Wednesday, February 3, 2016

स्वजातिभक्ष उन्माद शेष, टंकार शेष, अट्ठहास शेष

जलसा से शेफ़ाली फ्रॉस्ट की कविताएं – 2

फ़ोटो - http://www.brookings.in/ से साभार

मृत्युगीत 

-  शेफ़ाली फ्रॉस्ट 

मदकाल सृजन का बीत चुका,
गढ़ चुका एक सम्मत विशेष,
मधुमिश्र वृन्द अब उखड़ गया
दृढ बध्य ताल पर नृत्य एक,
नतकर्तल पर सहमत जन की
वीभत्स शून्य का त्वरित नाद,
अब दृश्य अनेक पर भाव एक,
अनुभव अनेक, अनुभाव एक    


इकरंगी अस्ताचल में 
वृत्त नारंगी अब फैल चुका,
श्वेत एक, अब श्याम एक,
अधश्वेत एक, अध्श्याम एक
चौकोर धरा पर आवर्तित 
सरकटा सूर्य और चाँद एक,
संपूर्ण विलय, सम्पूर्ण प्रलय
विध्वंस स्मृति, परिणाम एक

कृशभार सिंधु का रन्ध्र रन्ध्र   
लील चुका अब कीच पुष्प,
निर्जल लहरों पर उलट उलट  
कामाग्निहीन, कामांध भुजंग    
पीता अपना ही रंग विशेष
गरल शेष, बस वमन शेष,
मुहं फाड़ खड़ी बस क्षुधा शेष

दिव्य पुलक में हुड़क हुड़क 
मूष गीध गीदड़ सियार,
भूखी सड़कों में सड़प सड़प
धरते स्वअनुज माँस पर दाढ़,
स्नेहिल जिह्वा का दन्तप्रवण
हन्त-मुग्ध अनुराग शेष
मानुषविहीन भयभीत निशा,
स्वजातिभक्ष उन्माद शेष,  
टंकार शेष, अट्ठहास शेष,
अब अंत शेष
बस अंत शेष !


रीपोस्ट : हुकुम सदर की फन्टश फूं

आठ साल पुरानी यह पोस्ट मित्र और बड़े भाई आशुतोष बरनवाल के लिए खासतौर पर लगाई जा रही है.


हुकुम सदर की ...
बीसेक साल पुरानी बात होगी. नैनीताल में पढ़ते हुए जब भी मौका मिलता था हम दो - चार दोस्त अक्सर रानीखेत की तरफ़ निकल जाया करते थे. रानीखेत से हम दोस्तों का अपनापा नैनीताल में पढ़ने वाले अपने दीप भाई की वजह से पैदा हुआ था और अब भी क़ायम है. दीप भाई रानीखेत के एक प्रतिष्ठित परिवार से ताल्लुक रखते हैं.

ख़ैर उन दिनों नैनीताल में पढ़ाई करते हुए, हमारी आवारागर्दी में शराब नामक तत्व की नई नई घुसपैठ हुई थी और झूठ क्यों कहूं उसमें काफ़ी मज़ा आने लगा था. शराब महंगी होती थी और पैसे नहीं होते थे. जैसे तैसे महीने में एकाध बार 'मिलौचा' करके चार-पांच यार लोग अद्धा खरीद लाते थे. उसी में बाका़यदा पार्टी हो जाया करती थी. तलब अलबत्ता हमेशा अधूरी ही संतुष्ट हो पाती थी.

इन विषम परिस्थितियों में दीप भाई रानीखेत में मिलने वाली इफ़रात दारू का आईना झलकाते झलकाते हमें जब तब वहां ले जाया करते थे. रानीखेत में कुमाऊं रेजीमेन्ट का मुख्यालय है और रानीखेत शहर देश के बचे-खुचे कैन्टोनमेन्टों में है. जाहिर है फ़ौजी भाइयों की मेहरबानी से सस्ती दारू की सप्लाई वहां सदैव ज़ोरों पर रहती है. यह शराब सस्ती होने के साथ साथ बिना मिलावट की भी होती थी. सुधीजन 'आर्मी की है' जुमले का महात्म्य समझते होंगे.

रानीखेत क्लब में हर बृहस्पतिवार को सिविलियनों के लिये चार बोतलें ऑफ़ीसर्स मैस से आती थीं. क्लब में एकाध साल पहले आग लगी थी और वह बिल्कुल उजड़ा हुआ रहा करता था. सन १९३२ से वहां काम कर रहे बहादुरदा (जो नब्बे से ऊपर के हो चुकने के बावजूद आज भी कार्यरत हैं) नाप नाप कर चार रुपये प्रति पैग के नियत रेट पर तबीयत हरी करने का सत्कर्म किया करते थे. चूंकि क्लब वीरान रहा करता था सो ज़्यादातर लोग वहां आग लगने के बाद से आना बन्द कर चुके थे और बृहस्पतिवार के इस कार्यक्रम की ख़बर बहुत गोपनीय तरीके से कुछ ही लोगों को मालूम थी. इस ख़बर को जानने वाले भाग्यशालियों में दीप भाई के कारण हम भी शामिल थे.

अक्सर बृहस्पतिवारों को हम लोग किसी न किसी बहाने से रानीखेत निकल जाया करते थे. बृहस्पतिवार की आधी रात को क्लब से मीठी नीमबेहोशी में बाहर निकलना रूटीन में शुमार हो गया था. हम लोग अक्सर वापस दीप भाई के घर की तरफ़ पैदल जाते हुए आर्मी स्कूल और एम ई एस कॉलोनी के आगे से गुज़रते थे. पहरेदार गश्त लगाया करते थे और हमें दूर से आता देख कर पहले सीटी बजाते थे, फिर ज़ोर से कुछ शब्द कहते थे और हमें नज़दीक से देख लेने के बाद उनका व्यवहार सामान्य हो जाता था. उनके बोले गये शब्द शुरू में मेरे ज़रा भी पल्ले नहीं पड़ा करते थे. असल में जानने की न ताब होती थी न इच्छा.

बाद में ध्यान देने पर अस्पष्ट तरीके से 'हुकुम सदर की फन्टश फूं' जैसा कुछ लगातार सुनाई देने लगा. अपनी ध्वन्यात्मकता के कारण यह काफ़ी आकर्षक लगने लगा.

एक बार मैं इस बात का ज़िक्र कई साल बाद अपने एक कर्नल दोस्त से कर बैठा. वह सुनकर हंसते हंसते दोहरा हो गया. सामान्य हो चुकने के बाद उसने जो बताया उसका सार कुछ यूं था:

इंग्लैण्ड में युद्ध के समय, रात को अपनी छावनियों की पहरेदारी कर रहे सैनिक को जब भी किसी तरह की मानवीय आहट सुनाई देती थी तो वह पूछा करता था : "Who comes there? Friend or foe?" इस की प्रतिक्रिया में दूसरी तरफ़ से मिलने वाले के उत्तर पर ही पहरेदार की अगली कार्रवाई निर्भर किया करती थी.

"Who comes there? Friend or foe?" ही इस पोस्ट के शीर्षक का ध्वन्यानुवाद है.

कैसे कह दूँ कि मुझे छोड़ दिया है उस ने

परवीन शाकिर की ग़ज़ल:

परवीन शाकिर (24 नवम्बर 1952 - 26 दिसंबर 1994)

कू-ब-कू फैल गई बात शनासाई की
उस ने ख़ुशबू की तरह मेरी पज़ीराई की

कैसे कह दूँ कि मुझे छोड़ दिया है उस ने
बात तो सच है मगर बात है रुस्वाई की

तेरा पहलू तेरे दिल की तरह आबाद रहे
तुझ पे गुज़रे न क़यामत शब-ए-तन्हाई की

वो कहीं भी गया लौटा तो मेरे पास आया
बस यही बात है अच्छी मेरे हरजाई की

उस ने जलती हुई पेशानी पे जो हाथ रखा
रूह तक आ गई तासीर मसीहाई की



राग दरबारी में इसे पिरोया है उस्ताद मेहदी हसन ने -

जो काफ़ी था कल, आज उतर रहा है सड़कों पर उनींदा

जलसा से शेफ़ाली फ्रॉस्ट की कविताएं – 1 

फ़ोटो urbanruralfabric.blogspot.com से साभार

क्या ?
-शेफ़ाली फ्रॉस्ट

क्या यह चौराहे पर सिटपिटाई हुई औरत
हरे कनटोप में संभाले दुधमुंहा बच्चा
हार सकती है अपने पांच पति, लाल बत्ती के जुए में ?
उतार सकती है गले में बंधा रतजगों का तमगा ?
बढ़ कर आगे उलट सकती है अमरुद वाले का ठेला
'दो रूपए का एक दो, वर्ना शोर मचाउंगी!
तुम लुटेरे हो, छीन रहे हो बच्चे से मेरे पेड़ पर झूलने का हक़
और टहनी पर लटक जाने का हक़,
जो सिर्फ़ मेरा है !'

क्या तोड़ सकता है
रोडवेज़ की नीली बस का ड्राइवर रामगुलाम, चढ़ा कर पहिया
सूर्या प्रॉपर्टीज़ की खाली पड़ी, दस मंज़िला इमारत
जहाँ घुप्प अँधेरे में चाँद की अर्थी,
दे रही है कन्धा उन पांच परिवारों को,
जो जकड कर बाजुओं में एक दूसरे, फिर तीसरे को
मर गए शहर की सर्दी से,  
उन्हें और कोई घर नहीं मिला 

फैब इण्डिया की सुनहरी किनारी निगल रही है उस लड़की का दुपट्टा,  
जो बीच ट्रैफिक में खड़ी है मेरे लिए
कटोरा भर कड़वे तेल से भरे मीठे उलाहने के साथ
'अठन्नी डाल रही हो, यह है तुम्हारा शनि का दान?'
दस रूपए में पांच बेच रहा है बॉल पेन, नारियल और रूमाल
खटखटा कर बंद गाड़ियों के शीशे
बाजू से नाक पोंछने वाला अधनंगा लड़का ।  
वो सड़क किनारे पैदल चलता,
पचास पैसे का एक गिलास पानी पी कर, कुल्ले करता
तेल लगे बालों में कंघी घुमाता आदमी
उतार सकता है धूल से भरा चेहरा,  
जो शहर की गलियों ने उसे बिना पूछे पहनाया है ?

उड़ सकता है क्या राजीव चौक पर, चीर कर मैट्रो की छत
पीली लाइन की भीड़ में अटका, वो मॉल में टाइल पोंछने वाला लड़का
जिसने आज लड़की देखी, नवेली !
जो हवाई जहाज में बैठ कर कल जा रही है सिंगापोर,
सधे हुए मांबाप के साथ
जहाँ वो ढांक देगी उबासियों से अपनी 
आइफ़िल टावर, स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी, लीनिंग टावर ऑफ़ पीज़ा
और वो जितनी भी इमारतें हैं जिन्हे देखा है उस लड़के ने,  
कुओनी ट्रेवल के परचे में
पहली फ्लोर के एस्कलेटर से निकलते ही, बास्किन रौबिन के बाजू वाले बाथरूम के पास 

छोटी, काली गाड़ी में चालीस पार की औरत
जो हरी बत्ती के बीचों बीच  
रिवर्स गियर से निकाल रही है, बीस साल में पहली बार,  
पति की नामुरादी, ससुर का गुस्सा
बिना सिन्दूर की माँग,
बच्चे की फीस, चावल के दाम,
बिफ़र रहा है कमख़याली पर उसकी 
वो हरी पट्टी वाले स्वेटर का आदमी,   
ऑफिस कैब से उगल दिया जाता है जो 
साइबर पार्क की सीढ़ियों पर,
अंदर और अंदर,
नीचे और नीचे,
जो हर लंच में बाहर आ कर गुमटी पर कॉफ़ी पीता है, शकरकंदी खाता है
ठहाके लगाता है उन पट्टियों पर,
जो रौंद रौंद कर उसका सीना, सिलाई और ऊन से 
भेजती हैं चिट्ठियां, हर महीने की पहली तारीख
"बाथरूम की छत धसक गयी पिछली बरसात 
ब्लड टेस्ट वाले का उधार चुकाना है इस बार ।"

उतार सकता है कपड़े,
खुले आसमान तले, वो बंगाली रिक्शेवाला 
जो आगे वाले ऑटो की पीली पिछ्वाड़ी पर देखता है
कोकाकोला पीती हीरोइन
झटकता है माथे का पसीना, बाएं हाथ की मुड़ी हुई उंगली से,  
एक हाथ से घुमाता टेढ़ा पहिया
दूसरे से उठाता है, कीचड़ में गिरा मोटा आदमी
तरेरती है खटकती आँख,
टैरिलीन की पीली साड़ी में उसकी जोरू
'ए जी, इससे तो गाँव क्या बुरा था?' 

वो आदमी मुँह से निकालता हुआ झाग
जो खड़ा है हाथ लपेटे उखड़ी दीवार के प्लास्टर से
जिसके शरीर के नीचे का हिस्सा
गीला हो रहा है
और जो अब नहीं सोचता कि 
सड़क पार करती धानी साड़ी में लिपटी औरत उसे देख कर मुहं बिचका रही है,
कैसे कहे उस बड़ी गाड़ी में चढ़े आदमी से
"तेल लगी मुस्कान से तुमने दिल नहीं खींचा मेरा! 
भर दिया बस्ते में मेरे  
वो ढेर सारा आक्रोश,
जो काफ़ी था पहनने के लिए कल !
आज उतर रहा है सड़कों पर उनींदा,
सैंकड़ों पहियों की मशक्कत के बाद
टैम्पो के पिछवाड़े में
पहिये की रौंद में,   
कॉफ़ी की दुकान में
शनि के दान में,
अमरुद के पेड़ में
मैट्रो की चेन में
भीड़ इतनी है लेकिन
आदमी कुल्ला करे की तक़रार
प्यार करे कि मन भर सिन्दूर डाल कर  
ताकता रहे आसमान
निगल जाता है यह शहर 
खिड़की से आँख
दरवाज़े से धड़
अकेले ही अकेले
अलग ही अलग ।"

रफ़ी साहब की दुर्लभ तस्वीर


कमाल की तस्वीर.
साल 1975.
शिकागो.
एक नहीं दो-दो मोहम्मद.

इंतज़ार हुसैन का निधन

इंतज़ार हुसैन को पाकिस्तान ही नहीं, बल्कि पूरे उर्दू साहित्य में मौजूदा दौर के अहम कहानीकारों में से एक माना जाता है. उन्होंने मंगलवार को लाहौर में अंतिम सांस ली, जहां कई दिनों से एक अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था. उन्हें निमोनिया और बुख़ार था. उनको बुधवार को सुपुर्दे ख़ाक किया जाएगा.
इंतज़ार हुसैन का जन्म 21 दिसंबर 1925 को बुलंदशहर ज़िले के डिवाई में हुआ था. विभाजन के बाद वे पाकिस्तान जाकर लाहौर में रहने लगे थे. उन्होंने उर्दू और अंग्रेज़ी साहित्य में एमए की डिग्रियां हासिल की थीं. उन्होंने उर्दू के नामी अखबारों और पत्रिकाओं में काम किया था. अपने समय को ईमानदारी के साथ दर्ज करने वाले इस लेखक ने पांच उपन्यास और सात कहानी-संग्रहों की रचना की.   
उनकी कहानियों का पहला संग्रह 'गली कूचे' 1953 में प्रकाशित हुआ था. इसके अलावा उन्होंने कई अनुवाद किए और यात्रा संस्मरण भी लिखे. उनके उर्दू कॉलम भी किताब की शक्ल में प्रकाशित हुए थे और वो अंग्रेजी में भी कॉलम लिखते थे. उनके एक उपन्यास और चार कहानी संग्रहों का अंग्रेजी में अनुवाद हुआ.
वो पहले पाकिस्तानी थे जो 2013 में अंतरराष्ट्रीय बुकर प्राइज के लिए शॉर्टलिस्ट हुए.
कबाड़खाने की श्रद्धांजलि.

देखिये कबाड़ी इरफ़ान का लिया इंतज़ार हुसैन का एक पुराना साक्षात्कार -

 

Tuesday, February 2, 2016

धरमेंदर और गद्दार की खोपड़ी - पिक्चर के किस्से - 1


पिक्चर के किस्से - 1

नाहिद में 'यादों की बारात' लगी थी. जमाने के टाइम के तकाज़े के हिसाब से हम चार दोस्त जीनातमान के जलवे और धरमेंदर की जन्मजात हौकलेटपंथी देखने के उद्देश्य से सेकंड क्लास की सबसे आगे की सीटों पर काबिज़ थे. टिकट पांच लिए थे पर नब्बू के नहीं आ सका था. हममें से सबसे स्याने मुरुगन उस्ताज ने पांचवां टिकट ब्लैक में निकाल लेने में सफलता हासिल कर ली थी. पिक्चर शुरू होने तक वह महात्मा नहीं आये थे जिन्हें मुरुगन ने टिकट बेचा था.

पन्द्रह मिनट बाद ठीकठाक डीलडौल वाला एक साया मेरे बगल वाली ब्लैक सीट पर बैठा और बैठने के दस ही सेकंड के भीतर मुंह पर गमछा डालकर बाकायदा सो गया. एक मिनट बाद खर्राटे शुरू हो गए. मैं थोड़ी देर को असमंजस में आ गया लेकिन जीनातमान के जलवे उस असमंजस पर भारी पड़े. मेरा ध्यान तब टूटा जब उस साए ने गमछा अपने मुंह से हटाकर मुझसे फुसफुसाते हुए पूछा - "धरमेंदर ने शेट्टिया की खोपड़ी फोड़ दी क्या?" मेरे ना कहने पर वह फिर निद्रालीन हो गया.

इंटरवल हुआ पर वह सोया रहा. मरियल पीली रोशनी में वह वाकई पहलवान टाइप का लग रहा था. मूमफली, पपन करारे और ठंडी कोल्डींग बेचनेवालों की पुकारें भी उसके मुंह से गमछा न उठवा सकीं. हम चारों दोस्तों ने बाहर सिगरेट का लुत्फ़ लेते हुए गमछाधारी के बारे में एकाध मज़ाक किये. हॉल के भीतर उसका मज़ाक उड़ा सकने की हमारी हिम्मत नहीं थी क्योंकि हम चार मिलकर उसकी एक जांघ के बराबर नहीं बैठते थे.

कोई एक घंटे की खर्राटापूरित नींद बाद गमछा फिर से हटा और फुसफुसाते हुए पहलवान ने पूछा - "धरमेंदर ने शेट्टिया की खोपड़ी फोड़ दी क्या?"

मैंने हाँ जैसा कुछ कहा.

"हट साला. वही तो देखना था."

पहलवान ने खीझते हुए ज़मीन पर ख़ूब सारा थूकते हुए हॉल के बाहर का रुख किया.


Monday, February 1, 2016

2015 के सबसे प्रसिद्ध फ़ोटोग्राफ़्स - 5

अमेरिका के लॉस एंजेल्स में अलबर्ट आइन्श्टाइन की तरह दिखने के
एक आयोजन में इकठ्ठा लोग. बीच में 81 साल के बेनी वेसर्मैन हैं.
यह आयोजन गिनीज बुक में शामिल हुआ और
इससे हुई आय विकलांग बच्चों की शिक्षा के लिए दान दी गयी.
फ़ोटोग्राफ़र: लूसी निकलसन
लॉस एंजेल्स
27 जून 2015


टाइम्स स्क्वायर, न्यूयॉर्क 

फ़ोटोग्राफ़र: इदरीस लतीफ़
न्यूयॉर्क
26 जनवरी 2015

चिली के साथ एक फुटबॉल मैच में लिओनेल मेसी

फ़ोटोग्राफ़र: इवान आल्वारादो
सान्तियागो, चिली
4 जुलाई 2015

2015 के सबसे प्रसिद्ध फ़ोटोग्राफ़्स - 4

बर्फ़ से बने मॉडल्स की प्रदर्शनी में बर्फ़ का रेल इंजन 

फ़ोटोग्राफ़र: किम क्यून-हून 
चीन
4 जनवरी 2015

चीले में काल्बूको ज्वालामुखी

फ़ोटोग्राफ़र: राफ़ाएल आरेनास
हवाना, क्यूबा
22 अप्रैल 2015
फ़्रांस में लूसान के नज़दीक अरंडी के खेत में एक पेड़

फ़ोटोग्राफ़र: डेनिस बालीबोस
फ़्रांस
23 अप्रैल 2015

इसाबेल मेरामोंतेस के शिल्प - 3