Saturday, September 13, 2008

सीमेंट और सरिया: किसके पेट में गया?

इस तस्वीर को ग़ौर से देखिए. सावन की
घनघोर घटाएँ हवाओं के ज़ोर से एक निश्चित दिशा की ओर उड़ती दिखती हैं. घटाओं का ये सिलसिला दूर नज़र आने वाले पहाड़ों तक चला जाता है. उन पहाड़ों का ऊपरी हिस्सा उजास-सलेटी रंग से ढँका हुआ दिखता है.

और ग़ौर से देखें तो उन पहाड़ों के नीचे हरे पेड़ों की कतारें सी दिखती हैं. तस्वीर में नज़र नहीं आता पर उन पेड़ों के पीछे और पहाड़ की तलहटी में मेरा गाँव है. गौलापार खेड़ा. यानी गौला नदी के पार वाला खेड़ा.

इस गौला को आप इस तस्वीर में देख रहे होंगे. ये नदी गर्मियों और जाड़ों में सूखी रहती है. सिर्फ़ बरसात में कुपित होती है. जब ये नदी सूखी होती है तब इसे गौला का रौखड़ कहा जाता है जिसमें पहाड़ों से लुढ़ककर आए बड़े बड़े पत्थर, रेता, बजरी, रोड़ी और कंकड़ बिखरे रहते हैं.

मेरे माँ-बाप को अच्छी तरह याद है कि एक बार अकाल पड़ा था. खेतों में कुछ नहीं उगा था. ये वो साल था जब गौला नदी पर बना बहुत पुराना पुल टूट गया था. गाँव को हल्द्वानी से जोड़ने का एकमात्र रास्ता ख़त्म हो गया था. गाँव में लोग तेल-नमक को तरस गए थे.

कई बरस गुज़रे और फिर विकास हुआ.

काठगोदाम में गौला नदी पर बैराज बनाया गया. एक नया पुल बनाया गया. सड़क जो कच्ची थी, डामर की हो गई. विकास की ये आँधी रुकी नहीं. कुछ और साल गुज़रे और गाँव वाले कहने लगे – अब तो गौलापार भी शहर होने वाला है.

सरकारी हुकुम आया कि किसानों को अपनी ज़मीनों का सड़क वाला कुछ हिस्सा देना होगा क्योंकि और बड़ी, और चौड़ी सड़क बननी हैं. ये बाईपास बनेगा जिससे बड़े बड़े ट्रक माल लेकर पहाड़ों तक सप्लाई करेंगे. सड़कें बनीं.

फिर सुना कि तल्ली हल्द्वानी से गौलापार तक सरकार एक विशाल पुल बनवा रही है. लोग पुलकित हुए: “बस वो पुल बन जाए, फिर देखना. गौलापार का कायापलट हो जाएगा.”

फिर एक दिन बड़ी बड़ी मशीनें गौला नदी के किनारे इकट्ठा की गईं. सीमेंट, सरिया ख़रीदा गया. टैरीकॉट की पैंट, शर्ट, चमकदार जूते पहने इंजीनियर साहबों ने सर्वे किया. ओवरसियर को डाँटा, ठेकेदार का सलाम स्वीकार किया, मंत्री के सामने थोड़ा सा झुककर विनम्र मुस्कुराहट के साथ प्रगति आख्या प्रस्तुत की.

ख़बर थी कि भारी पैसा 'सैंकसन' हो गया है.

मंत्री जी उदघाटन करने आए होंगे, शामियाना भी लगा होगा शायद. ठंडे की क्रेटें खुली होंगी. कुछ समोसा पकोड़ी और गुलाब जामुन भी रखे होंगे. ये मैंने नहीं देखा. मैं वहाँ नहीं था. मैं ये देखने के लिए भी नहीं था कि उस शाम उत्तराखंड की पीडब्ल्यूडी विभाग की मंत्री ने अपने घर में पार्टी दी या नहीं. मुझे ये भी नहीं मालूम कि मंत्री के घर के बाहर उस दिन (या उस दिन को सेलेब्रेट करने के लिए बाद में कभी) कितने ड्राइवर अपने साहबों यानी बड़े बड़े ठेकेदारों, अफ़सरों और शहर के गणमान्य लोगों का इंतज़ार करते ऊँघे रहे होंगे.

मशीनों ने काम शुरू किया. गौला के रौखड़ में इस पार से उस पार तक बड़े बड़े गड्ढे बनाए गए. सरकारी पैसे से ख़रीदा गया सीमेंट और सरिया उनमें भरा गया. देखते ही देखते कंक्रीट के कई मज़बूत स्तंभ उभर कर सामने आ गए. फिर उनपर पुल बिछाने का काम शुरू हुआ.

पैसे की कोई कमी नहीं. फ़ाइलें अपनी सुस्त रफ़्तार छोड़ लगभग उड़ने लगीं. वाउचर पर दस्तख़त करवाने के लिए ठेकेदार साहब को बड़े साहब या छोटे साहब के दफ़्तर के बाहर इंतज़ार नहीं करना है. साहब कहते हैं कि रक़म अगर अगले हफ़्ते 'सैंकसन' होनी है तो मैं आज करता हूँ. काम नहीं रुकना चाहिए. मंत्री जी का मूलमंत्र विकास है. विकास नहीं रुकना चाहिए.

और फिर वो दिन भी आया जब चमचमाते काले डामर की पक्की सड़क इस पार से उस पार तक बिछ गई. आह, कितना सुबीता हो गया है. पंद्रह मिनट में पहुँच जाइए इस अंधेरे, जंगली गाँव गौलापार से उस पार हल्द्वानी शहर की चकाचौंध तक.

***

कुछ हफ़्ते पहले सुबह उठकर भारत की ख़बरों पर नज़र डालने के लिए इंटरनेट खोला. सबसे पहले इसी तस्वीर पर नज़र गई जिसे आप ऊपर देख चुके हैं. ख़बर थी: भारी बारिश में हल्द्वानी का पुल बहा.

अब उसी तस्वीर को फिर से देखिए और बताइए कि सीमेंट-सरिया किसके पेट में गया?

(अशोक पांडे उवाच: रॉयटर्स और एपी द्वारा जारी ध्वस्त पुल की फ़ोटू हमारे कबाड़ी कैमरामैन रोहित उमराव की है.)

स्कॉच-व्हिस्की और केल्टिक मशकबीन उर्फ़ "स्कॉटलैण्ड द ब्रेव"



दुनिया की सबसे बेहतरीन स्कॉच-व्हिस्की बनाने वाले देश स्कॉटलैण्ड का कोई आधिकारिक राष्ट्रगीत अब तक नहीं है. अलबत्ता १९५० के आसपास एक स्कॉटिश पत्रकार क्लिफ़ हैनली द्वारा गायक रॉबर्ट विल्सन के लिए लिखा गया "स्कॉटलैण्ड द ब्रेव" इस रिक्त स्थान की पूर्ति हेतु सुझाए जा रही रचनाओं में सबसे ऊपर है.

यह रचना अलबत्ता कैनेडियन सेनाओं की द ब्रिटिश कोलम्बियन ड्रैगून्स नामक यूनिट की आधिकारिक पाइप बैण्ड मार्च बन चुकी है. हाल के वर्षों में रॉयल रेजीमेन्ट ऑफ़ स्कॉटलैण्ड द्वारा भी इसे रेजीमेन्टल क्विक मार्च का दर्ज़ा दे दिया गया.
केल्टिक मशकबीनों की उदास कर देने वाली आवाज़ आपको किसी पहाड़ी वादी में पहुंचा दे तो अचरज न कीजियेगा.

यह गीत और उक्त जानकारी मुझे कल उपहार में मिली एक सिंगल मॉल्ट बोतल के भीतर धरी एक मिनी सीडी और उसके खोल से मिली. अब बची-खुची सिंगल मॉल्ट आप के साथ क्या शेयर करूं. आधी बोतल से पिलाना कुफ़्र होगा, सोचा बैगपाइप ही शेयर किये जाएं:

Friday, September 12, 2008

बिछुआ बाजे रे !


प्रस्तुत है इकबाल बानो का गाया एक गीत- बिछुआ बाजे रे ! इस गाने के शास्त्रीय/तकनीकी पक्ष की मुझे कोई जानकारी नहीं है और फ़िलहाल उससे मेरी कोई मुराद भी नहीं है. मैं तो बस यही जानता हूं कि यह इस नाचीज को सुहाता है और बरबस ही अपने रंग में बांध लेता है. आप भी सुनें......



पुनश्च :
आज ही शाम को अशोक पांडे से फ़ोन पर बात हुई थी. उनकी शिकायत थी कि मैं आजकल कुछ लिख नहीं रहा हू,लिखना मतलब गद्य लिखना. एक तो यह है कि आजकल फ़ुरसत थोड़ी कम-सी है और एकेडेमिक किस्म के लेखन को समय देना पड़ रहा है ,यह मेरे पेशे की मांग भी है . दिन में बेतरह थक जाने के बाद शाम को आराम के लिए संगीत के शरण्य में जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता. सो फ़ोन वार्ता में तय यह हुआ कि मैं कोई गाना लगा दूं. बस जी, खाना खाया और जम्हाई लेते हुए मित्र से किए वादे को पूरा करने की धुन में अपनी पसंद का यह गाना प्रस्तुत कर दिया. अब अशोक भाई और सारे भाई-बहनों, यह मत कहना कि ये क्या किया - यह गाना तो 'सुखनसाज' पर अगस्त के तीसरे सप्ताह में पोस्ट किया चुका है. अब किया जा चुका है तो किया जा चुका है .'कबाड़खाना' एक अलग ठिया है सो हियां भी पर जरा अलग तरीके से. वैसे भी एक बार और सुन लेने में हर्ज क्या है!

इतना कायर हूं कि उत्तर प्रदेश हूं...

इतना कायर हूं कि उत्तर प्रदेश हूं...

“भाषा में भदेस हूं, इतना कायर हूं कि उत्तर प्रदेश हूं...”. धूमिल की दशकों पहले लिखी गईं इन पंक्तियों की कई तरह से व्याख्या होती है, पर रुपहले पर्दे के महानायक अमिताभ बच्चन के माफीनामे ने जैसे इसे और मौजूं बना दिया है। जया बच्चन ने एक समारोह में यही कहा था कि वे हिंदी में बोलेंगी.. और राज ठाकरे की सेना टूट पड़ी। नारे लगे, पोस्टर फटे, पुतले फुंके, और फिर सामने आए महानायक, ऐसी विनम्र मुद्रा में कि पूरा देश फिदा हो गया। राज ठाकरे का भी दिल पिघल गया और उन्होने अभयदान दे दिया। अमिताभ ने फिर साबित किया अहिंसा की ताकत। भृगु ऋषि से लात खाने के बाद भगवान विष्णु के कहे वचन याद आ गए-आपको चोट तो नहीं लगी मुनिवर!

पर ये विनम्रता थी या मजबूरी। एंग्री यंगमैन बतौर महानायकत्व का दर्जा हासिल करने वाले अमिताभ की पहचान यही थी न कि वे अन्याय के खिलाफ कभी नहीं झुके। न्याय के लिए अग्निपथ पर चले, कानून तोड़ने की भी परवाह नहीं की। लोगों ने उन्हें पूजा। अपने गुस्से को उनके जरिये निकलते देखा। लगा कि कोई तो है जो व्यवस्था को ललकार सकता है। क्या दौर था वो... लोग तनावमुक्त होकर सिनेमा हाल से निकल कर राहत की मूंगफली चबाते हुए शांत भाव से व्यवस्था के जबड़े में बिला जाते थे। और...और क्या....खेला खतम। महानायक बुढ़ा गया।

हां, बुढ़ाते-बुढ़ाते, अमिताभ को सहस्राब्दि का महानायक जरूर चुना लिया गया। हजार साल में पैदा हुआ दीदावर...। न न्यूटन, न आइंस्टीन, न वाल्तेयर न रूसो, न वाशिंगटन न लिंकन, न अकबर न राणा प्रताप, न शिवाजी न रानी झांसी, न गालिब न मीर, न मार्क्स न गांधी, न टैगोर न प्रेमचंद, न अंबेडकर न भगत सिंह और न चेग्वारा....पैदा हुआ तो बस हरिवंश नंदन अमिताभ बच्चन। उस खानदान का चश्मोचिराग जो प्रतापगढ़ के बाबू पट्टी से इलाहाबाद के कटघर और सिविल लाइंस होते हुए बरास्ता दिल्ली, मुंबई में समंदर किनारे बस कर पिछले चालीस साल से पैसे के साथ-साथ देश की दुआ बटोर रहा है।

लेकिन असल जिंदगी में राज ठाकरे की एक धमकी ने महानायक का कचूमर निकाल दिया। तुरंत माफी मांग ली। एक बार भी सवाल नहीं उठाया कि हिंदी बोलने में कौन सा कानून टूटा, किसका अपमान हुआ। भूल गए रुपहले पर्दे की दहाड़। पिता की विरासत भी याद न रही। बेचारे बच्चन जी ने हिंदी के लिए न जाने क्या-क्या किया। आजादी के बाद देश को वाकई हिंदी में चलाने का सपना देखने वालों में वे भी थे। नेहरू जी के बुलावे पर यही करने दिल्ली पहुंचे थे, इलाहाबाद विश्वविद्यालय की लगी-लगाई नौकरी छोड़कर। अब स्वर्ग में तड़प रहें होंगे कि उनके महानायक बेटा-बहू महाराष्ट्र में सार्वजनिक स्थान पर हिंदी नहीं बोल सकते। शायद वहां से उकसा भी रहे हों....मुन्ना..!.ए मुन्ना ! उठा हिंदी का झंडा, लड़ इन सबसे ... लड़ ... अग्निपथ, अग्निपथ ... लथपथ, लथपथ ... लथपथ...।

पर मुन्ना कैसे सुनते ये पुकार। जरा भी आवाज ऊंची करते तो उनकी फिल्म ‘लास्ट लियर’ का कबाड़ा तो होता ही, अभिषेक की ‘द्रोण’ भी पत्ता-पत्ता, बूटा-बूटा हो जाती। करोड़ों का खेल है जी और आपको हिंदी की पड़ी है। ये गलती तो उन लोगों की है जिन्होंने फिल्मी डायलाग को हकीकत मान लिया। समाजवादी पार्टी की प्रचार फिल्म में अमिताभ ने कह क्या दिया कि गंगा तट पर पुनर्जन्म लेना चाहते हैं, लोग वाकई उन्हें यू.पी पर जान न्योछावर करने वाला मानने लगे। याद कीजिए, मुंबई की सड़कों पर पिटते-लुटते यूपी, बिहार के बेरोजगारों को, क्या कभी उनके हक में अमिताभ ने एक बार भी आवाज उठाई। अब तो ये भी बता दिया कि उनके डाक्टर से लेकर घर के स्टाफ तक यूपी वाले नहीं, महाराष्ट्र के लोग हैं। और हिंदी का शिगूफा छोड़ने वाली गुड्डी उनसे मराठी में ही बात करती हैं। घर में मराठी, बाहर अंगरेजी। फिल्मों में हिंदी तो खैर मजबूरी है। फिर भी उन्हें यूपी वाला कहा जाए तो इन ‘बच्चनों’ की क्या गलती।

राज ठाकरे को यकीन न हो तो एक और प्रमाण हाजिर है। उत्तर प्रदेश विकास परिषद के सदस्य रहते हुए अमिताभ ने, या यू.पी.फिल्म विकास परिषद की अध्यक्ष रहते जया बच्चन ने, कोई ऐसी कोशिश नहीं की कि हिंदी पट्टी में कहीं भी हिंदी फिल्म उद्योग का इन्फ्रास्ट्रक्टर विकसित हो। हिंदी भाषा की फिल्में हिंदी क्षेत्र में बनें। मुंबई के प्रति श्रद्धा का इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा। अगर खुदा न खास्ता गंगा तट पर फिर पैदा हो भी गए, तो कमाने तो मुंबई ही जाएंगे न!

वैसे, लोग तो ये भी कहते हैं कि विवाद जानबूझकर पैदा किया गया। वरना, जया को हिंदी में बोलना था तो बोलतीं, महाराष्ट्र वालों से माफी मांगकर हिंदी में बोलने के एलान की क्या जरूरत थी। उनका इरादा ही था कि पति और बेटे की फिल्मों का विरोध हो। मुफ्त की चर्चा मिले। आजकल ये हथकंडा हर दूसरी फिल्म के लिए अपनाया जाता है। नहीं तो जया को गुड्ड़ी-बुड्ढी कहने वाले राज ठाकरे को अमिताभ भाई बताते फिरें, इसका क्या मतलब। ऐसे में तो सगे भाई से दुश्मनी हो जाती है और यहां दुश्मनों जैसा सुलूक करने वाले को भाई बताया जा रहा है। ये हकीकत जानने वाले कम नहीं हैं। इसीलिए न बालीवुड में उनके हक आवाज उठी और न हिंदी पट्टी में ही कोई सुगबुगाहट हुई।

शुक्रिया राज ठाकरे, हिंदी वालों और उनके फिल्मी महानायक की औकात बताने के लिए।

काजुको सिराइशी की कविता और पेंटिंग


पीला ताल
आप वहां मछली पकड़ सकते हैं लज्ज़तदार मछली
सजा सकते हैं दस्तरख्वानों पर
लेकिन पीला है ताल, छुपाए अपनी गहराइयां
ताल के किनारे बसे आदिवासी भी
छिपाते हैं अपनी गहराई
क्या पता मछलियां रहती हों उनकी आंखों में
या लज्ज़तदार रूहें गाती हों उबलती नफरत से
अंधेरी हैं गहराइयां उनकी आंखों की कोई नहीं देख सकता

कोई शै रहती है पीले ताल के इर्दगिर्द
जिसका खाका नजर नहीं आता दस्तरख्वान पे।

(अनुवाद-सोमदत्त। पूर्वग्रह-जुलाई-अगस्त१९८८ से साभार)
(पेंटिंग-रवींद्र व्यास)

अच्‍छी किताबें पाठकों की मोहताज नहीं होतीं।

अच्‍छी किताबें पाठकों की मोहताज नहीं होतीं। वे अपने पाठक खुद ढूंढ लेती हैं। उन्‍हें कहीं नहीं जाना पड़ता, पाठक ही अच्‍छी किताबों की तलाश में भटकते रहते हैं। अच्‍दी किताबें पा लेने पर पाठक की खुशी का ठिकाना नहीं रहता। किताबें जितनी ज्‍यादा पुरानी, पुरानेपन की हल्‍की-सी गंध लिये और हाथ लगाते ही फटने-फटने को होती हैं, उतनी ही ज्‍यादा कीमती और प्रिय होती हैं। किताबें जितनी ज्‍यादा मुड़ी-तुड़ी, कोनों से फटी हुई और पन्‍ना-पन्‍ना अलग हो चुकी होती हैं, उनके नसीब में उतने ही ज्‍यादा पाठक आये होते हैं।

अच्‍छी किताबें पतुरिया की तरह होती हैं जो अक्‍सर अपने घर का रास्‍ता भूल जाती हैं और दर-दर भटकते हुए नये नये पाठकों के घर पहुंचती रहती हैं। खराब किताबें सजी-संवरी एक कोने में सती सावितरी की तरह बैठी अपने पाठक की राह देखती रहती हैं। बदकिस्‍मती से गलत जगह पड़ी अच्‍छी किताबें भी अपने पाठकों की राह देखते-देखते दम तोड़ देती हैं और उनमें भरा सारा ज्ञान सूख जाता है। अच्‍छी किताबें अच्‍छे पाठकों को देखते ही खिल उठती हैं और खराब पाठकों की सोहबत में कुम्‍हलाती रहती हैं।

किताबें हमारी सबसे बड़ी शिक्षक होती हैं। ये बिना हाथ में छड़ी लिये या गाल पर थप्पड़ मारे हमें शिक्षा देती हैं। ये न तो कभी हम पर छींटाकशी करती हैं और न ही कभी गुस्सा होती हैं। हम उनके पास कभी जायें तो वे हमें सोते हुए नज़र नहीं आयेंगी। हम उनसे कुछ भी जानकारी मांगें या कोई भी उलटा-सीधा सवाल पूछें, वे तब भी हमसे कुछ भी नहीं छुपायेंगी।

हम उनके साथ शरारत करें तो भी वे कुछ भी नहीं बोलेंगी। कितनी भली होती हैं किताबें कि किसी भी बात का बुरा नहीं मानतीं। आप कबीर साब के पास मिलान कुंडेरा को बिठा दीजिये या ओरहान पामुक को रहीम के पास बिठा दीजिये, दोनों ही किताबें बुरा नहीं मानेंगी, आप अगली सुबह उनकी जगह बदल कर पामुक को श्‍याम सिंह शशि के पास और कामू को संत रैदास के पास जगह दे दीजिये, वे इसका भी बुरा नहीं मानेंगी और अपने पाठकों को ज्ञान देने में कोताही नहीं करेंगी।

सबसे ज्‍यादा वे किताबें पढ़ी जाती हैं जो पाठक कहीं से चुरा कर लाता है। फिर उन किताबों का नम्‍बर आता है जिन्‍हें हम उधार मांग कर तो लाते हैं लेकिन वापिस नहीं करते। फुटपाथ पर बिक रही अचानक नज़र आ गयी वे किताबें भी खूब पढ़ी जाती हैं जिनकी हम कब से तलाश कर रहे थे। पूरे पैसे दे कर खरीदी गयी किताबें भी अपना नम्‍बर आने पर आधी अधूरी पढ़ ही ली जाती हैं। लाइब्रेरी से लायी गयी किताबें पूरी नहीं पढ़ी जातीं और उन्‍हें वापिस करने का वक्‍त आ जाता है। रोज़ाना डाक में उपहार में आने वाली या किसी आयोजन में अचानक लेखक के सामने पड़ जाने पर भेंट कर दी गयी किताबें कभी नहीं पढ़ी जातीं। कई बार तो भेंट की गयी किताबें भेंटकर्ता के जाते ही किसी और पाठक के पास ठेल दी जाती हैं। वह आगे ठेलने की सोचता रहे या बिन पढ़े एक कोने में रखे रहे। कोर्स की किताबें पढ़ने में हमारी नानी मरती है और समीक्षा के लिए आयी किताबें भी तब तक पढ़े जाने का इंतज़ार करती रहती हैं जब तक संपादक की तरफ से चार बार अल्‍टीमेटम न मिल जाये। तब भी वे कितनी पढ़ी जाती हैं। हम जानते हैं।

पुस्‍तक मेलों में खरीदी गयी किताबें भी पूरे पढ़े जाने का इंतज़ार करते करते थक जाती हैं और अगला पुस्‍तक मेला सिर पर आ खड़ा होता है। यात्रा में टाइम पास करने के लिए स्‍टेशन, बस अड्डे या एयरपोर्ट पर खरीदी गयी किताबें यात्रा में जितनी पढ़ ली जायें, उतना ही, बाकी वे कहीं कोने में या बैग ही में पड़े पड़े अपनी कहानी का अंत बताने के लिए बेचैन अपने इकलौते पाठक को वक्‍त मिलने का इंतज़ार करती रहती हैं।

दरअसल किताबें हमें दोस्‍त बनाना चाहती हैं और हमारे साथ अपना सब कुछ शेयर करना चाहती हैं, लेकिन हम हैं कि अच्‍छी किताबों से मुंह चुराते फिरते हैं। हम जानते हैं कि किताब छोटे बच्‍चे की तरह हमारे सीने से लग जाने को छटपटा रही हैं लेकिन हम हैं कि जूते पर तो चार हज़ार रुपये खर्च कर देंगे, बच्‍चे को खिलौना भी हज़ार रुपये का दिलवा देंगे लेकिन हम किताब की हसरत भरी निगाहों की अनदेखी करके आगे बढ़ जायेंगे। भला बंद किताबें भी किसी को कुछ दे सकती हैं।। नहीं ना।।
मैं सोचता हूं कि पूरी दुनिया में जितनी किताबें छपती हैं। उनमें से कितनों को पाठक नसीब होते होंगे और कितनी किताबों के जितनी प्रतियां छपती हैं उनमें से कितनी प्रतियां बिन खुले ही रह जाती होंगी। कई किताबों को तो पूरी उम्र बिता देने के बाद भी एक भी पाठक नसीब नहीं होता।

आप एक बार देखिये तो सही किताबें पढ़ने का सुख। मान लीजिये आप गांधी जी की आत्‍मकथा पढ़ रहे हैं और साथ में कॉफी की चुस्कियां ले रहे हैं। आपको थोड़ी देर में ही लगने लगेगा कि गांधी जी खुद आपके पास आ बैठे हैं और अपने आश्रम का कोई किस्‍सा खुद आपको सुना रहे हैं। कितनी बार तो ऐसा होता है कि हम अच्‍छी किताब पढ़ने में इतने डूब जाते हैं कि खाना, पीना और कई बार पूजाकरना तक भूल जाते हैं। सही भी है, किताब जो खुराक दे रही है, और ज्ञान दे रही है, वह किसीर पूजा अर्चना से कम है क्‍या.

अब किताबों के कुछ रोचक प्रसंग

प्रसंग एकः

जॉर्ज बर्नाड शॉ एक दिन पुटपाथ पर किताबों के ठीये के पास से गुज़र रहे थे तो उन्‍हें सामने पुरानी किताबों के ढेर में अपनी एक किताब नज़र आयी। उनकी यह देखने की उत्‍सुकता स्‍वाभाविक थी कि इस किताब का फुटपाथ तक पहुंचने का रूट क्‍या रहा होगा। उन्‍होंने किताब उठायी तो देखा कि अरे, ये प्रति तो वे अरसा पहले एक मित्र को भेंट कर चुके थे और उस पर उनका खुद का लिखा सप्रेम भेंट और उनके हस्‍ताक्षर भी हैं। उन्‍होंने किताब वाले से पूछा कि कितने में दी ये किताब तो उसने बताया एक पाउंड। बर्नाड शॉ बिगड़े- लूट मचा रखी है क्‍या, ये मेरी लिखी किताब है और तू एक पाउंड मांग रहा है, ला दे चालीस पेंस में। और वे उसे रेजगारी थमा के किताब घर ले आये। आराम से बैठ कर उन्‍होंने पहली भेंट के नीचे लिखा, तुम्‍हें पुनः भेंट प्रिय मित्र, हस्‍ताक्षर किये, तारीख डाली और नौकर के हाथ किताब उसके पास दोबारा भिजवा दी।

प्रसंग दोः

सीनियर बच्‍चन (हरिवंश जी) जब दिल्‍ली से अपना एमपी वाला राजपाट छोड़ कर हमेशा के लिए बंबई आ रहे थे तो उन्‍होंने कबाड़ी को बुलवा कर लगभग 5000 किताबें तौल कर बेची थीं। निश्चित ही इन 5000 किताबों में खरीदी गयी, भेंट में आयीं, समर्पित की गयीं किताबें भी रही होंगी। कुछ बेहद कीमती किताबें भी रही होंगी। कितना ही अच्‍छा होता अगर दिन पहले उन्‍होंने किसी भी अखबार में फोन करके इस आशय की टिप्‍पणी छपवा दी होती कि कोई भी पाठक चाहे तो उनके घर आ कर अपनी पसंद की किताबें ले सकता है।

तीसरा प्रसंग एक खराब किताब काः

मुंबई में एक साहित्यिक आयोजन चल रहा था, कई वरिष्‍ठ रचनाकार बाहर से आये थे, उस वक्‍त निर्मल वर्मा जी वक्‍ता के रूप में अपनी बात कह रहे थे। पिछले दिन के सत्रों की खबर तस्‍वीरों सहित अखबारों में छपी थीं। तभी सफारी सूट पहने एक सज्‍ज्‍न भीतर आये। वे मझौले लेवल के कारोबारी आदमी लग रहे थे। मंच की तरफ देखा तक नहीं कि कौन हैं वहां। आस पास का जायजा लिया और बाहर खड़े अपने ड्राइवर को इशारा किया। दो मिनट में ही उनका ड्राइवर किताबों के दो बंडल लिये अंदर आ गया। अब जनाब ने एक एक आदमी के पास जा कर उसका नाम पूछ कर किताबे भेंट करने लगे। प्रिय भाई अलां को सप्रेम भेंट और फलां को सप्रेम भेंट। मेरेपास भी आये, नाम पूछा, आंखें मिलाने या अपना नाम बताने की ज़रूरत नहीं समझी और एक और सप्रेम भेंट टिका गये। किताब देखी- उनकी पीएचडी की थीसिस थी। कविता में रस और रस में कविता टाइप कुछ नाम था।

शाम को डिनर का प्रोग्राम था इसलिए मैं कपड़े बदल कर जब पांच बजे के करीब घर से वापिस आया तो वही सज्‍जन अपनी थीसिस का अगले बंडल निपटा रहे थे। भलारेज़ रोज थोड़े ही मिलते हैं इतने सारे ग्रण ग्राहक एक साथ। अभी मैं बैठा ही था कि एक बार फिर मेरे पास आ कर मेरा नाम पूछने लगे। मैंने बताया- सुल्‍तान अहमद। एक और सप्रेम भेंट-सुल्‍तान अहमद के नाम। दोनों प्रतियां मेरी कार में कई दिन तक रखी रहीं। एक दिन हिन्‍दी भाषी मैकेनिक किताब के पन्‍ने पलट के देख रहा था, तुरंत उसे थमा दी।

अब इस पूरे प्रसंग में उन भाई साहब, मेरा या मैकेनिक का क्‍या कसूर। किताब एक गलत हाथ से दूसरे गलत हाथ में जाती रही और अपने दुर्भाग्‍य को कोसती रही।

एक और प्रसंगः

शिमला में मेरे कथाकार मित्र रहते हैं राज कुमार राकेश। संयोग से हम दोनों ही इस समय (एक दूसरे की जानकारी के बिना) बर्ट्रेंड रसेल की आत्‍म कथा पढ़ रहे हैं। किताब की भूमिका लिखी है माइकल फुट ने। 95 वर्षीय फुट इंगलैंड के जाने माने लेखक, पत्रकार और सुदीर्घजीवी एमपी रहे हैं। अब जी राकेश की को तलब लगी कि इन फुट साहब की लिखी किताब अन्‍आर्मड विक्‍टरी पढ़ें। ये किताब नेहरू और उनके बीच हुए खतो किताबत को ले कर है। किताब मिली नहीं कहीं भी उन्‍हें। दिल्‍ली तक पूछ के देख लिया। मुझसे कहा तो मैंने अपनी लाइब्रेरी, ब्रिटिश लाइब्रेरी और लैंडमार्क सब जगह तलाशी, किताब नहीं ही मिली। भला 1963 में छपी किताब इतनी आसानी से थोड़े ही मिलेगी।

अचानक उन्‍हें सूझा और वे गाड़ी उठा कर सीधे शिमला स्थित एडवांस स्‍टडीज सेंटर में जा पहुंचे। किताब वहां थी। निकलवायी गयी। राकेश जी खुश लेकिन लाइब्रेरियन जी खुश नहीं। उन्‍होंने किताब देने से मना कर दिया कि नहीं, कोई फैकल्‍टी, रिसर्च स्‍कालर, फैलो या स्‍टाफ ही इस किताब की कभी भी मांग कर सकता है। हम उनकी अनदेखी करके बाहर वाले को किताब कैसे दे सकते हैं।

राकेश ने कहा कि जरा किताब दिखाना तो।

किताब संस्‍थान द्वारा 1965 में खरीदी गयी थी और पिछले 43 बरस में एक बार भी जारी नहीं करायी गयी थी।

बेचारे माइकल फुट और बेचारी किताब 'अन्‍आर्मड विक्‍टरी'।

Thursday, September 11, 2008

'प्रेम-विवाह के बजाए ज़िद-विवाह कहना ज़्यादा सही होगा'

[अप्रतिम व्यंग्यकार शरद जोशी पर लिखे क्रांतिकारी कवि और विचारक वेणुगोपाल के संस्मरण की यह आख़िरी कड़ी है. इसमें शरद जोशी के व्यक्तित्व का निर्मम विवेचन किया गया है. हमने पाठकों के धैर्य की पर्याप्त परीक्षा ले ली. उम्मीद है कि पूर्व कड़ियों की ही भाँति इस आख़िरी पेशकश को पाठकों की उदारता प्राप्त होगी. अब मैं ब्लॉग 'आजाद लब' पर संभवतः कल (१२/०९/२००८) सुप्रसिद्ध कवि और वेणुगोपाल के शुरुआती दिनों के साथी (काग़जनगर, आंध्र के दिनों के) आलोक भट्टाचार्य का वेणुगोपाल पर लिखा एक आत्मीय संस्मरण प्रकाशित करूंगा. मुझे आज ही दस्तयाब हुआ है. अनेकानेक धन्यवाद!- विजयशंकर]
उन्हीं नाटकों की रिहर्सल के दौरान. एक दिन. इरफ़ाना जी की आदत थी कि वह अक्सर घर से कुछ बनाकर लाती थीं- स्वादिष्ट कुछ- कि साथी कलाकार मिलकर खाएं. उस दिन भी लाई थीं. 'सबसे बड़ा सवाल' में राजेश भी एक भूमिका कर रहा था. वह भी बैठा था. खाने के बाद उसे सिगरेट की तलब हुई. उसने इरफ़ाना जी से पूछा- 'भाभी, अगर आपको कोई ऐतराज न हो तो मैं एक सिगरेट पी लूँ?' इरफ़ाना जी ने अनुमति देते हुए कहा- 'ऐतराज क्यों होगा! पीजिये न!' सिगरेट सुलगाते हुए राजेश ने कहा- 'मैं इसलिए पूछ रहा था कि शरद जी तो सिगरेट-शराब छूते तक नहीं हैं.' इरफ़ाना जी ने एक लम्बी साँस ली और कहा- 'अच्छा होता, छूते और लेते तो कम से कम ऐसा तो नहीं होता...' वाक्य पूरा किए बिना ही वह चुप हो गयीं. दूसरी ओर देखने लगीं. आँखें नम थीं.

....इस गोष्ठी वाली घटना से बहुत पहले की बात है. न्यू मार्केट (भोपाल) में मैं और राजेश ( कवि राजेश जोशी) उनके साथ थे. बात प्रेम-विवाह पर हो रही थी. मैंने पूछा- 'शरद जी आपका प्रेम-विवाह तो जबरदस्त रेवोल्यूशनरी था न? जात-पांत, धर्म आदि सारी नकली हदबंदियों को तोड़ दिया गया था उसमें.' शरद जी ने एक लम्बी साँस ली. मुस्कुराए. कहा- 'आज उसे प्रेम-विवाह के बजाए ज़िद-विवाह कहना ज़्यादा सही होगा.'

कुछ दिनों बाद. राजेन्द्र गुप्त दो नाटक निर्देशित कर रहे थे. मनोहर आशी स्पांसर थे. शरद जी नाटक 'अन्धों का हाथी' और मोहन राकेश का 'सबसे बड़ा सवाल'. मैं दोनों में था. कास्टिंग तय करने तक राजेन्द्र गुप्त ने मुझसे भी पूछा- 'मैं आपको शरद जी के नाटक में प्रमुख भूमिका देना चाहता हूँ लेकिन मैंने सुना है कि आपमें और शरद जी में...'. मैंने उन्हें आश्वस्त किया कि ऐसी कोई बात नहीं है. शरद जी गुस्से में ज़रूर हैं लेकिन जहाँ तक मेरा सवाल है, मुझे उनके नाटकों में कम करके ख़ुशी ही होगी.

जो नहीं कहा गया, वह इतना तो बतला ही रहा था कि कहीं कुछ ऐसा है, जो ठीक नहीं है. बेहद बिगड़ा हुआ है.

'अन्धों का हाथी' में काम करने के दौरान ही रिहर्सल में शरद जी ने बोलचाल की शुरुआत कर दी. किसी ख़ास मूवमेंट के बारे में यह कहते हुए- 'यह मूवमेंट ऐसे नहीं, ऐसे करो' ... और फिर से सब कुछ सामान्य हो गया.

आपातकाल लगा. मुझे जो काम रेडियो, अकादमी आदि सरकारी संस्थाओं से मिलता था, वह रुक गया तो विजय बहादुर सिंह ने कहा- 'मेरी मानो तो विदिशा आ जाओ और एम.ए. कर डालो.' विडम्बना ही कहेंगे इसे कि कहाँ जो पी.जी. किस कॉलेज में हो, वहाँ भाषण देकर पैसे लेता था और कहाँ अब ख़ुद पी.जी. करूंगा. आर्थिक समस्या, फ़ी आदि का हल विजय बहादुर ने यह सुझाया- 'ऐसा करना, तुम्हारे दो नाम हैं न. शैक्षणिक नाम, नंदकिशोर शर्मा रहेगा और वेणुगोपाल को हम माडर्न पोएट्री की क्लास दे देंगे. फ़ी वगैरह एडजस्ट हो जाया करेंगे. और फिर हम लोग तो हैं ही.'

मैं विदिशा गया और शरद जी फ़िल्मों में लिखने मुम्बई. विदिशा के जिलाधीश सतीश कंसल, शरद जी के गहरे दोस्त थे. कुँआरे थे. शरद जी अक्सर लिखने के बहाने उनके पास आते. 'गोधूलि' फ़िल्म उन्होंने वहीं लिखी. शाम के टहलने-घूमने में कई बार विजय बहादुर सिंह और मैं साथ होते. ठहाके वैसे ही लगते लेकिन खनक में फीकापन आ गया था.

पता नहीं किसलिए और कैसे शरद जी को यह शक हो गया कि मैं कहीं दुनियावी कामयाबी हासिल करने के लिए षड्यंत्रकारियों में शामिल हो गया हूँ. चापलूसी करने लगा हूँ और यहाँ-वहाँ गोटियाँ बिठाने की और प्रभावशाली लोगों को पढ़ाने की कोशिशों में लगा रहता हूँ.

एक बार जब राजेन्द्र माथुर 'नवभारत टाइम्स' के सम्पादक थे, तब मैं किसी काम से दिल्ली गया था. राजेन्द्र माथुर से पुरानी जान-पहचान थी., सो उनसे मिलने चला गया. संयोग से वहाँ शरद जी भी आ गए. मुझे देखते ही गुस्से और खीझ से भर गए. मौका मिलते ही, राजेन्द्र माथुर न सुन सके, इस तरह मुझसे बोले- 'यहाँ भी आ गए तुम! ज़रा तो शर्म करो.' मैं पूछता ही रह गया- 'क्या मतलब है आपका.'

वह तनाव में चुप रहे. मुझे लगा कि सफाई देने का कोई औचित्य नहीं. साफ था कि कोई मोर्चा ऐसा है, जो उनका सर्वथा निजी है. जहाँ वह जूझ रहे हैं और लगातार हार रहे हैं और टूट रहे हैं. क्या हो सकता है वह मोर्चा? एक ही जवाब हो सकता था- आर्थिक परेशानियों का या व्यावसायिकता का.

'तिलिस्म' कहानी में नायक बेहद डरता रहता है. कभी उसे लगता है, कोई पीछे से आक्रमण करने ही वाला है. देखता है तो पत्नी है जो पीठ पर हाथ रखना चाहती है. उसे लगता है- 'घर की हर चीज़ अब तिलिस्मी हो गयी थी. वह परदा क्यों हिल रहा है? इसके पीछे कोई नकाबपोश तो नहीं?'

शरद जी हमेशा किसी न किसी में अपने नायक से 'आइडेंटीफाई' करते थे. कभी सीधे-सीधे तो कभी छिपे तौर पर. जो उनके नायक की मनोस्थिति, वह उनकी मनोस्थिति. जो मित्र नहीं हैं, वे शत्रु हैं. वह अपने इन्हीं विचारों की जकड़बंदी में फंस गए थे.

दरअसल ज़िंदगी के नाम पर वह एक तिलिस्म को जी रहे थे. उसकी ताली की तलाश में भोपाल से मुंबई के बीच की दूरी माप रहे थे. कभी तिलिस्म उनका डिफेन्स मैकेनिज्म बनता तो कभी वही उनके लिए डरौना बनकर डराने लग जाता.

तिलिस्म ही उनके लिए आश्वासन था. वही चेतावनी भी था, हमलावर भी और वही आश्रयस्थल और छिपने की जगह भी. तिलिस्मी क़ैदी जैसे व्यंग्य कर सकता है और हंस-हंसा सकता है, वैसे ही शरद जी व्यंग्य भी कर रहे थे और हंस-हंसा भी रहे थे. करुणा जिस तरह की विचारधारा की मांग करती है, उससे शरद जी सायास दूर थे. आत्मदया और आत्मघृणा व्यक्ति को अकेला कर देती है और शरद जी दिन-ब-दिन घनघोर अकेले होते चले गए. आज अधिक से अधिक इतना भर कहा जा सकता है कि काश, उनका व्यंग्य भी करुणा से उपजता!

बहुरूपी तिलिस्म को पहचानकर अगर हम उसके निरीह क़ैदी होने से बच सके तो शरद जी का जीवन और लेखन हमारे लिए अधिक सार्थक हो पायेगा.

(समाप्त. पुनः धन्यवाद!)

'पहल' से साभार

एक फच्चा कबाड़ी की कविता

अरिंदम बारह साल के हैं। आज अचानक उन्हें यह अहसास हुआ कि वे तो आशुकवि हैं! फिर क्या था, धड़ाधड़ कविताएँ रचने लगे। बाहर बारिश की झड़ी थी (दिल्ली की बात है ये) और उनकी कॉपी में कविताओं की। फिर कविता मॉनसून पर भी लिखी गई जो कि अब आपकी नज़र है। दाद जी खोल कर दीजिएगा, (अरिंदम की) उम्र का तकाज़ा है।

जब धरती नहा रही थी

आसमां रो रहा था
बादल गुर्रा रहे थे
धरती नहा रही थी
यह था मॉनसून

बच्चे भीग रहे थे
फसलें उग रही थीं
चादर आसमां को ढक रही थी
यह था मॉनसून

Wednesday, September 10, 2008

ग्यारह सितंबर का एक फोटोग्राफ




नोबेल सम्मान प्राप्त पोलिश कवयित्री विस्वावा शिम्बोर्स्का की एक कविता:

ग्यारह सितंबर का एक फोटोग्राफ़

वे कूद रहे थे जलती इमारतों से
एक
दो
कुछेक और
- कुछ ऊपर थे, कुछ नीचे
एक फोटोग्राफ़र ने उन्हें दर्ज़ कर लिया है
जब वे जीवित थे
धरती के ऊपर
धरती तक पहुँचते हुए -
हर आदमी साबुत
हर एक का अपना चेहरा

और हर एक का भली तरह छिपा हुआ रक्त
- अभी वक़्त है उनके बालों के बेतरतीब हो जाने में
अभी वक़्त है उनकी जेबों से चाभियाँ और रेजगारी निकल कर गिरने में
वे अब भी उपस्थित हैं हवा की वास्तविकता के भीतर
उन जगहों पर जहाँ अभी-अभी
उनके लिए जगह का निर्माण हुआ है

उनके वास्ते मैं सिर्फ़ दो काम कर सकती हूँ -
उनकी उड़ान का वर्णन करूं
और अपनी ओर से न जोड़ूं कोई अन्तिम शब्द!

(साभार: 'पहल'- ७५)

'भरी सभा में मुझे गालियाँ दी हैं इसने'

उन्होंने बोलचाल बंद कर दी. सामने पड़ते ही मेरी नमस्ते करने की आदत थी. मैं करता पर वह मुँह फेर लिया करते. मैं उनका दुश्मन नंबर वन हो गया था. इस बात का उन्होंने इतना प्रचार-प्रसार किया, मुझे लेकर इतने चुटकुले बनाए कि जब कारंत जी ने रंग-शिविर में मुझसे और इरफाना जी ने अकेले में पूछा- 'आपको मेरे साथ काम करने में ऐतराज तो नहीं, क्योंकि आपका शरद जी के साथ कुछ ठीक नहीं चल रहा है.' तो मैंने कहा- 'भाभी जी, आप भी किन बातों के चक्कर में पड़ी हैं. शरद जी गुस्से में हैं, यह सही है, लेकिन आप और शरद जी मेरे लिए पहले आदरणीय थे, आगे भी रहेंगे.'

शरद जोशी पर वेणुगोपाल का संस्मरण
....इसी क्रम में उस गोष्ठी की बात भी. शरद जी के कृतित्व पर केंद्रित. आयोजक प्रभाकर श्रोत्रिय ने कहा कि मैं 'जीप पर सवार इल्लियाँ' किताब पर लिखूं. शरद जी भी यही चाहते थे. उन दिनों मुझे लगता था कि तीखा स्वर ही मेरी पहचान है. शरद जी पर लिखने के लिए मैंने 'तिलिस्म' नामक पुस्तक को चुना. शरद जी भी ख़ुश हुए क्योंकि 'तिलिस्म' उनकी भी प्रिय रचना थी. मुझे लगा कि शरद जी इतने अधिक अपने हैं कि किसी भी किस्म के समझौते की जरूरत नहीं है. अपनों के आगे तो सच-सच बोलना चाहिए. मेरे विचार में जब 'धर्मयुग' में कथादशक योजना के अंतर्गत परसाई जी और शरद जी शामिल हुए थे तो वह भी स्वयं को कहानीकार मानते थे और दूसरे भी.

धर्मवीर भारती ने उन्हें कहानीकार समझकर ही इकत्तीस कथाकारों में चुना था. फिर यह दोनों व्यंग्यकार कबसे हो गए? यह लेबुल किसने चिपकाया? मैंने शरद जी की रमेश बख्शी के बारे में कही हुई बात से ही लेख की शुरुआत की. रमेश बख्शी को जिस तरह भारती ने 'घरेलू संबंधों का कहानीकार' कहा, वैसे ही परसाई और शरद जोशी को भी 'व्यंग्यकार' बना दिया गया. यह सिर्फ़ एक लेबुल है.

परसाई जी और शरद जी या तो कहानियां लिखते हैं या फिर निबंध या रेखाचित्र आदि. व्यंग्य तो युग की स्पिरिट है. चाहे कविता हो, चाहे नाटक. उसे विधा कहना ग़लत है. मैंने इस प्रसंग में लेख को प्रभावशाली बनाने के लिए धूमिल की पंक्ति 'जब दोस्तों का गुस्सा हाशिये पर चुटकुला बन रहा हो' भी उद्धृत की और दोस्तों को चेतावनी दी कि वे व्यावसायिकता का शिकार न बनें. जो लेखक 'तिलिस्म' जैसी कहानी लिख सकता है, वही लेबुल लग जाने के बाद चुटकुले लिखने पर मजबूर है. लेख का अंत मैंने गिन्सबर्ग की 'हाउल' की पंक्तियों से किया- 'हम अभिशप्त हैं अपने सदी के श्रेष्ठ मस्तिष्कों को/नष्ट/भ्रष्ट होते देखने के लिए.'

लेख का पाठ ख़त्म हुआ तो सबसे अधिक तालियाँ शरद जी ने ही बजायीं. फिर उन्होंने जवाब दिया. जो कहा, वह मुझे हतप्रभ और अवाक् कर गया. उन्होंने बताया कि कैसे मैं दोस्तों से मांग-मांग कर कपड़े पहनता हूँ और उन्हीं के चंदे पर ज़िंदगी काट रहा हूँ. तात्पर्य यह कि ऐसे भिखमंगे चरित्रवाले व्यक्ति को किसी सभा या गोष्ठी में बोलने का अधिकार नहीं है. जब उनका जवाब समाप्त हुआ तो मुझे लगा कि बात ख़त्म हो गयी. मैं तो 'तिलिस्म' के कहानीकार को श्रेष्ठ मानकर उसे व्यावसायिकता का शिकार होकर नष्ट-भ्रष्ट होने से बचने की सलाह दे रहा था. मेरा अंदाज़ जरूर तीखा था लेकिन नीयत दुरुस्त थी.
गोष्ठी के बाद शरद जी ने मुझसे बात करने से मना कर दिया. तब भी मैंने रामप्रकाश त्रिपाठी से यही कहा- 'रचनाकार को गुस्सा आ गया है तो उसका गुस्सा सर-आंखों पर.' लेकिन मैं यह नहीं समझ पा रहा था कि ग़लती कहाँ पर हो गयी? शरद जी ने ही मुझे जो चेतावनी दी थी, और विस्तार से समझाया था, मैंने उसी को तो उन पर लागू किया था.
दूसरे दिन रमाकांत जी को पता चला. वह बोले-'तुम तो मेरे साथ चलो. शरद जी के साथ मिलकर सारे गिले-शिकवे दूर कर लो.' वह अपने साथ ले गए. शरद जी से उन्होंने कहा- 'ये ले आया हूँ वेणुगोपाल को मैं. जो भी गुस्सा हो आपका, निकाल डालिए.' मुझे देखते ही शरद जी आग-बबूला हो गए. 'इसने भरी सभा में गालियाँ दी हैं मुझे.' उन्होंने कहा. मैंने कहा- 'शरद जी मैंने गालियाँ नहीं ;तिलिस्म' जैसी कहानी के रचयिता के व्यावसायिक दबाव में आकर नष्ट-भ्रष्ट होने की बात कही है.' वह और भी भड़क गए. 'गालियाँ और क्या होती हैं?' उनका कहना था.'

उन्होंने बोलचाल बंद कर दी. सामने पड़ते ही मेरी नमस्ते करने की आदत थी. मैं करता पर वह मुँह फेर लिया करते. मैं उनका दुश्मन नंबर वन हो गया था. इस बात का उन्होंने इतना प्रचार-प्रसार किया, मुझे लेकर इतने चुटकुले बनाए कि जब कारंत जी ने रंग-शिविर में मुझसे और इरफाना जी ने अकेले में पूछा- 'आपको मेरे साथ काम करने में ऐतराज तो नहीं, क्योंकि आपका शरद जी के साथ कुछ ठीक नहीं चल रहा है.' तो मैंने कहा- 'भाभी जी, आप भी किन बातों के चक्कर में पड़ी हैं. शरद जी गुस्से में हैं, यह सही है, लेकिन आप और शरद जी मेरे लिए पहले आदरणीय थे, आगे भी रहेंगे.'

कारंत जी ने जब वेणु गांगुली की नाट्य-कथा 'रंग-शिविर के लिए विजय तेंदुलकर का 'पंछी ऐसे आते हैं' नाटक निर्देशित किया तो मुझे बंडा की भूमिका सौंपी. इरफाना जी मेरी माँ की भूमिका में थीं. शरद जी भोपाल में हर परिचित से कह रहे थे- 'बड़ा क्रांतिकारी बना फिरता है. ड्रामे में ही सही, मेरी पत्नी का बेटा बना है, तो एक प्रकार से मेरा भी बेटा बन गया न.'

मैं सुनता और दुखी होता. एक श्रेष्ठ मस्तिष्क का नष्ट-भ्रष्ट होना स्पष्ट देख रहा था. मान लीजिये, मैंने कुछ ग़लत कह भी दिया हो उस दिन की गोष्ठी में, तो भी कहाँ मैं, कहाँ शरद जी. कल के छोकरे की बातों को इतना सर पर बिठाने की क्या जरूरत!

मुझे लगा यह नार्मल नहीं है. कहीं कुछ गहरे में टूट-फ़ुट रहा है. सतह पर भले ही कुछ न दिख रहा हो.

(अगली कड़ी में जारी)

'पहल' से साभार

दर-ओ-दीवार से भी रश्क मुझे आता है, गौर से जब किसी जानिब वो नज़र करते हैं

डॉक्टर रोशन भारती की पहचान बताने को मुझ से कोई पूछे तो मैं कहूंगा: "बेहद सुरीला शख़्स!" यह इत्तेफ़ाक़ था कि दिल्ली में रहने वाला, संगीत-कला के मामले में निहायत ठस्स एक दोस्त मेरे लिए भारती साहब का अल्बम 'दाग़' लाकर छोड़ गया. उसे किसी ने बतौर उपहार दिया था पर वह संगीत सुनता ही नहीं, सो उसकी खर-मित्र बुद्धि ने मुझे ही उक्त गिफ़्ट का सही इस्तेमाल करने लायक समझा.

टाइम्स म्यूज़िक द्वारा जारी किया गया यह संग्रह अपने रैपर से बाहर आने के बाद से ही मेरे सर्वप्रिय अलबमों में जगह बनाने में कामयाब हो गया. फिर मैंने कभी सुख़नसाज़ शुरू किया. जाहिर है मैंने डॉक्टर रोशन भारती की आवाज़ में वहां दाग़ देहलवी की एक ग़ज़ल लगाई. उस पर भाई संजय पटेल की टिप्पणी आई. उन्होंने यह भी बताया कि मुझे जल्द ही डॉक्टर रोशन भारती का फ़ोन नम्बर देंगे. दो दिन बाद मैं किसी दोस्त के घर था जब फ़ोन बजा और उस तरफ़ से भारती साहब विनम्रतापूर्वक अपना परिचय दे रहे थे. ऐसे मौके कम आते हैं जब आप एक अबूझ ख़ुशी से सन्न रह जाते हैं - वह भी ऐसा ही क्षण था. ऊपर से उन्होंने मुझे ज़रूरत से ज़्यादा मान देते हुए एक शेर भी गा के सुना दिया.

अलबम के नाम से जाहिर है, इस में सारी ग़ज़लें दाग़ की हैं. रोशन भारती की आवाज़ में नए ज़माने के गायकों के पैंतरे नहीं, अलफ़ाज़ को मोहब्बत करने की तमीज़ है. कहीं-कहीं वे आपको इशारे-इशारे में अपनी रेन्ज भी दिखाते चलते हैं. पर सबसे बड़ी बात तो ये है कि उन्हें सुनना बहुत-बहुत सुकूनभरा होता है. कल रात भर उस अलबम को सुनता रहा तो सोचा क्यों न आप सब को डाक्साब से मिलाऊं.

प्रस्तुत हैं उनकी गाई दो ग़ज़लें:




दिल गया, तुमने लिया हम क्या करें
जाने वाली चीज़ का ग़म क्या करें

एक साग़र पर है अपनी ज़िन्दगी
रफ़्ता-रफ़्ता इसे भी कम क्या करें

मामला है आज हुस्न-ओ-इश्क़ में
देखिये वो क्या करें, हम क्या करें

आईना है और वो हैं देखिये
फ़ैसला दोनों ये बाहम क्या करें



आप जिन जिन को हदफ़ तीर-ए-नज़र करते हैं
रात दिन हाय जिगर हाय जिगर करते हैं

गै़र के सामने यूं होते हैं शिकवे मुझसे
देखते हैं वो उधर बात इधर करते हैं

दर-ओ-दीवार से भी रश्क मुझे आता है
गौर से जब किसी जानिब वो नज़र करते हैं

एक तो नश्शा-ए-मय उस पे नशीली आंखें
होश उड़ते हैं जिधर को वो नज़र करते हैं
ooo
*अगर आपको लगा हो कि डाक्साब गले में आला लगाए तानपूरे पर जमे बैठे होंगे तो निराशा हाथ लगेगी. ये वो वाले नहीं दूसरे वाले डॉक्टर हैं और बेग़म अख़्तर पर महत्वपूर्ण शोधकार्य कर चुके हैं जिसे किताब की सूरत में आने की राह में ख़ुद इन्हीं साहब का आलस आड़े रहा है. स्मार्ट नौजवान हैं :



कोटा, राजस्थान में रहने वाले रोशन भारती से उनके मोबाइल पर 09829036828 पर बात की जा सकती है.

Tuesday, September 9, 2008

प्रशियन नाइट्स से एक कविता

कल रात एक मित्र ने फ़ोन पे एक कविता सुनाई ... बहुत ही लम्बी कविता ... अब तक ज़हन पे छाई है ... उस के बाद एक तहखाने में गया .... न जाने कितने सालों पहले पढ़ी एक किताब याद आ गई थी ......

यहां प्रस्तुत कविता 'कैंसर वार्ड' जैसे कालजयी उपन्यास के लेखक नोबेल पुरस्का विजेता अलैक्ज़ैन्डर सोल्ज़ेनित्सन, ने एक रूसी आर्टिलरी ऑफ़िसर के रूप में दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अपने प्रिज़न कैम्प में लिखी थी :

रूसी से अंग्रेज़ी अनुवाद किया है रॉबर्ट कॉन्क्वेस्ट ने


From her shoulders slipped the shawl,
Woven of some white-checked wool.

In my confusion I was stuck,
Losing the flow of German speech.

Somehow I could only reach
The shawl, and throw it around her neck.

From her hands, still warm after the wash,
A faintest wisp of steam uncurled.

Questioning, and unsure,
She stepped back toward the threshold ….
I strode to the still-open door,
And I shut it with a crash.

Condemned to action, without looking,
I just gestured to her, “Komm !”
It wasn’t passion, or the firm
Pleasure in the muscles ringing ….
With my back to the mean bed I
Shortly heard that she … was ready ….

And after, unnaturally close
To the pale blue of her eyes,
I said to her – too late – “How base !”
Anne, that moment, with her face
Sunk in the pillow, in an unsteady
Voice that she could not control,
Begged, “Doch erschiessen Sie mich nicht !”

Have no fear ... For ... Oh ! ... already
Another’s soul is on my soul ...

अब पेश है हिन्दी अनुवाद:

सफ़ेद चेकदार ऊन से बुनी शॉल
ढुलकी उस के कन्धों से

मैं अवाक था हकबकाया
जर्मन बोलने का मेरा प्रवाह बाधित

किसी तरह मैं पहुंच सका उस शॉल तक
डाल दिया उसकी गरदन के गिर्द

अभी अभी धुले उसके गर्म हाथों
से लहराती उठी भाप की एक मद्धम लौ

सवालात से भरी और अनिश्चित
वह वापस जा रही थी देहरी की तरफ़

मैं दौड़ता हुआ पहुंचा अब तक खुले दरवाज़े पर
और भेड़ कर बन्द कर दिया उसे

कर्मान्ध होकर बिना उसकी तरफ़ देखे,
मैंने उसे इशारा किया: "आओ!"
यह कोई आवेग न था, न
मांसपेशियों में लहराता सुख ...
बिस्तर पर थी मेरी पीठ जब
मैंने उसके ... तैयार हो चुकने की संक्षिप्त आहट सुनी

बाद में जब मैं अप्राकृतिक तरीके से
निकट था उसकी आंखों के फ़ीके नीले के
मैंने उससे कहा - अलबत्ता बहुत देर हो चुकी थी - "कितना बर्बर!"
उस क्षण, उसका मुंह धंसा हुआ था तकिये में,
काबू से बाहर हो गई अस्थिर आवाज़ में
उसने याचना की: "और तब भी तुम मुझे गोली से नहीं उड़ाते!"

डरो मत ... उफ़! ... अभी से ...
मेरी आत्मा पर सवार किसी दूसरे की आत्मा ...