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Monday, July 22, 2013

बिन सतगुरु नर रहत भुलाना, खोजत फिरत न मिलत ठिकाना



आज के सुअवसर पर फिर से पण्डित कुमार गन्धर्व जी के स्वर में कबीरदास जी:

Sunday, August 30, 2009

कौन ठगवा नगरिया लूटल हो ।।


कौन ठगवा नगरिया लूटल हो ।।
चंदन काठ के बनल खटोला ता पर दुलहिन सूतल हो।
उठो सखी री माँग संवारो दुलहा मो से रूठल हो।
आये जम राजा पलंग चढ़ि बैठा नैनन अंसुवा टूटल हो
चार जाने मिल खाट उठाइन चहुँ दिसि धूं धूं उठल हो
कहत कबीर सुनो भाई साधो जग से नाता छूटल हो



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Saturday, August 29, 2009

निरभय निरगुन गुन रे गाऊँगा



निरभय निरगुन गुन रे गाऊँगा ।
मूल कमल दृढ आसन बांधूं जी, उलटी पवन चढाऊंगा ॥
मन ममता को थिर कर लाऊं जी, पाँचों तत्व मिलाऊँगा ॥
इंगला, पिंगला, सुखमन नाड़ी जी, तिरवेनी पर हौं न्हाऊंगा ॥
पांच पचीसों पकड़ मंगाऊं जी, एक ही डोर लगाऊँगा ॥
शून्य शिखर पर अनहद बाजे जी, राग छत्तीस सुनाऊँगा ॥
कहत कबीरा सुनो भाई साधो जी, जीत निशान घुराऊँगा ॥

Saturday, February 23, 2008

अवधूत, गगन घटा गहरानी


मोहल्ले में मैंने आज सुबह कुमार गंधर्व जी की आवाज़ में 'हिरना समझ बूझ बन चरना' लगाया था। उसी के सिलसिले में प्रस्तुत कर रहा हूं इसी दिव्य स्वर में 'अवधूत, गगन घटा गहरानी'।



Tuesday, December 18, 2007

निरभय निरगुन गुन रे गाऊँगा

मोहल्ले पर एकाध दिन पहले कुमार गन्धर्व जी का गाया सूरदास का भजन लगाया था। वरिष्ठ कवि (और कहानीकार ) उदय प्रकाश जी ने कबीर का यह भजन सुनने की इच्छा व्यक्त की थी। उन के साथ आप भी सुनें:

निरभय निरगुन गुन रे गाऊँगा ।
मूल कमल दृढ आसन बांधूं जी, उलटी पवन चढाऊंगा ॥
मन ममता को थिर कर लाऊं जी, पाँचों तत्व मिलाऊँगा ॥

इंगला, पिंगला, सुखमन नाड़ी जी, तिरवेनी पर हौं न्हाऊंगा ॥
पांच पचीसों पकड़ मंगाऊं जी, एक ही डोर लगाऊँगा ॥

शून्य शिखर पर अनहद बाजे जी, राग छत्तीस सुनाऊँगा ॥
कहत कबीरा सुनो भाई साधो जी, जीत निशान घुराऊँगा ॥

Sunday, December 16, 2007

झीनी झीनी चदरिया

कुमार गन्धर्व की आवाज़ में सुनिए कबीर का भजन

 

Thursday, December 13, 2007

कौन ठगवा नगरिया लूटल हो


कुमार गन्धर्व जी का गाया कबीरदास का एक अदभुत भजन। मालवे में रहने वालों के लिए ज्यादे ही खास।

कौन ठगवा नगरिया लूटल हो ।।

चंदन काठ के बनल खटोला
ता पर दुलहिन सूतल हो।

उठो सखी री माँग संवारो
दुलहा मो से रूठल हो।

आये जम राजा पलंग चढ़ि बैठा
नैनन अंसुवा टूटल हो

चार जाने मिल खाट उठाइन
चहुँ दिसि धूं धूं उठल हो

कहत कबीर सुनो भाई साधो
जग से नाता छूटल हो
(३ मिनट ८ सेकेंड)