Wednesday, August 26, 2015

एक क़स्बे की कथाएँ - 4


हल्द्वानी के किस्से - 4

जल के असंख्य नाम होते हैं. मेरे एक परम सखा के भी ऐसे ही असंख्य नाम हैं. कोई तीसेक साल पहले एक दफा होली के मौसम में उन्होंने बाबा तम्बाकू के टीन के डिब्बे में छेद कर और उस छेद में से घासलेट में भीगी सुतली को गुजारकर पागल कुत्ते की आवाज़ निकालने वाली मशीन का आविष्कार किया था. इस मशीन की मदद से वे अपने घर के बाहर से गुजरने वाले हर आदमी, विशेषतः बूढ़ों के प्रति अपने सीजनल अनुराग का प्रदर्शन किया करते. अपनी पीठ पीछे अचानक आ धमके पागल कुत्ते की आवाज़ सुनकर बूढ़े धरती से कोई डेढ़ फुट हवा में उछल जाते थे. भाग्यवान बूढ़े धरती माता की शरण में पहुँच जाया करते और जो कम भाग्यवान होते उन्हें केवल अपने चेहरे पर आ गए खौफ़-ए-अज़ल भर से काम चलाना पड़ता था. इसमें मेरे मित्र का और मित्र के अनुसार बूढ़ों का खूब मनोरंजन होता था. उनका विचार था कि हमारे जीवन में और ख़ासतौर पर रिटायर्ड लोगों के जीवन में स्वस्थ मनोरंजन की बहुत कमी है. यही उनका स्थाई दर्द था और कुत्ता मशीन बनाने की प्रेरणा. इस महामना कर्म के एवज़ में उन्हें आसपास के मोहल्ले तक में सुतली नंगा और उनके शिष्यटोले में सुतली उस्ताद के नामों से संबोधित किये जाने का एज़ाज़ हासिल हो गया.

जब हमारे मोहल्ले में पान-बीड़ी की पहली दुकान खुली तो उसका उद्घाटन मेरे इन्हीं मित्र के हाथों हुआ. हाईस्कूल के इम्तहान में चौथी दफ़ा असफलता मिलने के बाद मेरे एक और सखा नब्बू डीयर, जिनकी जीवनगाथा मैं फिर कभी लिखूंगा, ने लगातार फेलियर कहे जाने के सुख का मोह त्यागकर इस दुकान को खोला था. दुकान सरकारी नर्सरी में आई आम की पेटियों से निकली फंटियों और सरकारी नर्सरी के ही साइनबोर्डों इत्यादि पदार्थों से बनाया गया – इस कार्य में लगने वाली मेहनत के लिए नर्सरी के चौकीदार को भागीदार बनाने का काम सुतली उस्ताद ने ही किया था क्योंकि चौकीदार की निगाह में सुतली ही मोहल्ले का इकलौता शिक्षित और सभ्य इंसान था जो बिना फीस लिए उसके इकलौते बच्चे को पढ़ाया करता था. यह अलग बात है कि उसका बच्चा सातवीं में दो साल से फेल हो रहा था. उद्घाटन कार्यक्रम सुतली उस्ताद से ही कराये जाने की शर्त पर ही चौकीदार ने दुकान-निर्माण में योगदान दिया था.

तो बिना छत कीनब्बू डीयर की दुकान के उदघाटन की रस्म के तौर पर जब सुतली ने फ़ोकट कैपिस्टन का पहला सुट्टा खींचा, उनके नाम के आगे सुट्टन की उपाधि लग ही जानी थी. अगले सात माह तक नब्बू डीयर सुतली को फिरी-फ़ोकट कराता रहा. शनैः शनैः सुतली ने स्वाध्याय से चरस पीने में पीएचडी हासिल कर ली और इस शोध में नब्बू डीयर को अपना रिसर्च असिस्टेंट बनाया. सुतली चरस के सेवन से पहले घर पर खाना भकोस कर आता था जबकि नब्बू डीयर के घर हर बखत फाके चला करते. अंततः जीवन से विरक्त होकर दुकान को एक रात आग के हवाले कर नब्बू डीयर संन्यासी बन गया अर्थात घर से भाग गया. कोई कहता वह गोपेश्वर चला गया है कोई कहता उसने मुरादाबाद में एक्सपोर्ट का काम शुरू कर दिया है. नब्बू की अम्मा अलबत्ता कुछ नहीं कहती थी, पुत्र के नाम का ज़िक्र चलते ही अपनी आँखों के कोरों पर अपनी मैली धोती चिपका लेती. नब्बू-पलायन प्रकरण के बाद चरस ठूंसने की समर ट्रेनिंग कर रहे नए छोकरों की निगाह में सुतली ईश्वर हुआ चाहते थे. नब्बू की जली हुई दुकान के खंडहरों पर बड़े बड़े पत्थरों की सुरक्षित आड़ में उन्होंने एक मंदिर का निर्माण किया जिसे सुट्टन चरस के आस्ताने के नाम से ख्याति मिली.

इस तरह अच्छे भले जमुनादत्त पुत्र गंगादत्त को पहले सुतली नंगा फिर सुतली उस्ताद और फिर सुट्टन चरस के नाम दे दिए गए. हमारे देश का इतिहास गवाह है महापुरुषों की सर्जना ऐसे ही होती रही है.

पढ़ाई और कामधाम के चक्कर में मेरा हल्द्वानी से सामान बंध तो गया लेकिन मन यहीं रमा रहा. चिठ्ठी-फोन इत्यादि से मालूम पड़ता था सुतली ने पहले चरस और उसके बाद लकड़ी की तस्करी में हाथ डाला. इस दूसरे काम ने उसे क्रमशः सुतली लठ्ठ, सुतली फर्री, सुतली जड़िया, सुतली धरमकाँटा, सुतली लेलेण्ड और सुतली जंगलात जैसे नामों से विभूषित किया. हल्द्वानी में निर्माण कार्य की धूम मचना शुरू हुई तो पूर्ववर्ती धंधों में अटैच्ड रिस्क से निजात पाने की नीयत से उसने रेता बजरी की खदानों में हाथ आज़माया. यहाँ अकूत धन था और सुतली के पास उसे कमाने की कूव्वत. एक बड़ा सा प्लाट खरीदकर सुतली गौला नदी के उस पार जा बसा और दुनिया उसे सुतली गारा कहने लगी. सुतली गारा से वापस श्री जमनादत्त पुत्र स्व. श्री गंगादत्त बनने में सुतली ने सबसे मुफीद हिन्दुस्तानी दांव खेला. ज़मीन का धंधा और जनसेवा. यह दांव भी सदा की तरह निशाने पर लगा और नियतिचक्र ने सुतली को पहले अमीर आदमी फिर ग्राम प्रधान और बाद में ब्लॉक सदस्य बनवा दिया. सुतली नाम से उसे लोग अब सामने से नहीं बुलाते थे. उसमें सुतली के क्रोधित हो जाने का भय था और सुतली अब वह पुराना आविष्कारक भर नहीं रहा था जो घासलेट में सुतली डुबोकर तम्बाकू के खाली डिब्बे से पागल कुत्ते की आवाज़ निकालता था. सुतली को नागरों और ज़माने ने हल्द्वानी के सबसे संपन्न और आदरणीय लोगों में प्रतिष्ठित कर दिया था.

मेरा सुतली से सीधा संपर्क लम्बे समय तक कटा रहा था और हमारे बीच जैसा कि मुहावरे में कहा जाता है पुल के नीचे से भतेरा पानी बह चुका था. तो कहने का मतलब यह है कि जब मैंने हल्द्वानी लौटने का फैसला किया तो इससे यह साबित नहीं होता था कि सुतली इतने सालों से मेरी बाट जोह रहा था. वह मेरी स्मृति के उन गुप्त तहखानों में जा बसा था जहां खुद मैं भी बहुत मेहनत कर के ही पहुँच सकता था. इसके अलावा यह भी बात थी कि वह मेरी किसी भी तात्कालिक आवश्यकता का हिस्सा भी नहीं था. हमारे रास्ते अलग हो चुके थे.

कोई दो साल पहले घर पर घंटी बजी तो सुतली को आया देख मुझे हैरानी और खुशी दोनों का मिलाजुला अनुभव हुआ. मैं उसे तकरीबन पच्चीस सालों बाद सशरीर देख रहा था. हाल ही में स्थानीय अखबार में उसकी एकाधिक बार फ़ोटो मुझे दिखी थी लेकिन वह इतना बदल गया होगा मुझे उम्मीद न थी. उसने उम्दा काट के कपड़े पहने हुए थे, तनिक मुटा गया था और पहली निगाह में सम्मानीय समझे जाने लायक लग रहा था. हम गले मिले उसने माँ की खबर पूछी, तीन साल पहले गुज़र गए पिताजी की फ़ोटो को स्पर्श कर प्रणाम किया. हमने बहुत देर तक अपने मोहल्ले के नब्बूडीयर युग को याद किया और भरसक नोस्टाल्जिक होते रहे. हमने दिन का खाना भी साथ खाया. वह लौटने के मूड में नहीं लगता था. धीरे धीरे मेरे बिस्तर पर लुढ़क गया और बाकायदा दो घंटे सोता रहा.

शाम हो गयी थी. वह उठकर दो कप चाय सूत चुका था और अब बोतल खोलने का प्लान बना रहा था. मुझे लगा उसके बच्चे बाहर गए होंगे और उसने समय काटने की नीयत से मेरे घर का रुख किया होगा. वरना उसका मुझसे क्या काम. मैं अनमना सा उसके साथ बाहर जाने को तैयार होने लगा तो वह “अभी आया पंडित” कहकर बाहर चला गया.

“यार आज बच्चों ने ये दिला दिया है” कहते हुए उसने अचानक कमरे में एंट्री ली और अपने साथ गाड़ी से निकाल कर लाये झोले के भीतर से चमचमाता लैपटॉप निकालते हुए कहा. मुझे गश आते-आते बचा.

“कैसा है?” उसके चेहरे पर किसी महंगी चीज़ पर पैसे खर्च कर देने का कोई भी भाव नहीं था.

“अच्छा बुरा तो छोड़ सुतली लेकिन ये बता यार तू इसका करेगा क्या. वो भी इस उमर में.”

“अरे यार पंडित, पढ़ाई के लिए बेटा दिल्ली भेज रखा है पिछले महीने से. वाइफ भी उसी के पास है. फोन करता हूँ तो बेटा कहता है पापा फेसबुक किया करो फेसबुक किया करो. वाइफ कहती है मैं कर लेती हूँ तो तुमसे कैसे नहीं होता फेसबुक. अब हमने बखत में कोई पढ़ाई कर रखी होती तो करते ना साले फेसबुक ... बाबू ने शादी भी साली एम ए पास से करा दी हुई यार पंडित. क्या लाटापंथी है साली ...”

चेहरे पर गोपनीयता का भाव लाते हुए वह फुसफुसाया “मुझे कम्प्यूटर सिखा दे यार पंडित. मना मती करियो भाई.”

यह मेरे लिए बहुत ज़्यादा बड़ी डोज़ हो गयी थी सो रात की हत्या करने के लिए पूरी बोतल निबटाने से बेहतर कोई रास्ता था भी नहीं.

अगले दिन से मैं सुतली के इस नवीनतम साइबरावातार के चक्करों में लिपझ गया. पहले तो उसे ढंग से माउस पकड़वाना सिखाने में दिन भर की ऐसी-तैसी हुई फिर वह सीधे पोर्नोग्राफी डाउनलोड करने के तरीके सीखने पर आ गया. मेरे झिड़कने पर उसने पोर्नोग्राफी का आइडिया पोस्टपोन कर दिया और ताश के पत्तों वाले खेल में दूसरे ही दिन महारत हासिल कर ली. वह सुबह दस बजे मेरे दरवाज़े पर होता और गलत नहीं कहूँगा उसकी यह कर्मठताभरी जिद मुझे अच्छी लगने लगी थी. मैंने अपने भीतर के अध्यापक को झकझोर कर जगाया और जी जान से सुतली को बिल गेट्स बनाने में जुट गया. दिन भर तल्लीन होकर कम्प्यूटर पर हाथ साफ़ करने में सन्नद्ध सुतली को देखते मुझे लगने लगा था जैसे इतने सालों में उसके बारे में सुनी गयी सारी बातों में कोई सच्चाई नहीं थी. उसके फोन भी बहुत कम आते थे. जो आते भी थे उन्हें वह घर के बाहर जाकर अटैंड करता था और वापस आकर पहले से अधिक उत्साह से इस नवीं ज्ञान की बारीकियां समझने की कोशिश करता.

चौथे दिन जब वह ठीकठाक ऑपरेट करने लगा तो मैंने उसे फेसबुक दिखा कर उसका अकाउंट बनवा दिया.

पांचवे दिन मुझे बाहर जाना था. सुतली चौबीस घंटों में एक्सपर्ट फेसबुकिया बन चुका था और उसके फ्रेंड्स में उसके बीवी बच्चों के अलावा मेरी भी एंट्री हो चुकी थी. वह तीसेक लोगों की लिस्ट में शुमार था.

मेरे लौटने में कोई तीन सप्ताह लगे. दो एक बार सुतली का फोन आया. लेकिन औपचारिकता वाला ही. मैं पूछता “फेसबुक कैसा चल रहा है सुतली गुरु?” तो वह मुदित होकर कहता “चीज तो अच्छी बनाई यार अमरीकावालों ने. कल बेटे ने वाइफ के साथ पिक्चर देखी तो उसकी फ़ोटो देखने को मिल गयी. सही चीज़ है पंडित यार.”

एक दिन उसने अपनी सेल्फी अपलोड की. दो घंटे बाद दूसरी. अगले दिन पूरा अल्बम था दो साल पुरानी गोवा यात्रा का. प्रदेश के मुख्यमंत्री के साथ उसकी एक फ़ोटो पर पैंतालीस लाइक्स आये. एमएपास बीवी की स्कर्ट वाली फ़ोटो लगाई तो उस पर दो सौ से ऊपर. फ़ोटो उसने हटा दिया. फ्रेंड लिस्ट में उसे जाननेवाले अब पांच सौ हुआ चाहते थे.

फिर मैं लौट आया. सुतली अगले छः माह तक नज़र नहीं आया. अखबारों में उसकी नियमित फ़ोटो लगती. एक दफा उसने नगरपालिका लाइब्रेरी की बदहाली को लेकर इंटरव्यू दिया था तो एक दफा उसे पुलिस ने शांतिभंग की आशंका में हिरासत में ले लिया था.

फेसबुक पर उसकी अपडेट्स बेहद बेसिक और भोली होती थीं. उनकी संख्या अलबत्ता अब कम होती जा रही थी.

“यार पंडित फेसबुक पे लोगों को टैग कैसे करते हैं?” छः महीने के अंतराल पर उसका फोन आधी रात के बाद आया. वह बेतरह हंस रहा था और पार्श्व की गूंजें बता रही थीं कि वह अपनी मंडली के साथ पार्टी कर रहा है.

एक माह बाद मैंने अखबार में उसकी फ़ोटो देखी. जेल में था सुतली. एसडीम को धमकाने के आरोप में.

फिर सुतली बाहर था. सुतली पर मुकदमा चल रहा था. सुतली का बेटा नशेड़ी हो गया था पूना में उसका इलाज चल रहा था. सुतली ने हमारे मोहल्ले में स्कूल की बिल्डिंग खरीद ली थी और वह उसे बैंकेट हॉल में बदलने ला रहा था.

सुतली एक दिन मिल ही गया. एक शादी थी. वह अपने असल चरित्र में था. काला चश्मा, कमर में पिस्तौल वाली चमड़े की पेटी, ००७ नंबर की लम्बी गाड़ी और चमचों की बरात.

“अरे पंडित गुरु, क्या हाल!” उसने उत्साहपूर्वक मुझे गले लगाया.

“बस ठीक है यार सुतली. तू बता कैसा चल रहा है तेरा फेसबुक.”

“अरे छोड़ यार, तू बता माँ कैसी हैं आजकल? मैं जल्दी आ रहा हूँ रस-भात खाने. उनके हाथ का स्वाद उस दिन से भूला कौन साला है यार पंडित.”

हमें तू-तड़ाक करता देख उसके चमचों के चेहरों पर मेरे लिए थोड़ी सी एक्स्टेम्पोर इज्ज़त भभक आई.

उसकी गाड़ी के भीतर हम अपना दूसरा पैग खींच रहे थे जब वह अचानक बोला “साली फेसबुक ने जीना हराम कर दिया यार. आधी आधी रात पैन्चो फोन में टुणुन्ग टुणुन्ग. सुबह हगने जाओ तो साली फोन में टुणुन्ग टुणुन्ग. इसका फ़ोटो देखो उसकी फ़ोटो देखो. बीजेपी वाले की लाइक करो तो साले कांग्रेसी नाराज़. कांग्रेसी की लाइक करो बीजेपी वालों की पिछाड़ी में चरस. बेटे ने अलग अपनी साली फ़ोटो लगा लगा के दिक कर रखा था. साले हाथ भर के हुए नहीं गर्लफ्रेंड के साथ बीयर सूत रहे हैं बाप के पैसों से. हमें गधा समझा है साला. फेसबुक पे सब दिख जाता है. बड़ी दिक्कत है यार पंडित. चल खींच ना! एक और ठोकते हैं.”

माह भर बाद उसका फिर से फोन आया “पंडित यार फेसबुक बंद कैसे करते हैं.”

“अबे हुआ क्या सुतली बाबू?”

“कुछ नहीं यार. बड़ी कुत्ती चीज़ है साली. इतना टाइम बर्बाद होता है दिनमान भर. पिछली दीवाली के टाइम पे दारू पी के साला वो वाइफ के फादर को फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज दी एक दिन. उसका अकाउंट भी वाइफ ने ही बनाया था. वाइफ भी वहीं थी उन दिनों देहरादून. बुड्ढा निकला रंगीला सायर. रोज़ सुबह से आधी रात तक हर दस मिन्ट में पैन्चो एक सायरी. लाइक करो तो आफ़त. न करो तो आफ़त. वाइफ अलग नाराज़. आपने पापा की सायरी लाइक नहीं की. अबे खच्चर हैं साले यार हम कोई. फोन में साली हर बखत टुणुन्ग टुणुन्ग. आज बुड्ढे ने परिवार की फ़ोटो लगाई हैं. मेरी भी है एक. जेल से बाहर निकलते हमारे जामाता – ये लिख के टैग किया है साले ने.”

इस वाकये को साल बीतने आया. कहाँ हो सुतली उस्ताद? 

Monday, August 3, 2015

ऐ री धन-धन भाग मोरे - पंडित वेंकटेश कुमार

हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में पंडित वेंकटेश कुमार का नाम उतना “विख्यात” नहीं है लेकिन आपको उनके बारे में जानना ही चाहिए. उनके गायन के बारे में इन्डियन एक्सप्रेस ने कुछ समय पहले एक लेख छापा था जिसका अनुवाद यहाँ आपके लिए पेश किया जा रहा है-


कुछ बरस पहले कलकत्ता में एक संगीत सभा में, जहाँ पंडित वेंकटेश कुमार का नाम किसी ने भी नहीं सुन रखा था, यह संकोची गायक बमुश्किल श्रोताओं की तरफ निगाह डाल रहा था और उस राग को अनाउंस करने में भी उसे संकोच हो रहा था जिसे वह गाने वाला था. दो-एक मिनट के भीतर ही उसने राग पूरिया के अपने गांधार और निषाद से श्रोतामंडली को बाँध लिया. विलम्बित का आधा होते होते करीब 2000 के आसपास मौजूद श्रोता जानते थे कि वे एक दुर्लभ कलाकार से रू- ब-रू थे. स्पष्टतः पंडित वेंकटेश कुमार एक ऐसे संगीतकार थे जिन्हें उन्होंने सुन चुका होना था, लेकिन सुना नहीं था. हॉल में श्रोताओं के बीच बांटे गए संगीतकारों का जीवनपरिचय देने वाले ब्रोशर्स को उलटने की परिचित कागज़ी आवाज़ आने लगी थी.

उसमें श्रोताओं को एक पैराग्राफ़ का नोट हासिल हुआ. हासिल किये गए इनामात और विदेशी दौरों की सूची गायब थी जो इस बात का सबूत थी कि कलाकार अभी विख्यात नहीं है. इकलौता परिचित शब्द था – धारवाड़ – उत्तरी कर्नाटक का वह इलाका जहां पंडित जी का घर है. धारवाड़ ने भारतीय शास्त्रीय संगीत को गायन की अनेक हस्तियाँ दी हैं जिनमें पंडित भीमसेन जोशी भी सम्मिलित हैं.  

जैसे-जैसे गायन बढ़ता गया, उनकी गायकी में से भीमसेन जोशी की स्मृतियों ने उभरना शुरू किया – ख़ास तौर पर वह पौरुष से भरा खारापन और पुकार की स्पष्टता – और संगीत संध्या के समाप्त होते न होते कलकत्ता वाले कला को लेकर अपनी अति-संवेदनशीलता के चलते तकरीबन पगला चुके थे. इस कलाकार को पहली बार सुनने वाले हर किसी के मन में यही संशय चल रहा था – पचास पार का एक आदमी है जो उतना ही अच्छा गा रहा है जितना स्थापित उस्ताद गाया करते हैं लेकिन उसे कोई जानता तक नहीं. उसकी चर्चा तब क्यों नहीं हुई जब वह उभर रहा था?

कुमारजी हमेशा धारवाड़ में ही रहे हैं. उनका जन्म लक्ष्मीपुरा में हुआ और 12 की आयु में उन्होंने मिथकीय ख्याति रखनेवाले संत और बहुमुखी प्रतिभा से सम्पन्न हिन्दुस्तानी संगीतकार पुत्तुराजा गवई द्वारा संचालित वीरेश्वर पुन्याश्रम में दाखिला लिया. कुमारजी ने अपने मामा की राय पर यहाँ दाखिला लिया था. मामाजी स्वयं कन्नड़ थियेटर आर्टिस्ट थे. कुमार जी के पिता एक लोकगायक थे और अपने बेटे के लिए हिन्दुस्तानी वोकल की औपचारिक तालीम का ख़र्च उठा सकने की स्थिति में नहीं थे. आश्रम में जाकर यह तालीम संभव हुई जहां उन्होंने गवई महाराज से 11 साल तक सीखा. अंततः उन्होंने अध्यापन शुरू कर दिया जो वे आज तक कर रहे है – धारवाड़ के यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ़ म्यूजिक में.

(अरुणाभ देब की लिखी और 18 अगस्त 2012 को इन्डियन एक्सप्रेस में छपी रिपोर्ट पर आधारित)

प्रस्तुत है पंडित वेंकटेश कुमार का गाया राग दुर्गा. अलौकिक प्रस्तुति है यह. इस लिंक तक पहुंचाने के लिए अन्यतम मित्र आशुतोष उपाध्याय का शुक्रिया -

उन इलाकों की हिफाज़त में ख़र्च हुए हम - "ठुल्ले" की कविता

फ़ोटो http://news.xinhuanet.com/ से साभार

वे साधारण सिपाही जो कानून और व्यवस्था में काम आए

-संजय चतुर्वेदी

शायद कुछ सपनों के लिए
शायद कुछ मूल्यों के लिए
कुछ- कुछ देश
कुछ- कुछ संसार
लेकिन ज़्यादातर अपने अभागे परिवारों के भरणपोषण के लिए
हमने दूर-दराज़ रात-बिरात
बिना किसी व्यक्तिगत प्रयोजन के
अनजानी जगहों पर अपनी जानें लगाई
जानें गंवाई

हम कानून और व्यवस्था की रक्षा में काम आए
लेकिन हमारे बलिदान को आंकना
और उस बलिदान के सारे पहलुओं को समझना
एक आस्थाहीन और अराजक कर देने वाला अनुभव रहेगा

जो अपने कारनामों के दम पर
इस मुल्क की सड़कों पर चलने का हक़ भी खो चुके थे
हमें उनकी सुरक्षा में अपनी तमाम नींदें
और तमाम ज़िन्दगी ख़राब करनी पड़ी
उन्माद और साम्प्रदायिकता का ज़हर और कहर
सबसे पहले और सबसे लम्बे समय तक हम पर गिरा
हम उन इलाकों की हिफाज़त में ख़र्च हुए
जहां हमारे बच्चों का भविष्य चुराकर
काला धन इकठ्ठा करने वालों के बदआमोज़ लड़के-लड़कियां
शिकार करें और हनीमून मनाएं
या उन विवादास्पद संस्थाओं की सुरक्षा में
जहां अन्तर्राष्ट्रीय सरमाए के कलादलाल
हमारी कीमत पर अपनी कमाऊ क्रांतियां सिद्ध करें

हमें बंधक बनाया गया
या शायद हम जब तक जिये बंधक बनकर ही जिये
लेकिन हमारे सगे-संबंधी इतने साधन सम्पन्न नहीं थे
कि राजधानी में दबाव डाल सकते
और उन्होंने हमारे बदले किसी को रिहा कर देने के लिए
छातियां नहीं पीटीं
हम यातना सहते हुए ही मरे
लेकिन हमारे बीवी-बच्चे जो आज भी बदहाल हैं
हवाई जहाज़ पर उड़ने वाले नहीं थे
इसलिए न उन्हें पचास हज़ार डालर मिले
न फ़ोर्ड फ़ाउन्डेशन के मौसेरे पुरस्कार

और यह हम तमाम गीतों और प्रार्थनाओं के बीच कह रहे हैं
कि हमारे अपने अफसरों नें
जिन्हें ख़ुद एक सिपाही होना था
हमें अपने घर झाड़ुओं की तरह इस्तेमाल किया
और यह भी हम तमाम गीतों और प्रार्थनाओं के बीच कह रहे हैं
कि कोई उल्लू का पट्ठा इतना अच्छा होगा
जो अपनी आंखों
और अपने दिमाग़ के सारे सितारों के साथ हमें बताए
कि अपने बीवी-बच्चों के साथ
जिस तरह की ज़िन्दगी जिए हम
वह क्या किसी देशी-विदेशी महापरिषद में
कभी कोई महत्वपूर्ण एजेंडा रही? 

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नोट: जनसत्ता में वर्ष 2000 में छपी संजय जी की इस कविता को पढ़ते हुए देश के एक नव-महामना की ज़बान की एक यह बानगी भी देखी ही जानी चाहिए - 

Friday, July 24, 2015

पांच सौ अक्षरों में कैद बहस

‘द हिन्दू’ में 21 अक्टूबर को प्रकाशित लेख का अनुवाद: आशुतोष उपाध्याय

फ़ोटो: इन्डियन एक्सप्रेस से साभार

पांच सौ अक्षरों में कैद बहस

रोहित धनकर

नई शिक्षा नीति के निर्माण में आम जन की भागीदारी स्वागतयोग्य है, मगर ट्विटर मार्का बहस सुसंगत निष्कर्षों तक नहीं पहुंचा सकती.

अप्रैल के महीने में मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी ने नई शिक्षा नीति के निर्माण के लिए आम जनता को आमंत्रित करने के फैसले की जानकारी दी. उन्होंने बताया कि सरकार ने mygov वेबसाइट के जरिये "पहली बार आम नागरिक को नीतिनिर्माण के काम में हिस्सेदार बनाने का प्रयास किया है, जो अब तक चंद लोगों तक सीमित था." सरकार के इस कदम की सराहना की जानी चाहिए क्योंकि एक लोकतंत्र के भीतर नीतिनिर्माण में लोगों की ज्यादा से ज्यादा हिस्सेदारी से ही बेहतर नीतियां बनती हैं. कम से कम सिद्धांत रूप में यह बात सही है.
      लेकिन वेबसाइट मेंलोगों की टिप्पणियों को 500 अक्षरों और चंद पूर्वनिर्धारित मुद्दोंतक सीमित कर दिया गया है. इस तरह आंशिक रूप से सेंसर की गयी रायशुमारी से ज्यादा से ज्यादा विखंडित और विरोधाभासी सुझाव ही जनता की ओर से मिल पाएंगे. हालांकि विरोधाभासी दृष्टिकोण स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान हैं, फिर भी उन्हें तर्कपूर्ण व व्यवस्थित किए जाने की जरूरत पड़ती है. दूसरे शब्दों में- अगर उन्हें शिक्षा पर एक व्यापक आधार वाले संवाद के उद्देश्य से एकत्र किया जा रहा है तो उन्हें सुविचारित तर्कके रूप में प्रकट करना होगा.
      दूसरे, महत्वपूर्ण दलीलें 500 अक्षरों के अतिसूक्ष्म दायरे में व्यक्त नहीं की जा सकतीं. 500 शब्दों की सीमा के बारे में कहा जा सकता है कि वेबसाइट पर फाइल अपलोड करने की भी छूट है, पर इस तरह अपलोड की गई फाइलें बहस का हिस्सा नहीं बन पातीं. इस तथ्य को वेबसाइट में मौजूद टिप्पणियों को देखकर भी समझा जा सकता है. इसलिए, यह निष्कर्ष निकालना गलत नहीं होगा कि जनता के विचारों को जानने का यह तरीका स्वयं विचारों के विखंडन का पक्षपोषण करता है.

विखंडित विवेक का दौर
मगर यह विखंडित विवेक का दौर है. समाज को इस मान्यता की ओर धकेला जा रहा है कि चिंतन का मतलब विचारों को टुकड़ों में यहां-वहां उछालना भर होता है. वैसे ही जैसे लोग ट्विटर में विचारों को उछालते रहते हैं. विचारों के ये टुकड़े दरअसल किसी खास सन्दर्भ में ही अर्थपूर्ण होते हैं. इस किस्म के विखंडित विचारों से निर्मित संवाद केवल अधपके तर्कों को ही तैयार करता है. वर्तमान सरकार द्वारा कराए जा रहे नीति सम्बन्धी विचार-विमर्श, चाहे इनकी पद्धति की वजह से कहें या फिर समझ की कमी के कारण,महज विचारों के विखंडित और अस्पष्ट बादलों के सामान हैं. यह ट्विटर युग का विवेक है.
      हमारी संस्कृति और राज-व्यवस्था की एक सामान्य प्रासंगिक पृष्ठभूमि कहीं नज़र नहीं आती. यह मान लेगा गलत होगा कि हम अपनी सांस्कृतिक, सामजिक, राजनीतिक और आर्थिक ज़रूरतों को एक सा ही समझते/देखते हैं. ट्वीट करने की थोड़ी-बहुत सार्थकता हो सकती है लेकिन कुल मिलाकर यह एक आधी-अधूरी राय ही है. इससे विचारों के आदान-प्रदान का भ्रम पैदा होता है मगर विचार करने वाले के वास्तविक तर्क और इरादे छुपे रह जाते हैं. शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर एक सुसंगत तर्क और व्यापक सहमति बनाने के लिए सन्दर्भ बताना बेहद ज़रूरी है.
      ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के अनुसार नीति (पॉलिसी) एक तरह की दिशा या कार्य को निदेशित करने का सिद्धांत है जिसे किसी संगठन या व्यक्ति ने अपनाया अथवा प्रस्तावित किया हो. इसे विशिष्ट गतिविधियों या क्रियाओं को पैदा करने के लिए उपयोग में लाया जाता है. इसे किन्हीं खास सुझाओं और सिफारिशों की स्वीकार्यता को जांचने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.
      मानव संसाधन मंत्रालय इसके द्वारा नियोजित सिलसिलेवार बहस-मुबाहिसे से शिक्षानीति की ऐसी ही रूपरेखा की उम्मीद कर रहा है. mygov वेबसाइट के मुताबिक मंत्रालय ने वेबसाइट पर जो समूह बनाया है उसका उद्देश्य "समावेशी, सहभागितापूर्ण और समग्र दृष्टिकोण से देश के लिए एक नई शिक्षा नीति तैयार करना है." वेबसाइट पर 'संवाद' आयोजित करने के अलावा मंत्रालय की एक "पूर्व परिभाषित सर्वेक्षण प्रश्नावली" के माध्यम से राष्ट्रव्यापी परामर्श एकत्र करने की भी योजना है. इसके लिए भी एक समूह का गठन हो चुका है, एक सरकारी अधिकारी की अध्यक्षता में, हालांकि यह अब तक रहस्यों में घिरा है- जिस जनता से नई नीति पर अपनी राय बताने की अपेक्षा की जा रही है, उसे भी इसके सदस्यों के बारे में कोई जानकारी नहीं है.

दोषपूर्ण पद्धति
इस प्रकार शिक्षा नीति तैयार करने की पद्धति में कम से कम दो गंभीर समस्याएं हैं. पहली, ट्विटर मार्का विचारों की सही-सही व्याख्या की दरकार होती है. लेकिन यह व्याख्या उसी रहस्यमय समूह के हवाले कर दी गई है, जो एक सरकारी अधिकारी की अध्यक्षता में बनाया गया है. व्याख्या के लिए एक सामान्य वैचारिक रूपरेखा की जरूरत पड़ती है, जिसके बारे में चुप्पी साध ली गयी है या उसे सार्वजनिक नहीं किया गया है. इसलिए व्यक्त किए गए विचार पहले से तयशुदा नीतियों को पुष्ट करने के इरादे से तोड़े-मरोड़े जा सकते हैं. इसका मतलब यह हुआ कि एक छोटे से पसंदीदा समूह के पूर्व-निर्धारित निर्णयों को एक अप्रभावी जन-संवाद के जरिये सही ठहराया जा सकता है.
      दूसरी, सर्वानुमति बनाने के किसी आधारभूत निर्देशक सिद्धांतों के अभाव में इस कवायद का वही नतीजा निकलेगा जिसे शिक्षा के जाने-माने दार्शनिक जॉन व्हाइल "एचसीएफ समस्या" कहते हैं. समूची कवायद से ऐसे अस्पष्ट और अपुष्ट सुझावों का ढेर लग जाएगा, जिनके बीच सामाजिक न्याय और समता के मुद्दे गायब होंगे- क्योंकि इस तरह भिड़ाए गए इन मुद्दों पर कोई आसान सी सहमति उपलब्ध नहीं है. और इस तरह समाज की वास्तविक चिंताएं या तो महत्वहीन हो जाएंगी या सिरे से नदारद होंगी.
      इस विचार-विमर्श के प्रयोजन और उद्देश्य को समझने के लिहाज से प्राथमिक शिक्षा के लिए चुने गए 13 प्रकरणों का पाठ बड़ा दिलचस्प है. प्रत्येक प्रकरण का करीब 200 शब्दों में परिचय दिया गया है और साथ में विमर्श के लिए सवालों की एक सूची है. ज्यादातर सवाल इसके संचालन की बारीकियों से जुड़े हैं. नीति से इनका कोई खास संबंध नहीं है.
      उदाहरण के लिए, एक सवाल में यह पूछा गया है कि टेक्नोलॉजी का शिक्षकों की वास्तविक मौजूदगी को सुनिश्चित करने के लिए कैसे इस्तेमाल किया जा सकता है. सवाल के गठन से ही स्पष्ट हो जाता है कि मुद्दा यह नहीं कि टेक्नोलॉजी इस्तेमाल करनी चाहिए या नहीं, बल्कि यह है कि कैसे इसे इस्तेमाल करना चाहिए. अगर सवाल 'क्या' से शुरू होता तो यह शिक्षक की विश्वसनीयता, स्वायत्तता, जिम्मेदारी व सम्मान जैसे सभी महत्वपूर्ण मुद्दे उठाता. लेकिन 'कैसे' जोड़ देने से यह पहलेही तय हो गया कि शिक्षकों की कड़ाई से निगरानी करनी चाहिए और उन्हें दंड का भय दिखाना चाहिए. इसलिए 'क्या टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करना चाहिए' जैसा सवाल एक नीति से जुड़ा सवाल बन जाता है, क्योंकि यह सामान्य सिद्धांतों के गिर्द घूमता है, जबकि 'कैसे' जुड़ने वाली चर्चा एक तकनीकी सवाल है जिसका नीति से कोई खास ताल्लुक नहीं बल्कि यह कार्यान्वयन का मसला है.वेबसाइट में ज्यादातर प्रश्न इसी मिजाज़ के हैं.
      यहां ध्यान देने लायक बात यह है कि प्रकरणों के परिचय में ही कई पूर्व निर्धारित नीतियां छुपी हुई हैं. उदाहरण के लिए, स्कूल स्तर पर परीक्षा सुधार वाला प्रकरण कहता है कि "परीक्षा सुधार शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को बदल देगा और अधिगम परिणामों में सुधार लाएगा." यह विचार के लिए एक महत्वपूर्ण मुद्दा हो सकता था कि क्या 'परीक्षा-उन्मुख सुधार' सफल हो सकते हैं, अथवा वे 'परीक्षा के लिए पढ़ाई' को प्रोत्साहन देंगे और इस तरह समालोचनात्मक तार्किकता के लिए दी जाने वाली शिक्षा का ही बंटाधार कर डालेंगे. परीक्षा का डर क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी समस्याओं में एक नहीं है? लेकिन यहां, परीक्षा-उन्मुख सुधार को आस्था के एक तत्व की तरह स्वीकार कर लिया गया है.
      मैं शिक्षा नीति पर सार्वजनिक बहस की मुखालिफत नहीं कर रहा हूं. न ही मैं शिक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा किए जाने के विरोध में हूं. एक लोकतांत्रिक देश में शिक्षा नीति पर फैसले लेने के लिए ये दोनों सामान रूप से आवश्यक हैं. दिक्कत सिर्फ इतनी है कि तयशुदा सवालों और पूर्व-निर्धारित प्रकरणों से गहरे और निष्पक्ष वाद-विवाद की संभावना सीमित हो जाती है.
      आज भारतीय शिक्षा तीन दिशाओं से खिंचाव महसूस कर रही है. पहली दिशा, शिक्षा को आर्थिक वृद्धि की जरूरतों के अनुरूप ढालने की वकालत की है. इसमें व्यावहारिक कौशल-निर्माण और पर्याप्त कार्यशक्ति तैयार करने पर जोर दिया जाता है. दूसरी दिशा शिक्षा को लोकतंत्र और सामाजिक न्याय को हासिल करने की ओर ले जाने की है. इसमें समाज, राजनीति, अर्थतंत्र की आलोचनात्मक समझ बनाने तथा ज्यादा समतामूलक व सामंजस्यपूर्ण समाज के लिए मूल्यों का ढांचा गढ़ने पर जोर दिया जाता है. तीसरी दिशा, जो दिन पर दिन मजबूत होती जा रही है, शिक्षा को भारतीय संस्कृति एवं इतिहास के एक खास नजरिये से जोड़ने का दबाव बनाती है. इसका जोर पाठ्यक्रम में हिन्दू नायकों, ग्रंथों और आचरण के लिए ज्यादा से ज्यादा जगह बनाने पर है. तीनों तरह के खिंचाव समाज और राज्य-व्यवस्था की जरूरतों के अलग-अलग दृष्टिकोणों को रेखांकित करते हैं. उदाहरण के लिए, पहला आर्थिक खिंचाव जहां बिकाऊ कौशलों पर जोर देता है, वहीं राजनीतिक आलोचना और सामाजिक न्याय के मुद्दों की उपेक्षा करता है. इसका परिणाम एक कार्यक्षम किन्तु दब्बू कार्यशक्ति और उपभोक्तावाद के विस्तार के रूप में प्रकट होगा. दूसरी ओर, एकमात्र सामाजिक न्याय के लिए शिक्षा को समर्पित कर देने का परिणाम वही होगा जिसे कोठारी आयोग की रिपोर्ट "बेरोजगार स्नातकों की फ़ौज” कहती है. जो सामाजिक न्याय हासिल करने में भी नाकामयाब होगी. और भारतीय संस्कृति व इतिहास की इकतरफा समझ पर जोर देने का परिणाम समाज में विभाजन और कडुआहट के बीजारोपण के रूप में प्रकट होगा. जो आर्थिक प्रगति के साथ-साथ लोकतंत्र तथा सामाजिक न्याय को भी नष्ट कर डालेगा.
      सरकार का ट्विटर मार्का बहस-मुबाहिसे पर जोर यह बताता है कि वह किसी दीर्धकालिक संवाद के पक्ष में नहीं है. पूर्व परिभाषित बिंदुओं और तयशुदा सवालों के जरिए संकीर्ण दायरे में सार्वजानिक बहस को खोलने की रणनीति वास्तविक नीतिगत मुद्दों पर बहस को पहले ही रोक देती है. इस तरह निर्णय कुछ चुनिन्दा हाथों तक सिमट जाते हैं. खुली लोकतांत्रिक बहस का भ्रम पैदा किया गया है लेकिन असल में जनता का दिमाग छोटे-छोटे मामूली विवरणों में उलझाया जा रहा है.
(रोहित धनकर अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी, बंगलुरु में अकादमिक विकास विभाग के प्रोफ़ेसर व निदेशक हैं.

साथ ही वह दिगंतर, जयपुर के अकादमिक सलाहकार भी हैं.)

Wednesday, July 8, 2015

रोटी लेने वालों ने क़तार ईजाद की और मिलकर गाना सीखा

अफ़ज़ाल अहमद सैयद की यह कविता ख़ास तौर पर मित्र आशुतोष बरनवाल ने लिए लगाई जा रही है -



शायरी मैंने ईजाद की

काग़ज़ मराकशियों ने ईजाद किया
हुरूफ़ फ़ोनेशियनों ने
शायरी मैंने ईजाद की

कब्र खोदने वालों ने तन्दूर ईजाद किया
तन्दूर पर कब्ज़ा करने वालों ने रोटी की परची बनाई
रोटी लेने वालों ने क़तार ईजाद की
और मिलकर गाना सीखा

रोटी की क़तार में जब चींटियां भी आकर खड़ी हो गईं
तो फ़ाक़ा ईजाद हुआ

शहवत बेचने वाले ने रेशम का कीड़ा ईजाद किया
शायरी ने रेशम से लड़कियों के लिये लिबास बनाए
रेशम में मलबूस लड़कियों के लिए कुटनियों ने महलसरा ईजाद की
जहां जाकर उन्होंने रेशम के कीड़े का पता बता दिया

फ़ासले ने घोड़े के चार पांव ईजाद किए
तेज़ रफ़्तारी ने रथ बनाया
और जब शिकस्त ईजाद हुई
तो मुझे तेज़ रफ़्तार रथ के नीचे लिटा दिया गया
मगर उस वक़्त तक शायरी मुहब्बत की ईजाद कर चुकी थी

मुहब्बत ने दिल ईजाद किया
दिल ने खे़मा और कश्तियां बनाईं
और दूर दराज़ के मुक़ामात तय किए
ख़्वाज़ासरा ने मछली का कांटा ईजाद किया
और सोए हुए दिल में चुभो कर भाग गया

दिल में चुभे हुए कांटे की डोर थामने के लिए
नीलामी ईजाद हुई
और ज़ब्र ने आख़िरी बोली ईजाद की

मैंने शायरी बेचकर आग ख़रीदी
और ज़ब्र का हाथ जला दिया

(ईजाद करना: आविष्कार करना, मराकश: मोरक्को, हुरूफ़: शब्द का बहुवचन, फ़ोनेशिया: भूमध्यसागर और लेबनान के बीच एक स्थान, फ़ाक़ा: भूख, शहवत: काम वासना, मलबूस: कपड़े धारण किए हुए, महलसरा: अंतःपुर, ख़्वाज़ासरा: हिजड़ा, ज़ब्र: दमन और अत्याचार)

Tuesday, July 7, 2015

जब बारिश हो रही हो तो किसी से कुछ नहीं मांगना चाहिए

अफ़ज़ाल अहमद सैयद की कविता की यह नायाब कविता फिर से:


अगर कोई पूछे 

अगर कोई पूछे कि दरख़्त अच्छे होते हैं या छतरियां
तो बताना कि दरख़्त 
जब हम धूप में उनके नीचे खड़े हों
और छतरियां जब हम धूप में चल रहे हों
और चलना अच्छा होता है उन मंज़िलों के लिए
जहां जाने के लिए कई सवारियां और इरादे बदलने पड़ते हैं
हालांकि सफ़र तो उंगली में टूट जाने वाली सुई की नोंक का भी होता है
और उसका भी जो उसे दिल में जाते हुए देखती है

अगर कोई पूछे कि दरवाज़े अच्छे होते हैं या खिड़कियां
तो बताना कि दरवाज़े दिन के वक़्त
और खिड़कियां शामों को
और शामें उनकी अच्छी होती हैं
जो एक इन्तज़ार से दूसरे इन्तज़ार में सफ़र करते हैं
हालांकि सफ़र तो उस आग का नाम है 
जो दरख़्तों से ज़मीन पर कभी नहीं उतरी

मांगने वाले को अगर कच्ची रोटियां एक दरवाज़े से मिल जाएं तो उसे
दियासलाई अगले दरवाज़े से मांगनी चाहिए
और जब बारिश हो रही हो तो किसी से कुछ नहीं मांगना चाहिए
न बारिश रुकने की दुआएं
दुआ मांगने के लिए आदमी के पास एक ख़ुदा का होना बहुत ज़रूरी है
जो लोग दूसरों के ख़ुदाओं से अपनी दुआएं क़ुबूल करवाना चाहते हैं
वो अपनी दाईं एड़ी में गड़ने वाली सुई की चुभन
बाईं में महसूस नहीं कर सकते

बाज़ लोगों को खुदा विरसे में मिलता है
बाज़ को तोहफ़े में, बाज़ अपनी मेहनत से हासिल कर लेते हैं
बाज़ चुरा लाते हैं
बाज़ फ़र्ज़ कर लेते हैं
मैंने ख़ुदा क़िस्तों में ख़रीदा था
क़िस्तों में ख़रीदे हुए ख़ुदा उस वक़्त तक दुआएं पूरी नहीं करते
जब तक सारी क़िस्तें अदा न हो जाएं
एक बार मैं ख़ुदा की क़िस्त वक़्त पर अदा न कर सका
ख़ुदा को मेरे पास से उठा ले जाया गया
और जो लोग मुझे जानते थे
उन्हें पता लग गया
कि अब मेरे पास न ख़ुदा है, न क़ुबूल होने वाली दुआएं
और मेरे लिए एक ख़ुदा फ़र्ज़ कर लेने का मौका भी जाता रहा.

Monday, July 6, 2015

फ़्रांस के चित्रकार रॉबर्ट एन्टोइन पिनशों - 3

मौने की तारीफ से उत्साहित होकर फ्रांसुआ देपॉ ने इस युवा कलाकार के करियर का नियंत्रण अपने हाथों में लेने का फ़ैसला किया. शुरूआत के तौर पर देपॉ ने पिनशों का ढेर सारा काम खरीद लिया. इस सम्बन्ध ने 1920 तक चलना था.
1904 में  पिनशों ने थियेटर नौर्मैड के एक प्रोग्राम का कवर तैयार किया. गी दे मोपासां का एक नाटक मंचित किया जाना था. 

18 जुलाई से 18 सितम्बर तक पिनशों ने अपने चित्रों को दुबारा से प्रदर्शित किया. इस बार कसीनो दे दीईपे में उनके साथ लूचे, लेबर्ग और कैमोइन के चित्र लगे थे. जब वे उन्नीस साल के थे तो रुआं की गैलरी लेग्रिप में उनकी पहली प्रमुख प्रदर्शनी आयोजित हुई. इसमें चौबीस कैनवास सजाये गए थे. इस बाबत दो महत्वपूर्ण आलेख भी छपे.

उसी साल रॉबर्ट एन्टोइन पिनशों ने पहली बार पेरिस का रुख किया. 1905 में पेरिस में अक्टूबर नवम्बर में लगी इस प्रदर्शनी में फॉविज़्म का विधिवत जन्म माना गया.आलोचक कमील मौक्लेयर ने लिखा : “जनता के मुंह पर रंगों का एक बर्तन उड़ेल दिया गया है.”   


लुई वौसेलास ने एक ही कक्ष में लगे और एक  शिल्प का प्रभाव देते कुछेक पेंटर्स के चित्रों को देखकर ‘लेस फॉव्स’ (बनैले पशु) शब्द का आविष्कार किया. 20 नवम्बर को मार्सेल निकोल ने लिखा “इन चित्रों का कला से कोई सम्बन्ध नहीं है. इनकी तुलना एक मासूम बच्चे के खेल से की जा सकती है जिसके पास खिलौने के नाम पर केवल रंगों का डिब्बा हो.”





(जारी)

Sunday, July 5, 2015

फ़्रांस के चित्रकार रॉबर्ट एन्टोइन पिनशों - 2

रॉबर्ट एन्टोइन पिनशों ने शताब्दी की शुरुआत में रुआं के लिसी पीयर-कॉर्नेल में अध्ययन किया. उसकी कक्षा में पढ़ने वाले दो और छात्र विख्यात चित्रकारों में शुमार होने के साथ-साथ अन्तरंग मित्र भी बने. ये थे मार्सेल ड्यूशैम्प और पीयर ड्यूमौन्त. इस स्कूल में 1874 से पढ़ा रहे फ़िलिप ज़कारी (1849-1915) ड्राइंग की कक्षाएं लेते थे और ख़ासे अनुशासनप्रिय और सख्त माने जाते थे. फ्रांस के कला संसार में उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध के महत्वपूर्ण लोगों में ज़कारी का शुमार किया जाता है.  

कला की विधिवत शिक्षा लेने के साथ-साथ रॉबर्ट एन्टोइन पिनशों ने 1895-96 में जोसेफ़ देलात्रे द्वारा स्थापित लिबरे अकादमी और रयू देस शारले जाने को अपना नियमित काम बना लिया. नए और उभरते कलाकारों के ये जगहें प्रेरणा के अड्डों का काम किया करती थीं.

फरवरी 1903 में मार्सेल ड्यूशैम्प के अपने दोस्त रॉबर्ट एन्टोइन पिनशों का पोर्ट्रेट बनाया. उसी साल 15 जून से 31 जुलाई तक रॉबर्ट एन्टोइन पिनशों ने अपनी दो पेंटिंग्स को रुआं की नगरपालिका के प्रदर्शनी हॉल में अपनी दो पेंटिंग्स प्रदर्शित कीं. उस समय के बड़े कला-पारखी चार्ल्स हिल्बर्ट ड्यूफ़ॉर ने रॉबर्ट एन्टोइन पिनशों के बारे में अच्छी बातें लिखीं. पिनशों की आयु तब कुल 17 थी.

रुआं में 14 मई से 15 जुलाई 1903 में हुई वार्षिक कला प्रदर्शनी में रॉबर्ट एन्टोइन पिनशों ने अपना काम जिन कलाकारों के साथ प्रदर्शित किया उनमें चार्ल्स फ्रेकों, ब्लांच मोने और स्वयं क्लाउड मौने शामिल थे. मौने ने यहाँ रुआं के चर्च की अपनी बनाई पेंटिंग टांग रखी थी. रॉबर्ट एन्टोइन पिनशों के काम को इम्प्रेशनिस्ट कला के संग्राहक फ्रांसुआ देपॉ ने बहुत पसंद किया जबकि क्लाउड मौने ने इस युवा कलाकार के लिए लिखा : “चौंका देने वाली एक आँख की सेवा में चौंका देने वाला एक स्पर्श.”





 (जारी) 

Saturday, July 4, 2015

फ़्रांस के चित्रकार रॉबर्ट एन्टोइन पिनशों - 1

फ्रांसीसी पोस्ट-इम्प्रेशनिस्ट लैंडस्केप पेंटर रॉबर्ट एन्टोइन पिनशों (1886-1943) रुआं स्कूल ऑफ़ पेंटिंग से ताल्लुक़ रखते थे. वे ताजिंदगी अपने स्कूल के प्रति वफादार बने रहे. उन्नीस साल की आयु से लेकर अगले दो वर्षों तक उन्होंने फॉव शैली में काम किया लेकिन वे न तो कभी भी क्यूबिज्म की तरफ बढ़े न ही उन्होंने यह माना कि पोस्ट मॉडर्निज्म किसी भी तरह उनकी कलात्मक आवश्यकताओं के लिहाज़  से कमतर है.

रॉबर्ट एन्टोइन पिनशों का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ जो कलात्मक और साहित्यिक दृष्टि से बेहद संपन्न था. उनके पिता रॉबर्ट पिनशों लाइब्रेरियन, पत्रकार, नाटककार और रंगमंच-आलोचक तो थे ही, विख्यात कहानीकार गी दे मोपासां के अन्तरंग मित्र भी थे. वे गुस्ताव फ्लाबेयर के शिष्य भी रहे थे. मोपासां और रॉबर्ट पिनशों ने 1875 में एक नाटक ‘A la Feuille de Rose Maison Turque’ की स्क्रिप्ट लिखी थी जो इरोटिसिज़्म और वैश्यावृत्ति जैसे विषयों को स्पर्श करता था. नाटक का आधिकारिक मंचन 15 मई 1877 को मौरिस लेलोआ के स्टूडियो में किया गया – दर्शकों में गुस्ताव फ्लाबेयर, एमिल ज़ोला और इवान तुर्गेनेव जैसे दिग्गज शामिल थे.

जब रॉबर्ट ने देखा कि बेटे के भीतर कला के लिए शुरूआती रुझान है तो उन्होंने उसके लिए ढेर सारे ऑइल पेंट्स खरीदे और उसे लेकर सन्डे पेंटिंग वॉक्स पर जाना शुरू किया. 1898 के एक फोटो में रॉबर्ट जूनियर को 12 वर्ष की आयु में पेंटिंग करते हुए देखा जा सकता है. सन 1900 में उन्होंने अपने पुत्र की कुछ पेंटिंग्स की एक प्रदर्शनी भी आयोजित की.

उसी साल रयू दे ला रीपब्लीक में रॉबर्ट एन्टोइन ने कैमरा सप्लाई करने वाले विख्यात स्टोर Dejonghe and Dumont के शोकेस में अपना काम प्रदर्शित किया. यह स्थान हालांकि उतना उल्लेखनीय नहीं था लेकिन यहाँ प्रदर्शित कलाकृतियों को जनता ने देखा. इस स्थान की एक खूबी थी कि यह होटल डॉफ़िन एट द’एस्पाने से फ़क़त कुछ ही मीटर की दूरी पर था जहां पॉल गोगां, मोने, पिसारो, देगा, रेनुआ, सेजां, गिलोमीन और सिसली जैसे बड़े कलाकारों का काम नियमित रूप से प्रदर्शित हुआ करता था. 16 मार्च 1900 को ज्योर्ज ड्यूबोक नामक एक आलोचक ने रॉबर्ट एन्टोइन की कला पर एक लंबा आलेख लिखा जो ले जर्नल दे रुआं में प्रकाशित हुआ.







(जारी)

Friday, July 3, 2015

एक पेन्टर तीन फ़ोटोग्राफ़

ये तस्वीरें बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में खींची गयी थीं. फ्रांसीसी पोस्ट-इम्प्रेशनिस्ट पेंटर रॉबर्ट एन्टोइन पिनशों के बारे में कल से एक लम्बी सीरीज शुरू कर रहा हूँ.