पहली तस्वीर जसुली दताल की मूर्ति की है बाकी शौका समाज और वहां के लैन्डस्केप. सभी फ़ोटो डॉ. सबीने लीडर के खींचे हुए हैं और एक कॉफ़ीटेबल बुक Uttaranchal: A Cultural Kaleidoscope में छप चुके हैं.


































तोवा की एक कविता का अनुवाद प्रकाशित किया था. उस पोस्ट में अनजाने में रह गईं गलतियाँ खोजते - खोजते मन हुआ कि अन्ना की एक और कविता आपको पढ़वा दी जाय. सो, देर काहे की.. लीजिए प्रस्तुत है यह कविता...


अब्दुल बिस्मिल्लाह, वरिष्ठ साहित्यकार : कई महिलाओं ने अंतरंग प्रसंगों पर लिखा है। चाहे अपने जीवन में आए पुरूषों से संबंधों को लेकर हो या पति को लेकर। माना जा रहा है कि यह काफी साहस का काम है, खासकर पति के क्रियाकलापों पर। अभी तक घर की महिलाएं उनके कारनामों पर टिप्पणी करने का साहस भी नहीं कर पाती थीं। भयभीत रहती थीं, लज्जा के साथ-साथ संकोच भी करती थीं। जब पढ़-लिखकर उनमें चेतना आईं तो वह बात कहने लगीं जिसे कहने में उन्हें संकोच होता था। साहस आया तो वह खुलकर कहने लगीं। वर्तमान दौर में बाजार इस कदर हावी है कि चीजों को माल बनाकर बेचना एकमात्र लक्ष्य हो गया है। इसमें मीडिया भी व्यापक तौर पर काम कर रहा है। ऐसी किताबें छपती हैं जो बाजार लुभाता है। हालांकि यह पूरी स्त्री जाति की कहानी नहीं है। स्त्रियों का एक वर्ग है जो यह काम कर रहा है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि स्त्रियों पर व्यापक अत्याचार हुआ है। लेकिन ऐसे अनुभवों को शब्दों में पिरोने का काम गांव की स्त्रियां नहीं, महानगरों में रहने वाली स्त्रियां कर रही हैं। संस्कृत में ए क श्लोक है, ‘सत्यम ब्रूयात, प्रियम ब्रूयात, न ब्रूयात सत्यमप्रियं’। हमारी संस्कृति में यह बात रही है। इसलिए किसी के बारे में कुछ बोलने या लिखने के पहले इसका ध्यान जरूर रखा जाना चाहिए । इसमें संदेह नहीं कि आत्मकथा या कहानी के जरिए अपनी या अपने पति की जिंदगी के अंतरंग प्रसंगों को लिखा जाना एक साहस का काम है। इसे नकारात्मक ढंग से न लेकर सकारात्मक ढंग से लिया जाना चाहिए । ए क स्त्री ने जो झेला है, भोगा है, वह लिख रही है। लेकिन सवाल यह है कि इसका साहित्यिक स्तर क्या है। आ॓मपुरी के मामले में बाजार एक बड़ा फैक्टर है। स्त्रियों द्वारा अंतरंग प्रसंगों को लिखा जाने का मामला इतना सरल नहीं है जितना समझा जा रहा है। यह आत्मकथा है तो साहित्यिक स्तर देखा जाना चाहिए ।
अनामिका, कवियित्री : कुछ घाव छोटे होते हैं और जब पछुवा चलती है तो गुमचोट या
गुमजोड़ों का दर्द उभरकर सामने आ जाता है। पश्चिम का प्रभाव बुरा नहीं होता क्योंकि
गांधीजी से लेकर रवींद्रनाथ टैगोर ने कहा था खिड़कियां खुली रखी जानी चाहिए । इससे
प्रभावित लेखनी भी बुरी नहीं है। सामान्य तौर पर जब लड़कियां ससुराल जाती हैं तो कहा
जाता है कि दोनों घरों के सुख-दुख तुम्हें देखने हैं, मुंह सील कर रखना। पिटाई खाकर भी वह सब कुछ सहती है, खुद को भूल जाती है, कई दिक्कतों के साथ घर-गृहस्थी चलाते-चलाते वह खुद को हाशिये पर ला खड़ा करती हैं। स्त्री-पुरूष संबंधों में दो तकलीफें हैं, पहला कामना का सरप्लस मतलब यौनानुराग। हर स्त्री चाहती है कि उसका पुरूष जितेंद्रिय हो, लेकिन घर-गृहस्थी में फंसे होने के कारण स्त्री खुद पर ध्यान नहीं देती और पुरूष दूसरों के आकर्षण में रीझ जाता है। दूसरा है गुस्सा, बाहर का गुस्सा घर में उतारा जाता है। पुरूषों को बाहर में काफी कुछ झेलना होता है, इस कारण घर में स्त्री साफ्ट टारगेट बनती है। स्त्री-पुरूष की लड़ाई न तो दो वर्गों की लड़ाई है और न ही दो जातियों के बीच। यह गोरे-काले की भी लड़ाई नहीं है और न ही यहां सत्ता परिवर्तन का व्याकरण ही लागू होता है। स्त्री आंदोलन प्रतिशोध का आंदोलन नहीं है। परिवार में पीढ़ियों के बीच जेंडर का मुद्दा संवाद के जरिए सुलझाया जा सकता है। यहां भेड़-भेड़िये का रिश्ता नहीं है। तसलीमा नसरीन से लेकर मैत्रेयी पुष्पा ने वही लिखा है जो उसने पब्लिक स्फेयर में महसूस किया। जब वे किसी संपादक से मिलती है, गॉड फादर से मिलती है या किसी और से। प्रेम तो सबसे बड़ा लोकतांत्रिक स्पेयर है। यदि आप किसी स्त्री से पूछें तो वह यही कहेगी तो उसका शरीर तो ए कमात्र ढोल है जिसे वह जबर्दस्ती ढोने के लिए मजबूर हैं। यही कारण है कि पब्लिक स्पेयर में जाने से वह घबराती है कि पता नहीं क्यों होगा। जो स्त्रियां ऐसे लिख रही हैं उनका संवाद आने वाली पीढ़ियों से है, किशोरों से है, युवाओं से है। अंतरंग संबंधों को लेकर उनको शर्मिंदा करना ए क भाव होगा लेकिन इसके जरिए संदेश देने का काम कर रही हैं।
सामान्यतौर से लोग नकारात्मक उदाहरणों से सीखते हैं। यह इसलिए लिखा जा रहा है कि
आने वाली पीढ़ी अपनी मां, बहनों की तकलीफों को समझे। इसलिए संदर्भ सहित बातें रखी
जाती हैं। क्योंकि जाने-अनजाने लोग ऐसा करने से एक बार सोचें। यह लेखन आत्मनिरीक्षण का एक अवसर देता है।






लंबे अरसे से सोचता था कि नैनीताल में कोई फिल्म फेस्टिवल किया जाए. दोस्तों के साथ मिलकर योजना बनाने की कोशिश भी की. लेकिन कभी कुछ तय नहीं हो पाया. इस बार पता चला कि अपने ही कुछ पुराने साथी वहां पर फिल्म फेस्टिवल की तैयारी कर रहे हैं तो मैं भी साथ में जुट गया. फेस्टिवल क़रीब आने पर दोस्तों से मिलने की ख़्वाहिश लिए मैं दिल्ली से नैनीताल के लिए निकल पड़ा. हमें उत्तराखंड संपर्क क्रांति से हल्द्वानी तक जाना था. साथ में भारत भी था. शाम चार बजे की ट्रेन थी लेकिन हम तीन बजे ही स्टेशन पहुंच गए. ऐसा बहुत कम हुआ है कि संपर्क क्रांति वक़्त पर चले. यही सोचकर पिछले महीने जब हल्द्वानी जाने के लिए स्टेशन पहुंचा तो ट्रेन प्लेटफॉर्म छोड़ रही थी. तबीयत कुछ ख़राब थी. ऐसे में शारीरिक थकान तो थी ही मानसिक तौर पर भी बड़ी मुश्किल हुई. उस दिन टिकट कैंसल कर दूसरे दिन ट्रेन पकड़ी थी. इस बार पहले से ही तय कर लिया था कि निर्धारित वक़्त से पहले ही प्लेटफ़ार्म पर पहुंच जाएंगे. नतीज़ा ये हुआ कि पूरे एक घंटे प्लेटफ़ार्म पर इंतज़ार करना पड़ा. 

ये सज्जन दिल्ली वाले नहीं मेरे नए बने दोस्त पत्रकार हरिश्चंद्र चंदोला थे जो दिन के पांच बजे अपने लैपटाप की स्क्रीन घूरते हुए, थाली में भात के साथ आमलेट सानने का प्रयास कर रहे थे। सारे बाजार, दुकानें बंद होने के कारण उन्हें यह बेमेल खाना अब मिला था। कोई छह महीने पहले बरेली में पहली बार उनका जिक्र मेरे कवि चचा वीरेन डंगवाल ने करते हुए बताया था कि कई देशों में रिपोर्टिंग करने, खासतौर से खाड़ी देशों में युद्ध कवर करने के बाद, वे इन दिनों जोशीमठ (उत्तरांचल) में आलू की खेती कर रहे हैं। भालुओं से आलुओं की रखवाली के लिए उन्हें रातों को जागना पड़ता है। चचा के बताने का ढंग कुछ ऐसा था कि उनसे मिलने जोशीमठ जा पहुंचा। पता चला देहरादून चले गये हैं। देहरादून में उस दिन उत्तराखंड राज्य की पहली सरकार शपथ लेने वाली थी। जब उनसे मुलाकात हुई तब पता चला कि उत्तर-पूर्व में उनके जीवन का खासा बड़ा हिस्सा गुजरा है। साठ के दशक में वे टाइम्स ऑफ इंडिया के कोहिमा संवाददाता थे और प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने उन्हें नगा उग्रवादियों और सरकार के बीच मध्यस्थ बनाया था। वहीं उन्होंने एक नागा लड़की से शादी की थी। दिलचस्प राजनीतिक परिस्थितियों में उन्हें एक खोनोंमा खेल (गांव) के एक नगा मुखिया ने गोद भी ले लिया था।

सर्राफा में अजनबी होने के कारण कोई उन्हें गिरवी रखने को तैयार ही नहीं था। जो तैयार भी हुए, वे हजार- पांच सौ से ज्यादा नहीं दे रहे थे। दरअसल हमें संदिग्ध समझकर कुछ खेल रहे थे, कुछ टरका रहे थे। दोपहर बाद हम उन्हें बेचने के लिए मोलभाव करने लगे। जिन दो-एक सुनारों ने खरीदने में दिलचस्पी दिखाई, वे ढाई-तीन हजार ही दाम लगा रहे थे जबकि सिर्फ अंगूठियां ही कम से कम, पन्द्रह हजार की थीं। ख्याल आया कि क्यों न इन्हें होटल मालिक के पास ही गिरवी रख दिया जाये। साथ ही यह भी विचार किया गया कि अगर उसने भांप लिया कि हम लोगों की जेब एकदम खाली है तो वह अपना किराया और खाने का बिल काटकर हमें चलता कर देगा, फिर क्या होगा। उसके बाद गिरवी रखने के लिए भी कुछ नहीं बचेगा। शाम को एक मारवाड़ी सुनार ने सलाह दी कि हम स्टेशन के पिछवाड़े जायें, जहां पूर्वोत्तर में सुअर बेचने वाले ठेकेदार रहते हैं। वे पुरबिया होने के नाते हमारी मदद कर देंगे। तपाक से वहां पहुंचे तो पाया कि झुंड के झुंड किकियाते सुअरों के बीच चौकियों पर ठेकेदारों की गद्दियां थीं जहां कुप्पियां जल रही थीं। वे सुअरों की गुर्राहट व जीवन के आखिरी क्षणों में की जा रही मंत्रणा के बीच मच्छरदानियों में सोने की तैयारी कर रहे थे। पूर्वोत्तर में सबसे अधिक सुअर पंजाब, उत्तर प्रदेश और बिहार से जाते हैं। ये ठेकेदार नहीं, उनके नौकर थे जो सुअरों की रखवाली के लिए रात में वहां टिके हुए थे। उनसे बात की तो पता चला कि उन्हें दिहाड़ी और खुराकी मिलती है लिहाजा वे अंगूठी गिरवी रखने की हालत में नहीं थे। हम लोग वापस लौट आये।