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Thursday, July 21, 2016

बाग़ में खड़ी हुई एक लड़की की तस्वीर जो फिर कभी नहीं मिली

सिर्फ गैर अहम शायर
- अफ़ज़ाल अहमद सैय्यद

सिर्फ गैर अहम शायर
याद रखते हैं
बचपन की फिरोजी और सफ़ेद फूलों वाली तामचीनी की प्लेट
जिसमें रोटी मिलती थी

सिर्फ गैर अहम शायर
बेशर्मी से लिख देते हैं
अपनी नज्मों में
अपनी महबूबा का नाम

सिर्फ गैर अहम शायर
याद रखते हैं
बदतमीज़ी से तलाशी लिया हुआ एक कमरा
बाग़ में खड़ी हुई एक लड़की की तस्वीर

जो फिर कभी नहीं मिली.  

Wednesday, July 20, 2016

हमारी आँखें और जुबान उबल आने के बाद शहर में बहार लौट आएगी

शहर में बहार लौट आएगी
-अफ़ज़ाल अहमद सैय्यद

वजीरे आजम की
फोटोजेनिक मुस्कराहट के नतीजे में
एडोनिस की तरह
क़त्ल किया गया नौजवान मौत की सरजमीन से लौट आएगा
और दूसरे मरने वाले भी

सदर के खंखारते ही
दहशतगर्द हथियार फेंक देंगे
और मेहरान बैंक में मुलाजमत अख्तियार कर लेंगे

सिह पहर को
वजीरे आजम की जम्हाई रुकते ही
लोग सिनेमाओं और थिएटरों को चल पड़ेंगे
फ्रेंच बीच पर निम्फो लडकियां टापलेस चहलकदमी करेंगी

मजबूत शानों पर
फांसी पाने के बाद
हमारी आँखें और जुबान उबल आने के बाद
शहर में बहार लौट आएगी

(लिप्यान्तरण: मनोज पटेल)

***

मुलाजमत  -  नौकरी
सिह पहर  -  तीसरा पहर, afternoon

शान  -  कंधा 

Tuesday, July 19, 2016

एक आईसक्रीम को मुतआरिफ़ कराने की मुहिम

एक आईसक्रीम को मुतआरिफ़ कराने की मुहिम
-अफ़ज़ाल अहमद सैय्यद

रेंजर्ज की मोबाइलों
और बख्तरबंद गाड़ियों के आने के बाद
टैंकों के आने से पहले
वह खिलौनों की दुकानों से निकलकर
हमारी सड़कों पर आ गए

अपने पहियों वाले सफ़ेद डिब्बों के साथ
जिनके ऊपर खूबसूरत छतरियां लगी थीं

वह स्ट्राबेरी और वनीला की जुबान में बात करते थे
उनके पास लोगों को मुतवज्जा करने के लिए
एक दिलकश धुन थी

उनकी
एक आईसक्रीम को मुतआरिफ़ कराने की मुहिम
हमारे शहर के लिए आखिरी खुशगवार हैरत थी

(लिप्तयांरण : मनोज पटेल)

***

मुतआरिफ  -  परिचित
मुतवज्जा  -  आकर्षित



Monday, July 18, 2016

उस वक़्त उसकी अंगुली में उसकी दी हुई अंगूठी नहीं है

खेल
-अफ़ज़ाल अहमद सैय्यद

सदरे मम्लिकत
आँखों पर पट्टी बांधकर फन फेयर में बोर्ड पर बने गधे के खाके में
उसकी दुम पिन से लगाने की कोशिश कर रहे हैं
तीन लड़कियां खिलखिला कर हंस रही हैं
उनमें से एक
बहुत खूबसूरत है

एक अहम शख्स की महबूबा
उसके कमरे में दबे पाँव आने के बाद
उसकी आँखें मूँदकर
उसे गेस करने को कहती है
उस वक़्त उसकी अंगुली में उसकी दी हुई अंगूठी नहीं है

वजीरे आजम
आँखों पर पट्टी बांधकर
अपने बच्चों के साथ सरसब्ज लान पर
ब्लाइंड मैन बफ़ खेल रही हैं

हम लोगों को
आँखों पर पट्टियां बांधकर
कैदियों की गाड़ियों में धकेला जा रहा है

(लिप्यान्तरण - मनोज पटेल)

***

सदरे मम्लिकत  -  राष्ट्रपति
वजीरे आजम  -  प्रधानमंत्री

सरसब्ज  -  हरे-भरे  

Sunday, July 17, 2016

हम उसकी खुदकशी पर अफ़सोस कर सकते हैं

राबर्ट क्लाइव 
- अफ़ज़ाल अहमद सैय्यद

" मेरी सारी नेकनामी रहने दो
मेरी सारी दौलत छीन लो "

उसके साथ ऐसा ही किया गया

उसने दर्द कम करने के लिए अफ्यून का इस्तेमाल ख़त्म कर दिया था
ओमीचंद का भूत अब उसके सामने परेड नहीं करता था
उसे मालूम था
सच और खुशनसीबी पर उसकी इजारेदारी ख़त्म हो चुकी है

अब किसी बारिश में
दुश्मन का गोला बारूद नहीं भीग सकेगा
कोई हुक्मरान
उसके क़दमों में खड़े होकर
उसे सुलह के दस्तावेज नहीं पेश करेगा

फिर भी वह वही था
जिसने तारीख की एक अहम जंग
सिर्फ चौदह सिपाहियों के नुकसान पर जीती थी

वह एक मुश्किल दुनिया का बाशिन्दा था

हम उसकी खुदकशी पर अफ़सोस कर सकते हैं 

Saturday, July 16, 2016

हमें पोर्नोग्राफी की किताबों को एहतियात से छूना चाहिए

वह आदमी जिसे लड़कियों की जिल्द पसंद थी
- अफ़ज़ाल अहमद सैय्यद

वह आदमी जिसे लड़कियों की जिल्द पसंद थी
अपनी पोर्नोग्राफी की किताब पर मढ़ने के लिए

उसने फ़ौज के एक भगोड़े को
एक महकूम लड़की की ज़िंदा खिंची हुई खाल
हासिल करने की तरगीब दी

मज्कूरा भगोड़ा
सिंध से दो बार गुजरा

हमें पोर्नोग्राफी की किताबों को
एहतियात से छूना चाहिए

(लिप्यान्तरण: मनोज पटेल)

***

महकूम  -  गुलाम
तरगीब  -  प्रलोभन, प्रेरणा
मज्कूरा - जिसका जिक्र हुआ (उपरोक्त)

Friday, July 15, 2016

इसके अलावा कि कौन सा फूल किस शख्स के आंसुओं से उगा

मुझे एक कहानी सुनाओ
- अफ़ज़ाल अहमद सैय्यद

मुझे एक कहानी सुनाओ
इसके अलावा कि तुम मुझसे हामिला हो गयी हो
इसके अलावा कि तुम उस लड़की से ज्यादा खूबसूरत हो
जो मुझे छोड़कर चली गई है
इसके अलावा कि तुम हमेशा सफ़ेद ब्लाउज के नीचे
सफ़ेद ब्रेजियर पहनती हो

मुझे एक कहानी सुनाओ
इसके अलावा कि आईने ने सबसे खूबसूरत किसे बताया था
इसके अलावा कि आईने में नजर आने वाली हर शै खूबसूरत होती है
इसके अलावा कि गुलाम लड़कियों के हाथों से
शहजादियों के आईने कैसे गिर जाते थे
इसके अलावा कि शहजादियों के हमल कैसे गिर जाते थे
इसके अलावा कि शहर कैसे गिर जाते थे
और फसील,
और इल्म,
और मुकाबला करते हुए लोग

मुझे एक कहानी सुनाओ
इसके अलावा कि डेटलाइन से गुजरते हुए
तुम कप्तान के केबिन में नहीं सोईं
इसके अलावा कि तुमने कभी समंदर नहीं देखा
इसके अलावा कि डूबने वालों की फेहरिस्त में कुछ नाम
हमेशा दर्ज होने से रह जाते हैं

मुझे एक कहानी सुनाओ
इसके अलावा कि बिछड़ी हुई जुड़वा बहनें ब्राथल में
एक दूसरे से कैसे मिलीं
इसके अलावा कि कौन सा फूल किस शख्स के आंसुओं से उगा
इसके अलावा कि कोई जलते हुए तंदूर से रोटियाँ नहीं चुराता

मुझे एक कहानी सुनाओ
इसके अलावा कि सुलहनामे की मेज अजायबघर से कैसे गायब हो गई
इसके अलावा कि एक बर्रेआज़म को गलत नाम से पुकारा जाता है

मुझे एक कहानी सुनाओ
इसके अलावा कि तुम्हें होंठों पर बोसा देना अच्छा नहीं लगता
इसके अलावा कि मैं तुम्हारी ज़िंदगी में पहला मर्द नहीं था
इसके अलावा कि उस दिन बारिश नहीं हो रही थी

(लिप्यान्तरण: मनोज पटेल)

***

हामिला  -  गर्भवती
हमल  -  गर्भ
फसील  -  नगर या किले को घेरने वाली चारो ओर की दीवार
इल्म  -  ज्ञान
ब्राथल  -  वेश्यालय, brothel

बर्रे आज़म  -  महाद्वीप 

Thursday, July 14, 2016

सिर्फ उससे मिलना नामुमकिन है

एक लड़की
-अफ़ज़ाल अहमद सैय्यद

लज्जत की इन्तेहा पर
उसकी सिसकियाँ
दुनिया के तमाम कौमी तरानों से ज्यादा
मौसीकी रखती हैं

जिन्सी अमल के दौरान
वह किसी भी मलिकाए हुस्न से ज्यादा
खूबसूरत करार पा सकती है

उसके ब्लू प्रिंट का कैसेट
हासिल करने के लिए
किसी भी फसादजदा इलाके तक जाने का
ख़तरा लिया जा सकता है

सिर्फ उससे मिलना
नामुमकिन है
पाकिस्तान की तरह
हाला फारुकी भी
पुलिस की तहवील में है

(लिप्यान्तरण: मनोज पटेल)

***
कौमी तराना - राष्ट्र गान

तहवील - कस्टडी, अभिरक्षा

Wednesday, July 13, 2016

कीकर एक झाड़ी है जिससे हमारी शायरी भरी है

हमारा कौमी दरख़्त
-अफ़ज़ाल अहमद सैय्यद

सफ़ेद यास्मीन की बजाए
हम कीकर को अपनी शिनाख्त करार देते हैं
जो अमरीकी युनिवर्सिटियों के कैम्पस पर नहीं उगता
किसी भी ट्रापिकल गार्डेन में नहीं लगाया जाता
इकेबाना खवातीन ने उसे कभी नहीं छुआ
नबातात के माहिर उसे दरख़्त नहीं मानते
क्योंकि उसपर किसी को फांसी नहीं दी जा सकती

कीकर एक झाड़ी है
जिससे हमारे शहर, रेगिस्तान
और शायरी भरी है

काँटों से भरा हुआ कीकर
हमें पसंद है
जिसने हमारी मिट्टी को बहिरा-ए-अरब में जाने से रोका.

(लिप्यान्तरण: मनोज पटेल)

***

इकेबाना - फूल सजाने का जापानी तरीका
नबातात - जमीन से उगने वाली चीजें
बहिरा - ए - अरब - अरब सागर

(http://nayibaat.blogspot.in/ से साभार)

Friday, May 6, 2011

पॉल रॉब्सन के लिए एक कविता

कल का दिन अशोक भाई के सौजन्य से पॉल रॉब्सन के साथ गुजरा तो मुझे अपने कबाड़ में पड़ी नाओमी शिहाब न्ये की इस कविता का ध्यान आया. आपके सामने यह कविता प्रस्तुत है इस सन्दर्भ के साथ कि 1952 में पॉल रॉब्सन को वैंकूवर, कनाडा में गाने के लिए आमंत्रित किया गया तो स्टेट डिपार्टमेंट ने उन्हें देश छोड़ने की इजाजत नहीं दी थी, बावजूद इसके कि अमेरिका से कनाडा जाने के लिए पासपोर्ट तक कि दरकार नहीं थी. उसके बाद जो हुआ उसे आप यहाँ और इस कविता में पढ़ सकते हैं.  













सरहद पार : नाओमी शिहाब न्ये
(अनुवाद : मनोज पटेल)

अमेरिका की उत्तरी सरहद पर 
खड़े हो 
पाल राब्सन ने गाया कनाडा के लिए
जहां फोल्डिंग कुर्सियों पर बैठी 
भारी भीड़ 
उन्हें सुनने की खातिर 
कर रही थी इंतज़ार.

गाया उन्होंने कनाडा में
उनकी आवाज़ ने पार की
अमेरिका की सरहद 
जबकि उनकी देह को 
नहीं थी इजाज़त
सरहद पार करने की.

फिर से याद दिलाओ हमें
बहादुर दोस्त.
किन मुल्कों में गाना है हमें ?
पार करना है हमें किन सरहदों को ?
किन गीतों को बहुत दूर से आना है
हमारी तरफ घूमते हुए
गाढ़ा करने के वास्ते हमारे दिनों को ? 
                    :: ::

Monday, May 2, 2011

सूरज जितनी बड़ी एस्प्रिन की एक टिकिया


अशोक भाई का बहुत शुक्रगुजार हूँ कि उन्होंने मुझे अपना कबाड़ यहाँ रखने की इज्जत बख्शी. फिलहाल रोक डाल्टन के कबाड़ में इस इजाफे को क़ुबूल फरमाएं...  


सिरदर्द  :  रोक डाल्टन 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

कितना सुन्दर है कम्युनिस्ट होना 
हालांकि यह बहुत सिरदर्द भी देता है.

आप देखते हैं कि साम्यवाद का सिरदर्द 
ऐतिहासिक समझा जाता रहा है, यानी 
यह दर्दनिवारक गोलियों से नहीं दूर होता 
बल्कि दूर होता है यह 
केवल पृथ्वी को स्वर्ग बना देने की उपलब्धि से.
मैं बताऊँ आपको, यह बम है, बम !

पूंजीवाद के अधीन जब हमारा सिर दुखता है
वे बस हमारे सिर को उतार लेते हैं.
क्रांतिकारी संघर्ष में, सिर एक विलंबित बम है.
सामाजिक ढाँचे में हम अपने सिरदर्द की ऎसी योजना बनाते हैं 
जो उसे बहुत बिरला नहीं रहने देता, बल्कि इसका ठीक उल्टा

बाक़ी चीजों के साथ-साथ, साम्यवाद 
सूरज जितनी बड़ी एस्प्रिन की एक टिकिया होगा. 
 

Sunday, May 1, 2011

एक माफ़ीनाम नए कबाड़ी मनोज पटेल से


रोक डाल्टन की कविताओं की पोस्टिंग पर मैं भाई मनोज पटेल से माफ़ी भई मांग रहा हूं. आज मैं सुबह से इन कविताओं के प्रिन्टाआउट लिए इस अस्पताल से उस अस्पाताल के चक्कर काटता रहा. मेरी ज़िद थी कि ये सारी पांचों कविताएं कबाड़ख़ाने पर आज ही छपें. यक़ीन है भाई मनोज इस नाफ़रमानी और ज़िद्दीपन को मुआफ़ी अता फ़रमाएंगे.

अब तो मनोज वैसे भी हमारे कबाड़ी कुनबे के सदस्य बन चुके हैं सो उनकी नाराज़गी उतनी ज़्यादा नहीं होगी, उम्मीद है. उम्मीद तो यह भी है कि आगे से वे हमें दुनिया भर की महान कविताओं से परिचित कराते रहेंगॆ . आमीन

रोक डाल्टन की कविता - मनोज पटेल का पांचवां अनुवाद

यकीन


चार घंटों की यातना के बाद, अपाचे एवं अन्य दो सिपाहियों ने कैदी को होश में लाने के लिए उस पर एक बाल्टी पानी फेंक कर कहा : "कर्नल ने हमें यह बताने का हुक्म दिया है कि तुम्हें खुद को बचाने का एक मौक़ा दिया जाने वाला है. यदि तुम सही-सही यह बता दो कि हममें से किसकी एक आँख शीशे की है, तो तुम्हें यातना से छुटकारा दे दिया जाएगा." जल्लादों के चेहरे पर निगाहें फिराने के बाद, कैदी ने उनमें से एक की तरफ इशारा किया : "वह. उसकी दाहिनी आँख शीशे की है."

अचंभित सिपाहियों ने कहा, "तुम तो बच गए ! लेकिन तुमने कैसे अंदाजा लगाया ? तुम्हारे सभी साथी गच्चा खा गए क्योंकि यह अमेरिकी आँख है, यानी एकदम बेऐब." "सीधी सी बात है," फिर से बेहोशी तारी होने का एहसास करते हुए कैदी ने कहा, "यही इकलौती आँख थी जिसमें मेरे लिए नफरत नहीं थी."

जाहिर है, उन्होंने उसे यातना देना जारी रखा.

रोक डाल्टन की कविता - मनोज पटेल का चौथा अनुवाद

कविता से


मैं तुम्हारा स्वागत करता हूँ कविता
बहुत शुक्रगुजार हूँ आज तुमसे मुलाक़ात के लिए
(ज़िंदगी और किताबों में)
तुम्हारा वजूद सिर्फ उदासी के चकाचौंध कर देने वाले
भव्य अलंकरण के लिए ही नहीं है

इसके अलावा हमारी जनता के इस लम्बे और कठिन संघर्ष के
काम में मेरी मदद करके
तुम आज मुझे बेहतर कर सकती हो

तुम अब अपने मूल में हो :
अब वह भड़कीला विकल्प नहीं रही तुम
जिसने मुझे अपनी ही जगह से बाँट दिया था

और तुम खूबसूरत होती जाती हो
कामरेड कविता

कड़ी धूप में जलती हुई सच्ची खूबसूरत बाहों के बीच
मेरे हाथों के बीच और मेरे कन्धों पर

तुम्हारी रौशनी मेरे आस पास रहती है

रोक डाल्टन - मनोज पटेल का तीसरा अनुवाद

27 साल


सत्ताईस साल का होना
एक संजीदा बात है
दरअसल तमाम मौजूद चीजों के बीच
सबसे संजीदा बातों में से एक
देखते हुए दोस्तों की मौत
और डूबते हुए बचपन को
शक होने लगता है
अपने खुद के अमरत्व पर.

पूंजीवादी तर्कशास्त्र में प्रेस की आजादी बस एक और धंधा है

रोक डाल्टन की कविता - मनोज पटेल का दूसरा अनुवाद

आजादी के आंकड़े


सल्वाडोर के लोगों के लिए प्रेस की आजादी की लागत
20 सेंटावो प्रतिदिन बैठती है
केवल उन्हीं लोगों की गिनती करते हुए जो पढ़ सकते हैं
और जिनके पास बीस सेंटावो से ज्यादा बचे रह जाते हैं
बमुश्किल उतना भर खाने के बाद जितना ज़िंदा रहने के लिए जरूरी है.

बड़े उद्योगपतियों और प्रचारकों के लिए
प्रेस की आजादी
एक श्वेत-श्याम पृष्ठ के लिए हजारों और कुछ रेजगारी की कीमत पर बिकती है
और मुझे नहीं पता कि पाठ्य या चित्र के लिए
प्रति वर्ग इंच की किस दर पर.

डान नेपोलियन वियरा अल्टामिरानो
और डतरिज और पिंटो और अल मुंडो के मालिकों के लिए
प्रेस की आजादी लाखों की है :
जिसमें शामिल हैं इमारतें
सैन्य सिद्धांतों पर बनाई गईं
जिसमें शामिल हैं मशीन और कागज़ और रोशनाई
उनके उद्योगों के आर्थिक निवेश
जो वे दिन-प्रतिदिन बड़े उद्योगपतियों और प्रचारकों से पाते हैं
और सरकार और उत्तरी अमेरिका
और दूसरे दूतावासों से
जिसे वे गारते हैं अपने मजदूरों के शोषण से
जिसे वे ऐंठते हैं ब्लैकमेल से ( "सबसे नामी आदमी की निंदा
न छापकर या मौकापरस्ती से ऐसा राज छापकर
जो समुद्र की सबसे छोटी मछली को डुबो देगा" )
जो वे कमाते हैं "एकमात्र अधिकार" की अवधारणा से, उदाहरण के लिए
"लव इज" तौलिए... "लव इज" मूर्तिकाएं...
जो वे रोज एकत्र करते हैं
सल्वाडोर (और गुआटेमाला) के उन सभी लोगों से
जिनके पास बीस सेंटावो उपलब्ध होते हैं.

पूंजीवादी तर्कशास्त्र में
प्रेस की आजादी बस एक और धंधा है
और सबके लिए इसकी कीमत
इसके लिए उसके द्वारा किए जाने वाले भुगतान के समानुपाती है :

लोगों के लिए बीस सेंटावो प्रति व्यक्ति प्रति दिन
प्रेस की आजादी की कीमत,

वियरा अल्टामिरानो डतरिज पिंटो वगैरह के लिए
लाखों डालर प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन
होती है प्रेस की आजादी की कीमत.

जो कविता है हर किसी की

आज से आपको अतिप्रतिभाशाली अनुवादक मनोज पटेल के कुछ अन्नुवाद पढ़ेने को मिलेंगे.उन्होंने अल सल्वादोर के कवि रोक डाल्टन की कविताओं के कुछ अविश्वसनीय अनुवाद किए हैं.

1992 की बात है. या 1993 की. मार्टिन एस्पादा ने राजनीतिक कविताओं का संग्रह तैयार किया और उसका नाम दिया : रोटी की तरह कविता. कहना न होगा कि यह पंक्ति रोक डॉल्टन की कविता 'तुम्हारी तरह' से ली गई है.

रोक डाल्टन (अल सल्वाडोर, 1935 - 1975) एक कवि, लेखक, बुद्धिजीवी और क्रांतिकारी की हैसियत से लैटिन अमेरिका के इतिहास की महत्वपूर्ण शख्सियत रहे हैं. अपने छोटे से जीवन में उन्होंने कुल मिलाकर 18 किताबें लिखीं. मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचारों से प्रभावित डाल्टन ने क्रांतिकारी एक्टिविस्ट बनने का भी काफी प्रयास किया जिसे यह कहते हुए नकार दिया गया कि क्रान्ति में उनकी भूमिका एक कवि के रूप में ही है. मेक्सिको में निर्वासन में रहने के दौरान उन्हें गिरफ्तार किया गया और मौत की सजा सुनाई गई लेकिन वे चमत्कारी ढंग से बच निकले. पर उन दिनों लटिन अमेरिका में सोचने समझने वालों के साथ जो सामान्यत: होता था, ठीक उसी तरह 1975 में उनकी हत्या कर दी गई.

आज प्रस्तुत है उनकी पहली कविता:



तुम्हारी तरह

तुम्हारी तरह मैं भी
प्रेम करता हूँ प्रेम से, ज़िंदगी,
चीजों की मोहक सुगंध, और जनवरी
के दिनों के आसमानी रंग के भूदृश्यों से.

और मेरा भी खून खौल उठता है
और मैं हंसता हूँ आँखों से
जो जानती रही हैं अश्रुग्रंथियों को.

मेरा मानना है कि दुनिया खूबसूरत है
और रोटी की तरह कविता भी सबके लिए है.

और मेरी नसें सिर्फ मेरे भीतर नहीं
बल्कि उन लोगों के एक जैसे खून तक भी फैली हैं
जो लड़ते हैं ज़िंदगी के लिए,
प्रेम,
छोटी-छोटी चीजों,
प्राकृतिक भूदृश्यों और रोटी के लिए,

जो कविता है हर किसी की.