सुन्दर चन्द ठाकुर की ताज़ा कविता-सीरीज़ का अन्तिम हिस्सा पेश है -
मैं हूं - ३
सुन्दर चन्द ठाकुर
मैं डर से बाहर निकल आया हूं
इसलिए अब कह सकता हूं कि ईश्वर नहीं है कहीं
ईश्वर डर में बैठा रहता है भूत की तरह
भूत नहीं है (मैंने नहीं देखा उसे आज तक)
इसलिए ईश्वर भी नहीं है (उसे भी नहीं देख पाया मैं)
मुझे कल का डर नहीं अब
कल मेरा क्या हो जाएगा?
लुट जाऊंगा?
कल मैं नहीं रहूंगा!
कल मैं नहीं ही तो रहूंगा!
(कृपया याद रखें)
पृथ्वी से एक खरब प्रकाशवर्ष दूर भी ऐसा ही ब्रह्माण्ड है
खगोल पिण्डों और ग्रह-नक्षत्रों से भरा हुआ
समय नहीं है कहीं
सब कुछ स्थिर है
आदि से अनन्त तक
आदि और अनन्त भी नहीं है
जैसे मोक्ष नहीं है
सिर्फ़ धर्म हैं झूठमूठ के
टाइमपास के साधन
इन्सान में आदतें हैं
गुणसूत्रों में फ़ीड हो गई कुछ दूसरों से अर्जित
बिना आदतों के मुश्किल है टाइम पास
मैं एक हंसती हुई लड़की को एक हंसती हुई लड़की की तरह देखता हूं
एक रोते हुए बच्चे को एक रोते हुए बच्चे की तरह
एक घायल चिड़िया को एक घायल चिड़िया की तरह
उनके बारे में मैं क्या लिख सकता हूं
वे वैसे ही दिखे मुझे क्योंकि वे वैसे ही थे
उनके बारे में क्या कल्पना करूं
कल्पना से दुख जन्म लेता है
कल्पना से सुख भी जन्म ले सकता है
मगर जो सामने होता है वही होता है
दुख और सुख की कल्पना भी एक आदत है
जबकि एक धड़धड़ाती हुई रेलगाड़ी की तरह है जीवन
जगहों, दृश्यों, और लोगों को सतत लांघता हुआ
हज़ारों झूठ हज़ारों सच के बीच गुंथे हुए
अतीत के भग्नावशेष और निर्माणाधीन
सब कुछ स्थिरता के साथ उड़ा जा रहा है
जैसे वह हमेशा से उड़ता ही रहा था
क्योंकि वही है जो चलाए हुए है दुनिया में सब कुछ
इच्छाएं, वासनाएं, योजनाएं, साज़िशें, हत्याएं, दया, परोपकार, युद्ध और प्यार
और मैं हूं एक बित्ता सा दिमाग़ लिए
पृथ्वी और ब्रह्माण्ड के बारे में सोचता हुआ
अपने पिता की, पूर्वजों की राह पर
जैसे सूरज पूरब से पश्चिम की ओर बढ़ता है
डूबने के वास्ते
ईश्वर नहीं है कहीं, सिर्फ़ मैं हूं
अपने नहीं होने की ओर बढ़ रहा हूं
मैं क्या लिख जाना चाहता हूं
जिसे पढ़कर पीढ़ियों का भला हो
कुछ काम की बातें
मगर क्या है जो काम का नहीं
सब कुछ लिखा ही जा चुका
अपने अर्थों, विम्बों यथार्थों और कल्पना में सब से बेहतरीन
बेहतरीनतम
अपने होने को सार्थक करता हुआ मैं ही हूं
ईश्वर कहीं नहीं
मेरे पास आओ और दिखाओ अपने दिल के छाले
सुनाओ मुझे क्या-क्या गुज़री तुम पर
मैं बढ़ाऊंगा तुम्हारी तरफ़ हाथ
मेरी आंखों में उतर आएगी गहरी सहानुभूति
मैं तुम्हारे साथ मिल कर कुछ देर रो लूंगा
हंस भी लूंगा
क्योंकि मैं हूं
अभी जबकि ईश्वर नहीं है
मैं हूं!
Sunday, July 3, 2011
Saturday, July 2, 2011
हमारी खबर से बेखबर बहता चला आता है जीवन
देहरादून में रहने वाले कवि, मित्र राजेश सकलानी का नया कविता संग्रह हाल ही में छप कर आया है. हिन्दी के दो बड़े कवियों श्री असद ज़ैदी और श्री वीरेन डंगवाल ने मुझे इस संकलन की कविताओं के आश्चर्यजनक नएपन और गुणवत्ता की बाबत बाकायदा टेलीफ़ोन पर लम्बे कॉल किए. वीरेनदा ने तो मुझे इस संग्रह से कुछ कविताएं पढ़ कर सुनाईं (ऐसा उन्होंने आलोक धन्वा की किताब "दुनिया रोज़ बनती है" के आने के बाद से पहली दफ़ा किया).
यह संग्रह "पुश्तों का बयान" (प्रकाशक अन्तिका प्रकाशन) बस अभी अभी मिला है. बहुत दिनों बाद हिन्दी में एक नायाब कविता-संकलन आया है. सरसरी तौर पर देखे जाने से कहीं ज़्यादा की मांग करने वाले इस संग्रह से एकाध कविताएं पोस्ट करने से पहले मैं वरिष्ठ कवि असद ज़ैदी द्वारा लिखा गया किताब का ब्लर्ब पहले प्रस्तुत करता हूं.
राजेश सकलानी की कविताओं में एक निराली धुन, एक अपना ही तरीक़ा और अनपेक्षित गहराइयां देखने को मिलती हैं. अपनी तरह का होना ऐसी नेमत (या कि बला) है जो हर कवि को मयस्सर नहीं होती या मुआफ़िक़ नहीं आती. राजेश हर ऐतबार से अपनी तरह के कवि हैं. वह जब जैसा जी में आता है वैसी कविता लिखने के लिए पाबन्द हैं और यही चीज़ उनकी कविताओं में अनोखी लेकिन अनुशासित अराजकता पैदा करती है. उनकी कविता में एक दिलकश अनिश्चितता बनी रहती है - पहले से पता नहीं चलता यह किधर जाएगी. यह गेयता और आख्यानपरकता के बीच ऐसी धुंधली सी जगहों में अपनी ओट ढूंढती है जहां से दोनों छोर दिखते भी रहें. ऐसे ठिकाने राजेश को ख़ूब पता हैं.
राजेश व्यक्तिगत और राजनैतिक के दरम्यान फ़ासला नहीं बनाते. वह मध्यवर्ग के उस तबक़े के दर्दमन्द इन्सान हैं जो आर्थिक नव-उदारीकरण और लूट के इस दौर में भी जनसाधारण से दूर अपना अलग देश नही बनाना चाहता. जो मामूलीपन को एक नैतिक अनिवार्यता की तरह - और इन्सानियत की शर्त की तरह - बरतता है. वह इस तबक़े की मौजूदगी और अब भी उसमें मौजूद नैतिक पायेदारी को लक्षित करते रहते हैं. राजेश एक सच्ची नागरिकता के कवि हैं और अपने कवि को इस नागरिक से बाहर नहीं ढूंढ़ते. शाहर देहरादून को कभी इस से पहले ऐसा ज़िम्मेदार और मोहब्बत करने वाला कवि नहीं मिला होगा.
वह अपनी ही तरह के पहाड़ी हैं. पहाड़ी मूल के समकालीन कवियों में पहाड़ का अनुभव दर असल प्रवास की परिस्थिति या प्रवासी दशा की आंच से तपकर और मैदानी प्रयोगशालाओं से गुज़रकर ही प्रकट होता है. इस अनुभव की एक विशिष्ट नैतिक और भावात्मक पारिस्थितिकी है जिसने बेशक हिन्दी कविता को नया और आकर्षक आयाम दिया है. राजेश सकलानी की कविता इस प्रवासी दशा से मुक्त है, और उसमें दूरी की तक़लीफ़ नहीं है. इसीलिए वे पहाड़ी समाज्के स्थानीय यथार्थ को और उसमें मनुष्य के डिसलोकेशन और सामाजिक अन्तर्विरोधों को, सर्वप्रथम उनकी स्थानीयता, अन्तरंगता और साधारणता में देख पाते हैं. यह उनकी कविता का एक मूल्यवान गुण है.
राजेश की ख़ूबी यह भी है कि वह बड़े हल्के हाथ से लिखते हैं : उनकी इबारत बहुत जल्दी ही, बिना किसी जलवागरी के पाठक से उन्सियत बना लेती है. यक़ीनन यह एक लम्बी तपस्या और होशमंदी का ही हासिल है.
अमरूद वाला
लुंगी बनियान पहिने अमरूद वाले की विनम्र मुस्कराहट में
मोटी धार थी, हम जैसे आटे के लौंदे की तरह बेढब
आसानी से घोंपे गए
पहुँचे सीधे उसकी बस्ती में
मामूली गर्द भरी चीजों को उलटते-पुलटते
थोड़े से बर्तन बिल्कुल बर्तन जैसे
बेतरतीबी में लुढ़के हुए
बच्चे काम पर गए कई बार का उनका
छोड़ दिया रोना फैला फ़र्श पर
एक तीखी गंध अपनी राह बनाती,
भरोसा नहीं उसे हमारी आवाज़ का.
पों
पों पों पों आप हटे
बयान आ रहा है
तकलीफ़ें दूर होंगी
वित्तमन्त्री को सुनें
कहीं इकठ्ठा न हों
फिर चुपचाप घर जाएं
पों ....
दुल्हन
सपनों की त्वचा में रंगभेद नहीं होता
और दुल्हन की साड़ी की कोई कीमत नहीं होती
नंगे पैर गली में भटकने से
कैसे धरती तुम्हारे चेहरे पर निखरती है और
कितनी प्यारी हैं तुम्हारे श्रंृगार की गलतियाँ
चन्द्रमा की तरह दीप्त
अपनी बालकनी से दबे-दबे मुस्करातीं हैं मालकिनें
तुम्हारी खुशियों को नादानी समझतीं
उनकी आँखों में तुम मछली की तरह
लहराती हुई निकलो
भले ही जल्द टूट जाएँ वे चप्पलें जो
त्ुमने जतन और किफ़ायत से खरीदी हैं,
उन्हें इतराने दो और खप जाने दो मेहँदी
अपनी खुरदरी हथेलियों में
कुछ-कुछ ज्यादा है वे रंग जो तुम
अपने चेहरे पर चाहती हो
एक वह है जो दूसरे में दखल किए जाता है
दुल्हनें इसलिए भी शरमाती हैं कि चाहती
भी हैं दिखना लेकिन तुम ऐसे शरमाती हो
जैसे धीमे-धीमे दुनिया से टर लेती हो
जैसे तुमने जान ली है थोड़ी-सी लज्जा और
थोड़े से भरोसे के साथ दिख जाने की कला
जैसे तुम पहली बार उजाले में आई हो
कोई तेरी पलकों के ठाठ देखकर
चौंक पड़ेंगे
कुछ भले लोगों की तरह सँभलेंगे
कुछ इंतजार करेंगे बेचैनी से
मेहँदी के घटने के दिन
कुछ ऐसे देखेगें लापरवाही से जैसे नहीं देखते हो
अच्छा हो तुम उन्हें भी ऐसे ही देखो
जैसे न देखती हो
जैसे तुम समझ गई हो अपना होना
समय की कठिनाइयों में यह भी काम आएगा
अपने टूटे-फूटे बचपन की किताब को
तुम बंद कर देती हो
जैसे शाम होते ही दिन खत्म हो जाता है
ऐसे ही गुज़रो तुम बहुत समय तक
मचल-मचल कर इस जीवन को गाढ़ा कर दो.
अकेला छोड़ कर
वर्ष २००२, जाती बारिशों में मिले एक रोज़
धीमे बोलते हैं शेर मोहम्मद
लफ़्ज़ उनके रेशम की तरह,
हमेशा की तर मुस्कुराए आहिस्ता
धवल दाढ़ी थिरकी, जल जैसे
कैसे हो, मैंने पूछा थूक गटकते
सिर हिलाया उन्होंने
जाने दो अभी जैसा कुछ
चौंके फिर कुछ सहज हुए
होने को भी हैं जो ग़लतियां
मुआफ़ करते
उन्हें छूनेको मन था
अकेला छोड़ कर निकल गए काम पर
पुश्तों का बयान
हम तो भाई पुश्तें हैं
दरकते पहाड़ की मनमानी
सँभालते हैं हमारे कंधे
हम भी हैं सुन्दर, सुगठित और दृढ़
हम ठोस पत्थर हैं खुरदरी तराश में
यही है हमारे जुड़ाव की ताकत
हम विचार और युक्ति से आबद्ध हैं
सुरक्षित रास्ते हैं जिंदगी के लिए
बेहद खराब मौसमों में सबसे बड़ा भरोसा है
घरों के लिए
तारीफ़ों की चाशनी में चिपचिपी नहीं हुई है
हमारी आत्मा
हमारी खबर से बेखबर बहता चला आता
है जीवन.
पुश्ता : भूमिक्षरण रोकने के लिए पत्थरों की दीवार. पहाड़ों सड़कें, मकान और खेत पुश्तों पर टिके रहते हैं.
(इस संग्रह से कुछेक कविताएं आपको जब-तब यहां पढ़ने को आगे भी मिलेंगी. पुस्तक मिलने का पता: अंतिका प्रकाशन सी-५६/यूजीएफ़-४ शालीमार गार्डन, एक्सटेंशन-II ग़ाज़ियाबाद-२०१००५ (उ.प्र.))
यह संग्रह "पुश्तों का बयान" (प्रकाशक अन्तिका प्रकाशन) बस अभी अभी मिला है. बहुत दिनों बाद हिन्दी में एक नायाब कविता-संकलन आया है. सरसरी तौर पर देखे जाने से कहीं ज़्यादा की मांग करने वाले इस संग्रह से एकाध कविताएं पोस्ट करने से पहले मैं वरिष्ठ कवि असद ज़ैदी द्वारा लिखा गया किताब का ब्लर्ब पहले प्रस्तुत करता हूं.
राजेश सकलानी की कविताओं में एक निराली धुन, एक अपना ही तरीक़ा और अनपेक्षित गहराइयां देखने को मिलती हैं. अपनी तरह का होना ऐसी नेमत (या कि बला) है जो हर कवि को मयस्सर नहीं होती या मुआफ़िक़ नहीं आती. राजेश हर ऐतबार से अपनी तरह के कवि हैं. वह जब जैसा जी में आता है वैसी कविता लिखने के लिए पाबन्द हैं और यही चीज़ उनकी कविताओं में अनोखी लेकिन अनुशासित अराजकता पैदा करती है. उनकी कविता में एक दिलकश अनिश्चितता बनी रहती है - पहले से पता नहीं चलता यह किधर जाएगी. यह गेयता और आख्यानपरकता के बीच ऐसी धुंधली सी जगहों में अपनी ओट ढूंढती है जहां से दोनों छोर दिखते भी रहें. ऐसे ठिकाने राजेश को ख़ूब पता हैं.
राजेश व्यक्तिगत और राजनैतिक के दरम्यान फ़ासला नहीं बनाते. वह मध्यवर्ग के उस तबक़े के दर्दमन्द इन्सान हैं जो आर्थिक नव-उदारीकरण और लूट के इस दौर में भी जनसाधारण से दूर अपना अलग देश नही बनाना चाहता. जो मामूलीपन को एक नैतिक अनिवार्यता की तरह - और इन्सानियत की शर्त की तरह - बरतता है. वह इस तबक़े की मौजूदगी और अब भी उसमें मौजूद नैतिक पायेदारी को लक्षित करते रहते हैं. राजेश एक सच्ची नागरिकता के कवि हैं और अपने कवि को इस नागरिक से बाहर नहीं ढूंढ़ते. शाहर देहरादून को कभी इस से पहले ऐसा ज़िम्मेदार और मोहब्बत करने वाला कवि नहीं मिला होगा.
वह अपनी ही तरह के पहाड़ी हैं. पहाड़ी मूल के समकालीन कवियों में पहाड़ का अनुभव दर असल प्रवास की परिस्थिति या प्रवासी दशा की आंच से तपकर और मैदानी प्रयोगशालाओं से गुज़रकर ही प्रकट होता है. इस अनुभव की एक विशिष्ट नैतिक और भावात्मक पारिस्थितिकी है जिसने बेशक हिन्दी कविता को नया और आकर्षक आयाम दिया है. राजेश सकलानी की कविता इस प्रवासी दशा से मुक्त है, और उसमें दूरी की तक़लीफ़ नहीं है. इसीलिए वे पहाड़ी समाज्के स्थानीय यथार्थ को और उसमें मनुष्य के डिसलोकेशन और सामाजिक अन्तर्विरोधों को, सर्वप्रथम उनकी स्थानीयता, अन्तरंगता और साधारणता में देख पाते हैं. यह उनकी कविता का एक मूल्यवान गुण है.
राजेश की ख़ूबी यह भी है कि वह बड़े हल्के हाथ से लिखते हैं : उनकी इबारत बहुत जल्दी ही, बिना किसी जलवागरी के पाठक से उन्सियत बना लेती है. यक़ीनन यह एक लम्बी तपस्या और होशमंदी का ही हासिल है.
अमरूद वाला
लुंगी बनियान पहिने अमरूद वाले की विनम्र मुस्कराहट में
मोटी धार थी, हम जैसे आटे के लौंदे की तरह बेढब
आसानी से घोंपे गए
पहुँचे सीधे उसकी बस्ती में
मामूली गर्द भरी चीजों को उलटते-पुलटते
थोड़े से बर्तन बिल्कुल बर्तन जैसे
बेतरतीबी में लुढ़के हुए
बच्चे काम पर गए कई बार का उनका
छोड़ दिया रोना फैला फ़र्श पर
एक तीखी गंध अपनी राह बनाती,
भरोसा नहीं उसे हमारी आवाज़ का.
पों
पों पों पों आप हटे
बयान आ रहा है
तकलीफ़ें दूर होंगी
वित्तमन्त्री को सुनें
कहीं इकठ्ठा न हों
फिर चुपचाप घर जाएं
पों ....
दुल्हन
सपनों की त्वचा में रंगभेद नहीं होता
और दुल्हन की साड़ी की कोई कीमत नहीं होती
नंगे पैर गली में भटकने से
कैसे धरती तुम्हारे चेहरे पर निखरती है और
कितनी प्यारी हैं तुम्हारे श्रंृगार की गलतियाँ
चन्द्रमा की तरह दीप्त
अपनी बालकनी से दबे-दबे मुस्करातीं हैं मालकिनें
तुम्हारी खुशियों को नादानी समझतीं
उनकी आँखों में तुम मछली की तरह
लहराती हुई निकलो
भले ही जल्द टूट जाएँ वे चप्पलें जो
त्ुमने जतन और किफ़ायत से खरीदी हैं,
उन्हें इतराने दो और खप जाने दो मेहँदी
अपनी खुरदरी हथेलियों में
कुछ-कुछ ज्यादा है वे रंग जो तुम
अपने चेहरे पर चाहती हो
एक वह है जो दूसरे में दखल किए जाता है
दुल्हनें इसलिए भी शरमाती हैं कि चाहती
भी हैं दिखना लेकिन तुम ऐसे शरमाती हो
जैसे धीमे-धीमे दुनिया से टर लेती हो
जैसे तुमने जान ली है थोड़ी-सी लज्जा और
थोड़े से भरोसे के साथ दिख जाने की कला
जैसे तुम पहली बार उजाले में आई हो
कोई तेरी पलकों के ठाठ देखकर
चौंक पड़ेंगे
कुछ भले लोगों की तरह सँभलेंगे
कुछ इंतजार करेंगे बेचैनी से
मेहँदी के घटने के दिन
कुछ ऐसे देखेगें लापरवाही से जैसे नहीं देखते हो
अच्छा हो तुम उन्हें भी ऐसे ही देखो
जैसे न देखती हो
जैसे तुम समझ गई हो अपना होना
समय की कठिनाइयों में यह भी काम आएगा
अपने टूटे-फूटे बचपन की किताब को
तुम बंद कर देती हो
जैसे शाम होते ही दिन खत्म हो जाता है
ऐसे ही गुज़रो तुम बहुत समय तक
मचल-मचल कर इस जीवन को गाढ़ा कर दो.
अकेला छोड़ कर
वर्ष २००२, जाती बारिशों में मिले एक रोज़
धीमे बोलते हैं शेर मोहम्मद
लफ़्ज़ उनके रेशम की तरह,
हमेशा की तर मुस्कुराए आहिस्ता
धवल दाढ़ी थिरकी, जल जैसे
कैसे हो, मैंने पूछा थूक गटकते
सिर हिलाया उन्होंने
जाने दो अभी जैसा कुछ
चौंके फिर कुछ सहज हुए
होने को भी हैं जो ग़लतियां
मुआफ़ करते
उन्हें छूनेको मन था
अकेला छोड़ कर निकल गए काम पर
पुश्तों का बयान
हम तो भाई पुश्तें हैं
दरकते पहाड़ की मनमानी
सँभालते हैं हमारे कंधे
हम भी हैं सुन्दर, सुगठित और दृढ़
हम ठोस पत्थर हैं खुरदरी तराश में
यही है हमारे जुड़ाव की ताकत
हम विचार और युक्ति से आबद्ध हैं
सुरक्षित रास्ते हैं जिंदगी के लिए
बेहद खराब मौसमों में सबसे बड़ा भरोसा है
घरों के लिए
तारीफ़ों की चाशनी में चिपचिपी नहीं हुई है
हमारी आत्मा
हमारी खबर से बेखबर बहता चला आता
है जीवन.
पुश्ता : भूमिक्षरण रोकने के लिए पत्थरों की दीवार. पहाड़ों सड़कें, मकान और खेत पुश्तों पर टिके रहते हैं.
(इस संग्रह से कुछेक कविताएं आपको जब-तब यहां पढ़ने को आगे भी मिलेंगी. पुस्तक मिलने का पता: अंतिका प्रकाशन सी-५६/यूजीएफ़-४ शालीमार गार्डन, एक्सटेंशन-II ग़ाज़ियाबाद-२०१००५ (उ.प्र.))
इन्सान की जिजीविषा से ज़्यादा सुन्दर कुछ कहां
मैं हूं - २
सुन्दर चन्द ठाकुर
अब उम्र मुझ पर हावी हो रही है
बहुत आहिस्ता वह हमेशा अपना असर दिखाती ही रही थी
आहिस्ता-आहिस्ता वह कहां पहुंच गई
जबकि मैंने जैसे अभी जन्म ही लिया है
मैं विस्मय से देखता हूं चीज़ों को
और अभिभूत होता हूं
एक चिड़िया की ख़ूबसूरती के आगे समर्पण कर देता हं
प्रकृति और पृथ्वी की सुन्दरता
इनका कहना ही क्या
वह मुझे हमेशा ही सम्मोहित कर जाती है
जैसे किशोर वय में स्त्री का खुला जिस्म सम्मोहित करता रहा
अब तो और भी ज़्यादा
इन्सान की जिजीविषा से ज़्यादा सुन्दर कुछ कहां
मैं बच्चा ही बने रहना चाहता था
संरक्षित और ग़लत बातों, विचारों, मंतव्यों से अनभिज्ञ
मगर मैं जान गया हूं अब बहुत कुछ
यही जानना जी का जंजाल बना
सोचने लगा हूं कि जीवन के कुछ तो मायने होने चाहिए
जीवन के क्या मायने हो सकते हैं
कि उसे जिया गया भरपूर
अच्छे भोजन अच्छे स्वास्थ्य और सुन्दर चीज़ों के बीच
एक विचारधारा भी हो तो बेहतर
मगर मैं उस दौर में बड़ा हुआ जब विचारधाराएं खोखली पड़ गईं थीं
हंसिये के नीचे फ़सल के हरे के बजाय खून का लाल दिखने लगा जब
विद्वज्ज्न बापू की लंगोट खींचने पर आमादा थे
रहस्य बेपर्दा होते रहे जब और चीज़ें रहस्यमयी होने लगी थीं
अब मैं कहता हूं कि जीवन के कुछ मायने नहीं होते हुए भी उसका मायना है
क्योंकि वह होता है और एक उम्र जीता है
मैं हूं
जहां भी हूं जैसा भी हूं जैसे भी हूं
मैं हूं
यही है जीवन का मायना
हिलता हुआ, सांस लेता हुआ, सोचता हुआ
जीवन में प्रेम है या नहीं
विचारधारा है या नहीं
रस है या नीरस
खुलती भोर में डूबती शाम में
बारिश अंधड़ झुलसती गर्मी में
भरा हुआ कभी खाली
खुश होता हंसता कभी रोता उदासी में सिकुड़ता
मैं हूं!
(जारी- अगले हिस्से में समाप्य)
सुन्दर चन्द ठाकुर
अब उम्र मुझ पर हावी हो रही है
बहुत आहिस्ता वह हमेशा अपना असर दिखाती ही रही थी
आहिस्ता-आहिस्ता वह कहां पहुंच गई
जबकि मैंने जैसे अभी जन्म ही लिया है
मैं विस्मय से देखता हूं चीज़ों को
और अभिभूत होता हूं
एक चिड़िया की ख़ूबसूरती के आगे समर्पण कर देता हं
प्रकृति और पृथ्वी की सुन्दरता
इनका कहना ही क्या
वह मुझे हमेशा ही सम्मोहित कर जाती है
जैसे किशोर वय में स्त्री का खुला जिस्म सम्मोहित करता रहा
अब तो और भी ज़्यादा
इन्सान की जिजीविषा से ज़्यादा सुन्दर कुछ कहां
मैं बच्चा ही बने रहना चाहता था
संरक्षित और ग़लत बातों, विचारों, मंतव्यों से अनभिज्ञ
मगर मैं जान गया हूं अब बहुत कुछ
यही जानना जी का जंजाल बना
सोचने लगा हूं कि जीवन के कुछ तो मायने होने चाहिए
जीवन के क्या मायने हो सकते हैं
कि उसे जिया गया भरपूर
अच्छे भोजन अच्छे स्वास्थ्य और सुन्दर चीज़ों के बीच
एक विचारधारा भी हो तो बेहतर
मगर मैं उस दौर में बड़ा हुआ जब विचारधाराएं खोखली पड़ गईं थीं
हंसिये के नीचे फ़सल के हरे के बजाय खून का लाल दिखने लगा जब
विद्वज्ज्न बापू की लंगोट खींचने पर आमादा थे
रहस्य बेपर्दा होते रहे जब और चीज़ें रहस्यमयी होने लगी थीं
अब मैं कहता हूं कि जीवन के कुछ मायने नहीं होते हुए भी उसका मायना है
क्योंकि वह होता है और एक उम्र जीता है
मैं हूं
जहां भी हूं जैसा भी हूं जैसे भी हूं
मैं हूं
यही है जीवन का मायना
हिलता हुआ, सांस लेता हुआ, सोचता हुआ
जीवन में प्रेम है या नहीं
विचारधारा है या नहीं
रस है या नीरस
खुलती भोर में डूबती शाम में
बारिश अंधड़ झुलसती गर्मी में
भरा हुआ कभी खाली
खुश होता हंसता कभी रोता उदासी में सिकुड़ता
मैं हूं!
(जारी- अगले हिस्से में समाप्य)
कुछ भले लोगों ने मुझे बुराई से दूर रहना सिखाया
आज कल बम्बई में डेरा जमाए सुन्दर चन्द ठाकुर पुराने कवि-कबाड़ी हैं. आज से उनकी हालिया कविताओं की सीरीज़ "मैं हूं" की कुछ कविताएं -
मैं हूं - १
किसी के होने के क्या मानी हैं इस दुनिया में
कोई नहीं भी रहे तो पृथ्वी घूमती रहती है
मगर मैं हूं अभी
और पृथ्वी घूम रही है.
मैं एक हरा पेड हो सकता हूं
एक ठूंठ भी
एक नदी या एक सूखा हुआ नाला
एक खिला हुआ या मुरझा चुका फूल
एक दुत्कारा गया प्रेमी
बदले की आग में सुलगता हुआ
मैं कुछ भी हो सकता हूं
खुली हैं सारी दिशाएं
मगर मुझ पर सिर्फ़ गुरुत्वाकर्षण बल ही काम नहीं कर रहा
मैं शायद बना दिया गया मां के संघर्ष से
कुछ भले लोगों ने मुझे बुराई से दूर रहना सिखाया
वे कुछ आधी-अधूरी प्रेमिकाएं रहीं
जिन्होंने मुझ में प्रेम की प्यास भर दी
मेरे सिरहाने खड़ा पहाड़ भी चुपचाप भरता रहा मुझ में सहनशक्ति
मैं बना ऐसे ही
आसपास की चीज़ों और लोगों ने निर्मित किया मुझे
और अब मैं हूं
सब कुछ समझता हुआ कि कैसे हूं
मां का संघर्ष अब मेरा संघर्ष बन गया है
मैं अच्छाई बांटता हूं
प्रेम की बूंदें भरता रहता हूं दिलों के कोश में
अपने आसपास में जीता हूं भरपूर
जिन चीज़ों से निर्मित हुआ मैं वे अब खुल रही हैं
वक्त मुझे उघाड़ रहा है
उघड़ता हुआ मैं हूं
मेरे तत्व वापस लौटने लगे हैं
जिस शून्य से बनना शुरू हुआ था
मैं लौट रहा हूं उसी शून्य की ओर
लौटाता हुआ सब कुछ
मैं शून्य हो जाऊंगा
मगर खुल चुका पूरा
ख़त्म होता
अभी मैं हूं.
(जारी)
मैं हूं - १
किसी के होने के क्या मानी हैं इस दुनिया में
कोई नहीं भी रहे तो पृथ्वी घूमती रहती है
मगर मैं हूं अभी
और पृथ्वी घूम रही है.
मैं एक हरा पेड हो सकता हूं
एक ठूंठ भी
एक नदी या एक सूखा हुआ नाला
एक खिला हुआ या मुरझा चुका फूल
एक दुत्कारा गया प्रेमी
बदले की आग में सुलगता हुआ
मैं कुछ भी हो सकता हूं
खुली हैं सारी दिशाएं
मगर मुझ पर सिर्फ़ गुरुत्वाकर्षण बल ही काम नहीं कर रहा
मैं शायद बना दिया गया मां के संघर्ष से
कुछ भले लोगों ने मुझे बुराई से दूर रहना सिखाया
वे कुछ आधी-अधूरी प्रेमिकाएं रहीं
जिन्होंने मुझ में प्रेम की प्यास भर दी
मेरे सिरहाने खड़ा पहाड़ भी चुपचाप भरता रहा मुझ में सहनशक्ति
मैं बना ऐसे ही
आसपास की चीज़ों और लोगों ने निर्मित किया मुझे
और अब मैं हूं
सब कुछ समझता हुआ कि कैसे हूं
मां का संघर्ष अब मेरा संघर्ष बन गया है
मैं अच्छाई बांटता हूं
प्रेम की बूंदें भरता रहता हूं दिलों के कोश में
अपने आसपास में जीता हूं भरपूर
जिन चीज़ों से निर्मित हुआ मैं वे अब खुल रही हैं
वक्त मुझे उघाड़ रहा है
उघड़ता हुआ मैं हूं
मेरे तत्व वापस लौटने लगे हैं
जिस शून्य से बनना शुरू हुआ था
मैं लौट रहा हूं उसी शून्य की ओर
लौटाता हुआ सब कुछ
मैं शून्य हो जाऊंगा
मगर खुल चुका पूरा
ख़त्म होता
अभी मैं हूं.
(जारी)
Friday, July 1, 2011
मेघ मेघ
पंडित गोकुलोत्सव महाराज की आवाज़ में कल आपने राग मियां की मल्हार का लुत्फ़ उठाया था. आज सुनिये उनकी ही आवाज़ में राग मेघ. बेहतरीन कम्पोज़ीशन है. मौज की गारन्टी.-
रात होते ही उतरूंगा तुम्हारे कंधो पर
हिन्दी(साहित्यिक) ब्लॉग्स पर आज कल शुरुआती दिनों जैसा उत्साह नही दिख रहा. इस का दोष प्रायः फेस बूक को दिया जा रहा है. एक हद तक यह सही भी लगता है . लेकिन ज़रूरी नहीं कि फेस बुक ने ब्लॉग्गिंग को नुकसान ही पहुँचाया हो. फेस बुक के माध्यम से इधर कुछ सशक्त ब्लॉग्गर्ज़ से मेरी मुलाक़ात हुई है . उन मे से एक हैं लीना मल्होत्रा राओ http://lee-mainekaha.blogspot.com/ ब्लॉग का नाम है अस्मिता . इस मे मुझे एक नई ताज़गी लिए हुए कुछ प्रेम कविताए मिली . एक आप के लिए:
प्यार.. बिना शर्तों के.
मै एक पारदर्शी अँधेरा हूँ
इंतज़ार कर रहा हूँ अपनी बारी का
रात होते ही उतरूंगा तुम्हारे कंधो पर
तुम्हारे बालो के वलय की घुप्प सुरंगे रार करती हैं मुझसे
तुम एक ही बाली क्यों पहनती हो प्रिये
आमंत्रण देती है मुझे ये
एक झूला झूल लेने का
और यह पिरामिड जहाँ से
समय भी गुज़रते हुए अपनी चाल धीमी कर लेता है
हवाओ को अनुशासित करते हैं
और हवाए एक संगीत की तरह आती जाती रहती हैं
जिसमे एक शरद ऋतु चुपचाप पिघल के बहती रहती है.
तुम्हारी थकी मुंदती आँखों में तुम्हारे ठीक सोने से पहले
मै चमकते हुए सपने रख देता हूँ
और अपनी सारी सघनता झटककर पारदर्शी बन जाता हूँ
ताकि मेरी सघनता तुम्हारे सपनो में व्यवधान न प्रस्तुत कर दे.
क्या तुमने सोते हुए खुद को कभी देखा है ?
निश्चिन्त ..अँधेरे को समर्पित,
असहाय ..पस्त ..नींद के आगोश में गुम
सपने भी वही देखती हो जो मै तुम्हे परोसता हूँ
और तुम्हारी देह के वाद्यों से निकली अनुगूंज को नापते हुए मेरी रात गुज़र जाती है
और मै तुम्हारा ही एक उपनिवेश बनकर गर्क हो जाना चाहता हूँ तुम्हारे पलंग के नीचे
.
तुम्हे उठना है सूरज के स्वागत के लिए तरो ताज़ा
भागती रहोगी तुम शापित हाय
सूरज के पीछे
और मै सजाता रहूँगा पूरा दिन वो सपने जो दे सकें तुम्हे ऊर्जा
देखा कितना सार्थक है मेरा होना तुम्हारे और सूरज के बीच में धरा
क्या तुम मुझे पहचानती हो
मै हर बार उतरा हूँ तुम्हारे क़दमों में और पी गया हूँ तुम्हारी सारी थकान
और अनंतकाल से मै सोया नहीं हूँ.
जबकि तुम अनंतकाल से भाग रही हो सूरज के पीछे
और तब जब भूल जाती हो मुझे एक स्वप्न की तरह
मै लैम्पपोस्ट के नीचे खड़ा होकर प्रतीक्षा करता हूँ तुम्हारी
प्यार करता हूँ बिना शर्तो के.
प्यार.. बिना शर्तों के.
मै एक पारदर्शी अँधेरा हूँ
इंतज़ार कर रहा हूँ अपनी बारी का
रात होते ही उतरूंगा तुम्हारे कंधो पर
तुम्हारे बालो के वलय की घुप्प सुरंगे रार करती हैं मुझसे
तुम एक ही बाली क्यों पहनती हो प्रिये
आमंत्रण देती है मुझे ये
एक झूला झूल लेने का
और यह पिरामिड जहाँ से
समय भी गुज़रते हुए अपनी चाल धीमी कर लेता है
हवाओ को अनुशासित करते हैं
और हवाए एक संगीत की तरह आती जाती रहती हैं
जिसमे एक शरद ऋतु चुपचाप पिघल के बहती रहती है.
तुम्हारी थकी मुंदती आँखों में तुम्हारे ठीक सोने से पहले
मै चमकते हुए सपने रख देता हूँ
और अपनी सारी सघनता झटककर पारदर्शी बन जाता हूँ
ताकि मेरी सघनता तुम्हारे सपनो में व्यवधान न प्रस्तुत कर दे.
क्या तुमने सोते हुए खुद को कभी देखा है ?
निश्चिन्त ..अँधेरे को समर्पित,
असहाय ..पस्त ..नींद के आगोश में गुम
सपने भी वही देखती हो जो मै तुम्हे परोसता हूँ
और तुम्हारी देह के वाद्यों से निकली अनुगूंज को नापते हुए मेरी रात गुज़र जाती है
और मै तुम्हारा ही एक उपनिवेश बनकर गर्क हो जाना चाहता हूँ तुम्हारे पलंग के नीचे
.
तुम्हे उठना है सूरज के स्वागत के लिए तरो ताज़ा
भागती रहोगी तुम शापित हाय
सूरज के पीछे
और मै सजाता रहूँगा पूरा दिन वो सपने जो दे सकें तुम्हे ऊर्जा
देखा कितना सार्थक है मेरा होना तुम्हारे और सूरज के बीच में धरा
क्या तुम मुझे पहचानती हो
मै हर बार उतरा हूँ तुम्हारे क़दमों में और पी गया हूँ तुम्हारी सारी थकान
और अनंतकाल से मै सोया नहीं हूँ.
जबकि तुम अनंतकाल से भाग रही हो सूरज के पीछे
और तब जब भूल जाती हो मुझे एक स्वप्न की तरह
मै लैम्पपोस्ट के नीचे खड़ा होकर प्रतीक्षा करता हूँ तुम्हारी
प्यार करता हूँ बिना शर्तो के.
Thursday, June 30, 2011
नायक बनने की हबड़तबड़ नहीं साधारण बने रहने की विनम्र ज़िद
कुमार अम्बुज के कहानी संग्रह 'इच्छाएं' का एक आकलन प्रस्तुत है. एक्सक्लूसिव कबाड़.
हिन्दी साहित्य का संसार कुमार अम्बुज को एक कवि के रूप में जानता है. कविता के लिए दिये जाने वाले तमाम सम्मान और पुरुस्कार उन्हें मिल चुके हैं. समय-समाज के विभिन्न ज़रूरी विषयों-मुद्दों पर कलम चला चुके और कुल चार कविता-संग्रह 'किवाड़'. 'क्रूरता' 'अनन्तिम' और अतिक्रमण' दे चुके कुमार अम्बुज की रचनाधर्मिता अपनी गहरी प्रतिबद्ध मूल्यनिष्ठा के लिए जानी जाती रही है. अब वे अपना पहला कहानी संग्रह ले कर आए हैं.
इस कहानी संग्रह 'इच्छाएं' की पहली कहानी 'हकला' अपने तरह का इकलौता अद्वितीय दस्तावेज़ है. एक हकले नायक (यदि नायकोचित परिभाषाएं उस पर लागू की जा सकती हों) का आत्मवृत्त पढ़ना वेदना के बिल्कुल नए संसार से गुज़रने की अनुभूति देता है. हकलापन देह में अवस्थित एक ऐसी विकलांगता है जो इस से ग्रस्त व्यक्ति को मानव-भाषा के उच्चारण के अनुपम अनुभव से वंचित करने के साथ ही शर्म, असहायता और विवशता के अंधेरे संसार में धकेल देता है.
अपनी विषयवस्तु को खोल रही कहानी एक तरह की कराह से शुरू होती है. घर पर हकले बच्चे की उपस्थिति से हकबकाए पिता का "क्षोभ भरा विलाप" और उसी क्रम में साथ-साथ नायक का पिटना और उसका क्रमशः "पक्के तौर पर" हकला हो जाना एक सघन नैराश्य का निर्माण करने वाली छवियां हैं. कहानी के विकसित होने का सिलसिला नायक द्वारा अपने हकलेपन के बेहद इन्टेन्स विवेचन के साथ जुड़ा हुआ है. उस के सवाल आपसे मुख़ातिब है: "अनगिन शब्दों ने मेरा गला घोंटा है, मेरे कण्ठ में वे फंसे पड़े हैं, और मेरी नींद में, मेरे सपनों में चुभते हैं. टूटे-फूटे शब्दों के कोने-किनारे, उनकी नोकें किस कदर तकलीफ़ देती हैं, मुझसे ज़्यादा कौन समझेगा?"
समय के साथ साथ नायक बोले जाने वाले शब्दों के संसार से तिरस्कृत महसूस करता हुआ लिखित शब्दों के संसार में प्रवेश करता है जहां शब्दों के साथ हकलेपन की कोई समस्या नहीं होती. साथ ही वह स्वीकार करता है कि इस तिरस्कार भरे संसार में बेज़ुबान पशुओं ने उसे मनुष्यों से अधिक प्रेम दिया - गाय के बछड़े, तोते, आवारा कुत्ते उसकी इस कहानी के बेहद ज़रूरी हिस्से हैं. वह कहता भी है: "वे सब मेरे अधूरे शब्दों को पूर्ण बनाते थे. मेरे अर्धउच्चारित शब्दों या अटक कर बोले गए वाक्यों का उन्होंने कभी अनादर नहीं किया."
प्रत्यक्ष रूप से किंचित हड़बड़ी में लिखे गए इस आत्मवृत्त के अन्तिम हिस्से में वह अपनी शैली को न्यायोचित ठहराता हुआ पाठक से कहता है कि उसे हकले का दर्द और उसकी व्याकुलता को समझते हुए यह जानना चाहिये कि "हकला न होना कितनी बड़ी नियामत है." मां से जुड़ी एक बचपन की स्मृति की याद के साथ समाप्त होने वाला यह वृत्त आपको हकबकाया छोड़ देता है और मांग करता है कि इसे एक सामान्य कहानी की तरह ट्रीट न किया जाए बल्कि दोबारा-तिबारा पढ़ा जाए और हैरत की जाए. कई अर्थों में यह एक असाधारण कहानी है. शिल्प की दृष्टि से जैसी कि इसकी मांग थी, कुमार अम्बुज ने करीब छः पृष्ठों की इस कहानी को एक पैराग्राफ़ में लिखा है. इस से कहानी की गति कभी थमती या अटकती नज़र नहीं आती और अटक अटक कर बोलने की जन्मजात आदत से मजबूर हकले को एक बेहद मजबूत और संवेदनशील चरित्र प्रदान करने में सहायता मिली है.
यह कहानी एक तरह से इस संग्रह की प्रतिनिधि कहानी होने का दर्ज़ा रखती है और निस्संदेह एक बड़ी उपलब्धि है. 'हकला' कहानी के साथ ही कुमार अम्बुज अपने कहानीकार की विशिष्ट शैली को स्थापित कर देते हैं और संग्रह की दूसरी कहानी 'मां रसोई में रहती है' में और भी मुखर होकर सामने आते हैं. भारतीय मध्यवर्ग के परिवारों की धुरी को सदियों से मजबूती के साथ थामे अडिग खड़ी माताओं की जिजीविषा का बहुत संवेदनशील चित्र इस कहानी में देखने को मिलता है.
संग्रह की कहानियों की विषयवस्तुएं इस कदर भिन्न्ता लिये हुए और अनूठी हैं कि उनमें से हर एक के बारे में लिख पाना यहां सम्भव भी नहीं है और सम्भवतः उचित भी नहीं होगा. विभिन्न तरीकों से इस क्रूर संसार में अपनी उपस्थिति को भरसक अर्थपूर्ण और संवेदनापूरित बनाए रखने के बेहद मुश्किल उद्यम में लगे भारतीय मध्यवर्ग का बहुत ही सामयिक और महत्वपूर्ण दस्तावेज़ीकरण इस तमाम कहानियों की खूबी है. नौकरियां, बीमारियां, परिवार, दफ़्तर, लोगबाग इन कहानियों के केन्द्र में हैं और उनमें नायक बनने की हबड़तबड़ नहीं साधारण बने रहने की विनम्र ज़िद दिखाई देती है.
यह संग्रह मानव जीवन की साधारणता का महान कोरस है जिसमें बग़ैर अधिक लाग लपेट के, बिना किसी साहित्यिक चमत्कार की कामना के, एक ज़रूरी और विरल तत्व का ईमानदार संधान किया गया है.
लम्बी कहानी 'संसार के आश्चर्य' का उपशीर्षक बहुत रोचक है: "जो विस्मित नहीं हो सकते, वे अधूरे मनुष्य हैं". इस कहानी के ठीक पहले वाली कहानी 'सनक' रत्तियां बेचने वाले, कविताओं की पंक्तियां इकठ्ठा करने वाले और फ़िलहाल जुगनू पालने का काम शुरू कर चुके एक ऐसे ही अधेड़ सेल्समैन का किस्सा है, जो अपने हर वाक्य से हमें विस्मय में डालता है.
'संसार के आश्चर्य' में लेखक अपने तीन यात्रा वृत्तान्त सुनाता है जिनमें वह जैसा कि शीर्षक से जाहिर है, संसार के आश्चर्यों की उसकी यात्राओं के विवरण दर्ज़ हैं. बदलते समाज, बदलती चिन्ताओं और उनकी जटिल विद्रूपताओं और उनकी खूबसूरत बारिकियों को किसी खिलंदड़े दार्शनिक की सी नज़र से देखा गया है. कहानी की शैली दिलचस्प भी है और अतीव मनोरंजक भी. कहानी की दरकार है कि उसके वाक्यों-शब्दों की सतह को खुरचकर उस के अन्दर प्रविष्ट हुआ जाए. आख़िर में एक जगह लिखा गया है: "पर्यटक होना भी मुश्किलों और पागलपन का पुलिन्दा हो जाना है. इतना तो आप भी समझ गए होंगे. पर्यटक अपने आप को असाधारण समझते हैं और शेष दुनिया उन्हें असामान्य मानती है. ... मेरी तरह आप भी सांसारिक व्याधियों और विपन्नता में फंसे हुए हैं, लेकिन फिर भी मैं कहूंगाकि आप थोड़ा सा समय, कुछ पैसा और उत्साह लेकर 'संसार के आश्चर्यों' की यात्रा ज़रूर करें. जितनी जगहों पर जाना मुमकिन हो, उतना ही सही."
'एक दिन मन्ना डे' और 'पीतल का अदमी' भी ऐसी ही कहानियां है जो बताती है कि बाहर से बेहद एकांगी दिखाई देने वाला मानव-संसार दरअसल हमें लगातार विस्मित करते जाने वाले तत्वों और चरित्रों से भरपूर है. और दिखाई देने वाले संसार के भीतर का यह संसार देख पाने के लिए किसी जादू की ज़रूरत नहीं होती. बस अपने आसपास की चीज़ों के प्रति थोड़ा अधिक सजग, थोड़ा अधिक संवेदनशील होना होता है.
फ़्रांज़ काफ़्का से लेकर ज्ञानरंजन तक लेखकों द्वारा पिताओं को लेकर दुनिया भर के साहित्य में बहुत सारा गद्य लिखा गया है - 'मुश्किल' और 'कहना-सुनना' शीर्षक कहानियां इस विषय पर नई दृष्टि डालती हैं. खास तौर पर 'कहना-सुनना' कहानी में क्रमशः वयस्क और अधेड़ होते पुत्र और बूढ़े होते पिता के सम्बन्धों के बीच पसर जाने वाले रेगिस्तान को कुमार अम्बुज किसी तटस्थ और उस्ताद करीगर की बारीक निगाह से उधेड़ देने का जोखिम उठाते हैं.
घर के छोटे बच्चे को हो गई टीबी को लेकर एक पिता की चिन्ताओं, चिकित्सकों द्वारा सुरक्षित उपचार के बाबत आश्वस्त कर दिये जाने के बावजूद पत्नी से इस बात को छिपाने की जद्दोजहद और एक छोटे से घर की छोटी सी ज़िन्दगी के भीतर बहुत संवेदनशीलता के साथ झांका गया है 'ख़ुशी' शीर्षक कहानी में.
किताब के ब्लर्ब पर जितेन्द्र भाटिया का कथन है: "अव्वल तो ये कहानियां फ़ॉर्म के किसी पूर्वनिर्धारित ढांचे में सीमित किये जाने की मोहताज नहीं हैं और न ही इन्हें अम्बुज के मुकम्मल, सुपरिचित कवि संसार का महज विस्तार या उसका स्वाद बदलने वाला 'बाई प्रोडक्ट' माना जा सकता है. इस कथन के परिप्रेक्ष्य में 'बारिश' कहानी का ज़िक्र करना आवश्यक लगता है.
'बारिश' एक काव्यात्मक कहानी है. दरअसल यह कहानी एक मुकम्मिल कविता है और जब कुमार अम्बुज "अपनी बारिश" का ज़िक्र करते हैं तो लगता है कि बताना चाह रहे हैं कि ये कहानियां मेरी "अपनी" हैं - ये तमाम कहानियां बेशक एक कवि ही लिख सकता था, जिसकी अभिव्यक्ति के संसार को सचमुच ही किसी बने-बनाए सांचे के बरअक्स नहीं देखा जा सकता और देखा जाना चाहिये भी नहीं. इस तरह के कई मायनों में यह संग्रह न सिर्फ़ महत्वपूर्ण माना जाना चाहिये, कुमार अम्बुज की तरफ़ से आगे के दिनों में आने वाले साहित्य की समृद्ध विविधता की तरफ़ इशारा भी करता है.
'बारिश' कहानी के शुरू में भूमिका तैयार करते हुए कुमार अम्बुज लिखते हैं:
"जानता हूं कि बारिश को ठीक-ठाक पूरा-पूरा किसी कविता में भी नहीं लिखा जा सकता. कहानी में तो कतई नहीं. वह गद्य के स्पर्श भर से स्थूल हो जाएगी. या हो सकता वह विवरण के किसी रेगिस्तान में ही विलीन हो जाए. जबकि उसके हर अंग से बारिश होती है. उन अंगों से भी जो मृत कोशिकाओं से बने हैं. उसके नाख़ूनों से. उसके रोओं से. और पलकों से. ..."
इतना लिख चुकने के बाद वे बारिश के बारे में लिखते जाने का जोखिम उठाते हैं और उसके विविध प्रत्यक्ष-परोक्ष आयामों से आप को रू-ब-रू कराते चलते हैं. गाब्रीएल गार्सिया मारकेज़ की कहानी 'वॉचिंग इट रेन इन माकोन्दो' में अनवरत बारिश को देखती हुई ईसाबेल को कभी कभी जैसा महसूस होता रहता है, कुछ कुछ वैसा ही इस कहानी के कुछ हिस्सों में देखने को मिलता है. इस विकट कविता-कहानी या कहानी-कविता का अन्त इन पंक्तियों से होता है :
"अब उसने दूसरी सारी आवाज़ों को आग़ोश में ले लिया है.
दसों दिशाओं से बारिश की आवाज़ आती है.
उसने हर दृश्य को ढांप लिया है.
अब सब तरफ़ सिर्फ़ बारिश है.
मेरी बारिश."
(इच्छाएं, कहानी-संग्रह, लेखक: कुमार अम्बुज, भारतीय ज्ञानपीठ, रु. ११०)
हिन्दी साहित्य का संसार कुमार अम्बुज को एक कवि के रूप में जानता है. कविता के लिए दिये जाने वाले तमाम सम्मान और पुरुस्कार उन्हें मिल चुके हैं. समय-समाज के विभिन्न ज़रूरी विषयों-मुद्दों पर कलम चला चुके और कुल चार कविता-संग्रह 'किवाड़'. 'क्रूरता' 'अनन्तिम' और अतिक्रमण' दे चुके कुमार अम्बुज की रचनाधर्मिता अपनी गहरी प्रतिबद्ध मूल्यनिष्ठा के लिए जानी जाती रही है. अब वे अपना पहला कहानी संग्रह ले कर आए हैं.
इस कहानी संग्रह 'इच्छाएं' की पहली कहानी 'हकला' अपने तरह का इकलौता अद्वितीय दस्तावेज़ है. एक हकले नायक (यदि नायकोचित परिभाषाएं उस पर लागू की जा सकती हों) का आत्मवृत्त पढ़ना वेदना के बिल्कुल नए संसार से गुज़रने की अनुभूति देता है. हकलापन देह में अवस्थित एक ऐसी विकलांगता है जो इस से ग्रस्त व्यक्ति को मानव-भाषा के उच्चारण के अनुपम अनुभव से वंचित करने के साथ ही शर्म, असहायता और विवशता के अंधेरे संसार में धकेल देता है.
अपनी विषयवस्तु को खोल रही कहानी एक तरह की कराह से शुरू होती है. घर पर हकले बच्चे की उपस्थिति से हकबकाए पिता का "क्षोभ भरा विलाप" और उसी क्रम में साथ-साथ नायक का पिटना और उसका क्रमशः "पक्के तौर पर" हकला हो जाना एक सघन नैराश्य का निर्माण करने वाली छवियां हैं. कहानी के विकसित होने का सिलसिला नायक द्वारा अपने हकलेपन के बेहद इन्टेन्स विवेचन के साथ जुड़ा हुआ है. उस के सवाल आपसे मुख़ातिब है: "अनगिन शब्दों ने मेरा गला घोंटा है, मेरे कण्ठ में वे फंसे पड़े हैं, और मेरी नींद में, मेरे सपनों में चुभते हैं. टूटे-फूटे शब्दों के कोने-किनारे, उनकी नोकें किस कदर तकलीफ़ देती हैं, मुझसे ज़्यादा कौन समझेगा?"
समय के साथ साथ नायक बोले जाने वाले शब्दों के संसार से तिरस्कृत महसूस करता हुआ लिखित शब्दों के संसार में प्रवेश करता है जहां शब्दों के साथ हकलेपन की कोई समस्या नहीं होती. साथ ही वह स्वीकार करता है कि इस तिरस्कार भरे संसार में बेज़ुबान पशुओं ने उसे मनुष्यों से अधिक प्रेम दिया - गाय के बछड़े, तोते, आवारा कुत्ते उसकी इस कहानी के बेहद ज़रूरी हिस्से हैं. वह कहता भी है: "वे सब मेरे अधूरे शब्दों को पूर्ण बनाते थे. मेरे अर्धउच्चारित शब्दों या अटक कर बोले गए वाक्यों का उन्होंने कभी अनादर नहीं किया."
प्रत्यक्ष रूप से किंचित हड़बड़ी में लिखे गए इस आत्मवृत्त के अन्तिम हिस्से में वह अपनी शैली को न्यायोचित ठहराता हुआ पाठक से कहता है कि उसे हकले का दर्द और उसकी व्याकुलता को समझते हुए यह जानना चाहिये कि "हकला न होना कितनी बड़ी नियामत है." मां से जुड़ी एक बचपन की स्मृति की याद के साथ समाप्त होने वाला यह वृत्त आपको हकबकाया छोड़ देता है और मांग करता है कि इसे एक सामान्य कहानी की तरह ट्रीट न किया जाए बल्कि दोबारा-तिबारा पढ़ा जाए और हैरत की जाए. कई अर्थों में यह एक असाधारण कहानी है. शिल्प की दृष्टि से जैसी कि इसकी मांग थी, कुमार अम्बुज ने करीब छः पृष्ठों की इस कहानी को एक पैराग्राफ़ में लिखा है. इस से कहानी की गति कभी थमती या अटकती नज़र नहीं आती और अटक अटक कर बोलने की जन्मजात आदत से मजबूर हकले को एक बेहद मजबूत और संवेदनशील चरित्र प्रदान करने में सहायता मिली है.
यह कहानी एक तरह से इस संग्रह की प्रतिनिधि कहानी होने का दर्ज़ा रखती है और निस्संदेह एक बड़ी उपलब्धि है. 'हकला' कहानी के साथ ही कुमार अम्बुज अपने कहानीकार की विशिष्ट शैली को स्थापित कर देते हैं और संग्रह की दूसरी कहानी 'मां रसोई में रहती है' में और भी मुखर होकर सामने आते हैं. भारतीय मध्यवर्ग के परिवारों की धुरी को सदियों से मजबूती के साथ थामे अडिग खड़ी माताओं की जिजीविषा का बहुत संवेदनशील चित्र इस कहानी में देखने को मिलता है.
संग्रह की कहानियों की विषयवस्तुएं इस कदर भिन्न्ता लिये हुए और अनूठी हैं कि उनमें से हर एक के बारे में लिख पाना यहां सम्भव भी नहीं है और सम्भवतः उचित भी नहीं होगा. विभिन्न तरीकों से इस क्रूर संसार में अपनी उपस्थिति को भरसक अर्थपूर्ण और संवेदनापूरित बनाए रखने के बेहद मुश्किल उद्यम में लगे भारतीय मध्यवर्ग का बहुत ही सामयिक और महत्वपूर्ण दस्तावेज़ीकरण इस तमाम कहानियों की खूबी है. नौकरियां, बीमारियां, परिवार, दफ़्तर, लोगबाग इन कहानियों के केन्द्र में हैं और उनमें नायक बनने की हबड़तबड़ नहीं साधारण बने रहने की विनम्र ज़िद दिखाई देती है.
यह संग्रह मानव जीवन की साधारणता का महान कोरस है जिसमें बग़ैर अधिक लाग लपेट के, बिना किसी साहित्यिक चमत्कार की कामना के, एक ज़रूरी और विरल तत्व का ईमानदार संधान किया गया है.
लम्बी कहानी 'संसार के आश्चर्य' का उपशीर्षक बहुत रोचक है: "जो विस्मित नहीं हो सकते, वे अधूरे मनुष्य हैं". इस कहानी के ठीक पहले वाली कहानी 'सनक' रत्तियां बेचने वाले, कविताओं की पंक्तियां इकठ्ठा करने वाले और फ़िलहाल जुगनू पालने का काम शुरू कर चुके एक ऐसे ही अधेड़ सेल्समैन का किस्सा है, जो अपने हर वाक्य से हमें विस्मय में डालता है.
'संसार के आश्चर्य' में लेखक अपने तीन यात्रा वृत्तान्त सुनाता है जिनमें वह जैसा कि शीर्षक से जाहिर है, संसार के आश्चर्यों की उसकी यात्राओं के विवरण दर्ज़ हैं. बदलते समाज, बदलती चिन्ताओं और उनकी जटिल विद्रूपताओं और उनकी खूबसूरत बारिकियों को किसी खिलंदड़े दार्शनिक की सी नज़र से देखा गया है. कहानी की शैली दिलचस्प भी है और अतीव मनोरंजक भी. कहानी की दरकार है कि उसके वाक्यों-शब्दों की सतह को खुरचकर उस के अन्दर प्रविष्ट हुआ जाए. आख़िर में एक जगह लिखा गया है: "पर्यटक होना भी मुश्किलों और पागलपन का पुलिन्दा हो जाना है. इतना तो आप भी समझ गए होंगे. पर्यटक अपने आप को असाधारण समझते हैं और शेष दुनिया उन्हें असामान्य मानती है. ... मेरी तरह आप भी सांसारिक व्याधियों और विपन्नता में फंसे हुए हैं, लेकिन फिर भी मैं कहूंगाकि आप थोड़ा सा समय, कुछ पैसा और उत्साह लेकर 'संसार के आश्चर्यों' की यात्रा ज़रूर करें. जितनी जगहों पर जाना मुमकिन हो, उतना ही सही."
'एक दिन मन्ना डे' और 'पीतल का अदमी' भी ऐसी ही कहानियां है जो बताती है कि बाहर से बेहद एकांगी दिखाई देने वाला मानव-संसार दरअसल हमें लगातार विस्मित करते जाने वाले तत्वों और चरित्रों से भरपूर है. और दिखाई देने वाले संसार के भीतर का यह संसार देख पाने के लिए किसी जादू की ज़रूरत नहीं होती. बस अपने आसपास की चीज़ों के प्रति थोड़ा अधिक सजग, थोड़ा अधिक संवेदनशील होना होता है.
फ़्रांज़ काफ़्का से लेकर ज्ञानरंजन तक लेखकों द्वारा पिताओं को लेकर दुनिया भर के साहित्य में बहुत सारा गद्य लिखा गया है - 'मुश्किल' और 'कहना-सुनना' शीर्षक कहानियां इस विषय पर नई दृष्टि डालती हैं. खास तौर पर 'कहना-सुनना' कहानी में क्रमशः वयस्क और अधेड़ होते पुत्र और बूढ़े होते पिता के सम्बन्धों के बीच पसर जाने वाले रेगिस्तान को कुमार अम्बुज किसी तटस्थ और उस्ताद करीगर की बारीक निगाह से उधेड़ देने का जोखिम उठाते हैं.
घर के छोटे बच्चे को हो गई टीबी को लेकर एक पिता की चिन्ताओं, चिकित्सकों द्वारा सुरक्षित उपचार के बाबत आश्वस्त कर दिये जाने के बावजूद पत्नी से इस बात को छिपाने की जद्दोजहद और एक छोटे से घर की छोटी सी ज़िन्दगी के भीतर बहुत संवेदनशीलता के साथ झांका गया है 'ख़ुशी' शीर्षक कहानी में.
किताब के ब्लर्ब पर जितेन्द्र भाटिया का कथन है: "अव्वल तो ये कहानियां फ़ॉर्म के किसी पूर्वनिर्धारित ढांचे में सीमित किये जाने की मोहताज नहीं हैं और न ही इन्हें अम्बुज के मुकम्मल, सुपरिचित कवि संसार का महज विस्तार या उसका स्वाद बदलने वाला 'बाई प्रोडक्ट' माना जा सकता है. इस कथन के परिप्रेक्ष्य में 'बारिश' कहानी का ज़िक्र करना आवश्यक लगता है.
'बारिश' एक काव्यात्मक कहानी है. दरअसल यह कहानी एक मुकम्मिल कविता है और जब कुमार अम्बुज "अपनी बारिश" का ज़िक्र करते हैं तो लगता है कि बताना चाह रहे हैं कि ये कहानियां मेरी "अपनी" हैं - ये तमाम कहानियां बेशक एक कवि ही लिख सकता था, जिसकी अभिव्यक्ति के संसार को सचमुच ही किसी बने-बनाए सांचे के बरअक्स नहीं देखा जा सकता और देखा जाना चाहिये भी नहीं. इस तरह के कई मायनों में यह संग्रह न सिर्फ़ महत्वपूर्ण माना जाना चाहिये, कुमार अम्बुज की तरफ़ से आगे के दिनों में आने वाले साहित्य की समृद्ध विविधता की तरफ़ इशारा भी करता है.
'बारिश' कहानी के शुरू में भूमिका तैयार करते हुए कुमार अम्बुज लिखते हैं:
"जानता हूं कि बारिश को ठीक-ठाक पूरा-पूरा किसी कविता में भी नहीं लिखा जा सकता. कहानी में तो कतई नहीं. वह गद्य के स्पर्श भर से स्थूल हो जाएगी. या हो सकता वह विवरण के किसी रेगिस्तान में ही विलीन हो जाए. जबकि उसके हर अंग से बारिश होती है. उन अंगों से भी जो मृत कोशिकाओं से बने हैं. उसके नाख़ूनों से. उसके रोओं से. और पलकों से. ..."
इतना लिख चुकने के बाद वे बारिश के बारे में लिखते जाने का जोखिम उठाते हैं और उसके विविध प्रत्यक्ष-परोक्ष आयामों से आप को रू-ब-रू कराते चलते हैं. गाब्रीएल गार्सिया मारकेज़ की कहानी 'वॉचिंग इट रेन इन माकोन्दो' में अनवरत बारिश को देखती हुई ईसाबेल को कभी कभी जैसा महसूस होता रहता है, कुछ कुछ वैसा ही इस कहानी के कुछ हिस्सों में देखने को मिलता है. इस विकट कविता-कहानी या कहानी-कविता का अन्त इन पंक्तियों से होता है :
"अब उसने दूसरी सारी आवाज़ों को आग़ोश में ले लिया है.
दसों दिशाओं से बारिश की आवाज़ आती है.
उसने हर दृश्य को ढांप लिया है.
अब सब तरफ़ सिर्फ़ बारिश है.
मेरी बारिश."
(इच्छाएं, कहानी-संग्रह, लेखक: कुमार अम्बुज, भारतीय ज्ञानपीठ, रु. ११०)
Wednesday, June 29, 2011
हमारा यार है हम में हम को इंतजारी क्या
२००६ में आशा भोंसले ने यूनीवर्सल रेकॉर्डस से 'कहत कबीर' संग्रह जारी किया था. आशा भोंसले की आवाज़ में कबीर को सुनना बहुत सुखद अनुभव था. इस संग्रह से आपको सुनवाता हूं अपना पसंदीदा पीस. वैसे तो यह रचना आज से दो साल से अधिक समय पहले कबाड़ख़ाने पर लगाई जा चुकी है पर अब उसके प्लेयर ने काम करना बन्द कर दिया है. आनन्द लीजिए -
हम है इश्क मस्ताना हम को होशियारी क्या
रहें आजाद इस जग से हमें दुनिया से यारी क्या
जो बिछुड़े हैं पियारे से भटकते दरबदर फिरते
हमारा यार है हम में हम को इंतजारी क्या
खलक सब नाम अपने को बहुत कर सिर पटकता है
हमन गुरनाम सांचा है हमन दुनिया से यारी क्या
न पल बिछुड़े पिया हमसे न हम बिछड़े पियारे से
उन्हीं से नेह लागी है हम को बेकरारी क्या
कबीरा इश्क का माता दुई को दूर कर दिल से
जो चलना राह नाज़ुक है, हम सिर बोझ भारी क्या
हम है इश्क मस्ताना हम को होशियारी क्या
रहें आजाद इस जग से हमें दुनिया से यारी क्या
जो बिछुड़े हैं पियारे से भटकते दरबदर फिरते
हमारा यार है हम में हम को इंतजारी क्या
खलक सब नाम अपने को बहुत कर सिर पटकता है
हमन गुरनाम सांचा है हमन दुनिया से यारी क्या
न पल बिछुड़े पिया हमसे न हम बिछड़े पियारे से
उन्हीं से नेह लागी है हम को बेकरारी क्या
कबीरा इश्क का माता दुई को दूर कर दिल से
जो चलना राह नाज़ुक है, हम सिर बोझ भारी क्या
हँस रही थी मध्यकाल से वह सरस्वती

पाँवटा साहब (हिमाचल) के मित्र कवि प्रदीप सैनी ने पिछले दिनो मुझे यह कविता मेल की थी . आज अचानक याद आया कि गत वर्ष दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय मे सरस्वती की 11वीं सदी की बनी हुई संगमरमर की खण्डित लेकिन खूबसूरत मूर्ति देखी थी. और इस की कुछ तस्वीरें भी खींच लाया था. उस समय ये तस्वीरें मैं किसी ऐतिहासिक साक्ष्य के निमित्त सेव कर रहा था .
लेकिन हुसैन प्रकरण के सन्दर्भ मे ये फोटो बहुत प्रासंगिक और प्रतीकात्मक लग रहे हैं.

हुसैन की सरस्वती
बन्दर
पढ़ा रहे हैं पाठ
वे हमें अपनी तरह
सभ्य बनाने पर उतारू हैं
इस वक़्त वे मचान के ठीक ऊपर हैं
पर बन्दर क्या जानें
मचान में नहीं होता
टहनियों जैसा लचीलापन

कि मोड़ लें जिधर चाहें
वे गिरेंगे मचान से
उछलकूद करते करते
मुँह के बल
और बहुत दिनों के बाद हँसेगी
हुसैन की सरस्वती .
Saturday, June 25, 2011
किताबें , शब्द और अंतर्जाल
हिन्दी साहित्य की प्रतिष्ठित पत्रिका तद्भव (अंक -23 )का यह सम्पादकीय हिन्दी साहित्यप्रेमियों का * साईबर फोबिया* ज़रूर दूर करेगा. कम्प्यूटर और साईबर वर्ल्ड से बहुत ज़्यादा जुड़े न होने के बावजूद अखिलेश जी भविष्य के माध्यमो के प्रति पोज़िटिव नज़रिया रखते है.
अंक/23 /2011 सम्पादकीय
इन दिनों प्रायः कुछ लोगों द्वारा इस बात की चिंता प्रकट की जाती है कि इंटरनेट का विस्तार किताबों के वर्तमान स्वरूप को समाप्त कर देगा। जाहिर है, यहां आशय छपी हुई पुस्तकों से है। इसी बात को कभी यूं कहा जाता है कि एक दिन आयेगा जब कागज और रोशनाई का लोप हो जायेगा और दुनिया में छापाखाना का उद्योग बंदी के कगार पर पहुंच जायेगा। इसी प्रकार कुछ उत्साही जो इतना अंधकारपूर्व भविष्य कथन नहीं करते, कहते हैं कि इंटरनेट पर ब्लागों और वेब पत्रिाकाओं के प्रति बढ़ती रुचि एक दिन मुद्रित अखबारों और पत्रिाकाओं की किस्मत को रूंध देगी। इस चुनौती के जवाब में हिंदी का आशावादी समुदाय इतमीनान दिखाता है कि इस तरह के दुर्वचन बहुत बार कहे गये हैं किंतु छपे हुए साहित्य का कुछ नहीं बिगड़ा है और इस बार भी कुछ नहीं बिगड़ेगा। यह विपर्यय एक प्रकार से हमारे देश की अवस्थिति की तरह है जहां एक तरफ भूमंडलीकरण के बाद की दुनिया की द्रुत रफ्तार और हृदयहीन आक्रामकता है तो दूसरी तरफ पुराने वक्त की मंथरता में बसे लोगों का अबोध किंतु कारुणिक वास भी है। कितना दिलचस्प है कि कई लेखक गर्व से कहते हैं कि वे कहानियां, कविताएं, उपन्यास, आलोचना कम्प्यूटर पर लिखते हैं। लेकिन उनमें भी कम गर्व नहीं महसूस किया जा सकता जो ठाठ से कहते हैं कि वे कलम कागज के मेल से ही शब्दों का जादू उपस्थित कर पाते हैं। यहां ठहरकर हम कहना चाहेंगे कि खतरे का अंदेशा कर रहा वर्ग कम से कम इतना सहिष्णु है कि वह सामाजिक जीवन में इंटरनेट की भूमिका और उसके महत्व को नकार नहीं रहा है और न वह ऐसी किसी मुहिम का प्रणेता और समर्थक है कि इसकी विदाई में ही मनुष्यता की सुरक्षा है। उसकी चाहत अधिक से अधिक सहअस्तित्व की है कि सूचना संजाल के समानांतर उसका अपना जो अभ्यास है उसकी भी गरिमा, सौंदर्य एवं शक्ति को कमतर न आंका जाये।
अब जरा कुछ दशक पहले के वक्त पर निगाह डालें। सिनेमा के अभ्युदय में भी साहित्य की समाप्ति का दुःस्वप्न देखा गया था। टेलिविजन को सिनेमा और साहित्य दोनों का संहारक माना गया। रंगीन टेलिविजन के खिलाफ तो बकायदा वैचारिक संघर्ष हुआ था और कम्प्यूटर की भर्त्सना में बौद्धिक दुनिया ने विराट प्रतिरोध दर्ज किया था। इतना ही नहीं, हमारे कुछ महत्वपूर्ण कवियों ने कम्प्यूटर की निंदा करते हुए अपनी कविता में उसे न छूने तक की प्रतिज्ञा की थी। लेकिन समय गवाह है कि वे चीजें बदस्तूर जारी रहीं। इतना ही नहीं अपने फलक, क्षमता और प्रयोग में अनवरत अभिवृद्धि करती रहीं। यहां हमारा मंतव्य यह नहीं है कि विजयी होने पर ही कोई संघर्ष अथवा प्रतिपक्ष सार्थक होता है। या किसी प्रतिरोध की विफलता उसकी सार्थकता को संदिग्ध बनाती है। दुनिया की अनेक नैतिक, सच्ची, मानवीय लड़ाइयां कई बार परास्त हुई हैं किंतु वे मानव इतिहास की बेशकीमती धरोहर हैं। कम्प्यूटर, टेलिविजन, सिनेमा और अद्यतन इंटरनेट माध्यम को खतरे के रूप में ग्रहण करने के संदर्भ में कहना सिर्फ यह है कि संसार में विज्ञान के आविष्कारों की बुनियाद में मनुष्य और समाज की बेहतरी के स्वप्न एवं संकल्प होते हैं, यह तो सत्ताएं होती हैं जो विज्ञान की बुनियाद और सिद्धांत को लांघकर अपनी शक्ति संरचना की हिफाजत के लिए उसके दुरुपयोग की गुंजाइश बनाती हैं। इसीलिए, जैसाकि कहा गया है कि, समाज में वर्चस्वशाली वर्ग के चरित्रा के मुताबिक ही अधिभूत संरचनाओं का स्वरूप तय होता है। विज्ञान के साथ भी वही सलूक होता रहा है। विज्ञान के संदर्भ में यह भी सोचना चाहिए कि जब समाज के किसी चरण में कोई आविष्कार प्रकट हो उठता है तो वह लोगों की लाख नाराजगी, चिढ़ के बावजूद विस्थापित नहीं हो सकता है। किसी तकनीक का तिरोहण उससे उन्नत तकनीक ही कर सकती है। पुरानी अथवा यथस्थिति की तकनीक उससे लड़ाई जीतने में सर्वथा अक्षम होती है। मगर इस प्रसंग में जो एक दूसरी बात है उसका जिक्र करना यहां जरूरी है कि किताबें हों, साहित्य या अन्य कुछ हो जब उसके सम्मुख मिट जाने की चुनौती आती है तो वह अपनी अस्तित्व रक्षा के लिए अपने को परिवर्तित करता है और तत्कालीन परिस्थितियों में भी अपनी उपस्थिति को निर्धारित करता है, कई बार नये सिरे से स्थापित करता है। हमारे कथा साहित्य मेंᄉ कविता मेंᄉ जो विभिन्न बदलाव हुए हैं उनके पीछे सामाजिक, वैचारिक दबावों के साथ इस कारक का भी निश्चय ही योगदान रहा होगा। यह अनायास नहीं है कि कैमरे की ताकत का मुकाबला कथा साहित्य ने यथार्थ की अभिव्यक्ति हेतु यथार्थवाद का अतिक्रमण करके किया परिणामस्वरूप स्थैतिक कैमरा की शान गतिमान कैमरा की यांत्रिाकी के आगमन से कमतर हो गयी लेकिन कथा साहित्य ने रचनात्मकता के उत्कर्ष हासिल किये। कहना यह है कि साहित्य का स्वरूप बदला न कि शब्द और साहित्य मिट गये। यहां निवेदन करना होगा कि शासक वर्ग एक छद्म विजेता के दम्भ में कई बार यह गुमान पाल लेता है कि उसकी आंधी में तमाम लोग मिट गये। महल हो या मॉल, पांच सितारा होटल हो या सेज, बड़े बांध हों या नयी कॉलोनियांᄉ इनके निर्माण में बड़ी आबादी देखते देखते नदारद हो जाती है तब निर्माण के नियंताओं को यह वहम होने लगता है कि जो कभी वहां थे अब मिट गये किंतु वे मिटे नहीं होते हैं बल्कि वे उनकी आंखों से ओझल हो चुके होते हैं। सृजनात्मक शब्दों के संदर्भ में भी कहा जाना चाहिए कि बार बार अपने अंत का फरमान सुनने के बाद भी वे अपनी उ+ष्मा और संवेदना के साथ जीवित तथा सक्रिय हैं। थोड़ा ठहरकर यहां यह भी रेखांकित करना होगा कि उपरोक्त की भांति यह भी कम सच नहीं है कि जो सृजनात्मक शब्द नूतन परिस्थितियों के मुताबिक अपने भिन्न तेवरᄉ अपने भ्रूभंगᄉ नहीं तैयार करते वे वाकई मिटने के लिए अभिशप्त होते हैं।
जहां तक इंटरनेट द्वारा किताबों के सम्मुख पेश की गयी चुनौती का प्रश्न है तो देखने की बात है कि यह ठीक उस प्रकार की चुनौती नहीं है जैसी कैमरा ने यथार्थवाद के सामने उपस्थित की थी। यहां मूल संकट शब्द के सम्मुख नहीं कागज, छपाई और रोशनाई के सामने है। लेखक कम्प्यूटर पर रचे या हाथ से लिखे, या अमृत लाल नागर, मनोहर श्याम जोशी सरीखे रचनाकारों की तरह बोलकर सृजन करेᄉ क्या फर्क पड़ता है। इसी प्रकार विशेष फर्क नहीं पड़ता है, रचना चाहे पढ़कर ग्रहण की जाये या सुनकर। आखिर संसार की अनेक महान रचनाएं बगैर लिपि के मौखिक परम्परा में जन्मी और मौखिक परम्परा में जीवित रहीं। अपने देश का ही दृष्टांत लें, विभिन्न संस्कृतियों में उनकी अपनी अपनी लिपि की यात्राा भोजपत्रा से ई बुक और ई पत्रिाका तक पहुंची है। दरअसल यह विरुद्धों के संघर्ष की स्थिति नहीं है। आज कम्प्यूटर प्रेमी जो रचनाकार ब्लाग को अपनी अभिव्यक्ति का प्रिय माध्यम मानते हैं वे भी अंततः अपनी रचनाओं का मुद्रित रूप देखकर खुश होते हैं। इसी प्रकार इस इलाके को खास तवज्जो न देने वाले रचनाकार भी अपनी रचना और रचना के विषय में संदर्भ सामग्री इंटरनेट पर देख पढ़कर सुखी होते हैं। यह उसी तरह है जैसे मौखिक परम्परा के सृजनकर्ता की महत्वाकांक्षा मुद्रित में शामिल होना रहती है तो छपी हुई कृतियों के हर सर्जक का मोक्ष उसका मौखिक परम्परा बन जाना है।
छापाखाना का आविष्कार अभिव्यक्ति के विश्व में क्रांति की तरह था। उसने अभिव्यक्ति के लिए लोकतांत्रिाक वातावरण के निर्माण में अभूतपूर्व भूमिका का निर्वाह किया। खास यह कि छपाई ने आत्माभिव्यक्ति को राज्याश्रय के संरक्षण और दासता से आजाद होने की संजीवनी दी तो उसे पाठकों के विपुल लोक तक पहुंचाने की दिशा में वह पुल बनी। और गद्य के लिए तो वह कोख ही सिद्ध हुई। लेकिन यही छपाई तमाम अश्लील भावों, हिंसक और तानाशाह विचारों और सत्ता के पैरोकार अभिलेखों के लिए भी खाद पानी खुराक बनी। इसी मत को कम ज्यादा करके हम लिपि के लिए भी लागू कर सकते हैं। आशय यह है कि लिपि हो या मुद्रणᄉ ये गुलाम बनाने, शोषण करने के लिए मजबूत फंदे बने तो ये उनकी बेड़ियों को काटने के लिए घारदार हथियार भी बने। गैरबराबर दुनिया में किसी चीज की तरह लिपि और छपाई का भी परस्पर विपरीत प्रयोग हुआ। यही विश्लेषण इंटरनेट पर उपलब्ध शब्दलोक पर लागू होता है। छपाई का विचारों एवं भावनाओं के प्रसार में निस्संदेह महान अवदान रहा है। किंतु इससे कैसे इंकार किया जा सकता है कि इंटरनेट के अभ्युदय ने उसकी इस समस्या को आईना भी दिखाया कि वह महंगी है। वह पांडुलिपि निर्माण और उसके प्रतिलिपि निर्माण की तुलना में भले ही सस्ती और जनोन्मुख थी लेकिन इंटरनेट के आगमन के बाद वह महंगी सुविधा लगने लगी। आज बहुत सारा साहित्य, पत्रिाकाएं, ज्ञान इंटरनेट पर मुफ्त में उपलब्ध हैं जबकि किताबें और पत्रिाकाएं और अखबार अपनी कीमतें बढ़ाने के लिए अभिशप्त हैं। दूसरी ओर जैसाकि ब्लाग प्रेमियों का तर्क है : सम्पादकों, प्रकाशकों के अंकुश, दमन और तानाशाही से रचनाकारों को ब्लाग ने आजाद कर दिया है। छपाई की शक्ति संरचना और धनाभाव की समस्या ने रचनाकारों की अभिव्यक्ति की राह में जो कांटें बिछा रखे थे, ब्लाग और वेबसाइट ने उनको उससे बचाकर एक आत्मीय पनाह दी है।
यहां पर ठहरकर यह विचार करने की आवश्यकता है कि आत्माभिव्यक्ति की उपरोक्त आजादी और बाजार व्यवस्था की स्वतंत्राता में कोई समानता तो नहीं है? कहीं यह स्वतंत्राता अन्य से समाज से निरपेक्ष तो नहीं है। हिंदी साहित्य से जुड़े कुछ ब्लागों पर आत्माभिव्यक्ति की आजादी के रूप में कई बार जैसी रचनाएं और प्रतिक्रियाएं सामने आती हैं उससे लगता है कि क्या वाकई कोई स्वाधीनता ऐसी भी होती है जो आत्मनियंत्राण, जिम्मेदारी से मरहूम और भयानक वाचाल हो। लेकिन यह हर माध्यम में होता है और उस पर अंततः निर्णय उसके श्रेष्ठ उदाहरणों पर दिया जाता है न कि कमजोर और क्षरित दृष्टांतों पर। आज इसी माध्यम की मदद से पिछले दिनों कुछ देशों में सत्ताएं पलट गयीं और जनविद्रोहों का तूफान आया। विकीलीक्स ने इसी हथियार से अमेरिकी शासन की चूलें हिला दीं और कई राष्ट्रों की विकृतियों का उद्घाटन करके खलबली पैदा की है। तो इसी माध्यम पर विकृतियों के अभूतपूर्व संसार का खजाना भी है। इसलिए एक मंच के रूप में न इसके बहिष्कार की आवश्यकता है न इसके अंधाधुंध स्वीकार की। इस चौकसी में सर्वाधिक गौरतलब चीज है अंतर्वस्तु। वस्तुतः किताब बनाम इंटरनेट का द्वंद्व खड़ा करने में यह सिद्ध करने की कोशिश होती है कि अंतर्वस्तु नहीं माध्यम श्रेष्ठतर होता है। इसे पारम्परिक भाषा में कहें, इस मुहिम से निष्कर्ष निकलता है कि साध्य से साधन उच्च्तर है। भूमंडलीकरण के उपरांत मनुष्यता की विचारधारा, सरोकार और सामूहिकता से छुटकारा दिलाने की जो परियोजना चलायी जा रही है, उपर्युक्त निष्कर्ष उसकी ही फलश्रुति हैᄉयह संदेह किया जा सकता है?
अंततः हम कहना चाहेंगे कि किताब और कम्प्यूटर का अंतर्संघर्ष एक तरह से चाहे अनचाहे रचना में अतंर्वस्तु की प्रधानता को हाशिए पर धकेलता है। और यह भी कि यह एक निरर्थक झगड़ा है, क्योंकि चाहे कागज पर हो या कम्प्यूटर पर वह होगी तो किताब अथवा पत्रिाका ही।
इस बिंदु पर किताबों की तरफदारी में बार बार कही गयी और रूढ़ि बन गयी इन दलीलों को सामने रखने से कोई फायदा नहीं है कि कम्प्यूटर के बरक्स किताबों की व्याप्ति बहुत ज्यादा है। पहले यह तर्क दिया जाता था कि किताबों, अखबारों को आप बाथरूम, सफर, शयन कहीं भी ले जा सकते हैं और पढ़ सकते हैं। लैपटाप के बाद किताबों का यह बल छीन लिया गया है। आने वाले समय में हो सकता है, प्रत्येक वाहन में कम्प्यूटर हो या इतनी तरक्की हो जाय कि कम्प्यूटर के बगैर कम्प्यूटर आपके सामने हो। जैसे जल्द ही बिना की बोर्ड वाले कम्प्यूटर बाजार में आने वाले हैं जो इंसान के दिमाग के संकेतों का यथानुसार अनुपालन करेंगे। मान लीजिए विज्ञान इतना उन्नति करे कि आदमी की इच्छा होते ही उसके सामने इंटरनेट का ब्रह्मांड सक्रिय हो जाय। लेकिन तब भी शब्द की सत्ता बनी रहेगी और इसी तरह मनुष्यविरोधी और मनुष्य समर्थक शब्दों की टकराहट भी बनी रहेगी। कहना ही होगा कि जब तक शब्द रहेंगे, तब तब तक साहित्य भी रहेगा और निश्चय ही वह किताबों, पत्रिाकाओं में दर्ज होगा।
पिछले दिनों कन्हैया लाल नंदन, सुरेन्द्र मोहन, भवदेव पांडे, सोहन शर्मा, शिवराम, अनिल सिन्हा के निधन से हिन्दी साहित्य एवं समाज को अपूर्णनीय क्षति पहुंची है। इन लोगों ने अपने शब्दकर्म और अपनी सांस्कृतिक गतिविधियों से हिन्दी समाज को समृद्धि दी। तद्भव इन सभी की स्मृति को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है।
अखिलेश
अंक/23 /2011 सम्पादकीय
इन दिनों प्रायः कुछ लोगों द्वारा इस बात की चिंता प्रकट की जाती है कि इंटरनेट का विस्तार किताबों के वर्तमान स्वरूप को समाप्त कर देगा। जाहिर है, यहां आशय छपी हुई पुस्तकों से है। इसी बात को कभी यूं कहा जाता है कि एक दिन आयेगा जब कागज और रोशनाई का लोप हो जायेगा और दुनिया में छापाखाना का उद्योग बंदी के कगार पर पहुंच जायेगा। इसी प्रकार कुछ उत्साही जो इतना अंधकारपूर्व भविष्य कथन नहीं करते, कहते हैं कि इंटरनेट पर ब्लागों और वेब पत्रिाकाओं के प्रति बढ़ती रुचि एक दिन मुद्रित अखबारों और पत्रिाकाओं की किस्मत को रूंध देगी। इस चुनौती के जवाब में हिंदी का आशावादी समुदाय इतमीनान दिखाता है कि इस तरह के दुर्वचन बहुत बार कहे गये हैं किंतु छपे हुए साहित्य का कुछ नहीं बिगड़ा है और इस बार भी कुछ नहीं बिगड़ेगा। यह विपर्यय एक प्रकार से हमारे देश की अवस्थिति की तरह है जहां एक तरफ भूमंडलीकरण के बाद की दुनिया की द्रुत रफ्तार और हृदयहीन आक्रामकता है तो दूसरी तरफ पुराने वक्त की मंथरता में बसे लोगों का अबोध किंतु कारुणिक वास भी है। कितना दिलचस्प है कि कई लेखक गर्व से कहते हैं कि वे कहानियां, कविताएं, उपन्यास, आलोचना कम्प्यूटर पर लिखते हैं। लेकिन उनमें भी कम गर्व नहीं महसूस किया जा सकता जो ठाठ से कहते हैं कि वे कलम कागज के मेल से ही शब्दों का जादू उपस्थित कर पाते हैं। यहां ठहरकर हम कहना चाहेंगे कि खतरे का अंदेशा कर रहा वर्ग कम से कम इतना सहिष्णु है कि वह सामाजिक जीवन में इंटरनेट की भूमिका और उसके महत्व को नकार नहीं रहा है और न वह ऐसी किसी मुहिम का प्रणेता और समर्थक है कि इसकी विदाई में ही मनुष्यता की सुरक्षा है। उसकी चाहत अधिक से अधिक सहअस्तित्व की है कि सूचना संजाल के समानांतर उसका अपना जो अभ्यास है उसकी भी गरिमा, सौंदर्य एवं शक्ति को कमतर न आंका जाये।
अब जरा कुछ दशक पहले के वक्त पर निगाह डालें। सिनेमा के अभ्युदय में भी साहित्य की समाप्ति का दुःस्वप्न देखा गया था। टेलिविजन को सिनेमा और साहित्य दोनों का संहारक माना गया। रंगीन टेलिविजन के खिलाफ तो बकायदा वैचारिक संघर्ष हुआ था और कम्प्यूटर की भर्त्सना में बौद्धिक दुनिया ने विराट प्रतिरोध दर्ज किया था। इतना ही नहीं, हमारे कुछ महत्वपूर्ण कवियों ने कम्प्यूटर की निंदा करते हुए अपनी कविता में उसे न छूने तक की प्रतिज्ञा की थी। लेकिन समय गवाह है कि वे चीजें बदस्तूर जारी रहीं। इतना ही नहीं अपने फलक, क्षमता और प्रयोग में अनवरत अभिवृद्धि करती रहीं। यहां हमारा मंतव्य यह नहीं है कि विजयी होने पर ही कोई संघर्ष अथवा प्रतिपक्ष सार्थक होता है। या किसी प्रतिरोध की विफलता उसकी सार्थकता को संदिग्ध बनाती है। दुनिया की अनेक नैतिक, सच्ची, मानवीय लड़ाइयां कई बार परास्त हुई हैं किंतु वे मानव इतिहास की बेशकीमती धरोहर हैं। कम्प्यूटर, टेलिविजन, सिनेमा और अद्यतन इंटरनेट माध्यम को खतरे के रूप में ग्रहण करने के संदर्भ में कहना सिर्फ यह है कि संसार में विज्ञान के आविष्कारों की बुनियाद में मनुष्य और समाज की बेहतरी के स्वप्न एवं संकल्प होते हैं, यह तो सत्ताएं होती हैं जो विज्ञान की बुनियाद और सिद्धांत को लांघकर अपनी शक्ति संरचना की हिफाजत के लिए उसके दुरुपयोग की गुंजाइश बनाती हैं। इसीलिए, जैसाकि कहा गया है कि, समाज में वर्चस्वशाली वर्ग के चरित्रा के मुताबिक ही अधिभूत संरचनाओं का स्वरूप तय होता है। विज्ञान के साथ भी वही सलूक होता रहा है। विज्ञान के संदर्भ में यह भी सोचना चाहिए कि जब समाज के किसी चरण में कोई आविष्कार प्रकट हो उठता है तो वह लोगों की लाख नाराजगी, चिढ़ के बावजूद विस्थापित नहीं हो सकता है। किसी तकनीक का तिरोहण उससे उन्नत तकनीक ही कर सकती है। पुरानी अथवा यथस्थिति की तकनीक उससे लड़ाई जीतने में सर्वथा अक्षम होती है। मगर इस प्रसंग में जो एक दूसरी बात है उसका जिक्र करना यहां जरूरी है कि किताबें हों, साहित्य या अन्य कुछ हो जब उसके सम्मुख मिट जाने की चुनौती आती है तो वह अपनी अस्तित्व रक्षा के लिए अपने को परिवर्तित करता है और तत्कालीन परिस्थितियों में भी अपनी उपस्थिति को निर्धारित करता है, कई बार नये सिरे से स्थापित करता है। हमारे कथा साहित्य मेंᄉ कविता मेंᄉ जो विभिन्न बदलाव हुए हैं उनके पीछे सामाजिक, वैचारिक दबावों के साथ इस कारक का भी निश्चय ही योगदान रहा होगा। यह अनायास नहीं है कि कैमरे की ताकत का मुकाबला कथा साहित्य ने यथार्थ की अभिव्यक्ति हेतु यथार्थवाद का अतिक्रमण करके किया परिणामस्वरूप स्थैतिक कैमरा की शान गतिमान कैमरा की यांत्रिाकी के आगमन से कमतर हो गयी लेकिन कथा साहित्य ने रचनात्मकता के उत्कर्ष हासिल किये। कहना यह है कि साहित्य का स्वरूप बदला न कि शब्द और साहित्य मिट गये। यहां निवेदन करना होगा कि शासक वर्ग एक छद्म विजेता के दम्भ में कई बार यह गुमान पाल लेता है कि उसकी आंधी में तमाम लोग मिट गये। महल हो या मॉल, पांच सितारा होटल हो या सेज, बड़े बांध हों या नयी कॉलोनियांᄉ इनके निर्माण में बड़ी आबादी देखते देखते नदारद हो जाती है तब निर्माण के नियंताओं को यह वहम होने लगता है कि जो कभी वहां थे अब मिट गये किंतु वे मिटे नहीं होते हैं बल्कि वे उनकी आंखों से ओझल हो चुके होते हैं। सृजनात्मक शब्दों के संदर्भ में भी कहा जाना चाहिए कि बार बार अपने अंत का फरमान सुनने के बाद भी वे अपनी उ+ष्मा और संवेदना के साथ जीवित तथा सक्रिय हैं। थोड़ा ठहरकर यहां यह भी रेखांकित करना होगा कि उपरोक्त की भांति यह भी कम सच नहीं है कि जो सृजनात्मक शब्द नूतन परिस्थितियों के मुताबिक अपने भिन्न तेवरᄉ अपने भ्रूभंगᄉ नहीं तैयार करते वे वाकई मिटने के लिए अभिशप्त होते हैं।
जहां तक इंटरनेट द्वारा किताबों के सम्मुख पेश की गयी चुनौती का प्रश्न है तो देखने की बात है कि यह ठीक उस प्रकार की चुनौती नहीं है जैसी कैमरा ने यथार्थवाद के सामने उपस्थित की थी। यहां मूल संकट शब्द के सम्मुख नहीं कागज, छपाई और रोशनाई के सामने है। लेखक कम्प्यूटर पर रचे या हाथ से लिखे, या अमृत लाल नागर, मनोहर श्याम जोशी सरीखे रचनाकारों की तरह बोलकर सृजन करेᄉ क्या फर्क पड़ता है। इसी प्रकार विशेष फर्क नहीं पड़ता है, रचना चाहे पढ़कर ग्रहण की जाये या सुनकर। आखिर संसार की अनेक महान रचनाएं बगैर लिपि के मौखिक परम्परा में जन्मी और मौखिक परम्परा में जीवित रहीं। अपने देश का ही दृष्टांत लें, विभिन्न संस्कृतियों में उनकी अपनी अपनी लिपि की यात्राा भोजपत्रा से ई बुक और ई पत्रिाका तक पहुंची है। दरअसल यह विरुद्धों के संघर्ष की स्थिति नहीं है। आज कम्प्यूटर प्रेमी जो रचनाकार ब्लाग को अपनी अभिव्यक्ति का प्रिय माध्यम मानते हैं वे भी अंततः अपनी रचनाओं का मुद्रित रूप देखकर खुश होते हैं। इसी प्रकार इस इलाके को खास तवज्जो न देने वाले रचनाकार भी अपनी रचना और रचना के विषय में संदर्भ सामग्री इंटरनेट पर देख पढ़कर सुखी होते हैं। यह उसी तरह है जैसे मौखिक परम्परा के सृजनकर्ता की महत्वाकांक्षा मुद्रित में शामिल होना रहती है तो छपी हुई कृतियों के हर सर्जक का मोक्ष उसका मौखिक परम्परा बन जाना है।
छापाखाना का आविष्कार अभिव्यक्ति के विश्व में क्रांति की तरह था। उसने अभिव्यक्ति के लिए लोकतांत्रिाक वातावरण के निर्माण में अभूतपूर्व भूमिका का निर्वाह किया। खास यह कि छपाई ने आत्माभिव्यक्ति को राज्याश्रय के संरक्षण और दासता से आजाद होने की संजीवनी दी तो उसे पाठकों के विपुल लोक तक पहुंचाने की दिशा में वह पुल बनी। और गद्य के लिए तो वह कोख ही सिद्ध हुई। लेकिन यही छपाई तमाम अश्लील भावों, हिंसक और तानाशाह विचारों और सत्ता के पैरोकार अभिलेखों के लिए भी खाद पानी खुराक बनी। इसी मत को कम ज्यादा करके हम लिपि के लिए भी लागू कर सकते हैं। आशय यह है कि लिपि हो या मुद्रणᄉ ये गुलाम बनाने, शोषण करने के लिए मजबूत फंदे बने तो ये उनकी बेड़ियों को काटने के लिए घारदार हथियार भी बने। गैरबराबर दुनिया में किसी चीज की तरह लिपि और छपाई का भी परस्पर विपरीत प्रयोग हुआ। यही विश्लेषण इंटरनेट पर उपलब्ध शब्दलोक पर लागू होता है। छपाई का विचारों एवं भावनाओं के प्रसार में निस्संदेह महान अवदान रहा है। किंतु इससे कैसे इंकार किया जा सकता है कि इंटरनेट के अभ्युदय ने उसकी इस समस्या को आईना भी दिखाया कि वह महंगी है। वह पांडुलिपि निर्माण और उसके प्रतिलिपि निर्माण की तुलना में भले ही सस्ती और जनोन्मुख थी लेकिन इंटरनेट के आगमन के बाद वह महंगी सुविधा लगने लगी। आज बहुत सारा साहित्य, पत्रिाकाएं, ज्ञान इंटरनेट पर मुफ्त में उपलब्ध हैं जबकि किताबें और पत्रिाकाएं और अखबार अपनी कीमतें बढ़ाने के लिए अभिशप्त हैं। दूसरी ओर जैसाकि ब्लाग प्रेमियों का तर्क है : सम्पादकों, प्रकाशकों के अंकुश, दमन और तानाशाही से रचनाकारों को ब्लाग ने आजाद कर दिया है। छपाई की शक्ति संरचना और धनाभाव की समस्या ने रचनाकारों की अभिव्यक्ति की राह में जो कांटें बिछा रखे थे, ब्लाग और वेबसाइट ने उनको उससे बचाकर एक आत्मीय पनाह दी है।
यहां पर ठहरकर यह विचार करने की आवश्यकता है कि आत्माभिव्यक्ति की उपरोक्त आजादी और बाजार व्यवस्था की स्वतंत्राता में कोई समानता तो नहीं है? कहीं यह स्वतंत्राता अन्य से समाज से निरपेक्ष तो नहीं है। हिंदी साहित्य से जुड़े कुछ ब्लागों पर आत्माभिव्यक्ति की आजादी के रूप में कई बार जैसी रचनाएं और प्रतिक्रियाएं सामने आती हैं उससे लगता है कि क्या वाकई कोई स्वाधीनता ऐसी भी होती है जो आत्मनियंत्राण, जिम्मेदारी से मरहूम और भयानक वाचाल हो। लेकिन यह हर माध्यम में होता है और उस पर अंततः निर्णय उसके श्रेष्ठ उदाहरणों पर दिया जाता है न कि कमजोर और क्षरित दृष्टांतों पर। आज इसी माध्यम की मदद से पिछले दिनों कुछ देशों में सत्ताएं पलट गयीं और जनविद्रोहों का तूफान आया। विकीलीक्स ने इसी हथियार से अमेरिकी शासन की चूलें हिला दीं और कई राष्ट्रों की विकृतियों का उद्घाटन करके खलबली पैदा की है। तो इसी माध्यम पर विकृतियों के अभूतपूर्व संसार का खजाना भी है। इसलिए एक मंच के रूप में न इसके बहिष्कार की आवश्यकता है न इसके अंधाधुंध स्वीकार की। इस चौकसी में सर्वाधिक गौरतलब चीज है अंतर्वस्तु। वस्तुतः किताब बनाम इंटरनेट का द्वंद्व खड़ा करने में यह सिद्ध करने की कोशिश होती है कि अंतर्वस्तु नहीं माध्यम श्रेष्ठतर होता है। इसे पारम्परिक भाषा में कहें, इस मुहिम से निष्कर्ष निकलता है कि साध्य से साधन उच्च्तर है। भूमंडलीकरण के उपरांत मनुष्यता की विचारधारा, सरोकार और सामूहिकता से छुटकारा दिलाने की जो परियोजना चलायी जा रही है, उपर्युक्त निष्कर्ष उसकी ही फलश्रुति हैᄉयह संदेह किया जा सकता है?
अंततः हम कहना चाहेंगे कि किताब और कम्प्यूटर का अंतर्संघर्ष एक तरह से चाहे अनचाहे रचना में अतंर्वस्तु की प्रधानता को हाशिए पर धकेलता है। और यह भी कि यह एक निरर्थक झगड़ा है, क्योंकि चाहे कागज पर हो या कम्प्यूटर पर वह होगी तो किताब अथवा पत्रिाका ही।
इस बिंदु पर किताबों की तरफदारी में बार बार कही गयी और रूढ़ि बन गयी इन दलीलों को सामने रखने से कोई फायदा नहीं है कि कम्प्यूटर के बरक्स किताबों की व्याप्ति बहुत ज्यादा है। पहले यह तर्क दिया जाता था कि किताबों, अखबारों को आप बाथरूम, सफर, शयन कहीं भी ले जा सकते हैं और पढ़ सकते हैं। लैपटाप के बाद किताबों का यह बल छीन लिया गया है। आने वाले समय में हो सकता है, प्रत्येक वाहन में कम्प्यूटर हो या इतनी तरक्की हो जाय कि कम्प्यूटर के बगैर कम्प्यूटर आपके सामने हो। जैसे जल्द ही बिना की बोर्ड वाले कम्प्यूटर बाजार में आने वाले हैं जो इंसान के दिमाग के संकेतों का यथानुसार अनुपालन करेंगे। मान लीजिए विज्ञान इतना उन्नति करे कि आदमी की इच्छा होते ही उसके सामने इंटरनेट का ब्रह्मांड सक्रिय हो जाय। लेकिन तब भी शब्द की सत्ता बनी रहेगी और इसी तरह मनुष्यविरोधी और मनुष्य समर्थक शब्दों की टकराहट भी बनी रहेगी। कहना ही होगा कि जब तक शब्द रहेंगे, तब तब तक साहित्य भी रहेगा और निश्चय ही वह किताबों, पत्रिाकाओं में दर्ज होगा।
पिछले दिनों कन्हैया लाल नंदन, सुरेन्द्र मोहन, भवदेव पांडे, सोहन शर्मा, शिवराम, अनिल सिन्हा के निधन से हिन्दी साहित्य एवं समाज को अपूर्णनीय क्षति पहुंची है। इन लोगों ने अपने शब्दकर्म और अपनी सांस्कृतिक गतिविधियों से हिन्दी समाज को समृद्धि दी। तद्भव इन सभी की स्मृति को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है।
अखिलेश
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