Monday, January 17, 2011

एक चीनी लोक कथा - १

परसों रात एक दोस्त के कबाड़ख़ाने में एक दुबली सी किताब मिली - ट्रेडीशनल कॉमिक टेल्स. पांडा बुक्स के इस प्रकाशन में चीन की चुनिन्दा पारंपरिक लोकगाथाएं एकत्र की गयी हैं. कल दिन-रात इसे पढ़ते हुए प्रसन्न हुआ किया. सोचता हूँ मौका मिलते ही इस किताब का अनुवाद कर दूंगा. हम लोग बस हिंदी-हिंदी करते रहते हैं. बाकी भाषाओँ के लिए उनके लोगों ने कैसी कैसी चीज़ें जुटायीं. यह मुझे इस पुस्तक को पढ़ते हुए अहसास हुआ. ऐसा ही कुछ इतालो काल्विनो द्वारा इकठ्ठा की गयीं इतालवी लोक कथाओं के खासे वृहद् संग्रह का अंग्रेजी अनुवाद पढ़ते हुए लगा था. मुझे हिंदी प्रदेश की सबसे युवा पीढ़ी से उम्मीद है की अनुवाद के क्षेत्र में वह बड़ा काम करने को आगे आएगी. समकालीन हिंदी का परिदृश्य इस कदर उचाट और नाउम्मीद करने वाला है कि मुझे उस में कुछ नया पा सकने कि संभावनाएं फिलहाल नज़र नहीं आतीं.

छोड़िये! चीनी लोक कथाओं के इस संग्रह से आप के लिए एक कथा का अनुवाद करना शुरू कर रहा हूँ. दोएक दिन लगेंगे. मौज आएगी. लपूझन्ने की तर्ज़ पर मनी बैक गारंटी.



तीन पदोन्नतियां

जो क़िस्सा मैं बताने जा रहा हूँ , मिंग साम्राज्य के दौर में घटा था. शांदोंग प्रदेश के लिंकिंग जिले में एक रईस आदमी अपने परिवार के साथ रहा करता था. इस परिवार के इकलौते बेटे झांग हाओगु को बहुत लाड़ के साथ पाला-पोसा गया था. झांग हाओगु कभी स्कूल भी नहीं गया. जब वह बड़ा हुआ, उसके पास फ़ालतू की चीज़ों में समय जाया करने के आलावा कोई काम नहीं होता था. हर रोज़ भरपेट खाना - पीना के चुकने के बाद वह पिंजरे में बंद अपनी पालतू चिड़िया थामे शहर की गलियों में घूमा करता था. लोगों ने उसका मज़ाक बनाने की नीयत से उसका नामकरण 'पिल्ला' कर दिया.

एक दिन ऐसे ही घूमते हुए उसने किसी चौराहे पर एक भविष्यवक्ता को देखा. भीड़ उसे घेरे हुए थी. झांग हाओगु ने उसके पास जाने का फैसला किया. जैसे ही भविष्यवक्ता ने झांग हाओगु को देखा, उसने जान लिया कि आज इस रईसजादे से मोटी रकम ऐंठी जा सकती है. वह भीड़ की अनदेखी करता हुआ झांग हाओगु के पास जाकर बोला - " बड़े भाई! आपकी आँखें बेहद तीखी हैं और भौहें मुड़ी हुईं. आप तो बहुत बड़े अफसर बनेंगे. आपका चौड़ा माथा बतला रहा है कि आप राजदरबार में कोई बड़ा काम सम्हालने वाले हैं. इस के लिए आपने इतना करना है कि बीजिंग में होने वाली एक परीक्षा में बैठना है. जब आप उस में सफल हो कर आयेंगे तो आपको बधाई देने वाला मैं पहला आदमी होऊंगा."

अगर झांग हाओगु होशमंद इंसान होता तो इस चापलूसी को सुनकर भविष्यवक्ता को पीट-पीट कर अधमरा कर देता. उसे न पढ़ना आता था, न लिखना. वह इम्तहान देने बीजिंग कैसे जा सकता था? मगर उसने इस बाबत बिलकुल नहीं सोचा. उस के मन में बस यह आया: मेरे बाप के पास बहुत पैसा है और मैं आसानी से बड़ा अफसर बन सकता हूँ. सो नाराज़ होने के बजाय उसने खुश होते हुए कहा - "क्या तुम्हें पक्का यकीन है कि मैं इम्तहान में सफल हो जाऊंगा?"

"इसमें ज़रा भी शक नहीं बड़े भाई. आप तो उत्तीर्ण होने वालों की सूची में शुरू के तीन लोगों में होने वाले हैं."

"ये लो. अभी मेरे पास चांदी के यही दो सिक्के हैं. अगर मैं पास हो गया तो तुम्हें और दूंगा. नहीं हुआ तो हिसाब बाद में बराबर किया जाएगा."

भविष्यवक्ता ने मन ही मन सोचा - "पिल्ले, तब तक तो मैं पता नहीं कहाँ होऊंगा."

घर पहुँच कर झांग हाओगु ने सामान बाँधा, कुछ रकम और सोना साथ लिया और बीजिंग की राह लग लिया. उस के दिमाग में एक बार भी नहीं आया की वह अनपढ़ है और किसी इम्तहान में बैठना तक उस के लिए मुमकिन नहीं. खैर, बखत बखत की बात!

जब वह बीजिंग पहुंचा, इम्तहान का आखिरी दिन था. शहर का पश्चिमी द्वार बंद हो चूका था पर उसकी किस्मत थी की उसे शहर में पानी की सप्लाई करने वालों का साथ मिल गया. मिंग और क़िंग साम्राज्यों के दौरान राजा लोग बीजिंग के बाहरी छोर पर अवस्थित प्राकृतिक स्रोत का पानी पिया करते थे और हर शाम को घोड़ा गाड़ियाँ पानी लेकर शहर आया करती थीं. झांग हाओगु को इस बारे में कुछ भी पता नहीं था. वह इस गाड़ियों के पीछे-पीछे चलता हुआ शहर में प्रविष्ट हो गया. पहरेदारों ने भी उस पर यह सोच कर कोई ध्यान नहीं दिया की वह भी पाने सप्लाई करने वाली टीम का सदस्य होगा.

शहर के भीतर झांग हाओगु को ज़रा भी गुमान नहीं था कि इम्तेहान कहाँ हो रहा है. वह ऐसे ही गलियों में भटकता रहा. एक चौराहे पर उसने देखा कि कुछ लोग दो लालटेनें लिए चले आ रहे हैं. इस समूह के बीच में रात की पहरेदारी पर निकला एक अफसर था - राजकुमार वाई झोन्ग्ज़िआन. इस समूह को देख कर झांग हाओगु का घोड़ा बेकाबू हो गया और अफसर के घोड़े से जा भिड़ा. पुराना कोई दिन होता तो वाई ने झांग हाओगु को मरवा दिया होता क्योंकि वह सम्राट झियोंग का पसंदीदा हिजड़ा था और उसे सम्राट ने यह अनुमति दे रखी थी कि बिना रपट के वह किसी को भी मरवा दे. लेकिन आज वह जानना चाहता था कि यह अजनबी दिख रहा आदमी है कौन. उस ने अपने घोड़े कि लगाम खींचते हुए चीख कर कहा - "क्या तू जीने से थक है बे?" झांग हाओगु को क्या पता कि उस के सामने कौन है.उस ने चिल्ला कर कहा - "मुझ से इस अंदाज़ में बात न कर. मुझे एक ज़रूरी काम पर जाना है."

"क्या काम है?"

"मैं शांदोंग से यहाँ तक सिर्फ इस लिए आया हूँ कि राजकीय परीक्षा में बैठ सकूं. अगर मुझे देर हो गयी तो मैं शुरू के तीन सफल लोगों में कैसे आ पाऊंगा?"

"क्या तुम्हें पका यकीन है कि तुम शुरू के तीन में आ जाओगे?"

"अगर ऐसा न होता तो मैं यहाँ आता ही क्यों."

"मगर परीक्षा-कक्ष तो बंद हो गया होगा अब तक."

"कोई बात नहीं. मैं खटखटा कर दरवाज़े खुलवा लूँगा."

वाई ने सोचा - यह आदमी कह रहा है कि वो शुरू के तीन लोगों में होगा. क्या यह वाकई इस कदर पढ़ा-लिखा है? या सिर्फ गप्प मार रहा है.सो उस ने चीखते हुए कहा - " ठीक है! इसे मेरा कार्ड दे दो और इम्तहान में बैठने दो." वाई यह देखना चाहता था कि यह आदमी कितना काबिल है.

(अगला हिस्सा रात तक)

पंचतंत्र से एक कहानी - चतुर खरगोश


एक वन में हाथियों का एक झुंड रहता था | झुंड के सरदार को गजराज कहते थे | वो विशालकाय, लम्बी सूंड तथा लम्बे मोटे दाँतों वाला था | खंभे के समान उसके मोटे मोटे पैर थे | जब वो चिंघाड़ता था तो सारा वन गूँज उठता था |
गजराज अपने झुंड के हाथियों से बड़ा प्यार करता था | स्वयं कष्ट उठा लेता था, पर झुंड के किसी भी हाथी को कष्ट में नहीं पड़ने देता था | और सारे के सारे हाथी भी गजराज के प्रति बड़ी श्रद्धा रखते थे |
एक बार जलवृष्टि न होने के कारण वन में जोरों का अकाल पड़ा | नदियां, सरोवर सूख गए | वृक्ष और लताएँ भी सूख गयी | पानी और भोजन के अभाव में पशु-पक्षी वन को छोड़कर भाग खड़े हुए | वन में चीख-पुकार होने लगी, हाय-हाय होने लगी |
गजराज के झुंड के हाथी भी अकाल के शिकार होने लगे | वे भी भोजन और पानी न मिलने से तड़प-तड़पकर मरने लगे | झुंड के हाथियों का बुरा हाल देखकर गजराज बड़ा दुखी हुआ | वह सोचने लगा, कौन सा उपाय किया जाए, जिससे हाथियों के प्राण बचें |
एक दिन गजराज ने तमाम हाथियों को बुलाकर उनसे कहा, "इस वन में न तो भोजन है, न पानी है ! तुम सब भिन्न-भिन्न दिशाओं में जाओ, भोजन और पानी की खोज करो |"
हाथियों ने गजराज की आज्ञा का पालन किया | हाथी भिन्न-भिन्न दिशाओं में छिटक गए |
एक हाथी ने लौटकर गजराज को सूचना दी, "यहाँ से कुछ दूर पर एक दूसरा वन है | वहाँ पानी की बहुत बड़ी झील है | वन के वृक्ष फूलों और फलों से लदे हुए हैं |"
गजराज बड़ा प्रसन्न हुआ | उसने हाथियों से कहा, "अब हमें देर न करके तुरंत उसी वन में पहुँच जाना चाहिए, क्योंकि वहां भोजन और पानी दोनों हैं |"
गजराज अन्य हाथियों के साथ दुसरे वन में चला गया | हाथी वहां भोजन और पानी पाकर बड़े प्रसन्न हुए |
उस वन में खरगोशों की एक बस्ती थी | बस्ती में बहुत से खरगोश रहते थे | हाथी खरगोशों की बस्ती से ही होकर झील में पानी पीने के लिए जाया करते थे |
हाथी जब खरगोशों की बस्ती से निकलने लगते थे, तो छोटे-छोटे खरगोश उनके पैरों के नीचे आ जाते थे | कुछ खरगोश मर जाते थे, कुछ घायल हो जाते थे |
रोज-रोज खरगोशों के मरते और घायल होते देखकर खरगोशों की बस्ती में हलचल मच गयी | खरगोश सोचने लगे, यदि हाथियों के पैरों से वे इसी तरह कुचले जाते रहे, तो वह दिन दूर नहीं जब उनका खात्मा हो जायेगा |
अपनी रक्षा का उपाय सोचने के लिए खरगोशों ने एक सभा बुलाई | सभा में बहुत से खरगोश इकट्ठे हुए | खरगोशों के सरदार ने हाथियों के अत्याचारों का वर्णन करते हुए कहा, "क्या हममें से कोई ऐसा है, जो अपनी जान पर खेलकर हाथियों का अत्याचार बंद करा सके ?"
सरदार की बात सुनकर एक खरगोश बोल उठा, "यदि मुझे खरगोशों का दूत बनाकर गजराज के पास भेजा जाये, तो मैं हाथियों के अत्याचार को बंद करा सकता हूँ |"
सरदार ने खरगोश की बात मान ली और खरगोशों का दूत बनाकर गजराज के पास भेज दिया |
खरगोश गजराज के पास जा पहुंचा | वह हाथियों के बीच में खड़ा था | खरगोश ने सोचा, वह गजराज के पास पहुंचे तो किस तरह पहुंचे | अगर वह हाथियों के बीच में घुसता है, तो हो सकता है, हाथी उसे पैरों से कुचल दें |
यह सोचकर वह पास ही की एक ऊँची चट्टान पर चढ़ गया | चट्टान पर खड़ा होकर उसने गजराज को पुकारकर कहा, "गजराज, मैं चंद्रमा का दूत हूं | चंद्रमा के पास से तुम्हारे लिए एक संदेश लाया हूं |"
चद्रमा का नाम सुनकर, गजराज खरगोश की ओर आकर्षित हुआ | उसने खरगोश की ओर देखते हुए कहा, "क्या कहा तुमने ? तुम चद्रमा के दूत हो ? तुम चंद्रमा के पास से मेरे लिए क्या संदेश लाये हो ?"
खरगोश बोला, "हां गजराज, मैं चंद्रमा का दूत हूं | चद्रमा ने तुम्हारे लिए संदेश भेजा है | सुनो, तुमने चंद्रमा की झील का पानी गंदा कर दिया है | तुम्हारे झुंड के हाथी खरगोशों को पैरों से कुचल-कुचलकर मार डालते हैं | चंद्रमा खरगोशों को बहुत प्यार करते हैं, उन्हें अपनी गोद में रखते हैं | चंद्रमा तुमसे बहुत नाराज हैं | तुम सावधान हो जाओ | नहीं तो चंद्रमा तुम्हारे सारे हाथियों को मार डालेंगे |"
खरगोश की बात सुनकर गजराज भयभीत हो उठा | उसने खरगोश को सचमुच चंद्रमा का दूत और उसकी बात को सचमुच चंद्रमा का संदेश समझ लिया | उसने डर कर कहा, "यह तो बड़ा बुरा संदेश है | तुम मुझे फ़ौरन चंद्रमा के पास ले चलो | मैं उनसे अपने अपराधों के लिए क्षमा याचना करूँगा |"
खरगोश गजराज को चंद्रमा के पास ले जाने के लिए तैयार हो गया | उसने कहा, "मैं तुम्हें चंद्रमा के पास ले चल सकता हूं, पर शर्त यह है कि तुम अकेले ही चलोगे |"
गजराज ने खरगोश की बात मान ली |
पूर्णिमा की रात थी | आकाश में चंद्रमा हँस रहा था | खरगोश गजराज को लेकर झील के किनारे गया | उसने गजराज से कहा, "गजराज, मिलो चंद्रमा से |"
खरगोश ने झील के पानी की ओर संकेत किया | पानी में पूर्णिमा के चंद्रमा की परछाईं को ही चंद्रमा मान लिया |
गजराज ने चंद्रमा से क्षमा मांगने के लिए अपनी सूंड पानी में डाल दी | पानी में लहरें पैदा हो उठीं, परछाईं अदृश्य हो गई |
गजराज बोल उठा, "दूत, चंद्रमा कहां चले गए ?"
खरगोश ने उत्तर दिया, "चंद्रमा तुमसे नाराज हैं | तुमने झील के पानी को अपवित्र कर दिया है | तुमने खरगोशों की जान लेकर पाप किया है इसलिए चंद्रमा तुमसे मिलना नहीं चाहते |"
गजराज ने खरगोश की बात सच मान ली | उसने डर कर कहा, "क्या ऐसा कोई उपाय है, जिससे चंद्रमा मुझसे प्रसन्न हो सकते हैं ?"
खरगोश बोला "हां, है | तुम्हें प्रायश्चित करना होगा | तुम कल सवेरे ही अपने झुंड के हाथियों को लेकर यहाँ से दूर चले जाओ | चंद्रमा तुम पर प्रसन्न हो जायेंगे |"
गजराज प्रायश्चित करने के लिए तैयार हो गया | वह दूसरे दिन हाथियों के झुंड सहित वहां से चला गया |
इस तरह खरगोश की चालाकी ने बलवान गजराज को धोखे में डाल दिया | और उसने अपनी बुद्धिमानी के बल से ही खरगोशों को मृत्यु के मुख में जाने से बचा लिया |

Sunday, January 16, 2011

सीखना

अमेरिकी कवि जेराल्ड स्टर्न(जन्म - १९२५) की कविता 'व्हैन आई हैव रीच्ड द पौइंट ऑफ सफोकेशन' से एक टुकड़ा आप लोगों के वास्ते:


सालों लग जाते हैं यह शऊर पाने में
कि सुन्दर चीज़ों के तबाह हो चुके होने को कैसे देखा जाए
यह सीखने में कि
उस जगह को कैसे छोड़ दिया जाना चाहिए
जहाँ आप पर ज़ुल्म हो रहे हों लगातार
और यह जान सकने में
कि निपट ख़ालीपन
के बीच से कैसे निर्मित किया जा सकता है
अपना पुनर्जीवन.

Saturday, January 15, 2011

क्या तुमने फिल्म '300' देखी है ?



एक छोटी सी जगह है पाकिस्तान में, सारागढ़ी | ऐसा ज्यादा कुछ एतिहासिक नहीं है उसमे | महाराज रणजीत सिंह ने अपने राज में कई दुर्ग बनाये थे | तो ऐसे ही दो दुर्ग गुलिस्तान और लोखार्ट के बीच संचार व्यवस्था बनाये रखने के लिए सारागढ़ी दुर्ग बनाया गया | लेकिन इतिहास में उस जगह का नाम एक ख़ास वजह से दर्ज है | 12 सितम्बर 1897 को 10 हजार अफगान और पश्तून लड़ाकों और संख्या में महज 21 सिखों के बीच हुए मुकाबले की वजह से |

अफगान विद्रोह 1897 में अपने चरम पे था | गुलिस्तान दुर्ग पर हमले की कई कोशिशों को नाकाम किया जा चुका था | अफगान लड़ाकों ने अब अपना ध्यान सारागढ़ी पर किया, क्योंकि सारागढ़ी सूचना केंद्र था जिसे तबाह करना जरूरी था | पूरी घटना का ब्यौरा कुछ यों था |

1. सुबह 9 बजे करीब दस हज़ार अफगान लड़ाकों ने सारागढ़ी दुर्ग को घेर लिया |
2. सरदार गुरमुख सिंह ने लोखार्ट दुर्ग पर कर्नल हौटन को सूचना भेजी कि उन्हें घेर लिया गया है |
3. कर्नल हौटन ने मदद भेजने से हाथ खड़े कर दिए |
4. भगवान सिंह सबसे पहले घायल हुए, लाल सिंह गंभीर रूप से घायल हुए |
5. लाल सिंह, जीवा सिंह भगवान सिंह के मृत शरीर को अफगान फौज से लड़ते हुए अन्दर के सुरक्षा घेरे तक लाये |
6. दुर्ग के खुले दरवाजे से प्रवेश करने के अफगान फौजों के दो प्रयासों को विफल कर दिया गया |
7. अफगान फौजों ने कई बार आत्मसमर्पण करने को कहा, मुमकिन है कई प्रलोभन भी दिए हों |
8. दीवार में सेंध लगाने में अफगान फौजें कामयाब हुई |
9. उसके बाद आमने सामने के युद्ध की भूमिका बननी शुरू हो गयी |
10. ईशर सिंह ने अपने आदमियों को आंतरिक सुरक्षा घेरे में चले जाने का हुक्म दिया और खुद अफगान फौजों पर टूट पड़े |
11. लेकिन सुरक्षा घेरा टूट चुका था , 'जो बोले सो निहाल , सत श्री अकाल' के जयघोष के साथ सिखों ने आखिरी युद्ध के लिए तलवारें खींच ली |
12. सारे सिख कई सारे पश्तून सिपाहियों के साथ मारे गए |

सारागढ़ी को अंग्रेजों ने अगले दिन अपने कब्जे में ले लिया था | पश्तून सिपाहियों ने बाद में स्वीकार किया कि उनके 180 सिपाही मारे गए और कई सारे घायल हुए हैं | दुर्ग में हमले के बाद करीब ६०० लाशें बरामद हुई थी | तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने उन लड़ाकों को श्रद्धांजलि देने के लिए हरमंदिर साहिब (स्वर्ण मन्दिर) के पास गुरुद्वारा सारागढ़ी साहिब बनाया है | ब्रिटिश संसद ने खड़े होकर इस युद्ध में वीरगति पाए सिपाहियों को सम्मान दिया था | संसद ने वक्तव्य जारी करते हुए कहा - 'ब्रिटिश, साथ ही भारतीय भी, 36 सिख रेजीमेंट की बहादुरी पर गर्व महसूस करते हैं | ये कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि दुनिया में वो सेना कभी हार नहीं सकती जिसके पास ऐसे बहादुर सिख जान की बाजी लगाने को तैयार हों |'

बहरहाल, महत्वपूर्ण ये नहीं कि कब क्या हुआ, या घटनाएं किस क्रम में हुई | महत्वपूर्ण ये भी नहीं कि वो लड़ किससे रहे थे, किसके लिए रह थे, क्यों लड़ रहे थे | महत्वपूर्ण ये है कि वे लड़े, उन्हें झुकना नहीं था | महत्वपूर्ण ये है कि उन्हें पता था कि 'खालसा' क्या होता है, वे खालिस लोग थे | ये सिर्फ कागजी विवरण हैं, लेकिन इन्हें पढ़ते हुए भी सर में खून जम जाता है | क्या तो जिगर रहा होगा उन इक्कीस लोगों का, जिन्हें सामने दस हजार लोग नजर आ रहे होंगे | उनके पास समय नहीं था रूककर अपनी भावनाएं देखने का | उनके सामने बस एक ही लक्ष्य था, वो लक्ष्य भी उन्होंने सोचकर नहीं लिया होगा | लोग उन्हें पागल कहें, सिरफिरा कहें, या आगे उनके लिए स्मारक बनायें, ये भी कह सकते हैं कि आत्मसमर्पण कर सकते थे, ये सब भी उन्हें सोचने का वक़्त नहीं मिला होगा | बात यहाँ पर इस चीज़ की भी नहीं है, कि लड़ाई से कभी भला हुआ या नहीं | अगर उनके पास वक़्त रहता तो इस तरह की बौद्धिक बहस वे भी करते | देश भर में हडतालें, आन्दोलन कर सकते थे | शांति मार्च करते, दांडी में नमक क़ानून तोड़ते | आजादी के बाद शायद चुनाव लड़ते, या देश की बसें फूंकते | वे लोग किसी विचारधारा के तहत ऐसा नहीं कर रहे थे | न उन लोगों को गुरु गोबिंद सिंह की बात याद रही होगी कि 'चिड़ियों से मैं बाज तुडाऊं' | दिल में कहीं ग्रन्थ साहिब पर ऐतबार, ऐतराज का सवाल भी न आया हो | लेकिन उनके पास मौत का सिर्फ एक सेकंड था, और उस पल में उन्हें जिंदगी से ईमानदार होना था |

कौन सही है कौन गलत, ये तुम लोग करते रहो | लेकिन वादों, इज्मों और त्वों को परे रखकर बस एक बार खुद से ईमानदार बनो | महज सौ-सवा सौ साल पुरानी इस घटना को हम यों ही भूल गए हैं | क्यों नहीं इसे साहित्य कला या सिनेमा में जगह मिलती | आज लोहड़ी , मकर संक्रांति की शुभकामनाएं देते हुए ये कबाड़ी उन लोगों को, बस उन्ही पलों को याद रखना चाहता है |

Friday, January 14, 2011

मैं मीर मीर कह उस को बहुत पुकार रहा


गली में उसकी गया सो गया न बोला कुछ
मैं मीर मीर कह उस को बहुत पुकार रहा

कल देर रात एक मित्र से ख़ुदा-ए-सुखन मीर तकी मीर की शायरी पर चर्चा होती रही.

कहना ने होगा मीर को मैं दुनिया का महानतम प्रेम कवि मानता हूँ. मीर से यह लगाव बरसों पुराना है और हमारी यह पहचान उत्तरोत्तर गहरी होती चली गयी है.

मीर की बात करूं और उनका कोई शेर न पेश किया जाए ऐसा मुमकिन नहीं. सिरहाने मीर के अहिस्ता बोलो, अभी टुक रोते-रोते सो गया है कहने वाले मीर का एक पसंदीदा शेर इस तरह है:

या रोये या रुलाया, अपनी तो यूँ ही गुज़री
क्या ज़िक्र हमसफीरां यारान-ए-शादमां का

बाबा मीर की कविता ये लगाव मेरे प्रिय समकालीन हिंदी कवियों में एक आलोक धन्वा का भी शगल है. उनकी एक कविता मीर को समर्पित है और बहुत सादा शब्दों में मीर की शायरी पर एक ज़रूरी कमेन्ट कराती है और अहसास कराती है की मीर को समझने के लिए तबीयत में एक फक्कड़पन और सीने में गहरे ज़ख्मों का होना बुनियादी ज़रूरत है. कविता प्रस्तुत है:

मीर

मीर पर बातें करो
तो वे भी उतनी ही अच्छी लगती हैं
जितने मीर

और तुम्हारा वह कहना सब
दीवानगी की सादगी में
दिल-दिल करना
दुहराना दिल के बारे में
जोर देकर कहना अपने दिल के बारे में की
जनाब यह वही दिल है
जो मीर की गली से हो आया है.

शीत के आगमन का पर्व -- 'उतना'

आज मकर संक्राँति है. हमारी (लाहुल की पटनी समुदाय की) परम्परा में नव वर्ष का पहला दिन।
मुझे लगा कि अपने नव वर्ष की शुभकामनाओं के साथ आज कबाड़खाने के पाठकों को अपनी आदिम परम्पराओं की एक एक हल्की सी झलक दिखा दूँ. और उन्हे उस भारत से अवगत कराऊँ, जो किताबी, फिल्मी और शहरी दुनिया मे प्राय: दिखाई नही देती।
कहते हैं आज सूर्य उत्तरायण में प्रवेश करता है. शायद इसी लिए इस पर्व का नाम ‘उतना’ है. इस पर्व का आयोजन बहुत साधारण सा होता है . घर का सब से बड़ा पुरुष सुबह सवेरे उठ कर स्नान करता है, और घर की छत पर जा कर (लाहुल मे पारम्परिक रूप से समतल छतों का प्रचलन है. ) ग्राम देवता और कुलदेवता को भोग अर्पित करता है. भोग मे सत्तू का शंकवाकार पिण्ड (टोटु) तथा मक्खन का बना दंज़ा (बनबकरा /आईबेक्स) अर्पित किया जाता है. साथ में पवित्र लकड़ी शुर (सरू/ जुनिपर) की धूणी निकाली जाती है. और पुरखों के लिए सत्तू और तेल पिण्ड दान दिया जाता है. उतना पर्व के साथ एक रोचक मिथक यह जुड़ा है कि आज के दिन शीत देवता ऊंचे हिमनदों से उतर कर चन्द्रभागा संगम मे स्नान करता है. साक्षात यक (आईस) का बना वह देव इक्कीस दिनो तक नदी मे ही निवास करता है. और इन दिनो नदी जम जाती है।
२२ वे दिन वह बाहर निकलता है।
२३ वे दिन खेत पर आता है ।
२४ वे दिन चूल्हे मे घुस जाता है। कहते हैं इस दिन आग मे ताप ही नही होता. और यह सबसे ठंडा दिन होता है. 25वे दिन वह प्रस्थान करता है . उस दिन स्त्रियाँ और बच्चे उसे गीत गा कर विदाई देते हैं. भुर्ज की टहनियों से मवेशियों की पीठ् झाड़ते हैं.... कहते है वह किसी किसी मवेशी से चिपका रह जा सकता है। :-
लीह्ज़ु डेला रे थग्ज़ुईं
डेहलो फुङ रे लेह्तुईं .........
यक की डलियाँ तोड़ो , डेहला के हार पहनो ,
हे शीत देवता अपने ठार जाओ, इन बेज़ुबानो को छोड़ो.....
शीत इली रीत अति.... अर्थात शीत चला गया अब ठंड से राहत मिलेगी।
कहते हैं कि 14 फरवरी को वह अपने मूल स्थान (ग्लेशियर) मे चला जाता है. और तापमान के उतार चढ़ाव के बावत आदिवासियों की यह गणना एक दम सटीक होती है।
उतना मेरे क़बीले मे एक महत्वपूर्ण पर्व है, वर्ष के तमाम बड़े उत्सवों की तिथि उतना के आधार पर ही तय होती है। उतना के बाद जो पहली पूर्णिमा आएगी वह खोगला का दिन होगा. खोगला आग का त्योहार है. इस दिन शुर की मशालें बाँधी जाती जातीं हैं. इन मशालों को हाल्डा कहा जाता है. रात को नियत समय पर घर के सभी पुरुष इन मशालों को ले कर गाँव के बाहर एक स्थान तक ले जातें हैं, वहाँ इकट्ठे हो कर अलाव जलाते हैं तथा पड़ोसी गाँव का हाल्डा भी देखते हैं।
इस के अगले अमावस्य को कुँस त्योहार आता है जो कि सर्दियों का मुख्य त्योहार है. यह वर्ष भर मे वह अकेला दिन होता है जब लाहुल के लोग एक दूसरे का अभिवादन करते हैं. जौ की कोंपले जो अँधेरे मे उगाई जाती हैं, तथा पीली हो जाती हैं इन्हें यौरा कहा जाता है. अभिवादन के दौरान परस्पर यौरा बाँटा जाता है, एक दूसरे के पैर छुए जाते हैं और कुशल मंगल सुख साँत पूछा जाता है. इस उत्सव मे बलराज की पूजा होती है. जो कि समृद्धि और बरक़त के देवता माने जाते हैं . लोक गाथाओं मे इसे बळिदानो तिहार कहा गया है . यह भी मान्यता है कि यह त्योहार पौराणिक राजा बलि अथवा वैदिक असुर बल की स्मृति मे मनाया जाता है. यह उत्सव कई दिनों तक चलता है. खूब माँस एवम मदिरा का सेवन होता है. ( विस्तार से फिर कभी)

Thursday, January 13, 2011

सरोज स्मृति

(महाप्राण पर लिखी पिछली पोस्ट पर कमेन्ट में गिरिजेश जी, अरुण जी ने पूरी कविता देने की बात की थी , तो साहेबान लीजिये पूरी कविता का आनन्द लीजिये |)




सरोज स्मृति

ऊनविंश पर जो प्रथम चरण
तेरा वह जीवन-सिन्धु-तरण;
तनये, ली कर दृक्पात तरुण
जनक से जन्म की विदा अरुण!
गीते मेरी, तज रूप-नाम
वर लिया अमर शाश्वत विराम
पूरे कर शुचितर सपर्याय
जीवन के अष्टादशाध्याय,
चढ़ मृत्यु-तरणि पर तूर्ण-चरण
कह - "पित:, पूर्ण आलोक-वरण
करती हूँ मैं, यह नहीं मरण,
'सरोज' का ज्योति:शरण - तरण!" --


अशब्द अधरों का सुना भाष,
मैं कवि हूँ, पाया है प्रकाश
मैंने कुछ, अहरह रह निर्भर
ज्योतिस्तरणा के चरणों पर।
जीवित-कविते, शत-शर-जर्जर
छोड़ कर पिता को पृथ्वी पर
तू गई स्वर्ग, क्या यह विचार --
"जब पिता करेंगे मार्ग पार
यह, अक्षम अति, तब मैं सक्षम,
तारूँगी कर गह दुस्तर तम?" --

कहता तेरा प्रयाण सविनय, --
कोई न था अन्य भावोदय।
श्रावण-नभ का स्तब्धान्धकार
शुक्ला प्रथमा, कर गई पार!


धन्ये, मैं पिता निरर्थक था,
कुछ भी तेरे हित न कर सका!
जाना तो अर्थागमोपाय,
पर रहा सदा संकुचित-काय
लखकर अनर्थ आर्थिक पथ पर
हारता रहा मैं स्वार्थ-समर।
शुचिते, पहनाकर चीनांशुक
रख सका न तुझे अत: दधिमुख।
क्षीण का न छीना कभी अन्न,
मैं लख न सका वे दृग विपन्न;
अपने आँसुओं अत: बिम्बित
देखे हैं अपने ही मुख-चित।

सोचा है नत हो बार बार --
"यह हिन्दी का स्नेहोपहार,
यह नहीं हार मेरी, भास्वर
यह रत्नहार-लोकोत्तर वर!" --
अन्यथा, जहाँ है भाव शुद्ध
साहित्य-कला-कौशल प्रबुद्ध,
हैं दिये हुए मेरे प्रमाण
कुछ वहाँ, प्राप्ति को समाधान

पार्श्व में अन्य रख कुशल हस्त
गद्य में पद्य में समाभ्यस्त। --
देखें वे; हसँते हुए प्रवर,
जो रहे देखते सदा समर,
एक साथ जब शत घात घूर्ण
आते थे मुझ पर तुले तूर्ण,
देखता रहा मैं खडा़ अपल
वह शर-क्षेप, वह रण-कौशल।
व्यक्त हो चुका चीत्कारोत्कल
क्रुद्ध युद्ध का रुद्ध-कंठ फल।
और भी फलित होगी वह छवि,
जागे जीवन-जीवन का रवि,
लेकर-कर कल तूलिका कला,
देखो क्या रँग भरती विमला,
वांछित उस किस लांछित छवि पर
फेरती स्नेह कूची भर।


अस्तु मैं उपार्जन को अक्षम
कर नहीं सका पोषण उत्तम
कुछ दिन को, जब तू रही साथ,
अपने गौरव से झुका माथ,
पुत्री भी, पिता-गेह में स्थिर,
छोड़ने के प्रथम जीर्ण अजिर।
आँसुओं सजल दृष्टि की छलक
पूरी न हुई जो रही कलक

प्राणों की प्राणों में दब कर
कहती लघु-लघु उसाँस में भर;
समझता हुआ मैं रहा देख,
हटती भी पथ पर दृष्टि टेक।

तू सवा साल की जब कोमल
पहचान रही ज्ञान में चपल
माँ का मुख, हो चुम्बित क्षण-क्षण
भरती जीवन में नव जीवन,
वह चरित पूर्ण कर गई चली
तू नानी की गोद जा पली।
सब किये वहीं कौतुक-विनोद
उस घर निशि-वासर भरे मोद;
खाई भाई की मार, विकल
रोई उत्पल-दल-दृग-छलछल,
चुमकारा सिर उसने निहार
फिर गंगा-तट-सैकत-विहार
करने को लेकर साथ चला,
तू गहकर चली हाथ चपला;
आँसुओं-धुला मुख हासोच्छल,
लखती प्रसार वह ऊर्मि-धवल।
तब भी मैं इसी तरह समस्त
कवि-जीवन में व्यर्थ भी व्यस्त
लिखता अबाध-गति मुक्त छंद,

पर संपादकगण निरानंद
वापस कर देते पढ़ सत्त्वर
दे एक-पंक्ति-दो में उत्तर।
लौटी लेकर रचना उदास
ताकता हुआ मैं दिशाकाश
बैठा प्रान्तर में दीर्घ प्रहर
व्यतीत करता था गुन-गुन कर
सम्पादक के गुण; यथाभ्यास
पास की नोंचता हुआ घास
अज्ञात फेंकता इधर-उधर
भाव की चढी़ पूजा उन पर।
याद है दिवस की प्रथम धूप
थी पडी़ हुई तुझ पर सुरूप,
खेलती हुई तू परी चपल,
मैं दूरस्थित प्रवास में चल
दो वर्ष बाद हो कर उत्सुक
देखने के लिये अपने मुख
था गया हुआ, बैठा बाहर
आँगन में फाटक के भीतर,
मोढे़ पर, ले कुंडली हाथ
अपने जीवन की दीर्घ-गाथ।
पढ़ लिखे हुए शुभ दो विवाह।
हँसता था, मन में बडी़ चाह
खंडित करने को भाग्य-अंक,
देखा भविष्य के प्रति अशंक।

इससे पहिले आत्मीय स्वजन
सस्नेह कह चुके थे जीवन
सुखमय होगा, विवाह कर लो
जो पढी़ लिखी हो -- सुन्दर हो।
आये ऐसे अनेक परिणय,
पर विदा किया मैंने सविनय
सबको, जो अडे़ प्रार्थना भर
नयनों में, पाने को उत्तर
अनुकूल, उन्हें जब कहा निडर --
"मैं हूँ मंगली," मुडे़ सुनकर
इस बार एक आया विवाह
जो किसी तरह भी हतोत्साह
होने को न था, पडी़ अड़चन,
आया मन में भर आकर्षण
उस नयनों का, सासु ने कहा --
"वे बडे़ भले जन हैं भैय्या,
एन्ट्रेंस पास है लड़की वह,
बोले मुझसे -- 'छब्बीस ही तो
वर की है उम्र, ठीक ही है,
लड़की भी अट्ठारह की है।'
फिर हाथ जोडने लगे कहा --
' वे नहीं कर रहे ब्याह, अहा,
हैं सुधरे हुए बडे़ सज्जन।
अच्छे कवि, अच्छे विद्वज्जन।
हैं बडे़ नाम उनके। शिक्षित
लड़की भी रूपवती; समुचित
आपको यही होगा कि कहें
हर तरह उन्हें; वर सुखी रहें।'


आयेंगे कल।" दृष्टि थी शिथिल,
आई पुतली तू खिल-खिल-खिल
हँसती, मैं हुआ पुन: चेतन
सोचता हुआ विवाह-बन्धन।
कुंडली दिखा बोला -- "ए -- लो"
आई तू, दिया, कहा--"खेलो।"
कर स्नान शेष, उन्मुक्त-केश
सासुजी रहस्य-स्मित सुवेश
आईं करने को बातचीत
जो कल होनेवाली, अजीत,
संकेत किया मैंने अखिन्न
जिस ओर कुंडली छिन्न-भिन्न;
देखने लगीं वे विस्मय भर
तू बैठी संचित टुकडों पर।


धीरे-धीरे फिर बढा़ चरण,
बाल्य की केलियों का प्रांगण
कर पार, कुंज-तारुण्य सुघर
आईं, लावण्य-भार थर-थर
काँपा कोमलता पर सस्वर
ज्यौं मालकौस नव वीणा पर,
नैश स्वप्न ज्यों तू मंद मंद
फूटी उषा जागरण छंद
काँपी भर निज आलोक-भार,
काँपा वन, काँपा दिक् प्रसार।
परिचय-परिचय पर खिला सकल --
नभ, पृथ्वी, द्रुम, कलि, किसलय दल
क्या दृष्टि। अतल की सिक्त-धार
ज्यों भोगावती उठी अपार,
उमड़ता उर्ध्व को कल सलील
जल टलमल करता नील नील,
पर बँधा देह के दिव्य बाँध;
छलकता दृगों से साध साध।
फूटा कैसा प्रिय कंठ-स्वर
माँ की मधुरिमा व्यंजना भर
हर पिता कंठ की दृप्त-धार
उत्कलित रागिनी की बहार!
बन जन्मसिद्ध गायिका, तन्वि,
मेरे स्वर की रागिनी वह्लि
साकार हुई दृष्टि में सुघर,
समझा मैं क्या संस्कार प्रखर।
शिक्षा के बिना बना वह स्वर
है, सुना न अब तक पृथ्वी पर!
जाना बस, पिक-बालिका प्रथम
पल अन्य नीड़ में जब सक्षम
होती उड़ने को, अपना स्वर
भर करती ध्वनित मौन प्रान्तर।
तू खिंची दृष्टि में मेरी छवि,
जागा उर में तेरा प्रिय कवि,
उन्मनन-गुंज सज हिला कुंज
तरु-पल्लव कलिदल पुंज-पुंज
बह चली एक अज्ञात बात
चूमती केश--मृदु नवल गात,
देखती सकल निष्पलक-नयन
तू, समझा मैं तेरा जीवन।


सासु ने कहा लख एक दिवस :--
"भैया अब नहीं हमारा बस,
पालना-पोसना रहा काम,
देना 'सरोज' को धन्य-धाम,
शुचि वर के कर, कुलीन लखकर,
है काम तुम्हारा धर्मोत्तर;
अब कुछ दिन इसे साथ लेकर
अपने घर रहो, ढूंढकर वर
जो योग्य तुम्हारे, करो ब्याह
होंगे सहाय हम सहोत्साह।"


सुनकर, गुनकर, चुपचाप रहा,
कुछ भी न कहा, -- न अहो, न अहा;
ले चला साथ मैं तुझे कनक
ज्यों भिक्षुक लेकर, स्वर्ण-झनक
अपने जीवन की, प्रभा विमल
ले आया निज गृह-छाया-तल।
सोचा मन में हत बार-बार --
"ये कान्यकुब्ज-कुल कुलांगार,
खाकर पत्तल में करें छेद,
इनके कर कन्या, अर्थ खेद,
इस विषय-बेलि में विष ही फल,
यह दग्ध मरुस्थल -- नहीं सुजल।"
फिर सोचा -- "मेरे पूर्वजगण
गुजरे जिस राह, वही शोभन
होगा मुझको, यह लोक-रीति
कर दूं पूरी, गो नहीं भीति
कुछ मुझे तोड़ते गत विचार;
पर पूर्ण रूप प्राचीन भार
ढोते मैं हूँ अक्षम; निश्चय
आयेगी मुझमें नहीं विनय
उतनी जो रेखा करे पार
सौहार्द्र-बंध की निराधार।

वे जो यमुना के-से कछार
पद फटे बिवाई के, उधार
खाये के मुख ज्यों पिये तेल
चमरौधे जूते से सकेल
निकले, जी लेते, घोर-गंध,
उन चरणों को मैं यथा अंध,
कल ध्राण-प्राण से रहित व्यक्ति
हो पूजूं, ऐसी नहीं शक्ति।
ऐसे शिव से गिरिजा-विवाह
करने की मुझको नहीं चाह!"
फिर आई याद -- "मुझे सज्जन
है मिला प्रथम ही विद्वज्जन
नवयुवक एक, सत्साहित्यिक,
कुल कान्यकुब्ज, यह नैमित्तिक
होगा कोई इंगित अदृश्य,
मेरे हित है हित यही स्पृश्य
अभिनन्दनीय।" बँध गया भाव,
खुल गया हृदय का स्नेह-स्राव,
खत लिखा, बुला भेजा तत्क्षण,
युवक भी मिला प्रफुल्ल, चेतन।
बोला मैं -- "मैं हूँ रिक्त-हस्त
इस समय, विवेचन में समस्त --
जो कुछ है मेरा अपना धन
पूर्वज से मिला, करूँ अर्पण
यदि महाजनों को तो विवाह
कर सकता हूँ, पर नहीं चाह
मेरी ऐसी, दहेज देकर
मैं मूर्ख बनूं यह नहीं सुघर,
बारात बुला कर मिथ्या व्यय
मैं करूँ नहीं ऐसा सुसमय।
तुम करो ब्याह, तोड़ता नियम
मैं सामाजिक योग के प्रथम,
लग्न के; पढूंगा स्वयं मंत्र
यदि पंडितजी होंगे स्वतन्त्र।
जो कुछ मेरे, वह कन्या का,
निश्चय समझो, कुल धन्या का।"

आये पंडित जी, प्रजावर्ग,
आमन्त्रित साहित्यिक ससर्ग
देखा विवाह आमूल नवल,
तुझ पर शुभ पडा़ कलश का जल।
देखती मुझे तू हँसी मन्द,
होंठो में बिजली फँसी स्पन्द
उर में भर झूली छवि सुन्दर,
प्रिय की अशब्द श्रृंगार-मुखर
तू खुली एक उच्छवास संग,
विश्वास-स्तब्ध बँध अंग-अंग,
नत नयनों से आलोक उतर
काँपा अधरों पर थर-थर-थर।
देखा मैनें वह मूर्ति-धीति
मेरे वसन्त की प्रथम गीति --
श्रृंगार, रहा जो निराकार,
रस कविता में उच्छ्वसित-धार
गाया स्वर्गीया-प्रिया-संग --
भरता प्राणों में राग-रंग,
रति-रूप प्राप्त कर रहा वही,
आकाश बदल कर बना मही।
हो गया ब्याह आत्मीय स्वजन
कोई थे नहीं, न आमन्त्रण
था भेजा गया, विवाह-राग
भर रहा न घर निशि-दिवस जाग;
प्रिय मौन एक संगीत भरा
नव जीवन के स्वर पर उतरा।
माँ की कुल शिक्षा मैंने दी,
पुष्प-सेज तेरी स्वयं रची,
सोचा मन में, "वह शकुन्तला,
पर पाठ अन्य यह अन्य कला।"

कुछ दिन रह गृह तू फिर समोद
बैठी नानी की स्नेह-गोद।
मामा-मामी का रहा प्यार,
भर जलद धरा को ज्यों अपार;
वे ही सुख-दुख में रहे न्यस्त,
तेरे हित सदा समस्त, व्यस्त;
वह लता वहीं की, जहाँ कली
तू खिली, स्नेह से हिली, पली,
अंत भी उसी गोद में शरण
ली, मूंदे दृग वर महामरण!

मुझ भाग्यहीन की तू सम्बल
युग वर्ष बाद जब हुई विकल,
दुख ही जीवन की कथा रही,
क्या कहूँ आज, जो नहीं कही!
हो इसी कर्म पर वज्रपात
यदि धर्म, रहे नत सदा माथ
इस पथ पर, मेरे कार्य सकल
हो भ्रष्ट शीत के-से शतदल!
कन्ये, गत कर्मों का अर्पण
कर, करता मैं तेरा तर्पण!

गुरु मन्त्र

कविताओं की काफी बात होती है, लेकिन कहानियों की नहीं | कभी कभी तो मुझे लगता है कि कहानी लिखने वाला रोज़ अपना आधा दिन अपने पात्रों के साथ बिताता होगा, जबकि कविता लिखने वाला पांच मिनट में कुछ चमत्कार सा लिखकर ख़त्म कर देता होगा | कविता के साथ मजेदार बात यह है कि समझ न आने पर वो और महान हो जाती है | इसी से मिलती जुलती बात कहानी के साथ यह है कि पात्रों की ऐसी तैसी कर दो, कहानी बढ़िया हो जायेगी | लेकिन इन सब के बीच हम यह भूल जाते हैं कि जिन लोगों का नाम आज अमर है, उन्होंने बहुत ही साधारण ढंग से लिखा है | प्रेमचंद उसी कड़ी के हैं, उन्हें देख के एक बार आपको भी लगेगा कि अरे , इसमें क्या बात है ये तो मैं भी लिख सकता हूँ | लेकिन वो कहानियां जनमानस की कहानियां हैं, साहित्य का चमत्कार करने की उसमे अपनी तरफ से कोई कोशिश नहीं है | पाठक को अपने साथ बहा ले चलना ही उनका चमत्कार है |





घर के कलह और निमंत्रणों की कमी से पंडित चिंतामणि जी के चित्त में वैराग्य पैदा हुआ और उन्होंने सन्यास ले लिया तो उनके परम मित्र पंडित मोटेराम शास्त्रीजी ने उपदेश दिया - दोस्त, हमारा अच्छे-अच्छे साधू-महात्माओं से सत्संग रहा है | यह जब किसी भलेमानस के दरवाजे पर जाते हैं, तो गिड़गिड़ाकर हाथ नहीं फैलाते और झूठे आशीर्वाद नहीं देने लगते कि 'नारायण तुम्हारा चोला मस्त रखे, तुम हमेशा सुखी रहो |' यह तो भिखारियों का दस्तूर है | संत लोग दरवाजे पर जाते ही कड़क कर हांक लगते हैं, जिससे घर के लोग चौंक पड़ें और उत्सुक होकर द्वार की तरफ दौड़ें | मुझे दो-चार वाणियां मालूम हैं, जो चाहे ग्रहण कर लो | गुदड़ी बाबा कहते थे-'मरें, तो पाँचों मरें |' यह ललकार सुनते ही लोग उनके चरणों पर गिर पड़ते थे | सिद्ध बाबा की हांक बहुत श्रेष्ठ थी- 'खाओ, पियो, चैन करो, पहनो गहना, पर बाबा जी के सोटे से डरते रहना |' नंगा बाबा कहते थे- 'दे तो दे, नहीं दिला दे, खिला दे, पिला दे, सुला दे |' यह जान लो कि तुम्हारा आदर सत्कार बहुत कुछ तुम्हारी हांक के ऊपर है | और क्या कहूँ | भूलना मत | हम और तुम काफी दिनों साथ रहे, अनेकों भोज साथ खाए | जिस नेवते में हम और तुम दोनों पहुंचते थे, लाग-डाट से एक-दो पत्तल और उड़ा ले जाते थे | तुम्हारे बिना अब मेरा रंग नहीं जमेगा, ईश्वर तुम्हें हमेशा सुगन्धित वस्तु दिखाए |
          चिंतामणि को इन वाणियों में एक भी पसंद नहीं आई | बोले- मेरे लिए कोई वाणी सोचो |
          मोटेराम- अच्छा यह बोली कैसी है कि, 'न दोगे तो हम चढ़ बैठेंगे' ?
          चिंतामणि- हाँ , यह मुझे पसंद है | तुम्हारी इजाजत हो तो इसमें काट-छांट करूँ |
          मोटेराम- हाँ, हाँ करो |
          चिंतामणि- अच्छा, तो इस प्रकार रखो- न देगा तो हम चढ़ बैठेंगे |
          मोटेराम- (उछलकर) नारायण जानता है, यह बोली अपने रंग में निराली है | भक्ति ने तुम्हारी अकल को चमका दिया है | भला एक बार ललकार कर कहो तो देखें किस तरह कहते हो |

          चिंतामणि ने दोनों कान उँगलियों से बन्द कर लिए और अपनी ताकत से चिल्लाकर बोले- न देगा तो चढ़ बैठूंगा | यह नाद ऐसा आकाशभेदी था कि मोटेराम भी अचानक चौंक पड़े | चमगादड़ घबराकर पेड़ों पर से उड़ गए, कुत्ते भूंकने लगे |

          मोटेराम- दोस्त, तुम्हारी वाणी सुन कर मेरा तो कलेजा कांप उठा | ऐसी ललकार कहीं सुनने में नहीं आई, तुम सिंह की भांति गरजते हो | वाणी तो निश्चित हो गयी अब कुछ दूसरी बातें बताता हूँ, कान लाकर सुनो | साधुओं की भाषा हमारी बोलचाल से अलग होती है | हम किसी को आप कहते हैं और किसी को तुम | साधु लोग छोटे-बड़े, अमीर-गरीब, बूढ़े-जवान, सबको तू कह कर बुलाते हैं | माई और बाबा का हमेशा उचित व्यवहार करते रहना | यह भी याद रखो कि सादी हिंदी कभी मत बोलना; नहीं तो मरम खुल जाएगा | टेड़ी हिंदी बोलना; यह कहना कि, 'माई मुझको कुछ खिला दे' साधुजनों की भाषा में ठीक नहीं है | पक्का साधु इसी बात को यों कहेगा- माई मेरे को भोजन करा दे, तेरे को बड़ा धर्म होगा |
          चिंतामणि- दोस्त, हम तेरे को कहां तक जस गावें | तेरे ने मेरे साथ बड़ा उपकार किया है |

          यों उपदेश दे कर मोटेराम चले गए | चिंतामणि जी आगे बढे तो क्या देखते है कि गांजे-भांजे की दूकान के सम्मुख कई जटाधारी महात्मा बैठे हुए गांजे के दम लगा रहे हैं | चिंतामणि को देखते ही एक महात्मा ने अपनी जयकार सुनायी- चल-चल, जल्दी लेके चल नहीं तो अभी करता हूं बेचैन |
          एक दूसरा साधु कड़क कर बोला - अ-रा-रा-रा-धम, आये पहुंचे हम, अब क्या है गम |
          अभी यह कड़ाका आसमान में गूँज ही रहा था कि तीसरे महात्मा ने गरज कर अपनी बोली सुनायी- देस बंगाला, जिसको देखा न भाला, चटपट भर दे प्याला |
         चिंतामणि से अब न रहा गया | उन्होंने भी कड़क कर कहा- नहीं देगा तो चढ़ बैठूंगा |

          इतना सुनते ही साधुजन ने चिंतामणि का सादर अभिवादन किया | तत्क्षण गांजे की चिलम भरी गयी और उसे सुलगाने का काम पंडित जी पर पड़ा | बेचारे बड़े मुसीबत में पड़े | सोचा, अगर चिलम नहीं लेता तो अभी सारी कलई खुल जायेगी | मजबूर होकर चिलम ले ली; किन्तु जिसने कभी गांजा न पिया हो, वह बहुत कोशिश करने पर भी दम नहीं लगा सकता | उन्होंने आंखें बन्द करके अपनी समझ में तो बड़े जोरों से दम मारा | चिलम हाथ से छूटकर गिर पड़ी, आंखें निकल आयीं, मुँह से फिचकुर निकल आया, लेकिन न तो मुँह से धुंए के बादल निकले, न चिलम ही सुलगी | उनका यह कच्चापन उन्हें साधु-समाज से च्युत करने के लिए बहुत था | दो-तीन साधु झल्ला कर आगे बढे और बड़ी बेरहमी से उनका हाथ पकड़ कर उठा लिया |

          एक महात्मा- तेरे को धिक्कार है |
          दूसरे महात्मा- तेरे को लाज नहीं आती ? साधु बना है, मूर्ख ?
          पंडितजी शर्मिंदा होकर समीप के एक हलवाई की दूकान के सामने जा बैठे और साधु समाज ने खंजड़ी बजा-बजा कर यह भजन गाना आरम्भ किया :
          माया है संसार संवलिया, माया है संसार;
          धर्माधर्म सभी कुछ मिथ्या, यही ज्ञान व्यवहार;
                                        संवलिया, माया है संसार |
          गांजे, भंग को वर्जित करते, है उन पर धिक्कार;
                                        संवलिया, माया है संसार |

: प्रेमचंद

Wednesday, January 12, 2011

हे अमृत के पुत्रों

(विवेकानंद के जन्मदिवस पर प्रस्तुत अंश डॉ. नरेन्द्र कोहली जी द्वारा लिखित पुस्तक 'न भूतो न भविष्यति' से लिया गया है | एक साधारण संन्यासी से एक युग प्रवर्तक और समाज सेवक बनने का दृढ़ संकल्प कन्याकुमारी की अंतिम शिला से शुरू हुआ और पूरे भारत में क्रांति बनकर छा गया |)

उस अंतिम शिला पर बैठकर स्वामी ने अपना मन एकाग्र किया | वे ध्यान में गहरे उतरते चले गए | उनका ध्यान भारत के वर्तमान और भविष्य पर एकाग्र हो रहा था | देश के इस पतन का कारण क्या है ? एक दृष्टा के दिव्यदर्शन के रूप में उन्होंने देखा-क्यों भारत उन्नति की चोटी से पतन के गर्त में गिर गया | उस एकांत में जहाँ चारों ओर झाग और पवन का वेग ही सुनाई पड़ता था, उनके सारे अस्तित्व में मानों भारत का गंतव्य प्राण के रूप में स्पंदन कर रहा था | भारत की उपलब्धियाँ आकाश के ग्रहों के समान उनके हृदयाकाश में द्युतिमान थीं | अनागत शताब्दियों के आवरण को हटाकर अपना रहस्य उद्घाटित कर रही थीं | भारतीय संस्कृति के क्षमतावान स्वरुप के यथार्थ को स्वामी ने साक्षात देखा | जिस प्रकार कोई वास्तुकार अनबने भवन की कल्पना ईंट और पत्थरों में करता है, उसी प्रकार उन्होंने भारत को उसके मूर्त्त रूप में देखा | साक्षात देखा | सांगोपांग देखा | उन्होंने देखा कि भारत माता की धमनियों में दौड़ने वाला रक्त और कुछ नहीं, केवल धर्म था | अध्यात्म ही उसका प्राण था | उन्हें अनुभव हुआ : भारत का निर्माण उसी सर्वोच्च आध्यात्मिक चेतना की पुन:प्रतिष्ठा से होगा, जिसने उसे सदा के लिए भक्ति, श्रद्धा और मानवता का पालना बना दिया था | उन्होंने भारत की महानता को देखा | उन्होंने उसकी सीमाओं और दुर्बलताओं को भी देखा | भारत अपनी अस्मिता खो चुका था | अब एक मात्र आशा ऋषियों की संस्कृति में थी | उसे पुन: जगाया जाए, उसे पुन: जीवंत किया जाए, उसे पुन: स्थापित किया जाए | धर्म भारत के पतन का कारण नहीं था | पतन का कारण था- धर्म के आदेशों की अवहेलना, उनका उल्लंघन | धर्म का आचरण संसार की सबसे बड़ी शक्ति को जन्म देता है |
मोक्षोन्मुखी संन्यासी एक सुधारक, एक राष्ट्रनिर्माता, विश्वशिल्पी में परिणत हो गया था | उनकी आत्मा करुणा से पिघलकर जैसे सर्वव्यापक हो गई | हे भगवान ! जिस देश में बड़ी-बड़ी खोपड़ी वाले आज दो सहस्र वर्षों से यह ही विचार कर रहे हैं कि दाहिने हाथ से खाऊँ या बाएँ हाथ से ? पानी दाहिनी ओर से लूँ या बायीं ओर से | अथवा जो लोग फट फट स्वाहा, क्रां, क्र्रूं हुं हुं करते हैं , उनकी अधोगति न होगी, तो और किसकी होगी ? काल: सुप्तेषु जागर्ति कालो हि दुरतिक्रम: | काल का अतिक्रम करना बहुत कठिन है | ईश्वर सब जानते हैं, भला उनकी आँखों में कौन धूल झोंक सकता है ?
जिस देश में करोड़ों लोग महुआ खाकर दिन गुज़ारते हैं, और दस-बीस लाख साधु और दस-बारह करोड़ ब्राह्मण उन गरीबों का खून चूस कर जीते हैं; और उनकी उन्नति के लिए कोई चेष्टा नहीं करते, वह देश है या नरक ? वह धर्म है या उसकी भ्रमित व्याख्या करने वाला पिशाच नृत्य ? मैं भारत को घूम-घूमकर देख चुका हूँ-क्या बिना कारण के कहीं कोई कार्य होता है ? क्या बिना पाप के दंड मिल सकता है ? 'सब शास्त्रों और पुराणों में व्यास के ये दो वचन हैं - परोपकार से पुण्य होता है और परपीड़न से पाप |' देश का दारिद्र्य और अज्ञता देखकर मुझे नींद नहीं आती | क्या हमारे गुरुदेव नहीं कहा करते थे कि खाली पेट से धर्म नहीं होता ? वे गरीब, जो पशुओं का सा जीवन व्यतीत कर रहे हैं, उसका कारण अज्ञान है | पाजियों ने युग युगों से उनका खून चूसा है और उन्हें अपने पैरों तले कुचला है | हिन्दू, मुसलमान, ईसाई- सबने ही उन्हें पैरों तले रौंदा है | उनकी उद्धार की शक्ति भी भीतर से अर्थात कट्टर हिंदुओं से ही आएगी | प्रत्येक देश में बुराइयाँ धर्म के कारण नहीं, वरन धर्म को न मानने के कारण ही विद्यमान रहती हैं | दोष धर्म का नहीं, समाज का है | स्वामी ने स्पष्ट देखा : सन्यास और सेवा- ये युगल विचार ही भारत का उद्धार कर सकते हैं |
हाँ, वे अमेरिका जाएँगे | भारत के करोड़ों लोगों के नाम पर, उनके प्रतिनिधि बनकर वे अमेरिका जाएँगे | अपने मस्तिष्क की शक्ति से वे वहाँ संपत्ति अर्जित करेंगे | भारत लौटकर वे अपने देशवासियों के उत्थान का प्रयत्न करेंगे | या फिर इस प्रयत्न में अपने प्राण दे देंगे | और कोई सहायता करे न करे, गुरुदेव उनकी सहायता करेंगे |
उनका वर्षों का चिंतन आज कुछ निष्कर्षों पर पहुँचा था | उन्हें मार्ग मिल गया था | उन्होंने अश्रुभरी आँखों से सागर को देखा : उनका ह्रदय अपने गुरु और जगदंबा के चरणों में नत हो गया | आज से उनका जीवन अपने देश की सेवा को समर्पित था | विशेष रूप से अस्पृश्य नारायण की सेवा के लिए, भूखे नारायणों के लिए, करोड़ों करोड़ दलित और दमित नारायणों के लिए | ब्रह्म का साक्षात्कार, निर्विकल्प समाधि का आनन्द, उनके जीवन का लक्ष्य नहीं था, जीवन का लक्ष्य था - सेवा | उन्होंने नारायण को देखा, संसार के स्वामी, अनुभवातीत, किंतु सारे जीवों में व्याप्त | उनका असीम प्रेम कोई भेदभाव नहीं करता - कोई ऊँच-नीच नहीं है, शुद्ध और अशुद्ध धनी और निर्धन, पुण्यात्मा और पापी - किसी में कोई भेद नहीं करते थे | उनके लिए धर्मलाभ ही मनुष्य के लिए महत्त्वपूर्ण नहीं था | मनुष्य को प्रयत्न करना चाहिए- वेद, ऋषि, तपस्या और ध्यान, आत्मसाक्षात्कार ... किंतु यह सर्वसाधारण...उनका जीवन, उनके सुख-दुख, उनकी पीड़ा और दीनता, उनकी निर्धनता और असहायता | मानव यातना से निरपेक्ष धर्म तत्वहीन और सारहीन था |

Monday, January 10, 2011

सरोज स्मृति / सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

निराला को देखते ही हमें क्या दिखता है ? उलझे बाल, बेतरतीब दाढ़ी, तीखी नाक , कबीर जैसा मनमौजी इन्सान , चप्पल चटकाते या शायद नंगे पाँव चलता होगा |  हिंदी में महान लोगों की कमी कभी रही नहीं , आज भी नहीं है | वैचारिक जुगाली, साहित्यिक, परिमार्जित , शैली प्रांजल और जो भी , सर्वहारा वर्ग, किसान वर्ग के कवि , अकेलेपन के कवि, रोमानी ख़याल , विद्रोही तेवर आदि आदि, के कवि समय समय पर हिंदी जगत को समृद्ध करते रहे | लेकिन निराला, वो सही में निराला था | अपने टाइम का सबसे फक्कड़ , कबाड़ी टाइप का कवि (भारतेंदु से अब तक , फक्र है) | जब वह तोडती पत्थर कहता है , तो लगता है वो भी वहीं रास्ते पे धूप में खड़ा था | या भिखारी की दशा को चित्रित करते हुए कहता है , 'पेट-पीठ दोनों मिलकर हैं एक चल रहा लकुटिया टेक' तो पेट-पीठ का मिलकर एक होना, सच कहता हूँ, मेरे लिए काव्य का पहला चमत्कार था | महादेवी और पन्त के साथ उन्हें छायावाद के प्रमुख स्तंभों में गिना जाता है | एक बात और , निराला के बारे में कोई भी मुझसे ज्यादा ही जानता होगा | मैंने तो सिर्फ ये बात छेड़ी है, ताकि और कुछ भी पता चले | मुझे तो बस उनकी शक्ल देखके ही लगता है कि बन्दा धांसू लिखता तो रहा ही होगा , 'कूल डूड' भी रहा होगा | हालाँकि विकिपीडिया पर पढ़ा उनका जीवन चरित्र काफी दुःख भरा लगता है |

इस कबाड़ी कवि को कबाड़खाने का सलाम |

'सरोज स्मृति' जिसका एक अंश आज पोस्ट किया जा रहा है, निराला की बहुत भावुक रचना है, जो उन्होंने अपनी दिवंगत पुत्री सरोज के लिए लिखी थी |

ऊनविंश पर जो प्रथम चरण
तेरा वह जीवन-सिन्धु-तरण;
तनये, ली कर दृक्पात तरुण
जनक से जन्म की विदा अरुण!
गीते मेरी, तज रूप-नाम
वर लिया अमर शाश्वत विराम
पूरे कर शुचितर सपर्याय
जीवन के अष्टादशाध्याय,
चढ़ मृत्यु-तरणि पर तूर्ण-चरण
कह - "पित:, पूर्ण आलोक-वरण
करती हूँ मैं, यह नहीं मरण,
'सरोज' का ज्योति:शरण - तरण!" --


अशब्द अधरों का सुना भाष,
मैं कवि हूँ, पाया है प्रकाश
मैंने कुछ, अहरह रह निर्भर
ज्योतिस्तरणा के चरणों पर।
जीवित-कविते, शत-शर-जर्जर
छोड़ कर पिता को पृथ्वी पर
तू गई स्वर्ग, क्या यह विचार --
"जब पिता करेंगे मार्ग पार
यह, अक्षम अति, तब मैं सक्षम,
तारूँगी कर गह दुस्तर तम?" --

कहता तेरा प्रयाण सविनय, --
कोई न था अन्य भावोदय।
श्रावण-नभ का स्तब्धान्धकार
शुक्ला प्रथमा, कर गई पार!


धन्ये, मैं पिता निरर्थक था,
कुछ भी तेरे हित न कर सका!
जाना तो अर्थागमोपाय,
पर रहा सदा संकुचित-काय
लखकर अनर्थ आर्थिक पथ पर
हारता रहा मैं स्वार्थ-समर।
शुचिते, पहनाकर चीनांशुक
रख सका न तुझे अत: दधिमुख।
क्षीण का न छीना कभी अन्न,
मैं लख न सका वे दृग विपन्न;
अपने आँसुओं अत: बिम्बित
देखे हैं अपने ही मुख-चित।

सोचा है नत हो बार बार --
"यह हिन्दी का स्नेहोपहार,
यह नहीं हार मेरी, भास्वर
यह रत्नहार-लोकोत्तर वर!" --
अन्यथा, जहाँ है भाव शुद्ध
साहित्य-कला-कौशल प्रबुद्ध,
हैं दिये हुए मेरे प्रमाण
कुछ वहाँ, प्राप्ति को समाधान



:सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

Sunday, January 9, 2011

मैं तुम लोगों से दूर हूँ

मैं तुम लोगों से इतना दूर हूँ
तुम्हारी प्रेरणाओं से मेरी प्रेरणा इतनी भिन्न है
कि जो तुम्हारे लिए विष है, मेरे लिए अन्न है |

मेरी असंग स्थिति में चलता-फिरता साथ है,
अकेले में साहचर्य का हाथ है,
उनका जो तुम्हारे द्वारा गर्हित हैं
किन्तु वे मेरी व्याकुल आत्मा में बिम्बित हैं, पुरस्कृत हैं
इसीलिए, तुम्हारा मुझ पर सतत आघात है!!
सबके सामने और अकेले में |
(मेरे रक्त-भरे महाकाव्यों के पन्ने उड़ते हैं
तुम्हारे-हमारे इस सारे झमेले में)

असफलता का धूल-कचरा ओढ़े हूँ
इसलिए कि वह चक्करदार ज़ीनों पर मिलती है
छल-छद्म धन की
किन्तु मैं सीधी-सादी पटरी-पटरी दौड़ा हूँ
जीवन की |
फिर भी, मैं अपनी सार्थकता में खिन्न हूँ
विष से अप्रसन्न हूँ
इसलिए कि जो है उससे बेहतर चाहिए
पूरी दुनिया साफ़ करने के लिए मेहतर चाहिए
वह मेहतर मैं हो नहीं पाता
पर, रोज़ कोई भीतर चिल्लाता है
कि कोई काम बुरा नहीं
बशर्ते कि आदमी खरा हो
फिर भी मैं उस ओर अपने को ढो नहीं पाता |

रिफ्रिज़रेटरों, विटैमिनों, रेडियोग्रैमों के बाहर की
गतियों की दुनिया में
मेरी वह भूखी बच्ची मुनिया है शून्यों में
पेटों की आँतों में न्यूनों की पीड़ा है
छाती के कोषों में रहितों की ब्रीड़ा है

शून्यों से घिरी हुई पीड़ा ही सत्य है
शेष सब अवास्तव अयथार्थ मिथ्या है भ्रम है
सत्य केवल एक है जो कि
दु:खों का क्रम है |

मैं कनफटा हूँ हेठा हूँ
शेव्रलेट- डॉज़ के नीचे मैं लेटा हूँ
तेलिया-लिबास में, पुरज़े सुधारता हूँ
तुम्हारी आज्ञाएँ ढोता हूँ |

गजानन माधव मुक्तिबोध

Friday, January 7, 2011

परिंदे - अंतिम भाग

[पिछली किश्त से जारी]

अगले दिन मिस अर्चना, मीरा कुछ खाना लेकर आये | सुधीर रात भर अस्पताल में ही रहे | प्रोफ़ेसर उप्रेती के साथ वाले बिस्तर पर लेटे रहे | "अब कैसी तबियत है प्रोफ़ेसर उप्रेती की ?" मीरा ने पूछा | "अभी सो रहे हैं | रात भर कुछ -कुछ बोलते ही रहे | अभी जाकर सोये हैं |" सुधीर ने जवाब दिया | "डॉक्टर ने क्या कहा है ?" मिस अर्चना ने बैठते हुए कहा | "ठीक हैं | बस थोड़ा तनाव की वजह से | काफी कमज़ोर भी हो चले हैं, वजन सामान्य से काफी गिर गया है |" सुधीर ग्लूकोज़ की बोतल को खाली होते हुए देखता रहा | "तुम खाना खा लो" मीरा ने सुधीर की ओर खाने का डब्बा बढ़ा दिया | "कुछ रिपोर्ट्स आनी बाकी हैं , उसके बाद ही सही सही कुछ कहा जा सकता है |" सुधीर ने डब्बा मेज़ के ऊपर रखते हुए कहा | "ठीक है, अभी थोड़ी देर में स्वामी सर आयेंगे | वे रहेंगे प्रोफ़ेसर के पास | तुम खाना खा लो" अर्चना ने कहा | "यहाँ पौड़ी में धूप अच्छी आती है | थोड़ी चहल पहल रहती है तो महसूस होता है कि दुनिया में और लोग भी रहते हैं | मैं थोड़ा बाहर हो आती हूँ |" कहते हुए मीरा बाहर चली गयी |

"तुमने खाना खाया " सुधीर ने अर्चना की ओर देखकर पूछा | एक पल के लिए तुम कहना थोड़ा अजीब लगा, लेकिन अधूरी बात अधूरी नहीं रख पाया | अर्चना को अच्छा लगा, "नहीं, अभी नहीं |"
"तो आप भी अभी खा लो, काफी खाना रखा है मीरा जी ने |"
"तुम ही सही रहेगा |" मिस अर्चना मुस्कुराई |
सुधीर ने खाने के डब्बे को खोला | एक ख़ाली डिब्बे में आधी सब्जी डालकर अर्चना ने अपने पास ले लिया |
"क्या हम डॉली को खबर करें ?" अर्चना ने पूछा |
"मैंने पूछा था प्रोफ़ेसर से, उन्होंने मना किया |" खाने का कौर मुँह में डालते हुए सुधीर ने कहा |
"लेकिन...प्रोफ़ेसर की हालत...डॉली को पता तो होना ही चाहिए |" मिस अर्चना ने सुधीर को समझते हुए कहा, "क्या प्रोफ़ेसर ने साफ़ साफ़ मना किया ? तुमने पूछा या उन्होंने खुद कहा ?"
सुधीर खाना हाथ में लेकर रुक गए, "प्रोफ़ेसर रात भर डॉली के बारे में बात करते रहे | डॉक्टर बीच बीच में आके उन्हें चुप होने के लिए कह रहे थे | जब मैंने उनसे पूछा कि प्रोफ़ेसर क्या डॉली को यहीं बुला लें, तो उन्होंने मना कर दिया | इससे ज्यादा मैं पूछ नहीं सका |" धूप दरवाजे तक आ गयी थी | सुधीर ने दरवाजे की ओर देखा | अर्चना ने पीछे मुड़कर दरवाजे की तरफ देखा, कोई नहीं था | "क्या बात है ?" अर्चना ने सुधीर की ओर देखकर पूछा |
"नहीं, कुछ नहीं | क्या तुम पूरी सर्दियाँ यहीं रहोगी ? अभी तुम्हें कोई क्लास नहीं मिली है | छुट्टियों के बाद ही वो सब होगा... एक -डेढ़ महीने बाद |"
"हाँ ... तुम लोग भी तो यहीं हो |"

शाम को वापस ट्रांसिट आकर सुधीर अपने कमरे में लेट गए | चाय पीने का मूड हुआ, उठकर बोयज़ हॉस्टल की ओर जाने लगे | होस्टल की ओर जाने वाली पगडण्डी से एक पल रूककर मेंढक पहाड़ी की ओर देखा, हम शापित लोग हैं , मन ही मन सोचा और फिर आगे बढ़ गए | बोयज़ हॉस्टल में फिफ्थ सेमेस्टर के ही कुछ स्टुडेंट रह गए थे | कुछ स्टुडेंट सुधीर के पास आये, वे प्रोफ़ेसर उप्रेती की तबियत के बारे में जानना चाहते थे | सुधीर का ध्यान बार बार भटक कर प्रोफ़ेसर के कहे वाक्य पर अटक रहा था कि हम शापित लोग हैं | डॉक्टर तुम यहाँ से कहीं और चले जाओ, और अर्चना को भी ..."वे ठीक हैं , कुछ ही दिनों में वापस आ जायेंगे |" सुधीर ने जल्दी से कहा | सुधीर को ऐसा लगा कि जाने से पहले उन्होंने उसे अविश्वास से देखा हो | रमेश को चाय बनाने को कहकर सुधीर एक खाली टेबल पर बैठ गए | हॉस्टल मेस पूरी तरह खाली थी | आज आखिरी पेपर ख़त्म होने के साथ आधे से ज्यादा हॉस्टल खाली हो चुका था | कल सारे लड़के चले जायेंगे | फिर हॉस्टल मेस बन्द हो जायेगी , सुधीर को अपने खाने का इंतजाम बाहर कहीं किसी होटल में करना होगा | सारे टीचर्स भी कल चले जायेंगे | दासगुप्ता सर ने भी सामान पैक कर लिया था, इंदिरा के विरोध के बावजूद | हम शापित लोग हैं ... स्माल सेल लंग कार्सिनोमा ... उफ़ |

तीन साल तक लंग कैंसर से लड़ने के बाद आखिर प्रोफ़ेसर ने अपनी लड़ाई रोक दी | डॉली से लड़ाई भी प्रोफ़ेसर जारी नहीं रख सके, उन्हें बुला लिया गया | प्रोफ़ेसर ने शोभा से दूसरी शादी की थी | डॉली , प्रोफ़ेसर की पहली पत्नी से हुई बेटी थी | अनुपमा, जिसे प्रोफ़ेसर ने तलाक़ दिया था | कुछ दिनों बाद, अनुपमा का शव पंखे से लटकता हुआ पाया गया | डॉली को प्रोफ़ेसर अपने पास लेकर आ गए | जिंदगी भर इस अपराधबोध से प्रोफ़ेसर मुक्त नहीं हो सके | शोभा ने बाद में डॉली को सब कुछ बता दिया था , जिसके बाद डॉली ने कभी प्रोफ़ेसर को माफ़ नहीं किया | अपनी माँ के नाम पर ही अनुपमा नाम डॉली ने अपना लिया |

देहरादून में ही प्रोफ़ेसर का अंतिम संस्कार करना निश्चित हुआ | मुखाग्नि देने के लिए सुधीर से कहा गया | सुधीर की यादों में अभी प्रोफ़ेसर की बातें चल रही थी | स्वामी को ये सब मत बताना, अर्चना और तुम भी कहीं और चले जाना | अर्चना का हाथ थामकर प्रोफ़ेसर बच्चों की तरह रोये थे, "मुझे माफ़ कर देना अनुपमा |"
शव आधा जल गया था | दहक वातावरण में अभी थी | सुधीर बोझिल क़दमों से पीछे पीछे हटे |
तीन दिन बाद राख ली जाती है | सुधीर ने अस्थियों को एक घड़े में भरा, और अनुपमा को दे दिया | राख के एक एक टुकड़े में प्रोफ़ेसर के होने का अहसास था | यार डॉक्टर, यहाँ पहाड़ों में अपनी जिंदगी खराब मत करो | हम लोग तो दुनिया से भागे हुए लोग हैं, तुम क्यूँ भाग रहे हो | राख जैसे पूरे शरीर में चढ़ती जा रही हो |

"पौड़ी!!! पौड़ी!!! " ऋषिकेश बस अड्डे पर पौड़ी की बस तैयार खड़ी थी , कंडक्टर हर आने जाने वाले से पूछ रहा था | सुबह के चार बजे थे | "भेजी, कहाँ जाना है ?" कंडक्टर ने सुधीर को हिलाकर पूछा | "पौड़ी" सुधीर की आँखें कहीं और देख रही थी | "वो वाली में बैठ जाओ |" कंडक्टर ने कहा | सुधीर जाने लगे तो कंडक्टर फिर से चिल्लाया - "अरे भैजी! इधर इधर |" जब ध्यान देने के बाद भी उसने देखा कि सुधीर के कदम कहीं के कहीं जा रहे हैं | उसने मन ही मन कुछ अंदाजा लगाया, भागकर आया | "भेजी ?" सुधीर की अधमुंदी आँखों में देखने लगा | हाथ पकड़ने की कोशिश की तो सुधीर ने हाथ में रखी प्लास्टिक की थैली अपने से सिमटा ली, जैसे कंडक्टर उससे वो थैली छीनना चाहता हो | उसने हाथ पकड़कर सुधीर को बस के अन्दर बिठा दिया | मन्दिर वाले बाबाजी आखिरी दिनों में चल नहीं पाते थे , जमीन पर घिसट घिसट कर चलते थे | "अर बेटा! सुना दे जरा गीता सार |"
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतं |
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ||

"भाईसाहब !" कंडक्टर ने सुधीर को हिलाया, "आपकी तबियत तो ठीक है ?" सुधीर को याद आया, बाबाजी के साथ एक औरत रहती थी | माँ से उसने पूछा कि वो कौन है | वो उनकी चेरी है, माँ ने कहा | सुधीर को लगा कि पत्नी को कहते होंगे | ये तो उसे काफी दिनों बाद पता चला कि चेरी उस लड़की को कहते है, जो किसी बाबा के साथ भाग आई होती है |
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे |
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिता: ||

कंडक्टर ने सुधीर का माथा छुआ "शायद थोड़ा ज्वर है आपको, बस थोड़ी दूर और है आपका कॉलेज | कॉलेज के टीचर हैं न आप ?" सुधीर ने ठंडा हाथ अपने माथे पर महसूस करके आँखें खोली | "हाँ, हाँ कॉलेज ही जाना है | आया क्या ?" कंडक्टर ने तसल्ली जैसे देते हुए कहा , "बस थोड़ी दूर है |"

"आ गया भाई साहब ! आपका कॉलेज |" कंडक्टर ने सुधीर को जगाया, "तबियत ठीक है अब आपकी ?" "हाँ मैं ठीक हूँ |" सुधीर ने उनींदी आखों से बाहर देखा | फिर तेजी से बस से उतर गया | कॉलेज दिखायी दे रहा था, सर्द बैगनी छाँव में | कॉलेज के आसपास का पूरा गाँव धूप में नहाया हुआ था | तेज तेज क़दमों से सुधीर चलना लगा | "चलो " पीछे से कंडक्टर की आवाज आई , और बस आगे बढ़ गयी | सुधीर ने अपने को स्वस्थ महसूस किया | कदम आगे बढ़ाया ही था कि माथे में भयंकर पीड़ा शुरू हो गयी | "गुड मोर्निंग सर |" रमेश मफलर पहने हुए सामने खड़ा था | "सर , आप बड़ी जल्दी आ गए | सामान नहीं लाये |" उसने पूछा | सुधीर को याद आया कि उसके साथ कोई सामान नहीं है | "सर!" रमेश पीछे से चिल्लाता रह गया | कॉलेज के गेट के बगल से एक छोटी सी पगडण्डी थी | सुधीर उसी पगडण्डी पर चलने लगे | बस थोड़ी दूर और, सुधीर अपने आप से कहते जा रहे थे | थकान बढती जा रही थी , सुधीर को महसूस होने लगा था कि उन्हें ज्वर है | पगडण्डी मेंढक पहाड़ी के पास जाकर सर्पिलाकार तरीके से मुड़ गयी | जिससे वो रास्ता खत्म होने का आभास से रही थी | पहाड़ी के सिरे पर पहुंचकर सुधीर ने इधर उधर घूमकर देखा | फिर जल्दी से थैले को उलटकर राख हवा में उछाल दी | सुधीर को काफी हल्का महसूस हो रहा था मानों इस राख के साथ उसने अपने अस्तित्व का कुछ टुकड़ा भी हवा में बिखेर दिया हो | राख उड़ती हुई घाटी से नीचे गिर रही थी, इस उम्मीद में कि कभी हवा में उड़ते हुए वो शायद चौखम्भा पहुँच जाए | वो राख को देखता रहा, हम शापित लोग हैं |


can we do nothing for the dead ? And for a long time the answer had been - nothing! - Katherin Mansfield


: निर्मल वर्मा के लिए

Thursday, January 6, 2011

परिंदे - तीसरा भाग

[पिछली किश्त से आगे]

"जब मैं छोटा था तो सोचा करता था कि पहाड़ों में कहीं मेरा एक छोटा सा घर होगा , जिसमे मैं दिन भर बैठा हुआ विओलिन बजाता रहूँगा |" प्रोफ़ेसर हल्के से हँसे, हाथ सर के पीछे ले जाकर बोले - "अब देखो, घर तो नहीं लेकिन सरकारी कमरा है मेरे पास , जिसमे दिन भर मैं अपने अकेलेपन की विओलिन बजाता रहता हूँ |" सुधीर चुपचाप इस एकालाप को सुनता रहा | धूप खिली हुई थी | तीन दिन हलकी बारिश के बाद आज धूप निकली थी | "यार डॉक्टर ! जीने का मजा तो अकेलेपन में है | है नहीं ?" प्रोफ़ेसर ने धूप में आँखे मिचमिचाते हुए कहा | "जी सर !" सुधीर ने कहा | "रेगिस्तान में चलते रहो , धूप में , न किसी मंजिल की तलाश न कहीं कोई पड़ाव , बस एक सफ़र हो | सफ़र भी ऐसा जिसका कोई नतीजा नहीं निकलना हो , बस एक सफ़र हो , ना आगे कुछ , ना पीछे |" प्रोफ़ेसर ने हथेलियों को आँखों के ऊपर रख लिया , "धूप में आँखें बन्द करो तो नारंगी रंग दिखायी देता है | जोर से पलकों को दबाओगे तो वही रंग काला पड़ जाता है |" आँखें खोलकर उन्होंने गहरी साँस ली | "वो सामने चौखम्भा है न ?" उन्होंने ऊँगली से इशारे किया | सुधीर अनमने भाव से उनकी बात सुन रहा था | अचानक मुड़ कर देखा, बोला "हाँ" | "कभी चलें क्या वहाँ पे ?" प्रोफ़ेसर ने पूछा | सुधीर हल्के से मुस्कुरा दिया | "अरे वाकई ! चलते हैं कभी | कितनी खूबसूरत जगह है वो |" "कब चलना है ?" सुधीर ने पूछा | "यार ! चलते हैं कभी , मई जून में | अगले सेमेस्टर एंड पे" प्रोफ़ेसर पूरे विश्वास से बोले | जेब से सिगरेट निकाली ही थी , कि सुधीर उनकी ओर देखने लगा, " प्रोफ़ेसर! एक दिन में दो , केवल | उससे ज्यादा नहीं |" प्रोफ़ेसर मुस्कुराये - "अरे यार ! आज मौसम अच्छा है |" थोड़ी देर सोचकर बोले , "स्वामी को मत बताना , नहीं तो साला बखेड़ा खड़ा करेगा |" अचानक प्रोफ़ेसर जैसे सोते से जगे, "आज तारीख क्या है ?" "पंद्रह दिसंबर" सुधीर ने हाथ में पकडे हुए अख़बार के उपरी हिस्से में तारीख देखकर उसमे दो जोड़कर बता दिया | "अरे यार ! कल तो मेकैनिकल का जरूरी पेपर है |" ट्रांसिट की ओर जाती सड़क पर दो लड़कों को टहलते हुए देखा , "अरे सुनो ! मेकैनिकल के किसी लड़के को भेज देना यहाँ , जल्दी |" वे दोनों उलटे कदम वापस होस्टल की ओर चल दिए |

मीरा (स्वामीजी की पत्नी) और मिस अर्चना बैठे हुए बात कर रहे थे | प्रोफ़ेसर उप्रेती के आते ही दोनों चुप हो गए | "स्वामी कहाँ है ?" प्रोफ़ेसर ने पूछा | "आज सुबह से ही मुझसे नाराज हैं | मुझे लगा कि शायद आपके पास गए होंगे |" मिसेज स्वामी ने जवाब दिया | " अरे मेरे पास तो नहीं आया |" प्रोफ़ेसर कुछ सोचते हुए वापस जाने लगे | "अंकल , पापा बहुत गुस्से मे थे |" जाह्नवी ने पास आकर कहा | "अरे तेरा पापा तो ऐसे ही नाराज होता रहता है | अभी तेरे से भी छोटा है वो |" प्रोफ़ेसर ने उसकी नाक को छूकर कहा | जाह्नवी हँसने लगी, घर के अन्दर भाग गयी | "सर , जाह्नवी की पढाई भी रुक रही है यहाँ | देहरादून में कुछ दिन मम्मी के पास जाना चाहती हूँ , उसके बाद जाह्नवी को बोर्डिंग स्कूल में डाल देती |" मीरा अपनी भड़ास निकाल रही थी , स्वामी ने जरूर ये सब सुनने से मना कर दिया होगा, प्रोफ़ेसर ने मन में सोचा | "ठीक है ! मैं देखता हूँ | शायद मेरे ही रूम पे गया होगा वो |" प्रोफ़ेसर ने मीरा को तसल्ली देने की कोशिश की | "मुझे जाह्नवी के करियर की बेहद चिंता होती रहती है | अगर यहाँ रहेगी तो ..." प्रोफ़ेसर जाना चाहते थे लेकिन मीरा की बातें मानों आज ही ख़त्म होना चाहती हों, "आपने सही किया था सर, जो डॉली को पढ़ने के लिए दिल्ली भेज दिया था | सुना है डॉली अब बाहर जाने वाली है |" प्रोफ़ेसर को अचानक अपनी साँस फूलती सी लगी, वहीं सीढ़ी पर बैठ गए - "हाँ ! जर्मनी जा रही है, दो महीने के लिए | कुछ रिसर्च फेलोशिप का मामला है | " मीरा "बहुत अच्छा है | बहुत तरक्की मिली है बेटी को | हमारी जाह्नवी जितनी थी , जब गयी थी न ? उसका चेहरा अभी भी याद आता है |" प्रोफ़ेसर जल्दी से बोले - "मीरा , मैं अभी स्वामी को ढूंढ के लाता हूँ | तुम बैठो |" तेज क़दमों से बाहर निकल गए |

कॉलेज होस्टल से पीछे के रास्ते से सीधा सीधा उतर जाओ तो सामने कई छोटे मंझोले खेत दिखाई देते हैं , जो जानवरों को चराने के ज्यादा काम आते हैं | उसी पर बनी हुई पगडण्डी चलते हुए एक छोटी पहाड़ी के पास से गुजरती है | दूर, हॉस्टल से ये पहाड़ी एक मेंढक के मुँह जैसी लगती है | लोग इसे मेंढक पहाड़ी कहते हैं | इसी पहाड़ी के दूसरे छोर पर , जहाँ गहरी खाई है, स्वामी बैठे हुए दिखायी दिए | प्रोफ़ेसर चुपचाप जाकर उनके साथ बैठ गए | " प्रोफ़ेसर यार ! हम शापित हैं , हीदन देवताओं का सोना चुराने वाले समुद्री लुटेरों की तरह | न हम जी सकते हैं , न मर सकते हैं | है न ?" स्वामी प्रोफ़ेसर की ओर देखकर मुस्कुराये | प्रोफ़ेसर ने आश्वस्त भाव से स्वामी की बात को सुना , जवाब देना ही चाहते थे कि यकायक चुप हो रहे , धीरे से इतना ही कहा , "स्वामी |"
"पहले डॉली, अभी जाह्नवी | हम लोग, ऐसा लगता है जैसे विस्थापित लोग हैं | अतीत से विस्थापित, भविष्य में हमारे लिए कोई जगह नहीं |"
"क्या तुम सेल्फिश होना चाहते हो ?" प्रोफ़ेसर ने पूछा |
स्वामी ने मुँह फेर लिया, सामने पहाड़ियों पर बादल उतर आये थे | आँखों में धुंध गहराने लगी थी, "प्रोफ़ेसर , तुम रिटायर कब होने वाले हो ?"
"दो या तीन साल में , क्यूँ?" प्रोफेसर खुश हुए कि स्वामी ने विषय बदल दिया है |
"नहीं , मैं सोच रहा हूँ कि तुम उसके बाद क्या करोगे ?"
प्रोफ़ेसर उप्रेती से कुछ कहते न बना, ज़मीन पर उगी घास को उखाड़ने लगे | पहाड़ी से नीचे अलकनंदा बहती हुई दिखायी दे रही थी | पानी से उठती हुई भाप ने उसके किनारे बसे छोटे कसबे को अपने में समेट लिया था | पहाड़ी कस्बों की अपनी कोई इच्छा नहीं होती | एक तरफ पहाड़ और दूसरी तरफ पानी , उनकी रोजमर्रा के जीवन की दिशा तय करते हैं | पहाड़ और पानी , बारहों महीने ठण्ड सहते सहते, ठिठुरते हुए पहाड़ | पानी बर्फ बनकर जम सकता है , पहाड़ वो भी नहीं कर सकते | पहाड़ सिर्फ टूट सकता है |

"सुधीर ! दरवाजा खोलो |" दासगुप्ता सर दरवाजे को लगातार पीट रहे थे | सुधीर अचानक चौंककर उठे | बाहर जाकर देखा, दासगुप्ता सर दरवाजे के बाहर खड़े हैं | "प्रोफ़ेसर की तबियत खराब हो गयी है | उनको लेकर पौड़ी जाना है | चलो |" सुधीर और दासगुप्ता तेज क़दमों से चलते हुए ट्रांसिट के बाहर के मैदान में गए | हल्के हल्के रुई के फाहे जैसे आसमान से बूँदे गिर रही थी | इंदिरा और मीरा बाहर मैदान में एक ओर बैठे हुए थे | कुछ और टीचर भी एक एक झुण्ड सा नियत करके उसमे शामिल थे | "स्वामी सर कहाँ हैं ?" सुधीर ने इधर उधर घूमकर पूछा | "कॉलेज की एम्बुलेंस लेने गए हैं | प्रोफ़ेसर ने तुम्हें बुलाया था |" दासगुप्ता धीरे से सुधीर के कान में बोले , "कुछ कहना मत, बस सुनते जाना उनसे |" सुधीर एकाएक डर से गए, माँ ने एक बार ऐसे ही बुलाकर दादा के पास भेजा था, फिर कान में कहा कि कुछ कहना मत, बस सुनते जाना | सुधीर एकटक दासगुप्ता सर को देखते रहे, दादा को सुधीर ने फिर कभी अपने सामने नहीं देखा |

प्रोफ़ेसर सो रहे थे, या शायद थक गए थे | थकान से आँखें मूँद लीं थी | सुधीर बिना कोई आवाज किये आये, अर्चना ने चुप रहने का इशारा करके कुर्सी पर बिठा दिया | "सुधीर !" प्रोफ़ेसर ने हलकी सी आहट भांप ली | "जी सर !" सुधीर चौकन्ने से हो गए | "थोड़ा देखके चलना आगे फिसलन है |" प्रोफ़ेसर बड़बड़ाये | सुधीर ने बहुत ध्यान लगाकर सुनने की कोशिश की | "ये कौन है ?" प्रोफ़ेसर ने अचानक आँखें खोल दी | "मैं हूँ...सुधीर " सुधीर ने फिर से जवाब दिया | "सुधीर, तुम्हारे पास माचिस है ?" प्रोफ़ेसर ने पूछा | "यस सर !" सुधीर ने जवाब दिया | "दिया जला दो, एक अगरबती |" प्रोफ़ेसर ने अपना कमरा समझकर भगवान के आले की ओर इशारा किया | अर्चना अल्मिरा से एक अगरबत्ती लेकर आई और सुधीर को दे दी | सुधीर ने अगरबत्ती जलाकर प्रोफ़ेसर के सिरहाने रख दिया | प्रोफ़ेसर ने राहत की साँस ली , "हाँ, अब आराम है | शोभा , ये तकिया हटा दो |" प्रोफ़ेसर ने अर्चना को शोभा कहकर संबोधित किया | अर्चना चौंकी, पास नहीं गयी | सुधीर ने पास आकर तकिया हटा दिया | "शोभा ! तुम डॉली को लेकर...बस कुछ दिन की तो बात थी ... उसके बाद मैं ..." प्रोफ़ेसर अचानक चुप हो गए, "सुधीर ? ये तुम हो क्या ?"
"जी सर! क्या बात है ?" सुधीर ने पूछा | प्रोफ़ेसर चुप रहे | "सर ?" सुधीर पास आये | "नहीं, कुछ नहीं" प्रोफ़ेसर झल्लाकर बोले, "मैं ठीक हूँ | चलो, मैं चलता हूँ |" ये कहकर प्रोफ़ेसर चुपचाप लेट गए | थोड़ी देर बाद उठकर बोले - "सुधीर ! चौखम्भा चलेंगे हम, ठीक है ?" सुधीर ने हाँ में सर हिला दिया |

- क्रमश:

Wednesday, January 5, 2011

श्राद्ध के दिनों में

गगन गिल की ये कविता स्त्री के एकाकीपन और उसके दुखों को एक अलग ही आयाम तक ले जाती है.कविता पढ़े जाने के बाद भी कई बार लौट लौट कर आती है. आप भी पढ़ें इसे.

श्राद्ध के दिनों में - गगन गिल

कभी कभी आकाश से
हमारी मांएं उतर आतीं थी.
हम पिताओं का तर्पण करते
उनके लिए नाना भोजनों की गंध
देवलोक में भेजते
मांएं हमारी निचले आकाशों में
हमारी प्रार्थनाओं की अनुपस्थिति में
मंडराती होतीं.
हम उनकी शांति की चिंता नहीं करते थे
और सोचते थे उन्‍हें भी शांति पाने की
ऐसी जल्‍दी न होगी.
पिताओं को भोज पर आने में
देर लगती थी
ऐसा लगता वे दूसरे लोकों में
सुख से हैं
भोजन समाप्‍त करते हुए
वे हमारे चिंतित चेहरे देखते
उसी उदासीनता से
जो उनमें जीवित र‍हते समय थी
मांओं को हम नहीं परोसते थे
हालांकि वो वहीं होतीं थीं
पिताओं की थाली के पास.
शांति के लिए हम भटकते थे
हमारी मांएं भटकती थीं
लेकिन तर्पण हम
पिताओं का ही करते थे.

परिंदे - दूसरा भाग

[पिछली किश्त से आगे]

अगले दिन दरवाजे पर हुई थाप से सुधीर यकबयक चौंक कर उठा | दरवाजा खोला तो प्रोफ़ेसर और मिस अर्चना खड़े थे | "जन्मदिन की बहुत बहुत बधाई हो भई डॉक्टर " प्रोफ़ेसर ने हाथ आगे बढ़ाया
सुधीर अभी उन्नींदा सा ही था, "लेकिन आप लोगों को कैसे पता चला ?" प्रोफ़ेसर एक ओर को हट गए
"हमें तो हमारी स्लैम बुक से पता चला है |" मिस अर्चना ने हाथ आगे बढ़ा लिया |
सुधीर ने बढ़कर हाथ मिलाया,"मिस ! इतनी पुरानी चीजें आपने रखी हुई हैं ? और आपको मेरा जन्मदिन भी याद है उसमे ?"
सुधीर को याद आया कि बहुत सारे जूनियर मिस अर्चना के काफी प्रशंसक थे | और उन्होंने ही मिस अर्चना से अनुरोध करके उनकी स्लैम बुक भरी थी |
"तुम भी क्या मिस मिस लगाये रहते हो यार |" प्रोफ़ेसर ने जैकेट की जेब में हाथ डाल लिए थे | सुधीर की तन्द्रा टूटी, ध्यान आया बरामदे में ठंडी हवाएं चल रही हैं |
"अन्दर आ जाइए |" सुधीर ने एक ओर हटते हुए कहा, "आदत नहीं जाती सर, शुरू से ही मिस कहते रहे हैं |"
मिस अर्चना और प्रोफ़ेसर उप्रेती अन्दर आकर बिस्तर पर बैठ गए (घर में कुर्सियां नहीं है) | "हाँ सुधीर ! और तुम्हारा वो हाँजी हाँजी करना भी | क्या पंजाबियों की तरह हिंदी बोलते हो |"
सुधीर खिसिया गए, "ठीक है मिस , अब से नहीं बोलूँगा |"
प्रोफ़ेसर ने दो दिन पुराना अखबार उठा लिया, "सुधीर तुम्हारा कमरा तो बाकी ट्रांसिट से भी ठंडा है | अरे यार, कुछ बंदोबस्त करो हीटर वगैरह का |" अर्चना ने गंभीर भाव से कहा - "अरे! दासगुप्ता सर को बोल दो , बोयज़ होस्टल से जब्त कर लेंगे तुम्हारे लिए भी |" प्रोफ़ेसर और सुधीर हँसने लगे, अर्चना ने दोनों की ओर देखा, "अरे सही में |" प्रोफ़ेसर उप्रेती दासगुप्ता को बेहद पसंद करते थे , "दासगुप्ता थोड़ा शरारती सा है, लेकिन अच्छा टीचर है |"
सुधीर ने उनकी ओर अविश्वास से देखा | "अरे मानों भई !" प्रोफ़ेसर सुधीर का असमंजस समझ गए थे, "दासगुप्ता साला अपनी इमेज सही नहीं रखता , पता नहीं क्यूँ |"
"दासगुप्ता सर ने प्रेम विवाह किया है न ?" अर्चना ने जिज्ञासा रखी |
"हाँ , मिस आपके ही बैच की हैं, कंप्यूटर साइंस ब्रांच से हैं, मिस इंदिरा सेन |"
"वो मिस नहीं , मिसेज हैं अब |" प्रोफ़ेसर ने टोका | "इंदिरा सही स्टुडेंट थी सी एस के टॉप लोगों में से थी | लेकिन टीचर से शादी ..." अर्चना ने अपने शब्दों को रोक दिया |
"दासगुप्ता ने सारा मामला बहुत अच्छी तरह संभाला था | उसके घर से मंजूरी नहीं मिली थी , हम लोगों ने उसकी शादी करवाई थी | स्वामी ने लड़की का कन्यादान किया था |" प्रोफ़ेसर हौले से हँसे, "तो आज क्या करने का प्लान है भई?" सुधीर ने बारी बारी से दोनों की ओर देखा, कुछ समझ नहीं आने पर कह दिया, "कुछ नहीं सर |"
"अरे ऐसे कैसे कुछ नहीं | आज कुछ मीठा तो बनाना होगा | मन्दिर में प्रसाद चढ़ाना चाहिए |" मिस अर्चना अपनी लय में बोलती जा रही थी | सुधीर को माँ का स्मरण हो आया | हर जन्मदिन पर फ़ोन करके ये दोनों चीजें प्राथमिकता में गिनवाती, मन्दिर में प्रसाद, घर पर मीठा | इन सब से जिंदगी की कड़वाहट शायद थोड़ी कम होती हो , सुधीर ने मन ही मन सोचा |
"अरे कहाँ खो गए ?" अर्चना ने सुधीर के कंधे पर हाथ रखा, "मैं कह रही थी कि इन सबसे जिंदगी में थोड़ी मिठास घुलती है |" सुधीर हँस दिए, लड़कियों की आदत एक जैसी होती हैं, माँ जैसी |
"तुम्हारा जन्मदिन भी बड़े अच्छे दिन आया है, आज मुझे मन्दिर जाना है | तुम भी चलो " मिस अर्चना के स्वर में सुधीर को हमेशा एक आदेश का भान रहता है |
"नहीं , मिस .. मन्दिर के लिए तो मुझे माफ़ ही करो " सुधीर ने कहा |
"अच्छा ? क्यूँ भई ?" प्रोफ़ेसर ने पूछा जिसका सुधीर ने कोई जवाब नहीं दिया |
"तुम आखिरी बार मन्दिर कब गए थे ?" मिस अर्चना ने पूछा |
"याद नहीं पड़ता | ऐसा नहीं कि भगवान से कोई दुश्मनी हो, बस वहाँ अन्दर रहा नहीं जाता |" सुधीर ने अपना बचाव किया | "ठीक है, फिर तुम अन्दर मत आना, बाहर से ही पूजा करना | वैसे भी यहाँ मन्दिर में एक साथ सिर्फ दो ही आदमी अन्दर रह सकते हैं | तुम अन्दर आ जाओगे तो पुजारी को बाहर खड़ा होना पड़ेगा |" मिस अर्चना मुस्कुरायी | सुधीर ने अब प्रतिरोध करना छोड़ दिया |

आज माता के मन्दिर की ओर जाने वाले काफी लोग ट्रैकरों का इंतज़ार कर रहे थे | कुछ लोग पैदल ही चलने लगे | "सुधीर ! पैदल चलें ? तुम चल लोगे ?" अर्चना ने सुधीर की ओर देखा | आसमानी लिबास में बेहद हल्के रंग का दुप्पटा हवा में उड़ रहा था | "हाँ जी | हम तो कॉलेज टाइम में पौड़ी तक पैदल ही निकल जाते थे |" सुधीर मुस्कुराया | "अच्छा ?" अर्चना को आश्चर्य हुआ | माथे पे उड़ रही अलकों को कान से पीछे करती, और दूसरे हाथ से दुप्पटे को उड़ने से बचाती अर्चना को देखकर सुधीर ने मदद का प्रस्ताव किया | "मिस, आप चाहें तो मैं आपकी ये पूजा की डलिया पकड़ लूँ ?" सुधीर ने हाथ आगे बढ़ाया | "ओह , श्योर , थैंक यू |" मिस अर्चना ने डलिया सुधीर की ओर बढ़ा दी | जल्दी में सुधीर की उँगलियाँ उनकी उँगलियों से छू गयी | "ओह माय ... तुम्हारी उँगलियाँ इतनी ठंडी क्यूँ है ? अरे खून नहीं है क्या शरीर में ?" अर्चना ने सुधीर को झिड़का , "देखो, यहाँ सही से खाना खाया करो , नहीं खाओगे तो वजन गिरने लगेगा |" "जी मिस " सुधीर से कुछ कहते न बना | "अपने हाथ जैकेट के अन्दर रखो " अर्चना ने दुबारा आदेश दिया | सुधीर ने चुपचाप बाँया हाथ जेब में रख लिया , और दाहिने की उँगलियाँ भी जेब में डाल ली | सामने एक नवविवाहिता चल रही थी, उसकी बाजुओं तक भरी लाल चूड़ियाँ बार बार खनक रही थी | उसी के आगे एक प्रौढ़ा थी, जो संभवत उसकी सास थी | जरा सा हट कर चलता युवक उसके कान में कुछ कहता और वो हौले से हँस देती | युवक ने थोड़ा सा पीछे हटकर, युवती से डलिया अपने हाथ में ले ली, और दाहिने हाथ से युवती का हाथ कसकर पकड़ लिया | वो थोड़ा कसमसाई , लेकिन फिर दाहिना हाथ भी उसने अपने बाँयें हाथ से मिला लिया | "तुम्हारा शादी करने का कोई इरादा भी है या ... ?" मिस अर्चना ने सुधीर से पूछा | सुधीर झेंप गए , मिस ने उन्हें सामने चल रहे विवाहित युगल को देखते हुए पकड़ लिया है शायद |
"पता नहीं मिस |"
"कभी कोई लड़की पसंद नहीं आई ?"
"आई थी मिस" सुधीर को अपने बेबाकी पर खुद भी आश्चर्य हुआ |
"फिर?"
"बस , जब तक मैं इंजीनियरिंग पूरी करता उसकी शादी तय हो गयी थी |"
"ओके !"
"हमारे यहाँ तो आप जानती ही हैं मिस कि एक बार लड़की की शादी तय हो गयी , इसका मतलब कि शादी हो ही गयी | फिर कुछ कहना सुनना बाकी नहीं रह जाता |"
"हूँ ..." मिस अर्चना अपने पैरों की ओर देखने लगी | पहाड़ी का ये मोड़ अन्दर की ओर था इसलिए हवा लगनी बन्द हो गयी थी, लेकिन काफी ठंडा और प्रकाश भी थोड़ा कम था |
अचानक से एक जीप उनके बगल में रुकी | उन्होंने मुड़कर देखा तो दासगुप्ता जीप से मुँह बाहर किये दिखाई दिए, "अरे मैडम, अरे सुधीर | आओ आओ, जगह है थोड़ी इसमें |" फिर मुड़कर अपने साथ वाले लोगों से विनय की, "भाईसाहब! आप कृपया पीछे बैठ जाएँ |" एक साधारण सा ग्रामीण इस विनम्र निवेदन से पानी पानी हो गया | जल्दी से उतर कर पिछली सीट पर चला गया | दासगुप्ता और उनकी पत्नी एक ओर, एक आदमी दांयी ओर बैठा था | सुधीर और मिस अर्चना बीच में एक आदमी की सीट पर बैठ गए | इंदिरा अर्चना से बातचीत का सिलसिला बढ़ने लगी | पुरानी बातों, और यादों को, ताजा करते, और हँसते रहते | दासगुप्ता बोले, "हाँ अर्चना, कैसा लग रहा है तुमको यहाँ ?"
"सर, पूरे चार साल यहीं गुज़ारे थे , कोई पहली बार थोड़े ही आई हूँ |"
"हाँ सो तो है , लेकिन फिर भी , काफी चेंजेज भी तो हुआ है इधर |"
"नहीं सर , कुछ भी तो नहीं बदला है | वही सर्दियाँ हैं, वहीं हम हैं |"
"पिछले साल हम यहीं रुके थे , बर्फ पड़ी थी , इस साल भी पड़ेगी न ?" इंदिरा ने दोनों हाथो को रगड़ना शुरू कर दिया जैसे पिछली बर्फ़बारी की याद आने से ही ठण्ड ज्यादा तेज़ लगने लगी हो |
"अभी फिफ्थ सेमेस्टर के एक्साम बाकी हैं , तब तक तो हम यहीं है |" दासगुप्ता ने मुस्कुराके इंदिरा की ओर देखा |
"इस बार भी यहीं ... रहते हैं न ..."इंदिरा साफ़ तौर पर नाराज दिख रही थी |
"देखेंगे" कहकर दासगुप्ता सर पहाड़ियों पर उग रहे सूर्य को देखने लगे |

सुधीर बाहर खड़े हो गए | मिस अर्चना ने अन्दर बुलाया तो नहीं आये | "भगवान को नहीं मानते हो क्या ?" मिस अर्चना ने दबी जुबान में गुस्से से कहा | "मानता हूँ |" सुधीर ने जवाब तो दिया लेकिन मन की कशमकश नहीं ख़त्म कर पाए | हाथ जोड़ दिए , लेकिन मन या आँखों में कोई भाव प्रकट न हुआ | अर्चना ने दुपट्टे का एक छोर सर पे रख लिया, पूजा का नारियल गर्भ-गृह में बैठे पंडित जी को दिया | धूप के तीन चार बत्तियां बनाकर जला लीं | अगरबत्तियां और धूप पहले से ही काफी जली हुई थी, फिर और धुंआ करके क्या... | सुधीर हाथ जोड़े हुए सोचते जा रहे हैं | माँ होती तो हाथ पकड के मन्दिर के अन्दर लेके जाती | उस दिन भी जब मैं गुस्सा होता था, किसी चीज को पाने की जिद करने के लिए | मेरा सबसे आसान तरीका होता था रोते रोते सड़क पर लेट जाना | माँ हँसती, कहती ठीक है लेकिन मन्दिर के अन्दर तो चल ले पहले | मन्दिर के अन्दर ही एक घर में बहुत बूढ़े बाबाजी रहते , जिनकी उम्र मुझे सौ साल की लगती | वे मुझे खूब सारे फल खाने को देते और मैं उनके मन्दिर में कहीं भी घूम सकता था | बस बदले में मुझे मन्दिर में आये लोगों को गीता सार सुनाना होता | मन्दिर से बाहर आते आते मैं भूल जाता कि मैं किस चीज़ के लिए जिद कर रहा था, और माँ का हाथ थामकर उछल उछल कर एक के बाद एक बातें बनाने लगता | माँ, भैया कहता है कि ... "प्रसाद ले लो ! कब तक हाथ जोड़े खड़े रहोगे ?" अर्चना की आवाज सुधीर के कानों में पड़ी | सुधीर की तन्द्रा टूटी, लोग जाने की तैयारी में हैं | सुधीर ने प्रसाद लेने के लिए हाथ बढ़ाया | "अरे मुझसे नहीं , पंडित जी से ले लो | फिर तुम्हें सबको बाँटना है, आज तुम्हारा जन्मदिन है न |"

सुधीर अपने कमरे में लेटे हुए छत को घूर रहे थे | दोपहर का वक़्त होने के बावजूद कमरे में अँधेरा था , सर्दियों की वजह से दीवारों में सीलन थी | छत पर पानी से बने हुए पैटर्न देखते रहे | बाल सफ़ेद होने लगे हैं क्या ? उसने उठकर आइना ढूँढने की कोशिश की | बैग के अन्दर वाले हिस्से मे से आइना निकालकर देखा | कमरे की लाईट जलाई, ओह लाईट तो कल रात से ही गायब है | खिड़की के पास ले जाकर आईने में कुछ खोजने जैसे लगा | नहीं , बाल सफ़ेद नहीं हुए हैं , सुधीर ने आईने को चेहरे के दायें बाएं घुमाया | शेव भी नहीं की है, लेकिन अभी गरम पानी कहाँ से मिलेगा | दुबारा जाकर बिस्तर पर लेट गए | कुछ सोचने के बाद एकदम से उठे और गैस पर गरम करने के लिए पानी चढ़ा दिया | पुरानी डायरी खोल के पढ़ने लगे जो आदमी, समझिये उसे पढ़ के कुछ और बूढ़ा होता जा रहा है | शायद वाकई मैं बूढ़ा हो रहा हूँ , सुधीर ने मन ही मन सोचा | ये डायरी एक ज़माने से पढ़ी नहीं , लेकिन हर जगह इसे अपने साथ रखकर घूमता हूँ | इसे फेंक देना चाहता हूँ , लेकिन पुरानी चीज़ों से पता नहीं लगाव क्यूँ होता जाता है | छः दिसंबर बयानवे, पौड़ी , आज मैंने श्रद्धा को फ़ोन किया | सोलह दिसंबर बयानवे, श्रद्धा को फ़ोन किया | टेड़े मेड़े अक्षरों में कुछ कुछ गूढ़ जानकारी सी लिखी हुई थी | तीस जनवरी तेरानवे, श्रद्धा के घर फ़ोन किया , बात नहीं हो पायी | सुधीर ने डायरी को टेबल की ओर उछाल दिया | ओंधे मुँह गिरने से पहले डायरी के बीच से एक छोटा सा कार्ड गिर गया | तीन दिसंबर बयानवे , हैप्पी बर्थडे टु माय डियरेस्ट फ्रेंड , फ्रॉम श्रद्धा |

- क्रमश:

Monday, January 3, 2011

परिंदे - पहला भाग

[कहानी अधूरी है , पूरी कब तक होगी , होगी भी या नहीं , पूरे विश्वास से नहीं कह सकता | अधूरे ड्राफ्ट पढ़ने का भी अपना मजा है | सोचते रहो , अंदाजे लगाते रहो, कहानी पूरी करो , आपके अन्दर भी तो एक अफ़सानानिगार छुपा बैठा है]

शाम का धुंधलका छाने लगा था | पगडण्डी की मोड़ों पर अँधेरा पाँव पसारने लगा था | बेतरतीब उग आई झाड़ियाँ अँधेरे को पनाह देती सी महसूस होती हैं | पहाड़ों में हरे रंग की कालिमा के बीच बीच में भूरा रंग उजला लग रहा था | प्रोफ़ेसर उप्रेती चलते चलते ठिठक गए | जैकेट की जेब में हाथ डालकर अपना पसंदीदा सिगरेट ब्रांड निकाला, कैप्सटन | पीछे पीछे जमीन देखता सुधीर भी रुक गया | प्रोफ़ेसर हर एक जेब में हाथ डालकर माचिस ढूँढने की नाकाम कोशिश करने लगे | बीच बीच में हाथ झटककर नाउम्मीद भी होते | सुधीर ने माचिस की डिबिया उनकी तरफ बढ़ा दी | प्रोफ़ेसर खिसियानी हँसी हँस पड़े | "भगवान् की तलाश सबसे ज्यादा नास्तिक को ही होती है | तुम कब से माचिस रखने लगे ?" सुधीर ने सिर्फ हूँ किया, प्रोफ़ेसर के भूलने की आदत वो जानता था |
"तुमको अर्चना याद है ? अर्चना सेमवाल ? शायद तुम्हारी सीनियर रही होगी |" प्रोफ़ेसर ने धीरे से कहा | सुधीर का कोई जवाब नहीं आया, बात उस तक नहीं पहुंची |

"जिंदगी का गणित कुछ अजीब नहीं लगता तुम्हें ?" प्रोफ़ेसर ने सवाल किया | सुधीर का ध्यान इस ओर नहीं था | प्रोफ़ेसर ने अपना सवाल दोहराया |
"आपको ऐसा क्यों लगता है प्रोफ़ेसर ?"
"अर्चना के बारे में सोचकर लगता है | मेरी सबसे होनहार स्टुडेंट |" प्रोफ़ेसर आगे आगे चल रहे थे | पगडंडी इतनी छोटी थी कि दो लोग एक साथ नहीं चल सकते थे | बात करने के लिए लगभग चिल्लाना पड़ रहा था |
"प्रोफ़ेसर! अब वापस चलें ? हम लोग काफी दूर आ गए हैं कॉलेज से | अँधेरा भी घिरने लगा है |" सुधीर ने चिल्लाकर कहा | दोनों वापस मुड़ गए | अब सुधीर आगे आगे चल रहा था, प्रोफ़ेसर पीछे | पटकथा वही थी, बस पात्र आपस में बदल लिए | कॉलेज के मैदान में पीली रौशनी जलने लगी थी | फ़ुटबाल खेलने वाले लड़के अब होहल्ला करते हुए, एक दूसरे को गाली देते हुए अपने होस्टल की ओर जा रहे होंगे | गंगोत्री गर्ल्स होस्टल के गेट पर खड़े लड़के लड़की अब एक दूसरे से विदा लेने लगे होंगे | कॉलेज में ऑफिशियल रात हो गयी थी |
"आप कुछ कह रहे थे प्रोफ़ेसर |" सुधीर ने प्रोफ़ेसर को याद दिलाया |
"हाँ, अर्चना वापस आई है यहाँ पढ़ाने के लिए | तुम तो जानते हो अर्चना तुम्हारी सीनियर थी |"
सुधीर तब फर्स्ट इयर में आया था, जब अर्चना सेमवाल फाइनल इयर में थी | कॉलेज की जीनियस लडकी, मैकेनिकल इंजीनियरिंग में अपने बैच की अकेली लडकी | मैकेनिकल लेने वाली, बाद की कई लड़कियों के लिए वो प्रेरणाश्रोत बनी थी, मिस अर्चना | "मुझे पता है प्रोफ़ेसर लेकिन मेरी उनसे कोई जान-पहचान नहीं थी |"
"अर्चना ने प्रेम विवाह किया था, कुछ सालों में तलाक़, जब विवाह में प्रेम ही नहीं रहा |" प्रोफ़ेसर अब सुधीर के बगल में आ गए थे | "पगडण्डी पे सावधानी से कदम रखना, आगे फिसलन है |"
प्रोफ़ेसर ने एक गहरी सांस भरी, "शोभा और डॉली को अपने साथ रखने के लिए मैंने क्या क्या कोशिशें नहीं की | लेकिन शोभा गयी तो गयी, डॉली ने भी पूरा बचपन बाप के बिना गुज़ार लिया |" सुधीर चुपचाप चलता रहा, कहने के लिए कुछ नहीं था | प्रोफ़ेसर अपनी रौ में बोलते रहे, "डॉली की शादी भी हो गयी, लेकिन मुझे नहीं बुलाया | कभी कभी मिल आता हूँ उससे दिल्ली जाकर, लेकिन दिल्ली बहुत दूर है शायद अभी | वक़्त भी कितनी तेज़ भागता है न ? कल तक तो मेरी बच्ची थी डॉली, मेरी दुनिया | आज उसकी अपनी दुनिया है, जहाँ मेरे लिए कोई जगह नहीं |"
"आप, वहाँ क्यों नहीं चले जाते ? क्या रखा है यहाँ ?" सुधीर ने बेपरवाही से कहा |
"सूरज बुझते ही यहाँ रात हो जाती है | है न ?" प्रोफ़ेसर ने सिगरेट फेंक दी |
हलकी बूंदाबांदी फिर से होने लगी थी | दोनों तेज़ क़दमों से ट्रांसिट की ओर चलने लगे |
"प्रोफ़ेसर ! अभी स्वामी जी के पास गयी थी, लगा कि आप वहाँ होंगे | आज रात का खाना मेरे रूम में, ठीक ?" सामने मिस अर्चना खड़ी थी |
"क्या कर रहा है वो साला ? हमारे साथ घूमने भी नहीं आया |" प्रोफ़ेसर ने गुस्से से कहा | मिस अर्चना हँस पड़ी, सुधीर ने कनखियों से देखा, मिस अर्चना अभी भी सुन्दर लगती हैं |
"सुधीर! तुम भी हमारे साथ ही खाओगे |" मिस अर्चना ने आदेश के स्वर में कहा |
"मिस, मैं ...खुद..." सुधीर सकपका गए |
"अरे! सुधीर खा लो, कब तक विश्वामित्र की तरह तपस्या करते रहोगे |" प्रोफ़ेसर ने धीमे से कहा |
"क्या कहा आपने ?" मिस अर्चना ने दोनों हाथ कमर पे रख लिए |
"मैं कह रहा था कि खा लो, अर्चना खाना बहुत अच्छा बनाती है |" प्रोफ़ेसर ने शरारती मुस्कान से कहा |


खाना खाने के बाद सभी सुर-स्तव(बकौल स्वामी) का पान करने के लिए बैठ गए | सुधीर उनसे थोड़ी दूर बैठ गया, फ्रान्ज़ काफ्का में मुँह डालकर | किताबों में सुधीर की कोई दिलचस्पी नहीं है , लेकिन... | मिस अर्चना ने सुधीर से भी लेने का आग्रह किया, पर सुधीर टाल गए | बातों की कोई धुन छेड़े बिना सभी पी रहे थे | अचानक स्वामी बोले, "यार डॉक्टर, तुम कहाँ यहाँ हम लोगों के बीच चले आये | अच्छा खासा बेंगलोर में थे | पैसा भी बना रहे थे | बढ़िया कुलीन परिवार, शादी वादी करे रहते और फिर ..." बोलते बोलते रुक गए | सुधीर के लिए ये सवाल कभी आया न हो ऐसी बात नहीं थी | बस सुधीर को खुद कभी ये कोई सवाल नहीं लगा, "माँ ने शादी कराने के लिए काफी जोर लगाया था | तीनों भाई अपनी गृहस्थी में खुश हैं | फिर माँ चल बसी तो उस दुनिया के साथ जो ताना बाना था वो भी नहीं रहा | ऐसे ही एक दिन यहाँ चला आया |" ख़ामोशी एक बार फिर सबके मन में पसर गयी थी | बाहर टिन शेड पर बारिश की धीमी धीमी टप टप सुनी जा सकती थी | आज सुधीर का जन्मदिन था, माँ थी तो जन्मदिन भी याद रहता था | अब तो पता ही नहीं चलता और गुज़र जाता है | प्राग से कभी कभी भैया भाभी का फोन आ जाता है, साथ में छोटा अंशुल भी होता है |
"जिंदगी का गणित भी अजीब है प्रोफ़ेसर !" मिस अर्चना पहली बार बोली, सुधीर ने चौंककर प्रोफ़ेसर की ओर देखा, प्रोफ़ेसर धीमे से मुस्कुराये | अर्चना ने सिप लेकर अपनी बात जारी रखी, "जहाँ से नफ़ा होने की उम्मीद होती है, वहाँ से नुक्सान, है न प्रोफ़ेसर ?" प्रोफ़ेसर बन्द खिड़की को घूर रहे थे, "लाइफ इस व्हट हैपंस टु यू व्हाइल यू आर बिजी मेकिंग अदर प्लान्स" | स्वामी हल्के से हँस दिए, "प्रोफ़ेसर साला, हमेशा कुछ न कुछ फिलोसोफी मारता है | किताबें पढ़ पढ़ के पागल हो गया है |" सुधीर जानना चाहता था कि मिस अर्चना क्यों इस जगह पर चली आई, पूछने में संकोच हुआ तो नहीं पूछा | प्रोफ़ेसर ने कुछ कहा तो था कि तलाक़ लिया था मिस अर्चना ने, लेकिन फिर यहाँ आने की क्या जरूरत थी | सुबह की बरसात होने से धूप की उम्मीद बेमानी तो नहीं होती | जिंदगी एक बार फिर से भी तो शुरू हो सकती है | सपनों से हार जाना भी जीवन का एक अहम् पड़ाव है, सफ़र फिर भी जारी रहता है |
"मीरा देहरादून जाना चाहती है, जाह्नवी को लेकर |" स्वामी ने अपना सर झुका लिया |
प्रोफ़ेसर ने धीमे से पूछा "तुम क्यों नहीं चले जाते उनके साथ ?"
स्वामी ने बदले में कुछ न कहा | प्रोफ़ेसर उप्रेती ने शोभा को ऐसे ही जाते देखा था | शोभा, फिर कभी वापस नहीं आई | डॉली भी बदलकर अनुपमा हो गयी | दिल्ली विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र की प्रोफ़ेसर, मिसेज़ अनुपमा कोहली | "चलो खैर, देहरादून जाकर जाह्नवी की एडुकेशन ठीक से हो जायेगी, फ्यूचर अच्छा रहेगा |" प्रोफ़ेसर ने सिगरेट जलाते हुए कहा | "आपके घर से कोई पत्र नहीं आया, मिस अर्चना ?" स्वामी ने पूछा |
"नहीं" अर्चना एक बेबस हँसी हँस दी, "बाबूजी और छोटे भाई ने जो कहा था, पूरा किया | पिछले दिनों माँ की चिट्ठी आई थी, बाबूजी की तबियत खराब होने का जिक्र भी था |"
"तुम्हें जाना चाहिए था |" प्रोफ़ेसर ने खांसते खांसते कहा |
"पी एस में भाई ने लिखा था कि आने की कोई जरूरत नहीं है, पोस्ट करते वक़्त लिखा होगा |" अर्चना हाथ में पकडे ग्लास को काफी देर तक देखती रही, "धमकी के स्वर में अपने साइन भी किये थे |"
बाहर बारिश तेज़ हो चली थी, टिन शेड की टप टप अब संगीत न रहकर एक कुंठा हो चली थी | लैम्प की बत्ती अचानक तेज़ हो गयी थी | प्रोफ़ेसर ने आगे बढ़कर उसे थोड़ा धीमा किया | अर्चना के अन्दर भावनाओं का आलोड़न जारी था, "बाबूजी शायद न बचें, फिर उसके बाद भाई घर अपने नाम करना चाहेगा | आखिर उसके बीवी-बच्चे हैं, घर-गृहस्थी है | सब कुछ जानते हुए भी बाबूजी उसके नाम कर देंगे | पुरुषप्रधान समाज की हकीकत यही है | स्त्री पुरुष बराबरी, भेदभाव नहीं, से सब बातें सिर्फ घर से बाहर ही अच्छे लगती है | जिंदगी के गणित का एक अजीब सा समीकरण |" कॉलेज के शिवमंदिर से टन...टन की आवाज आ रही थी | शाम की आरती के बाद पुजारी रात को २ किलोमीटर दूर जंगल में अपने घर जाएगा | सर्दी , गर्मी , बरसात हो लेकिन पुजारी का नियम नहीं टूटता | सन्यास उसने लिया नहीं है, लेकिन अकथ, अदृश्य, अनाम को लेकर ऐसा पागलपन एक गृहस्थ में बिरले ही देखने को मिलता है | स्वामी ने हाथ जोड़कर हरिओम का घोष किया |
"बाबूजी ने बचपन से दिल्ली की लड़की बनाके रखा | पिछ्ड़ेपंथी से कहीं दूर, मोडर्न दुनिया में | इस दुनिया में लड़के -लड़कियों के बीच कोई फर्क नहीं है | दोनों जींस पहनते हैं, बाल कटाते हैं, फर्राटेदार अंग्रेजी में बात करते हैं | इंजीनियरिंग में एडमिशन के टाइम पर उन्हें अपना गाँव याद आया, गाँव से मेरा बर्थ सर्टिफिकेट बना लिया गया | फिर इंजीनियरिंग में विक्रांत से प्यार | एक साल के करीयर को समर्पित किया, फिर शादी | विक्रांत के रूप में सब कुछ मिला, और भी बड़ा परिवार, और भी बड़ा घर, और और भी बड़े बुद्धिजीवी | विक्रांत के साथ हर तरह से खुश थी मैं, मेरी मनमर्जी चलती थी | फिर वही, जिसपे खबरें बनती हैं; अविश्वास, शक, रोज़ रोज़ के झगड़े | मेरी जॉब छुड़वा दी गयी,फिर एक दिन चरित्रहीनता का आरोप लगाकर तलाक़ की अर्जी डाल दी गयी | अदालत में बैठकर सुनती रही कि मेरे अफ़ेयर किस किस से हैं | बदले में मेरे वकील ने भी विक्रांत के ऐसी ऐसी लड़कियों से रिश्ते निकाले, जिनके नाम मैंने भी नहीं सुने थे | तलाक़ तो खैर लेना ही था, लेकिन होड़ लगी थी कि कौन सामने वाले को ज्यादा पतित और स्खलित साबित कर सकता है | वो लोग जीत गए |" अर्चना के चेहरे पे सख्ती आने लगी थी | प्रोफ़ेसर फिर से बन्द खिड़की के बाहर देखने लगे, काले शीशे को, जैसे जानते हों कि सच और काला होने जा रहा है | अर्चना ने एक सिप और भरा, "अदालती कार्यवाही में मेरे वकील ने वो सब गलत साबित किया , लेकिन अब कोई फ़ायेदा नहीं था | कुछ दिन माँ के आँचल में चुपचाप सोई कुछ घूरती रही | एक दिन मेरा सारा सामान मेरे घर वापस पहुंचा दिया | उस दिन महसूस हुआ मानो दलदल में गिरी हुई हूँ | बस अब कोई रास्ता नहीं है, संघर्ष से और भी हार मिलेगी |"
"आपके घर वालों ने तो आपको सपोर्ट किया होगा |" सुधीर ने पहली बार मिस अर्चना से सीधा संवाद किया |
"भाई को अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा पर आंच आती दिखने लगी थी | हर एक बात में टोकाटोकी होने लगी थी | कभी कभी मुँह पर कह भी दिया जाता कि तुम तो हमें मत ही समझाओ | अपने आस पास बैठे बुद्धिजीवियों की नस्ल को गिद्धों से भी नीचे गिरते हुए देखा मैंने | कॉलेज में नियुक्तियां निकली तो माँ ने अपने अकाउंट में छुपाये हुए पैसे निकालके मुझे रोते हुए विदा किया |" अर्चना की आँखों में एक आँसू छटपटा रहा था |
"नफरत होती है ऐसे लोगों से |" प्रोफ़ेसर अपने आप में बड़बड़ाए |
"नफरत मुझे माँ से होती है | क्यों, इस सब के बीच में बेचारी सी बनी रही, लाचार बनी रही| अरे लोगों के खिलाफ मेरा पक्ष नहीं ले सकती थी, तो लोगों के साथ ही हो लेती | मेरे चरित्र को जब मेरे अपने ही बाजार में बेच रहे थे, तो वो भी कुछ नफ़ा कमा लेती | क्यों दोनों तरफ से हिस्सेदार बनना ?"
"अर्चना! उन्होंने तुम्हें यहाँ भेजा है, सबके विरोध के वावजूद |"
"यही तो ग़लतफ़हमी है स्वामीजी, उन्होंने मुझे वहाँ से भेज दिया | जो काम भाई, बाबूजी सारी लानत-मलानत भेजने के बाद भी नहीं कर सके, उन्होंने मुझे ममता के धोखे में रखकर कर दिया |"
"तुम अभी बहुत निर्दयता से आकलन कर रही हो अर्चना, वक़्त के साथ शायद तुम्हें ... |" प्रोफ़ेसर जानते थे वक़्त के साथ भी धारणाएं बदलनी बहुत मुश्किल होती हैं | आखिर यही था तो वक़्त उनके रिश्तों में जमी बर्फ क्यों नहीं पिघला पाया |
"वैसे आप सही कहते हैं प्रोफ़ेसर |" अर्चना के चेहरे पर सायास मुस्कान थी, "शान्ति और नीरवता के इस शमशान में, गिद्धों की आमद मंदिरों से कम है |"
"प्रोफ़ेसर! डॉली की तरफ से कोई ख़त आया ?" स्वामी ने एक हलकी झिझक के बाद पूछ लिया | खारापन जुबान पर अभी ताजा ही था, समंदर में थोड़ा सा नमक और डालने से समंदर नहीं बदलेगा |
"फोन आया था | एक बेटा हुआ है | कह रही थी, पापा, माथा बिलकुल आप का लगता है |" प्रोफ़ेसर बच्चों जैसे खुश हुए, लेकिन एक वक़्त के बाद हँसी को जबरन खींचा भी तो नहीं जाता, "फिर कहने लगी कि, पापा! पूछोगे नहीं माँ पर क्या गया है ?" सुधीर चौंका, लेकिन शांत बैठा रहा | मिस अर्चना अपने ग्लास को ध्यान से देखती रही | स्वामी खिड़की की ओर देखने लगे, जहाँ थोड़ी देर पहले तक प्रोफ़ेसर देख रहे थे |

- क्रमश:

Sunday, January 2, 2011

सात स्त्रियों का सपना देखो

हम यात्राएं करते हैं बाकी लोगों की तरह

महमूद दरवेश

हम यात्राएं करते हैं बाकी लोगों की तरह; लेकिन लौटते शून्य में हैं. जैसे कि
यात्रा बादलों का कोई रास्ता हो. हमने दफ़ना दिया अपने प्रियजनों को बादलों की छांह में पेड़ों की जड़ों के बीच
हमने अपनी पत्नियों से कहा: जन्म देती रहो सैकड़ों बरसों तक ताकि हम इस यात्रा को ख़त्म कर सकें
एक देश पहुंचने के एक घन्टा पहले, असम्भव से फ़क़त एक मीटर पहले!
हम यात्राएं करते हैं भक्तिगीतों के रथों में, फ़रिश्तों के तम्बुओं में सोते हैं, और पुनरुज्जीवित होते हैं
जिप्सियों की भाषा में.
हम दूरी को मापते हैं एक जादुई चिड़िया की चोंच से, और गाते हैं ताकि दूरी भूल जाए हमें
हम सफ़ाई करते हैं चांदनी की. तुम्हारी सड़क लम्बी है, सो सात स्त्रियों का सपना देखो ताकि
इस लम्बी यात्रा को अपने कन्धों पर लाद कर ले जा सको. खजूर के पेड़ों को हिलाकर रख दो उन के लिए.
तुम नामों को जानते हो, और यह भी कि उनमें से गैलिली के पुत्र को कौन जन्म देगी.
शब्दों का है हमारा मुल्क: बोलो. बोलो. मुझे एक पत्थर पर सुस्ता लेने दो अपनी सड़क को.
शब्दों का है हमारा मुल्क: बोलो. बोलो. देखने दो मुझे इस यात्रा का अन्त.

अमर सपूतों

उठो, धरा के अमर सपूतों ! पुन: नया निर्माण करो |
जन-जन के जीवन में फिर से नयी स्फूर्ति नव प्राण भरो 
नया प्रात है, नयी बात है, नयी किरण है, ज्योति नयी 
नयी उमंगें, नयी तरंगे, नयी आस है, साँस नयी 
युग-युग के मुरझे सुमनों में नयी-नयी मुसकान भरो |
डाल-डाल पर बैठ विहग कुछ नये स्वरों में गाते हैं 
गुन-गुन गुन-गुन करते भौंरे मस्त उधर मँडराते हैं 
नवयुग की नूतन वीणा में नया राग नव गान भरो |
कली-कली खिल रही इधर वह फूल-फूल मुस्काया है 
धरती माँ की आज हो रही नयी सुनहरी काया है 
नूतन मंगलमय ध्वनियों से गुंजित जग-उद्यान करो |
सरस्वती का पावन मन्दिर शुभ सम्पत्ति तुम्हारी है
तुम में से हर बालक इसका रक्षक और पुजारी है 
शत-शत दीपक जला ज्ञान का नवयुग का आह्वान करो ||
उठो, धरा के अमर सपूतों! पुन: नया निर्माण करो || 

Saturday, January 1, 2011

एक काली बिल्ली हम दो के बीच से गुज़रती है

शान्त है वह, मैं भी

महमूद दरवेश

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वह शान्त है
मैं भी
वह नींबू वाली चाय ऑर्डर करता है
और मैं कॉफ़ी पीता हूं
(हम दो में सिर्फ़ यही फ़र्क़ है)
मेरी ही तरह वह पहने है एक ढीली धारीदार कमीज़
और उसी की तरह मैं घूर रहा हूं एक मासिक पत्रिका को
वह मुझे नहीं देख रहा कि मैं कनखियों से उसे देख रहा हूं
मैं उसे नहीं देख रहा कि वह कनखियों से मुझे देख रहा है
वह शान्त है
मैं भी
वह वेटर से किसी चीज़ के लिए कहता है
मैं वेटर से किसी चीज़ के लिए कहता हूं
एक काली बिल्ली हम दो के बीच से गुज़रती है
और मैं उसकी रात जैसी फ़र को सहलाता हूं
वह उसकी राह जैसी फ़र को सहलाता है.
मैं उस से नहीं कहता: आज आसमान साफ़ है
ज़्यादा नीला.
वह मुझे नहीं बताता कि आज आसमान साफ़ है
उसे देखा जा रहा है और वह देख रहा है
मुझे देखा जा रहा है और मैं देख रहा हूं
मैं अपनी बांईं टांग हिलाता हूं
वह अपनी दाईं टांग हिलाता है
मैं एक गीत गुनगुनाता हूं
वह एक गीत गुनगुनाता है
मैं अचरज करता हूं: क्या वह कोई आईना है जिसमें मैं देख रहा हूं ख़ुद को?
तब मैं उसकी आंखों में देखता हूं, वह मुझे दिखाई नहीं देता.
जल्दबाज़ी में बाहर निकलता हूं मैं कहवाघर से
मैं सोचता हूं: हो सकता है वह एक हत्यारा हो,
या हो सकता है वह यूं ही गुज़रनेवाला राहगीर हो
हालांकि मैं हूं एक हत्यारा.

हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन..


इष्टजनों के मैसेज, मेल, फोन आदि-आदि आने पर तड़ाक से उठा कर बोल दिया..."आपको भी नया साल मुबारक हो !" काहे व्यर्थ में जश्न में टांग अड़ाई जाए. एक और कैलेण्डर पर ३६५ और खाने बने होंगे.. विद्यार्थी अपनी कॉपी पर तारीख के आख़िरी खाने में कुछ दिन गड़बड़ाएंगे, फिर आदत हो जाएगी... राष्ट्रीय राजधानी प्रदेश और 'आदर्श रहवासी शहर' समेत बड़े शहरों में देश की तमाम युवाशक्ति पबों, बारों और घरों में आँख बंद किए नाच रही होगी... कितनी कस कर आँखें बंद करनी पड़ेगी आईने से बचने के लिए. कार्डों की, गिफ्ट की, मोबाईल कंपनियों की, होटलों की अच्छी आमदनी होगी... कई ऐसे लोगों के मैसेज आएँगे जिन्हें आप और जो आपको साल भर से भूले हुए हैं, और अचानक वे आपके और आपके परिवार के लिए खुशनुमा ३६५ दिन भेंट कर निकल लेते हैं, अगले त्यौहार तक सामाजिक कर्तव्यों की इतिश्री करते हुए.
लेकिन नया साल सिर्फ मोबाईल वालों के लिए नहीं आएगा न केवल ईमेल वालों के लिए..आज सुबह आँख खुलने पर हर एक आदमी वहीं होगा..और शायद हर एक आदमी वही होगा, न्यू ईअर रेझोल्युशन भी दुनिया की तस्वीर नहीं बदल सकते. मेरी कोई "न्यू ईअर विश लिस्ट" नहीं है, मेरी झोली में शुभकामनाएं बहुत भरी हुई हैं, लेकिन मेरे लिए इनका वजन उठाना बहुत कठिन है क्योंकि मेरा यथार्थ पथरीला और चट्टानी है. दिनों-दिन यह एहसास घर करता जाता है कि सिर्फ सदिच्छाओं के बूते नैया पार नहीं लगेगी. गर आप और मैं इस नववर्ष में कोरी आशा के पार जा कर देख सकें तो बहुत कुछ है.

ऐसा नहीं है कि आशा के बहानों से मेरी कोई दुश्मनी है.. मैं तो यहाँ तक कहने के लिए तैयार हूँ, कि क्यों नहीं हम हर महीने शुभ नवमाह कहने की परम्परा डालें. हम संकल्प भी लें... जनवरी के महीने में हम संकल्प लें कि फुटपाथ पर सोते हुए लोगों पर हम गाडी नहीं चढ़ाएंगे, या फरवरी के महीने में हम संकल्प लें कि हम कीटनाशक दवा पर चेतावनी लिख कर चस्पा कर देंगे कि इसे पीकर किसानों का आत्महत्या करना मना है, मार्च के महीने में हम कहें कि जो लोग भूख से मर रहे हैं वो कुपोषण से मरें ताकि नवमाह की खुशियों में खलल न पड़े और देश का नाम बदनाम न हो, अप्रैल में हम कसम खाएं कि जो लोग विकास परियोजनाओं में उजड़ रहे हैं उनके लिए गारंटी के साथ चौकीदार की नौकरी दी जाएगी, मई में हम कहें कि सरकार मई दिवस की खुशी में मजदूरों को साल भर कम मजदूरी में जानवरों जैसे खटाने के एवज में एक सीईओ की एक दिन पिटाई करने का अवसर देगी. जून में दलितों से कहा जाए कि नवमाह जून की खुशी में आपपर कुछ नामी-गिरामी बालनेता उपकार करेंगे आपके साथ खाना खाकर, (कृपया पाउडर लगा कर झोपड़े में बैठें, आप टीवी पर हैं) जुलाई में देर कर रहे मानसून से निवेदन किया जाए कि तुम कृपया वनडे मैच के दिन मत बरसों.. फिर भले ही बरसकर बाढ़ लाते रहो बिहार में, कौन सी नई बात है, अगस्त में सब सैनिक संकल्प लें कि वे एक दिन में एक ही गैर मराठी को पीटेंगे और एक माह में एक ही लेखक की किताब बैन करवाएँगे.. आखिर संयम राष्ट्ररक्षकों की पूंजी है (दुसरे संकल्प में कांग्रेसी मुख्यमंत्री भी शरीक हों) सितम्बर में रिक्शाचालकों से कहा जाए कि वे राष्ट्रहित में सड़कें कार वालों के लिए खाली कर दें और फ्लाईओवर के नीचे बैठकर बीडी न पीयें इसका धुआं प्रदूषण का कारक है, अक्टूबर में मुसलमानों से कहा जाय कि वे कृपया बीच बीच में पुलिस के साथ संयुक्त शांतिकालीन युद्धाभ्यास करें ताकि फर्जी एनकाउन्टर में जल्द ही महारत हासिल की जा सके, नवम्बर में प्राथमिक उपचार के अभाव में मर रहे मरीजों के लिए बाबा रामदेव का योगाभ्यास और श्री श्री फलाने शंकर के जीने के गुर सीखना अनिवार्य करवाया जाए.. ताकि मरने से पहले एक बार आत्मिक शान्ति उन्हें प्राप्त हो सके. दिसंबर में समाचार चैनल वाले संकल्प लें कि शाहरुख खान की छींक जैसी ब्रेकिंग न्यूज के बीच भी हम कुछ समय सेलिब्रिटी एक्टिविस्ट के लिए निकालेंगे और मानवाधिकार के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करेंगे और राडिया-फाडिया आदि नामों को प्रेस की स्वतन्त्रता पर हमला मानेंगे.
खैर भैय्या अपन तो इतनाई जानते हैं कि, नए साल में जो कुछ नया होगा वो अच्छा होगा इसकी कोई गारंटी नहीं है. बस आप अपना काम करते रहो... और हो सके तो थोड़ा समय निकालकर आईना देखते रहो, नहीं तो हमारे समय पर जो मुखौटा चढ़ा हुआ है, उसके पार देखना बहुत मुश्किल है...
जोहार !
(फोटो गूगल से चुराया गया है)