Monday, January 9, 2012

इन दिनो कर्मनाशा से भाप उठ रही होगी !



इस महादेश का वृत्त चित्र :


सिद्धेश्वर की ये कविताएं आप को एक एसेंशियल यायावरी पर ले जाती हैं . यह यायावरी कर्मनाशा और तमसा के घाटों से ले कर कौसानी और शिमला की पहाड़ियों तक चलती है. इस यायावरी मे आप हिमालय की तराईयों ले कर विध्याँचल के पार तक पहुँच जाते हैं.... बल्कि ट्राँस हिमालय के अकूत- अकथ तिलिस्म तक का आस्वाद ले लेते हैं . ये कविताऎं आप को बेचैन नहीं करती न ही कोई आध्यात्मिक क़िस्म की सांत्वनाएं देती हैं बल्कि स्टेप बाई स्टेप आप की आँखें खोलती हैं , चीज़ों को देखने का शऊर देती हैं. इस यात्रा मे आप के अन्दर उत्तरोत्तर एक समझ पकती है जो आप की तिलमिलाहट और खीझ को डाईल्यूट कर के आप को एक ठोस कौतूहल और एक सकारात्मक विस्मय सौंपती है जो आज जीवन मे नदारद है . अँधेरा इस यात्रा का स्थायी भाव है. जहाँ अँधेरा नही है, वहाँ धुँधलका तो है ही और बार बार यह धुँधलका छँटता है, कभी चकाचौँध की स्थिति भी आती है . उस कौँध मे आप को कुछ ऐसे ‘लोकेल’ मिलेंगे जिन से आप का सामना अक्सर ही होता रहा होगा , लेकिन आप की असावधान आखों ने जिन्हे बेतरह “मिस” कर दिया होगा . यही कारण है कि यह यायावरी एक पर्यटक की यायावरी क़तई नही है. सिद्धेश्वर का कवि इस पूरी यात्रा मे एक सहज साधारण आम आदमी की नज़र से चीज़ों को देखता हुआ ; कभी अचम्भित, कभी प्रफुल्लित और कभी आहत होता हुआ ; कहीं एक दम उस लोकेल मे घुल मिल जाता हुआ और कहीं सहसा कट कर उस मे ‘छूट’ सा जाता हुआ चलता है........ बड़ी बात यह है कि साथ ही साथ बहुत ज़रूरी टिप्पणियाँ करता चलता है . उस से भी बड़ी बात यह है कि इन टिप्पणियों मे न तो बड़े बड़े दावे हैं, न ही कोई बड़ा नारा. इन कविताओं को पढ़ कर पता चलता है कि सिद्धेश्वर एक सजग और बहुश्रुत कवि हैं. लेकिन कहीं भी कविता पर अपनी विद्वता को हावी नही होने देते और न ही स्थानिक या वैश्विक उथल पुथल और मारा मारी के प्रति अपनी सजगता को अपनी कविता का मुद्दा बनाते हैं . बल्कि इस सब के प्रति वे बहुत *कूल*, स्थिर और परिपक्वता पूर्ण तरीक़े से रिएक्ट करते हैं .

इस कवि की चेतना मे पंजाब का कवि पाश एक विचार की तरह बैठा दिखाई देता है . उसे पता है कि , “बीच का कोई रास्ता नही है” लेकिन इस बात को ले कर बहुत शोर मचाने की बजाय उसे चुपचाप अपना काम करते रहना पसन्द है . हालाँकि अंत मे अपने कथित काम के औचित्य पर सवाल खड़ा करना भी नही भूलता . यह कवि बड़ी उत्सुकता से बौद्धिक गोष्ठियों के सभागारों के बिम्ब खींचता है जहाँ के नीम अँधियारे से लौटते हुए दो ज़रूरी शब्द नोट करना कभी नही भूलता – “उम्मीद” , और “कविता” ! जब किसी कस्बे के चौराहे पर धुँधलका देख ठिठक कर स्कूटर रोकता है तो पूरे बाज़ार की पड़्ताल कर डालता है. वह् बाज़ार मे बिकती इमरतियाँ , जलेबियाँ ,मूँगफलियाँ , काठ के हस्तशिल्प , यहाँ तक कि रेहड़ियों और फड़ों के अँधेरे का फायदा उठा कर फल सब्ज़ियों मे सेंध मारने वाले कीड़े भी देख लेता है . एक उदास उजाड़ रेलवे स्टेशन इस यात्रा मे बार बार आता है – एक सपने की तरह ; और कवि इस के चित्र बनाने मे खूब रमता है. इस के अलावा इस कवि के सपनो मे बहुत कुछ आता है— काफल , आड़ू , सेब , खुमानी , रस्सों के पुल , सीढ़ीदार खेत , और स्कूल जाते बच्चों के बीच कभी अचानक मुक्तिबोध दिखाई दे जाते है – तेंदु पत्तों के गोदाम के बाहर सीढ़ियों पर बीड़ी पीते हुए !

इस यात्रा मे सुदूर दक्कन के अलवार भक्तों से ले कर जंगल को कलम बना देने वाले कबीर तक से आप की मुलाक़ात हो जाएगी . निराला की ‘पत्थर तोड़ती स्त्री’ और निर्मल वर्मा के ‘वे दिन’ भी नज़र आएंगे . पर्वतों पर सोना उडेलते कवि पंत मिल जाएंगे . वली दक्कनी का अपमानित तिरस्कृत भग्न मज़ार भी दिख जाएगा और अपने निखालिस प्रकाश मे सराबोर आधुनिक कवि वेणुगोपाल और उन को इस विशेषण के साथ स्मरण करने वाले वीरेन डंगवाल भी . लेकिन परम्परा यहाँ जड़ हो कर स्थिर नही हो गई है. यह कवि परम्परा से अभिभूत हो कर बैठ नही गया है. वह तो जैसे अपने तमाम प्रिय साहित्यिकों के काम मे कुछ नया जोड़ लेना चाहता है . मसलन पत्थर तोड़ती स्त्री के बारे कवि कहता है कि वो अब भी वहीं है, लेकिन एक अंतर आ गया है जिसे अनदेखा नही किया जा सकता :

“ धीरे - धीरे
ऊपर उठ रहे हैं उसके नत नयन
और समूचे इलाहाबाद को दो फाँक करते हुए
कहीं दूर देख रहे हैं।
अपने खुरदरे हाथों के जोर से
वह कूट - पीस कर एक कर देना चाहती है
दुनिया के तमाम छोटे - बड़े पत्थर”

यह कवि जितनी बारीक़ी से “भाषा के गोदामों” को खंगालता है उतनी ही शिद्दत से भूगोल के कंटुअर भी जाँच लेता है. और वो कंटुअर जब संघर्षशील आदमी की खुर्दुरी हथेलियों के हों तो कविता सहज ही समय के पार जा कर अपनी बुलन्दी अख्तियार कर लेती है :

“हथेलियों में कई तरह की नदियाँ होती हैं
कुछ उफनती
कुछ शान्त - मंथर - स्थिर
और कुछ सूखी रेत से भरपूर.
कभी इन्हीं पर चलती होंगीं पालदार नावें
और सतह पर उतराता होगा सिवार.
हथेलियों के किनार नहीं बसते नगर - महानगर
और न ही लगता है कुम्भ - अर्धकुम्भ या सिंहस्थ
बस समय के थपेड़ों से टूटते हैं कगार
और टीलों की तरह उभर आते हैं घठ्ठे”

इस तरह इन कविताओं का यायावर एक साथ भाषा,विचार , इतिहास और भूगोल के दरमियान विचरण करता है और सहज ही आप को भी इन तमाम सीमाओं के पार ले जाता है.मानो इस महादेश और उस के जन को , और उस के सच को , स्वप्नो को, उम्मीदों को बहुत क़रीब से दिखा देना चाहता हों . आप ज़रूर देखना चाहेंगे सिद्धेश्वर की आँखों से !!

- अजेय
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कविता संग्रह : कर्मनाशा

कवि : सिद्धेश्वर सिंह

प्रकाशक : अंतिका प्रकाशन
सी-56/यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन, एकसटेंशन-II, गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.)
फोन : 0120-2648212 मोबाइल नं.9871856053
ई-मेल: antika.prakashan@antika-prakashan.com, antika56@gmail.com
मूल्य : रु. 225

Sunday, January 8, 2012

मेरी आँखें चमकने लगी हैं सितारों की तरह

हालीना पोस्वियातोव्सका (१९३४-१९६७)  की कवितायें पढ़ते समय हम इस बात से सजग रहते हैं कि पोलिश कविता की समृद्ध और गौरवमयी परम्परा में वह एक महत्वपूर्ण   बेहद जरूरी कड़ी हैं मेरे द्वारा किए गए ( किए जा रहे) उनकी  बहुत - सी कविताओं के अनुवाद  आप यहाँ हमारे  इस ठिकाने  'कबाड़ख़ाना' प,' , 'कर्मनाशा' पर तथा 'शब्द योग' , 'अक्षर' कुछ अन्य  पत्र - पत्रिकाओं में  पढ़ चुके हैं। संतोष है  कि विश्व कविता से प्रेम रखने वाली हिन्दी बिरादरी में इन्हें पसन्द किया गया है। आभार।  इसी क्रम में आज प्रस्तुत है एक  उनकी  एक और कविता 'विवश राग': 


हालीना पोस्वियातोव्सका की कविता

विवश राग 
( अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह )

मैंने प्रेम के वृक्ष से तोड़ ली एक टहनी
और उसको
दबा दिया मिट्टी की तह में
देखो तो
किस कदर खिल उठा है मेरा उपवन।

संभव नहीं
कि कर दी जाय प्रेम की हत्या
किसी भी तरह।

यदि तुम उसे दफ़्न कर दो धरती में
तो वह उग आएगा दोबारा
यदि तुम उसे उछाल दो हवा में
तो पंख बन जायेंगे उसके पल्लव
यदि तुम उसे गर्त कर दो पानी में
तो वह तैरेगा बेखौफ़ मछली की तरह
और यदि ज़ज्ब दो उसे रात में
तो और निखर आएगी उसकी कान्ति।

इसलिए
मैंने चाहा कि प्रेम को दफ़्न कर दूँ अपने हृदय में
लेकिन मेरा हृदय बन गया प्रेम का वास- स्थान
मेरे हृदय ने खोले अपने हृदय - द्वार
इसकी हृदय - भित्तियों को भर दिया गीत - संगीत से
और मेरा हृदय नृत्य करने लगा पंजों के बल।

इसलिए
मैंने प्रेम को दफ़्न कर लिया अपने मस्तिष्क में
किन्तु लोग पूछने लगे
कि क्यों मेरा ललाट हो गया है फूल की मानिन्द
कि क्यों मेरी आँखें चमकने लगी हैं सितारों की तरह
और क्यों मेरे होंठ हो गए हैं
सुबह की लालिमा से भी अधिकाधिक सुर्ख।

मैंने आत्मसात कर लिया प्रेम को
और सहेज लिया इसे सहज ही
किन्तु इसके आस्वाद के लिए मैं हूँ अवश
लोग पूछते हैं कि क्यों मेरे हाथ बंधनयुक्त हैं प्रेम से
और क्यों मैं हूँ उसकी परिधि में पराधीन।

Thursday, January 5, 2012

मैं कुत्तों के बारे में जो जानता हूँ : ओरहन पामुक

ओरहन पामुक नोबेल पुरस्कार से सम्मानित तुर्की के गद्यकार हैं | निजी जिंदगी के बारे में उन्होंने सुन्दर बहते हुए गद्य को माध्यम बनाते हुए लिखा है | प्रस्तुत अंश उनकी किताब 'अदर कलर्स' से लिया है |



ह एक मटमैले रंग का कुत्ता था, साधारण से बहुत ज्यादा अलग नहीं | यह अपनी पूंछ हिला रहा था | इसकी आँखें उदास थी | इसने हमें वैसे नहीं सूंघा जैसे उत्सुक कुत्ते सूंघते हैं | अपनी दर्दीली आँखों का प्रयोग कर उसने हमें जानने की कोशिश की | और जब उसने ऐसा कर लिया, तो उसने अपनी गीली नाक गाड़ी में सटा ली |
चुप्पी | रुया डर गयी थी | उसने अपने पाँव पीछे किये और मेरी तरफ देखा |
"डरो मत " मैं फुसफुसाया | मैं अपनी सीट से उठकर रुया की तरफ आ गया |
कुत्ता भी पीछे हट गया | हम दोनों ने साथ मिलकर उसे सावधानी से जांचा | एक चार पैर वाला प्राणी | एक कुत्ते के जैसा बनना कैसा होता होगा ? मैंने अपनी आँखें बंद कर ली | और मैं सोचने लगा कि एक कुत्ते के जैसा होना कैसा होता होगा | कुत्तों के बारे में मैं जो भी चीजें जानता था मैंने उन्हें दुबारा याद करने की कोशिश की |

1 . हाल में मेरा एक इंजिनियर दोस्त मुझे बता रहा था कि उसने कैसे सिवास कांगल को कुछ अमरीकियों को बेच दिया | उसने तब मुझे जो विवरण पुस्तिका दिखाई उसमे जिस कुत्ते का चित्र दिया था वह ताकतवर, सुन्दर तथा तना हुआ कांगल था | जिसका शीर्षक कहता था, "हेलो, मैं एक तुर्की कांगल हूँ | मेरी औसत उंचाई [इतने सेंटीमीटर] है, मेरी उम्र [इतने साल] है, मैं इतना बुद्धिमान हूँ, और यह मेरी नस्ल है | कुछ समय पहले, हमारा एक दोस्त  खो गया, लेकिन हम उसकी गंध का चार सौ मील दूर से पीछा करते रहे जब तक कि हमने उसे ढूंढ नहीं लिया | तो हम इतने ज्यादा चालाक और वफादार है," आदि आदि |

2 .  तुर्की कॉमिक्सों और अनुवादित तुर्की कॉमिक्सों में कुत्ते 'हाव' करते हैं! लेकिन विदेशी कॉमिक्सों में कुत्ते 'वूफ' करते हैं !

कुत्तों के बारे में मैं इतना ही जानता था | मैंने कोशिश की , लेकिन कुछ ज्यादा सोच नहीं सका | मैंने अपनी जिंदगी में दसियों हजारों कुत्ते देखे होंगे, लेकिन दिमाग में कुछ और नहीं आया | बेशक, सिवाय इसके, कि कुत्तों के दांत पैने होते हैं और वे गुर्राते हैं |
"पापा, आप क्या कर रहे हो ?" रुया ने पूछा, "ऐसे अपनी आँखें बंद मत करो , मुझे ऊब होती है |"
मैंने अपनी आँखें खोली, "ड्राईवर" मैंने कहा, "यह कुत्ता कहाँ से है ?"
"कुत्ता कहाँ है ?" उसने पूछा, और तब मैंने उसे दिखाया | "वे कुत्ते आगे कूड़े के ढेर की तरफ सीधा बढ़ रहे हैं |" ड्राईवर ने कहा |
कुत्ते ने अपने आगे की ओर सीधा देखा, जैसे वह जानता हो कि हम उसके बारे में ही बात कर रहे हैं |
"सर्दियों में वे भूखे हो जाते हैं , कष्ट में रहते हैं, एक दूसरे को ही नोच डालते हैं |"
एक सन्नाटा छा गया, लम्बे समय तक कोई नहीं बोला |
"पापा, मैं ऊब गयी हूँ ," रुया ने कहा |
"ड्राईवर, चलो , चलते हैं," मैंने कहा |

जब गाड़ी चलने लगी , रुया ने अपना ध्यान  पेड़ों, समंदर, और रास्ते पर लगा दिया था और मुझे भी भूल गयी थी | तब मैंने दुबारा अपनी आँखें बंद की और एक आखिरी बार याद करने की कोशिश की जो मैं कुत्तों के बारे में जानता हूँ |

3 . एक बार एक कुत्ता था जो मुझे बेहद पसंद था | अगर मुझे आखिरी बार देखे हुए उसे ज्यादा समय हो जाता तो मुझे देखकर वह हर्षोन्माद में अपनी पीठ के बल जमीन पर तड़पता रहता, और खुद को गीला कर देता, इस उम्मीद में कि मैं उसे प्यार भरी थपकी दूंगा | उन्होंने उसे जहर दे दिया, और वो मर गया |

4 . कुत्ते का चित्र बनाना आसान होता है |

5 . पड़ोस में एक जगह, जहाँ मेरा एक दोस्त रहता था, वहां एक कुत्ता था जो किसी गरीब राहगीर पर काफी जोर से भूँका करता था, लेकिन अमीर को वह बिना कोई आवाज किये बेरोकटोक जाने देता था |

6 . कुत्ते के साथ फर्श पर घिसटती हुई टूटी हुई सांकल की आवाज मुझे डरा देती है | शायद यह मुझे किसी बेहद बुरी चीज की याद दिला देता है

7 वहां पर उस कुत्ते ने हमारा पीछा नहीं किया |

मैंने अपनी आँखें खोलीं और यह मैंने सोचा: लोग असल में बहुत कम याद रखते हैं | मैं इस दुनिया में दसियों हजारों कुत्ते देख चुका हूँ, और जब भी देखा है हमेशा मुझे वे खूबसूरत से प्रतीत हुए है | दुनिया हमें इसी तरह से आश्चर्यचकित करती है | यहाँ है , वहां है , हमारे पास है | तब यह धुंधली होती जाती है, सब कुछ सिफ़र में बदल जाता है |

8 . इस भाग को लिखने और पत्रिका में छपवाने के दो साल बाद, मेकका पार्क में कुत्तों के एक झुण्ड ने मुझ पर हमला किया | उन्होंने मुझे काटा | मुझे सुल्तान्हमेत के रेबीज़ हॉस्पिटल में पांच टीके लगाने पड़े |

Tuesday, January 3, 2012

लिरिक्स क्या हैं यार इस गाने के

ये हम लोग अक्सर आपस में पूछा करते हैं , "लिरिक्स क्या हैं यार ?"  फिल्म ममी के विडियो के साथ यह गीत बहुत लोकप्रिय हुआ था | चेब खालिद, रचिद ताहा , फौदेल का नाम इसके गायकों में आया | इसका एक भी शब्द समझ नहीं आता, इसके बावजूद मुझे प्रिय है, और इस तरह इसे पसंद करने वालों में मैं अकेला नहीं | बाकी, मेलोडी खाओ , खुद जान जाओ |



अगर आप में से कोई गीत के बोल , और उसका अर्थ समझा सके तो बड़ी मेहरबानी |

Sunday, January 1, 2012

चार्ली चैप्लिन के बारे में बस्टर कीटन



सच कहूँ तो मुझे नहीं लगता कि चार्ली राजनीति, इतिहास या अर्थशास्त्र के बारे में मुझसे ज्यादा जानता होगा | मेरी ही तरह उसे भी मेक अप टॉवेल से पीट दिया गया , इससे पहले कि वह डायपर से बाहर आता | बड़े होते समय हम दोनों में से किसी के पास समय नहीं था कि हम शो बिजनेस के अलावा कुछ और पढ़ सकें | लेकिन चार्ली काफी जिद्दी इंसान है, और जब उसके कम्युनिज्म के समर्थन में बात करने के अधिकार को चुनौती दी गयी , तो वह बस अपनी बात पर अड़ गया |



कुछ इस तरह की अफवाहों के बारे में भी लिखा गया है कि चार्ली किसी दिन वापस अमेरिका आना चाहता है | मैं उम्मीद करता हूँ कि ऐसा हो | उससे भी ज्यादा मैं उम्मीद करता हूँ कि वह दुबारा फिल्में बनाना शुरू करने के अपने वादे को निभाए |


आज तक कोई भी इतने सारे लोगों को नहीं हँसा सका है, जितना चार्ली, उसके 'लिटिल ट्रैम्प' से | और इतिहास में कभी ऐसा समय नहीं आया , जब इतने ज्यादा लोगों को अपने डर और दुःख भुलाने के लिए चार्ली के ट्रैम्प जैसे किसी की जरुरत महसूस हुई हो |

: अपनी आत्मकथा 'माय वंडरफुल वर्ल्ड ऑफ स्लैपस्टिक' में बस्टर कीटन

फिर मंदिर को कोई मीरा दीवानी दे मौला

[फोटो : गुजरे साल की एक उदास शाम , नगर रोड, पुणे ]


मौला वही पुरानी आरजुएं हैं | वही पुराने हालात हैं | तुझे हम बेशक पागल लगते होंगे जो वक़्त के हर एक टुकड़े के बाद वही दुखड़ा शुरू करते हैं | लेकिन वही हम हैं | दुनिया को थोडा और बेहतर कर दे, गर ये बेहतर है तो |

ये नए साल की शुरुआत, गुजरे साल की उसी एक मखमली अहसास के लिए जिसने हमारी दुआ को अपनी आवाज के हाथ पहना दिए |



आप सबको नए साल की बहुत बहुत शुभकामनाएं |

Friday, December 30, 2011

बेनी हिल और घटिया दर्जे का ह्यूमर

बेनी हिल कोई मानीखेज या अलहदा टाइप कुछ भी नहीं थे | बस जब भी उनका शो देखा है , हंसा हूँ | आप को शायद घटिया दर्जे का लगे, जैसा कि बहुत सारे आलोचकों को लगता है | बदहाली के दिनों में जब करने को कुछ नहीं था, उनके काफी शो डाउनलोड करके देखे | थोड़ी देर के लिए ही सही , काफी निचले दर्जे के ह्यूमर का सहारा लेकर ही सही , अपनी दुनिया से खुद को बेदखल करने में कामयाब रहा हूँ | बहरहाल मुंह बंद रखता हूँ , और आप देखिये ये विडियो |




बहरहाल जिन्हें बेनी हिल पसंद आये या पहले से पसंद हों तो विकिपीडिया तो है ही , एक बढ़िया लिंक ये भी है

एक कहानी जो मैं कहना नहीं चाहता

जापान में जन्मे अकिरा कुरोसावा (१९१०-१९९८  दुनिया के  बेहतरीन फिल्मकारों में से एक हैं | सेवेन समुराई, योजिम्बो, कगेमुषा, ड्रीम्स, राशोमोन, रैन उनकी कुछ ऐसी फिल्मों में से हैं जो आज भी देखने वालों पर न खत्म होने वाला प्रभाव छोड़ जाते हैं | हेइगो उनके बड़े भाई और मार्गदर्शक थे | १९३३ में हेइगो ने ख़ुदकुशी कर ली | पचास साल बाद अपनी आत्मकथा 'समथिंग लाइक एन आटोबायोग्राफी' में अकिरा ने इस घटना का जिक्र किया है |


Photo: Akira's persona and Van Gogh in Akira Kurosawa's Dreams

ऐसी कहानी सुनाने के बाद जो मुझे बुरा महसूस कराती हो, मुझे जारी रहना चाहिए और उस बारे में लिखना चाहिए जो मैं दुबारा नहीं देखना चाहूँगा | यह मेरे भाई की मृत्यु से सम्बंधित है | इसके बारे में लिखना मेरे लिए बेहद पीड़ादायी है , लेकिन अगर मैं इस बारे में चर्चा नहीं करूँगा, तो मैं आगे जारी नहीं  रख पाऊंगा | जिंदगी के स्याह पहलुओं की एक झलक देखने के बाद, मुझे अचानक अपने माता-पिता के घर जाने की जरूरत महसूस होने लगी | अब यह साफ़ हो गया था कि आगे से अब सारी विदेशी फ़िल्में बोलने वाली फिल्में होंगी , और उन्हें दिखाने वाले सिनेमाघरों ने एक सार्वभौमिक सा नियम बनाया कि उन्हें अब दृश्य का वर्णन करने वालों की कोई जरुरत नहीं रही | बड़ी संख्या में वर्णनकर्ता निकाले जाने लगे, और, इसे सुनकर, वे लोग हड़ताल पर चले गए | मेरा भाई, जो हड़तालियों का अगुआ बना था, काफी बुरे दौर से गुजर रहा था | मेरे लिए यह सही नहीं था कि लगातार अपने आप को उस पर थोपता रहूँ | मैं घर चला गया | मेरे माता-पिता , जो मेरी पिछली कुछ सालों की मेरी जिंदगी के बारे में कुछ नहीं जानते थे , उन्होंने मेरा स्वागत किया ऐसा जैसे मैं रेखाचित्रों के अध्ययन के लिए दूर गया था | मेरे पिता जैसे सब कुछ जानना चाहते थे कि मैं किस तरह की चित्रकला का अध्ययन कर रहा था , तो मेरे पास कोई रास्ता नहीं बचा था इसके अलावा कि मैं सच के बारे में चुप ही रहूँ और जहाँ तक हो सके झूठ बोलूं | मेरे पिता की उम्मीदें मुझे एक कलाकार के रूप में देखना, यह देखकर मैंने दुबारा चित्रकार बनने की सोची | मैं दुबारा से रेखाचित्र बनाने लगा, मैं तैलचित्र बनाना चाहता था | लेकिन घर का खर्चा मेरी बड़ी बहन उठा रही थी, जिसने मोरिमुरा गकुएँ के एक अध्यापक से विवाह किया था | मैं उनसे रंग और कैनवस नहीं मांग सकता था | इसलिए मैंने रेखाचित्र बनाये |

इन सबके बीच, एक दिन हमने मेरे भाई के आत्महत्या की कोशिश के बारे में सुना | मुझे यकीन था कि इसकी वजह उसकी हडताली वर्णनकर्ताओं के मुखिया बनने की दर्दनाक स्थिति थी, जो असफल रही थी | मेरे भाई ने यह सोचकर इस्तीफा दे दिया था कि जब फिल्म तकनीक इतनी विकसित हो चुकी है कि अब फिल्मों में आवाज भी शामिल की जाने लगी है, तो वर्णनकर्ताओं की जरूरत नहीं रह जायेगी | जबकि वह जानता था कि वह हारी हुई लड़ाई लड़ रहा है, उसके लिए उनका अगुआ बनना बयान करने की हद से भी तकलीफदेह रहा होगा | मेरे भाई की अपनी जिंदगी की पीड़ा को एक बार में खत्म कर देने की कोशिश ने पूरे घर पर फिर से दुःख का ग्रहण ला दिया | मैं किसी भी तरह से कोई खुशी का बहाना ढूँढना चाहता था जिससे एकबारगी सबका ध्यान कहीं और जाए | तो मुझे एक विचार आया कि अपने भाई की शादी उस औरत से करवा दूँ जिसके साथ वह रह रहा था | मैं लगभग एक साल तक उसके जासूसी सा करता रहा, और उसके चरित्र में कुछ संदेहास्पद मुझे नहीं मिला , बल्कि मैं उससे ऐसे व्यवहार करने लगा जैसे वह वास्तव में मेरी भाभी ही हो | मुझे लगने लगा जैसे उनके रिश्ते को एक औपचारिक जामा पहनाने का काम मेरा नैसर्गिक भूमिका हो जो मुझे अदा करनी ही है | माँ, पिता तथा बड़ी बहन को इसमें कोई ऐतराज नहीं था | लेकिन अजीब बात यह थी कि मुझे अपने भाई से कोई सीधा सीधा जवाब नहीं मिला | मैंने उसके मौन को यह सोचकर स्वीकार कर लिया कि वह आजकल बेरोजगार है | तब एक दिन माँ ने मुझसे पूछा, "क्या हेइगो पूरी तरह से ठीक है |" "आपका क्या मतलब है ?" मैंने पूछा | तब उन्होंने अपना डर  बताया "क्या हेइगो हमेशा नहीं कहता था कि वह तीस साल पूरे करने से पहले ही मर जाएगा ?" जो भी उन्होंने कहा वह सच था | भाई हमेशा कहता था | वह दृढतापूर्वक कहता था कि जब लोग तीस साल पार कर लेते हैं , वे जो भी करते है वह बदसूरत और मतलबी होता है, इसलिए उसका वो सब करने का कोई इरादा नहीं है | वह रशियन साहित्य का बड़ा उपासक था, और मिखाइल आर्त्सीबशेव के दी लास्ट लाइन को दुनिया की सबसे बेहतरीन किताब का दर्जा देता था , और उसकी एक प्रति हमेशा अपने हाथो में रखता था | लेकिन नायक नौमोव के अजीब मृत्यु के धर्म के प्रति मेरे भाई का लगाव  मुझे हमेशा भावनाओं के अतिरेकता से ज्यादा कुछ नहीं लगता था | और यह बेशक उसकी अपनी मौत की इच्छा नहीं है | इसलिए जब मेरी माँ ने अपनी चिंता व्यक्त की तो मैंने इसे हंसकर उड़ा दिया, यह कहकर, "जो लोग मरने के बारे में बात करते है , नहीं मरते |" मैंने अपने भाई के शब्दों को हल्का कर दिया , लेकिन कुछ ही महीने बाद , मैंने माँ की आशंका को अपनी आखों के सामने घटते हुए देखा, मेरा भाई मर चुका था | और जैसा उसने वादा किया था , वह तीस साल पूरे होने से पहले ही मर गया था | सताईस साल की उम्र में उसने ख़ुदकुशी कर ली | ख़ुदकुशी से तीन दिन पहले उसने मुझे अपने साथ रात्रिभोज करने के लिए बुलाया था | लेकिन, काफी अजीब, मैं कितनी भी कोशिश करूँ, मुझे याद नहीं कहाँ | शायद उसकी मौत ने मुझपर गहरा सदमा छोड़ा था , हालाँकि मैं हमारे आखिरी बातचीत के एक एक वाक्य को पूरी स्पष्टता से याद करता हूँ , मुझे बिलकुल याद नहीं आता कि उसके पहले और उसके बाद क्या हुआ | हमने शिन ओकुबो स्टेशन पर एक दुसरे से विदा ली | हम एक टेक्सी में थे | जैसे मेरा भाई उतरा और ट्रेन स्टेशन की सीढियां चढ़ने लगा , उसने मुझसे कहा कि मैं घर तक के लिए गाडी ले लूँ | लेकिन जैसे ही गाडी दुबारा शुरू हुई, वह सीढ़ियों से वापस आया और उसने ड्राईवर को रुकने का इशारा किया | मैं गाडी से उतरा , उसकी तरफ बढ़ा  और , कहा , "क्या बात है ?" उसने  एक पल के लिए बहुत मुश्किल से मुझे देखा और तब कहा , "कुछ नहीं, तुम अब जाओ |" वह मुड़ा और सीढ़ियों से फिर ऊपर चढ़ने लगा | अगली बार जब मैंने उसे देखा तो वह खून सनी चादर से ढका हुआ था | इजू प्रायद्वीप के एक गर्म पानी के झरने के पास एक सराय के तनहा कमरे में उसने अपनी जान ले ली | कमरे के दरवाजे पर खड़ा मैंने अपने आप को हिलने में असमर्थ पाया | एक रिश्तेदार, जो शव की सुपुर्दगी के लिए मेरे और पिता के साथ आया था , ने मुझे गुस्से से घूरा और पूछा , "अकिरा, तुम  वहाँ  क्या कर रहे हो ?" मैं क्या कर रहा था ? मैं अपने मृत भाई को देख रहा था | मैं अपने मृत भाई के शव को देख रहा था , जिसके रगों में भी वही खून था जो मेरी रगों में है , और जिसने उसे अपने शरीर से बाहर बह जाने दिया था , और जिसे मैं सबसे ज्यादा मान देता था , और जिसकी जगह मेरी दुनिया में कोई नहीं ले सकता था | वह मर चुका था | मैं क्या कर रहा था ? लानत है मेरे ऊपर !
"अकिरा, जरा मेरी मदद करो ," मेरे पिता ने बहुत कोमलता से कहा | और तब, काफी मशक्कत के साथ, वह मेरे भाई के शव को एक चादर में लपेटने लगे | मेरे पिता के सांस फूलने और तनाव के दृश्य ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया , और किसी तरह से मैं कमरे में प्रवेश करने का हौसला जुटा सका | जब हमने मेरे भाई के शव को कार में रखा जिसे हम टोक्यो से हमारे साथ लाये थे , शव ने एक गहरी कराह ली | उसके पैर जो उसकी छाती से सट गए थे , जिसकी वजह से हवा उसके मुंह के रास्ते बाहर निकल आई थी | कार के ड्राईवर की कंपकंपी छूट गयी थी, लेकिन किसी तरह से वह शव को शमशान ले जा सका और उसे राख में बदल सका | वह पागलों की तरह वापस टोक्यो के लिए गाडी चलाता रहा , और बहुत सारे अजीब रास्तों से ले गया | मेरी बहादुर माँ ने मेरे भाई की ख़ुदकुशी के पूरे घटना को पूरे मौन के साथ, बिना एक आंसू बहाए सहन किया | जबकि मैं जानता था कि उसके दिल में मेरे लिए बिलकुल भी द्वेष नहीं है , मैं अपने आप को उसकी मौन यातना का जिम्मेदार मानने लगा | जब वह मेरे पास आई तो मैंने उससे अपने भाई के शब्दों को काफी हलके में लेने के लिए माफ़ी मांगनी चाही | लेकिन उसने इतना ही कहा , "अकिरा, तुम क्या कहना चाहते हो ?"  वह रिश्तेदार जिसने मुझसे पूछा था , "अकिरा, तुम वहाँ क्या कर रहे हो?" जब मैं अपने भाई के शव को देखकर स्तब्ध हो गया था, भी मुझे उतना नहीं डरा सका था, लेकिन मैं अपने आप को कभी माफ नहीं कर पाया जो कुछ भी मैंने अपनी माँ से कहा था | और इसका अंजाम मेरे भाई के लिए कितना खतरनाक हुआ था | मैं कितना बेवकूफ हूँ !


Wednesday, December 28, 2011

सब गोकुल के प्राण जीवन धन, बैरिन के उर साल

पण्डित जसराज का यह कृष्णभजन मुझे बेहद कर्णप्रिय लगता रहा है. आप भी सुनिये-

.... उपजि पर्यो यह कूंखि भाग्य बल, समुद्र सीप जैसे लाल
सब गोकुल के प्राण जीवन धन, बैरिन के उर साल

सूर कितो जिय सुख पावत हैं, निरखत श्याम तमाल
रज आरज लागो मेरी अंखियन, रोग दोष जंजाल

Monday, December 26, 2011

माँ, हर्पीज़ और आदिम चाँदनी

यह कोई आदिम युग ही होगा ,आधी-आधी रात तक जागे रहते हैं वे लोग.साँसे रोक,चाँद उगने की प्रतीक्षा में! जब कि सन्तरई-नीली चाँदनी ने पहले ही पहाड़ के पीछे वाली घाटी में बिछना शुरू कर दिया है. चाँद के घटने-बढ़ने का हिसाब,तमाम कलाओं की बारीकियां....भोज पत्रों में दर्ज करते हैं वे सनकी लोग. पल, घड़ी, पहर और तिथियां -उन्हों ने इन ब्यौरों के मोटे भूरे ग्रन्थ बना रक्खें हैं.

कुछ लोग एक झाड़ की ओट में भारी धारदार खाण्डों से दुर्बल मृगशावकों के गले रेत रहे हैं
और कुछ अन्य गुपचुप पड़ोसी कबीले पर हमले की योजनाएं बना रहे हैं. उन्हों ने बड़े-बड़े कद्दावर ऊंट और घोडे़ और कुत्ते पाल रखे हैं. अपने पालतुओं के जैसे ही वहशी दरिन्दे हैं वे -
तगड़े, खूंखार, युद्धातुर! अपने निश्चयों में प्रतिबद्ध ,अपने प्रारब्ध के प्रति निश्चिन्त . जाने कब से उनके आस-पास विचर रहा हूँ मैं - बलवान शिकारियों के उच्छिष्ठ पर पलने वाला लकड़बग्घा!
हहराते अलाव पर भूने जा रहे लाल गोश्त की आदिम गंध पर आसक्त मेरे अपने चाँद की प्रतीक्षा में । मुझे भी नीन्द नहीं आती आधी-आधी रात तक ।

मैं भी उतना ही उत्कट ,उतना ही आश्वस्त, वैसे ही आँखें बिछाए,उतना ही क्रूर,उतना ही धूर्त . अपने निजी चेतनाकाश के फर्जी़ नक्षत्रों का कालचक्र तय करने, अपना ही एक छद्म पंचांग निर्धारित करने की फिराक में .......अपना मनपसन्द अखबार ओढ़ (जिस में मेरे प्रिय कवि के मौत की खबर छपी है) अपनी ही गुनगुनी चाँदनी में सराबोर होने की कल्पना में उतना ही रोमांचित . महकती फूल सी गुलाबी रक्कासा पेश ही करने वाली है मदिरा की बूंदे . कि कैसी भीनी-भीनी खुश्बू आई है अचानक अखबार के भीगने की !

यह बारिश ही होगी .............चाँदनी में भीगे अक्षरों के पार. मैं प्रयास करता हूं बादलों की नीयत पढ़ने का . रह-रह कर उभरते हैं मेरे प्रिय कवि के गाढे़ अक्षर. बारिश में घुलमिल कर लुप्त हो जाते हैं. मैं पलकें झपकाता रह जाता हूं - निपट अनपढ़ . युगों से किसी और की कविता नहीं पढ़ी ! किसी और का दर्द नहीं समझा!! और भीतर का टीस गहराता ही गया है........

मेरी बीमार बूढ़ी मां ने दबे पांव कमरे में प्रवेश किया है . मैं अखबारों के नीचे उसके टखनों का घाव देख सकता हूं. मेरी जांघों में असहनीय जलन हो आई है . जहां मां के जैसे फफोले उग आए हैं . चाँदनी रात का चलता जादू रूक गया है. बन्जारों का डेरा तिरोहित हो गया है . मृग शावकों के ताज़ा लहू की गंध कायम है. गीले अखबार से भुने गोश्त की महक अभी उठ रही है
और माँ की तप्त आकांक्षाओं से छनते हुए आ रहे हैं सिहरे-सहमे से शब्द -
“बेटा जिस्म ठण्डा रहा है ,यह ऊनी शाल ओढ़ा देना , जुराबों का यह जोड़ा भी ....... और तुम यह सोचते क्या रहते हो यहां लेटे-लेटे कुछ करते क्यों नहीं बाहर जाकर ..”

मुझे लगता है , मुझे अपनी चाँदनी से बाहर हो कर भी जीना है !

Sunday, December 25, 2011

सोना लेने म्हारे पी गए, अरी मोरा सूना कर गए देस


भाई इकबाल अभिमन्यु ने कुछ दिन पहले आपको मशहूर पाकिस्तानी क़व्वाल फरीद अयाज़ की आवाज़ में कबीरदास जी की शानदार पेशकश सुनवाई थी. उन्हीं फरीद आवाज़ साहेब से आज सुनिए अतिविख्यात रचना पधारो म्हारे देस

Monday, December 19, 2011

तेरी दुनिया के पास ...

अदम बाबा की याद में एक बेहतरीन पेशकश. अलविदा बाबा!