Saturday, October 4, 2008

'सुनहरे वरक़' का एक वरक़ : 'टुक पांव की झांझर से ...'

आज से काफी साल पहले जब हमारे घरों में टीवी का एक ही चैनल हुआ करता था जिसे हम लोग प्यार से 'जनता चैनल' या डीडी - वन ( दूरदर्शन ) कहा करते थे तब ऐसे कई कार्यक्रम आया करते थे जिनको देखना रोजमर्रा का एक जरूरी काम हुआ करता था. तब धारावाहिक लगभग नए - नए ही शुरू हुए थे और अपनी उनमें कोई खास रुचि भी नहीं थी. 'साप्ताहिकी' , 'चित्रहार' , 'वर्ल्ड दिस वीक' आदि के अलावा एक ऐसा कार्यक्रम जिसे बिला नागा देखने की आदत पड़ गई थी , वह था - 'सुनहरे वरक़' - यह हिन्दी - उर्दू के कवियों - शायरों के जीवन प्रसंगों व रचनाकर्म पर आधारित एक ऐसा कार्यक्रम था जो साहित्य -संगीत - कला की प्यास को शमित भी करता था और जाग्रत भी. इसका शीर्षक गीत - ' ये शायरों के नग्मे कवियों की कल्पनायें' निदा फाजली साहब ने लिखा था और पंकज उधास ने गाया था. आजकल जब कि मैं अपने संगीत के संग्रह को एक बार फिर सहेजने में लगा हूं तब 'सुनहरे वरक़' का पहला खंड मिला है. इसी में संकलित है 'बाबा- ए -उर्दू शायरी' कहे जाने वाले दक्षिण देशीय उर्दू / रेख्ता काव्य के जगमगाते सितारे वली दकनी ( १६६८ - १७४४ )जिन्हें वली 'गुजराती' भी कहा जाता है, का कलाम जिसको राजकुमार रिजवी ने स्वर दिया है और संगीत से संवारा है खय्याम साहब ने. तो अब देर नही करते हैं और सुनते हैं उर्दू कविता के आरंभिक मुहाविरे का मुजाहिरा करती यह गजल -

मत गुस्से के शोले से टुक दिल को जलाती जा .
टुक मेह्र के पानी से तू आग बुझाती जा.

इस रात अंधेरी में मत भूल पड़ूं तुझ सूं ,
टुक पांव की झांझर से झनकार सुनाती जा .

तुझ चाल की कीमत से दिल नईं है मेरा वाकिफ़,
ऐ मांग भरी चंचल टुक भाव दिखाती जा.

तुझ बुत की परस्तिश में गई उम्र मेरी सारी ,
ऐ बुत की पुजनहारी इस बुत को पुजाती जा .

तुझ घर की तरफ़ सुंदर आता है 'वली' दायम ,
मुश्ताक दरस का है टुक दरस दिखाती जा .




( वली दकनी का लगभग पूरा जीवन सफर में ही बीत गया। सूफीवाद का यह मुरीद ता - जिन्दगी भटकता रहा - औरंगाबाद में जनम लिया और अहमदाबाद में आखिरी सांस ली. इस अजीम शायर ने मरने के बाद भी चैन न पाया. आपको याद तो होगा? मुआफ करें , यदि याददाश्त के आईने पर वक्त की गर्द बिछ-सी गई है तो तनिक यहां झांक लेवें )

मुझे देखने को मत उठाना अपनी निगाह



दिसम्बर ९, १९१३

अन्ना अख़्मातोवा

साल के सबसे अंधेरे दिनों ने
बन जाना चाहिये सबसे साफ़.
मुझे तुलना के लिए शब्द नहीं मिल रहे
- कितने मुलायम, कितने प्यारे हैं तुम्हारे होंठ

मुझे देखने को मत उठाना अपनी निगाह
ताकि मैं जीवित रह सकूं
वे सबसे उम्दा ज़हर की शीशियों से भी हल्की है
और मेरे वास्ते उतनी ही घातक

अब समझती हूं मैं, कि हमें शब्द नहीं चाहिये होते
कि बर्फ़ लदी टहनियां हल्की होती हैं, और
बहेलिये ने
नदी किनारे फैला लिया है अपना जाल!

(फ़ोटो: अन्ना के जीवन का एक दुर्लभ खु़शनुमा समय - पति निकोलाई गुमिल्योव और पुत्र लेव के साथ, १९१३)

ऐसा लगता है



ऐसा लगता है

अन्ना अख़्मातोवा

ऐसा लगता है जैसे कभी नहीं सुनाई देगी
आदमी की आवाज़ इस जगह.
बस प्रस्तरयुगीन हवा
दस्तक दे रही है काले द्वारों पर

ऐसा लगता है
मानो आसमान के नीचे बस मेरा ही स्वास्थ्य रहा है ठीक,
शायद इसीलिये, सब से पहले मैंने चाहा,
वह ख़तरनाक शराब पी जाना!



(फ़ोटो: ऊपर- सेन्ट पीटर्सबर्ग में अन्ना का स्मारक, नीचे - अन्ना की कब्र)

मैं खिड़की से बाहर देखने की जेहमत नहीं उठाती, मुझे मालूम है मुझे क्या दिखाई देगा

यक़ीन मानिये, परसों रात से नहीं सोया हूं. अन्ना अख़्मातोवा के अनुवाद किये थे कुछ साल पहले. फिर पता नहीं किसी प्रकाशक से बनी बात आधी रही और मैंने इस पाण्डुलिपि को अपने नितान्त व्यक्तिगत तहख़ाने में सहेज दिया था. मारीना स्वेतायेवा की एक कविता यहां क्या लगाई, अन्ना की उस विस्मृत पाण्डुलिपि को सश्रम खोजने के बाद बस सारा जीवन उसी के गिर्द घूम रहा है.

ज़्यादती न हो, इस लिहाज़ से मैंने तय किया है कि आज उसकी तीन कविताएं अलग-पलग पोस्ट्स में लगाऊंगा नियमित अन्तराल पर.

फ़िलहाल!

लगे हाथों, बोरिस पास्तरनाक की कई कविताओं के बिसराये हुए अनछपे अनुवाद भी कबाड़ में मिल गए हैं. साहब लोग बुरा न मानना अगर अगले कुछ दिन मैं रूस की महाकविता में डूबा आपको वही पेश करता रहूं.


मेरी डेस्क पर रात

अन्ना अख़्मातोवा

मेरी डेस्क पर रात.
काग़ज़ सफ़ेद है.
शहर की रात की गर्मी में
कोई भी चीज़ उड़ती नहीं.

मैं उसकी एक सिगरेट पीती हूं
मैं आख़्रिरी रूसी वोदका ख़त्म करती हूं
मैं खिड़की से बाहर देखने की जेहमत नहीं उठाती
मुझे मालूम है मुझे क्या दिखाई देगा

वह भी जाग गया है
और वह मेरा नाम नहीं लेगा
कैसी ताक़त है इस आदमी के भीतर
मेरा प्यार पाने के लिए कुछ भी नहीं करता

Friday, October 3, 2008

मेरी याद करना और सोचना: वह चाहती थी तूफ़ान आएं



तुम सुनोगे तूफ़ान को

अन्ना अख़्मातोवा

तुम सुनोगे तूफ़ान को, तुम मेरी याद करना
और सोचना: वह चाहती थी तूफ़ान आएं. आकाश की किनारी
कड़े कत्थई रंग की होगी
और लपटें उठ रहॊ होंगी तुम्हारे दिल में, जैसा तब हुआ करता था.

यह सब सच होगा एक दिन मॉस्को में
जब मैं तुमसे अन्तिम विदा लूंगी
और जल्दी से चल दूंगी उन ऊंचाइयों की तरफ़
जहां मैं जाना चाहती थी
अपनी परछाईं को छोड़कर, तुम्हारे पास रह जाने के लिये.

मुझे सुनाई पड़ती है हमेशा विलाप करती एक चिड़िया


मुझे सुनाई पड़ती है हमेशा विलाप करती एक चिड़िया

अन्ना अख़्मातोवा

मुझे सुनाई पड़ती है हमेशा विलाप करती एक चिड़िया
और मैं सुनती हूं भरपूर गरमियों को विदा होते
सांप जैसा फुंफकारता है हंसिया
मुझे कटते हुए मक्के के तनों की आवाज़ सुनाई देती है

छरहरी चरवाहिनों के नन्हे घाघरे
हवा में उड़ते हैं छुट्टियों में फहराए जाने वाले झंडों सरीखे
प्रसन्न घंटियों की टनटन, और धूल ढंकी पलकों के नीचे से
सरक आने वाली वह निगाह

प्यारभरी बातों से मुझे
आने वाली किसी काली घटना का अन्देशा तक होने की उम्मीद नहीं
पर तुम आओ फिर भी, और देखो तो इस स्वर्ग को
जहां हम साथ थे कभी -प्रसन्न और छलहीन!

मेरे भीतर

एक स्मृति का वास है मेरे भीतर
जिससे न मैं लड़ सकती हूं, न लड़ूंगी
कुंए की गहराई में किसी स्फटिक कंकड़ सी है वह -
ख़ुशी भी, दर्द भी!

मेरी आंखों को देखने वाला शख़्स
इसे देखे बिना नहीं रह पाता
जैसे किसी दुःखभरी कथा को सुनते हुए
वह अधिक विचारवान, शान्त और उदास हो जाता है -

मुझे पता है ईश्वर चीज़ों में बदल देता है लोगों को
मुक्त छोड़कर उनकी जीवित चेतना को
उनकी चमत्कारभरी यातना को जिलाए रखकर.

तुम बदल दिये गए हो मुझ में!

(फ़ोटो: बीमार अन्ना अख़्मातोवा, १९२४)

क्या तुम्हें इस धरती पर अब भी खोजा जा सकता है



रूसी साहित्य पर गहरा प्रभाव छोड़ने वाली अन्ना अख़्मातोवा की एक कविता आप ने परसों कबाड़ख़ाने में पढ़ी थी. मैंने वायदा किया था कि अन्ना की और कविताएं यहां पेश करूंगा.

अन्ना अख़्मातोवा (जून ११, १८८९ - मार्च ५, १९६६) का काव्य-संसार समय, स्मृति, रचनात्मक स्त्री की नियति और स्टालिन के खौफ़नाक युग से जुड़ी कई विषयवस्तुओं से मुख़ातिब है. 'शोकगीत' नामक महाकाव्यात्मक रचना स्टालिन के कहर का आधिकारिक दस्तावेज़ गिना जाता है.

अख्मातोवा के माता-पिता १९०५ में अलग हो गये थे. त्सारस्को सेलो में उनकी शिक्षा हुई जहां उन्हें उनके भविष्य के जीवनसाथी निकोलाई गुमिल्योव ने मिलना था. अन्ना ने बचपन से की कविता लिखना शुरू कर दिया था - पुश्किन, रेसीन और बरातिन्स्की उनके प्रिय कवि थे.

बहुत सारे रूसी कवियों ने अन्ना के प्रति अपने प्रेम का इज़हार किया. अन्ना ने १९१० में कवि निकोलाई गुमिल्योव से शादी कर ली. निकोलाई गुमिल्योव जल्द ही शेरों के शिकार के एक अभियान पर अफ़्रीका चल दिए. निकोलाई गुमिल्योव ने अन्ना की कविता को कभी भी गम्भीरता से नहीं लिया. बाद में रूस में तत्कालीन जीवित महानतम कवि अलैक्सान्द्र ब्लोक द्वारा सार्वजनिक घोषणा किये जाने पर वह अन्ना की कविताओं को अपनी रचनाओं से कहीं आगे का मानता है, गुमिल्योव को 'सदमा' लगा था.

१९१२ में अन्ना के पहले पुत्र लेव का जन्म हुआ और 'शाम' शीर्षक से पहला संग्रह भी आया. पाठकों को इस संग्रह में रॉबर्ट ब्राउनिंग और टॉमस हार्डी के रंग नज़र आए.

१९१४ में उनका दूसरा संग्रह आया. तब तक हज़ारों रूसी स्त्रियां "अन्ना की इज़्ज़त में" कविताएं रच रही थीं. अन्ना की तब तक की कविताओं में अपने संबंध के बेहद जटिल बिन्दु पर पहुंचे स्त्री-पुरुष की थीम हुआ करती थी.

अपने उच्चवर्गीय तौर तरीकों के चलते अन्ना को "नेवा की महारानी" और "रजत युग की आत्मा" जैसे विशेषणों से नवाज़ा गया. इस स्वर्णिम काल को बहुत साल बाद अन्ना ने अपनी सबसे लम्बी रचना 'पोयम विदाउट अ हीरो' में याद किया है.
गुमिल्योव को सोवियत-विरोधी गतिविधियों में लिप्त रहने के आरोप में फांसी पर लटका दिया गया. बाद में अन्ना ने दो विवाह किए. स्टालिन के गुलाग-शिविरों में इन में से दूसरे पति कला-विशेषज्ञ निकोलाई पुनिन की मौत के बाद अन्ना ने बोरिस पास्तरनाक के कई प्रेम-प्रस्ताव ठुकराए.

१९२२ में अख़्मातोवा को बूर्ज़्वा घोषित कर दिया गया और १९४० तक उनकी रचनाओं पर प्रतिबन्ध लगा. पश्चिम में बहुत कम लोगों को यकीन था कि अन्ना जीवित बची हैं. पर १९४० में उन्हें एक नया काव्य-संग्रह छपाने की इजाज़त दे दी गई.
१९४६ में लातवियाई दार्शनिक इसाइयाह बर्लिन द्वारा अन्ना अख़्मातोवा से मुलाकात किये जाने की ख़बर सुनकर स्टालिन के सांस्कृतिक सलाहकार आन्द्रेई ज़्दानोव ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की कि अन्ना "अर्श वैश्या और अर्ध भिक्षुणी" है. इस के बाद अन्ना की कविताओं पर दुबारा प्रतिबन्ध लगा दिया गया और लेखक संघ से उसके निष्कासन का प्रयास किया गया जो मृत्युदण्ड के बराबर माना जाता था. अन्ना का बेटा यंत्रणा-शिविरों में सड़ रहा था जिसे मुक्त कराने को अन्ना ने स्टालिन की तारीफ़ तक में कविताएं लिखीं.

आधिकारिक प्रतिबन्ध के बावजूद अन्ना का काम और नाम रूस भर में फैलता रहा और उन्हें रूसी संस्कृति की धरोहर का पहरेदार माना जाने लगा था.

स्टालिन की मौत के बाद १९६४ में अन्ना की ७५वीं वर्षगांठ पर उनकी समग्र रचनाएं प्रकाशित हुईं. इसके बाद उन्हें कई यूरोपीय सम्मान दिये गए. ७६ की आयु में सेन्ट पीटर्सबर्ग में उनकी मृत्यु हुई.

आज अन्ना विश्व साहित्य का विशिष्ट नाम हैं. उनके नाम पर संग्रहालय बने हुए हैं. १९८२ में सोवियत अंतरिक्षयात्री लुडमिला ज्योर्जियाना द्वारा खोजे गए एक सुदूर ग्रह का नाम ३०६७ अख्मातोवा रखा गया.

पेश हैं अन्ना की दो छोटी कविताएं.:


आर्मेनिया के लिए

काली भेड़ की तरह आऊंगी मैं तुम्हारे सपनों में
अपनी कमज़ोर टांगों पर
मैं तुम तक आ कर पूछना शुरू करूंगी:
"बादशाह सलामत! क्या आपने लज़ीज़ भोजन किया?
मोती की तरह जकड़े हुए हैं आप ब्रह्माण्ड को
आपको नसीब हुआ अल्लाह का दैवीय आशीर्वाद ...
क्या स्वादिष्ट था मेरा बच्चा?
क्या वह खुश कर पाया आपको? क्या वह
आपके बच्चे को खुश कर पाया?"

मैं नहीं जानती

मैं नहीं जानती तुम जीवित हो या मर चुके
यह भी नहीं कि क्या तुम्हें इस धरती पर अब भी खोजा जा सकता है
या क्या उस वक़्त जब सूरज डूब जाता है
मुझे गम्भीरतापूर्वक तुम्हारा शोक मनाना चाहिये?

तुम्हारे वास्ते है सब कुछ - नित्य की प्रार्थना
रातों की निद्राहीन गर्मी
और मेरी कविताओं का सफ़ेद रेवड़
और मेरी आंखों में नीली आग

इतना प्रिय कोई नहीं था मुझे, इतनी पीड़ा भी नहीं दी
मुझे किसी ने, उसने भी नहीं
जिसने यातना देने को मुझे धोख़ा दिया
उसने तक नहीं जिसने मुझे दुलार दिया और भूल गया.

(अन्ना की कुछेक और कविताएं जल्दी ही और पढ़वाऊंगा आपको)

Thursday, October 2, 2008

'सब मज़े दरकिनार आलम के' उर्फ़ मुनीश की मारुति

बेशक आज ईद है. गांधी और लालबहादुर जयन्ती है. पोस्टों का ढेर बताता है कि ये महत्वपूर्ण अवसर हैं. इस मौक़े पर ख़ुद कबाड़ख़ाने पर सिद्धेश्वर और विनीता ने अच्छी पोस्ट लगाई हैं. मगर मैं कहीं और ले जाना चाहता हूं आप को.

एक साहब हैं मुनीश. बहुत अज़ीज़ हैं - दोस्त हैं और कमाल इन्सान हैं. ज़बान पर उनकी पकड़ का मैं शैदाई हूं. 'आर्ट ऑफ़ रीडिंग' में उनकी आवाज़ में बहुत सुन्दर पोस्ट्स सुनी जा सकती हैं. 'मयख़ाना' उनका अपना ब्लॉग है जहां आप उनकी बहुआयामी प्रतिभा की झलक देख सकते हैं. आज उनके ब्लॉग पर एक ज़बरदस्त पोस्ट लगी हुई है. यह पोस्ट उनकी पुरातन मारुति कार को लेकर है जिस की सवारी का महती सौभाग्य एकाधिक बार इन पंक्तियों के लेखक को प्राप्त हो चुका है.

जिस तरह रेगिस्तान में इत्मीनान से डोलते यात्रारत ऊंट की निहायत औपचारिक लगाम को कोई नहीं खींचता और वह बेफ़िक्री से उसकी पीठ के एक तरफ़ लटकी यहां-वहां होती रहती है, उसी तरह इस महाकार ('नो पन इन्टेन्डेड') की फ़्रन्ट सीट की बैल्ट का महात्म्य है. वह है भी और नहीं भी. उसे आप ने अपने कन्धे पर डाल लेना होता है ताकि सुरक्षाकर्मी आप से बेफ़िज़ूल सवालात न करें. बाक़ी सारे काम तरीक़े से होते हैं यानी आपको जहां जाना होता है, आप वहां पहुंच जाते हैं.

इस पोस्ट को आप एक तरह से 'मयख़ाना' का विज्ञापन भी समझ सकते हैं. बहुत शानदार है मुनीश का यह ब्लॉग - बिल्कुल अलहदा. एक साफ़दिल इन्सान के सरोकारों से लबरेज़. और उनकी ज़बान ... उफ़्फ़! आप ख़ुद देख लेवें:




भर्तृहरि एक नामी राजा हुए हैं और अपने राज-काज से ज़ियादा वो याद किए जाते हैं उन बातों के लिए जो उन्होंने इंसानी फितरत , खुदा की नेमत और हुस्न की आग के बारे में कही हैं । उनके तमाम अशआर 'नीति शतक', 'वैराग्य शतक 'और 'श्रृंगार शतक' नाम के तीन दीवानों में कलमबंद मिलते हैं । कहते हैं 'वक़्त' या कहें 'काल' के बारे में उनका कहा आज के सबसे बड़े साइंस- दान जनाब स्टेफन हाकिंग्स से काफ़ी मेल खाता है। आप फरमाते हैं --"कालो न यातः वयमेव यातः" याने वक़्त नहीं बीत रहा ,हम ही बीत रहे हैं।

मशहूर शायर जनाब जां निसार अख़तर के बेटे और सूडो -सेकुलरिस्टों की ज़ीनत, मोहतरमा शबाना के खाविंद जावेद अख़तर साहब ने इस सब्जेक्ट पे एक नज़्म कही है जो आपके दीवान 'तरकश' में सहेजी गई है । बहरहाल, "वक़्त नहीं हम ही बीत रहे हैं", मेरी मारुती कार भी बीत रही है । अपना पन्द्रहवां सालाना उर्स वो इसी सितम्बर में मना चुकी है । इन पन्द्रेह बरसों में मैं अपनी कार के मुकाबले कहीं ज़ियादा बीता हूँ मगर महकमा ट्रैफिक वालों का फरमाना है के आपसे हमें कोई शिकवा नहीं लेकिन १९९३ मॉडल की मारुती अगर आप अब भी चलाना चाहते हैं तो इसका 'फिटनेस' सर्टिफिकेट ले आइये ।

उनकी मंशा समझनी मुश्किल नहीं । बड़ी- बड़ी कार कम्पनियों ने उनके अफसरान को निहाल कर रखा है । वो चाहती हैं के पुरानी गाडियाँ हटें तो नई बिकें । मारुती वालों से ये कोई नहीं पूछ सकता के भाई ऐसी कार बनाते ही क्यूँ हो जो १५ साल बाद भी सही सलामत चलती रहे । मुझे अपनी कार से कोई शिकायत नहीं । हरियाणा के गावोँ की भुसंड-भदान सड़कें हों या केट विंसलेट की चम्पई जांघों सी रेशमी कालका-शिमला रोड , रेणुका झील से पोंटा साहब का लद्दाख की याद दिलाता कच्चा रस्ता हो या आज के दौर की तमाम इंडियन हीरोइनों के पापी पेट जैसी सपाट नजीबाबाद - लैन्सडाउन रोड इस गाड़ी ने मुझे कभी धोखा नहीं दिया । हाँ हरियाणा टूरिस्म ने ज़ुरूर दिया ।

एक दफे दगशाई (हिमाचल) जाते हुए मोरनी हिल्स के रस्ते में लगे एक बोर्ड को देख मैं शोर्ट-कट के चक्कर में कालका की तरफ़ उतर गया जो नदी किनारे के गोल पत्थर की ढुलाई का रस्ता था और करीब १५ किलो मीटर का ये रस्ता हिमालयन कार रैली की प्रैक्टिस के लिए बेजोड़ हो सकता है । वहाँ से भी इस गाड़ी ने निकाला (निकालता तो खुदा है मगर मैं सेकुलर भी तो हूँ न) और ठीक पेट्रोल पम्प के सामने ही बंद हुई जहाँ इसकी वजेह महज़ बैटरी कनेक्शन का वायर हटना बताया गया ।



अब इस गाड़ी को बेचने का जी तो नहीं मगर रखना भी जी का जंजाल है चूंकि किसी दिन ये ज़ब्त भी हो सकती है अगर 'फिटनेस' न लिया तो! क्या करूँ समझ नहीं आता और ३ -३.५० लाख में आजकल कौनसी बढ़िया गाड़ी है ? गाड़ियों के बारे में ब्लॉग बन्धु अपने ख्याल यहाँ बाँट सकें तो इनायत होगी ।

गांधी जयन्ती पर कुछ पुराने कार्टून

ब्रिटेन के कट्टर रूढ़िवादियों ने कहा कि नमक सत्याग्रह को कुचलने के लिये ब्रिटिश राज ने जो नृशंसता अपनाई, उसके फलस्वरूप भारत में भड़के हिंसात्मक दंगों के पीछे सोवियत रूस का हाथ है। भारत की घटनाओं की इस तरह व्याख्या करने की विचारधार स्ट्रूब के इस कार्टून में देखी जा सकती है जो बीवरबुक प्रेस के मुख्य पत्र - कांग्रेस के अत्यंत तीव्र विरोधी - `डेली एक्सप्रेस´ के कार्टूनिस्ट ने बनाया था.



सत्याग्रह से विलिंगडन बड़ी उलझन में पड़ गये थे 15 जुलाई 1933 को गांधी जी ने उन के नाम एक तार भेजा जिसमें एक मुलाकात निश्चित करने के लिये कहा गया था ताकि संवैधानिक सुधारों के प्रश्न पर कांग्रेस और सरकार के मतभेद को शांतिपूर्वक और सम्मानजनक ढंग से हल करने के लिये बातचीत हो सके। विलिंगडन ने यह प्रार्थना स्वीकार नहीं की। होर ने हाउस ऑफ कॉनम्स में कहा : "हमने कह दिया है कि हम बातचीत करना नहीं चाहते और हम अपने इस फैसले पर अडिग हैं। मिस्टर गांधी एक तरफ तो सरकार से बात करना चाहते हैं, दूसरी ओर सविनय अवज्ञा के अपने अशर्त हथियार को भी अक्षुण्ण रखना चाहते हैं। मैं फिर कह दूं - कानूनों को पालन करने का दायित्व इन्हीं लोगों का है ओर इस के लिये कांग्रेस से किसी किस्म का समझौता करने का सवाल पैदा नहीं होता।"



माली ने गांधी जी को अपने कंधों पर समूचा राष्ट्र उठा कर चलते हुए दिखाया है। इंग्लैंड से वापसी पर उन्हें नई गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा जिनसे गोल मेज सम्मेलन और मैकडॉनल्ड द्वारा दिये गये आश्वासनों का खोखलापन उजागर हो गया। 3 जनवरी 1932 को उन्होंने वाइसराय को सूचना दी कि कांग्रेस `बिना किसी दुर्भावना के और बिल्कुल अहिंसक ढंग से सविनय अवज्ञा आंदोलन पुन: छेड़ेगी।´ विलिंग्डन ने तुरंत प्रहार किया। उसने अगली सुबह गांधी जी को गिरफ्तार कर लिया। जब तक सरकार चाहे तब तक बंदी बनाये रखने के लिये उन्हें यरवदा ले जाया गया। अन्य कांग्रेसी नेताओं की गिरफ्तारियां इसके बाद हुई।



30 जनवरी 1948 की शाम को पांच बजे के कुछ मिनटों बाद चंद गोलियों ने गांधी जी की जान ले ली। वे अपने होठों से `हे राम´ कहते हुए सिधार गये। उन्होंने अपना जीवन एक ध्येय, एक उद्देश्य के लिये बलिदान कर दिया और अपने अंतिम दिनों में तन-मन से उसी के लिये काम करते रहे। वह ध्येय था राष्ट्रीय एकता की पुन: स्थापना - वह एकता जो स्वराज्य के जन्म के साथ ही साम्प्रदायिक बर्बरता के आगे टूट कर बिखर गई थी। अपनी अटूट आस्थाओं और देश प्रेम की इतनी बड़ी कीमत ! लेकिन जो लौ उन्होंने जलाई है, वह हमेश-हमेशा जलती रहेगी।

चरखवा चालू रहै !


लोक अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम अपने आसपास और अपनी भाषा - शैली में ही खोजता है.ऐसा नहीं है कि देश - दुनिया के मामलात और मसले उसे प्रभावित नहीं करते लेकिन जब उन पर प्रतिक्रिया और प्रसंगानुकूल प्रकटीकरण की बात आती है तब वह सबसे पहले अपने तरीके से अपनी बात कहने की कोशिश करता हैं, यही उसकी खूबी ,खासियत व खरापन है. भारतीय स्वाधीनता के समर में जनजागरण के एक सशक्त औजार के रूप में लोकगीतों के वर्ण्य विषय कितने समकालिक, कितने सजग हो चले थे, यह 'चरखवा चालू रहै' गीत में बखूबी देखा जा सकता है. गौर करने की बात यह है इतना सब होते हुए भी न केवल इसकी सहजता बरकरार है बल्कि मौज, मस्ती और मारक व्यंगात्मकता जस की तस है. इतिहास के खाने में दर्ज इस गीत के रचयिता पता नहीं चल पाया है. वैसे भी लोक की सामूहिकता में यह संभव भी नहीं लगता है कि किसी एक व्यक्ति ने इसे इसे रचा होगा . यह एक सामूहिक - सामयिक इंप्रोवाइजेशन का प्रतिफल ही रहा होगा शायद. आज गांधी जयंती अवसर पर प्रस्तुत है गीत - 'चरखवा चालू रहै' आप इसे पढ़िए , आधुनिक भारत के इतिहास - चरित्रों से मुखतिब होइए और गांधी बाबा की बारात का हिस्सा बन जाइए ....

चरखवा चालू रहै !

गांधी बाबा दुलहा बने हैं
दुलहिन बनी सरकार
चरखवा चालू रहै !

वीर जवाहर बने सहबाला
अर्विन बने नेवतार
चरखवा चालू रहै !

वालंटियर सब बने बराती
जेलर बने वाजंदार
चरखवा चालू रहै !

दुलहा गांधी जेवन बैठे
देजै में मांगें स्वराज
चरखवा चालू रहै !

लार्ड विलिंगटन दौरत आए
जीजा , गौने में दीबो स्वराज
चरखवा चालू रहै !

( 'चरखवा चालू रहै' गीत नरेशचंद्र चतुर्वेदी द्वारा संपादित पुस्तक 'आजादी के तराने' से संकलित किया गया है और गांधी जी का स्केच इन पंक्तियों के लेखक की बिटिया हिमानी ने अपने स्कूल के वाल मैगजीन के लिए बनाया था, मुझे अच्छा लगा सो उसका फोटोग्राफ़ यहां चिपका दिया )

Wednesday, October 1, 2008

अन्ना अख़्मातोवा की 'शाम'



सुबह मारीना स्वेतायेवा की कविता लगाने के बाद दिन भर रूस की एक और महान कवयित्री अन्ना अख़्मातोवा (२३ जून १८८९-५ मार्च १९६६) को पढ़ता रहा.

कोई पच्चीस साल पहले की बात है. घर में डाक से 'सोवियत लिटरेचर' आया करती थी. एक अंक में अन्ना अख़्मातोवा की 'शाम' कविता ने इस क़दर प्रभावित किया कि मैंने तुरन्त उसका अनुवाद कर डाला था. हालांकि कविता की समझ न तब थी न अब है, उस कविता में कुछ था जो समझ में न आते हुए भी समझ में आ रहा था.

आज मारीना स्वेतायेवा के बहाने अन्ना अख़्मातोवा की याद आई तो एक पुरानी डायरी को खोजने के के चक्कर सारा घर ज़मींदोज़ कर डाला. उसी में लिखा धरा था वह अनुवाद. मेरी अपनी याददाश्त में जाने-अनजाने किया गया वह पहला साहित्यिक अनुवाद था, सो ज़ाहिर है उसमें हज़ार खोट होंगे. मगर कुछ ऐसा नाता है इस से कि आपको पढ़वाने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा.

हो तो यह भी सकता है कि अगले दो-एक दिन लगातार आपको अन्ना की कुछेक और नायाब कविताएं पढ़वाऊं. अन्ना की विस्तृत जीवनकथा भी तभी.
.

शाम

शॉल के पीछे अपने हाथों को मज़बूती से जकड़ लेती हूं मैं
इतनी ज़र्द क्यों दिख रही हूं आज की शान
... शायद मैंने ज़्यादा ही पिला दी थी उसे
दुःख और हताशा की कड़वी शराब

कैसे भूल सकती हूं! - वह बाहर चला गया था,
दर्द की रेखा में खिंचे हुए थे उसके होंठ
पगलाई सी मैं दौड़ती चली गई थी
सीढ़ियां उतर कर उसके पीछे, सड़क तक

मैं चिल्लाई: "मैं तो मज़ाक कर रही थी, सच्ची!
मुझे ऐसे छोड़कर मत जाओ, मैं मर जाऊंगी" - और
एक भयानक, ठण्डी मुस्कान अपने चेहरे पर लाकर
उसने हिदायत दी मुझे: "बाहर हवा में मत खड़ी रहो!"

कवियों के ग्रहण का पूर्वानुमान नहीं लगा सकता कोई पंचांग



१८९२ में मास्को में जन्मी मारीना स्वेतायेवा के पिता पुश्किन संग्रहालय के निदेशक थे और माता विख्यात पियानोवादक. बहुत छुटपन से कविता में रुचि लेने वाली मारीना का पहला संग्रह १९१० में छपकर आया.

१९२२ में वे देश छोड़ कर क्रमशः जर्मनी और चेकोस्लोवाकिया में जा बसीं. सत्रह साल के ख़ुद के चुने निर्वासन के उपरान्त जब वे १९३९ में वापस रूस लौटीं, उनकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी - हताशा और बीमारी के बीच १९४१ में उन्होंने आत्महत्या कर ली. उनके कुल पांच कविता-संग्रह छपे.

बीसवीं सदी की विश्व कविता को रूस ने जो महाकवि दिए उनमें मारीना भी एक मानी जाती हैं. उनकी तुलना अक्सर रूस की ही एक अन्य महान कवयित्री अन्ना अख़्मातोवा से की जाती है. मारीना स्वेतायेवा की कविता 'कवि' प्रस्तुत है:


कवि

बहुत दूर की बात छेड़ता है कवि
बहुत दूर की बात खींच ले जाती है कवि को

ग्रहों, नक्षत्रों ... सैकड़ों मोड़ों से होती कहानियों की तरह
हां और ना के बीच
वह घंटाघर की ओर से हाथ हिलाता है
उखाड़ फेंकता है सब खूंटे और बन्धन ...

कि पुच्छलतारों का रास्ता होता है कवियों का रास्ता -
बहुत लम्बी कड़ी कारणत्व की -
यही है उसका सूत्र! ऊपर उठाओ माथा -
निराश होना होगा तुम्हें
कि कवियों के ग्रहण का पूर्वानुमान नहीं लगा सकता कोई पंचांग.

कवि वह होता है जो मिला देता है ताश के पत्ते
गड्डमड्ड कर देता है भार और गिनती
कवि वह होता है जो पूछता है स्कूली डेस्क से
जो काण्ट का भी खा डालता है दिमाग
जो बास्तील के ताबूत में भी
लहरा रहा होता है हरे पेड़ की तरह
जिसके हमेशा क्षीण पड़ जाते हैं पदचिन्ह
वह ऐसी गाड़ी है जो हमेशा आती है लेट

इसलिये कि पुच्छलतारों का रास्ता
होता है कवियों का रास्ता, जलता हुआ
न कि झुलसाता हुआ,
यह रास्ता टेढ़ा-मेढ़ा
पंचांग या जन्त्रियों के लिए बिल्कुल अज्ञात!