Tuesday, February 16, 2010

बहुत छोटे हैं मुझसे मेरे दुश्मन, जो मेरा दोस्त है मुझसे बड़ा है



उर्दू के मशहूर आलोचक जनाब ज़िया जालन्धरी के शब्दों में अतहर नफ़ीस के यहां शोर कम और शऊर ज़्यादा पाया जाता है. आज से वर्षों पहले मैंने अपने डायरी में अतहर का एक शेर लिखा था:

धूप सर पर हो फिर बेसायबां ज़िन्दा रहो
अय मिरे अतहर नफ़ीस अय जाने-जां ज़िन्दा रहो


फिर किसी और डायरी में उसका ये शेर दर्ज़ हुआ:

जिसे खोकर बहुत मग़मूम हूं मैं
सुना है उसका ग़म मुझसे सिवा है


निखालिस ग़ज़ल के शायर थे अतहर नफ़ीस. उनकी शैली में जहां एक तरफ़ बाबा मीर का खस्ता लहज़ा है वहीं आधुनिक समय की रेश-रेश तल्खि़यां भी. अहसास-ए-जमाल और जमाल-ए-अहसास के इस शायर को ज़्यादा लम्बी उम्र नसीब न हुई. अतहर नफ़ीस मात्र अड़तालीस साल के थे जब २१ नवम्बर १९८० को उनका इन्तकाल हुआ. तब तक उनका एक ही संग्रह कलाम नाम से छपा था. बाद में उनकी ग़ज़लों का एक और संग्रह हम सूरतगर ख़्वाबों के की शक्ल में शाया हुआ. यारों के यार के तौर पर जाने जाने वाले अतहर नफ़ीस की मौत पर उसके बहुत से दोस्तों को एक शायर के कम एक दोस्त के जाने का बड़ा सदमा था.

आज उनकी दो ग़ज़लें पेश कर रहा हूं.


एक

सुकूत-ए-शब से इक नग़मा सुना है
वही कानों में अब तक गूंजता है

ग़नीमत है कि अपने ग़म-ज़दों को
वो हुस्न-ए-ख़ुद-निगर पहचानता है

जिसे खोकर बहुत मग़मूम हूं मैं
सुना है उसका ग़म मुझसे सिवा है

कुछ ऐए ग़म भी हैं जिनसे अभी तक
दिल-ए-ग़म-आशना, ना-आशना है

बहुत छोटे हैं मुझसे मेरे दुश्मन
जो मेरा दोस्त है मुझसे बड़ा है

मुझे हर आन कुछ बनना पड़ेगा
मेरी हर सांस मेरी इब्तिदा है

(सुकूत-ए-शब: रात की ख़ामोशी, ग़म-ज़दों को:दुखित लोगों को, हुस्न-ए-ख़ुद-निगर: स्वार्थी सौन्दर्य, मग़मूम: दुखी, इब्तिदा: शुरुआत)

दो

लम्हों के अजाब सह रहा हूं
मैं अपने वुजूद की सज़ा हूं

ज़ख़्मों के ग़ुलाब खिल रहे हैं
ख़ुश्बू के हुजूम में खड़ा हूं

इस दस्त-ए-तलब में इक मैं भी
सदियों की थकी हुई सदा हूं

शायद न रिहाई मिल सके अब
यादों का असीर हो गया हूं

ऐ मुझको फ़रेब देने वाले
मैं तुझ पर यक़ीन कर चुका हूं

मैं तेरे क़रीब आते-आते
कुछ और भी दूर हो गया हूं

(अजाब: यातना, दश्त-ए-तलब: इच्छाओं का जंगल, असीर: क़ैदी)

Monday, February 15, 2010

कौन हैं माची तवारा



सन १९६२ में जन्मी और स्वाभाव से बेहद शर्मीली माची तवारा टोक्यो के एक स्कूल में अध्यापिका हैं. फ़क़त छब्बीस साल की आयु में उन्होंने अपना पहला कविता संग्रह छपवाया था ’सारादा किनेबी’ (यानी सैलैड एनीवर्सरी). जापान की पारम्परिक कविता का एक फ़ॉर्मेट है तन्का. तन्का में कुल इकत्तीस अक्षरों का इस्तेमाल किये जाने की इजाज़त होती है. माची की इस किताब को जापान में अपूर्व ख्याति हासिल हुई. आप यक़ीन मानिये इस किताब की कुल छः महीने में पच्चीस लाख से ज़्यादा प्रतियां बिक गईं. बाद में उनके अनुवादों की दुनिया भर में साठ लाख से ज़्यादा प्रतियां बिकीं.

आधुनिक समय में प्रेम आधुनिक समय के प्रेम को लेकर लिखी जाने वाली महानतम कविताएं लिख चुकने वाली माची आज जापान में एक सेलेब्रिटी का दर्ज़ा रखती हैं. उनकी सारी कविताएं एक प्रेमी को सम्बोधित हैं. आज आपका उनसे परिचय करवा रहा हूं उनकी केवल दो कविताओं से. बुरा मत मानियेगा. जल्दी ही उनकी कई सारी कविताएं लेकत हाज़िर होता हूं.



एक

"मैं तीस की उम्र में मर जाऊंगा" तुम कहते हो
और बदले में
मैं फ़ैसला करती हूं कि मैं नहीं मरूंगी तब तक

दो

हिरोशिमा की लोकभाषा में
तुम हमारे प्यार का मज़ाक उड़ा रहे हो
या क्या मैं उम्मीद कर रही हूं कि तुम ऐसा कर रहे हो

Sunday, February 14, 2010

नहीं रहा तितली वाला फ़्रैडी

(अभी अभी भीमताल से आये एक फ़ोन ने हिला कर रख दिया है. मेरा दोस्त फ़्रैडरिक स्मेटाचैक नहीं रहा. पिछले दस सालों से ख़राब स्वास्थ्य से जूझ रहे शय्याग्रस्त फ़्रैडी ने आज सुबह अपनी अपनी अन्तिम सांसें लीं. कुछ समय पहले मैंने उस पर एक लेख कबाड़ख़ाने पर लगाया था. बतौर श्रद्धांजलि उसी को दोबारा लगा रहा हूं. फ़्रैडी ज़िन्दाबाद!)



वन स्ट्रॉ रेवोल्यूशन वाले जापानी मासानोबू फुकुओका और पर्मीकल्चर के प्रतिनिधि ऑस्ट्रियाई किसान सैप होल्ज़र फिलहाल विश्वविख्यात नाम हैं और दुनिया भर के पर्यावरणविद उन्हें हाथोंहाथ लेते हैं और उनकी लिखी किताबों की लाखों प्रतियां बिका करती हैं। सुन्दरलाल बहुगुणा और मेधा पाटकर के कामों को मीडिया द्वारा पर्याप्त ख्याति दिलाई जा चुकी है। लेकिन उत्तराखंड के कोटमल्ला गांव के बंजर में बीस हज़ार पेड़ों का जंगल उगाने वाले जगत सिंह चौधरी ‘जंगली’ जैसे प्रकृतिपुत्रों को उनके हिस्से का श्रेय और नाम मिलना बाकी है।

ठीक ऐसा ही मेरे प्यारे दोस्त फ्रेडरिक स्मेटाचेक जूनियर के बारे में भी कहा जा सकता है।

उत्तराखंड कुमाऊं के विख्यात पर्यटन स्थल भीमताल की जून एस्टेट में फ्रेडरिक स्मेटाचेक के घर पर (माफ करें फ्रेडरिक स्मेटाचेक जूनियर के घर) पर आपको एशिया का सबसे बड़ा व्यक्तिगत तितली संग्रह देखने को मिलेगा। हल्द्वानी से भीमताल की तरफ जाएं तो पहाड़ी रास्ता शुरू होने पर आपको चीड़ के पेड़ों की बहुतायत मिलेगी । यह हमारे वन विभाग की मेहरबानी है कि पहाड़ों में कल्पवृक्ष के नाम से जाने जाने वाले बांज के पेड़ों का करीब करीब खात्मा हो चुका है। भीमताल पहुंचने के बाद आप बाईं तरफ को एक तीखी चढ़ाई पर मुड़ते हैं और जून एस्टेट शुरू हो जाती है। जून एस्टेट में आपको चीड़ के पेड़ खोजने पड़ेंगे। यहां केवल बांज है दशकों से सहेजा हुआ।

फ्रेडरिक के पिता यानी फ्रेडरिक स्मेटाचेक सीनियर 1940 के दशक के प्रारंभिक वर्षों में यहाँ आकर बस गए थे।यहां स्मेटाचेक परिवार की संक्षिप्त दास्तान बताना ज़रूरी लगता है। चेकोस्लोवाकिया के मूल निवासी लेकिन जर्मन भाषी फ्रेडरिक स्मेटाचेक सीनियर 1940 के आसपास हिटलर विरोधी एक संस्था के महत्वपूर्ण सदस्य थे। विश्वयुद्ध का दौर था और हिटलर का सितारा बुलंदी पर। वह अपने सारे दुश्मनों को एक एक कर खत्म करता धरती को रौंदता हुआ आगे बढ़ रहा था। फ्रेडरिक स्मेटाचेक सीनियर की मौत का फतवा भी बाकायदा हिटलर के दस्तखत समेत जारी हुआ। जान बचाने की फेर में फ्रेडरिक सीनियर अपने कुछ साथियों के साथ एक पुर्तगाली जहाज पर चढ़ गए। यह जहाज कुछ दिनों बाद गोआ पहुंचा। गोआ में हुए एक खूनी संघर्ष में जहाज के कप्तान का कत्ल हो गया। सो बिना कप्तान का यह जहाज चल दिया कलकत्ता की तरफ।

कलकत्ता पहुंचकर रोजी रोटी की तलाश में फ्रेडरिक स्मेटाचेक सीनियर ने उन दिनों वहां बड़ा व्यापार कर रही बाटा कम्पनी में नौकरी कर ली। बाटानगर में रहते हुए फ्रेडरिक सीनियर ने अपने कुछ दोस्तों के साथ मिलकर एक क्लब की स्थापना की। चुनिन्दा रईसों के लिए बना यह क्लब सोने की खान साबित हुआ। इत्तफाक से इन्हीं दिनों अखबार में छपे एक विज्ञापन ने उनका ध्यान खींचा: कुमाऊं की नौकुचियाताल एस्टेट बिकाऊ थी। उसका ब्रिटिश स्वामी वापस जा रहा था। मूलत: पहाड़ों को प्यार करने वाले फ्रेडरिक सीनियर को फिर से पहाड़ जाने का विचार जंच गया। वे कलकत्ता से नौकुचियाताल आ गए और फिर जल्दी ही उन्होंने नौकुचियाताल की संपत्ति बेचकर भीमताल की जून एस्टेट खरीद ली जो फिलहाल उनके बेटों के पास है।

नौकुचियाताल और भीमताल के इलाके में फ्रेडरिक स्मेटाचेक सीनियर ने प्रकृति और पर्यावरण का गहन अध्ययन किया खासतौर पर इस इलाके में पाए जाने वाले कीट पतंगों का और तितलियों का। पर्यावरण के प्रति सजग फ्रेडरिक स्मेटाचेक सीनियर ने अपने बच्चों को प्राकृतिक संतुलन का मतलब समझाया और पेड़ पौधों जानवरों कीट पतंगों के संसार के रहस्यों से अवगत कराया। यह फ्रेडरिक स्मेटाचेक सीनियर थे जिन्होंने 1945 के साल से तितलियों का वैज्ञानिक संग्रह करना शुरू किया। यह संग्रह अब एक विषद संग्रहालय बन चुका है। संग्रहालय के विनम्र दरवाज़े पर हाफ पैंट पहने हैटधारी स्मेटाचेक सीनियर का फोटो लगा है।



स्मेटाचेक सीनियर के मित्रों का दायरा बहुत बड़ा था। विख्यात जर्मन शोधार्थी लोठार लुट्जे अक्सर अपने दोस्तों के साथ जून एस्टेट में रहने आते थे। इन दोस्तों में अज्ञेय और निर्मल वर्मा भी थे और विष्णु खरे भी। अभी कुछ दिन पहले स्मेटाचेक जूनियर ने मुझे सम्हाल कर रखा हुआ एक टाइप किया हुआ कागज़ थमाया। यह स्वयं विष्णु जी द्वारा टाइप की हुई उनकी कविता थी : ‘दिल्ली में अपना घर बना लेने के बाद एक आदमी सोचता है’। कविता के बाद कुछ नोट्स भी थे। शायद यह कविता वहीं फाइनल की गई थी।

अपने पिता की परम्परा को आगे बढ़ाने का काम उनके बेटों विक्टर और फ्रेडरिक स्मेटाचेक जूनियर ने संभाला। बड़े विक्टर अब जर्मनी में रहते हैं और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के भूवैज्ञानिक माने जाते हैं : अंटार्कटिका की पारिस्थितिकी के विशेषज्ञ। सो अब एक तरह से स्मेटाचेक परिवार का इकलौता और वास्तविक ध्वजवाहक फ्रेडरिक स्मेटाचेक जूनियर है। पचपन छप्पन साल का फ्रेडरिक पिछले करीब आठ सालों से पूरी तरह शैयाग्रस्त है। बिस्तर पर लेटे इस बेचैन शख्स के पास आपको कुछ देर बैठना होगा और धीरे धीरे आपके सामने पिछले चालीसेक सालों की आश्चर्यजनक और अविश्वसनीय कथाओं का पुलिन्दा खुलना शुरू होगा।

फ्रेडरिक स्मेटाचेक जूनियर के घर में घुसते ही उसकी बेहतरीन वास्तुकला ध्यान खींचती है। बहुत सादगी से बने दिखते इस घर के भीतर लकड़ी का बेहतरीन काम है। यह अपेक्षाकृत नया मकान है और इसे नींव से शुरू करके मुकम्मल करने का काम खुद फ्रेडरिक ने स्थानीय मजदूर मिस्त्रियों की मदद से किया। घर की तमाम आल्मारियां दरवाज़े पलंग कुर्सियां सब कुछ उसने अपने हाथों से बनाए हैं। किंचित गर्व के साथ वह कहता है कि इस पूरे इलाके में उस जैसा बढ़ई कोई नहीं हो सकता। न सिर्फ बढ़ईगीरी में बल्कि बाकी तमाम क्षेत्रों में अपने पिता को वह अपना उस्ताद मानता है। अपने पिता से फ्रेडरिक ने प्रकृति को समझना और उसका आदर करना सीखा। किस तरह कीट पतंगों और तितलियों चिड़ियों के आने जाने के क्रम के भीतर प्रकृति अपने रहस्यों को प्रकट करती है और किस तरह वह अपने संतुलन को बिगाड़ने वाले मानव के खिलाफ अपना क्रोध व्यक्त करती है यह सब फ्रेडरिक को बचपन से सिखाया गया था।

कोई आश्चर्य नहीं सत्तर के दशक में अंग्रेज़ी साहित्य में एम ए करने के बाद फ्रेडरिक ने थोड़े समय नौनीताल के डी एस बी कॉलेज में पढ़ाया लेकिन नौकरी उसे रास नहीं आई। उसने बंजारों का जीवन अपनाया और कुमाऊं गढ़वाल भर के पहाड़ों और हिमालयी क्षेत्रों की खाक छानी। सन 1980 के आसपास से कुमाऊं में फैलते भूमाफिया के कदमों की आहट पहचानने और सुनने वाले पहले लोगों में फ्रेडरिक था। यह फ्रेडरिक था जिसने अपने इलाके के निवासियों के लिए राशनकार्ड जैसा मूल अधिकार सुनिश्चित कराया।



अस्सी के दशक में फ्रेडरिक अपनी ग्रामसभा का प्रधान चुना गया और पांच सालों के कार्यकाल के बाद उसकी ग्रामसभा को जिले की आदर्श ग्रामसभा का पुरूस्कार प्राप्त हुआ।इस दौरान उसने अपने क्षेत्र के हर ग्रामीण की ज़मीन जायदाद को बाकायदा सरकारी दफ्तरों के दस्तावेजों में दर्ज कराया। जंगलों में लगने वाली आग से लड़ने को स्थानीय नौजवानों की टुकड़ियां बनाईं दबे कुचले लोगों को बताया कि शिक्षा को वे बतौर हथियार इस्तेमाल करें तो उनका जीवन बेहतर बन सकता है। साथ ही यह समय आसन्न लुटेरों के खिलाफ लामबन्दी की तैयारी का भी था जो तरह तरह के मुखौटे लगाए पहाड़ों की हरियाली को तबाह करने के गुप्त रास्तों की खोज में कुत्तों की तरह सूंघते घूम रहे थे।

पूरा पहाड़ न सही अपनी जून एस्टेट और आसपास के जंगलों को तो वह बचा ही सकता था। इसके लिए उसने कई दफा अपनी जान की परवाह भी नहीं की। जून एस्टेट में पड़ने वालै एक सरकारी जमीन को उत्तर प्रदेश की तत्कालीन भगवा सरकार ने रिसॉर्ट बनाने के वास्ते अपने एक वरिष्ठ नेता को स्थानांतरित कर दिया। इस रिसॉर्ट के निर्माणकार्य में सैकड़ों बांजवृक्षों को काटा जाना था। इन पेड़ों की पहरेदारी में स्मेटाचेक परिवार ने करीब आधी शताब्दी लगाई थी। भगवा राजनेता ने धन और शराब के बल पर स्थानीय बेरोजगारों का समर्थन खरीद कर निर्माण चालू कराया लेकिन फ्रेडरिक के विरोध और लम्बी कानूनी लड़ाई के बाद न्यायालय का निर्णय निर्माण को बन्द कराने में सफल हुआ। इस पूरे प्रकरण में कुछ साल लगे और कानून की पेचीदगियों से जूझते फ्रेडरिक को पटवारियों क्लर्कों पेशकारों से लेकर कमिश्नरों तक से बात करने और लड़ने का मौका मिला। उसे मालूम पड़ा कि असल लड़ाई तो प्रकृति को सरकारी फाइलों और तुगलकी नीतियों से बचाने की है। कम से कम लोगों को इस बाबत आगाह तो किया जा सकता है।

इधर 1990 के बाद से दिल्ली और बाकी महानगरों से आए बिल्डरों ने औने पौने दाम दे कर स्थानीय लोगों की जमीनें खरीदना शुरू किया। इन जमीनों पर रईसों के लिए बंगले और कॉटेजें बनाई गईं। भीमताल की पूरी पहाड़ियां इन भूमाफियाओं के कब्जे में हैं और एक भरपूर हरी पहाड़ी आज सीमेन्ट कंक्रीट की बदसूरत ज्यामितीय आकृतियों से अट चुकी है। अकेला फ्रेडरिक इन सब से निबटने को काफी नहीं था। फिर भी सन 2000 में उसने नैनीताल के उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की । यह याचिका पिछले दशकों में शासन की लापरवाही प्रकृति के प्रति क्रूरता और आसन्न संकट से निबटने के लिए वांछनीय कार्यों का एक असाधारण दस्तावेज है । पांच सालों बाद आखिरकार 2005 के शुरू में इस याचिका पर शासन ने कार्य करना शुरू कर दिया है।

वर्ष 2000 में फ्रेडरिक ने बाकायदा भविष्यवाणी करते हुए जल निगम को चेताया था कि उचित कदमों के अभाव में जल्द ही समूचे हल्द्वानी की तीन चार लाख की आबादी को भीमताल की झील के पानी पर निर्भर रहना पड़ेगा क्योंकि लगातार खनन और पेड़ों के कटान ने एक समय की सदानीरा गौला नदी को एक बीमार धारा में बदल दिया था। 2005 की गर्मियों में यह बात अक्षरश: सच साबित हुई।

बहुत कम लोग जानते हैं कि फ्रेडरिक एक बढ़िया लेखक और कवि भी है। वह अंग्रेजी में लिखता है और उसका ज्यादातर लेखन व्यंग्यात्मक होता है। उसे शब्दों और उनसे निकलने वाली ध्वनियों से खेलने और शरारत में आनन्द आता है। ‘द बैलेस्टिक बैले ऑफ ब्वाना बोन्साई बमचीक’ उसका अब तक का सबसे बड़ा काम है अलबत्ता उसे अभी छपना बाकी है । इसके एक खण्ड में पेप्सी और कोकाकोला के ‘युद्ध’ को समाप्त करने के लिए कुछ अद्भुत सलाहें दी गई हैं। दुनिया भर के साहित्य पढ़ चुके फ्रेडरिक के प्रिय लेखकों की लिस्ट बहुत लम्बी है। वह हिमालयी पर्यावरण के विरले विशेषज्ञों में एक है। पिछले दस सालों से जून एस्टेट के पेड़ों के हक के लिए लड़ते भारतीय दफ्तरों की

लालफीताशाही और खत्ता खतौनी जटिलताओं से रूबरू होता हुआ अब वह भारतीय भू अधिनियम कानूनों का ज्ञाता भी है। अपने बिस्तर पर लेटा हुआ वह एक आवाज सुनकर बता सकता है कि कौन सी चिड़िया किस पेड़ पर बैठकर वह आवाज निकाल रही है और कि वह ठीक कितने सेकेंड बाद दुबारा वही आवाज निकालेगी़ जब तक कि उसका साथी नहीं आ जाता। जंगली मुर्गियों तेंदुओं हिरनों के पत्तों पर चलने भर की आवाज से वह उन्हें पहचान सकता है और जैसा कि मैंने बताया था वह एक विशेषज्ञ बढ़ई तो है ही ।

गांव के बच्चों को हर मेले में जाने के लिए जेबखर्च देने वाला फ्रेडरिक, गैरी लार्सन जैसे भीषण मुश्किल काटूर्निस्ट का प्रशंसक फ्रेडरिक, देश विदेश के लेखक बुद्धिजीवियों का दोस्त फ्रेडरिक, ‘बटरफ्लाइ मैन’ के नाम से विख्यात फ्रेडरिक, कभी कभार शराब के नशे में भीषण धुत्त सरकार अफसरों को गालियां बकता फ्रेडरिक, बैसाखियों के सहारे धीमे धीमे चलने की कोशिश करता ईमानदार ठहाके लगाता फ्रेडरिक : पता नहीं क्या क्या है वह।

हां कभी भीमताल से गुजरते हुए लाल जिप्सी पर निगाह पड़े तो समझिएगा वह फ्रेडरिक की गाड़ी है। गाड़ी चालक से कहेंगे तो वह सीधा आपको फ्रेडरिक के पास ले जाएगा। आप पाएंगे कि ऊपर चढ़ती गाड़ी बिना आवाज किए चढ़ रही है। बाद में जब आप फ्रेडरिक से मिल चुके होंगे उसकी कुछ बातें सुन चुके होंगे हो सकता है अपनी पुरानी जिप्सी का जिक्र आने पर वह आपको बताए कि गाड़ी बीस साल पुरानी है। अपने जर्मन आत्मगर्व के साथ वह आपको बताएगा कि वह न सिर्फ इलाके का सबसे बढ़िया बढ़ई है बल्कि सबसे बड़ा उस्ताद कार मैकेनिक भी।

(संग्रहालय में फ़्रैडी की फ़ोटो उनके भाई विक्टर स्मैटाचैक ने २००५ में खींची थी. बाक़ी दो फ़ोटो पिछले साल रोहित उमराव ने उनके घर पर ली थीं)

तुम आये हो न शब-ए-इन्तेज़ार गुज़री है



जनाब हबीब वली मोहम्मद (जन्म १९२१) विभाजन पूर्व के भारतीय उपमहाद्वीप के प्रमुख लोकप्रिय ग़ज़ल गायकों में थे. एम बी ए की डिग्री लेने के बाद वली मोहम्मद १९४७ में बम्बई जाकर व्यापार करने लगे. दस सालों बाद वे पाकिस्तान चले गए. वहीं उन्होंने बेहद सफल कारोबारी का दर्ज़ा हासिल किया. अब वे कैलिफ़ोर्निया में अपने परिवार के साथ रिटायर्ड ज़िन्दगी बिताते हैं.

बहादुरशाह ज़फ़र की 'लगता नहीं है दिल मेरा' उनकी सबसे विख्यात गज़ल है. भारत में फ़रीदा ख़ानम द्वारा मशहूर की गई 'आज जाने की ज़िद न करो भी उन्होंने अपने अंदाज़ में गाई है.

उस वक़्त के तमाम गायकों की तरह उनकी गायकी पर भी कुन्दनलाल सहगल की शैली का प्रभाव पड़ा. उनका एक तरह का सूफ़ियाना लहज़ा 'बना कर फ़क़ीरों का हम भेस ग़ालिब, तमाशा-ए-अहल-ए-करम देखते हैं' की लगातार याद दिलाता चलता है.

सुनिये उनकी गाई हुई फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ साहब की अतिप्रसिद्ध गज़ल.




तुम आये हो न शब-ए-इन्तेज़ार गुज़री है
तलाश में है सहर, बार बार गुज़री है

वो बात सारे फ़साने में जिसका ज़िक्र न था,
वो बात उन को बहुत नागवार गुज़री है

जुनूं में जितनी भी गुज़री बकार गुज़री है
अगर्चे दिल पे ख़राबी हज़ार गुज़री है

न गुल खिले हैं न उन से मिले, न मै पी है
अजीब रंग में अब के बहार गुज़री है

चमन पे गारत-ए-गुलचीं से जाने क्या गुज़री
कफ़स से आज सबा बेक़रार गुज़री है

(शब-ए-इन्तज़ार: इन्तज़ार की रात, सहर: सुबह, बकार: काम काज के साथ, ग़ारत-ए-गुलचीं: फूलों कलियों की तबाही, कफ़स: पिंजरा, सबा: भोर की हवा)

Saturday, February 13, 2010

वक़्त से कौन कहे यार, ज़रा आहिस्ता

अमजद इस्लाम अमजद साहब ४ अगस्त १९४४ को जन्मे थे. मूलतः नाटककार के तौर पर जाने जाने वाले अमजद को उनके नाटक ’वारिस’ ने उर्दू साहित्य संसार में ख़ासी प्रसिद्धि दी.

कविता में नज़्म उनका पसन्दीदा फ़ॉर्मैट है.

आज पढ़िये उनकी एक नज़्म:


वक़्त से कौन कहे यार, ज़रा आहिस्ता
गर नहीं वस्ल तो ये ख़्वाब-ए-रिफ़ाक़त ही ज़रा देर रहे
वक़्फ़ा-ए-ख़्वाब के पाबन्द हैं
जब तक हम हैं!

ये जो टूटा तो बिखर जाएंगे सारे मंज़र
(तीरगी-ज़ाद को सूरज है फ़ना की तालीम)
हस्त और नेस्त के माबैन अगर
ख़्वाब का पुल न रहे
कुछ न रहे
वक़्त से कौन कहे
यार, ज़रा आहिस्ता

(वस्ल: मिलन; ख़्वाब-ए-रिफ़ाक़त: साथ रहने का सपना; वक़्फ़ा-ए-ख़्वाब: सपने का ठहराव; मंज़र: दृश्य; तीरगी-ज़ाद: अन्धेरे में रहने वाला; फ़ना: मृत्यु; हस्त और नेस्त: होना और न होना; माबैन: बीच में)

एक हिप-हॉप सॉन्ग, जो कोर्ट मार्शल करा सकता है!

दिलीप मंडल

एक सैनिक अपनी सेवा पूरी करता है। इसके बाद वह अपना समय परिवार के साथ
बिताना चाहता है। लेकिन अमेरिकी सेना में एक नीति है कि किसी सैनिक को
सर्विस पूरी करने के बाद भी फिर से ड्यूटी पर लगाया जा सकता है। अमेरिकी
सेना में नई भर्तियां न हो पाने और युद्ध के मोर्चे घटने की जगह बढ़ने की
वजह से जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने 2001 में ये नीति बनाई थी। इसे स्टॉप लॉस
पॉलिसी कहा गया।

अमेरिकी सैनिक स्पेशलिस्ट मार्क हाल 27 साल का है। इराक में अपना
कार्यकाल पूरा करने के बाद वो सेना से अलग होना चाहता था, लेकिन स्टॉप
लॉस पॉलिसी के तहत उसे फिर से इराक में तैनाती का ऑर्डर मिला। इससे नाराज
मार्क हॉल ने अपनी वेब साइट में एक हिप-हॉप गाना लिखा। इस गाने से
अमेरिकी सेना में ऐसा कोहराम मचा कि उसे गिरफ्तार कर लिया गया। उसका इराक
में कोर्ट मार्शल होने का आदेश जारी कर दिया गया है।

पढ़िए वो गाना जिसकी वजह से मार्क हॉल का कोर्ट मार्शल होगा।

“Fuck you colonels, captains, E-7 and above
You think you so much bigger than I am? ...
I’m gonna round them up all eventually, easily, walk right up peacefully
And surprise them all, yes, yes, y’all, up against the wall, turn around
I got a fucking magazine with 30 rounds, on a three-round burst, ready
to fire down
Still against the wall, I grab my M-4, spray and watch all the bodies
hit the floor
I bet you never stop-loss nobody no more.”

अमेरिका के युद्ध विरोधियों का कहना है कि ये गुस्से की अभिव्यक्ति है।
रैप गानों में किसी को मारने की बात पहली बार नहीं की गई है, लेकिन गाने
की वजह से किसी की जान भी नहीं गई है। इस गाने का अनुवाद क्या कुछ इस तरह
होगा :

कर्नल, कैप्टन, ई-7 और ऊपर के रैंक वालो
भाड़ में जाओ
तुम सोचते हो कि तुम मुझसे बड़े हो
मैं तुम सबको एक दिन पकड़कर लाऊंगा
बिना किसी हुज्जत के, आराम से
और तुम्हें दीवार की तरफ मुंह कर
खड़ा कर दूंगा
मेरी एम-4 गन में 30 गोलियां हैं
तीन बार की तड़ तड़ और सब खत्म
मुझसे शर्त लगाओ
फिर तुम फिर किसी का स्टॉप लॉस नहीं करोगे।

जाहिर है इस गाने में हिंसा है। लेकिन ये हिंसा किसी खास व्यक्ति के
खिलाफ नहीं है। इस कविता में जिन्हें गोलियों से भून देने की बात है, वो
आखिरी लाइन में फिर जिंदा हैं। जाहिर है मार्क हाल उस प्रवृत्ति को गोली
मारने की बात कर रहा है, जो किसी को जबरन युद्ध क्षेत्र में धकेल देती
है। लेकिन अमेरिकी लोकतंत्र इस गाने को सहन नहीं कर पा रहा है।

संदर्भ:
http://countercurrents.org/jamail110210.htm

http://news.newamericamedia.org/news/view_article.html?article_id=f9e382619ae841fdb0cdfa3b00e6b201&from=rss

http://www.google.com/hostednews/ap/article/ALeqM5gf52lMS9hfMtwITgIukwfs6KqLegD9DL09200

http://www.veteranstoday.com/wp-content/uploads/2010/02/marc-hall250-150x150.jpg

मेरी जिंदगी में किताबें

कुछ दिन हुए किताबों के महामेले से लौटी हूं। पुस्‍तक मेले में जाना मेरे लिए किसी उत्‍सव की तरह होता है, हालांकि जानती हूं कि वहां से मनों निराशा और टनों उदासी के साथ वापस लौटूंगी। हिंदी किताबों का संसार हजार-हजार फांस बनकर आंखों में चुभता रहता है। छुटपन से इसी सपने के साथ बड़ी हुई थी कि बड़ी होकर लेखक बनूंगी, पर जैसे-जैसे बड़ी होती जाती हूं, लेखक बनने का सपना किसी बीहड़ बियाबान में गुम होता जाता है। पत्रकार बनूंगी, सोचा भी नहीं था, पर वक्‍त के साथ पत्रकारिता की दुनिया में तथाकथित नाम कमाने और पैसा पीट लेने के सपने न सिर्फ सिर उगाते हैं, बल्कि थोड़ी सी तिकड़मों के साथ उन्‍हें पूरा करने की राहें भी हर दिन खुलती नजर आती हैं।

पर मुझे अखबार से ज्‍यादा किताबों से प्‍यार है।

होश संभालने के साथ ही मैंने पाया था कि किताबें झाडू और कलछी की तरह ही एक कमरे के हमारे मामूली से घर का हिस्‍सा थीं। मुश्किल से 12 बाई 12 के एक कमरे में मेरे मां-पापा की समूची गृहस्‍थी थी, जिसका एक बड़ा हिस्‍सा किताबों से पटा हुआ था। ऊपर टाण पर, मेज पर, कमरे के कोने में ईंटों पर लकड़ी के पटरे रखकर बनाई हुई शेल्‍फ पर किताबें सजी रहती थीं। लकड़ी पर अखबार बिछाकर पापा करीने से मार्क्‍सवाद, दर्शन और इतिहास की किताबें रखते थे। जब भी वो घर पर होते तो या किताब पढ़ रहे होते थे या किसी दोस्‍त के साथ उन किताबों पर कुछ ऐसी उलझी बहसें कर रहे होते, जिसका सिर-पैर भी मेरी समझ में नहीं आता था। मां चुपचाप उसी कमरे के एक कोने में, जहां रखा एक स्‍टोप, कुछ डिब्‍बे और बर्तन उसे रसोई जैसा आभास देते थे, में सिर झुकाए चाय बनाती या सब्‍जी छौंक रही होतीं। मां को वो बातें कितनी समझ में आती थीं, पता नहीं। लेकिन उन्‍हीं में से कुछ किताबों के अंदर पिता से छिपाकर वक्‍त-जरूरत के लिए कुछ पैसे रखने के सिवा मां को उनकी कोई खास सार्थकता समझ में आती थी, मुझे पता नहीं। वो अकसर किताबों के इस कबाड़ को लेकर नाराज होती रहती थीं, जिसे दिल्‍ली, खुर्जा, गाजियाबाद से लेकर अब इलाहाबाद तक पापा साथ-साथ ढोते रहे थे। पापा जिस भी दिन कोई नई किताब खरीद लाते, मां बहुत चिक-चिक करतीं। एक ढंग का पंखा भी नहीं है, सड़ी गर्मियों में भी इस टुटहे टेबल फैन से काम चलाना पड़ता है। ये नहीं कि एक तखत खरीद लें, एक गैस का चूल्‍हा। स्‍टोप के धुएं में आंखें फोड़ती हूं। पर इन्‍हें अपनी किताबों में आंखें फोड़ने से फुरसत नहीं। मां झींकती, पर उन किताबों की देखभाल वही करती थीं। एक-एक किताब कपड़े से साफ करके करीने से रखतीं, उनकी धूल झाड़ती, दीमक और फफूंद से बचाने के लिए धूप दिखातीं। लेकिन शाम को पापा फ़िर कोई नई किताब ले आते और मां की झकबक शुरू हो जाती।

ऐसे आदमी से ब्‍याह करके उनकी किस्‍मत फूट गई है, जिसे इन मरी किताबों के अलावा जीती-जागती मां की कोई परवाह नहीं है। शादी के दस सालों में पापा ने उन्‍हें एक साड़ी भी नहीं दिलाई। जो कुछ भी है, उनकी मुंबईया मां का दिया हुआ है वरना पापा तो निरे फो‍कटिया ठहरे। मैं सचमुच इस बात पर यकीन करती कि मां पापा को फोकटिया ही समझती हैं, अगर एक बार मैंने मुंबई में नानी के यहां, नानी के ये कहने पर कि तुम्‍हारा पति तो बिलकुल निठल्‍ला है, खास कमाता नहीं और जो कमाता है, सब किताबों पर फूंक देता है, मां ने जवाब में ये न कहा होता कि उन्‍हें अपने पति पर बहुत गर्व है। मां ने उनमें से कुछ किताबें पढ़ी हैं और वो सचमुच ज्ञान का भंडार हैं। तब मेरी उम्र कुछ पांच बरस रही होगी। मैंने बाद में चुपके से पापा से कहा था कि मां नानी से कह रही थीं कि उन्‍हें आप पर बड़ा गर्व है।

गर्व मुझे भी था। बड़ी मामूली सी उम्र में ही मैंने जिंदगी में किताबों की जरूरत और उसकी कीमत को समझ लिया था। उनमें लिखी बातें मैंने बहुत बाद में पढ़ीं, लेकिन ये हमेशा से जानती थी कि ये किताबें हमारे घर और हमारे होने का निहायत जरूरी हिस्‍सा थीं। आस-पड़ोस और मुंबई में हमारे रिश्‍तेदारों में से किसी के यहां गीता प्रेस, गोरखपुर वाला गुटका रामायण, हनुमान चालीसा, तुलसी उवाच या कबीर के दोहे छोड़कर कुछ खास किताबें नहीं थीं। कोर्स की किताब भी अगली क्‍लास में जाने के साथ ही बेच दी जाती और अगले क्‍लास की सेकेंड हैंड किताबें खरीद ली जातीं। सभी रिश्‍तेदार आपस में सामानों और गहनों की तुलना करते हुए एक-दूसरे से आगे निकल जाने की फिराक में रहते थे। मौसी की नींद इसी बात से तबाह हो सकती थी कि मामी ने पांच तोले का सोने का हार बनवा लिया है और वो अभी तक ब्‍याह की पतरकी चेन से ही गुजरा कर रही हैं।

लेकिन पापा उस दुनिया का हिस्‍सा नहीं थे। वो अपने तख्‍ते, लकड़ी के पटरे वाली शेल्‍फ, टुटहे टेबल फैन और किताबों में संतुष्‍ट रहने वाले जीव थे। मैं भी मुंबईया खचर-पचर वाली दुनिया को देखकर चकित-भ्रमित होती थी, लेकिन फिर इलाहाबाद लौटकर पापा की किताबें देखकर खुश भी हो जाया करती थी।

लेकिन जब वक्‍त गुजरने और आर्थिक तंगियां बढ़ते जाने के बाद भी पापा के किताबें खरीदने पर लगाम नहीं लगी तो मां की जबान पर भी लगाम नहीं रही। वो नाराज होतीं और दुखी भी। जब बोलने पर आतीं तो बोलती चली जातीं। अपनी नहीं तो कम से कम दो-दो लड़कियों की तो सोचो। उनके ब्‍याह के लिए कुछ जोड़ो। लड़कियां कुंवारी बैठी रहेंगी और ये किताबों में सिर दिए रहेंगे।

मुझे समझ में नहीं आया कि पापा के किताब पढ़ने की वजह से कैसे हमारी शादी नहीं हो पाएगी। जो भी हो, शादी से मुझे वैसे भी चिढ़ थी। बैहराना में महिला सेवा सदन इंटर कॉलेज वाली जिस गली में हमारा एक कमरे का घर था, उसके मुहाने पर एक लॉरी वाला रोज दारू पीकर अपनी बीवी की कुटम्‍मस करता था। मकान मालिक चौरसिया बात-बात पर अपनी बीवी पर चिल्‍लाता रहता था, कुतिया के कान में खूंट पड़ी है। हरामजादन सुनती ही नहीं। बगल के कमरे का किराएदार पूर्णमासी यादव बीवी के घर से जाते ही मुझे बुलाकर गोदी में बिठाने के लिए चुमकारने लगता था। इसलिए मुझे शादी और आदमी के नाम से ही घिन आती थी। अच्‍छा ही है शादी न हो। इन किताबों के बहाने ही सही।

जारी

Monday, February 8, 2010

पिया संग खेलूं



उस्ताद ग़ुलाम मुस्तफ़ा ख़ान की आवाज़ में सुनिये राग बसन्त:

Sunday, February 7, 2010

सिर्फ़ धरती है ऐसी जो हर क्षण सुनती रहती है

कल आपने देवताले जी की एक कविता पढ़ी थी. आज उसी क्रम में पढ़िये अस्सी के दशक की उनकी एक कविता

बकरों के साथ सुलूक के बारे में

बकरों के साथ सुलूक के बारे में
बहुत-सी बातें हो सकती हैं
गांधी जी ने कई बड़े काम किए
बकरे की मां का दूध पीते हुए
पर सद्भावनापूर्ण ज़िबह के बारे में
उनकी कोई टिप्पणी नहीं मिलती

आधा-आधा भेजा दो तरह का होगा उसका
जिसने ईजाद किया बकरे का झटका इस्तेमाल
सचमुच यह बेहद शालीन है
मानवीय करुणा की रिआयत
धीरे-धीरे हलाल करना
स्वादिष्ट मांस के ज़र्रे-ज़र्रे में
गुंजाता रह सकता है आर्त्तनाद
और खाते हुए यदि अतीन्द्रिय शक्ति से
सुनने लगें मनुष्य ऐसी अवशेष प्रतिध्वनियां
तो यह बुद्ध और ईसा के लिए कलंक ही होगा
बेमज़ा बुरा स्वाद भी हो सकता है अलग से

इसीलिए झंझटविहीन सदय झटका
ज़िबह करते वक़्त की यह मुरव्वत
असम्भव है मनुष्यों के बाहर

पर आदमी के साथ
उलटा सुलूक करती है न्याय-व्यवस्था
धीरे-धीरे महीन और कुशल विधियों के साथ
कि ख़ून का छींटा तक नहीं ...
पर सिर्फ़ धरती है ऐसी
जो हर क्षण सुनती रहती है
बिसूरने की अश्रव्य आवाज़.

कौन है ये मन छलिया


कुन्दनलाल सहगल साहब से बहुत गहरे प्रभावित सी. एच. यानी चन्द्रू आत्मा ने अपने कैरियर का आग़ाज़ा १९४५ में किया था. ओ. पी. नैयर के संगीत निर्देशन में गाई गई उनकी रचना "प्रीतम आन मिलो" ने उन्हें सबसे ज़्यादा ख्याति दी. यहां यह बताना प्रासंगिक होगा कि इस गीत के बोल नैयर साहब की पत्नी श्रीमती सरोज मोहिनी नैयर के थे.

फ़िलहाल चन्द्रू आत्मा से सुनिये दो ख़ूब पुराने गाने जो मुझे बहुत पसन्द हैं.



पनघट पे मोरे श्याम बजाये मुरलिया



नैनों में दो नैन समाये

Saturday, February 6, 2010

मैं पिता हूँ दो चिड़ियाओं का


चन्द्रकान्त देवताले देश के मूर्धन्य कवियों में शुमार हैं. उनकी कुछ कविताएं और उन पर वीरेन डंगवाल का एक लम्बा आलेख कबाड़ख़ाने पर पहले भी लगाए जा चुके हैं. उनकी कविताओं के अंग्रेज़ी अनुवादों में मसरूफ़ हूं आजकल.

उनकी कविताएं उड़ान की कविताएं होती हैं और गहरी सम्वेदनाओं की. वे भारतीय मध्यवर्ग की आत्मा की आवाज़ बन कर बोलते हैं और उन्हें बारहा पढ़ते हुए यह अहसास होता है कि इस पाये के कवि हिन्दी में विरले ही बच रहे हैं. उनकी एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूं.


दो लड़कियों का पिता होने से

पपीते के पेड़ की तरह मेरी पत्नी
मैं पिता हूँ
दो चिड़ियाओं का जो चोंच में धान के कनके दबाए
पपीते की गोद में बैठी हैं
सिर्फ़ बेटियों का पिता होने से भर से ही
कितनी हया भर जाती है
शब्दों में
मेरे देश में होता तो है ऐसा
कि फिर धरती को बाँचती हैं
पिता की कवि-आंखें...

बेटियों को गुड़ियों की तरह गोद में खिलाते हैं हाथ
बेटियों का भविष्य सोच बादलों से भर जाता है
कवि का हृदय
एक सुबह पहाड़-सी दिखती हैं बेटियाँ
कलेजा कवि का चट्टान-सा होकर भी थर्राता है
पत्तियों की तरह
और अचानक डर जाता है कवि चिड़ियाओं से
चाहते हुए उन्हें इतना
करते हुए बेहद प्यार।

Tuesday, February 2, 2010

चोक लेती जिन्दगी



कुछ न कर पाने की शर्मिंदगी के साथ भी मानना पड़ेगा कि सारे कबाड़ी लंबी ताने सो रहे हों या "हाईबरनेसनिया" रहे हों तो भी एक वाचमैन है जो "आल ईज वेल" की पुकार लगाते हुए फेरे लगाता रहता है। अकेले दम पर पूरे मजमे को थामे रह सकता है। क्या आप बता सकते हैं कि यह पासबां कौन है। अल्लामा इकबाल उसका जिक्र अपनी एक नज्म में हमसाया-ए-आसमां के तौर पर कर गए हैं। अभी सोच रहा हूं कि किसी दिन वह भी बिगड़ गया या कबाड़खाने की चौकीदारी छोड़ कर कुछ और करने लगा तो....। ब्लागिंग को मजमा कहने से बिदकें नहीं जरा इसकी प्रवृत्तियों पर गौर फरमाएं।

बहरहाल भाई काफ्का ने कबाड़खाने पर ध्वनियों, दृश्यों का ऐसा सिलसिला बांध रखा है कि अनुभूतियों के उस बीहड़ में जाते हुए डर लगता है। वह ऐसी दुनिया का दरवाजा खोलता है जिससे छूट कर हम भाग चुके हैं।

वैसे हमारी इंद्रियों की हद में कई सतत उपस्थित आवाजें हैं जिन्हें हम नहीं सुनते। वे सदा हमारे आसपास हैं फिर भी नहीं सुनाई पड़तीं, ढेरों दृश्य हैं जो हर मिनट बदल रहे हैं लेकिन नहीं दिखाई देते, स्पर्श, गंध और स्वाद हैं जो नहीं महसूस होते। आप गौर करें तो पाएंगे कि ट्यूबलाइट गुनगुनाती है। लता मंगेशकर की तरह नहीं, झरती रोशनी के प्रवाह की तरह। उसकी गुनगुन में व्यवधान तब पड़ता है जब ट्यूबलाइट झपकती है। इसीसे या शायद बाईक या लुप्त प्राय स्कूटर में तेल खत्म हो जाने के बाद की संकटपूर्ण परिस्थिति से चोक लेने का मुहावरा ईजाद हुआ है जिसे मनुष्यों पर पूरी तरह फिट पाया गया है। वाहनों से गति सम्मोहित आदमी का गहरा रिश्ता है, शायद इसी कारण छोटे कद की लड़कियों को मेरे शहर में "नैनो" कहा जाने लगा है।

खैर कहीं भी रहें झींगुर बोलते हैं और कुत्ते रातों को रोते हैं। ट्रेन गुजरती है और सीटी भी बजाती है। घड़ी टिक टिक करती है, मदारी अपने काजल लगाए बंदरों के साथ फिजूल घूमते रहते हैं। कौए कराहते हैं। हर हाथ स्पर्श अलग होता है लेकिन हमारा ध्यान तभी झटका खाता है जब मिलाते समय कोई अपना हाथ अहसान के भाव बस छुला भर देता है या हमारे हाथ में रख कर बस भूल ही जाता है। हम जानते बूझते कहीं और भूले रहते हैं। एक दिन हम यह भी भूल जाते हैं कि हम कभी क्या करने की सोचते थे। हमें क्या करना सबसे अच्छा लगता है। हम सबसे बेहतर क्या कर सकते हैं। क्या करते हुए हम खो कर देश-काल की सीमा लांघ जाते हैं और एक अपरिमित ऊर्जा से आप्लावित हो जाते हैं। लेकिन उस ऊर्जा के बजाए हमें किसी मानवाकार मशीन का पुर्जा होना भाता है।

....यह किसकी जिंदगी हो जो हम जी रहे हैं ?