसी कविताएँ यदि मर जाएँ बिना किसी बीमारी के
तो दो घंटे भी ज़्यादा होंगे कुछ आलोचना को रोने के लिए
इससे सिर्फ इतना भर नुकसान होगा कि
विलुप्त हो जाएगी कवियों की नस्ल और तब खाद्यान्न का संकट
कुछ कम झेलना पड़ेगा इस महादेश की शासन व्यवस्था को
ऐसी कविताओं की एक खासियत ये आलोचनाहंता है
दूसरी यह हो सकती है कि किसी प्रकार की उम्मीद की
जुंबिश से भी ये समाज को काफी दूर रखती हैं
जैसे हमारे समय का कवि खुद को काफी दूर रखता है अपने समाज से
आने वाला समय शायद साहित्य के इतिहास को कुछ इस
तरह रेखांकित करेगा कि हमारा समय एक कविता-शून्य समय था
इसीलिए यह कविता के लिए सबसे बेचैन रहने वाले समय के रूप में
जाना जाएगा और विख्यात होगा उतना ही जितना कि
अपने तमाम अवमूल्यन के लिए कुख्यात हो चुकी है एक रूपये की मुद्रा
फिर भी अरबों की संख्या भी नहीं काट सकती एक विषम संख्या को
क्योंकि एक एक, आधारभूत विषम संख्या है
वैसे ही जब मर जाएगी एक रूपये की मुद्रा तो उसकी अन्त्येष्टि में
माचिस की एक तीली भी खर्च नहीं करनी पड़ेगी लेकिन
तबाही मचेगी वह कि रहने वाले देखेंगे तांडव
और मन ही मन मनाएंगे कि हे प्रभू, हे लोकपाल, हे पूँजीपुत्र
कि कीमतें चीजों की या कवियों की
किसी भी विधि से, अनुष्ठान से या किसी अनियम से भी
घट जाती एक रूपये तो वापस आ जाता बल्ले बल्ले
वापस आ जाती हमारी बिकी हुई कस्तूरी, केवड़ा
और जितनी भी महकने वाली चीजें, हमारी दुनिया से गायब हो चुकी हैं
वैसे ज्यादा से ज्यादा सच बोलने के इन दिनों में
झूठ क्या बोला जाय पाप बढ़ाने के लिए
क्योंकि अपराध तो वैसे ही आदतन इतना बढ़ चुका है
कि घटते घटाते कम से कम हाथी जितना बचेगा ही
इसलिए कहना पड़ता है कहकुओं को कि
एक रूपये के मर जाने से दुनिया किसी संकट में नहीं फँसेगी
क्योंकि उसके विकल्प के रूप में अब चलायी जा सकती है
हत्या, बेरोजगारी, बलात्कार और आत्महत्या में से कोई भी एक चीज़
और समाज की जगह थाना, एन.जी.ओ., कैफे साइबर, बार
या कोई राजनीतिक पार्टी इत्यादि
लेकिन उखड़ी उखड़ी बातों के झुंड से
अगर निकल आए काम की एक कोई पिद्दी-सी बात भी
तो मानना पड़ेगा कि कविता की धुकधुकी अभी चल रही है
और अगर एक रूपये कीमतें घट जाएँ किसी भी अर्थशास्त्र से
तो फिर वापस आ जाएगा सतयुग
वानर सबके कपड़े प्रेस करके आलमारियों में रख देंगे
शेर आएगा और कविता लिखते कवियों को बिना डिस्टर्ब किए
साष्टांग करके गुफा में वापस लौट जाएगा
सफाईकर्मियों को शिमला टूर पर भेजकर
राजनीति के कार्यकर्ता गलियों में झाडू लगाएँगे
पुलिस की गाड़ियां प्रेमियों को समुद्रतट पर छोड़ आएँगी
पागुर करते पशु धरती पर छोटे छोटे बताशे छानेंगे
बादल कहेंगे हे फसलों तुम्हें कितने पानी की दरकार है
और वह साला सतयुग राम नाम का जाप करने
या रामराज्य पर कविता लिखने वाले महा महाकवियों की वाणी से नहीं
बल्कि चीज़ों की कीमतें एक रूपये घट जाने से आयेगा ...