फेरु
फ़ेरु अमरेथू रहता है
वह कहार है
काकवर्ण है
सृष्टि वृक्ष का
एक पर्ण है
मन का मौजी
और निरंकुश
राग रंग में ही रहता है
उसकी सारी आकान्क्षाएं - अभिलाषाएं
बहिर्मुखी हैं
इसलिए तो
कुछ दिन बीते
अपनी ही ठकुराइन को ले
वह कलकत्ते चला गया था
जब से लौटा है
उदास ही अब रहता है।
ठकुराइन तो बरस बिताकर
वापस आई
कहा उन्होंने मैंने काशीवास किया है
काशी बड़ी भली नगरी है
वहां पवित्र लोग रहते हैं
फेरू भी सुनता रहता है।
('तुम्हें सौंपता हूं' से साभार)
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Saturday, February 23, 2008
Monday, December 10, 2007
बाबा त्रिलोचन और जीने की कला
कल त्रिलोचन जी का देहावसान हो गया। भाषा में उनकी सतत प्रयोगधर्मिता और जीवन के प्रति गहरा अनुराग उन्हें एक अद्वितीय कवि बनाता है। जीवन के बाद के वर्षों में बीमारी और नैसर्गिक विस्मृति से लगातार लड़ते हुए भी उन्होने काव्यकर्म नहीं छोडा। उनके आखिरी कविता संग्रह 'जीने की कला' का ज़िक्र तक करने में हिन्दी पत्रिकाओं ने कृपणता बरती। यह हमारी भाषा के झंडाबरदारों का दोगलापन तो है ही, खुद हिन्दी भाषी समाज भी इस दारिद्र्य के लिए ज़िम्मेदार है।
बाबा त्रिलोचन से मेरी आखिरी मुलाक़ात करीब दो साल पहले हरिद्वार में हुई थी। वे तब भी काफी बीमार थे। मुझे याद है उन के सिरहाने 'निराला ग्रंथावली' के सारे खंड करीने से धरे हुए थे। मुझे सुखद आश्चर्य हुआ, उन्हें मेरी याद थी और १९९२ में नैनीताल की उस शाम की भी जब उन्होने मुझे कुपात्र के पहले कविता संग्रह का विमोचन किया था। बतौर उपहार मुझे उन्होने अपने हस्ताक्षरों समेत अपने अन्तिम कविता संग्रह 'जीने की कला' की एक प्रति दी। यह संग्रह २००३ में किताबघर से छपा था। यानी बाबा की आयु उस संग्रह के प्रकाशन के समय ८६ वर्ष थी। संग्रह की अधिकतर रचनाएं २००२ की हैं। हो सकता है हमारे महान आलोचकों को उस संग्रह में कोई नया वाद (या विवाद) देखने को नहीं मिला हो, लेकिन इस अदम्य कवि की अदम्य काव्य ऊर्जा का आदर तो किया ही जा सकता था।
संग्रह में बाबा भाषा का अपना खास सौष्ठव बनाए रखते हैं, और जीवन की छोटी छोटी चीजों को ओब्ज़र्व करते चलते हैं। और उनके भीतर बसा खिलन्द्ड़ मसखरा तो लगातार अपनी चिर परिचित सूरत दिखाता ही रहता है। उसी संग्रह से पढिये एक कविता 'धरम की कमाई':
सौंर और गोंड स्त्रियाँ चिरौंजी बनिए की दुकान
पर ले जाती हैं। बनिया तराजू के एक पल्ले पर नमक
और दूसरे पर चिरौंजी बराबर तोल कर दिखा देता है
और कहता है, हम तो ईमान की कमाई खाते
हैं।
स्त्रियाँ नमक ले कर घर जाती हैं। बनिया
मिठाइयां बनाता और बेचता है। उस की दुकान
का नाम है। अब वह चिरौंजी की बर्फी बनाता है,
दूर दूर तक उस की चर्चा है। गाहक दुकान पर
पूछते हुए जाते हैं। कीन कर ले जाते हैं, खाते और खिलाते
हैं।
बनिया धरम करम की चर्चा करता है। कहता
है, धरम का दिया खाते हैं, भगवान् के गुण गाते हैं।
(२.११.२००२)
*इसे मोहल्ले पर भी देखें
बाबा त्रिलोचन से मेरी आखिरी मुलाक़ात करीब दो साल पहले हरिद्वार में हुई थी। वे तब भी काफी बीमार थे। मुझे याद है उन के सिरहाने 'निराला ग्रंथावली' के सारे खंड करीने से धरे हुए थे। मुझे सुखद आश्चर्य हुआ, उन्हें मेरी याद थी और १९९२ में नैनीताल की उस शाम की भी जब उन्होने मुझे कुपात्र के पहले कविता संग्रह का विमोचन किया था। बतौर उपहार मुझे उन्होने अपने हस्ताक्षरों समेत अपने अन्तिम कविता संग्रह 'जीने की कला' की एक प्रति दी। यह संग्रह २००३ में किताबघर से छपा था। यानी बाबा की आयु उस संग्रह के प्रकाशन के समय ८६ वर्ष थी। संग्रह की अधिकतर रचनाएं २००२ की हैं। हो सकता है हमारे महान आलोचकों को उस संग्रह में कोई नया वाद (या विवाद) देखने को नहीं मिला हो, लेकिन इस अदम्य कवि की अदम्य काव्य ऊर्जा का आदर तो किया ही जा सकता था।
संग्रह में बाबा भाषा का अपना खास सौष्ठव बनाए रखते हैं, और जीवन की छोटी छोटी चीजों को ओब्ज़र्व करते चलते हैं। और उनके भीतर बसा खिलन्द्ड़ मसखरा तो लगातार अपनी चिर परिचित सूरत दिखाता ही रहता है। उसी संग्रह से पढिये एक कविता 'धरम की कमाई':
सौंर और गोंड स्त्रियाँ चिरौंजी बनिए की दुकान
पर ले जाती हैं। बनिया तराजू के एक पल्ले पर नमक
और दूसरे पर चिरौंजी बराबर तोल कर दिखा देता है
और कहता है, हम तो ईमान की कमाई खाते
हैं।
स्त्रियाँ नमक ले कर घर जाती हैं। बनिया
मिठाइयां बनाता और बेचता है। उस की दुकान
का नाम है। अब वह चिरौंजी की बर्फी बनाता है,
दूर दूर तक उस की चर्चा है। गाहक दुकान पर
पूछते हुए जाते हैं। कीन कर ले जाते हैं, खाते और खिलाते
हैं।
बनिया धरम करम की चर्चा करता है। कहता
है, धरम का दिया खाते हैं, भगवान् के गुण गाते हैं।
(२.११.२००२)
*इसे मोहल्ले पर भी देखें
बाबा त्रिलोचन:धरती का कवि अनंत में

बाबा नहीं रहे।
हम सबके बाबा त्रिलोचन २० अगस्त १९१७ को चिरानी पट्टी, सुल्तानपुर में जन्मे और ९ दिसम्बर २००७ को दिल्ली में अनंत यात्रा पर चले गए। इस कवि, लेखक, कोष निर्माता और संपादक का जीवन और साहित्य विविध और विपुल है। अपने अन्तिम वर्षों वे लगभग भुला से दिए गए थे।हिन्दी साहित्य और हिन्दी भाषी समाज का यह कमीनापन , यह क्रूरता नयी बात नहीं है।
'कबाड़खाना ' बाबा त्रिलोचन को याद करते हुए कृतज्ञता पूर्वक यह भी याद कर रह है कि १९९२ में अशोक पांडे के कविता संग्रह 'देखता हूँ सपने' का विमोचन उन्होंने ही किया था। शमशेर, नागार्जुन,केदार के बाद हिन्दी का यह बड़ा स्तंभ ढहा है। नमन।
हम सबके बाबा त्रिलोचन २० अगस्त १९१७ को चिरानी पट्टी, सुल्तानपुर में जन्मे और ९ दिसम्बर २००७ को दिल्ली में अनंत यात्रा पर चले गए। इस कवि, लेखक, कोष निर्माता और संपादक का जीवन और साहित्य विविध और विपुल है। अपने अन्तिम वर्षों वे लगभग भुला से दिए गए थे।हिन्दी साहित्य और हिन्दी भाषी समाज का यह कमीनापन , यह क्रूरता नयी बात नहीं है।
'कबाड़खाना ' बाबा त्रिलोचन को याद करते हुए कृतज्ञता पूर्वक यह भी याद कर रह है कि १९९२ में अशोक पांडे के कविता संग्रह 'देखता हूँ सपने' का विमोचन उन्होंने ही किया था। शमशेर, नागार्जुन,केदार के बाद हिन्दी का यह बड़ा स्तंभ ढहा है। नमन।
बाबा की एक कविता:
परिचय की गाँठ
यूं ही कुछ मुस्काकर तुमने
परिचय की वो गांठ लगा दी!
था पथ पर मैं भूला भूला
फूल उपेक्षित कोई फूला
जाने कौन लहर ती उस दिन
तुमने अपनी याद जगा दी।
कभी कभी यूं हो जाता है
गीत कहीं कोई गाता है
गूंज किसी उर में उठती है
तुमने वही धार उमगा दी।
जड़ता है जीवन की पीड़ा
निस्-तरंग पाषाणी क्रीड़ा
तुमने अन्जाने वह पीड़ा
छवि के शर से दूर भगा दी।
(बाबा का फोटो इरफान कबाड़ी के संग्रह से साभार)
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